शनिवार, 29 जून 2013

पानी

-  डॉ. पीसीलाल यादव   -

नदिया - तरिया, कुंवा - बवली, चाहे होवय बादर।
पानी हवय त मान हवय, मनखे होय के सागर।
पानी राहय ले पानी हे, पानी बिन करलई।
पानी हे त परान घलो, रूखराई के सुघरई।
पानी बचा के राख बने, पानी ले हे जिन्दगानी।
पानी बिन नई ते तैं हर, होबे पानी - पानी।
पानी हवय त मनखेपन, अउ मनखे के मरजाद।
पानी हवय तभे तो भाई, ये दुनिया हे आबाद।
पानी के मोल समझ नई, ते होबे पानी- पानी।
करे लपरही जिनगी म त, उतर जाही सरी पानी।
कहूँ नूरछूर कहूँ मीठ हे, पानी आनी - बानी।
पानी बचा परानी तभे, तोर होही बड़ाई।
नई तो लगथे सिरतोन अब, पानी बर होही लड़ाई।
बूँद - बूँद पानी ह बंधुवा, जिनगी बर अमरीत बूँद।
अवइया पीढ़ी बर सोच तैं, आँखी ल झन मूँद।
चंदा म बस जा तैं चाहे, छू ले भले अगास।
पानी बिना गुजर कहाँ हे ? पानी म बूताही पियास।
पानी ले प्रकृति उज्जर अउ, प्रकृति ले हे पानी।
पानी के राहत ले पानी हे, नई ते दुनिया हर पानी।
मनखे अस मरजाद में रह, झन कर तैं मनमानी।
पानी के बानी समझ पगला, पानी ले चढ़थे पानी।
बूँद - बूँद पानी के मोल, समझ झन कर नादानी।
पानी म जहर झन घोर, पानी ल रहन दे पानी।
जादा अतलंग करे अबूझ, मुड़ ऊपर होही पानी।
तब कोन तोर गोहार सुनही ? पानी - पानी - पानी।
घर - खार, नरवा - नंदिया ले, सागर समाथे पानी।
ठऊर - ठऊर रोक पानी, बन धरती बर बरदानी।
हरियर जंगल, हरियर खेत, पानी ले सबे खेल।
पानी हे त जग परभूती, मनखे - मनखे के मेल।
पानी बचा के जिनगी बचा, कर पानी के मान।
नई ते पानी - पानी काहत, निकल जही तोर परान।
गाँव सहर, घरो - घर होवय, जल संरक्षण के जोखा।
जल हे त कल हे, नई ते, जिनगी अलहन धोखा।
ठऊर- ठऊर बंधना बांध, जतन कर ले पानी के।
तभेच साख रही अड़हा, जीव - जगत जिनगानी के।
प्रकृति के अनमोल देन, पानी बिसा पियत हस।
पईसा हे त पानी बजारू, को जिनगी जियत हस?
धन जमा करथस तईसे, पानी घलो जमा कर ले।
पानी जमा करके जग में, दुनिया के भला कर ले।
पानी म मोती हर मिलथे, पानी म मिलथे मान।
पानी बिन बिरथा मंदिर, बिरथा हवय भगवान।
पहार- परबत, जंगल- हरियर, पानी ले  हरियर परान।
हाँसत- खेलत दुनिया सुग्घर, पानी बिना समसान।
पानी बचा के धरम कमा, पुन के बन तैं भागी।
पानी बिना कईसे बुझाही, जरत पेट के आगी।
सजला जल हे पानी तब, लगे पानी ठट्ठा हाँसी।
पानी म परदूसन होही तब, बनही गर के फाँसी।
कोनो भला बतावय के, पानी के रंग हेे कईसन?
अरे जेला घोर दे पानी में, हो जथे पानी वइसन।
पानी के परपात पहिचान, पानी संग कर मितानी।
पानी संग घूर के तहूँ संगी, हो जा पानी- पानी।
पानी ले सिख तैं मनखे, मिलना अउ मिलाना।
पानी गंवागे जिनगी गंवागे, त जिनगी भर पछताना।
माढ़े पानी बोहावत पानी, पानी ह तो पानी।
पारा- पारा पानी बर देख, होवत गिध मसानी।
पानी ले हे बान मनुख के, पानी च ले हे बानी।
पानी उरकत सांस उरके, का पानी गाय दुहानी?
परन कर ले पानी बर तैं, पानी ल बचा संगवारी।
जग- जिनगी ह महमहाय, हांसय फूल- फूलवारी।
पानी बचा पानी बर अउ, पानी के खाले किरिया।
पानी- पानी हे जिनगानी, पानी के बन जा झिरिया।
पानी बिना धरती ह तिपे, तात हे पवन झकोरा।
पुरवाही के बदला म आथे, बिनास करइया बड़ोरा।
सुन सिरजन के गीत, गूँजे, पानी के लाहरा म।
ममता के मोती मिलथे, जिनगी के दाहरा म।
पानी के परछो मत ले, पानी के गा ले गीत।
पानी संग पिरित कर ले, पानी ल बना ले मीत।
पुरखा कइसे बचाय पानी, पुरखा के कुछ सीख।
नई बचाबे पानी त सोच, नई मिलही घलो भीख।
पाट- पाट के  हमन तरिया, बना डरेन घर- कुरिया।
कहां नंदा गे कोजनी छै आगर छै कोरी तरिया।
डबरी घोल नई दिखय अब, नई दिखे कहूँ डबरा।
बजबजावत नाली भरे हे, का होगेस मिठलबरा?
पुरखा कोड़ावय कुंआ बावली, अउ कोड़ावय तरिया।
चारों मुड़ा पानी च पानी, गाँव- खेत- खार- परिया।
कुँआ ह कचरा दान लहुट गे, अइसन हमर करम हे।
पुरखा के नाव बुड़ोवत हम, का इही हमर धरम हे?
घर के पानी घर में छेंकव, गाँव के पानी ल गाँव।
पानी पाही धरती ह तभे, मिलही ममता के छाँव।
सावन भादो सुक्खा परथे, जेठ कस तिपे घाम।
पानी बिन हा- हाकार होगे, लगथे पूर्ण बिराम।
बादर ले बरसथे पानी त,धर के तन हरियाथे।
रूखराई अउ चिरई- चिरगुन, जीव सरी मुस्काथे।
जीयत पानी मरत म पानी, पानी जिनगी के नाँव।
पानी ले परान हे सबो के, का सहर का गाँव?
पानी रही त मरे म बेटा, नाती ह देही पानी।
नई ते परलोक म घलो नई, मिलही तोला पानी।
धरती मन भर पानी पीही, तभे तो दीही पानी।
धरती रही पियासे तब तो, कहाँ के पाबे पानी?
ठाँव- ठाँव गिरमिट कस बोर, धरती ह बेधावथे।
पीरा के मारे धरती दाई, कलप- कलप गोहरावथे।
पानी बचा ले भविष्य बर, तैं धरती के संतान।
नई ते पानी बिना तोर, होही जी मरे बिहान।
पानी सकेल बचा ले बने, बाढ़ही तोरेच पुन।
ुपुरखा के करम करनी ल, तरिया काहथे सुन।
सरोवर ह धरोहर आय, कर पुरखा के मान।
तरिया कुंआ बउली के अब, झन होवय हिनमान।
पानी बिरथा बोहाय झन, पानी ल बने सकेल।
पानी आवय अमरित बूंद, पानी संग झन खेल।
गंगा भर ह गंगा नोहे, सबो जल आवय गंगा।
मान कर गंगा के मनुख, तन - मन रही तोर चंगा।
झिमिर - झिमिर पानी गिरय, बरसय अमरित धार।
नरवा - ढोड़गी ल बाँध के, पानी ल सकेल सम्हार।
उदीम करके बरसा के पानी, भुँइया भीतर ओइला।
नई ते कंचन काया ह तोर, हो जही संगी कोइला।
दिनों - दिन काबर कइसे के, पानी होत हे कमती ?
बाढ़त तोर सुख - सुभित्ता, तिसना होवत लमती।
भटगे कुँआ - भटगे बउली, भटगे तरिया - पंइठू।
अइसने तोरो जिनगी भटही, गरबी मनुख अइंठू।
कुंवा म काड़ी कचरा डारे, तोर इही का चिन्हारी ?
पुरखा के पुन म डामर पोते, रऊँदे फूल - फुलवारी।
रुख लगा के भूख भगा ले, रोक बरसा के पानी।
पानी बिना कइसन जिनगी, कइसे होही किसानी ?
सोंच - समझ के पानी बउर, रोज बचा तैं पानी।
जिनगी के नुकसानी आय, पानी के नुकसानी।
पानी बचा के पानी पलो, जिनगी राहय हरियर।
तभे आंखी में सपना के, फुलही फुलवा सुघ्घर।
पानी ये परान मान येला, बिरथा झन तैं बोहा।
पानी ये तुलसी के चौपाई, कबीरदास के दोहा।
पानी करे बरबाद त जान, दुख भोगे ल परही।
नहाय बर पानी कहां पाबे ? तेल कस चुपरे लगही।
नाहना खोरना, कपड़ा धोना, जेवन बर चाही पानी।
बिन पानी काम चलय न, पीये बर चाही पानी।
छानी - छप्पर छत के पानी, अंगना म तैं रोक।
गड्ढा खन के तोप ढांक, भुईया म पानी झोंक।
धरती दाई पानी ले जब, पेट भरहा अघाही।
तभे जग जिनगी के घलो, पियास बने बुताही।
बचा - बचा के निसदिन तैं, पानी ल बने बउर।
तभे से सब ल मिलही सुग्घर पानी ठउर - ठउर।
पानी घलो देवता धामी, पानी पोथी पुरान।
पानी बिन न मुक्ति मिले, न पानी बिन भगवान।
पानी राहय ले जिनगानी, इही पानी के परमान।
पानी उतरगे मान उतरगे, जिनगी के अवसान।
पानी उलच जिनगी उलचे, कइसन तोर करतूती ?
पानी बचा के राख रइही, मनखे तोर परभूति।
मरकी मरका, करसी - करसा, हउंला लोटा गिलास।
तोर आगू तोर करनी म, हवय निरजला उपास।
पानी के पाँव म बाँध ले, मया पिरित के डोरी।
बाँध बंधान नंदिया बने, गाँव खाल्हे के झोरी।
चेतकर मइलाय कभू झन, पानी अउ पुरवाही।
इंखरे भरोसा जग - जिनगी, इही बुताही हाही।
पानी - पानी रटत रहिबे नई, मिलही तोला पानी।
जे दिन सिराही पानी तोर, ते दिन खतम कहानी।
नरवा - ढोड़गा, नंदिया - तरिया, कुंवा मरे पियास।
बिन बरसे अउ बिन परसे, नाहकय हवय चम्मास।
पानी बिना न पूजा - पाठ, न पानी बिना अस्नान।
पानी रहत ले परान कइथे, गीता बाइबिल कुरान।
भविस्य ल सोच - समझ के बचा के राख पानी।
अवइया नवा पीढ़ी बर तैं लिख ले नवा कहानी।
घर बाहिर सबे ठउर कर, वाटरहार्वेस्टिंग के जोखा।
पानी बचा के लइका ल दे, भविस्य के भरोसा।
  • गण्डई - पण्डरिया, जिला - राजनांदगांव छ.ग.

बचपन

- हरप्रसाद ' निडर '  -

अंतर्मन की साँसे रिमझिम, जग में यूँ बगराया।
तब छंदो ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।
    शब्द - शब्द है अर्थ घनेरे,
    यादें बचपन की जिद्दी।
    फुदक रही है मन अँगना,
    डाल - डाल प्यारी पिद्दी।
जब - जब देखा उस अल्हड़ को, उसने खूब रुलाया।
 तब छंदों ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।
    आस लगी है वह जीवन हो,
    यह तो हो गया झमेला।
    लौट न पाता पर बेचारा,
    है लगता पड़ा अकेला।
फिर भी वह मौसम अलबेला, अपना कर्ज चुकाया।
तब छंदों ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।
    चंचल मन है बांध पखेरु,
    यहाँ - कहाँ वो रुकने वाला।
    उड़ चला विश्राम डगर पर,
    देख इधर का गड़बड़ झाला।
रात कटी, पल गुजरा बरबस, सपन सलोने भुलाया।
तब छंदों ने रस निचोड़कर, मुझको गीत सुनाया।

पत्थरों से सर टकराने का

-  जितेन्द्र ' सुकुमार '   -

पत्थरों से सर टकराने का अंजाम मिला।
बेवजह मुस्कराने का अंजाम मिला।

लोग दुश्मन को गले लगाते हैं खुशी से,
मुझे दोस्तों को गले लगाने का अंजाम मिला।

वो बेनज़ीर है इसमें मेरा क्या कसूर,
हमें नज़र से नज़र मिलाने का अंजाम मिला।

छुपाने वाले छुपाते रहे दास्ता ए हकीकत,
हमें हमराज बनाने का अंजाम मिला।

क्या माना हमने गैरों को अपना,
हमें रिश्तें निभाने का अंजाम मिला।

अच्छा था उजड़ा ही रहा हयात सुकुमार,
यहाँ जि़दगी को सजाने का अंजाम मिला।
  • पता - चौबेबांध राजिम, जिला - रायपुर (छ.ग.)

अम्मा ऐसी बहू लाना

- आलोक तिवारी  -


जो न आये पालकी में बैठकर
ना कहारों के कंधे में चढ़कर
चल के आये अपने पैरों से।
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो कभी न कराये भू्रण लिंग परीक्षण
समझे लिंग अनुपात का महत्तव
ताकि बेटियाँ मुस्करा सके।
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो पानी का न करे फिजूल खर्च
करे जल की बचत ताकि बच सके
नदिया - तालाब और हम।
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो समझे ऊर्जा संरक्षण का मतलब
बुझा के रखे अनावश्यक बत्तियाँ
ताकि रोशन हो सके कई और घर
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो जाने वृक्षों का महत्व
पूजे वट वृक्ष पीपल को, अपने हाथों से
लगाये पौधे ताकि हो सके
धरती का श्रृंगार और मुझे दहेज में मिले
स्वस्थ जीवन की सौगात।
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो बैठी ना रहे रंगों के इंतजार में
आटे से भी बना सके रंगोली
भर सके अपने प्यार का रंग।
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो नये बर्तन खरीदे तो
लिखवाये तेरा नाम
ताकि घर रह सके एक
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो बच्चे के दाखिले के समय
बाप के साथ चढ़वाये अपना भी नाम
ताकि वल्दियत को सही पहचान मिले
    अम्मा ऐसी बहू लाना
जो हो दूरदृष्टा
पर हर चीज को देखती हो निकट से
  • पता - रत्ना निवास, पाठक वार्ड, कटनी ( म. प्र.)

मन मा गजब उमंग रे

-  मुकुन्द कौशल -

सबो कती पिरथी मा बगरे, हरियर - हरियर रंग रे।
पानी के बरसे ले जागिस, मन मा गजब उमंग रे।।
खनन् - खनन् - खन् चूरी बाजै
बोलै मन के बात
सरर - सरर अँचरा उड़ि जावै
पुरवा के लहरात
घेरी - बेरी केंस बगर के करथे मोला तंग रे।
पानी के बरसे ले जागिस मन मा गजब उमंग रे।।
एक्के दारी देख के कइसन
जादू कस कर डारिस
आँखी के ढेंकी मा जिउ ला
चाँउर कस छर डारिस
ये अलकरहा पीरा पा के, टूटै जम्मो अंग रे।
पानी के बरसे ले जागिस, मन मा गजब उमंग रे।।
सोवत - जागत उन्कर सपना
देखत रहिथे आँखी
उनला पा के हमरो जिउरा
होगै सूवा पाँखी
मन करथे पानी मा फींजौ, पतरेंगा के संग रे।
पानी के बरसे ले जागिस, मन मा गजब उमंग रे।।

