शनिवार, 30 अगस्त 2014

अगस्‍त से अक्‍टूबर 2014

सम्‍पादकीय
समाज की भाषा, परम्‍परा, संस्‍कृति लोकसाहित्‍य और लोकगीत किसी की बपौती नहीं
आलेख
छत्‍तीसगढ़ : सृजनशीलता के विविध आयाम :  डॉ. गोरेलाल चंदेल
स्‍वतंत्रता आंदोलन और रेणु की स्‍त्री पात्राएं : डॉ. पूनम रानी
स्‍त्री मुक्‍ित का स्‍वर है थेरीगाथाऍ : अनिता भारती
रघुवीर सहाय की राजनैतिक चेतना : डॉ. नरेश टॉक
हिन्‍दी फिल्‍मों में स्‍त्री : डॉ. संजीत कुमार
कहानी
उसकी रोटी : मोहन राकेश
काली पहाड़ी : विवेक मिश्र
चोर अंकल - पुलिस अंकल : लोकबाबू
फॉंस : सनत कुमार जैन
अनुवाद
पतंगसाज : कुबेर
लघुकथाएं
दो लघुकथाएं : अंकुश्री
दो लघ्‍ाुकथाएं : डॉ. अशोक गुजराती
बदलती हवा : राजेन्‍द्र मोहन त्रिवेदी '' बन्‍धु ''
सुरता
छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍याकाश का ध्रुवतारा : विशंभर यादव मरहा : वीरेन्‍द्र '' सरल ''
व्‍यक्तित्‍व 
अनिल विश्‍वास को मां से मिला भक्ति संगीत का संस्‍कार - डां.शरद दत्‍त
गीत/ गज़ल़/ कविता
गज़ल़ : काले - काले बादल भी ला : चॉंद '' शेरी ''
गज़ल़ : मेरे तुम्‍हारे बीच अब :  प्रो. फूलचंद गुप्‍ता
गज़ल़ : सपनों के संसार बहुत है : योगेन्‍द्र वर्मा '' व्‍योम ''
गज़ल़ : इल्‍म की शम्‍अ जलाओ : इब्राहीम कुरैशी
कविता : बरसों बाद : आनन्‍द तिवारी पौराणिक
नवगीत : सलीम खॉं फऱीद़
दो व्‍यंग्‍य गजलें : '' अशोक अंजुम ''
नवगीत : कुछ जाते वनवास में : कवि मुकुंद कौशल
दोहे : उसके हाथों में नहीं : बृजभूषण चतुर्वेदी '' ब्रजेश ''
दोहे : शिवशरण दुबे
कविता : वापसी : अनामिका
कविता : दिनेश कुशवाहा 
कविता : पतझड़ से झड़ते हैं, सारे अनुबंध : मनोज कुमार शुक्‍ल 
पुस्‍तक समीक्षा
लोक संस्‍कृति में लोकोत्‍सव - उत्‍सव की दानवीय भुजाएं: प्रतिरोध - अतिप्रतिरोध
समीक्षक - यशवंत मेश्राम
आखर के अरघ ( निबंध संग्रह )  समीक्षक - यशवंत मेश्राम
टुकड़ा कागज का एक उत्‍कृष्‍ट  गीतिकृति
समीक्षक - डॉ. महेश दिवाकर
आचार्य रामचन्‍द्र शुक्‍ल की '' आदर्श जीवन ''
समीक्षक - अरूणकर पाण्‍डे
साहित्यिक - सॉस्‍कृतिक गतिविधियॉं
डॉ. इकबाल देशप्रेम और मुहब्‍बत का पैगाम देने वाले शायर
प्रेमचंद की विरासत क्‍यों

समाज की भाषा, परम्परा, संस्कृति,लोकसाहित्य और लोकगीत किसी की बपौती नहीं

 इन्हें बेचने और विकृत करने का कुत्सित प्रयास बंद हो 
कुछ साल पहले एक आडियो-वीडियो एलबम बाजार में आया, जिसका नाम है - चुलबुली। इस एलबम में एक युगल गीत है -
'' हाय-हाय तोर लाल फीता, देख के मोला चढ़ गे निशा।
हाय रे मोर मनीषा, हाय रे मोर मनीषा।''
गीत के बोल श्रृृँगारिक हैं, सुंदर हैं। छत्तीसगढ़ में यह एलबम बहुत लोकप्रिय और प्रसिद्ध हुआ था; और कमोबेश आज भी लोकप्रिय है। परन्तु इस गीत में बहुत सारी बातें मन-मस्तिष्क को चुभने-झकझोरने वाली हैं, आपत्तिजनक हैं; गीत-संगीत की लय में बहकर जिसे शायद हम नजरअंदाज कर जाते हैं। समाज में दूषित वातावरण पैदा करने वाली इस तरह की बातों को नजरअंदाज करने के पीछे क्या है हमारी मजबूरी ? मजबूरी कुछ भी नहीं है। आमजन के लिए क्या कहें, यहाँ के बुद्धिजीवी-साहित्यकार, हम सभी अपने खिलाफ हो रहे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और तमाम तरह के शोषणों को सहने और चुप रहने के लिए कंडीशण्ड हो चुके है। किसी कवि ने कहा है - '' जिंदा आदमी सोचता है, बोलता है। नहीं सोचने, नहीं बोलने से आदमी मर जाता है। '' हमने सोचना और बोलना बंद कर दिया है। क्या हम सब मरे हुए हैं ? जिस मुद्दे की ओर मैं आपका ध्यान आकृष्ट करने जा रहा हूँ वह एक सामाजिक मुद्दा है, उसका संबंध शायद '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' से भी हो और इस कारण यह एक राष्ट्रीय मुद्दा होना चाहिये, परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा से सम्बद्ध होने के कारण इस मुद्दे को मैं विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ियों की अस्मिता के साथ ही जोड़कर देखना चाहूँगा।
इस गीत में मुद्दा है नायिका की वेशभूषा (कस्ट्यूम), उसका अभिनय, गीत के दृश्य तथा इस गीत के फिल्मांकन की। नायिका की वेशभूषा प्राथमिक शालाओं अथवा पूर्व माध्यमिक शालाओं में पढ़ने वाली बालिकाओं, किशोरियों की है। बालिका की दोनों चोंटियाँ लाल फीतों से बंधी हुई हैं जो इस एलबम के प्रौढ़ नायक के जेहन में प्यार का नशा पैदा करते हैं। नायिका के पीठ पर बस्ता लदा हुआ है; जाहिर है, इस गीत की नायिका प्राथमिक शाला अथवा पूर्व माध्यमिक शाला में पढ़ने वाली कोई बालिका है। या तो वह घर से स्कूल जाने के लिए निकली है या स्कूल से घर लौट रही है। रास्ते में उसका वयस्क प्रेमी (प्रेमी की वेशभूषा छात्रों वाली नहीं है।) मिल जाता है और उसके साथ प्रेमालाप करते हुए छेड़छाड़ युक्त संयोग श्रृँगार का गीत गाने लगता है। प्रेम-अभिसार का आमंत्रण देने वाले प्यार भरे कुछ मीठे प्रतिरोधों के बाद नायिका भी नायक का सुर अलापने लगती है। प्राथमिक शालाओं अथवा पूर्व माध्यमिक शालाओं में पढ़ने वाली बालिकाओं, किशोरियों की अवस्था बारह-तेरह वर्ष की होती हैं। किसी अवयस्क छात्रा के साथ इस तरह का फिल्मांकन क्या आपत्तिजनक नहीं है? बालिका हो अथवा बालक, यह अवस्था प्यार-मुहब्बत करने की अवस्था नहीं होती है। किशोर-मन सदा मधुर भावनाओं, कल्पनाओं और स्वप्नों के संसार में विचरण कर रहा होता है। प्यार भरे छेड़़छाड़ से युक्त इस गीत का और इस गीत के प्रेमालापों से युक्त दृश्यों का किसी किशोर-मन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, इसकी सहज कल्पना किया जा सकता है। क्या यह गीत अवयस्क बालिकाओं के प्रति यौन हिंसा को बढ़ावा देने वाला, इसके लिए दुष्प्रेरित करने वाला नहीं है? क्या यह गीत छात्र-छात्राओं के मन में शाला और कक्षा के प्रति प्रतिकर्षण और अरूचि पैदा कर उन्हें कल्पनाओं और अपराध की दुनिया की और दुष्प्रेरित करने वाला नहीं है? अवयस्क बालिका के साथ इस तरह की छेड़छाड़ या छेड़छाड़ का दृश्यांकन करना क्या गंभीर आपराधिक कृत्य नहीं है? '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' के अनुसार स्कूली छात्र-छात्राओं से किसी भी प्रकार का श्रम करवाना तथा उन्हें शारीरिक, मानसिक अथवा भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करना अपराध है। तो क्या सिर्फ इसलिए कि इस एलबम के निर्माण के समय '' शिक्षा का अधिकार अधिनियम '' नहीं था, निर्माता को बख्श देना चाहिए?
भाषा और संस्कृति का अटूट संबंध होता है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा है। इन लोकगीतों में यहाँ की परंपराओं, रीतिरिवाजों और यहाँ के लोकसमाज की भावनाओं आशाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति होती है। इन लोकगीतों का कलात्मक सौन्दर्य आह्लादकारी और मनोहारी होता है। इनमें भाषा का सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य होता है। परन्तु खेद का विषय है कि एक अर्से से, छत्तीसगढ़ी गीतों के आडियो-वीडियो एलबम जो जारी हो रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ की भाषा और यहाँ की लोकसंस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत करने की एक विकृत परंपरा विकसित हुई है और इस परंपरा को आगे बढ़ाने की होड़ सी मची हुई है। छत्तीसगढ़ी गीतों के इन एलबमों की भाषा में भाषा के सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य का स्थान, आपत्तिजनक फूहड़ता और कामुकता ने ले लिया है। एलबम निर्माताओं की दलील होती है - '' हम वही माल तैयार करते हैं, बाजार में जिसकी मांग होती है, ग्राहक जिसे खरीदना चाहता है।''
बाजार अब इन निर्माताओं के घर की इज्जत की मांग कर रही है। ग्राहक अब इनकी मां, बहन, बहू और बेटियों की इज्जत खरीदना चाहता है। इनकी मां, बहन, बहू और बेटियाँ इनका निजी मामला है, संभव है, ये इन्हें भी बेंच देंगे। लेकिन समाज की भाषा, समाज की परंपरा, समाज की संस्कृति, लोकसाहित्य और लोकगीत इनकी बपौती नहीं है; ये इन्हें बेचने और विकृत करने का कुत्सित प्रयास बंद करे।
000
संपादक

अनिल विश्‍वास को मॉं से मिला भक्ति संगीत का संस्‍कार

शरद दत्‍त
शरद दत्‍त
आज़ादी से लगभग चार साल पहले कि़स्मत फि़ल्म का एक तराना हर हिन्दुस्तानी की जबान पर था, जिसके बोल थे - '' आज हिमालय की चोटी से, फिर हमने ललकारा है, दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनियावाली, हिन्दुस्तान हमारा है।''  कवि प्रदीप की इस रचना को जिस्म की रंगों में खून की रफ्तार तेज कर देने वाली धुन में अनिल विश्वास ने ढाला था। देशभक्तिपूर्ण गीतों के प्रसंग में आज भी इस तराने को याद किया जाता है। लेकिन इसे विडंबना के अतिरिक्त और क्या कहा जाए कि हमारी यादों में तराने का अस्तित्व तो है, उसकी धुन बनाने वाले संगीतकार का नहीं। कितने लोग जानते हैं कि अनिल विश्वास कौन है, क्या है, वह जीवित है या नहीं, और अगर जीवित है तो कहाँ रहता है। किस तरह रहता है। लेकिन इस बेखबरी के लिए किसी को भी दोषी कैसे ठहराया जाए। अवाम की याददाश्त शायद बहुत देर तक उसका साथ नहीं देती। जि़न्दगी की तेज़ रफ़तार में वह अपने निकट अतीत का कोई एक टुकड़ा उसके पैरों को जकड़ लेता है और उसे झकझोर कर अपने होने का अहसास करता है।
हिंदी फिल्म - संगीत के भीष्म पितामह अनिल विश्वास का अतीत भी कुछ ऐसा ही
वे 1914 के उथल - पुथल भरे दिन थे। दुनिया के सभी छोटे - बड़े देश पहले महायुद्ध की विभीषिका झेल रहे थे। इसके बरक्स हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए जनता संगठित हो रही थी। एक तरफ कांग्रेस की नरम - दलीय राजनीति थी और दूसरी तरफ क्रांतिकारी गतिविधियाँ जोर पकड़ रही थीं, जिनके प्रमुख केन्द्र उत्तर में पंजाब तथा उत्तरप्रदेश, पश्चिम में महाराष्ट्र और पूर्व में बंगाल थे। विश्वव्यापी आतंक और हिन्दुस्तान के अवाम को इस कुलबुलाहट के बीच ही पूर्वी बंगाल [अब बांग्लादेश] के एक सुदूर नगर बरिसाल में 7 जुलाई 1914 को अनिल विश्वास का जन्म हुआ। कहा जाता है कि अभिमन्यु ने अपनी माँ के गर्भ में चक्रव्यूह - भेदन की कला सीख ली थी। बालक अनिल भी शायद गर्भ में रहते हुए ही उस दौर के प्रभावों को आत्मासत कर रहा था। जो उम्र बच्चों के खेलने - कुदने की होती है उस उम्र में वह क्रांतिकारी बन गया। उसके अंतस में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भरी हुई थी। लेकिन इसके अलावा उसे माँ से एक और संस्कार मिला था- भक्ति संगीत का संस्कार। जिसने अंतत: उसे क्रांतिकारी से संगीतकार बना दिया। संगीत उसके प्राणों में बसने लगा। संगीत ने उसकी आत्मा को मुक्त कर दिया। पर उसकी क्रांतिकारी भावनाओं का उ$फान फिर भी शांत नहीं हुआ। अवसर मिलते ही उसके भीतर का लावा फुट कर बाहर निकलने लगता।
बंगालियों के सारे विरोध के बावजूद उनके प्रांत का पश्चिमी और पूर्वी बंगाल के रुप में विभाजन हो चुका था। और जहाँ तक क्रांतिकारी गतिविधियाँ का संबंध है, पश्चिमी बंगाल में कलकत्ता तथा पूर्वी बंगाल में बरिसाल, जहाँ अनिल विश्वास का जन्म हुआ, सक्रियता के प्रमुख केन्द्र थे।
अनिल विश्वास की जन्मस्थली बरिसाल सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता अश्विनी कुमार दत्त की कर्मभूमि थी। उनके द्वारा गठित बांधव समिति ने एक अनुमान के अनुसार ढाई हजार से अधिक स्वयंसेवक तैयार किए थे और ग्रामीण विवादों के निपटाने के लिए अनेक न्यायिक समितियाँ बनाई थीं। विख्यात इतिहासकार सुमित सरकार के शब्दों में - बांधव समिति ने अपनी प्रथम वार्षिक रिपोर्ट में 89 न्यायिक समितियों के माध्यम से 523 ग्रामीण विवादों का निपटारा करने का दावा किया था ... 1909 ई. में इसकी 175 ग्राम शाखाएँ होने की रिपोर्ट मिलती है और 1906 की अकाल जैसी स्थिति में निरंतर मानव - सेवा के कार्य करके इसके नेता अश्विनी कुमार दत्त ने अपने जिले के हिंदू और मुसलमान किसानों के दिल में समान रुप से स्थान बना लिया था। इन्हीं सब कारणों से अश्विनीकुमार दत्त की गतिविधियों में बाद में गाँधीवादी स्वदेशी कार्यक्रम, राष्ट्रीय विद्यालयों एवं रचनात्मक ग्रामीण कार्य का स्पष्ट पूर्वाभास मिलता है। यानि अश्विनी कुमार दत्त के लिए क्रांति का अर्थ केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह नहीं बल्कि भावी समाज का एक रचनात्मक ढाँचा प्रस्तुत करना भी था। उन्होंने संघर्ष के साथ - साथ निर्माण की प्रक्रिया भी जारी रखी।
अनिल विश्वास की बाल्यावस्था और तरुणाई के विकास - क्रम को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए बरिसाल की इस संक्षिप्त पृष्ठभूमि को समझना जरुरी था। लेकिन इसके साथ ही जरुरी है यह जानना भी कि बरिसाल को नदीमातृक देश कहा जाता है - एक ऐसा भूभाग जिसकी नदियाँ ही उसकी माँ है। नदियों का इतना बड़ा जाल है वहाँ कि आज तक भी उस अंचल में रेल नहीं पहुँच पाई है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद बांग्ला के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कवि जीवनानंद दास भी बरिसाल - पुत्र थे और उनकी कविता में वहाँ की नदियों के बहुआयामी चित्र प्रचुरता के सााि अंकित हुए हैं।
नदियों के प्राचुर्य तथा रेलों के वहाँ न पहुँच पाने का एक प्रत्यक्ष परिणाम तो यह है कि सारा यातायात और हर तरह की सामग्री का परिवहन स्टीमरों तथा नौकाओं द्वारा ही होता है और दूसरा अगोचर परिणाम यह कि मनुष्य प्रकृति के अधिक निकट रहता है, जो उसकी संवेदनशीलता को प्रगाढ़ बनाती है।
अपनी इस नदीमातृक देश की चर्चा करते हुए अनिल दा ने कहा था - इसका नतीजा जानते हो क्या था ? जो तैरना नहीं जानता, वह गया काम से। इसलिए हमारे यहाँ बच्चे को एक साल का होते न होते पानी में छोड़ देते हैं तैरने के लिए। हाँ, दो सूखे नारियलों के साथ बाँधकर छोड़ते हैं ताकि वह डूबे नहीं और हाथ - पाँव मारने की प्रक्रिया में ही वह तैरना सीख जाता है।
अनिल दा का यह कथन एक वास्तविकता का उल्लेख मात्र लगता है, लेकिन यह उनकी संगीत - यात्रा के आरंभ का रुपक भी है कि कैसे वे बिना किसी औपचारिक शिक्षा के संगीत में निष्णात हो गए।
नदी की धारा पर जलपरी - सी तिरती नौकाएँ। मछली पकड़ने के लिए जाल फैलाकर किनारे पर बैठे प्रतीक्षारत बच्चे। घरों के आँगनों में खड़े नारियल के पेड़ और केले के गाछ। कुल मिलाकर प्रकृति का एक निर्मल और मनोहारी चित्र, जिसे देखकर अनायास कविता प्रभावित होने लगे या संगीत व लोक - संगीत की स्वर लहरियाँ मुखरित हो उठें। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था - राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। बरिसाल का यह वातावरण भी कुछ वैसा ही था। जिसके लोकगीत - संगीत की रचना के लिए खाद - पानी का काम किया। लोक संगीत व अभिनय का एक अत्यंत प्रचलित प्रकार जान्ना विशेष रुप से इसी अंचल की देन है। और मुकुंददास की जान्नाएँ इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। बालक अनिल इन सब प्रभावों को आत्मसात करता बड़ा हो रहा था।
अपने बचपन को याद करते हुए अनिल दा बताते हैं - मैं चार साल की उम्र में ही तबला बजाने लगा था। माँ नियमित पूजा करती और भजन गाती थीं, तो खोल [मिट्टी के अंग से बना एक विशेष वाद्य] मैं बजाता था।
- और आपके पिता ?
- हाँ, जोगेशचंद्र नाम था उनका। एक जमींदा के नायब यानि जनरल मैनेजर थे, एक तरह के छोटे - मोटे ताल्लुकेदार। एक चाचा थे - सुरेश विश्वास, जो ताल्लुकेदारी का काम देखते थे। पिता लगान वसूली के और दूसरे कामों के सिलसिले में ज्यादतर बाहर रहते और महीने में चार - छह दिन के लिए ही घर आते थे। नतीजा यह कि  पिता के साथ मेरा वैसा संबंध बना ही नहीं, जो एक पिता और पुत्र के बीचहोना चाहिए।
पिता योगेश विश्वास का ताल्लुका था बहादुरपुर गाँव में। बरिसाल सदर से स्टीमर बहादुरपुर। लगभग डेढ़ सौ परिवारों की बस्ती। कच्ची झोंपड़ियों में रहने वाले ब्राहा्रण, वैश्य, नाई, लुहार, शुद्र - अछूत आदि सभी जातियों और वर्णों के लोग, जिन्हें ताल्लुकेदार की प्रजा कहा जाता था। जिस जाति के लोग वहाँ न होते, उन्हें ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े का लालच देकर बुलाया जाता कि आओ भाई, अपने परिवार के साथ बसो यहाँ आकर। आखिर सामाजिक व्यवस्था के लिए सभी वर्णों - जातियों का गाँव में होना जरुरी था।
- आपका मकान तो पक्का होगा ? हमने जिज्ञासा की, तो अनिल दा बोले - नहीं, पक्का मकान सिर्फ ज़मींदार का होता था। हमारी इतनी हैसियत नहीं थी। हमारा घर एक ऊँचे चबूतरे पर टीन की चादरों से बना था - टीन की ही दीवारें और लकड़ी के मोटे खंभों पर टिकी छत भी नालीदार चादरों की।
अनिल विश्वास का बचपन इसी घर में बिता था, जो बरिसाल सदर में था। बहादुरपुर वे बचपन मे एक - दो बार ही गए, जिसकी बहुत स्पष्ट रुपरेखा उनके मन में नहीं है। बस उन्हें इतना ही याद है कि गाँव में उनके घर का आँगन बहुत बड़ा था, जहाँ धान की मढ़ाई होती थी। गाँव में ताल्लुकेदारी की सारी व्यवस्था चाचा सुरेश विश्वास के जि़म्मे थी।
- पिताजी नाच - गाने के शौकिन थे, अनिल दा ने बताया - उनके पास एक बजरा था, जिसमें बैठकर व ताल्लुकेदारी और ज़मींदारी के काम में लगातार यात्रा में रहते थे। बजरा क्या, अच्छा खासा मकान ही था - सोने का कमरा, बैठक$खाना, रसोईघर, स्नानघर, शौचालय, क्या कुछ नहीं था उसमें। और ऊपर खुली छत, जहाँ चाँदनी रातों में ...। फिर ठहरकर बोले - बैठना बहुत अच्छा लगता होगा ...।
अनिल दा शायद कुछ और कहना चाहते थे, लेकिन कह नहीं पाए। उन्हें लड़खड़ाते देख हमने जड़ दिया - नहीं, बाईजी का मुजरा $खूब जमता होगा।
हँसते हुए अनिल दा ने कहा - हाँ, पिताजी का मामला था न, मैं कहते हु झिझक रहा था।
पिता घर में आते तो पूछते - बॅडॅ खोका कोथाय ? [ अर्थात् बड़ा लड़का कहाँ है ?] अनिल विश्वास की एक बहन थी, पारुल। उनसे चार साल छोटी और एक भाई था सुनील जो पारुल से भी चार साल छोटा था। इसलिए परिवार में बॅडॅ़ खोका अनिल ही था।
पिता के पुकारने पर बालक अनिल उनके सामने पेश होता, और वे सवाल करते, पढ़ाई - लिखाई कैसी चल रही है ?
- ठीक। बालक अनिल जवाब देता और बात $खत्म हो जाती। पिता और पुत्र के बीच का संवाद इस लक्ष्मण - रेखा को शायद कभी नहीं लाँघ पाया। पिता का आतंक ही ऐसा था कि उनके सामने आँख उठाकर बात करने की हिम्मत पुत्र में नहीं थी।
पिता की स्नेह छाया और उनके सघन संवाद से वंचित अनिल ने माँ को ही पिता समझा, गुरु समझा, उसके संसार के समस्त नातों - रिश्तों की प्रतिमूर्ति थी माँ। वी उसके जीवन की प्रेरणा रही और उसी के संस्कारों ने उसके मानस का निर्माण किया। पारुल और सुनील भी इसके अपवाद नहीं थे। पिता का प्रभाव तीनों संतानों में से किसी के ऊपर नहीं रहा।
पिता ताल्लुकेदार थे, तो घर में नौकर - चाकर भी जरुर होंगे। और जैसा कि उन दिनों होता था ...।
अनिल दा ने हमारी बात बीच में काटते हुए कहा - नौकर - चाकर तो नहीं, बस एक नौकर था। पिताजी का नाम जोगेश था और उसका भी यही नाम था, इसीलिए हम उसे जोगेश्या मामा कहते थे। वह हमारे परिवार का एक अंग बन गया था, ऐसा ही होता था उन दिनों। अनिल दा ने हमारी अधूरी बात पूरी की - जोगेश्या हमारे लिए मामा ही था, नौकर नहीं, और बच्चों की देखभाल करना उसकी जिम्मेदारी थी। हमारी छोटी - सी भूल पर भी हमारी पिटाई कर देना उसका विशेषाधिकार था और इस अधिकार - क्षेत्र में कोई दखलंदाजी नहीं कर सकता था।
बोलते - बोलते अनिल दा कुछ रुके, फिर होठों पर हल्की - सी मुस्कान तैर गई और वे कहने लगे - एक मज़े की बात सुनाता हूं। पारुल दूध नहीं पी रही थी। जोगेश्या मामा ने बहुत मनुहार की, दूध का गिलास कई बार उसके होंठों से लगाने की कोशिश की लेकिन वह राज़ी नहीं हुई। आखिर जोगेश्या मामा का धैर्य जवाब दे गया। और कुछ तो उन्हें सुझा नहीं, वे पारुल को घसीटकर चूल्हे के पास ले गए। जो कुछ देर पहले ही बुझाया था और उसका सर चूल्हे में घुसाते हुए बोले - दूध नहीं पियोगी तो तुम्हारा सर इसी तरह गरम चूल्हे में घुसा देंगे। और सचमुच इस धमकी से सहमी पारुल गटागट दूध पी गई। वह जानती थी, हम तीनों भाई बहन जानते थे कि जोगेश्या मामा को ऐसा करने से रोकने वाला कोई नहीं है। अपनी सीमाओं के भीतर उनका एकछत्र साम्राज्य था।
- दादा आपने कहा कि माँ ही आपका सर्वस्व थी। उसके बारे में ...।
दादा ने तुरंत हमारी बात काटी - क्या बताऊँ माँ के बारे में। कहाँ से शुरु करुँ, कहाँ $खत्म करुँ। जितना कहूँगा, वह कम ही होगा। कबीर का वह दोहा याद है न -
सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं, तऊ हरि - गुन लिख्या न जाइ।।
तो भाई, माँ का प्रसंग तो ऐसा ही है मेरे लिए ...। कहते - कहते भावोद्रेक से अनिल दा का गला रुँध गया। वा$कई आँसुओं की कोई उम्र नहीं होती। छियासी वर्षीय अनिल दा आँखों में अनायास छलक आए आँसुओं को अँगुलियों की पोरों से पोंछते हुए बोले - मेरी माँ साक्षात् सरस्वती का अवतार थीं। जितनी लावण्यमयी, उतनी ही कलात्मक अभिरुचि से संपन्न। यामिनी नाम था उनका। किंतु पिताजी की मृत्यु के बाद जब उन्होंने दीक्षा ली, तो गुरु ने उनका नामकरण किया - सत्यभामा वैष्णवी। वे विवाह से पहले ही संगीत की $खासकर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने लगी थीं। उनके संगीत गुरु थे लालमोहन गोस्वामी, जो एक मंदिर के पुजारी थे और पखावज बहुत सुंदर बजाते थे। पिताजी हालाँकि स्वयं संगीत के जानकर नहीं थे, लेकिन जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं वे संगीत के प्रेमी थे और शायद स्वभाव से उदार ही रहे होंगे। तभी तो विवाह के बाद भी उन्होंने मेरी माँ को संगीत की शिक्षा रखने की अनुमति दी और लालमोहन गोस्वामी उन्हें संगीत के विभिन्न रुपों का अभ्यास कराने के लिए हमारे घर आने लगे।
है। जिसने हमारी चेतना को झकझोर कर हमें विवश किया कि हम उसके अवदान को न सिर्फ स्वयं स्वीकार करें बल्कि आज की और आने वाली पीढ़ियों के लिए उसे लिपिबद्ध कर दें।