  • पता - एम - 516, पद्नाभपुर, दुर्ग छ.ग. - 491001  

पुस्तक समीक्षा : माटी के सोंध - सोंध गन्ध भरे कविता के संग्रह

-  समीक्षक - सरला शर्मा  -

कवि अउ ब्रम्हा दूनों ल सिरजनहार कहिथें, फेर फरक अतके हावय के ब्रम्हा के सिरजे संसार ले देख सुनके हित अहित, नफा नुकसान बने मइहन ल गुन के, बिचार करके कवि अलग संसार बसाथे जेमा दया, धरम सत इमान के जय जयकार सुनाथे त दूसर बेईमानी, परपंच, भ्रष्टाचार, अनदेखई के विरोध के सुर अकास धुवत दिख्रथे इही हर कवि के आपदधर्म आय। एकर ले विमुख होके कविता कभू लोकमंगलकारी नइ हो सकय, आनंद तिवारी पौराणिक ये कसौटी म सोरा आना खरा साबित हो गइन। पिरीत के पुरइन पान लिख के। दूसर बात के ये संगरह म आनी - बानी कविता हावय फेर समाज म घटत मन के चित्रण पूरा इमानदारी से करे गए हे। इही देखव न -
तरक्की के मंतर देत हंव फिरी।
कलजुग म बड़े हावय चमचागिरी।।
कागजी तरक्की ल पढ़त - सुनत आंखी बोजागे त कवि कल्ला के कथे -
बड़ तरक्की होवत हे ...
जेती देखबे घोटाला
रिस्वत के बजार हे इमान धरम
सत ह बोहावत धारे धार हे ...
हड़ताल करइया मन भूख मरत हे, दलाल रोटी सेंकत हें त नेता मन दूनो जुआर सोहांरी तसमई धड़कत हें। अतके नहीं सरकारी रासन दुकान म जनता बर मिलइया सस्ता रासन कबके सिराग रातोरात बड़का सेठ के गोदाम भरगे त कवि ल लिखे बर परिस -
रासन के दुकान ले चांऊर दार नंदा गे
पौराणिक जी छत्तीसगढ़ी गजल कहे हंवय ओइसे तो गजल हर परेम पिरीत के भावधारा वाला होथे फेर ऊ गजल कहे हे व्यंग करे बर बानगी देखव -
आनी बानी के बाना धरत हे मनखे।
जेठ के भोंमरा कस तपत हे मनखे।।
आजकल चारो मुड़ा भीख मंगइन के भीड़ दिखथे। किसिम - किसिम के भिखमंगा। कोनो वोट मांगत दिखथे कोनो आसरम चलाये बर दान, कोनो स्कूल बर चंदा मांगत दिखथे त कोनो कोनो भिखमंगा भगवान के भेख धर के भीख मांगत दिख जाथे कुछू कहव आंय तो सबो झन भिखमंगा च न। तीन - गोड़िया के परयोग हर हिन्दी के छनिका के सुरता देवा दिहीस बड़ नीक लागिस थोरकुन शब्द म बड़का जब्बर बिचार उजागर होये हवय। आप मन पढ़ देखव न सुग्घर  तीन गोड़िया ल-
मंगनी म घलो अब मांगत हे मया।
दुकान म बेचावत हे दया,
बजार जिनिस होगे लाज, सरम, हया।
आतंकवाद के आगी म जर भुंजा जवइया अऊ लेसइया दूनो के न जात हे न धरम। त कवि कहिथे - कुचर दव ये आतंकवाद ल अइसन कुचरव के फेर कभू कोनो दिन कोनो गाँव, सहर, गली, मोहल्ला म मूड़ उठाये झन सकय। परकीरती चित्रण  म पौराणिक जी के कलम जादू जगा देथे -
बखरी के गोंदा हांस- हांस बिजराथे।
महर - महर दवना ह बड़ मटमटाथे।।
हमर कृषि संसकीरति वाला छत्तीसगढ़ बर सावन भादो के बढ़ महत्ता हे तभे त कवि गावत हे -
बरसत हे जलधार, असाढ़ के फुहार।
घुमरत हे करिया बादर बिजुरी चमकगे,
पानी झमाझम बरसगे नहावत हे रुख राई,
धरती के करे बर सिंगार,
परत हे असाड़ के फुहार।।
बियोग म बिरहा गीत कोनो नवा बात नोहय त देखव तो पौराणिक जी मयारु के सुरता करत हे, फेर ददा दाई भाई भौजी नदिया नरवा गाँव गिराम ल घलाव भुलाये नइहे। काबर के इही मन संग मयारु के दिन कटत हे त मयारु के दुख बिपत के संगी मन कवि मन ल परभावित तो करबे करही।
बरसत होही सावन मयारु तोर गाँव म।
बड़ी भुतही कस जूड़ हवा ह चलत होही।
नदिया अऊ नरवा म घार बोहावत होही,
हरियर दीखत होही खेत खार।
बारी म मोंगरा ममहावत होही, तोर फुलवारी,
बबा ह आल्हा गावत होही गुड़ी गाँव म।
बरसत होही सावन मयारु तोर गाँव म।।
ये कविता संगरह म हमर परम्परा, संसकीरती, माटी के  सोंध, गाँव गिराम के सहज सरल जीवन के झांकी बढ़ सुग्गर बरचित हे। इही सबो हर तो छत्तीसगढ़ी कविता के आधार आय। पौराणिक जी के कविता के जब्बर गुन वर्णनात्मक सैली अऊ चित्रात्मक आय। कोनो - कोनो मेर चिटिक धियान देहे बर परथे। बानगी देखव -
जउन ह संसो म पर जाथे
वो हर डरपोकना कहलाथे।
जउन के जघा म जेहर अऊ कहलाथे के जघा म कहाथे होतिस त कविता के सुघराई संग गुनवत्ता बाढ़ जातिस। उर्दू के मौसम, हमजोली असन शब्द के परयोग हर भासा के सुघराई बढ़ोये के काम करे हे।
पूरा संगरह ल पढ़ के जानेंव के पौराणिक जी के कविता उंकर तपसी मन में भभूत आय अऊ छत्तीसगढ़ी भासा ल संवारे सजाये साहित्य के दरबार म उंच पीढ़ा देवाय के उंकर साधना आय जेकर फल हम सबो पढ़ईया - लिखईया, सुनईया मन ल मिलही। इतिहास लिखाही त पौराणिक जी के पिरीत के पुरइन पान के बीच - बीच म कमल फूल दिखबे करही एमा दू मत नइ हे। सरसती दाई उंकर ऊपर किरपा बरसावत रहय अऊ छत्तीसगढ़िया पाठक मन ल सुग्घर कविता पढ़े मिलत रहय।

समवेत प्रयास से ही राजभाषा समृद्ध होगी


-  सुनील कुमार '' तनहा ''  -

पिछले दिनों हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति का प्रांतीय अधिवेशन रायपुर के दुधाधारी मठ में संपन्न हुआ। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी प्रदेश भर से सैकड़ों साहित्यकार इस सम्मेलन में भाग लिए। वक्ताओं ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ी भाषा  साहित्य की समृद्धि व प्रचार - प्रसार का पुराना फार्मूूला सुझाया तथा अब तक छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य के प्रति शासन प्रशासन व जनमानस में अपेक्षित समादर भाव की कमी व अरुचि के प्रति खूब आँसू बहाया।
कुछ वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद  छत्तीसगढ़ शासन द्वारा व्यापक पैमाने पर छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा का आरोप लगाया तथा कुछ ने छत्तीसगढ़ी भाषा का अध्ययन व अध्यापन प्रायमरी स्कूल से  करने की पुरजोर वकालत की। कुछ एक वक्ताओं ने तो छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों के छत्तीसगढ़ी साहित्य को सरकार द्वारा अपने खर्च पर प्रकाशित करके प्रसारित करने की बात भी कही।
खैर छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विकास के प्रति प्रांत भर से आये हुए साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों के द्वारा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मानसिक व्यायाम करके छत्तीसगढ़ी डे मनाकर औपचारिकता पूरी की गई। समिति द्वारा कुछ योग्य व अयोग्य साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। रात्रि काव्य पाठ हुआ। पूरी कवायद में इस वर्ष भी आम श्रोता नदारत ही थे और कार्यक्रम समाप्त हो गया। इस आशा के साथ कि अगले वर्ष भी यही दृश्य उपस्थित कर सकें।
वास्तव में उक्त नजारा मुझे हर वर्ष एक ही फिल्म को पुन: - पुन: देखने की तरह महसूस हुआ। आखिर छत्तीसगढ़ को राज्य बने दस वर्ष बीत गये लेकिन राजभाषा छत्तीसगढ़ी अब तक राजकाज की भाषा नहीं बन पाई। छत्तीसगढ़ी वास्तव में अब तक उपेक्षित क्यों है ? क्या वजह है कि छत्तीसगढ़ी भाषा दो करोड़ से भी अधिक लोगों की मातृभाषा होते हुए भी छत्तीसगढ़ी भाषा राजकीय संवाद की भाषा नहीं बन पाई ?
निश्चित तौर पर हमारी राजभाषा की इस दयनीय स्थिति के लिए राज्य शासन ही प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। चूंकि प्रशासन के तमाम नौकरशाह व कार्यकर्ता जो कि नीचे से लेकर उपर तक के पदों पर विराजमान हंै वे लोग अधिकांशत: बाहरी प्रांत से आये हैं जिनकी आस्था बेशक छत्तीसगढ़ में है ही नहीं। इसलिए वे लोग स्वाभाविक रुप से छत्तीसगढ़ी बोली बोलने व लिखने के प्रति अरुचि ही रखते हैं। और इसी चक्कर में छत्तीसगढ़ी राजभाषा घोषित होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य के वटवृक्ष बनने का सपना देखना बेमानी - सा लग रहा है।
उक्त कार्यक्रम में दानेश्वर शर्मा  द्वारा पूछे गये एक प्रश्र के जवाब में समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए भी शासन द्वारा एक रुपये की सहायता नहीं दी गई है। यह बात वास्तव में छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य की उपेक्षा का ज्वलंत उदाहरण है। जबकि सरकार द्वारा अनेक प्रकार के औचित्यहीन उल जूलूल योजनाओं में लाखों रुपये का अनुदान मुक्त हस्त से बांट दिया जाता है। लेकिन प्रांतीय स्तर के ऐसे बड़े कार्यक्रम जिसमें हजारों की संख्या में छत्तीसगढ़ी साहित्यसेवक व विद्वान एक होकर छत्तीसगढ़ी साहित्य की समृद्धि के लिए प्रयास करते हैं, के लिए सरकार द्वारा फूटी कौड़ी की सहायता नहीं दिया जाता। वाकई प्रबल असंतोष का कारण है। ऐसे में साहित्यकारों के मन में भी हताशा की भावना उत्पन्न होगी। विशेष रेखांकित करने वाली बात तो यह भी थी कि उक्त राज्य स्तरीय कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की ओर से भी कोई सहयोगात्मक व्यवहार नहीं दिखाई दिया। यहां तक कि आयोग का एक भी सदस्य वहां उपस्थित नहीं हुआ।
छत्तीसगढ़ी भाषा - साहित्य की समृद्धि व विकास के लिए गठित आयोग के सदस्यगणों का आखिर ऐसे महत्वपूर्ण अवसरों पर नदारत रहना उनकी नीयत पर संदेह उपस्थित करती हैं। वैसे भी उक्त आयोग के अध्यक्ष व महामंत्री के बीच की आपसी अहं के टकराव की गूंज तो सभी सुन चुके हैं। उन दोनों को उनकी अड़ियल रवैये से  व्यक्तिगत क्या फायदा हो रहा है, यह तो वे ही जाने लेकिन इससे कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ी भाषा व साहित्य का अहित अधिक हो रहा है इसीलिए छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के प्रांतीय अध्यक्ष सुशील यदु ने आयोजन के पूर्व लिखे अपने लेख में उक्त आयोग को सफेद हाथी की संज्ञा दी थी।
वैसे सुशील यदु भी स्वयं आत्मावलोकन करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। उनके द्वारा किये जाने वाले ऐसे वार्षिक आयोजन में भी तटस्थता का अभाव दिखता है। लगता है यदु भी खास वर्ग के साहित्यकारों के प्रभाव में आकर काम करते हैं इसीलिए ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में वही घिसे पीटे लोगों को बार - बार प्राथमिकता देकर मंचासीन करते रहते हैं तथा योग्य व अयोग्य साहित्यकारों के बीच की विभाजन रेखा को भी नहीं समझ पाते। प्रांतीय स्तर के अध्यक्ष का इस तरह दबाव में आकर काम करना भी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। ऐसी स्थिति में प्रतिभावान व उपलब्धि युक्त साहित्यकार अपने आप को ठगा सा महसूस करता है और हतोत्साहित भी होता है।
इन परिस्थितियों में छत्तीसगढ़ी साहित्य व भाषा का भला कतई नहीं होने वाला है। यह समय अपने व्यक्तिगत स्वार्थ साधने का नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा की समृद्धि में अपना नि:स्वार्थ योगदान देने का है। हमें मिल जुलकर ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जिससे हमारी राजभाषा व साहित्य का समुचित विकास हो सकें एवं जन - जन उसे आत्मसात कर सकें। राज्य के 95 प्रतिशत लोगों द्वरा दैनिक जीवन में बोली जाने वाली लोक व्यवहार की भाषा भला अपनी धरती में कैसे उपेक्षित हो सकती है। इतनी बड़ी जनसंख्या का समर्थन मिलने के बावजूद हम अपनी राजभाषा व साहित्य को उचित सम्मान न दिला पायें तो यह हमारे लिए शर्मनाक है इसलिए आयें और समवेत रुप से इस दिशा में हम पुन: सकारात्मक कदम उठायें,जिससे राजभाषा व साहित्य का मान बढ़े एवं लोकप्रियता प्राप्त करें। प्रत्येक जिले में ऐसे भव्य कार्यक्रम वर्ष भर होते रहना चाहिए और छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए हर संभव उपाय  अपनाना चाहिए इसके लिए छत्तीसगढ़ शासन व स्तरीय प्रशासन खास आर्थिक सहयोग करें एवं ईमानदारी व कर्तव्यपूर्वक छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य रुप से राजकाज की भाषा बनाकर इसे जन - जन में लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न करें तभी छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा सही मायनों में स्थापित हो सकेगी।
  • पता - राजमहल चौक, कवर्धा [छ.ग.]