कुछ जाते वनवास में

मुकुन्‍द कौशल 


भरी दुपहरी आ ठहरी है संध्या के आवास में।
अनचाहे अवसाद घुले हैं जीवन के सन्त्रास में।।
मिथ्याभाषी रथी - सारथी
सब निकले पाखण्डी
मुख्य मार्ग तक पहुँच न पाई
गाँवों की पगडण्डी
हमने बहुधा धोखे खाए अपनों पर विश्वास में।
पद से, मद से आकर्षित हो
निकले घर से जितने
उनमें से निज गंतव्यों तक
पहुँच सके है कितने
कुछ तो होते राजतिलक तो, कुछ जाते वनवास में।
वाक्य, वाक्य का हुआ विरोधी
शब्द, शब्द से रुठा
भाषा भी अब लगे परायी
और व्याकरण झूठा
मूल कथन की भोर खो गई अक्षर के अनुप्रास में।


पता - 
एम - 516, पदनाभपुर, दुर्ग ( छ.ग.)

रघुवीर सहाय की राजनैतिक चेतना

डॉ.नरेश टांक 

स्वातन्त्रयोत्तर भारतीय जीवन की विसंगतियाँ तथा मनुष्य जीवन की विडंबनाएं रघुवीर सहाय के काव्य की आधर - भूमि रही हैं। जहाँ एक ओर उनके समकालीन कवि-रचनाकार भिन्न-भिन्न वाद तथा मत की जमीन पर मनुष्यता की कसौटी तय करते हैं वहीं रघुवीर सहाय के काव्य में आये मनुष्य को किसी चौहद्दी में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने मनुष्य को ठीक वैसा ही चित्रित किया है जैसा वह उन्हें नज़र आता है, किसी प्रकार का कोई स्वप्न, युटोपिया या क्रांति के भ्रम में उनके मनुष्य नहीं जीते। रघुवीर सहाय की स्पष्टत: कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं थी, हाँ भिन्न-भिन्न मतों का प्रभाव उन पर अवश्य था जैसे - गांधी, लोहिया तथा मार्क्स के मतों का। साथ ही उनकी पत्रकारिता ने उनके महानगरीय - बोध् को तीक्ष्ण भी किया। ऐसे समय में जब मनुष्य को मनोरोग से त्रस्त तथा वर्गीय-चेतना से हीन बताया जा रहा था उन्होंने उस मनुष्य को चित्रित करने का बीड़ा उठाया जो खतरनाक रूप से निस्संग है तथा उसकी निस्संगता की वज़ह से हत्या की संस्कृति जन्म ले रही है। रघुवीर सहाय ने नेहरू युग की असफलता को बड़े नजदीक से देखा था इसीलिए
उनके काव्य-पात्रा आदर्शवादी नहीं बल्कि यथार्थ का नंगा चित्रण करने वाले साधारण मनुष्य हैं -
दोनों, बाप मिस्तरी, और बीस बरस का नरेन
दोनों पहले से जानते हैं, पैंच की मरी हुई चूड़ियाँ
नेहरू - युग के औज़ारोंं को मुसद्दीलाल की सबसे बड़ी देन।
सहाय, अपनी कविताओं के लिए खाद-पानी रोजमर्रा की होने वाली घटनाओं से लेते हैं। उनकी कविताओं में आये मनुष्य उन्होंने अपने आस-पास से ही उठाये हैं, जो मनुष्य से एक दर्जा नीचे रहने को विवश हैं - हर दिन मनुष्य से एक दर्जा नीचे रहने का दर्द उन पात्रों के साथ रघुवीर सहाय का दर्द साझा हो जाता है, जो कि नेहरू युग की भूखी पीढ़ी का नेतृत्व करते हैं। सत्ता से सार्थक संवाद हेतु मनुष्य की अभिव्यक्ति की समस्या तथा डरे - सहमे मनुष्य में उन्होनें कोई हीरोईज्म या नायकत्व न दिखलाकर उन्होंने एक ईमानदार रचनाकार होने के नाते सिर्फ मनुष्य के विभिन्न चरित्र दिखाए हैं जो तंगहाल परिस्थिति में जिंदगी जीने को विवश हैं।
आजादी के बाद महानगरों के बनने से एक नई तरह की संस्कृति ने जन्म लिया। रघुवीर सहाय भी इसी महानगरीय मशीन में एक पुर्जे के रूप में शामिल थे, जो कि महानगर की तमाम आपा - धपी को अपनी नंगी आंखों से देख रहे थे, महानगरों ने जहाँ आधुनिकता को पनपाया, वहीं मनुष्य को निस्संग तथा अकेला भी कर दिया, महानगर में मनुष्य किसी समुह का हिस्सा नहीं बना या उस रूप में जनता नहीं बना जैसे आजादी से पहले था बल्कि साठोत्तरी दशक में वह जनता कम भीड़ के रूप में अधिक दिखलाई पड़ता है, एक ऐसी भीड़ जो खतरनाक रूप से तटस्थ न्यूट्रल है, रघुवीर सहाय का काव्य-मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं उनका मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए चगली खाता है, खुशामद करता है तथा चापलुपी रूपी हंसी हंसता है। इस संस्कृति से रघुवीर सहाय बहुत आहत थे जो कि आदमी और कुत्ते को सरपट -गाड़ियों के बीच चांप लिया जाने के लिए सहमा हुआ छोड़ जाती है।
रघुवीर सहाय, आत्महत्या के विरुद्ध [भूमिका]
गौरतलब है कि रघुवीर सहाय ने मनुष्य को बोदा तथा कमजोर दिखाया है। हारता हुआ, विद्रोह न करने वाला मनुष्य दिखाया है तो इसकी पृष्ठभूमि में राजनैतिक - सामाजिक विसंगतियों की गहरी पैठ है जिसकी जांच - पड़ताल की। माँग उनकी कविता करती है। अन्य रचनाकारों की तरह त्राहि-त्राहि का भाव न रखकर तथा अपनी कविताओं में प्रौढ़ संवेदनाओं के रंग न भरकर सहाय ने संवेदना - सुत्र छोड़ रखे हैं जो पाठक या श्रोता से विशेष अलर्टनेस की अपेक्षा करते हैं जिससे उन आउटलाइन रूपी कविताओं की वास्तविकताओं तथा जिंदगी को समझा जा सके जिसे अपनी तक जाना, समझा और जिया नहीं गया। रघुवीर सहाय की कविता हारे हुए व्यक्ति की एकालाप न होकर हारे हुए उस
आदमी की खोज-खब़र है। जो कि कुलीन सामाजिकता के विरुद्ध लड़ रहे उस साधारण आदमी का ही प्रतिनिधित्व करता है। ''जिसे इंसान का शानदार जिदंगी और कुत्ते की मौत के बीच चाँप लिया है।ÓÓ
महान वृतांतों के टूटने की अनुगूंज उनकी कविता में सुनायी देती है, इसीलिए रघुवीर सहाय की कविता में कोई नायक नहीं है। केवल चरित्र हैं जो परिस्थितियों के दबाव में जिंदगी जीने के लिए विवश हैं, जिन्हें लोक लुभावन नारों से कोई उम्मीद नहीं। उनकी कविता मनुष्य के महानगरीय जीवन के बिम्बों का कोलाज है। कहीं बच्चा गोद में लिये बस में चढ़ती स्त्री है तो कहीं सुथन्ना संभालता हरचरना, कहीं सड़क पार करता दुबला-पतला बोदा आदमी है तो कहीं -गुलाम हंसी हंसते लोग, कहीं सवारी ढोता रिक्शा-चालक है तो कहीं तोंददानी संसद सदस्य, कहीं - गंधाती भीड़ है तो कहीं रंगे चुंगेे लिफ्ट माँगते नौजवान।ू
रघुवीर सहाय, प्रतिनिध् िकविताएँ, पृ 84
रघुवीर सहाय का कवि व्यक्तित्व अपनी अस्मिता के प्रति बड़ा सचेत है, वह स्वयं को इस्तेमाल किये जाने की छूट सत्ता तंत्रा को कहीं नहीं देता। चाहे वह कितना ही साधारण या आम जिन्दगी क्यों न जी रहा हो, वहीं उनके काव्य में अस्मिताविहीन तथा शोषण के विरुद्ध आवाज न उठाने वाले मनुष्य के प्रति हिकारत का भाव है, वे दबे - कुचले तथा डरे - सहमे मनुष्य के लिए समान अवसर तथा सामाजिक न्याय चाहते हैं, इसीलिए वे वह खास तथा सच्ची नफरत उस वर्ग से करते हैं जिसने यथास्थिति से समझौता कर लिया है। वास्तव में रघुवीर सहाय लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण तथा संवर्धन चाहते थे, ऐसे में उन लोगों के प्रति या उस वर्ग के प्रति उनमें किसी प्रकार कोई उम्मीद नहीं है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सचेत नहीं।
आज जबकि ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड बाजार केन्द्रित है, मनुष्य ब्राँड-संस्कृति का पोषक हो सभी मूल्यों तथा कर्मों को खारिज कर धता बता चुका है, ऐसे में रघुवीर सहाय का काव्य तथा उसमें अभिव्यक्त मनुष्य-बिम्ब हमें निरंतर मनुष्य तथा मशीन के द्वंद्व में संवेदना तथा मानव-मूल्यों की तरफ  अग्र्रसर होने की प्रेरणा देता है।
पता 

छत्‍तीसगढ : सृजनशीलता के विविध आयाम

डॉ. गोरेलाल चंदेल 

छत्तीसगढ़ अपनी विरासतों के लिए देश-विदेश में जाना जाता है। ये विरासत लोकजीवन और लोकसंस्कृति की तो है ही साथ ही साहित्य सृजन की भी लंबी परंपरा इस अंचल की है। राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य और विभिन्न कालों की वैचारिकता, चिंतन की मूलधारा तथा सामाजिक चेतना का प्रभाव इस अंचल के साहित्यकारों में दिखाई देता है। इस अचल के रचनाकार अपनी रचनाधर्मिता के प्रति न केवल ईमानदार रहे हैं वरन् सामाजिक चेतना की गहराई तथा संवेदनात्मक दृष्टि से समाज तथा सामाजिक जीवन की बारीकियों को पकड़ने में भी सक्षम दिखाई देते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ अंचल के रचनाकारों को हिन्दी साहित्य के रचनाकारों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा करनें में कोई संकोच नहीं होता।
1634 से छत्तीसगढ क्षेत्र में हिन्दी साहित्य के सृजन का इतिहास मिलता है। इसके पूर्व संस्कृत साहित्य की पुष्ट परंपरा इस क्षेत्र में रही है। कई शिलालेख एवं ताम्रपत्रों में संस्कृत साहित्य की विरासत आज भी मौजूद है। 1634 में रतनपुर के ख्यातिनाम कवि गोपाल चन्द्र मिश्र की खूब तमाशा, जैमिनी अश्वमेघ, भक्ति चिंतामणि, सुदामा चरित और राम प्रताप जैसी कृति सामने आती है। इस युग की रवनाओं में हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन कवियों का स्पष्ट प्रभाव दिखई देता है। 1650 से 1850 तक भक्त कवियों की एक लंबी परंपरा इस अंचल में दिखाई देती है। 1650 से 1850 के काल को छत्तीसगढ के कवियों का आरंभ काल माना जा सकता है। इस काल के प्रमुख कवियों में गोपाल चन्द्र मिश्र, माखनचन्द्र मिश्र, रेवाराम बाबू, उमराव बख्शी और रघुवर दयाल को माना जा सकता है। इन कवियों ने साहित्य की तत्कालीन मूलधारा के अनुरूप भक्ति को केन्द्रिय शक्ति के रूप में निरूपित करते हुए कविताएँ लिखी। इस काल के कवियों ने भक्ति के माध्यम से सामन्तवादी व्यवस्था की प्रताड़ना से हताश और निराश जनमानस में एक नई चेतना और नई ऊर्जा पैदाकर नवजागरण का शंखनाद किया।
1850 से 1915 तक का काल छत्तीसगढ के काव्य साहित्य में मध्ययुग के नाम से जाना जा सकता है। इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल विभाजन से उसकी संगति भले ही न बैठ पाए किन्तु काव्य की अवधारण और विषयवस्तु की दृष्टि से इस काल में उसी तरह की कविताएँ लिखी गईं जिस तरह की कविताएँ हिन्दी साहित्य के उत्तर मध्यकाल में लिखी गई। इसकी शुरूआत आरंभकाल के कवि माखनचन्द्र मिश्र से हो चुकी थी। उन्होंने Óछंद विलासÓ नामक ग्रंथ लिखकर Óलक्षण ग्रंथÓ की रचना का श्रीगणेश किया था। रघुवर दयाल ने Óछंद रत्नमालाÓ, उमराव बख्शी ने Óअलंकार मालाÓ, खेमकरण ने Óसुभात विलासÓ और भानु कवि ने Óछंद प्रभाकरÓ की रचना कर हिन्दी साहित्य के लक्षण ग्रंथों की वृद्धि में अपना योगदान दिया। मध्यकाल के प्रमुख कवियों में बिसाहू राम, बनमाली प्रसाद श्रीवास्तव, जगन्नाथ प्रसाद भानु, दशरथ लाल, सैयद मीर अली मीर, पुन्नी लाल शुक्ल, विश्वनाथ प्रसाद दुबे, लोचन प्रसाद पाण्डेय, सरयू प्रसाद त्रिपाठी, प्यारे लाल गुप्त, मावली प्रसाद श्रीवास्तव, बल्देव प्रसाद मिश्र, राजा चक्रधर सिंह, द्वारिका प्रसाद तिवारी Óविप्रÓ आदि हैं। इस युग की कविता में साहित्य की मूलधारा के साथ ही साथ जन-संस्कृति की मनोरम झांकी दिखाई देती है। लोक का दुख, पीड़ा, शोषण तथा आशा-निराशा के अतिरिक्त जन मानस में मैजूद जीवन शैली और उनके सामाजिक संबंधों को लेकर बेबाक कविता लिखने की परंपरा दिखाई देती है। इसी युग में सामाजिक जीवन के सभी पक्षों को संपूर्णता में अभिव्यक्ति देने वाले महाकाव्यों की रचना हुई। बिसाहू राम, सुखलाल पाण्डेय, बलदेव प्रसाद मिश्र, सरयू प्रसाद त्रिपाठी, मधुकर आदि को प्रमुख महाकाव्यकार के रूप में देखा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ के काव्य साहित्य के 1915 से 1950 के काल को आधुनिक युग की संज्ञा दी जा सकती है। इस काल में छत्तीसगढ से हिन्दी साहित्य के सर्वथा नये युग का सूत्रपात होता है। काव्य के क्षेत्र में नई अभिव्यंजना शैली, नए चिंतन, नए प्रतीकों और बिंबों का उद्भव और विकास इसी युग में होता है। साहित्येतिहास में इस काव्यधारा को छायावाद के नाम से जाना जाता है। छायावाद के प्रथम कवि और जनक के रूप में पं. मुकुटधर पाण्डेय को माना जाता है। बावजूद इसके इस काल के कवियों ने अपने आप को सामाजिक जीवन से अलग नहीं किया। अन्य छायावादी कवियों की तरह काव्य के माध्यम से वायवीय छाया बुनने के बजाय इन कवियों ने जमीन से जुड़कर सामाजिक यथार्थ की बुनावट को पहचानने की कोशिश की। उनकी संवेदनात्मक दृष्टि और संवेदनात्मक ज्ञान से जीवन के सत्य को पकड़ने और पहचानने का निरंतर प्रयास किया। इस काल के अन्य कवियों में पं. शेषनाथ शर्मा ÓशीलÓ, कुंजबिहारी चौबे, रामेश्वर शुक्ल ÓअंचलÓ, स्वराज प्रसाद त्रिवेदी, घनश्याम प्रसाद Óश्यामÓ, केदार नाथ चंद, लाला जगदलपुरी, जयनारायण पाण्डेय, हेमनाथ यदु, गोविन्द लाल अवधिया, वेणुधर पाण्डेय आदि प्रमुख हैं।
1950 के बाद के युग को छत्तीसगढ के साहित्य इतिहासकारों ने नये स्वर-युग का नाम दिया है। वस्तुत: इस नामकरण की सार्थकता भी है। इस युग में कविता वस्तु और शिल्प की दृष्टि से नये अर्थगांभीर्य के साथ सामने आई। अपने युग के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक घटनाओं पर कविता की स्पष्ट प्रतिक्रिया दिखाई देने लगी थी। कविता का सामाजिक उद्देश्य और सामाजिक प्रतिबद्धता बहुत स्पष्ट होती जा रही थी। भाववादी कविता का दौर लगभग समाप्त हो रहा था और इसके स्थान पर यथार्थवादी कविता सामने आ रही थी। यह सही है कि इस दौर की कविता जटिल सामाजिक यथार्थ की पारदर्शिता की कसौटी पर पूर्णत: खरी भले ही न उतरती हों, संवेदना के तलदर्शी स्वरूप की कमी भले ही इन कविताओं में दिखाई देती रही हो, जीवन सत्य को परत-दर-परत खोलने में कविता भले ही उतनी सक्षम न दिखाई देती रही हों, फिर भी इन कविताओं में काव्यात्मक ईमानदारी के साथ ही साथ समाज के साथ ईमानदार जुड़ाव अवश्य दिखाई दे रहा था। इस युग के कवियों में हरि ठाकुर, गुरूदेव कश्यप, सतीष चौबे, नारायण लाल परमार, ललित मोहन श्रीवास्तव, देवी प्रसाद वर्मा, राजेन्द्र मिश्र, राधिका नायक, विद्याभूषण मिश्र, अशोक वाजपेयी, मोहन भारती, प्रभंजन शास्त्री, मुकीम भारती, सरोज कुमार मिश्र, प्रभाकर चौबे, ललित सुरजन आदि प्रमुख थे।
सामाजिक चेतना और संवेदना की तलदर्शिता तक पहुँचने का प्रयास करने वाले इस काल के वरिष्ठ कवियों की ऊपरी सतह को तोड़कर, अंदर तक जाकर गहरी संवेदना तथा सामाजिक चेतना की पहचान नई पीढ़ी के कवियों ने की। इन कवियों की कविताओं में समाज के तलदर्शी यथार्थ को न केवल अभिव्यक्ति मिली वरन् वर्ग विभाजित समाज की वर्गीय संरचना भी अपनी सम्पूर्ण विशेषताओं के साथ सामने आई। नई पीढ़ी के ऐसे कवियों में जीवन यदु, एकांत श्रीवास्तव, बसंत त्रिपाठी, रवि श्रीवास्तव, महावीर अग्रवाल, शरद कोकाश, आलोक वर्मा, स्व. लक्षमण कवष आदि प्रमुख हैं। इन कवियों ने सामाजिक संरचना को बेहद सरल बिंबों में बांधकर प्रस्तुत किया। मुक्तिबोध की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले इन कवियों की सामाजिक प्रतिबद्धता बहुत स्पष्ट रही है।
छत्तीसगढ़ में हिन्दी काव्य साहित्य की तरह ही गद्य साहित्य की भी समृद्ध परंपरा रही है। कथा साहित्य के क्षेत्र में 1901 में Óछत्त्ीसगढ़ मित्रÓ में प्रकाशित माधवराव सप्रे की कहानी Óटोकरी भर मिट्टीÓ को मील के पत्थर के रूप में माना जाता है। कथ्य, तथ्य और भाषा - शैली की दृष्टि से कई समीक्षकों ने इसे हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी माना है। इसी क्रम में लोचन प्रसाद पाण्डेय की कहानियों को याद किया जा सकता है। Óगरूड़मालाÓ में प्रकाशित उनकी Óजंगल रानीÓ कहानी पर उन्हें स्वर्ण पदक मिला था। 1905 में लोचन प्रसाद पाण्डेय की Óदो मित्राÓ नाम से कथा संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसे इस अंचल का प्रथम कहानी संग्रह कहा जा सकता है। मुुकुटधर पाण्डेय और कुलदीप सहाय की कहानियाँ उस दौर की महत्वपूर्ण पत्रिका ÓमाधुरीÓ में प्रकाशित हो रही थी। मावली प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी साहित्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुई और सरस्वती कहानी प्रतियोगिता में उन्हें तृतीय पुरस्कार मिला। पदुमलाल पुन्नलाल बख्शी तो हिन्दी कथा साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे ही। इसके अतिरिक्त प्यारेलाल गुप्त, शिवप्रसाद, काशीनाथ पाण्डेय, घनश्याम प्रसाद, केशव प्रसाद वर्मा, केदारनाथ झा Óचन्द्रÓ प्रमुख कहानीकार हैं। बाद की पीढ़ी में मधुकर खेर, प्रदीप कुमार प्रदीप, नारायण लाल परमार, लाला जगदलपुरी, पालेश्वर शर्मा, प्रमोद वर्मा, रमाकांत श्रीवास्तव, चन्द्रिका प्रसाद सक्सेना, इन्द्रभूषण ठाकुर, देवी प्रसाद वर्मा आदि कहानीकारों ने इस अंचल के कथासाहित्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
1956 में कथासाहित्य के क्षेत्र में एक नया आन्दोलन प्रारंभ होता है, जिसे नई कहानी अन्दोलन के नाम से जाना जाता है। इस अंचल के शरद देवड़ा और शानी को नई कहानी आन्दोलन का महत्वपूर्ण कहानीकार माना जा सकता है। सचेतन कहानी आन्दोलन के कहानीकार के रूप में इस अंचल के महनकर चौहान और श्याम व्यास का नाम प्रमुख कहानीकार के रूप में लिया जा सकता है। कथासाहित्य के क्षेत्र में श्रीकान्त वर्मा बेहद चर्चित नाम रहे हैं। कई समीक्षक उसे अकहानी आन्दोलन के साथ जोड़ते हैं। श्रीकान्त वर्मा इसी अंचल के कथाकार थे। महिला कहानीकारों में शशि तिवारी और मेहरून्निसा परवेज की कहानियाँ हिन्दी कथासाहित्य के क्षेत्र में काफी चर्चित रहीं। इसके अतिरिक्त प्रभाकर चौबे, नरेन्द्र श्रीवास्तव, श्याम सुन्दर त्रिपाठी ÓपथिकÓ, जयनारायण पाण्डे, गजेन्द्र तिवारी आदि इस अंचल के प्रमुख कहानीकार रहे हैं।
नई पीढ़ी के कहानीकारों में लोक बाबू, परदेसी रामवर्मा, मनोज रूपड़ा, कैलाश बनवासी, नासिर अहमद सिकन्दर, आनंद हर्षुल, ऋषि गजपाल आदि की कहानियाँ इस दौर की सशक्त कहानियाँ मानी जाती हैं। इनकी कहानियों में सामाजिक अंतर्विरोध, समाज की वर्गीय संरचना, सामाजिक विडंबना, शोषक और शोषित के चरित्र का यथार्थपरक चित्रण हुआ है तथा कहानियों से जनमानस में नई सामाजिक चेतना जागृत करने में उन्हें सफलता मिली है।
छत्तीसगढ़ अंचल के निबंध विधा पर लेखन की परंपरा भी काफी पुष्ट रही है। प्रारंभिक दौर में धार्मिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विषयों पर निबंध लेखन हुआ। प्रारंभिक दौर के निबंधकारों में बिसाहू राम और अनंत राम पाण्डेय प्रमुख हैं। इस दौर में अनंतराम पाण्डेय के समालोचनात्मक निबंध भी देखने को मिलते हैं। वास्तव में निबंध की सुदृढ़ परंपरा माधवराव सप्रे से शुरू होती है। उन्होंने Óछत्तीसगढ़ मित्राÓ के माध्यम से निबंध के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, पं. राम दयाल तिवारी और बाबू कुलदीप सहाय ने इस विधा को आगे बढ़ाया। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने विविध विषयों पर निबंधों की रचना कर निबंध विधा का विस्तार किया। उन्होंने आत्म परक, संस्मरणात्मक तथा मनोवैज्ञानिक विषयों पर बेहद सहज, सरल निबंधों की रचना की तथा सरस्वती के संपादक के रूप में निबंध साहित्य को नई दिशा देने की कोशिश की। पं. मुकुटधर पाण्डेय ने छायावादी निबंधों की रचना कर हिन्दी साहित्य को चिंतन का सर्वथा नया आयाम दिया। यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, केशव प्रसाद वर्मा, जयनारायण पाण्डेय, शारदा तिवारी, नारायण लाल परमार, पं. रामकिशन शर्मा डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, धनंजय वर्मा आदि विद्वानों को निबंधकार के रूप में राष्ट्रीय ख्याति मिली।
समकालीन निबंध लेखन में अधिकांशत: समीक्षात्मक लेखों के रूप में निबंध लेखन हो रहा है। हिन्दी की महत्वपूर्ण राष्ट्रीय  एवं अंतराष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिकाओं में इस तरह के समीक्षात्मक लेख निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। डॉ. राजेश्वर सक्सेना, डॉ. धनन्जय वर्मा, डॉ. प्रमोद वर्मा. प्रभाकर चौबे, डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव, रमेश अनुपम, डॉ. गोरेलाल चंदेल, जय प्रकाश साव आदि के समीक्षात्मक लेख पहल, सापेक्ष, वसुधा, वर्तमान साहित्य, साक्षात्कार, पल-प्रतिपल, जिज्ञासा आदि महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त उपन्यास, नाटक, व्यंग्य, एकांकी आदि विधाओं में भी छत्तीसगढ़ में लगातार उच्चस्तरीय लेखन हो रहा है।
विगत 15-20 वर्षों से छत्तीसगढ़, प्रदेश की साहित्यिक गतिविधयों का केन्द्र रहा है, कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस अंचल में नई-नई साहित्यिक प्रतिभाओं की रचनाओं पर निरंतर गोष्ठियाँ एवं सेमीनार आयोजित हो रहे हैं और उनकी रचनात्मकता को विकसित होने का अवसर मिल रहा है। अंचल की रचनाशीलता को प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य रायपुर से प्रकाशित दैनिक देशबंधु और उसके संपादक ललित सुरजन ने किया है। साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजन में भी उनकी अग्रणी भूमिका रही है। इसी दिशा में Óसापेक्षÓ पत्रिका और श्री प्रकाशन के माध्यम से महावीर अग्रवाल का प्रयास भी सराहनीय है। छत्तीसगढ़ अंचल में साहित्यिक संभावनाओं की कमी नहीं है; केवल उनकी सृजनशीलता को प्रकाश में लाने के साधनों की आवश्यकता है।
पता 
दाऊ चौरा, खैरागढ़,
जिला - राजनांदगांव छत्तीसगढ़