प्रेम और अनुराग का लोकस्‍वर : ददरिया




-  पीसी लाल यादव -

        लोक का नाम जब भी हमारे सामने आता है, तब वह हमारी वाणी और हृदय को सरसिक्त कर जाता है। हमारे अंतस में भावात्मक और रसात्मक आनंद की हिलोरें पैदा करता है। और हमारी आँखों के सामने रुपायित होता है सहज, सरल, भोले - भाले, परिश्रमी, झूमते, नाचते - गाते लोगों का समूह, जो अपनी परम्परा, सभ्यता और संस्कृति को अपनी लोक कलाओं के माध्यम से पोषित करता है। यही वह लोक है जो कोयल की तरह गाता है, मोर की तरह नाचता है तथा श्यामल मेघ की तरह सबकी प्यास बुझाता है।
       शिष्ट जन इस लोक को अशिष्ट कहते हैं। शायद शिष्टता का उन्हें ही ज्यादा ज्ञान हो ? पर मुझे लगता है कि किसी को अशिष्ट कह कर हम शिष्ट नहीं हो सकते। शिष्ट का संसार भौतिकता की चकाचौंध से आप्लावित स्वप्निल, काल्पनिक और जीवन के सत्य से दूर, बहुत दूर होता है। वहाँ केवल दिखावा ही दिखावा और छलावा ही छलावा होता है। न शांति होती है न प्रेम। केवल आपाधापी, तनाव और कुंठा का बोल बाला होता है। भला ऐसे में क्या तथाकथित शिष्ट सुखी हो सकता है ? कदापि नहीं। लोक का अपना सहज, सरल परन्तु सुखद और यथार्थ परक संसार होता है। भले ही लोक सुविधाओं से वंचित होता है, पर प्रेम, शांति, सद्भाव और साहचर्य से परिपूरित रहता है। इसकी अनुभूति तो लोक का सानिध्य प्राप्त कर ही किया जा सकता है। इसकी प्रतीति तो इनके साहित्य का अध्ययन और मनन कर की किया जा सकता है। लोक का साहित्य लोक साहित्य कहलाता है। लोक साहित्य लोक की निधि है। इस निधि में है लोक - गीतों के हीरे - मोती, लोक कथाओं और लोक गाथाओं के नीलम, लोकोक्तियों और पहेलियों के पन्ना जवाहरात। यदि संपत्ति शिष्टता का सूचक है, तो भला इतनी सारी संपत्तियों का मालिक लोक अशिष्ट कैसे हो सकता है ? हाँ निरीहता, अभावग्रस्त, गरीबी, सहजता और सरलता अशिष्टता का बोधक है तो लोक जरुर अशिष्ट है, असभ्य है पर अपनी परंपरा और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में इनकी यह अशिष्टता व असभ्यता कला - संस्कृति व प्रेम और प्रकृति के मामले में शिष्ट से भी विशिष्ट है। लोक की यही विशिष्टता लोक जीवन का माधुर्य है। लोक जीवन तो सदानीरा नदी की तरह आदिम काल से लोक मंगल के हित प्रवाहित हो रहा है। यदि कोई इस नदी से दूर रहकर प्यासा है तो गलती नदी की नहीं उस प्यासे की है, जो शिष्ट का आचरण कर दंभ के कारण नदी के पास जाने में भी अपनी तौहीन समझता है। नदी का जल कंठ की प्यास बुझाता है और लोक गीत कंठ से निसृत हो श्रवणेन्द्रिय से प्रवेश कर मन और आत्मा की प्यास बुझाते हैं।
       लोक गीत जहाँ जीवन में रस घोलते हैं, वहीं श्रम की क्लान्ति को भी मिटाते हैं। लोक गीत लोक के लिए ऊर्जा और प्रेरणा शक्ति का कार्य करते हैं। लोक में लोक गीतों की महत्ता कभी कम हुई न होगी। लोक गीतों के उद्गम और अंत के विषय में डॉ. श्याम परमार ने लिखा है - लोक गीतों के प्रारंभ के प्रति एक संभावना हमारे पास है, पर उसके अंत की कोई कल्पना नहीं। यह वह धारा है, जिसके अनेक छोटी - मोटी धाराओं ने मिलकर उसे सागर की तरह गंभीर बना दिया है। सदियों के घातो - प्रतिघातों ने आश्रय पाया है। मन की विभिन्न परिस्थितियों ने उनमें अपने मन के ताने - बाने बुने हैं। स्त्री - पुरुष ने थककर इसके माधुर्य में अपनी थकान मिटाई है। इसकी ध्वनि में बालक सोये है। जवानों में प्रेम की मस्ती आई है, बूढ़ों ने मन बहलाए हैं। वैरागियोंं ने उपदेशों का पान कराया है। विरही युवकों ने मन की कसक मिटाई है। किसानों ने अपने बड़े - बड़े खेत जोते हैं, मजदूरों ने विशाल भवनों पर पत्थर चढ़ाए हैं और मौजियों ने चुटकुले छोड़ें है। कहने का आशय यह कि लोक गीत जीवन को स्पंदित करते हैं। लोक जीवन के सुख - दुख को अपने में समेट कर लोक में आश्रय पाते हैं। लोक के हर वर्ग और जीवन के हर रंग के चितेरे हैं लोकगीत।
       छत्तीसगढ़ तो लोक गीतों का कुबेर है। छत्तीसगढ़ के मेहनतकश इन्सानों की धरती है। किसान और बसुंदरा की धरती। यहाँ न जंगल - जमीन की कमी है न डोली - डाँगर की और न ही जाँगर की। हरे - भरे खेत खार, जंगल - पहार, धन - धान्य से भरे कोठार जैसे इस धरती के श्रृंगार है। इस रत्नगर्भा धरती की कला और संस्कृति भी ठीक इन्द्र - धनुष की तरह बहुरंगी है। इसकी अलौकिक आभा लोक जीवन को अवलोकित करती है। यहां लोक गीतों का अक्षय भंडार है। इस अक्षय भंडार का अनमोल हीरा है ददरिया।
       ददरिया श्रम की साधना और प्रकृति की आराधना में रत किसानों और श्रमिकों का गीत है। यह प्रेम और अनुराग की लोक अभिव्यक्ति है। लोक साहित्य के विद्वानों का कथन है कि दादर यानी ऊंचा स्थान, जंगल - पहाड़ में गाए जाने के कारण इसका नाम ददरिया पड़ा। यदि ददरिया के नामकरण के पक्ष में इस तथ्य को सही माना जाय तो यह भी सच है कि ददरिया केवल ऊँचे स्थानों अर्थात जंगलों - पहाड़ों में ही नहीं गाया जाता। यह मैदानी इलाकों में, सपाट खेतों में भी गाया जाता है। कुछ विद्वान दादरा से शब्द - साम्यता के कारण दादरा गीत ताल से इसके नामकरण का सूत्र तलाशते हैं। यह भी सत्य है कि ददरिया में वाक्य का प्रयोग नहीं होता। तब ताल के नाम पर नामकरण का सवाल ही नहीं उठता। विद्वानों ने ददरिया के चार भेदों का भी निरुपण किया है। ठाढ़ ददरिया, सामान्य ददरिया, साल्हो और गढहा ददरिया। बैलगाड़ी हाँकते गाड़ीवानों द्वारा गाए जाने वाला ददरिया गढ़हा ददरिया कहलाता है। संभवत: इसी आधार पर साल वनों में गाए जाने वाले ददरिया को साल्हो कहा गया हो ? तो क्या नांगर जोतते हलवाए द्वारा गाए जाने वाले ददरिया को नंगरिहा ददरिया कहा जायेगा ? इस प्रकार ददरिया का भेद उचित नहीं जँचता। जो भी हो, पर ददरिया है गीतों की रानी। ठाढ़ ददरिया और सामान्य ददरिया को खेतों में काम करते ग्रामीणों से सुना जा सकता है। इसकी स्वर लहरी बड़ी मीठी होती है।
       पारंपरिक रुप में ददरिया खेतों में फसलों की निंदाई कटाई करते, जंगल - पहाड़ में श्रम में संलग्र लोगों द्वारा गाया जाता है। यह और बात है कि अब मंच पर ददरिया वाद्यों के संगत में गाया जाता है। लड़के - लड़कियों को नचाया जाता है। इसलिए शहरी परिवेश में जीने वाले लोक कला के मर्मज्ञ ददरिया को लोकगीत न कहकर लोक नृत्य कहते हैं। पर यह कला का विकास नहीं है। यह पारंपरिकता के साथ खिलवाड़ है। उसके मूल रुप को विकृत करने का प्रयास है। मेरी दृष्टि में ऐसा कोई भी प्रयास न लोक कला के हित में है न ही लोक कलाकार के।
       ददरिया का सामूहिक स्वर सुनकर जिसने उसका रस पान किया होगा, वही व्यक्त कर सकता है ददरिया के आनंद और अनुभूति को। इसे अकेले - दुकेले भी गाया जाता है, सवाल - जवाब के रुप में। साथ देने वाला हो तो माधुर्य द्विगुणित हो जाता है -
बटकी म बासी, अऊ चुटकी म नून।
में गावत हंव ददरिया, ते कान देके सुन।
       ददरिया मुक्तक श्रेणी का लोक काव्य है। यह दोहे की शैली में होता है। इसका प्रभाव दोहे की ही तरह मर्मस्पर्शी होता है। ददरिया की श्रृंखला बड़ी लंबी होती है, पर ये परस्पर भिन्न होते हैं। इनका परस्पर संबंध विच्छेदित रहता है। सतसई के दोहे के बारें में जिस प्रकार कहा जाता है -
सतसईया के दोहरे, ज्यों नाविक की तीर,
देखन में छोटे लगे, घाव करत गंभीर।
       निष्ठुर, निर्दयी और निर्मोही व्यक्ति को भी ददरिया मोम की तरह पिघला देता है। पत्थर में भी प्रसून खिला देता है। लोककंठ में गूँजने वाले ददरिया का माधुर्य मंदिर में गूंजती घंटियों की तरह मन को शांति देता है। काम करते - करते जब काया थकने लगती है तब ददरिया की तान थकान मिटाती है। या यूं भी कहा जा सकता है कि ददरिया गाते - गाते काम करने से थकान आती ही नहीं। बल्कि यह शरीर में ऊर्जा और मस्तिष्क में चेतना का संचार करता है।
       ददरिया में विषयों की विविधता है पर मूलत: विषय श्रंृगार है। इसमें कृषि संस्कृति और आदिवासी संस्कृति पूर्णत: प्रतिबिम्बित होती है। क्योंकि यही लोक जीवन के मूलाधार है। लोक व्यवहार के शब्द ददरिया के श्रृंगार हैं। फलस्वरुप ददरिया की पंक्तियों के भाव का हृदय में अमिट छाप पड़ता है -
आमा ल टोरे खाहूँच कहिके।
तैं दगा दिए मोला, आहूँच कहिके।।
       प्रेम और अनुराग इसका मूल स्वर है। प्रेम तो जीवन का तार है। श्रृंगार है। प्रेम के बिना सारा संसार निस्सार है। युवा हृदय में जब प्रेम की कोंपले फूटती है तो वह किसी का प्रेम पाकर पल्लवित होती है। ददरिया प्रेमी हृदय की अभिव्यंजना है। ददरिया में प्रेम और अनुराग का ही वर्चस्व होता है। प्रेम गंगा जल की तरह पवित्र होता है। प्रेमी हृदय जिस छबि को अपनी आँखों में बैठा लेता है, वही उसका सर्वस्व होता है। उस प्रेम मूर्ति को वह अपनी कोमल भावनाएं पुष्प की तरह अर्पित करता है। मरने पर ही प्रीत छूटने की बात कहता है -
माटी के मरकी, फोरे म फूट ही।
तोर - मोर पिरित, मरे म छूटही।।
       लोक मन का यह अनुराग, लोक मन की यह प्रेमाभिव्यक्ति और विश्वास धरती की तरह विस्तृत, आकाश की तरह ऊँचा और सागर की तरह गहरा है। भला कोई प्रेम की ऊंचाई और गहराई को नाप सकता है? प्रेमी हृदय की ललक और प्रिय की तलाश को कितनी सार्थक करती है, ददरिया की ये पंक्तियाँ -
बागे - बगीचा दिखे ल हरियर।
झुलुप वाला नई दिखे, बदे हँव नरियर।।
       लोक जीवन के क्रिया व्यवहार का यथार्थ भी प्रस्तुत करता है ददरिया। जब मुद्रा का प्रचलन नहीं था तब लोग वस्तु - विनिमय द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे तथा परस्पर वस्तुओं को अदल - बदल कर अपने रोजमर्रा की चीजों की पूर्ति करते थे। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में अभी भी छिटपुट यह प्रथा देखने में आती है। जैसे रऊताईन कोदो या धान के बदले मही देती है। गाँवों में लोग बबूल बीच के बदले नमक लेते हैं -
ले जा लान दे जँवारा,कोदो के मिरचा ओ,
ले जा लान देबे हो ...
धाने रे लुवे, गिरे ल कंसी।
भगवान के मंदिर में बाजथे बंसी।।
नवा रे मंदिर, कलस नइ हे।
दू दिन के अवईया, दरस नई हे।।
       ददरिया के शाब्दिक सौन्दर्य, अर्थ गांभीर्य और इसके स्वर माधुर्य के कारण इसे गीतों की रानी कहा जाता है। यह सम्मान इसे इसकी सहजता, सरलता और सरसता के कारण भी मिला है। ददरिया वह गीत है जिसके रचनाकार का पता नहीं है। यह वाचिक परंपरा द्वारा एक कंठ से दूसरे कंठ तक पहुंचता है। कुछ छूटता है, कुछ जुड़ता है। इस छूटने और जुड़ने के बाद भी यह कभी निष्प्रभावी नहीं हुआ। इसका तेज और लालित्य बढ़ता ही गया। लोक गायक जो देखता है, उसे ही गीत के रुप में गढ़ कर गाता है। और समूह के कंठ में जो बस जाता है, वही लोक गीत कहलाता है। ददरिया लोक को भाने वाला गीत है -
संझा के बेरा, तरोई फूले।
तोर झूल - झूल रेंगना, तोंही ल खुले।।
बगरी कोदई, नदी म धोई ले।
तोर आगे लेवईहा, गली म रोई ले।
तिली के तेल रिकोयेंव बिल म।
रोई - रोई समझायेंव,नई धरे दिल म।।
       ददरिया की कड़ियाँ एक दूसरे के साथ पिरोई जाती है। ददरिया की धुने अलग - अलग होती है। पर एक  ही कड़ी को भिन्न - भिन्न धुनों में भी गाई जा सकती है। ददरिया की यह भी विशेषता है। ददरिया गाने वाले चाहे वह स्त्री हो या पुरुष वे इतने कुशल होते हैं कि अपनी कल्पना शक्ति से तत्काल ददरिया की पंक्तियाँ जोड़ लेते हैं। यदि इन्हें आशु कवि कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी परन्तु इस सृजन में उनका कोई व्यक्तिगत प्रभाव नहीं होता। उनकी अभिव्यक्ति लोकमय हो जाती है। लोक तो निस्पृह और निराभिमानी होता है। वह केवल अपनी स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ता है तथा लोकमंगल का अर्थ गढ़ता है।
       ददरिया की एक सुनिश्चित गायन शैली नहीं है। भिन्न - भिन्न धुनों, भिन्न - भिन्न रागों में एक लोक कंठ से फूटता है। राग का आशय यहाँ शास्त्रीय रागों से कतई नहीं है। लोक में सुर को राग कहा जाता है। शास्त्रीय राग में बंधन होता है। लोक को बंधन स्वीकार्य नहीं। वह तो फूल की खुशबू की मानिंद है जो सब को सुवासित करता है। ददरिया की कड़ियों को जोड़ने के लिए घोर का प्रयोग किया जाता है, जिसे हम टेक भी कहते है। ये पंक्तियाँ ददरिया की कड़ियो के बीच - बीच में दुहराई जाती है :-
हवा ले ले रे, पानी पी ले रे गोला
नई साग रांधे, मही म कुुंदरु।
गाड़ी भागथे दबोल म,
नई बाजय घुंघरु।।
हवा ले ले .....
रस्ता ल रेंगे, हलाय कोहनी,
तोर आँखी म सलोनी,
खोपा म मोहनी।।
हवा ले ले .....
कांचा लिमऊ के रे, रस चुचवाय
भौजी बिना देवर के, मन कचुवाय।
हवा ले ले .....
       ददरिया में धुनों की विविधिता के कारण इसके गायन में किसी प्रकार की दुरुहता नहीं आती बल्कि इस विविधता के कारण इसकी एकरसता समाप्त होती है। अक्सर गीतों की एकरसता श्रोता के मन में ऊब पैदा करती है। ददरिया से तो ऊबने का सवाल ही नहीं है -
ये भगाबो पल्ला का गा,जाम झिरिया में
हवा में कलगी डोले, एक पेड़ आमा, झऊर करे।
मया वाली दोसदारी बर दउड़ करे।।
सायकिल चलाए, हेंडिल धरि के।
तोला बइठे ल बलायेंव,कंडिल धरि के।।
बाँस के लाठी, चुने ल भइगे।
तोर खातिर मयारु, गुने ल भइगे।।
नांगर के मुठिया, दबाय नहीं।
तोर दिए खुरहोरी, चबाय नहीं।।
नंवा रे हँड़िया, भरे ल मड़िया।
निकलत नई बने, रांधत हड़िया।।
       ददरिया सवाल - जवाब के रुप में अभिव्यक्त होता है। एक समूह सवाल करता है, दूसरा समूह जवाब देता है। या ऐसा भी कह सकते हैं कि दो प्रेमी हृदय परस्पर सवाल - जवाब करते हैं। ददरिया हृदय में अंकुरित प्रेम को अपनी स्वर लहरी से सींचता है। उसे अनुराग का आश्रय देता है :-
ये दे संझा के बेरा, बगइचा में डेरा
तोला कोन बन खोजवं रे ...
ये दे संझा के बेरा .....
गहूँ के रोटी, जरोई डारे।।
मोला बोली बचन में हरोई डारे।।
बासी ल खाए, अढ़ई कौरा।
तोला बइठे ल बलाएंव बढ़ई चौरा।।
चंदा रे उवे सुरुज लाली ओ।
बखरी ले ढेला मारे पिरित वाली ओ।।
       ददरिया छोटे पद का गीत है। थोड़ी शब्द सीमा में बहुत अधिक कह देना लोक गीतों की विशेषता हैं। यह सामर्थ्य ददरिया के पास अधिक है। लोक जिव्हा में रचे - बसे शब्द हीरे - मोती की तरह शोभा पाते हैं। इसमें मात्राओं की कमी - बेशी को गायक अपनी लयात्मकता से पूर्ण कर लेता है। शब्दों की कमी पड़ने पर संगी, संगवारी, दोस, मयारु, जहुरिया आदि शब्द जोड़ लिए जाते हैं। यह उनकी गायकी का कमाल होता है। लोक  गायक तो वैसे भी स्वर - पूर्ति में कुशल व परिपक्व होते हैं। ददरिया गायन में कभी - कभी स्वर संतुलन के लिए अतिरिक्त पंक्ति भी जोड़ी जाती है :-
फूल रे फले, धनई के रवार।
कोन गलियन में होब,
मोर जीव के अधार
तुक - तुक के गोटी मारे,
किंजर के आना
खाल्हे बाहरा म रे ....
खाए कलिंदर रे, फोकला बघार।
इही गलियन में आबे,
मोर जीव के अधार
तुक - तुक गोटी मारे, गिंजर के आना
खाल्हे बाहरा म रे ....
घर के निकलती रे, कुरिया के टोंक
मैं बोल न नई तो पायेंव,
रे अदमी के झोप।।
ओली के हरदी, कुचर जल्दी।
देरी होगे पतरेंगी, निकल जल्दी।।
       लोक की अपनी मर्यादा हैं। अपनी सीमा हैं। लोक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। ददरिया गाँव की गलियों में नहीं गाया जाता। इसे खेत खार, जंगल पहार में ही गाया जाता है। वहाँ भी लोक समूह की उपस्थिति इसे मर्यादित रखती है। प्रेम और अनुराग का यह गीत यदा - कदा अश्लीलता को छूने का प्रयास भी करता है। यह प्रयास कुछ हम उम्र मित्रों के हास - परिहास के रुप में होता है, सार्वजनिक नहीं। समूह इस प्रयास को अस्वीकार करता है। नदी यदि तट का उलंघन करे तो वह अहित कर ही होता है।
करे मुखारी, जामुन डारा ग
बइठे ल आबे तै, बइहा, हमर पारा।
       ददरिया में बही बइहा का संबोधन प्रगाढ़ प्रेम को प्रदर्शित करता है। बही अर्थात पगली, बईहा माने पागल। प्रेम में तो आदमी पागल ही होता है। जो अतिप्रिय है उसे ही पागल कहने का अधिकार दिया है प्रेम ने। भला कोई दूसरा पागल कह सकता है।
चांदी के डबिया, सोने के ढकना।
नानपन के संगवारी, देवथे सपना।।
आघू नंगरिहा, बइला हे टिकला।
डोली म उतरहूं, हो जही चिखला।।
       ददरिया की पंक्ति - पंक्ति कानों को सुकुन देती है और आत्मा को तप्ति। यूं तो ददरिया में प्रेम का रंग गाढ़ा है। ददरिया में प्रेम के दोनों रुप संयोग और वियोग का समन्वय मिलता है। इसके साथ ही ग्रामीण रीति - नीति, धार्मिक आस्था और लोक विश्वास तथा समकालीन परिस्थितियाँ भी इसमें आकर लेती है :-
सियाराम भजले संगी
चरदिनिया जिनगी ग ....
सिया राम भज ले
चारे रे खुरा के चारे पाटी।
कंचन तोर काया, हो जही माटी।।
       इधर छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने भी ददरिया छंद में गीत लिखना प्रारंभ किया है। ये गीत लोकप्रिय भी हुए हैं। पर पारंपरिक ददरिया का सौंदर्य और माधुर्य उनमें भी नहीं आ पाया है। शायद इसका कारण मौलिक प्रयास हो। व्यक्ति विशेष की छाप हों। जबकि दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि इसमें ग्रामीण जीवन के शब्दों का अभाव रहता है। इसलिए लोकमन में ये गीत गहरे उतर नहीं पाते। छत्तीसगढ़ के कुछ गायक कलाकारों व रचनाकारों ने नाम लिप्सा के कारण ददरिया को अपनी रचना बताकर रचनाकार के रुप में अपना नाम जोड़ने का कुत्सित प्रयास किया है। या पंक्तियों को इधर - उधर कर इसके मूल स्वरुप को क्षति पहुंचाई है। जिन पारंपरिक ददरियों को एक पैसठ वर्षीय लोक कलाकार अपनी किशोरावस्था से गाते आ रहा हैं, उन गीतों के साथ तीस वर्षीय कलाकार रचनाकार के रुप में अपना नाम जोड़ता है। यह कितनी हास्यास्पद स्थिति है। पारंपरिक गीतों को पारंपरिक ही रहने दें तो क्या हर्ज हैं ? पारंपरिक गीतों को अपनी मौलिक रचना बताना अच्छी बात नहीं है। नाम ही चाहिए तो नाम के लिए अच्छे काम की जरुरत होती है।
       कुल मिलाकर ददरिया मेहनतकश लोगों के हृदय की अभिव्यक्ति है। पसीने की बूंदों से सिंचित लोक सर्जना है। प्रेमातुर मन का मादक स्वर है। लोक कंठ से झरता निर्झर है। जिसकी धारा कभी न क्षीण होगी न मलिन। ददरिया लोक मानस की शक्ति हैं इसमे प्रेम और अनअुराग की अभिव्यक्ति है। लोक की अभिव्यक्ति का यह सिलसिला अनवरत जारी रहे। लोक गीतों की रानी ददरिया का स्वरुप लोक हाथों से सजता रहे, संवरता रहे। यह लोक स्वर अतृप्त आत्मा को संतृप्त करता रहे। लोक गीतों का लोकमंगल स्वरुप बना रहें। यही मंगल कामना है -
छोटे हे केरी, बड़े हे केरा ।
राम राम ले, जाये के बेरा।।
जुन्ना लुगरा, कथरी के खिलना।
जिनगी रही त फेर होही मिलना।।
पता - '' साहित्‍य कुटीर ''
गण्डई पण्डरिया,
जिला - राजनांदगांव [छ.ग.]

छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पुरखा : मंदराजी दाऊ




-  कुबेर  -
कुबेर

लोकनाट्य ह वोतकच पुरातन आय जतका मनुष्य के सामाजिक जीवन। सत्य अउ सनातन के खोज म लोक कलाकार मन जउन सपना देखथें अउ वोला मंच म अभिनय के माध्यम ले प्रगट करथे विही  लोकनाट्य ल हम नाचा कहिथन। नाचा कलाकार मन लोक - जीवन से जुड़े अपन अनुभव ल जउन सरलता, सहजता अउ सुंदरता ले प्रस्तुत करथें विही ह नाचा के संप्रेषणीयता के राज आय। एकरे ले नाचा म सामूहिक सम्मोहन के प्रभाव पैदा होथे। देखइया मन नाचा के मोहनी म अतका मोहा जाथे कि रात भर अपन जघा ले टसमस नइ होवंय। लोक संस्कृति के सतरंगी चमक, मनमोहक खुशबू अउ लोकहित के भाव ह नाचा के आत्मा आय। नाचा के कोनों संवाद ह लिखित म नइ रहय। कलाकार मन भुक्त संवेदनात्मक आवेग के भावात्मक ताकत से उत्पन्न विलक्षण हाजिरजवाबी द्वारा प्रसंग अनुसार अपन संवाद ल खुदे बोलत जाथें। इंखर संवाद म हंसी - मजाक तो रहिबेच करथे, समाज के आर्थिक, धार्मिक अउ सामाजिक शोषण - जनित दुख - पीरा ऊपर करारा ब्यंग घला रहिथे।
छत्तीसगढ़ के नाट्य परंपरा ह संसार के सबले पुरातन नाट्य परंपरा आय। रामगढ़ के पहाड़ी म स्थित रंगशाला ल दुनिया के सबले जादा जुन्नेट रंगशाला माने जाथे। फेर नाचा के जउन सरुप ल आज हम देखथन वो ह जादा पुरातन नो हे। पहिली खड़े साज के चलन रिहिस हे। जेवन करके गाँव के कोनो चंउक म सब सकला जावंय। कलाकार मन मुंह मा छुही - कोयला पोत के हाजिर हो जावंय। तबलची, मंजीरहा, चिकरहा, मसालची अउ परी सब मिल के खड़े - खड़े ब्रहा्रानंद अउ कबीर के निरगुनिया  भजन गावंय। गम्मत नइ होवय। कोनो संगठित नाचा पार्टी नइ रहय। नाचा पार्टी ल संगठित करके वोला आज वाला सरुप देवइया महान लोक - रंगकर्मी, संगीतकार, सुंदर सामाजिक शुचिता अउ सौहाद्र के स्वप्र - द्रष्टा, समाज सुधारक अउ नाचा बर अपन तन - मन - धन ल अर्पित करइया महान विभूति के नाम रिहिस - दाऊ दुलार सिंह साव जउन ल हम मंदराजी दाऊ के नाम से जानथन।
मदराजी दाऊ के जन्म 1 अप्रैल 1911 ई. में राजनांदगांव ले सात किलोमीटर दुरिहा रवेली गाँव के संपन्न मालगुजार परिवार म होय रिहिस। पिताजी के नाव श्री रामाधीन साव  अउ माताजी के नाव श्रीमती रेवती बाई साव रिहिस। इंखर प्राथमिक शिक्षा कन्हारपुरी म होइस। बचपनेच ले इंखर रुचि गाना - बजाना म रिहिस। कहावत हे - होनहार बिरवान के होत चीकने पात। गाँव म कुछ लोक कलाकार रिहिन। इंखरे संगत म पड़ के बचपनेच म ये मन तबला अउ चिकारा बजाय बर सीख गें। वो समय इहां हारमोनियम के नामोनिशान नइ रिहिस।
माता - पिता के इच्छा रिहिस कि बेटा ह पढ़ - लिख के मालगुजारी ल संभालय, फेर बेटा के मन तो नाचा के सिवा अउ कुछू म रमेच नहीं। बाप ल ये सब चिटको नइ सुहावय। बेटा ल हाथ से निकलत देख के वोला फिकर होय लगिस। बेटा ल बांध के रखे खातिर अब वोला एकेच उपाय दिखिस। चौदह साल के बालपन म ही राम्हिन बाई नाव के सुंदर कन्या के संग दुलार सिह के बिहाव कर दिन। फेर मंदराजी के मूड़ म तो नाचा के भूत सवार रहय। दुनियादारी म वो कहाँ बंधने वाला रिहिस ?
दुनिया के कोनो माया - मोह ह मंदराजी दाऊ ल नाचा ले अलग नइ कर सकिन। एक समय वो ह नाचा बर नरियर झोंक डरे रहय। घर म बेटा ह बीमार पड़े रहय। भगवान ल परछो लेना रिहिस। विही दिन बीमार बेटा के सांस टूट गे। पुत्र  - सोग ले बढ़के दुनिया म अउ कोनों दुख नइ होवय, फेर वो तो रिहिस ए युग के राजा जनक वीतरागी। बेटा के लहस ल छोड़ के पहुंचगे नाचा के मंच म। रात भर नाचा होइस। देखइया मन रात भर मजा लूटिन। मदरांजी के मन के दुख ल कोई नइ जान सकिन, न देखइया मन, न संगवारी कलाकार मन। बिहिनिया नाचा खतम होइस। मंदराजी के दूनों आँखी ले तरतर - तरतर आँसू बोहय लगिस। संगवारी मन चकरित हो गें। अइसन रिहिस मदराजी दाऊ ह।
दुलार सिंह ले मंदराजी बने के घला बड़ रोचक किस्सा हे। बचपन म बड़े पेट वाला हट्टा - कट्टा दुलार सिंह ह अंगना म खेलत रहय। तुलसी - चवरा म वइसने एक ठन पेटला मूर्ति ओधे रहय जउन ह मंदरासी मन सरिख दिखय। नाना ह विही ल देख के बालक ल कहि दिस - मदरासी। काकी - भउजी मन ल घला इही नाम ह भा गे अउ दुलार सिंह ह बनगे मदरासी। इही मदरासी ह सुधरत - सुधरत हो गे मंदराजी अउ जहरित हो गे जग म।
नाचा अउ मंदराजी दाऊ अब एक - दूसर के पहिचान बन गें। समाज के कुरीति अउ अंगरेज के गुलामी वोकर मन ल निसदिन कचोटय। मंदराजी दाऊ ह इंखर से लड़े खातिर नाचा ल हथियार बना लिस। अब वो ह नाचा ल अपन मनमाफिक रुप देय बर भिड़गे। 1927 - 28 ई. म वो ह नाचा के प्रसिद्ध कलाकार मन ल जोड़ के नाचा पार्टी बनाय के उदिम शुरु कर दिस। खल्लारी के प्रसिद्ध परी नारद निर्मलकर, प्रसिद्ध गम्मतिहा लोहरा भर्रीटोला के सुकालू ठाकुर अउ खेरथा अछोली के नोहर दास कन्हारपुरी राजनांदगांव के तबलची राम लाल निर्मलकर अउ चिकरहा के रुप म खुद। पांचों झन मिल के नाचा पार्टी के गठन करिन। इही ह पहिली संगठित नाचा पार्टी बनिस।
मंदराजी दाऊ के नांव अब छत्तीसगढ़ म जहरित हो गे। 1930 ई. म वो ह संगवारी मन संग कलकत्ता जा के हारमोनियम लाइस। नाचा म अब पहिली बार हारमोनियम बजे लगिस। नाचा के रंग - ढंग ल दाऊ जी ह अब चुकता बदले ल भिड़गें। नाचा के मंच म अब चंदेवा लगे के शुरु हो गे। बजनिहा मन बर बाजवट माढ़े लगिस। मशाल के जघा गियास बत्ती [पेट्रोमेक्स] जले लगिस। खड़िया अउ हरताल के जघा स्नो पाउडर आ गे। ब्रहा्रानंद अउ कबीर के निरगुनिया भजन के जघा भाई रे तंय छुआ ल काबर डरे अउ तोला जोगी जानेव रे भाई जइसे गीत बजे लगिस आगू चल के फिल्मी गीत घला आगे। गम्मत होय लगिस अउ इही गम्मत मन म समाज के ढोंग ल उजागर करे के उदिम अउ देश के आजादी होय के बात होय लगिस। नाचा अबरात के दस बजे ले बिहिनिया के होवत ले होय लगिस।
जनता नाचा के दिवानी हो गे। दिन डुबतहच जघा पोगराय बर बोरा - दरी जठे के शुरु हो जाय। दुरिहा - दुरिहा के आदमी गाड़ी - खांसर म जोरा - जोरा के आय। नाचा के लोकप्रियता के हिसाब रायपुर म सन् 50 - 51 म एकर प्रदर्शन से लगाय जा सकथे। डेढ़ महीना तक रोज नाचा होइस। नाचा के समय जम्मों टाकीज मन बंद हो जावंय। टाकीज वाले मन थर खा गें।
मंदराजी ह नाचा अउ नाचा कलाकार मन बर अपन सब कुछ ल होम कर दिस। अंत म सौ एकड़ के मालिक ये दधीचि के पास हारमोनियम के सिवा अउ कुछू नइ बचिस। दाऊ जी ह एक बात हरदम कहय - दुनिया म धन कमाना सरल हे, नाम कमाना कठिन हे। दुनिया म सबो खाली हाथ आथें अउ खालिच् हाथ जाथें, फेर महापुरुष मन अपन नांव ल दुनिया म छोड़ जाथें। उंखर कर्म के महक ह सदा - सदा के लिये समाज म बस जाथे।
दाऊ मंदराजी 24 सितंबर 1984 ई. म ये दुनिया ले बिदा हो गे।
वोकर जन्म स्थान रवेली म वोला भक्ति भाव अर्पित करे बर हर साल 1 अप्रेल के दिन लोक कलाकार मन के मेला लगथे। राज्य सरकार ह वोकर सम्मान म लोक कलाकार मन बर दो लाख रुपिया के मंदराजी सम्मान देथे।
  • पता - व्याख्याता, शास. उच्च. माध्य. विद्या.कन्हारपुरी जिला - राजनांदगांव [छ.ग.]

बासी भात में खुदा साझा




- मुंशी प्रेमचंद  -

शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई है तो गौरी खिल उठी। देवताओं में उसकी आस्था और भी दृढ़ हो गयी। इधर एक साल से बुरा हाल था। न कोई रोजी न कोई रोजगार। घर में जो थोड़े - बहुत गहने थे वह बिक चुके थे। मकान का किराया सिर पर चढ़ा हुआ था। जिन मित्रों से कर्ज मिल सकता था, सबसे ले चुके थे। साल भर का बच्चा दूध के लिए बिलख रहा था। एक वक्त का भोजन मिलता, तो दूसरे जून की चिन्ता होती। तकाजों के मारे बेचारे दीनानाथ को घर से निकलना मुश्किल था। घर से निकला नहीं कि चारों ओर से चिथाड़ मच जाती - वाह बाबूजी, वाह। दो दिन का वादा कर के ले गये  और आज दो महीने से सूरत नहीं दिखायी। भाई साहब, यह तो अच्छी बात नहीं। आपको अपनी जरुरत का ख्याल है मगर दूसरों की जरुरत का जरा भी ख्याल नहीं ? इसी से कहा है - दुश्मन को चाहे कर्ज दे दो, दोस्त को कभी न दो। दीनानाथ को ये वाक्य तीरों से लगते थे और उसका जी चाहता था कि जीवन का अन्त कर डाले, मगर बेजबान स्त्री और अबोध बच्चे का मुँह देखकर कलेजा थाम के रह जाता।  आज भगवान ने उस पर दया की और संकट के दिन कट गये।
गौरी ने प्रसन्नमुख होकर कहा - मैं कहती थी कि नहीं, ईश्वर सबकी सुधि लेते हैं। और कभी न कभी हमारी भी सुध लेंगे। मगर तुमको विश्वास नहीं आया था। बोलो, अब तो ईश्वर की दयालुता के कायल हुए ?
दीनानाथ ने हठधर्मिता करते हुए कहा - यह मेरी दौड़ - धूप का नतीजा है, ईश्वर की क्या दयालुता ? ईश्वर को तो तब जानता, जब कहीं से छप्पर फाड़ कर भेज देते।
लेकिन मुँह से चाहे कुछ कहे, ईश्वर के प्रति उसके मन में श्रद्धा उदय हो गयी थी।
दीनानाथ का स्वामी बड़ा ही रुखा आदमी था और काम मेें बड़ा चुस्त। उसकी उम्र पचास के लगभग थी और स्वास्थ्य भी अच्छा न था, फिर भी वह कार्यालय में सबसे ज्यादा काम करता। मजाल न थी कोई आदमी एक मिनट की भी देर करे या एक मिनट भी समय से पहले चला जाय। बीच में 15 मिनट की छुट्टी मिलती थी, उसमें जिसका जी चाहे पान खा ले या सिगरेट पी ले या जलपान कर ले। इसके अलावा एक मिनट का अवकाश न मिलता था। वेतन पहली तारीख को मिल जाता था। उत्सवों में भी दफ्तर बंद रहता था और नियत समय के बाद कभी काम न लिया जाता था। सभी कर्मचारियों को बोनस मिलता था और प्राविडेट फॅड की भी सुविधा थी फिर भी कोई आदमी खुश न था। काम या समय की पाबन्दी की किसी को शिकायत न थी। शिकायत थी तो केवल स्वामी के शुष्क व्यवहार की। कितना ही जी लगाकर काम करो, कितना ही प्राण दे दो, पर उसके बदले धन्यवाद का एक शब्द भी न मिलता था।
कर्मचारियों में और कोई सन्तुष्ट हो या न हो, दीनानाथ को स्वामी से कोई शिकायत न थी। वह घुड़कियाँ और फटकार पाकर भी शायद उतने ही परिश्रम से काम करता था। साल भर में उसने कर्ज चुका दिये और कुछ संचय भी कर लिया। वह उन लोगों में था जो थोड़े में भी संतुष्ट रह सकते हैं। अगर नियमित रुप से मिलता जाय। एक रुपिया भी किसी खास काम में खर्च करना पड़ता तो दम्पति में घंटों सलाह होती और बड़े झाँव - झाँव के बाद कहीं मंजूरी मिलती थी। बिल गौरी की तरफ से पेश होता तो दीनानाथ विरोध में खड़ा होता। दीनानाथ की तरफ से पेश होता तो गौरी उसकी कड़ी आलोचना करती। बिल को पास करा लेना प्रस्तावक की जोरदार वकालत पर मुनहसर था। सर्टिफाई करने वाली कोई तीसरी शक्ति वहाँ न थी।
और दीनानाथ अब पक्का आस्तिक हो गया था। ईश्वर की दया या न्याय में अब उसे कोई शंका न थी। नित्य संध्या करता और नियमित रुप से गीता का पाठ करता। एक दिन उसके एक नास्तिक मित्र ने जब ईश्वर की निन्दा की तो उसने कहा - भाई, इसका तो आज तक निश्चय नहीं हो सका कि ईश्वर है या नहीं। दोनों पक्षों के पास इस्पात की सी दलीलें मौजूद है लेकिन मेरे विचार में नास्तिक रहने से आस्तिक रहना कहीं अच्छा है। अगर ईश्वर की सत्ता है तब तो नास्तिकों को नरक के सिवा कहीं ठिकाना नहीं। आस्तिक के दोनों हाथों में लड्डू, ईश्वर है तो पूछना ही क्या, नहीं है तब भी क्या बिगड़ता है ? दो - चार मिनट का समय ही तो जाता है ?
नास्तिक मित्र इस दोरुखी बात पर मुँह बिचकाकर चल दिये।
एक दिन जब दीनानाथ शाम को दफ्तर से चलने लगा तो स्वामी ने उसे अपने कमरे में बुला भेजा और बड़ी खातिर से उसे कुर्सी पर बैठाकर बोला - तुम्हें यहाँ काम करते कितने दिन हुए ? साल भर तो हुआ ही होगा ?
दीनानाथ ने नम्रता से कहा - जी हाँ, तेरहवाँ महीना चल रहा है।
- आराम से बैठो, इस वक्त घर जाकर जलपान करते हो ?
- जी नहीं, मैं जलपान का आदी नहीं।
- पान - वान तो खाते ही होगे ? जवान आदमी होकर अभी से इतना संयम।
यह कहकर उसने घण्टी बजायी और अर्दली से पान और कुछ मिठाईयाँ लाने को कहा।
दीनानाथ को शंका हो रही थी -  आज इतनी खातिरदारी क्यों हो रही है ? कहाँ तो सलाम भी नहीं लेते थे, कहाँ आज मिठाई और पान सभी कुछ मँगाया जा रहा है। मालूम होता है मेरे काम से खुश हो गये हैं। इस ख्याल से उसे कुछ आत्मविश्वास हुआ और ईश्वर की याद आ गयी। अवश्य परमात्मा सर्वदर्शी और न्यायकारी हैं, नहीं तो मुझे कौन पूछता ?
अर्दली मिठाई और पान लाया। दीनानाथ आग्रह से विवश होकर मिठाई खाने लगा।
स्वामी ने मुसकराते हुए कहा - तुमने मुझे बहुत रुखा पाया होगा। बात यह है कि हमारे यहाँ अभी तक लोगों को अपनी जिम्मेदारी का इतना कम ज्ञान है कि अफसर जरा भी नर्म पड़ जाय तो लोग उसकी शराफत का अनुचित लाभ उठाने लगते हैं और काम खराब होने लगता है। कुछ ऐसे भाग्यशाली है, जो नौकरों से हेल - मेल भी रखते हैं। उनसे हँसते - बोलते भी हैं फिर भी नौकर नहीं बिगड़ते बल्कि और भी दिल लगाकर काम करते हैं। मुझमें वह कला नहीं है इसलिए मैं अपने आदमियों से कुछ अलग - अलग रहना ही अच्छा समझता हूं और अब तक मुझे इस नीति से कोई हानि भी नहीं हुई लेकिन मैं आदमियों का रंग - ढंग देखता रहता हूं और सब को परखता रहता हूं। मैंने तुम्हारे विषय में जो मत स्थिर किया है वह यह है तुम वफादार हो और मैं तुम्हारे ऊपर विश्वास कर सकता हूं। इसलिए मैं तुम्हें ज्यादा जिम्मेदारी का काम देना चाहता हूं जहाँ खुद बहुत कम काम करना पड़ेगा, केवल निगरानी करनी पड़ेगी। तुम्हारे वेतन में पचास रुपये की और तरक्की हो जायेगी। मुझे विश्वास है, तुमने अब तक जितनी तनदेही से काम किया है, उससे भी ज्यादा तनदेही से आगे भी करोगे।
दीनानाथ की आँखों में आँसू भर आये और कण्ठ की मिठाई कुछ नमकीन हो गयी। जी में आया - स्वामी के चरणों पर सिर रख दे और कहे - आपकी सेवा के लिए मेरी जान हाजिर है। आपने मेरा जो सम्मान बढ़ाया है, मैं उसे निभाने में कोई कसर न उठा रखूँगा लेकिन स्वर काँप रहा था और वह केवल कृतज्ञता भरी आँखों से देखकर रह गया।
सेठजी ने एक मोटा सा लेजर निकालते हुए कहा - मैं एक ऐसे काम में तुम्हारी मदद चाहता हूं जिस पर इस कार्यालय का सारा भविष्य टिका हुआ है। इतने आदमियों में मैंने केवल तुम्हीं को विश्वास - योग्य समझा है और मुझे आशा है तुम मुझे निराश न करोगे। यह पिछले साल का लेजर है और इसमें कुछ ऐसी रकमें दर्ज हो गयी है जिनके अनुसार कम्पनी को कई हजार लाभ होता है लेकिन तुम जानते हो, हम कई महीनों से घाटे पर काम कर रहे हैं। जिस क्लर्क ने यह लेजर लिखा था उसकी बनावट तुम्हारी लिखावट से बिलकुल मिलती है। अगर दोनों लिखावटे आमने - सामने रख दी जाये तो किसी विशेषज्ञ को भी उनमें भेद करना कठिन हो जायगा। मंै चाहता हूं तुम लेजर में एक पृष्ठ फिर से लिखकर जोड़ दो और उसी नम्बर का पृष्ठ उसमें से निकाल लो। मैंने पृष्ठ का नम्बर छपवा लिया है। एक दफ्तरी भी ठीक कर लिया है, जो रात भर में लेजर की जिल्दबन्दी कर देगा। किसी को पता तक न चलेगा। जरुरत सिर्फ यह है कि तुम अपनी कलम से उस पृष्ठ की नकल कर दो।
दीनानाथ ने शंका की - जब उस पृष्ठ की नकल ही करनी है तो उसे निकालने की क्या जरुरत है ?
सेठजी हँसे - तो क्या तुम समझते हो, उस पृष्ठ की हूबहू नकल करनी होगी। मैं कुछ रकमों में परिवर्तन कर दूंगा। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मैं केवल कार्यालय की भलाई के ख्याल से यह कार्रवाई कर रहा हूं। अगर यह रद्दोबदल न किया गया तो कार्यालय के एक सौ आदमियों की जीविका में बाधा पड़ जायेगी। इसमें कुछ सोच - विचार करने की जरुरत नहीं। केवल आध घंटे का काम है। तुम बहुत तेज लिखते हो।
कठिन समस्या थी। स्पष्ट था कि उससे जाल बनाने को कहा जा रहा है। उसके पास इस रहस्य के पता लगाने का कोई साधन न था कि सेठजी जो कुछ कह रहे हैं वह स्वार्थवश होकर या कार्यालय की रक्षा के लिए। लेकिन किसी दशा में भी है यह जाल, घोर जाल। क्या वह अपनी आत्मा की हत्या करेगा ? नहीं, किसी तरह नहीं।
उसने डरते - डरते कहा - मुझे आप क्षमा करें। मैं यह काम न कर सकूंगा।
सेठजी ने उसी विचलित मुसकान के साथ पूछा - क्यों ?
- इसलिए कि यह सरासर जाल है।
- जाल किसे कहते हैं ?
- किसी हिसाब में उलटफेर करना जाल है।
- लेकिन उस उलटफेर से एक सौ आदमियों की जीविका बनी रहे तो इस दशा में भी वह जाल है ? कम्पनी की असली हालत कुछ और है, कागजी हालत कुछ और। अगर यह तब्दीली न की गयी तो तुरन्त कई हजार रुपये नफे के देने पड़ जायेंगे और नतीजा यह होगा कि कम्पनी का दिवाला हो जायगा और सारे आदमियों को घर बैठना पड़ेगा। मैं नहीं चाहता कि थोड़े से मालदार हिस्सेदारों के लिए इतने गरीबों का खून किया जाय। परोपकार के लिए कुछ जाल भी करना पड़े तो वह आत्मा की हत्या नहीं है।
दीनानाथ को कोई जवाब न सूझा अगर सेठजी का कहना सच है और इस जाल से सौ आदमियों की रोजी बनी रहे तो वास्तव में वह जाल नहीं, कठोर कर्तव्य है। अगर आत्मा की हत्या होती भी है तो सौ आदमियों की रक्षा के लिए उसकी परवाह न करनी चाहिए लेकिन नैतिक समाधान हो जाने पर अपनी रक्षा का विचार आया। बोला - लेकिन कहीं मुआमला खुल गया तो मैं तो मिट जाऊँगा। चौदह साल के लिए काले पानी भेज दिया जाऊँगा।
सेठ ने जोर से कहकहा मारा - अगर मुआमला खुल गया तो तुम न फँसोगे मैं फँसूगा। तुम साफ इनकार कर सकते हो।
- लिखावट तो पकड़ी जायेगी ?
- पता ही कैसे चलेगा कि कौन पृष्ठ बदला गया। लिखावट तो एक सी है।
दीनानाथ परास्त हो गया। उसी वक्त उस पृष्ठ की नकल करने लगा।
फिर भी दीनानाथ के मन में चोर पैदा हुआ था। गौरी से इस विषय में वह एक शब्द भी न कह सका।
एक महीने के बाद उसकी तरक्की हुई। सौ रुपये मिलने लगे। दो सौ बोनस के भी मिले।
यह सब कुछ था। घर में खुशहाली के चिह्न नजर आने लगे लेकिन दीनानाथ का अपराधी मन एक बोझ से दबा रहता था। जिन दलीलों से सेठजी ने उसकी जबान बन्द कर दी थी उन दलीलों से गौरी को सन्तुष्ट कर सकने का उसे विश्वास न था।
उसकी ईश्वर - निष्ठा उसे सदैव डराती रहती थी। इस अपराध का कोई भयंकर दंड अवश्य मिलेगा। किसी प्रायश्चित, किसी अनुष्ठान से उसे रोकना असम्भव है। अभी न मिले, साल दो साल न मिले, दस - पाँच साल न मिले। पर जितनी देर में मिलेगा उतना ही भयंकर होगा। मूलधन ब्याज  के साथ बढ़ता जायेगा। वह अक्सर पछताता - मैं क्यों सेठजी के प्रलोभन में आ गया। कार्यालय टूटता या रहता, मेरी बला से। आदमियों की रोजी जाती या रहती, मेरी बला से। मुझे तो यह प्राण पीड़ा न होती लेकिन अब तो जो कुछ होना था हो चुका और दंड अवश्य मिलेगा। इस शंका ने उसके जीवन का उत्साह, आनन्द और माधुर्य सब कुछ हर लिया।
मलेरिया फैला हुआ था। बच्चे को ज्वर आया। दीनानाथ के प्राण नहों में समा गये। दण्ड का विधान आ पहुँचा। कहाँ जाय, क्या करें। जैसे बुद्धि भ्रष्ट हो गयी।
गौरी ने कहा - जाकर कोई दवा लाओ या किसी डॉक्टर को दिखा दो। तीन दिन तो हो गये।
दीनानाथ ने चिन्तित मन से कहा - हाँ जाता हूं, लेकिन मुझे बड़ा भय लग रहा है।
- भय की कौन सी बात है ? बेबात की बात मुँह से निकालते हो। आजकल किसे ज्वर नहीं आता ?
- ईश्वर इतना निर्दयी क्यों हैं ?
- ईश्वर निर्दयी है पापियों के लिए। हमने किसका क्या हर लिया है ?
- ईश्वर पापियों को कभी क्षमा नहीं करता ?
- पापियों को दण्ड न मिले तो संसार में अनर्थ हो जाय।
- लेकिन आदमी ऐसे काम भी तो करता है जो एक दृष्टि से पाप हो सकते हैं दूसरी दृष्टि से पुण्य।
- मैं समझी नहीं।
- मान लो, मेरे झूठ बोलने से किसी की जान बचती हो तो क्या वह पाप है ?
- मैं तो समझती हूं, ऐसा झूठ पुण्य है।
- तो जिस पाप से मनुष्य का कल्याण हो, वह पुण्य है ?
- और क्या ?
दीनानाथ की अमंगल - शंका थोड़ी देर के लिए दूर हो गयी। डॉक्टर को बुला लाया। इलाज शुरु किया। बालक एक सप्ताह में चंगा हो गया।
मगर थोड़े दिन बाद वह खुद बीमार पड़ा। यह अवश्य ही ईश्वरीय दण्ड है और वह बच नहीं सकता। साधारण मलेरिया ज्वर था पर दीनानाथ की दण्ड - कल्पना ने उसे सन्निपात का रुप दे दिया। ज्वर में, नशे की हालत की तरह यों भी कल्पनाशक्ति तीव्र हो जाती है। पहले केवल मनोगत शंका थी, वह भीषण  सत्य बन गयी। कल्पना ने यमदूत रच डाले, उनके भाले और गदाएँ रच डाली, नरक का अग्निकुण्ड दहका दिया। डॉक्टर की एक घूंट दवा एक हजार मन की गदा के आवाज और आग के उबलते हुए समुद्र के दाह पर क्या असर करती ? दीनानाथ मिथ्यावादी न था, पुराणों की रहस्यमय कल्पनाओं में उसे विश्वास न था। नहीं, वह बुद्धिवादी था और ईश्वर में भी तभी उसे विश्वास आया, जब उसकी तर्कबुद्धि कायल हो गयी। लेकिन ईश्वर के साथ उसकी दया भी, उसका दण्ड भी आया। दया ने उसे रोजी दी, मान दिया। ईश्वर की दया न होती तो शायद वह भूखों मर जाता। लेकिन भूखों मरना अग्निकुण्ड में ढकेल दिये जाने से कहीं सरल था, खेल था। दण्ड भावना जन्म - जन्मान्तरों के संस्कार से ऐसी बद्धमूल हो गयी थी, मानो बुद्धिवाद इन मन्वन्तरों के जमे हुए संस्कार पर समुद्र की ऊँची लहरों की भाँति आता था पर एक क्षण में उन्हें जल - मग्न करे फिर लौट वह पर्वत ज्यों का त्यों अचल खड़ा रह जाता था।
जिन्दगी बाकी थी। बच गया। ताकत आते ही दफ्तर जाने लगा। एक दिन गौरी बोली - जिन दिनों तुम बीमार थे और एक दिन तुम्हारी हालत नाजुक हो गयी थी तो मैंने भगवान से कहा था कि यह अच्छे हो जायेंगे तो पचास ब्राहमणों को भोजन कराऊँगी। दूसरे ही दिन से तुम्हारी हालत सुधरने लगी। ईश्वर ने मेरी विनती सुन ली। उसकी दया न हो जाती तो मुझे कहीं मांगे भीख न मिलती। आज बाजार से सामान ले आओ, तो मनौती पूरी कर दूँ। पचास ब्राम्हा्रण नेवते जाएंगे तो सौ अवश्य आयेंगेे। पचास कंगले भी समझ लो और मित्रों में बीस - पच्चीस निकल ही आयेंगे। दो सौ आदमियों का डौल है। मैं सामग्रियों की सूची लिखे देती हूं।
दीनानाथ ने माथा सिकोड़कर कहा - तुम समझती हो, मैं भगवान की दया से अच्छा हुआ ?
- और कैसे अच्छे हुए ?
- अच्छा हुआ इसलिए कि जिन्दगी बाकी थी।
- ऐसी बातें न करो। मनौती पूरी करनी होगी।
- कभी नहीं, मैं भगवान को दयालु नहीं समझता।
- और क्या भगवान निर्दयी है ?
- उनसे बड़ा निर्दयी कोई संसार में न होगा, जो अपने रचे हुए खिलौनों को उनकी भूलों और बेवकूफियों की सजा अग्निकुण्ड में ढकेलकर दे। वह भगवान दयालु नहीं हो सकता। भगवान जितना दयालु है उससे असंख्य गुना निर्दयी है। और ऐसे भगवान की कल्पना से मुझे घृणा होती है। प्रेम सबसे बड़ी शक्ति कही गयी है। विचारवानों ने प्रेम को ही जीवन की और संसार की सबसे बड़ी विभूति मानी है। व्यवहार में न सही, आदर्श में प्रेम ही हमारे जीवन का सत्य है, मगर तुम्हारा ईश्वर दण्ड भय से  सृष्टि का संचालन करता है। फिर उनमें और मनुष्य में क्या फर्क हुआ। ऐसे ईश्वर की उपासना मैं नहीं करना चाहता, न ही कर सकता जो मोटे हैं, उनके लिए ईश्वर दयालु होगा, क्योंकि वे दुनिया को लुटते हैं। हम जैसों को तो ईश्वर की दया कहीं नजर नहीं आती। हाँ, भय पग - पग पर खड़ा घूरा करता है। यह मत करो, नहीं तो ईश्वर दण्ड देगा। वह मत करो नहीं तो ईश्वर दण्ड देगा। प्रेम से शासन करना मानवता है। आतंक से शासन करना बर्बरता है। आतंकवादी ईश्वर से तो ईश्वर का न रहना ही अच्छा है। उसे हृदय से निकाल कर मैं उसकी दया और दण्ड दोनों से मुक्त हो जाना चाहता हूं। एक कठोर दण्ड बरसों के प्रेम को मिट्टी में मिला देता है। मैं तुम्हारे ऊपर बराबर जान देता रहता हूं, लेकिन किसी दिन डण्डा लेकर पीट चलूं तो तुम मेरी सूरत न देखोगी। ऐसे आतंकमय, दण्डमय जीवन के लिए मैं ईश्वर का एहसान नहीं लेना चाहता। बासी भात में खुदा के साझे  की जरुरत नहीं। अगर तुमने ओज - भोज पर जोर दिया तो मैं जहर खा लूँगा।
गौरी उसके मुँह की ओर भयातुर नेत्रों से ताकती रह गयी।