स्‍वतंत्रता आंदोलन और रेणु की स्‍त्री पात्राएं

डॉ. पूनम रानी 

रेणु के साहित्य का प्रमुख गुण आंचलिकता माना गया है जिसमें अन्य तत्वों के समान ही स्त्री का आगमन स्वाभाविक तरीके से हुआ है। रेणु से पूर्व जहाँ स्त्री को देवी, माँ, सहचरी के रूप में देखते हुए उसे आदर्शवाद के कटघरे में खड़ा किया गया वहीं इस दौर में स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में पहचाना जाने लगा था। जैनेन्द्र, अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी, यशपाल आदि उपन्यासकारों ने मानवतावाद और अस्तित्ववादी विचारधाराओं से प्रभावित होकर स्त्री को 'व्यक्तिÓ रूप में परिभाषित कर मध्यवर्गीय स्त्री जीवन को ही रेखांकित किया जिसे एकांगी दृष्टिकोण कहा जा सकता है। रेणु अपने उपन्यासों में इस एकांगी दृष्टिकोण से बचे हंै। रेणु मैला आंचल में लिखते भी हैं इसमें फूल भी है, धूल भी है। मैं किसी से भी दामन बचा कर नहीं निकला। रेणु पर समाजवाद और समाजवादी आंदोलन और गांधी का गहरा प्रभाव रहा है। डॉ. राममनोहर लोहिया जहाँ कहते हैं  - औरतों की जो स्वाभाविक गैर बराबरी है उसको दूर करने का उपाय है कि उनको कुछ खास मौके दिये जाए। यह ज्यादा मौके वाला सिद्धांत औरतों के उफ  पर भी लागू है - औरत, शूद्र, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान या ईसाई जैसे धॢमक अल्पसंख्यकों में जो छोटी जातियाँ हैं। विशेष अवसर दिये बिना ये उँचे नहीं उठ सकते। 1. वहीं गांधी जी ने भी स्वतन्त्रता आंदोलन में स्त्रियों की महती भूमिका की वकालत की थी और ज्यादा से ज्यादा स़्ित्रयों से आंदोलन में शामिल होने की अपीले भी की थी। महात्मा गांधी के कारण ही अनेक स्त्रियों ने आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई। ऐसा कैसे हो सकता था कि रेणु का कोई उपन्यास स्वतन्त्रता आंदोलन के आस - पास घटित हो रहा हो और उनके उपन्यास की स्त्री पात्राएं चूल्हा चौके में लगी रहे रेणु की स्त्री पात्राएं स्वतन्त्राता आंदोलन में शामिल दिखाई गई हैं।
पुरुषवादी समाज में स्त्री के सशक्तीकरण का एक माध्यम राजनीति भी है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय गांधी ने राजनीति में स्त्रियों की भागीदारी को महत्वपूर्ण माना था। लोहिया भी समाज में स्त्रियों की अधिक भूमिका का समर्थन करते दिखाई पड़ते हैं। रेणु के साहित्य की स्त्री पात्राओं की स्वतन्त्रता आंदोलन में भूमिका स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, जिसके कारण स्त्रियों के पारंपरिक भूमिका में कुछ हद तक बदलाव भी आ रहा था। 'मैला आंचलÓ की 'मंगला देवीÓ गृहस्थी की पारम्परिक भूमिका से सर्वथा मुक्त विशुद्ध राजनीतिक सामाजिक कार्यकत्री के रूप में हमारे सामने आती है वह पटना शहर से मेरीगंज गांव आती हैं ताकि ग्राम आंदोलन में कुछ हिस्सेदारी निभा सके। गांधी जी से प्रेरित चरखा सेंटर की जिम्मेदारी मंगला देवी उठाती दिखाई पढ़ती हैं। रेणु स्वतन्त्रता आंदोलन का केवल उजला पक्ष नहीं दिखाते, उनका काम चल भी सकता था कि मंगला देवी और उनके जैसी अनेक स्त्रिया आंदोलन में हिस्सा ले रही हैं लेकिन वह आंदोलन के उन स्याह गलियारों में भी जाते हैं जहां सच्चाई कैद हंै मैला आंचल में वह यह दिखाने से नहीं चूकते कि किस तरह आंदोलन की अबलाओं के साथ सभी स्तरों पर शोषण हो रहा था। मंगला देवी कहती हैं- ''आदमी के अन्दर के पशु को उसने बहुत बार करीब से देखा है। विधवा आश्रम, अबला आश्रम और बड़े बाबूओं के घर आया की जिन्दगी उसने बिताई है। अबला नारी हर जगह अबला ही है। रूप और जवानी ?.... नहीं , यह भी गलत। औरत होना चाहिए, रूप और उम्र की कोई कैद नहीं। एक असहाय औरत देवताओं के संरक्षण में भी सुख चैन से नहीं सो सकती ''2 स्वतन्त्रता आंदोलन में हिस्सा ले रही 'परती परिकथाÓ की 'ईरावतीÓ का हाल भी कुछ ऐसा ही है। वह आंदोलन में हिस्सा लेती हैं और दर्जनों बार बलातकृत होती है और अंत में इस निष्कर्ष पर पंहुचती हैं कि ''इन्सान कत्ल और बलात्कार के सिवा और कुछ कर सकता है? 3 'जुलुसÓ की 'पवित्राÓ, 'दीर्घतपाÓ की 'रमला बनर्जीÓ एक बड़ी कार्यकर्ता है तो वहीं 'बेलागुप्तÓ ईरावती की तरह यौन शोषण का शिकार है। 'बांके बिहारीÓ 'बेलागुप्तÓ को कहता है - तुम स्त्री... उसके जब जी में आवेगा - तुम्हारा उपयोग करेगा। ...उसका चमड़े का पोर्टफोलियो-बैग है - उसे वह जब चाहता है खोलता है, बन्द करता है। चमड़े का थैला तर्क नहीं करता। बेला क्यों तर्क करती है। ...बाँके का हाथ बेकार बैठा नहीं रह सकता। आश्चर्य! जब उसको डर होता है किसी बात का - तब भी वह बेला को...। 4 रेणु दीर्घतपा में स्पष्ट लिखते है कि ''सब कुछ सह गई बेला देेश की आजादी के नाम पर! झेल गई''5 'दीर्घतपाÓ की 'बेलागुप्तÓ हो, चाहे 'मैला आंचलÓ की 'मंगला देवीÓ या 'जुलुसÓ की 'पवित्राÓ सभी का शोषण छद्म, भ्रष्ट क्रांतिकारियों द्वारा होता है। ऐसा जान पड़ता है कि पुरुष की मानसिकता में बदलाव की संभावना मुश्किल है। तभी तो  इतना ही नहीं वह स्वयं के साथ-साथ अन्य लोगों के द्वारा भी बेलागुप्त का शोषण होने देता है। यह तो मानना ही पड़ेगा कि स्त्री चाहे कितनी ही अपने आप को सुदृढ़ कर ले परन्तु पुरुषों की दृष्टि में वह देहमात्र ही है। उनकी हवस को पूरा करने का साधन ही है।
स्वतंत्रता आंदोलन ने जहाँ समाज और देश के शक्ति केन्द्रों को बदलकर रख दिया था, वहाँ अब ऊँची जाति, अधिक धनी होना या जमींदार होना शक्ति का कारण उतना नहीं रह गया था, जितना एक राजनीतिक पद और वर्चस्व। फलत: समाज का स्वार्थी,मक्कार और घाघ वर्ग इस नये शक्ति केन्द्र को पाने हेतु तरह-तरह के प्रयास करने लगा जिसमें वह काफी हद तक सफल भी हुआ। वह कहीं अपनी चापलूसी, चपलता तथा धन के बल पर राजनीतिक वर्चस्वता हासिल करता है तो कहीं स्त्रियों को तोहफे के रूप में देकर। चाहे वह उसकी बेटी, बहू, पत्नी हो, पीछे नहीं हटता। इसी दुर्भावना से ग्रस्त उपन्यास 'पल्टू बाबू रोडÓ है जिसमें लट्टू बाबू अपनी इस महात्वाकांक्षा की पूर्णत: हेतु अपनी भतीजी 'बिजलीÓ और 'छविÓ का उपयोग करता है - बिजली कांग्रेस कमेटी के महिला विभाग का भार अपने ऊपर लेती है। परन्तु यह बात अलग है कि बिजली को यह पद प्राप्त करने के लिए 'मुरली मनोहर मेहताÓ कांग्रेस का जिला मंत्री के साथ क्या-क्या समझौते करने पड़ते हैं।
इन सभी उदाहरणों से एक बात निकलकर जरूर आती है कि स्त्रियां जहाँ इस आदोंलन में मुक्ति तलाश रही थी वहीं पुरूष वर्ग अभी भी अपनी शिकारी की भूमिका में दिखाई पड़ रहा था। उसकी यह भूमिका स्वतन्त्राता आंदोलन के दौरान भी थी तो उसके बाद भी वह शिकारी की भूमिका में दिखाई देता है। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि तमाम मुश्किलों के बाद भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने से स्त्रियों में जहाँ प्रगतिशीलता का भाव जागृत हुआ है, वे घर की चार-दीवारी से निकलकर समाज के अच्छे-बुरे अनुभवों को महसूस कर अपने व्यक्तित्व को लेकर अब सचेत हो रही हंै। परन्तु अब वह इतनी चेतनशील हो चुकी है कि पुरुषों के हाथों शोषित होने की बजाय अपनी दैहिकता का इस्तेमाल, अब वह खुद के व्यक्तित्व निर्माण में करने लगी है। इस दृष्टिकोण से 'दीर्घतपाÓ की 'मिसेज ज्योत्सना आनन्दÓ खरी उतरती हंै। वह अपने पति महापात्रा द्वारा दूसरों को परोसने की बजाय अपनी देह का इस्तेमाल स्वयं को अधिक शक्तिशाली, धनवान बनाने में करती हंै और इसी के बल पर वह आज वॢकग विमेंस होस्टल की सेक्रेटरी बनी हुई हैं।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आजीवन सक्रिय राजनीति में भाग लेने वाले रेणु का कथा-साहित्य स्वतन्त्रता आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका को बिना किसी सजावट के धूल, शूल, कीचड़ के साथ प्रस्तुत किया है।
1  संपादक ओंकार शरद - लोहिया के विचार, पृ 75
2  संपादक भारत यायावर - मैला आंचल, पृ0 161-162
3  संपादक भारत यायावर - परती परिकथा , पृ 504
4  संपादक भारत यायावर - दीर्घतपा, पृ 352
5  संपादक भारत यायावर - दीर्घतपा, पृ 352
6  संपादक भारत यायावर - पल्टू बाबू रोड, पृ 43
पता 
5/345, त्रिलोकपुरी,दिल्‍ली - 110091