अभागिन




- डॉ. रामशंकर चंचल  -

गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के बीच झुकी कमर वाली वृद्धा के समान उसकी जर्जर कुटिया 15 वीं सदी की प्रदर्शनी सी लगती है। देखने वाले कभी - कभी उस अटपटे बेमेल कुटिया पर व्यंग्य कस देते। उस दिन की ही बात है जब कालेज गर्ल्स उधर से निकली तो एक ने उस उटज की ओर इंगित करते हुए फब्ती कस दी - अरी,मीना बता सकती हो दुनिया में कितने आश्चर्य है।
सात कहकर मीना ने अपनी आँखें फाड़कर प्रश्र खड़ा कर दिया - क्यों ? कुमारी जायसवाल तो जैसे उत्तर पहले से जानती थी - नहीं आठ, देखो यह बाबा आदम के जमाने की झोपड़ी। अरे बाबा यह झोपड़ी तो ऐसी लगती है जैसे किसी ने शहर के आंचल में गाँव बाँध दिया हो। सभी छात्राएं खिलखिला पड़ीं।
उनकी अट्टहास राधा के कानों से होकर सीधा दिल में बैठ गया। उसका दिल रो दिया - तुम हंसती हो,हंसो, खूब हंसों। बंगलों में रहने वाली चुलबुंलियों, तुमने किसी गरीब का जीवन पास से देखा है ? कभी जाकर उसके आँसू पोछे हैं ? नहीं, तू ऐसा नहीं कर सकती। तुमको ऐसा पाठ ही नहीं पढ़ाया जाता होगा। एक आह भर कर उसने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की, भगवान यदि एक गरीब की प्रार्थना सुनने को तू तैयार हो तो यही कहूंगी कि दुनिया में किसी दुश्मन को भी वैधव्य मत देना।
कितनी करुणा थी उसकी प्रार्थना में, परन्तु उसकी प्रार्थना पर उस दिन भाग्य ठहाका मारकर हँसा था। अदृष्य के उस व्यंग्य को वह भोली नारी राधा नहीं समझ सकी।
इसी दशहरे की बात है - अपनी कुटिया के आँगन में राधा एक जीर्ण शीर्ण चटाई पर बैठकर रंगीन भीड़ देख रही थी। बड़ी उत्सुकता से उनके चेहरे मोहरे देखने लगी। खुशी से फूली - फूली जनता की जमात को देखकर वह एक बार मुस्करा उठी। उसकी बड़ी - बड़ी आँखें गोरी - गोरी अंगुलियों में पकड़े एक सादी धोती के घूँघट में से चमकने लगी।
उसने अनेक माताओं ओर पिताओं को देखा जो अपने बच्चों को सुन्दर नवीन एवं रंगीन वस्त्र पहनाकर दशहरा मैदान की ओर बढ़ रहे थे। बच्चों के हँसमुख चेहरे देखकर वह गुदगुदा गयी। इसे जीवन कहते हैं। एक दीर्घ नि:श्वास निकल पड़ी उसने ऐसा अनुभव किया जैसे उसने जिन्दगी को दूर से देखा है पर उसका स्पर्श नहीं कर पायी। किसी प्लेटफार्म पर खड़े लोकल यात्री की तरह उसने मेल की तूफानी गति से अच्छी जिंदगी को भागते हुए देखा ही है। वह जल्दी - जल्दी जाती हुई भीड़ को इस तरह देख रही है जैसे कोई दार्शनिक किसी महत्वपूर्ण बृहत पुस्तक के पृष्ठों का सिंहावलोकन कर रहा हो। उसने देखा अमीरों के अरमान तो आकाश के तारे भी तोड़ते हैं पर वह अभागिन तो शारदीय शंका में भी धरती के कंकड़ गिनती है।
भीड़ धीमी हुई। राम - लक्ष्मण की सवारी निकली। तुरन्त उस मूर्तिवत श्रद्धा ने हाथ जोड़कर स्नेह सिक्त दो आँसू अपने कपोल पर लुढ़का दिये। हरमोहन, ब्रजकिशोर एवं लीला तीनों ही पड़ोस के आँगन से अपनी माता के पास आ चुके थे और इस तरह जुलूस समाप्त हुआ तो हरमोहन ने राधा से कहा - माँ, मैं भी राम बनंूगा। लक्ष्मण मैं बनूंगा माँ। बिरज कैसे चुप रह सकता। माँ मानो यह सब कुछ सुनकर निहाल हो गयी। राम - लक्ष्मण की यह जोड़ी अमर हो बेटा - कहते ही राधा की आँख के कोरो में अश्रु छलछला आये।
और मैं क्या बनूंगी माँ, लीला ने राधा का आँचल पकड़ लिया। तुम, तुम ... सी ... दुल्हन बनोगी, दुल्हन। दुल्हन तो सीता जैसी एक नारी होती है बेटी जो राम जैसे देवता से ब्याह करती है।
- अच्छा फिर ?
- फिर वह ससुराल जाती है।
- मैं भी ससुराल जाऊंगी।
राधा ने लीला को दुल्हन कह तो दिया पर दुल्हन की कल्पना से उसका दिल हिल गया। उसने उसे छाती से चिपका लिया और रोने लगी।
- माँ, तुम रोती क्यों हो ?
- बेटी, तुम ससुराल जाती हो इसीलिए।
- अच्छा मैं ससुराल नहीं जाऊंगी बस। अब तो चुप हो जा।
लीला ने राधा के आँसू पोछ दिये।
- माँ, तू भी ससुराल मत जाना।
अबोध बालिका की यह बात सुनकर राधा के अधरों पर एक हल्की सी मुस्कराहट छा गयी पर जल्दी ही अदृश्य हो गयी। इस छोटी सी जान को मैं कैसे समझाऊँ कि  यही मेरा ससुराल है। पर क्या इस मिट्टी के टूटे घर को ससुराल कहते हैं। क्या आँखें फाड़ कर डराने वाले इस छप्पर को ससुराल कहते हैं ? क्या इन फटी - फटी दीवारों को  ...? मैं ससुराल में होती तो बच्चों तुम्हारा दशहरा चीथड़ों में नहीं झाँकता और तुम्हारी दीवाली ... ओह, बीस दिन ही तो है दीवाली के।
अबकी बार मैं अपने पेट पर पट्टी बाँधकर भी अपने लाड़लों के लिए दीवाली मनाऊंगी। ढेर सी मिठाइयाँ लाऊंगी। पड़ोस के बाबू रामचरणदास के घर काम करने जाऊंगी पर उस दिन नीना ने कहा था - उस पर विश्वास मत करना राधा इसीलिए मैंने काम करने से मना कर दिया। मैं गरीब तो हूं पर अपनी दौलत कैसे बेच दूंगी, और कोई काम ढूंढ लूंगी।
अरे, घर में शक्कर नहीं। दीवाली पर शक्कर मिली भी तो बहुत कम। वह भी हम गरीबों तक तो कहाँ हाथ लगेगी। गेहूं भी तो नहीं। दीवाली में मक्का खिलाऊंगी बच्चों को ? नहीं एक बार तो आती है दीवाली साल में। सुनती हूं अमीरों के यहाँ रोज दीवाली होती है। देखा न उस दिन सेठ रामगोपाल के यहाँ सात मई को कैसा जलसा था। बाप रे, मैंने तो जिन्दगी में न ऐसा बंगला देखा न ऐसी रोशनी न ऐसा जलसा जमघट।
यह इन्द्रपुरी है। सुना है यहाँ एक से एक बढ़कर आलीशान कोठियाँ और बंगले हैं। क्यों न रामगोपाल सेठ के यहाँ जाकर बच्चों के लिए कुछ मांग लूं। उस दिन कहता था - राधा तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं है। तुम्हारे घर वाले मेरे यहाँ दस साल तक काम करते रहे। बड़े ईमानदार थे। पर मुझे तो उसकी भी आँखों में ऐसा ही दिखता था जो हो पर मैं किसी से भीख तो कभी नहीं मांगूंगी। भीख माँगकर दीवाली तो भिखारिन भी मना लेती है। न, मुझसे ऐसा न होगा। मैं घर की लाज नहीं जाने दूंगी। जहाँ भी काम मिलेगा, कर लूंगी। साँच को आँच नहीं।
और सचमुच राधा ने जी तोड़कर काम किया। साथ ही उसने एक जून भोजन करके बचत भी शुरु कर दी। उसकी ऐसी हालत देखकर एक दिन पड़ोसिन ने उससे पूछ ही लिया- आजकल बहुत दुबली हो गई है। राधा, क्या चिन्ता लगी है तुझे। एकदम आधी हो गयी है, आधी।
राधा ने झूठमूठ ही बहाना कर दिया - दस बारह दिन  से हाड़ में बुखार रहता है गंगा माँ। खाना भी नहीं पचता। फिर दीवाली का कामकाज। लीपना, पोतना, रंग छापना ये करना वो करना। मरने की फुर्सत नहीं।
गंगा माँ मान गयी तो राधा फूली - फूली घर में आयी और मुँह पर हाथ धरकर अकेली हँसने लगी। वह उस दिन की प्रतीक्षा करने लगी जब हरमोहन बड़ा हो जायेगा। अरे दस साल की ही तो बात है। यूँ निकलते हैं। फिर तो जगमोहन नौकरी करेगा। ढेर से रुपये लायेगा और तब घूँघट निकालती हुई छोटी सी बहू छमक - छमक कर इस घर को आबाद कर देगी। तब वो सब मिट्टी सोना हो जायेगा।
दीवाली आ गयी। मंहगाई है, क्या करे। एक बरस में तो आयी है दीवाली रात को बच्चे सोये तो दीवाली के सपनों में खूब  झूमें। लीला तो बिस्तर में से उठी वैसे ही हठ करने लगी - माँ, हम भी पटाखें फोड़ेंगे। बिरज तो राधा का आँचल पकड़कर घसीट ले गया आँगन तक। जा न माँ, मिठाई ला, मैं मिठाई खाऊँगा। हरमोहन बोला - माँ आज मैं नये कपड़े पहनूंगा, हाँ।
बिरज ने तो राधा को चेतावनी दे दी - माँ, मेरे लिए भी बुशर्ट लाना। बुशर्ट नहीं लायी तो तुझसे नहीं बोलूंगा। बच्चों का हठ राधा को बड़ा प्यारा लगा। इसीलिये तो कुछ देर वह कुछ नहीं बोली और केवल इच्छा करती रही कि वे बार - बार नये कपड़ों की, पटाखों की व मिठाइयों की माँग करें। आज राधा कंगाल नहीं है। आज के लिए तो वह धनवान माँ है। बाद में उसने हरमोहन की पीठ थपथपाकर, बिरज को चूमकर और लीला को दोनों हाथों में ऊपर उठाकर घुमाने लगी। हाँ - हाँ, सब लाऊगी। बेटा, तुम जो कहोगे वह लाऊंगी। बुशर्ट लाऊंगी, पेटीकोट लाऊंगी, खूब सारी मिठाई और ढेर सारे पटाखे लाऊँगी।
अरे हाँ, सस्ते अनाज की दुकान से गेहूँ लाना तो भूल ही गई। मालपुआ कैसे बनाऊँगी।
हरमोहन तू बिरज और लीला की देखभाल करना। मैं अभी आती हूं। माँ जल्दी आना, भूख लगी है देख न। मोती काका ने वहाँ तो खूब सारी चीजें बनाई है। गौरी और सज्जन तो सुबह से ही मिठाई खा रहे हैं। माँ, गौरी मुझे भी मिठाई दे रही थी। मैंने कह दिया - हम तुम्हारी मिठाई नहीं खायेंगे। हम मंगते थोड़े है।
- शाबास बेटा, अच्छा किया। अभी लाई तुम्हारे लिये। सब ले आती हूं।
राधा घर से इतनी फुर्ती से निकली जैसे एक से दस तक बच्चे गिनती लगाये और राधा बाजार से सब कुछ खरीदकर ले आये। हाँ, इससे बच्चों को बड़ा धीरज बंधा।
बाजार से दो बुशर्ट, एक पेटीकोट, कुछ मिठाई और पटाखे खरीदकर राधा सस्ते अनाज की दुकान पर जाकर क्यू में खड़ी हो गयी। दिन रात का परिश्रम फिर एक जून भोजन से कमजोरी और ऊपर से तेज धूप, राधा दो घण्टे में तो निराश हो गयी। घंटे पर घंटे निकलते गये पर हनुमान की पूंछ की तरह क्यू बढ़ता गया। क्यू में से कोई बोल उठा - अरे भाई, नम्बर आना कठिन है। जान - पहचान के लोग धड़ाधड़ ले रहे हैं और हम यूं ही मुँह ताक रहे हैं। राधा को पाँच घंटे हो गये। वह कल्पना करने लगी - बच्चे भूख से तिलमिला रहे होंगे। जैसे वह आवाज सुन रही थी। माँ कितनी देर हो गयी। तू तो कहती थी, मैं अभी आती हूं, माँ। गौरी और सज्जन तो दिनभर से मिठाइयाँ खा रहे हैं। हमको भी दे न। बहुत भूख लगी है माँ। उसकी आँखों से अश्रु झरने लगे। तेज धूप थी। सारे बदन में पसीना हो आया था। उसने देखा लाइन वहीं की वही हैं। वह घबरा उठी। पुन: कल्पना में डूब गयी। कल्पना के अन्तराल में भूख लगी है, माँ। अब नहीं सहा जाता। बच्चों की रोने चीखने की आवाज आने लगी कभी तो घर जाऊँगी इस आशा से उसकी आँखें चमक उठती। पटाखे लायी माँ, मेरा पेटीकोट, और मिठाई। माँ गौरी और सज्जन तो दिन भर से मिठाईयाँ खा रहे हैं। हमको भी मिठाई दे न। माँ ... माँ ... माँ ...।
धड़ाम की आवाज से क्यू में खलबली मच गयी। क्यू तोड़कर लोग राधा के चारों ओर इकट्ठे हो गये। राधा बेहोश पड़ी थी। उसके हाथ की मिठाई, पटाखे बिखर गये थे। आसपास दो नये बुशर्ट और पेटीकोट छिपरा गये। पुलिस आ पहुँची। लोगों ने नब्ज देखी। राधा क्यू छोड़कर भगवान के यहाँ इस जालिम जमाने की शिकायत करने चली गयी थी। शायद उसने तब भी यही कहा होगा - अभी आती हूं।
पर बिलखते हुए बच्चे अपनी प्यारी माँ की प्रतीक्षा करते रहे। उनके पटाखे नहीं फूट सके। हाँ, उनका भाग्य अवश्य फूटा परन्तु उसकी आवाज अमीरों की आतिशबाजी में सुनाई नहीं पड़ी।
  • पता- माँ, 145, गोपाल कालोनी, झाबुआ [म.प्र.]

भरका



- मंगत रवीन्द्र  -

जगनू हर नवा घर करिस ता भाई बंध संग पारा परोस ल झाराझार खवाइस। पिसान के हाथा देवाइस। बुड़ाती कोन्टा म देवता ल मढ़ाइस। बंदन बुकाए तिरसुल, कलस, कोन्हा म माढ़े डरडराउन लागै सुरइला संग दुनों परानी पलगी म सुतैं अऊ बेटा मटकू ल देवतरहा मुड़हत घर म सुतावैं। नम्मी पढ़त हे। एक ठन बिजली बलब कड़ेरी के पोल ले परोसी घर ले तार ले बुलका के लाइन ल लेहे। तिही पाय के एके खोली म अंजोर हर बगरै ... बेटा मटकू हर रात कुन पढ़ - लिखै तहाँ सूत जाए ... रात के सपना देखै के - तैं मोर पूजा कर। तोला धन दोगाही दिहौं ...। मटकू हर झकनका के जाग जाए ...। कभू - कभू तिरसूल धारी संकर पारबती मन डुड़वा बइला म चढ़ के आय ... एला सपना म देखै ... मटकू हर मन म राखे रहै। लइका जात तो आय ... खेले कूदे के धियान ... बिहना होवै तहाँ भौंरा बांटी ...।
एक दिन ददा ल बताइस - ददा, रात के रकम - रकम के सपना सपनाथौं। मोर बर नानकन मन्दिर बनवा दे ... मैं हर संकर सामी के पूजा करिहौ। लइका के गोठ ल सुन के जगनू हर दांत म अंगठी ल चाबी लीस। लइका के मिसिर के रेख नइ आए ए .. अऊ भगती के गोठ गोठियाथे। नोहर के छोहर म एक ठन बेटा पाएं तेहू हर मोर जोगी बनहूं कहत हे। मन म बिचार करथे के घर के देवता हर बिछाए हे का ... ? बउछाही ता तो मोर पार वार के बंदरो बिनास हो जाही ...।
सियान हर सियान होथे। गुन समझ के कथे - बेटा, अभी लइकोंधा अस ... दिन भर खेले कूदे रथस .. सपना डारथस। सपना रूख के जकना, जागे म दुच्छा ... सुध म आ जाथे ... तइहा सियान मन कहैं बेटा। जै - जै महादेव पारबती ... सुत उठ तहाँ बासी म दंती ... ददा के बात ल सुन के मटकू हर फेर खेले कूदे म भुलागे रात के सुतीस तहाँ फेर नदिया बइला म चढ़े महादेव ल सपना डारिस।बइला हर पूंछी ल अंटियावत रहिस अऊ पीठ ऊपर म संकर सामी बइठे हे। मुड़ म लम्बा जटा, भभूत चूपरे, बघवा के छाली ओढ़े मुसकियावत भोले नाथ ओकर कती आवत हे। मटकू हर झकनाके जाग गे। ददा ल जगाइस अऊ सपना के गोठ ल सुनाइस। ददा हर कथे - ले बेटा सूत जा, देवता धामी कती गोड़ करे हस ता रकम - रकम के सपना ल देखत हस कहत ओकर मुड़सरिया ल एती करिस ...।
सपना ल रोज सपनाए ... भूत मोके कस टूरा बरबरा डारै अऊ सपना म सुखाते जावत हे। ददा हर रकम - रकम के ओखद मांदी कराइस टोंटा म ताबुज अऊ बहाँ म जरी बंधवाइस। गुनिया बइद मन फूंकझार करिन ... सावन महिना म पींउरा पेंट कुरता पहिर के बम भोले कंवरिहा संग तुर्री धाम म जल चढ़ाइस। जोड़ा - जोड़ा फरहरी फोरिस तभो ले सपना बैरी बंद नई होइस। आखिर म एक झन जोतीस हर बताइस के बेटा, संकर जी के एक ठन मन्दिर बनवा दे ... अऊ ओई म बइठ के पूजा कर ता तोर सपना हर बंद होही। जगनू मण्डल हर अपन कुल परवार के संग सुरसुमता मढ़ाके नानकुन मंदिर ल बनवाइस ...।
अब टूरा मटकू अउ दाई - ददा ल थोकिन सांति मिलीस। सपना कम अवै ... पढ़ाई - लिखाई ल छोड़ केटूरा हर भगती लाइन म उतर गे। दस बारा बरिस ले पूजा करत आवत हे। भरखम  जवान होगे बेटा ... डाढ़ी बढ़ाए हे, माथा म चंदन बुकै ... गरदन म कन्ठारा माला के लरी हर ओरमे रहै अब तो मटकू नाव छिपा के, बाबा जी ... नाव परचरित होगे।
जगनू के एके ठन बेटा ... तेहू हर भगत लहुटगे। बर बिहाव करके कया - मया देखहूँ सोचे रहिस पर उल्टा होगे कथे ना - एक ठन आँखी तेहू म चिपरा ... का करै बिचारा ... मन के बिला म सुख के मुसवा ल छपके हे। सुरइला के अंचरा के मया बोचकत हे। महतारी हर कोख के पीरा ल कब भुलाथे जब हरियर मड़वा तरी तन म हरदी रंगे बेटा पत्तो ल देख ... मोहरी के सुर अऊ सुहागीन मन के बिहाव गीद हर अंतस म समाथे .. राजा रानी बरोबर बेटा बहू के चुम्मा लेथे ... सुख के चार बँूद आँसू थिप्प जाथे। करासकरवा के सोनहा दीया कस मन हो जाथे। पर सुरइला के मया हर जेठी नरवा कस सूखा होगे। पझरा के सउंक म ठन - ठन पखराके चाप उकलथे। अइसन ढंग ले बेटा हर संसार के रिवाज ल लात मार दिस अऊ एती जगनू हर नानकन ओखी ल लेके रातकुन बेंस दुवार ले भाग गीस। रिखी भांचा संग खेत खार तलक ल खोज डारिन पता नइ चलीस ...।
सुरइला हर छोटे कदकाठी के तिरिया ए .. उज्जर देंह तेमा मसराइल के लुगरा ... कनिहा ले चूंदी ओरमे रहै। फोदकू पांव के तीरे - तीर गोड़रंगी अऊ ऊपर म चाँदी के टोंड़ा ... चपके रहै। संझा के बेरा ए ... सूपा म नूनिया भाजी ल निमारत रहै। जगनू हर खार कती ले बांक ल खन के एक बोझा कांध म बोहे लान के अंगना म पटक दिस। असाड़ के बारी ल बतियाना हे। लहंस जाथे बारी ... एती खवा हे, असड़हू ठाढ़े बारी म लमेरा सेती अऊ करेला नार चढ़थे। ढेंखरा तो  भिन्ने गड़ियाथे तिही पाय के बांक ल कोड़ के लाइस हे। सुरइला हर भाजी ल निमेरत गुड़ाखू ल घंसत रहिस देखके जगनू हर कहिस - छी:, भाजी ओ निमारत हस अऊ मुँह म ...। मुँह ल धो ले तहाँ ले भाजी ल निमारबे।
सुरइला कथे - थोरे गिर जात हे ...।
- गिरत नइ ए ता काय, कमहूँ थल्लक ले गिरगे ता ... ? असाद नइ तो ... राधेओं कुटे के बेरा ... टार तोर चोचलाही ल ... कहाँ लंग के असाद डौकी ल पा गेओं। बहू लानबो तभो अइसनेच करही का ? कतेक ल सिखावंव एला। एक सिक्छा करमी के पुरता तो सिखा डारें चेंत आही त तो ...।
॥ पढ़त - पढ़त म पखरा भये, लिखत - लिखत म काठ॥
॥ गुरूजी पुछै पढ़ंता मन ला , ता सोला दुनी आठ॥
कतेक ल लिखौं के कहौं ... दुनों परानी म नानकन ओखी हर कुकुर मुड़ी कस घाव बाढ़गे। जस घाव बाढ़थे तस मछियाथे। झगरा बाढ़गे ओकर सुने ले ओहर आगी बर जाथे ता ओकर सुने ले ओहर ... पारा परोस के मनखे मन जुरियागे ... झगरा ल बुताइन। रतिया के खाना - पीना म कोई सोर नइ रहिस। गिल्ला गादर भात ... जरे भुंजाए साग अपन - अपन दसना म जा के चुरमुटा गइन .... कइसे रात पहाए निदिया रानी ए हर जानही ...।
॥ कुकुर बिलाई सुरगे, मुसवा रेंगे पटउहा म॥
॥ रात रक्सीन जागत हे, पीरा धरे हे झंउहा म॥
सुरइला के सुभाव रहिस के ओहर चार बजे सुत के उठ जाए। घर अंगना छर्रा देवै, पानी कांजी भरै, बरतन भड़वा मांजै पर आज तो तरिया म बोरे अंटाएन कस परे हे। उठिस पर अबेरहा ... कुमला के ... धनी के दसना सून्ना ... कती गे हे उठके ... ताक पाक करिस, गम नइ मिलीस। आरा - परोस ल पूछिंस। पता नइ ए ... हलाकान होगे। ओ तो उठै बिहना अऊ एक लोटा पानी मांगै पर आज ओ ओखी हर कोंचई कांदा कस तरी म गड़गे ...। सुरइला के चूल्हा के राख चूल्हा म परे हे। जतर खतर बरतन भंड़वा ... अंगना म बहिरीनइ परिस ... सुरइला हर रोवत गावत गाँव के रिखी भांचा मेर गइस ... हाल चाल ल सुनाइस ... भांचा पूछिस - ता का करी मामी ? ममा हर लइका मन कस कती उछिंद होगे। मामी कथे - कहुँ कती जहर महुरा खा के परान ल तियाग झन देय भांचा। फेर राँड़ी हो जाहूं।
- अइसन झन गोठिया मामी ... ममा हर अइसन नइ करै कहुँ कती गये होही सियान अऊ बड़ समझदार मनखे ए ... रिस हर अपन ल खाथे। ए जुवार के भराए पुरा हर ओ जुवार म ओहर जाथे। फिर झन करा... संझा के गंवाए गरूवा हर बिहना, कोठा म आ जाथे।
- नहीं भांचा, तुंहर ममा बड़ रिसहा ए ... कछु कर डारही ता पाछु के चेते ले का होही। चला मोला संग देवा। अपन जन नता ल खोजबोन।
- का होही मामी। कहत रिखी भांचा हर पेंट कुरता पहिर के तियार होइस ...।
मामी के मइके, ममा के महापरसाद, भाई के समधियाना ल सोरिहाइन बस अडï्डा, हाट - बाजार, धरम शाला ल खोज - खोज के थक गइन। खाए - पीए के सोर नइए ...। मामी तो कल के मोखारी नइ चाबे ए ...। इचार बिचार अऊ धरना म पैसा फेंकिन... गइस ता गइस कहाँ ? सियान होके गंवारी करत हे। अरे, भागे ले बिपत नइ हरै। कथे ना - घर के भागे ता बाहिर के भागे कहाँ जाही। सियान मनखे ए। सियान कस गुनतीस। मामी के हलपटï्टा बाढ़गे। टूरा मटकू ल कहतीस ता ओ तो लटï्ट बढ़ावत हे। धुरूवा भगत बनगें। कोन बैरी ओकर मति ल डोला दिस ... बाप तेन बइहा भूतहा होके घर ले उछिंद होगे। किसान के गाय गोरू गंवाथे ता ओकर बर कांजी हाउस रथे। गरमी के दिन ककरो कोलाबारी म बासा रथे पर मनखे के उछिंद ल कोन बताए ?
कौसिल्या के बेटा राम के बनोबास होइस ता महतारी के खोली म रात के दीया हर धीमिक - धीमिक बरत रहै। माता कौसिल्या हर मुठा भर भानस अऊ लोटा भर पानी ल पी के बिगर दसना के खटिया म बइठे - बइठे चौदा बरिस ले गुनत रहिस। सावन के महिना अगास म घुमर - घुमर के बादर आवत हे। बिजूरी हर जिगीम - जिगीम लहुकै ... बन के जीव मन हुंकारत रहैं। माता कौसिल्या हर मुठा भर भानस अउ लोटा भर पानी ल पी के बिगर दसना  के खटिया म बइठे - बइठे चौदस बरस ले गुनत रहिस। सावन के महिना अगास म घुमर - घुमर के बादर आवत हे। बिजूरी हर जिगीन - जिगीन लहुकै बन के जीव मन हुंकारत रहैं। माता कौसिल्या हर दसना म बइठे - बइठे रात ल पहावै ... थप्प - थप्प आँखी ले आँसू थिपै ... संग म सुकुमारी सीता अऊ सउंत बेटा लछिमन जती ... धनुष बान धरे बिगर पनही के हे ... माता कौसिल्या हर गुनत हे :-
॥ रिमझिम - रिमझिम मेहा बरसे, पवन चले पुरवइया॥
॥ कान, बिरिछ तरी खड़े होही, राम लछमन दुनों भइया॥
कस मामी, सुरइला हर माथा ल थपके बइठे जावै। चार बून्द आँसू हर आँखी ले थिप जाये। दु दिन, दु रात बलकगे, ममा के पता नइए ... मामी घर अंगना नइ चढ़े हे फेर का कहौं ... गइस ता गइस कहाँ ?
बजार के दिन ए ... बजरहा मन आवत हें... जावत हें। भीखू गौटिया कहत लागै। परोसी गाँव के गौटिया ए। किसानी लगठागे गुन के कोकानी ल कांध म अरझाए ... कोंथा म रूपिया खोंच के नागर लोहा लेहे। बाजार जावत हे। अनपनहा रस्दा। ओकर गाँव ले बजरहा कम आथें। बड़े फजर उठके रेंगीस ... टीप्प खार ... साल्हो गावत रेंगत हे :-
॥ कोन बन आमा रे, कोन बन जाम॥
॥ कोन बन म निकल गे लखन सियाराम॥ हरे हरे रे दोस ....।
बुढ़वा ए ता का होइस ... राग हर बुढ़वा थोरे होथे। रस्दा म भरका बड़ा गड्डïा चंग ले डंहकिस ता कान म अवाज आइस - राम राम गंउटिया।
आवाज सुनके गंउटिया हर अचरित होगे। कोन ए भई, मोला राम - राम क थे। सूनसान खार अऊ मनखे के बोली ... सब डहर ल निहारथे ... मनई के नाव नहीं, तहाँ फेर पाँव तरी, आवाज आथे - मैं जगनू औं गंवटिया। फेर देख डारथे। भरका म कइसे लुकाए हस रे ...। पेट भर डर गे रहें ...।
- तोला कइसे करथे कइके लुकाए हौ गंउटिया।
- मैं लइका औं रे ननजतिया मोर संग ठटï्ठा मसकरी करथस, अझी कोनो आने रतीस ता हाग मूत दार रहतीस ... भँय टार ... मैं तोरे घर समावत जाहूँ कहत रहें। एदे का होइस के पउर साल बइरसात म भूतहामुड़ा के पनलुकवा आमा ल गरजना मार दिस ... ठाढ़ सुखागे ... बेटा कस बढ़ोए रहें। एदे कमिया मन काट डरे हे। तोर गाड़ा ल भाड़ा म दे देेबे ... दु ठ गाड़ा के तीन  लहुट म आ जाही। अतका गोठ ल सुन के जगनू हर गुनथे - हौ कहत हौं ता नइ बनत ए अऊ नइ कहत हौं ता नइ बनत ए। हौ कहे म मोला घर जाए ल परही अऊ नहीं म मोर पुरखौती मालिक। गंउटिया कथे - का गुनथस रे ...। अतका म जगनू भरका ले निकलथे। कइसे चार दिन के खाए नइ हस कस दिखथस ... मार सोक - सोक ले। आँखी कान बोजागे हे। तलाव उछाल थोरे करे हस ?
- नहीं गउंंटिया, अइसनेच मुंह कान ए ग। ले चल भई चल, गाड़ा के दु ठन मुंह थोरे हे। भेज देबे तोर कमिया मन ल बियारा म परे हे गाड़ा हर। ले जाही। कहत जगनू हर गंउटिया के पाछु - पाछु .... जुआ म धन हारे जुवारी कस आवत हे। फेर गंउटिया हर गुनगुनावत हे :- कइसे दिखत हस आज उदास रे कजरेली मोर मैना ...।
छिन भर म जगनू के घर मुंहटा म आगिन ... तहाँ फेर का गंवटिया बर अंगना म मचिया निकाल के फफक - फफक के रोए लागीस। गंवटिया हर अब्बक - का होगे रे ए जगनू ल ... मरद जात होके अकारत डौकी कस रोथे। जरूर भरका म लुकाए के कलदब होही तहाँ अऊ का ... जगनू के परानी सुरइला हर लकठा म आ के सब हाल चाल ल सुनाइस ... तीर म रिखी भाँचा खलो ठाढ़े हे ... गंउटिया भक्क खागे ... अरे, नानकुन फुंचरा अऊ अतका रोंट अपलंग ... धन तो मैं भेंटे डारेंव। संग म ले के आ गेंव नइ तो का अलहन हो जाए रतिस। आज कल जी ल छिन म हेर डारथे। तभे बुजा हर गाड़ा मांगे ता कठुवाए रहिस, गुनत रहिस। मनखे अबूझ होथे। जिनगी के महतम ल नइ समझैं ... गुनत गंउटिया हर ए भाखा म जगनू ल समझाथे :-
॥ बड़े भाग मानुस तन पावा,सुर दुरलभ सब ग्रंथहि गावा॥ सुन ग जगनू ...
॥ पथ कितना भी हो पथरीला,
तू स्वेद बहा मुस्कुराता चल॥
॥ तूफान से है रह भरी,
सुधियों के दीप जलाता चल॥

  • पता- मु. पो. कापन, व्हाया - अकलतरा, जिला - जांजगीर - चाम्पा [छ.ग.]