स्‍त्री मुक्ति का स्‍वर है थेरीगाथाएं

अनिता भारती 

महिलाओं के जीवन में अचानक परिवर्तन तब आया जब गौतम बुद्ध ने उनको संघ में शामिल होने की आज्ञा दी। बौद्धकाल से पूर्व स्त्रियों का जीवन घर तक सीमित कर दिया गया था। उनसे सब अधिकार छीनकर उन्हें मात्र पुरूष की भोग्या के रूप में देखा गया। बुद्ध की विचारधारा स्वंय अपने आप में क्रंातिकारी थी। बुद्ध से पूर्व साधारण मनुष्य के मनुष्य होने की कोई कीमत नहीं थी। वह जातियों में बंटा धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास तथा जातीयता से उत्पीड़ित था। ऐसे समय में बुद्ध ने मानवता का मलहम लगाकर इसी दुखी मनुष्य को सहारा दिया। नारी की स्थिति तो और भी अधिक शोचनीय थी। उस पर तरह - तरह के अत्याचार किए जाते थे। डॉ. रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार बौद्ध धर्म का आर्विभाव ऐसे समय में हुआ जब नारी पुरूष के अत्याचारों से दबी जा रही थी। शास्त्रकारों ने जिसे कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी, उसके लिए बौद्धकाल में अमर संवेदना का संदेश मिला। संस्कृति के चार अध्याय पृ. 155 बुद्ध काल में पहली बार स्त्रियों को पुरूषों के बराबर समझा गया। अभी तक हिन्दू धर्म में सभी अधिकारों का भोक्ता एकमात्र पुरूष हुआ करता था। घर - परिवार से लेकर ज्ञान के अधिकार तक पर उसका एकमात्र अधिकार था। स्त्रियों के लिए ज्ञान प्राप्त करना वर्जित था। स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर माना जाता था परन्तु बुद्ध - काल में स्त्रियों के लिए सभी सीमाएं टूट गईं। बुद्ध ने लड़की जन्म को खुशी का अवसर बताया। कहा जाता है कि एक बार जब राज प्रसेनजीत तथागत के पास उपस्थित थे तब राजमहल से खबर आई कि रानी मल्लिका ने पुत्री को जन्म दिया है। पुत्री के जन्म की बात सुनकर प्रसेनजीत दुखी हो गए। तथागत ने उनकी उदासी का कारण जान उन्हें समझाते हुए कहा कि इसमें उदास होने की क्या बात है राजन! कन्या एक पुत्र से भी बढ़कर सन्तान सिद्ध हो सकती है क्योंकि वह भी बड़ी होकर बुद्धिमान तथा शीलवान बन सकती है। बुद्ध स्त्रियों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं, स्त्री संसार की विभूति है क्योंकि उनकी अपरिहार्य महत्ता है। उसके द्वारा ही बोधसत्व तथा विश्व के अन्य शासक जन्म ग्रहण करतें हैं। हिन्दू नारी का उत्थान पतन। डॉ. अम्बेडकर पृ . 22
अत: बुद्ध ने कन्या - जन्म को हर्ष का विषय माना तथा स्त्रियों की इस संसार अत्यन्त महत्ता है, ऐसा कहकर उन्होंने स्त्री जाति के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। बुद्ध ने ही सबसे पहले स्त्री को ज्ञान का  अधिकार दिया। वे कुंआरी हो अथवा विवाहित या फिर बृद्धा किसी भी अवस्था में संघ में प्रवेश ले सकती थी। स्त्रियां किसी भी जाति की हों शूद्र हों या ब्राह्मण, अमीर हो या गरीब, सधवा हो अथवा वेश्या, बुद्ध ने सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दिए। केवल बुद्ध - काल में ही हमें ऐसी अनेक दलित स्त्रियां मिल जाएंगी जिन्होंने उस समय की घृणित जाति - पांति और शोषणकारी सत्ता को ठुकरा कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई। वे स्त्रियों के मानसिक और दैहिक शोषण के तंत्र को लात मारकर स्त्री - मुक्ति के गीत गाती हुई संघ में शामिल हो गई। मोक्ष के द्वारा जो कि अभी तक केवल उच्च - जाति के पुरूषों के लिए खुले थे, अब उसकी अधिकारिणी बन गई। बौद्ध काल में स्त्रियां ज्ञान अर्जित करती, गली -गली घूमती हुई ज्ञान बांटती, भिक्षुणी संघ स्थापित कर रही थीं। उन्होंने समाज द्वारा जबरदस्ती लादी गई जिम्मेदारियोंको उतार फेंका। वे अपनी बात बेबाक, बोलाग और स्वतंत्र रूप से कहती हुई तथाकथित स्त्री - शोषण की दीवार को तोड़ धराशायी कर देती हैं। वे समझ जाती हैं, देह स्त्री के शोषण का आधार है और जाति व्यवस्था परिवार व पुरूष सत्तात्मक समाज उसका कारण है। इसमें कोई शक नहीं, दलित व गैर - दलित, दोनों महिलाएं उस समय भेदभाव व विषमतामूलक समाज में पिस रही थी। इस गैर - बराबरी के समाज में राजकुमारी से लेकर दासी तक दुखी और उदास थी। उसकी एक मात्र उपयोगिता भोग्या की थी, चाहे वह भोग जमीन, परिवार या फिर समाज के लिए हो। दलित स्त्रियों का जीवन तो और भी नारकीय था। एक तरफ  वे उच्चवर्ग की सेवाएं करने को मजबूर थीं तो दूसरी ओर परिवार में उसको उत्पीड़न झेलना पड़ता। ऐसी दलित - पद दलित स्त्रियों को बुद्ध ने समाज में सम्मानीय स्थान दिया। यही कारण है कि बुद्ध तथा बुद्धकालीन नारियों पर हमेशा से ही इन कट्टर पथियों द्वारा तरह - तरह के घृणित आरोप लगाए जाते रहे हैं। हिन्दू मानते है कि बुद्ध ने स्त्रियों को संघ में प्रवेश देकर उनको ज्ञानार्जन एंव अध्ययन मनन का अधिकार देकर उनको व्यभिचारी तथा स्वेच्छाचारी बना दिया। इन  हिन्दुओं के इन कुतर्को का समय - समय पर डा. अम्बेडकर से लेकर प्रगतिशील ताकतें तथा स्त्रियों की आजादी के पक्षधरों ने हमेशा मुँहतोड़ जबाब दिया है। परन्तु दुख और चिन्ता इस बात की है कि आज अपने आप को दलित चिंतक, साहित्यकार व मार्गदर्शक मानने वाले कुछ लोग भी बुद्ध की जाति ढूँढने लगे हैं तथा बुद्ध के काल में शिक्षित व संघ में प्रबज्जित थेरियों को लेकर उन पर गम्भीर कुत्सित आरोप मढ़ रहे है। ऐसे स्वार्थी, पदलोलुप व चर्चा में बने रहने वाले जातिवादी दलित साहित्यकार गौतम बुद्ध को क्षत्रिय मानकर उन्हें दलित व सम्पूर्ण समाज का आदर्श मानने से नकारते हुए उनके संघर्ष एंव त्यागपूर्ण कार्यों पर कीचड़ उछाल रहें हैं तथा उनके अथक प्रयासों से स्वतन्त्रता प्राप्त थेरियों को भी नहीं बख्श रहें हैं।
ऐसे ही कुत्सित और घृणित आरोप मढ़ने वाले जातिवादी दलित साहित्यकार डा. धर्मवीर हैं जिन्होने अपनी पुस्तक सामंत के मुंशी: प्रेमचन्द के लोकार्पण के अवसर पर अपने बीज भाषण में कहा कि बुद्ध ने मेरी स्त्रियाँ छीनी हैं। घर से बेघर करने और विवाह से छीनकर स्त्रियों को सन्यास वाली सामाजिक मृत्यु की भिक्षुणियाँ बनाना उनका धार्मिक अपहरण कहा जाना चाहिए। धर्मवीर बीज व्याख्यान पेज 4. थेरियों की सामाजिक मृत्यु का क्या आशय है ? क्या धर्मवीर ये कहना चाहते हैं कि बुद्ध के संघ में शामिल होकर स्त्रिया असामाजिक हो गईं। क्या सामाजिक मृत्यु का आशय समाज के उपयोगी न होना है। क्या धर्मवीर यह मान कर चलते कि स्त्री की समाज में एक मात्र उपयोगिता घर के अन्दर ही है और अगर वह समाज के नियम तोड़ती है तो उसके जीने - मरने का कोई महत्व नहीं। और अगर वह घर छोड़कर बुद्ध के संघ में शामिल हो गई तो वह समाज के लिए अनुपयोगी हो गई। डा. धर्मवीर के अनुसार स्त्रियों की भूमिका घर संभालने, बच्चे पालने व अपने पति को खुश करने तक सीमित है। अगर कोई स्त्री घर छोड़कर अपने अस्तित्व की खोज व अपने होने के अहसास को जानने के लिए अध्ययन मनन व ज्ञानार्जन का अधिकार चाहती है तो वह समाज के लिए अनुपयोगी हो जाती है। इसका अर्थ यह भी निकलता है कि धर्मवीर पुरूष वर्चस्व के सिद्धान्त के आधार पर मनु के समान चाहते हैं कि स्त्रियों को ज्ञान व शिक्षा न दी जाए क्योंकि वह अपने अस्तित्व व अपनी स्वतन्त्रता की बात करने लगेगी। जैसे ही स्त्री अपनी अस्मिता की बात करती है धर्मवीर जैसे ब्राह्मणवादी सकीर्ण विचारधारा वाले लोगों के पैरों तले जमीन खिसकने लगती है। उन्हें अपने अधिकार छीनने का भय सताने लगता है। उन्हें लगता है कि अगर नारी हमारे बराबर आ गई तो हमारा हुक्म कौन मानेगा? वे अपना गुलाम किसको बनायेंगे। इसलिए वे मनु की तरह ही स्त्री को घर में रखने की हामी है और वे बिल्कुल मनु महाराज की तरह औरतों का गठन चाहते है।
अनष्ता दष्त काले च मंत्र संस्कार कष्दत्पति
सुखस्य नित्यं दातेह परलोक च योषिता:
सदा प्रछष्या भाव्यं गहकार्येषु दक्षया।
सुसंस्कष्तों पस्करया के चामुक्तहस्तया।।
अर्थात विधिवत मन्त्रों द्वारा गृहित पति, स्त्री के लिए हर काल व ऋतु में सुखदायक है। लोक परलोक में उससे सुख ही सुख मिलता है अत: उसे सदैव प्रसन्नचित रहना चाहिए और गृहकार्य दक्षता पूर्वक करते हुए घर के बर्तन आदि को साफ रखे तथा खर्च में मितव्ययता बरते। डा. अम्बेडकर द्वारा लिखित पुस्तक हिन्दू नारी का उत्थान और पतन से उधृत-
डा. धर्मवीर के विचार और मनु महाराज के विचारों में कोई विभिन्नता नहीं । जिस प्रकार उस समय मनु महाराज ने बौद्ध धर्म को जड़ से मिटाने के लिए, बौद्ध धर्म को मानने वालों में शूद्र व स्त्रियाँ सबसे अधिक थीं। शुद्र व स्त्री को बौद्ध से मोड़ने के लिए दोनों पर ही व्यक्तिगत व सामाजिक प्रतिबन्ध लगाये। आज उसी प्रकार के प्रतिबंधों की बात डॉ. धर्मवीर कर रहे हैं। डा. धर्मवीर को लगता है भिक्षुणि या ज्ञानार्जन कर शिक्षित हुई स्त्री शायद उनके हाथ से निकल जायेगी इसलिए वो बुद्ध पर आरोप मढ़ते है कि बुद्ध ने मेरी स्त्रियाँ छीनी हैं। मेरी स्त्रियाँ छीनने से मतलब है मनु के हाथ से स्त्रियाँ छीनी हैं। स्त्री छीनना यह शब्द ही अपने आप में फासिस्टवादी मानसिकता का घोतक है। एक समय था जब युद्ध जीतने वाली या लुटेरे मानी जाने वाली जातियाँ हारे गये स्त्री पुरूषों को लूटी गई वस्तुओं में शामिल मानते थे। डॉ. धर्मवीर इसी मानसिकता के हैं तभी वे अपने अपने पुरूषवादी अंहकार भरे ब्राह्मणवादी स्वर में घोषित कर रहें हैं, बुद्ध ने मेरी स्त्रियाँ छीनी हैं। यह डा. धर्मवीर नहीं उनके भीतर सोयी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता बोल रही है जो औरतों को वस्तु मानती है तथा उनके द्वारा उठाई गई अस्तित्व,समानता व स्वतन्त्रता की मांग को अपने पैरों तले क्रूरता से रौंद देती है। अब सवाल उठता है, आखिर बौद्ध काल में स्त्रियों की दशा कैसी थी और क्यों कर हजारों हजार दलित पददलित औरतें स्वेच्छा से संघ की ओर आकृष्ट हुई ? बुद्ध संघ में शामिल होने पर उन्होंने अपने अन्दर क्या परिवर्तन महसूस किया ? कैसे उन भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
थेरी गाथा में उन भिक्षुणियों के जीवन के अनुभव हैं, जो बुद्ध की समकालीन थीं। थेरी गाथा एक तरह से बुद्धकालीन स्त्री के जीवन में कटु अनुभवों के साथ उनसे मुक्ति व विरक्ति के अनुभव भी हैं। घर परिवार इन भिक्षु महिलाओं ने क्या अनुभव किया। उन खुशी के पलो का भी थेरी गाथा में चित्रण है।
थेरी गाथा बौद्ध साहित्य की अमूल्य निधि त्रिपिष्टक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। थेरी गाथा में 73 भिक्षुणियाँ जिन्हें अर्हत पद प्राप्त था, उनकी खुशी अथवा पीड़ा के समय व्यक्त किए गए उद्गार शामिल हैं। थेरी गाथा बुद्ध साहित्य के साथ - साथ नारीवादी, महिला आन्दोलन के लिए भी महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उस समय थेरियों ने तथाकथित समाज के खिलाफ  जिस ईमानदारी से अपने आप को व्यक्त किया वैसी स्वतंत्र स्वाधीन वाणी आज भी मुश्किल से मिलती है। यह भारत के सम्पूर्ण इतिहास का यह पहला अवसर था जब वे ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र थी। वे अपने कष्टों के प्रति भी उतनी मुखर थीं जितनी अपने उल्लासमयी क्षणों को व्यक्त करने के लिए। दलित स्त्रियों का जीवन उस समय कितना कठिन था। उस पूरे विषाक्त वातावरण को पूर्णिमा थेरी व्यक्त करते हुए कहती हैं, मैं पनिहारिन थी। सदा पानी भरना मेरा काम था। स्वामिनियों के दंड के भय से, उनकी क्रोध भरी गालियों से पीड़ित होकर मुझे कड़ी सर्दी में भी सदा पानी में उतरना पड़ता था। एक तरफ  सामाजिक उत्पीड़न के चलते महिलाअें की दासों से भी गई बीती जिन्दगी थी तो दूसरी और पारिवारिक वातावरण उससे भी कहीं अधिक दूषित था। थेरी सुमंगल कवयित्री अपनी पीड़ा थेरी बनने के बाद अपने पूर्व अनुभव अन्य थेरियों के समक्ष रखते हुए कहती है। मेरी दरिद्र व्यस्था के वे छोटे - छोटे बर्तन जिनके बीच में मै मैली कुचैली बैठती थी और मेरा निर्लज्ज पति मुझे उन छातों से भी तुच्छ समझता था, जिन्हें वह अपनी जीविका के लिए बनाता था। कवयित्री सुमंगला भिक्षुणी संघ में आकर अत्यंत प्रसन्न थी। उसके परिवार में बिताए गए दु:ख के दिन कट गए। वह स्वतंत्र हो गई। उसने रात - दिन घिसघिस कर परिवार के लिए बिताए। अनेक गुलामी भरे सम्बन्धों से मुक्ति या आजादी की सांस ली। वह उन्मुक्त स्वर में उन्मुक्त स्त्री की तरह गा उठी। मुक्त हूँ, मैं मुक्त धनकुटे से पिंड छुटा देगची से भी मैं कितनी प्रसन्नचित हूँ अपने पति से मुझे घृणा हो गई है। उसकी छत्र छाया को अब मैं बर्दास्त नहीं कर साकती इसलिए मैं कड़कड़ा का नष्ट करती हूं। लालच और नफरत क्रोध और अपने आपसे कहती है, आह! यह है सुख और करती है चिंतन मनन सुखपूर्वक।