फूटहा छानी



- सुरेश सर्वेद  -

गाँव भर चरचा चले लगिस। अब पंचाइती चुनाव म सरपंच महिला ल चुने जाही। कोन अपन माई लोगन ल चुनाव म उतारही। दिन - रात इही बात होय लगिस। कम पढ़े लिखे गाँव म जइसे माईलोगन ल चूल्हा फुंकइया अउ बंस बढ़हइया के संग कोरा म लइका खेलइया समझे जाथे ये गाँव उही श्रेणी म आये। गाँव म बइसका होय अउ कोन चुनाव लड़ही ये गोठ आये अउ जाये पर निरनय नई होय पाय। काबर के कोनो मरद बइठका म अपन घरवाली ल चुनाव म खड़े करे के बात नई करय। खिलावन बिन बलाय बइठका म आवय अउ मने मन कामना करय के ये ओ बेरा कभू झन आवय जब कोनो गाँव के मरद उठके कहे कि ओकर माईलोगन चुनाव लड़ही ? ओकर मंशा अपन माईलोगन ल चुनाव लड़वाय के रिहीस। पर बइठका म ऐकर सेती फुरिया नइ सके के ओला गाँव आये अभी जुम्मा - जुम्मा एक बरिस होय होही। दुसंधा म रहय कि गाँव वाले मन ओकर बात ल मानिस के नई मानिस। इही उधेड़बुन म ओहर अपन बात नई रख पात रिहीस। ओहर चाहत रिहीस के गाँव वाले मन सवांगे ओला कहाय। पर गाँव वाले मन के कहना तो दूरिहा के ओकर डहर हिरक के नई देखय। देखतिन भी काबर, ओहर बाहिर ले आये हे अउ गाँव के जिम्मेदारी ओला सउंपे के कइसे विचार गाँव वाले मन करतीन। पुराना सरपंच घलोक सुधवा। अपन सियानी के दिन म कभू दू पइसा के गबन नई करिस। गाँव के बिकास म जतका हो सकीस करे के परयास करिस। एक दिन के बइठका म ओकर माईलोगन के सरपंची चुनाव म खड़ा कराय के बात अइस त पुराना सरपंच कहे लगिस - मोर बाई कम पढ़े लिखे हे। पंचायत म लाखों रुपिया के काम आथे। मंय तो जइसे तइसे चला लेत रहेंव पर बाई कर पाही ऐमा मोला संदेह हे। अउ फेर आजकाल जनपद के बाबू भइया मन खांव - खांव करथे। एक एक काम म कमीशन मांगथे। मंय तो लड़ झगर लेत रहेंव पर डौकी परानी का करही ?
पुराना सरपंच के बात ल गाँव वाले मन सुनके कहिन - तोर बाई नाव के सरपंच रही, काम बूता तंय करबे।
गाँव वाले मन के सलाह घला पुराना सरपंच ल नइ जमिस। पढ़े - लिखे सरपंच के बात आते ही खिलावन के मुंह म पानी आय लगिस। ओहर मने मन बिचारे लगिस के गाँव वाले मन जानतेच हे के ओकर बाई पढ़े - लिखे हे। ओ चाहे लगिस कि कोनो उठे अउ ओकर बाई के नाव धर दे, पर ओकर डहर ले गाँव बेखबर रिहीस।
अब तो दिन अउ रात कोनो बेरा अइसन नई रिहीस जब माईलोगन के ये चुनाव म सरपंची चुनई के बात नई चलत रिहीस होही। जहाँ दू झन आदमी सकलाय बस एके च चरचा - कोन अपन माईलोगन ल चुनाव म खड़ा कराही ?
पीपर के पेड़ तरी बने चउंरा म बइठे हिरामन गोठयाय अउ बीच - बीच म सुकदेव हुंकारु भरय। अब गाँव डउकी सियानी म चलही। सरकार ल घला पता नई का - का होवत रहिथे। कते - कते मेर ले नियम कानून लाथे अउ सउप देथे, हमला भोगे बर। जब डउकी परानी गाँव के सियानी करही त घर के चउका - चूल्हा कोन देखही। कोठा के गोबर कोन हेरही। गोबर के छेना कोन थोपही ?
- आज समय बदल गे हे हिरामन। कब तक माइलोगन मन घर बइठे रहही ? सरकार जउन करथे, सोच - समझ के करथे जी।
- तोर बात ल मंय मानत हंव पर जब माइलोगन गाँव के सियानी करही, तब घर परिवार कते डहर जाही ?
- तोरेच बात ल मंय करथो। तँय का करथस घर म। भउजी तोर संग खेत म जाथे। लइका बच्चा ल तियार करके पढ़े खातिर भेजथे अउ तो अउ तोला दोहदोहों ले खवाथे घलो। अउ तंय ये काबर बिसरत हस- शहर के माइलोगन मन नउकरी - चाकरी करथे। अपन परिवार ल घला सकेलथे।
- तंय सिरतोन कहत हस संगवारी, मोर मति मारे गे रिहीस ...।
हिरामन अउ सुकदेव के जोड़ी ल का कहिबे - नानपन म दूनों जउन संगवारीी बनीन ओला अब तक निबाहत हे। दूनों के जोड़ी ल टोरे के जलनखोर मन कई उपाय गढ़हीन। परपंच रचिन पर उंकर जोड़ी नई टुटिस। अब तो उमर साठ ले पार कर ले हे अउ नानपन ले एको दिन अइसन नइ गिस होही जब दूनों संगी अलग होय  होही। कोनो गाँव जाना रहय त दूनों संगे जाय। चाहे सुकदेव के सगा घर बर बिहाव, मरनी- हरनी के काम कारज राहय या फेर हिरामन के सगा घर। जवानी के दिन म जतका उतलंई ओमन करिन होही ओतका कोनो अउ करे होही अइसन सुने ल गाँव म नई मिलिस। चाहे तरिया म डूबक - डूबक के नाहय के होय या फेर भैरी के बखरी ले बिही - खिरा चोराय के होय।
अभी उंकर मन के बातचीत चलत रहिस के सायकल म नरोत्तम आवत दिखिस। नरोत्तम सुकलिया के गोसइया ये। नरोत्तम चार कक्षा पढ़े के बाद पढ़ई ल छोड़ नांगर - बख्खर के काम काज म जोतागे। ओकर बाई सुकलिया दसवीं कक्षा पढ़े रहय पर कभू अइसन नई लगिस के सुकलिया ल अपन पढ़े - लिखे के गरब गुमान होही। बड़े ल बड़े अउ छोटे ल छोटे माने म कभू अनाकानी नई करिस। अइसन बेरा घला कभू नई आइस जब ओकर संग कोनों माईलोगन के लड़ई - झगरा होय होही। दसवीं पढ़े के बाद भी ओहर गाँव के रंग म रच बसगे ... नरोत्तम हिरामन मन कर अइस। सायकल म चढ़े - चढ़े कहिस - का गुनतारा चलत हे दूनों संगवारी म ?
- अरे नरोत्तम तंय कहाँ ले आवत हस बाबू। आ, बइठ। हिरामन कहिस।
- नहीं बबा, मोला बड़ बेर होगे घर ले निकले। गाय - गरु ल पेरा भूंसा दे के बेरा हो गे, फेर कभू बइठबो।
- हव रे भई, हमन तो होगेन ठेलहा, तंय कमइया। काबर समे खराब करबे हमर मन तीर।
- अइसन बात नोहे बबा।
- त अउ कइसन बात ये ? हिरामन तिखारिस।
- तहूं अतका ल नई जानस हिरामन। बड़ बेर होगे घर ले निकले बिचारा ल। काम - धाम नइ करही त बहू ठठाही नहीं ? अउ दूनों संगी खलखला के हंसे लगिन। नरोत्तम तहूं न बबा कहत सायकल के पाइडिल ल ओंट आगू डहर बढ़गे
हिरामन अउ सुकदेव के बात फेर चले लगिस।
दिन सरकते गिस अउ चुनाव बर परचा भरे के दिन लकठियाते गिस। गाँव म बइठका होइस। कोनो अपन माईलोगन ल चुनाव म उतारे  बर तियार नई होइस। खिलावन समे के ताक म रहिस। कोतवाल समे कथे - हमर मेर जादा समे नई हे। कोनो न कोनो ल परचा भरवाये के निरनय ले ल परही। नई ते हमर गाँव म सरपंच चुनई म देरी के साथ बिकास काम म घलो देरी होही।
कोतवाल के बात सिरतोन रिहीस। बिन सियान के भला गाँव के समस्या सरकार तक कइसे पहुंचतिस अउ कइसे समस्या के निदान होतिस। पर इहां तो बिकट समस्या उपस्थित रहिस। कोनो ये कहे बर तियार नई रिहीस के मोर बाई हर चुनाव म उतरही। अभी गाँव म बइठका चलते रहिस के गाँव के समारु अउ जीवन अइन। ये दूनों के दिन कटे खिलावन के घर। इंकर माईलोगन मन पर के खेती म बनी भूती करे अउ बाल बच्चा के साथ अपन गोसइयां के पेट घलोक पोसे। एक - एक चेपटी म अतका ताकत रिहीस के दूनों के दूनों खिलावन के परम भक्त बनगे रिहीन। खिलावन इही दूनों ल अपन पक्ष म बोले बर तियार करे रिहीस। अउ आज बइठका म आ के ये दूनों अपन बात ल बकर डरिन। कहिन - हमर गाँव म कोनो तियार नई होवत हे, अपन बाई ल सरपंची चुनाव म उतारे बर ता काबर खिलावन के माइलोगन ल नई उतार देव चुनाव म ... ?
गाँव भर के जुरायाये लोगन ल समझ आत देरी नई लगिस के ये खिलावन के दारु बोलत हे। हिरामन तिलमिलागे। कहिस - खिलावन ल अभी जुम्मा - जुम्मा चार महीना होय हवे गाँव म बसे अउ तुमन एकर माइलोगन ल गाँव के सियानी सौंपे के गोठ गोठियाथो। ये गोठियाये के पहिली सोचो समझो काबर नई ?
- तोर कहिना ठीक हे बबा, पर तहीं बता जब कोनों गाँव के माईलोगन तियार नई हे चुनाव लड़े बर तब अउ हमर मेर रद्दा हे तेला तहीं फुरिया। कोन अपन माईलोगन ल चुनाव म उतारे बर तियार हे ?
हिरामन चुप होगे। नाव ले त ले आखिर काकर। कोनो तो मुँह फुटकार के कहत नई हे के मोर माईलोगन चुनाव म उतरही। गाँव के सियानी करही। हिरामन कहिस - पराया ल सियानी सौपे के बजाय हम चाहत हन हमरे सियानी करे।
- पर कोन हे तेन ल तो बता बबा ?
- तुमन पर ल गाँव के सियानी सौपे के जघा म अपन माईलोगन ल सियानी सौपे के काबर नई सोंचव ?
- पर हमर बाई तो पढ़े - लिखे नइ हे, ये सरपंची बिना पढ़े - लिखे करही ता गाँव के का होही, तहड्डूं जानथस अउ महूं।
बात सिरतोन रिहीस। जउन जतका जादा पढ़े लिखे रहिथे। ओहर ओतकेच अच्छा अधिकारी मन संग बात करे ल जानथे अउ गाँव के समस्या ल रख के ओकर निदान के उपाय सुझाथे। पर इहां दूनों दरुवाहा के माईलोगन मन तो एक कक्षा नई पढ़े रिहीन। इंकरो मुड़ म गाँव के सियानी देना मने अपन गाँव के बिकास ल रोकना ये। दूनों दरुवाहा के बात ल सुनके खिलावन मंद - मंद मुसकाये लगिस पर हिरामन के अड़ंगा म ओला गुस्सा घलोक आये लगिस। पर करतीस ता करतीस का। एक डहर पूरागाँव रिहीस एक डहर खिलावन अउ ओकर दू पोसवा दरुवाहा। तीन झन से काम बनने वाला नई रिहीस। खिलावन तो चहत रिहीस - कम से कम आधा गाँव ओकर पक्ष म आये फेर आधा ल बात मानेच ल परही पर इहां आधा गाँव तो दूरिहा के रिहीस। दू के सिवा तीसरा ओकर पक्ष म नई रहिस।
वइसे जब ले पर्चा भरे अउ चुनाव होय के चर्चा गाँव म होय लगिस तब ले खिलावन सक्रिय होगे रहिस अउ गाँव के अइसन कोनो मनखे नई होही जउन ल अपन जाल म फांसे के परयास नई करे होही। गाँव वाले मन ओकर दारु तो पी गे पर ये दूनों दरुवाहा के बाद तीसरा कोनो ओकर जाल म नई फसीन। गाँव म जतका बेर बइठका होइस, कोनो ओकर पक्ष नई लिन। अब निरनय के घड़ी तिरयागे रिहीस। अपन बात ल अपन मुंह न रख के दूनों दरुवाहा के द्वारा रखना उचित समझ ओहर तीन दिन ले ओमन ल अतका पीयात हे के गाँव में बिरोध के बावजूद ओमन अपनेच बात म अड़े रहय संगे संग गाँव वाले मन ल भी अपन बात माने बर तियार कर ले। खिलावन जतका आसान बात बने के सोचत रहिस ओतका आसान नई होत रहिस। घुम फिर के बात घेरीबेरी अपनेच गाँव के माईलोगन ल चुनाव म उतारे के आ जाय।
अभी गुनताड़ा चलत रिहीस। उही बेरा नरोत्तम अइस। नरोत्तम ल देखके हिरामन के आँखी चमकगे। नरोत्तम ल अपन तीर म बलइस। कहिस - नरोत्तम, तोर माईलोगन पढ़े - लिखे हे। तंय अपन माईलोगन ल सरपंच चुनाव के फारम भरवा दे।
- मंय गरीब आदमी बबा। दूनों परानी मेहनत - मजदूरी करके घर - परिवार ल चलाथन। फेर गाँव के सियानी कइसे अपन मुड़ म लेबो। घर के छानी फूटहा हे। पानी टपकथे। अपनेच छानी ल टपराये के मोर ताकत नई हे तब कइसे गाँव भर के छानी ल टपरा सकत हंव।
- तोला अपन फूटहा छानी के चिंता हे ? इहां गाँव भर के साबुत छानी घलोक निथरे लागही, ऐकर चिंता - फिकर नई हे ?
- अइसे कइसे होही बबा, भला साबुत छानी कइसे निथरे लगही ?
समारु गुमशुम बइठे कुछ सोचे लगिस। ओकर दारु के निशा उतरे लगिस। फेर डगमगावत उठीस अउ कहे लगीस - हिरामन बबा सिरतोन कहत हे नरोत्तम ...।
समारु के बात ल सुनके खिलावन के संगे संग गाँव वाले मन घलो अकबकागे। समारु अपन कहना जारी रखिस - तोर घर के छानी ले पानी टपकथे ता का होगे। गाँव घर के सरपंच बनही त छानी छवा जाही अउ पानी के टपकना घला रुक जाही पर पराया के हाथ सियानी जाय म साबुत छानी ले पानी टपकना शुरु हो जाही ... समारु जीवन ल देखके कहिस - कइसे जीवन,का मंय गलत कहत हंव।
- बिलकुल गलत नई कहत हस संगवारी ...। जीवन हर समारु के साथ देय लगीस। उंकर बात ल सुनके खिलावन के गुस्सा भड़के लगीस पर करे त करे का ? गाँव के जुरयाये लोगन के बीच फुटकार के ये थोरे कहय कि मंय तुम्मन ल तीन दिन ले दारु अइसने कहे बर पीयाय हंव रे ? ओकरे फजीहज होतिस। मन मारके बइठे रहिस ...।
गाँव के सियानी, गाँव च के हा करही तभे गाँव म बिकास होही। दारु पीयाके जउन सियानी चाही, वो अपन बिकास ल सोचही ... कइसे समारु ? जीवन किहीस।
- सिरतोन कहत हस संगवारी ...। समारु हुंकारु भरिस।
खिलावन दू ठन आदमी पोसे रहिस, उही मन ओकर बिरोध म होगे। अब खिलावन ल लगे लगिस - ओकर पोलपट्टी खुले के बेरा आगे। ओहर बइठा ले सलटे के जुगत म रहीस। समारु ओकर कर अइस। कहिस - कइसे खिलावन, तंय हमर बिचार ले सहमत हस नहीं ?
खिलावन का कहे। चुप रिहीस। जीवन किहिस - अरे समारु, खिलावन का कहही। ये हमर गाँव के मामला ये। ये माटी म जनमे, ये माटी म खेले कूदे हन। नानपन ले हमर तन अउ मन म ये माटी समाय हे। पराय ल पूछे के काबर ? निरनय हम्मन ल लेना हे। नरोत्तम घर के भउजी सरपंच बनही, मतलब उहिच बनही ...।
- कइसे नरोत्तम, अब तोला का कहिना हे ? हिरामन पूछिस।
- अब मंय का कहवं बबा, गाँव वाले मन जउन चाहही उही होही।
नरोत्तम के कथन म स्वीकृति रहिस। पहली थपड़ी जीवन पीटिस अउ फेर बइठका भर थपड़ी के आवाज म गूंजे लगिस। थपड़ी के आवाज खिलावन के कान के परदा चीरे लगीस। ओहर बइठका ठउर ले उठके अपन घर डहर चल परिस, पर थपड़ी के गूँज ओकर कान के संग नई छोड़िस ....।
  • पता - शास्त्री चौक, वार्ड नं. - 16, तुलसीपुर, राजनांदगांव [छ.ग.]

बड़की भौजी




- हरप्रसाद ' निडर '  -

ओ समें के गोठ ए, बरिस ओन्नाइस सौ तीन कोरी आगर तेरा चौदा के। दर्री बांध ले नहर खिसोरा गाँव के पहिरीपारा के बूढ़ती कोती खनावत रहिस। ओई समे हरखू ह मिडिल स्कूल म पढ़त रहिस। हरखू पढ़े ल तो रोज जाय फेर खनाय नहर के खँचवा अऊ माटी पटान हाथी डिपरा पार ल चढ़े उतरे ल परय, एकरे सेती ओकर माड़ी कोहनी ह धर देय, पहिलीच ले तो बतहा रहबे करय। स्कूल ले छुट्टी होवय त रोवत कलहरत माड़ी ल धरे - धरे उठत - बइठत घर जाय अऊ बस्ता ल खूँटी म ओरमा के लझरंग ले खटिया म बईठय अऊ किल्ली पार के पीरा म रोवय। रोवई गवई ल सुनके ओकर बड़की भौजी ह बूता काम ल छोड़ के दउड़त आवय अऊ चुप करावय, पहिली तो भुलवार के भात खवावय फेर डोरी तेल चुपर के गोड़ हाथ ल चपके करय। थोरकन पीरा ह ओरवस होवय तहाँ हरखू खोल कती खेले - बुले ल चल देवय। अइसने ओकर दिन पहावत रहिस।
अवइया बछर कक्षा आठमी के बोड परीक्षा होवइया रहिस तेकरे सेती स्कूल के लघे म कंजी घर म सटे एक ठन कुरमी गौटिया के बड़का परछी रहिच, ओईला एक महीना के पाँच रुपिया किराया म आठ झन टूरा मिलके लीन, उंकरे संग म हरखू घलो ह अपन गाँव ले सवा कोस भूइयाँ रोज रेंगे ल बाचे बर संगी मन संग हो के रहे लागीच। बालभारती के परीक्षा हो गये रहिस। दूसर दिन अंगरेजी के पेपर होना रहिस, ओई रात के हरखू ह जेवन खाके स्कूल के आघू अमरईया कती बनिअई अऊ पटकू पहिर के बूले ल निकलथे, देखथे के एक ठन टरक आमा रुख के खाल्हे नठाय खड़े हे अऊ ओकर खलासी ह भीतरी म खूसर के नट बूलूट ल कसत हावय। हरखू घलो ह टरक के भीतरी  पीछू कती ले कोंघरे - कोंघरे खूसर जाथे अऊ उखरु बइठ के देखे लागथे। उखरु बइठे - बइठे हरखू ल असकट लाग जाथे त चूतर के भार पालथी मोर के बइठ जाथे, ओई बखत सूक्खा झरे आमा पतई के भीतरी म खूसरे भूरी बिछी ह अरई कोचके सही चूतर ल कोचक देथे, तहाँ ले लहू बोहाये लागथे, कइसनो करके टरक ले बाहिर निकल जाथे अऊ पोठ किल्ली पार के रोय लागथे। रोवई गवई ल सुनके टरक के खलासी कथे - का होगे रे टूरा। हरखू कथे - खलासी भइया, मोर चूतर म सजवा अंगरा खूसेरे सही अड़बड़ भरभरावत हे ग।
खलासी कथे - पटकू ल छोर तो ... फेर अपने ह पटकू ल छोर के झर्राथे, फटकारथे। पटकू ल कछू नई गिरय फेर अंजोर म पटकू ल बने निटोर के देखथे, भूरी बिछी अरझे रथे। बिछी के नाव ल सुनके हरखू काँख - काँख के कलहरे लागथे अऊ चिचियाथे  मोला बिछी मार दीस कही के। किल्ली ल सुनके आजू - बाजू के रहइया मनखे मन जूरिया जाथें, एक चीटी  के भीतर हरखू के संगवारी घलो मन का हो गे कहत आ जाथें। हरखू कथे - संगी मन मोला मोर घर अमरा देवा घर जाहूं। संगी मन तियार हो जाथें। दू झन हरखू के चेचा ल धरके नहर पार ले चढ़ाथे अऊ एकक झन ओसरी पारी पीठ म खंघोड़ी पाके राते रात मशाल के अंजोर म घर अमरा देथें।
घर म हरखू के दाई ददा अऊ भइया मन का हो गे कहिके हकमका के अबक हो जाथें। लकठा पारा के मनखे घलो मन का होगे सुनके जूर जाथें। संगवारी मन बताथें हरखू के चूतर ल बिछी मार दे हे कहिके, थिराय लागथें, फेर उलट पाँव हो जाथें। एती हरखू के ददा हा गाँव के बैद बड़का बूढ़वा ल बलाये ल पारा के एक झन टूरा ल पठोथे। चिहुर ल सुनके हरखू के बड़की भौजी नींद ले झकना के जाग जाथे अऊ अपन खोलिया ले आँखी रमजत आ के देखथे। देखके समझत बेर नई लागै। रोनहू - रोनहू धमरस - धमरस रेंगत अपन खोलिया के पठेरा ले नरियर के तेल ला के अपन देवर हरखू के हाथ पांव म मले - मले करथे अऊ माथा ल ठोके - ठोके करथे। थोरकन बिलम के बड़का बूढ़वा ओखद ले के आ जाथे अऊ झार फूंक के ओखद खवा जाथे। अधरथिहा हरखू के बिथा ह हलू - हलू ओरवस होथे अऊ माई पिला सूत जाथें।
हरखू ठढ़ियाये बेरा झकना के जागथे अऊ अपन ददा ल कथे - ददा ग आज मोर अंगरेजी के परीक्षा हे। हरखू के ददा अकबका के कथे - पहिली काबर नई बताये रे, बेरा ठड़िया गे हे। परीक्षा चालू हो गे होही कहत अपन मंझिला टूरा ल सईकिल म अमराये ल जोंगथे। हरखू लकर - लकर सान्द खोर के तियार हो जाथे। फेर दूनो झन सईकिल म खिसोरा चल देथें। रद्दा म सईकिल के चेन गिरई के दुख ल भोगत परीक्षा खोलिया म हबर के खुसरत रथे तभे बड़े गुरुजी ह कथे - अभी कइसे आवत हस जी हरखू ? हरखू नमस्ते सर जी कहत कथे - गुरुजी, बिछी चाब दे रहिस। गुरुजी कथे आधा समे तो खपत हो गे हे, का पेपर बनाय सकबे ? हरखू कथे - हाँ गुरुजी ...।
हरखू परीक्षा खोलिया म प्रश्न पेपर उत्तर पेपर अऊ कलम दवात ल धरे बइठे हे, काबर के मारे बोखार के ओकर मुड़ी ह किंजरत अऊ धमकत रथे, तेकरे सेती ओला कुछु नई सुझत हे। उत्तर पेपर म सिरिफ अपन नाव रोल नंबर अऊ स्कूल के नाव लिख के बाहिर निकल जाथे। अइसने सबो पेपर हो जाथे। तीस अप्रेल के परीक्षा नतीजा आ जाथे। हरखू अपन अंकसूची ल देखथे, अंगरेजी विषय म एक नंबर पाय हे फेर तीसरा दर्जा म पास हो गये हे। अंगरेजी म ओ समे पास होना जरुरी नई रिहिस काबर के अंगरेजी अलमलहा विषय रहिच।
गरमी के छुट्टी म पढ़ईया लइका मन उल्ला हो जाथे। खेलई कूदई म दिन पहाथें। हरखू के ददा एक दिन कथे - अब्बड़ बूलत रथच, तोर भइया मन संग खातू गाड़ा म जाय कर अऊ ओती ले लकरी भरके लाय कर। खेती किसानी म भूला जाबो असाड़ के अदरा ह बरस दिही त अकरस जोताय खेत घलो मन ल बउगे नई पाबो लंदफदा जाबो, एकरे सेती कहत हँव लउहा - लउहा खातू कचरा ल फेंका अऊ लकरी छेना ल सकेला। ददा के सिखोना गोठ सुनके हरखू ह अपन भइया मन संग खातू गाड़ा म जावय अऊ मंझन भर अमरईया म गाँव के टूरा - टूरी मन संग कच्चा आमा ल टोर - टोर के नून मिरचा के बूकनी म खावय अऊ तरिया के पानी ल मूड़ी बोर के डकर - डकर पीयय। अइसने उदीम करई म हरखू ल रात के जर चढ़ा लेवय अऊ माड़ी कोहनी ह अड़बड़ पिरावय। एक दिन रथिया बनेच जर चढ़गे अऊ हाथ गोड़ ह मंझनिया के घाम सही लकलक ले तीप गे। हाथ गोड़ अऊ माथा के पीरा म अधरथिया हँकरे लागीच। दाई के तीर खटिया म बड़की भौजी अंगना म सूते रहय। हरखू के हंकरई ल सुनके के कथे - दाई ओ दाई दऊ के हाथ गोड़ पिरावथे काये, हंकरथे। दाई कथे जा तो देख। बड़की भौजी हरखू के पेट ल टमरथे। ओ तो गोरसी के भोंगरा सही तीपे रथे। फेर नरियर के तेल ला के हाथ गोड़ ल चुपरथे ठोकथे। तरपवाँ अऊ माथा म पानी के पोनहा देथे। एक घरी के भीतर हरखू के बोखार कमती हो जाथे, फेर नींद भर रात के सूतथे। होत बिहनहा नगवा के डाकडर मेर सूजी पानी देवाय जाथे। ये दे दू दिन पाछू हरखू नागर बईला ले के अपन भइया मन संग खूर्रा धाय बोय खेत जावथे अऊ बड़की भौजी रोटी पानी खवाके बड़े - बड़े ढेला ल कुदारी के पासा म पासत हे।