भिक्षुणी सुमंगला भिक्षुणी संघ के स्वतंत्र वातावरण में पहली बार महसूस करती है कि वह भी एक इंसान है, उसके भी कुछ सुख हैं। वह सुख देह से इतर हो सकते हैं। वह हर कदम पर महसूस करती है कि क्यों केवल वह ही स्त्री हाने के नाते ही हर समय किसी की छत्रछाया मेें रहने की अधिकारी है, उसे सुकून चाहिए हजां वह इत्मीनान से ठहर अपने होने के अस्तित्व का आनन्द ले सकें।
थेरी गाथा में ही मित्ता नामक भिक्षुणी अपने भिक्षुणी पूर्व जीवन को व्यक्त करते हुए कहती है - कितनी आजाद हूँ मैं! कितनी अनोखी है आजादी? तीन तुच्छ वस्तुओं से मुक्त ओखली, मूसल और अपने है अपने टेढ़े मालिक से। पूर्वजन्म और मृत्यु से मुक्त हंू मैं जिस तमाम ने दबाए रखा था मुझे वो सब अब दूर फिंक चुका है। आम जीवन जीने के बाद बनी भिक्षुणियों ने अपने घर व समाज में स्त्रियों के दोहरे शोषण को महसूस किया और उससे विद्रोह किया। उस समय विद्रोह का एकमात्र रास्ता भिक्षुणी संघ में शामिल होना था जिसे अनेक स्त्रियों ने अपनाया। सन्यास लेकर भिक्षुणी संघ  में शामिल होने वाले अनेक स्त्रियाँ ब्राह्मण वर्ग से भी आई थीं। जो ब्राह्मण वर्ग के कर्मकांड, आडम्बरों अंधविश्वासों में फंसी थी। जब उनको इन व्यर्थ के पचड़ों का ज्ञान हुआ तो वे इस जातीय भेदभाव से पूर्ण लिंगभेद पर आधारित हिन्दू धर्म को छोड़ बौद्ध भिक्षुणी बन गई। मिता थेरी हर समय धार्मिक अनुष्ठानों व पूजा पाठ में लगी रहती थी। बुद्ध के सम्पर्क में आने के बाद उसके मन में पला डर व अंधविश्वास दूर हो गया। वह अनुभव बताते हुए कहती है - मैं हर चतुर्दशी को, पूर्णमासी को और प्रत्येक पक्ष की अष्टमी को व्रत रखती थी, यह सोचकर कि मंै देव योनि को प्राप्त कर स्वर्ग जाउँगी। वहीं मैं आज रोज एक समय आहार ग्रहण करने वाली मंडे सर वाली चीवर पहनने वाली हँू। किन्तु आज मुझे स्वर्ग में वास करने की अभिलाषा नहीं है। कारण कि मंैने अपने हृदय की पीड़ाओं और चिंताओं को ही दूरी फेंक दिया हैं।
ये थेरियाँ स्वतंत्रता की कीमत तथा स्वाधीनता के अहसास को समझ चुकी थी, तभी तो अपनी स्वाधीनता को स्वर्ग से बढ़कर बताती हैं थेरी गाथा में पटाचारा गौतम बुद्ध की सर्वाधिकर प्रिय शिष्याओं में से एक थी जिसे अर्हत पद प्राप्त था। पटाचारा की 500 से अधिक शिष्याएं थीं जो जगह - जगह घूम शांति और सद्भाव व स्वतंत्रता का सन्देश देती थीं। पटाचारा उच्च कोटि की कवयित्री होने के साथ - साथ उच्च कोटि की दार्शनिक भी थी, पटाचारा ने समाज व परिवार से विद्रोह करके अपने घर के नौकर से विवाह किया। परन्तु विवाह के कुछ समय बाद पटाचारा पर दुखों के पहाड़ टूट पड़े। पहले पति की मृत्यु हुई और फिर उसके नवजात शिशु व दो वर्षीय पुत्र की भी मुत्यु हो गयी। कुछ ही दिनों में घर गिरने से उसके माता - पिता व भाई - बहनों की भी मृत्यु हो गई। जब वह भिक्षुणी संघ में आई तो विक्षिप्त अवस्था में थी। परन्तु भिक्षुणी संघ के स्वतंत्र, बौद्धिक एवं स्नेही वातावरण में वह शीघ्र ही ठीक हो गई। पटाचारा ने निस्सारता पर विचार करते हुए कहा - लोग छल से भूमि जोत उसमें बीज बोते हैं, इस प्रकार वे धन उपार्जन कर अपने स्त्री - पुत्रादि का पालन - पोषण करतें हैं, तो मुझ जैसी साधिका निर्वाण को क्यों न प्राप्त कर पाती ? मैं जो शील से सम्पन्न हूँ, अपने शास्त्र के शासन को पूरा करने वाली हूँ, अप्रमादिन हँू, अचंचल और विनीत हूँ। किसी गौतमी थेरी अत्यन्त निर्धन परिवार में जन्मी थी। उसका पूरा जीवन अभावों में बीता। विवाह के बाद भी उसे दो पल का सुख नसीब न हुआ। उसने अपने ससुराल में देखा और स्वयं अनुभव किया कि औरतों का जीवन अत्यन्त हीन है। उनका सारा जीवन रोते - रोते कट जाता है। अपने मुसीबतों के साथ - साथ वह सम्पूर्ण स्त्री - जीवन के दुखों की सुन्दर अभिव्यक्ति करते हुए कहती हैं - दुखों से भरपूर नारी तूने असंख्य जन्मों में इस प्रकार का अपरिमित दुख अनुभव किया है, तूने सहस्त्रों जन्मों में आँसुओं को बहाया है। सबने तुझे छोड़ दिया। तेरा पति भी तुझे छोड़कर चला गया। अन्त में जब किसा गौतमी अपने कष्टपूर्ण मानसिक ताप से भरे जीवन को छोड़कर भिक्षुणी संघ में शामिल होकर आनन्दविभोर हो गा उठती है - आह! आज मेरी पीड़ का तीर निकल गया। सभी प्रकार के बोझों को मंैने दूर फेंक दिया। पूरे हुए मेरे सब कर्तव्य - मुक्त हूँ। मैं सब बंधनों से, विमुक्त है मेरा चित, मैं किसा गौतमी यह कहती हूँ।
स्त्री पारिवारिक दुख में डूबी थी परन्तु स्वयं उसके अपने शरीर के दुख - जैसे माँ बनने की भंयकर पीड़ा भी झेलनी पड़ती थी जिसे आज तक माँ बनने की गर्वपूर्ण शब्द चाशनी में डूबो कर छुपा दिया जाता है। बुद्ध काल की स्त्री यानि थेरी किस्सा गौतमी में बनने में होने वाली पीड़ा का मार्मिक शब्दों में वर्णन करती है। कोई - कोई बच्चे जनने वाली माताएँ एक बार ही मृत्यु चाहती हुई, अपना गला काट लेती हंै, ताकि दोबारा यह असह्य दुख न सहना पड़े। कुछ सुकुमारियॉ विष खा लेती हैं। बच्चा जब पैदा नहीं होते और गर्भ के बीच में रूक जाता है तो रुग्ण मातृघातक बन जाता है और जच्चा बच्चा दोनों के दोनों ही विपदा अनुभव करतें हैं। माँ बनने की पीड़ा का ऐसा मार्मिक वर्णन संस्कृत साहित्य से लेकर आज तक वर्तमान साहित्य तक में दुर्लभ है। परिवार और समाज के नियमों - उपनियामों की चक्की में पिसती हुई नारी निराशा के सागर में आकंठ डूबी थी। मन में अवसाद के भाव समेटे जीवन से मुँह मोड़ते हुए आज तक न जाने कितनी स्त्रियाँ आत्महत्या करती आई है। सीहा थेरी अपने पूर्व पारिवारिक दुखों और निराश जीवन का वर्णन करते हुए कहती हंै, जीवन  में पूरी तरह निराश होकर एक दिन रस्सी को लेकर में घने वन में  घुस गई। सोचा बार - बार हीन आचरण करने से तो मेरे लिए यही श्रेय होगा कि मैं फांसी लगाकर मर जाऊँ  पर उसके निराशापूर्ण जिन्दगी से मुक्ति मिलती है भिक्षुणी संघ में शामिल होकर।
थेरी गाथा में गृहस्थ जीवन बिता चुकी थेरियों के अलावा ऐसी भी थेरियां थीं जो अविवाहित थीं। जो किसी भी पुरूष के संसर्ग में नहीं आना चाहती थी। जो विवाह न करके आध्यात्मिक सुख प्राप्त करते हुए जीवन बिताना चाहती थी। ऐसी थेरियों में गरीब परिवार की स्त्री से लेकर राजकुमारियाँ तक शामिल थीं। बुद्ध - काल में स्त्री अपनी मर्जी से अविवाहित भी रह सकती थीं।
बुद्ध जो कि शुरू में स्त्रियों को संघ में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे परन्तु आनन्द से विचार - विमर्श के बाद वे स्त्रियों को संघ में शामिल करने के पक्ष मे हो जाते हैं। इसका कारण यह कदापि नहीं कि वे स्त्रियों के विरोधी थे परन्तु परिवार में बच्चों के पालन - पोषण व घर - गृहस्थी के कर्तव्यों की वजह से बुद्ध इस अन्तर्द्वन्द्व में थे कि अगर स्त्रियाँ अपने परिवार व बच्चे छोड़कर संघ में आएगी तो उनके बच्चों का क्या होगा? उनका मानना था कि स्त्रियों से बढ़कर बच्चे को और कोई अच्छे से नहीं पाल सकता। परन्तु उन्होंने अपने इस अन्तर्द्वन्द्व पर विजय पायी और संघ के द्वार स्त्रियों के लिए खोल देने से डॉ. अम्बेडकर के कथानुसार बुद्ध ने औरत को भिक्षुणी बनने की आज्ञा देकर न केवल एक ओर उनके लिए आजादी का मार्ग खोल दिया बल्कि उन्हें सैक्स से मुक्त गरिमा पाने की अनुमति दी तो दूसरी ओर पुरूष के साथ समानता का मार्ग खोल दिया।
बुद्ध - काल में स्त्री सिर मुंडाए, चीवर धारण किए उन्मुक्त भाव से ध्यान लगा सकती थी। अपने समान भिक्षु से तर्क कर सकती थी। वे बेरोकटोक जंगल, पहाड़, पर्वत चढ़ सकती थी। स्वयं अपने होने के अहसास का अनुभव करती हुई। अपने को पुरूष की छत्रछाया से दूर एक सम्पूर्ण इकाई मानते हुए इस वास्तविक संसार को स्वंय अपने अनुसार सोच - समझ सकती थी।
बुद्ध के भिक्षुणी संघ में शामिल होने वाले स्त्रियों में अति प्रतिष्ठित गणिकाएँ एवं वेश्याएँ भी थीं। ये वो स्त्रियाँ थीं जो अपने रूप और पैसे से मतान्ध थीं। भिुक्षुणी संघ का आकर्षण इनका इनसे दूषित जीवन छुड़ा इन्हें संघ तक खींच लाया। इनमें प्रमुख थी आम्रपाली और अड्ढाकाशी। ये दोनों ही बाद में गौतम बुद्ध की सर्वाधिक प्रिय शिष्याओं में से थी। बुद्ध काल में गणिकाओं ओर वेश्याओं को अत्यन्त सम्मान मिलता था। अनेक लोग इनके चाहने वाले थे। इनको नगरवधू की उपाधि से विभूषित किया जाता था। परन्तु ये जानती थी ये आदर, सम्मान, धन - दौलत आदि केवल युवा रहने तक ही हैं। वृद्धावस्था में जब यह शरीर रोग का घर हो जाएगा, युवावस्था खत्म हो जाएगी तब कोई द्वार तक पर न फटकेगा। बुद्ध की चारों ओर होती प्रशंसा से प्रभावित होकर आम्रपाली ने गौतम बुद्ध और उनके शिष्यों को भोजन पर आमंत्रित किया। भोजन उपरान्त बुद्ध के भौतिक सुखों की निस्सारता पर प्रभावशाली प्रवचन सुन अम्रपाली सब कुछ छोड़ थेरी बन संघ में शामिल हो गई। अम्रपाली एक कुशल नृत्यांगना के अलावा अत्यंत उच्च कोटि की कवयित्री भी थी। वह अपनी वृद्धावस्था का अत्यंत सजीव काव्यमयी चित्र खींचते हुए कहती है - एक समय यह शरीर ऐसा था। इस समय यह जर्जर और अनेक दुखों का आलय है। एक ऐसे जीर्ण घर के समान जिसकी लीपन टूट - टूट कर नीचे गिर गई है। बिना लेपादि के यह जया का घर शरीर शीघ्र ही गिर जाएगा। जैसे टूटी हुई लीपन वाला जीर्ण घर, सत्यवादी के वचन कभी मिथ्या नहीं होते। अम्बपाली द्वारा मनुष्य शरीर का एक टूटे घर से बांधा गया रूपक अत्यन्त मार्मिक एवं मनोहारी है।
भिक्षुणी अड्ढा कासी थेरी में भिक्षुणी बनने से पूर्व राजगृह की अत्यंत प्रसिद्ध वेश्या थी। अड्ढा कासी की एक दिन की आय काशी राज्य की एक दिन की आय के बराबर थी, परन्तु भिक्षुणियों के सुखी स्वतंत्र और बौद्धिक जीवन से युक्त जीवन को देख कासी थेरी भिक्षुणी संघ में शामिल हो गई। अपने पूर्व जीवन पर दृष्टिपात करते हुए अपनी कहानी सुनाती है - किन्तु आज मेरा सारा सौन्दर्य आज मेरे लिए है घृणा का कारण ग्लानि पैदा करने वाला मैं उसके मोह से विरक्त हो चुकी हँू। मुझे अब और नहीं घूमना मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्कर में, मंैने साक्षात्कार कर लिया है तीनों विधाओं का। मैंने भगवान सम्यक् सम्बुद्ध के शासन को पूरा कर लिया है।
अपने समस्त दुखों से छुटकारा पाए अपनी मानसिक शारीरिक कमजोरियों पर काबू करके, मानसिक - बौद्धिक आध्यात्मिक भूख मिटाने व व्यक्तिगत - सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करती हुई बुद्ध की समकालीन स्त्रियाँ भिक्षुणी संघ में शामिल होकर अपने व्यक्तित्व को पूर्ण मनोयोग से जीती हैं। वे अर्हत पद प्राप्त करती हैं।  अपने मनुष्य होने के अहसास को भिक्षुणी संघ में शामिल होकर कथा - कविताओं के माध्यम से अत्यंत सरल, सरस व निडरतापूर्वक बयान करती हैं। वे कामना करती हैं स्त्री मुक्ति की। स्त्री - मुक्ति के क्षेत्र में कविता - कहानियों द्वारा इतिहास रचती हैं। ये निडर थेरियाँ चीवर धारण किए सिर मुंडाए गली - गली, गाँव - गाँव, जंगल - जंगल, पर्वत - पर्वत की खाक छानती हुई निर्द्वन्द्व निर्भय पुरूषों की छत्र - छाया से दूर, स्त्री मुक्ति की राह पर निकल पड़ती हैं। मन, तन, वचन की पीड़ा से मुक्त जाति वर्ण लिंग व समाज के बन्धनों से स्वतंत्र हो वे गा उठती हैं - यहाँ इस शिला पर बैठी। मंै पूर्ण मुक्ति का अनुभव कर रही हँू। स्वाधीनता का वातावरण, मेरी आत्मा व शरीर को, आच्छादित किए हुए है।
थेरी गाथाएँ बुद्धकालीन ही नहीं अपितु आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। थेरी गाथाएँ स्त्री जगत को मानसिक, शारीरिक व बौद्धिक गुलामी के प्रति विद्रोह की चेतना जगाए उसे स्वतंत्र, निर्भय स्वाधीनता जीवन जीने की प्रेरणा देती है। भिक्षुणी संघ में पहली बार भारतीय समाज में स्त्रियों के अन्दर छिपी प्रतिभाएँ उर्जा एवं विचार स्वातंत्रय को न केवल पूर्ण अवसर मिला अपितु उन्हें मौलिक अधिकार समानता व स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई। थेरी गाथाओं में थेरियों की उन्मुक्त उल्लासमयी वाणी कविताओं व कहानी के रूप में स्त्री समाज के साथ - साथ आज भारतीय समाज के लिए भी अमूल्य निधि है। थेरी गाथाएँ नवीनता के साथ - साथ आधुनिकता की मशाल जलाए मनुष्यमात्र को परतंत्रता के खिलाफ  उठ खड़े होने की प्रेरणा जगाती हैं। स्त्री मुक्ति के प्रतीक रूप में थेरी गाथाओं की कविता को लाखों - करोड़ों वर्षों तक याद रखा जाएगा।
पता 
ए डी 118 बी, शालीमार बाग,
दिल्ली 88, मोबाईल : ९८९९७००७६७
मेल  : anita.bharti@gmail.com

कविता

दिनेश कुशवाहा 
रेखा
जो लोग तुम्हें नशा कहते थे
मुकम्मल ताजमहल
उनके लिए भी
नहीं है तुम्हारा कोई पुरातात्विक महत्व
कि बचाकर रखे जाएँगे तुम्हारे खंडहर।

न तो इन्द्र ही रखेंगे बचाकर तुम्हें
धरती पर सहस्र वर्ष
पुरानी वारुणी की तरह।

अजंता-एलोरा के शिल्पियों के स्वप्न भी
नहीं थीं तुम
पर तुम्हारे माथे पर लिखा जा सकता था
कोणार्क का सूर्य मंदिर।

पहली बार देखा था तुम्हें
तो याद आया एक टुकड़ा कहरवा
लगा जैसे रजत खंभे पर हाथ टिकाये
तिर्यक मुद्रा में खड़ी हो कोई यक्षिणी
जिसकी गहरी नाभि और उन्नत वक्षों पर
बार-बार आकर टिक जाता हो ढीठ सूरज
एक याचक का पीला चेहरा लिये हुए।

मेरा कहानीकार दोस्त देवेन
करता था जिन दिनों प्यार
उन दिनों भी
उसके रात के सपनों में
चली आती थीं तुम
ऐसा क्या था दुर्निवार?
जो बान्हने-छानने पर भी
झाँक ही जाता था
जीभ चिढ़ाती चंचल किशोरी की तरह।

तुम्हारे चौड़े पंजे नाचे होंगे न जाने कितने नाच
तुम्हारी लम्बी अँगुलियाँ बुनी होंगी ज़रूर
कुछ मोज़े-कुछ स्वेटर
एक अनदेखे बच्चे के लिए।

मैंने देखा कि कला में डूब जाना
भूल जाना है काल को
पर हमें रात-दिन डसती रहती हैं उसकी क्रूरताएँ
कि जिसे मन से उरेहते हैं ब्रह्मा
उसे कैसे लग जाती है
पहले उनकी ही नज़र!

सोचता रहा मैं
कि धरती की सुन्दर कलावती बेटियों को
कौन बाँटता है
नटी से लेकर नगरवधू तक के ख़ानों में
कि जिसे हज़ारों-हज़ार लोग
लिफ़ाफे़ में भरकर भेजते हैं सिन्दूर
उसे कोई नहीं भेजता डिठौना?


हेलेन
 हँसना कोई हँसी-ठ_ा नहीं है
क्या आप बता सकते हैं
अपनी ज़िन्दगी में कितनी बार
हँसे होंगे ईसा मसीह?

ठ_ा नहीं है थिरकना भी
या तो बलइया लेती हैं
या विद्रोह करती है देह की
एक-एक बोटी।

मैंने उसे कभी खड़े
या लेटे हुए नहीं देखा
समुद्र का एक उत्ताल नर्तन
आता था लहराते हुए
और लौट जाता था
सामने किनारों तक छूकर
अपनी अथाह दुनिया में।

चमकते श्रमबिन्दु याद दिलाते थे
कि अभी-अभी
पर्वत-जंगल-मैदान लाँघती
इधर से दौड़ती हुई गई लकड़हारे की बेटी
या किसी वनवासी ने चन्दन घिसकर
बिंदियों से सजा दिए हैं
अपनी प्रिया के कपोल
और उसे पहनाने के लिए
लेने गया है वन देवता से एक चितकवरी खाल।

मैंने उसके हाथ में कभी पानी नहीं देखा
न कोई खाने की चीज़
जब भी देखी तो शराब
मन हुआ कई बार
जैसे कोठे पर
मिली लड़की से पूछने को होता है
क्या है तुम्हारा असली नाम?
उसने दुखी होकर कहा
झूमते हाथी, दौड़ते खरगोश
नाचते मोर से तुम नहीं पूछते
उसका असली नाम?
तुम्हारी पंचकन्याओं में
कैसे आएँगी इजाडोरा डंकन
प्यारी मग्दालीना?

दुनिया के सारे कलावंत बेटों को
मैंने ही नहीं बनाया शराबख़ोर!
न झूठों से कहा
कि खोल लो शराब के कराख़ाने!
मैंने नहीं बिछाई
सूली ऊपर पिया की सेज!

बारूद से जली
गुलाब की पत्तियों का हाहाकार
मैंने नहीं चुराया।

स्मिता पाटिल
उसके भीतर एक झरना था
कितनी विचित्र बात है
एक दिन वह उसमें नहा रही थी
लोगों ने देखा
देखकर भी नहीं देखा
उसकी आँखों का पानी।

मैना ने कोशिश की
कि कैसे गाया जाए पिंजरे का गीत
कि लोग
आँखों में देखने के आदी हो जाएँ। 

तब घर के पीछे बँसवारी में
हवा साँय-साँय करती थी
जब उसने कोयल की नक़ल की थी
और चल पड़ी थी बगीचे की ओर
कि देखा
बड़े बरगद के पेड़ पर
किस तरह ध्यान लगाकर बैठते हैं गिद्ध
पूरे सीवान की थाह लेते हुए।

पिटती-लुटती-कुढ़ती स्त्री के रूप में
गालियाँ नहीं
मंत्र बुदबुदाती थी नैना जोगिन।


एक दिन मैंने उससे पूछा
बचपन में तुम ज़रूर सुड़कती रही होंगी नाक
वह मुस्कुराकर रह गई
मैंने कहा
जिसने गौतम बुद्ध को खिलाई थी खीर
तुम जैसी ही रही होगी वह सुजाता।

उसने पूछा
पुरुष के मुँह में लगी सिगरेट
बढ़कर सुलगा देने वाली लड़की भी
क्या इसी तरह आ सकती है इतिहास में?

कविता द्रोही भी मानते थे
अभिनय करती थी कविता
जीवन के रंगमंच पर
भीड़ भरी सिटी बसों में।

सुनते थे हम प्रसव की पीड़ा के बाद
औरत जनमती है दूसरी बार
अभिनेत्री!
जीवन के इस अभिशप्त अभिनय के लिए
हम तैयार नहीं थे।

मीना कुमारी
बिस्तर पर जाते ही
किसी का माथा सहलाने के लिए
हुलसी हथेलियाँ
फफक पड़ती इतनी
कि उसके चेहरे पर उभर आती थी कोख।

जलते बलुवे पर नंगे पैर
चली जा रही थी एक माँ
तलवों में कपड़ा लपेटे
जब हम उसे देख रहे थे अमराइयों में।

महुवा के पेड़ तले
अपने आँचल में बीनते हुए कुछ
शायद दुनिया का सबसे रस भरा फूल
उसके गाल खिल उठते थे
और साथ ही भर आती थीं आँखें।

यह क्या उल्लाह मियाँ?
मात्र आँसुओं की भीख के लिए ही
नहीं होते बड़री आँखों के कटोरे।

चाँदनी में सिफ़र्  चाँद-तारों से
बातें कर जी नहीं भरता
चाहिए ही चाहिए एक आदमी
अकेले आदमी का आसमान
कभी ख़त्म नहीं होता।

वर्जित फल खाया भी, नहीं भी
स्वर्ग में रही भी, नहीं भी
पर ज़िन्दगी-भर चबाती रही धतूरे के बीज
और लोग कैंथ की तरह उसका कच्चापन
अपनी लाडली के लिए ही
रसूल ने भेजा था एक जानमाज़
मु_ी-भर खजूर और एक चटाई।

झुकी पलकें पलटकर लिखतीं
एक ऐसे महान अभिनय का शिलालेख
कि मन करता था चूम लें इसे
जैसे करोड़ों-करोड़ लोग चूमते हैं क़ाबे का पत्थर
या जैसे बच्चों को बेवज़ह चूम लेते हैं।
 पता - 
हिन्दी विभाग, 
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा (म0प्र0)
फोन नं0  -     (07662) 233929, 09425847022        

निष्‍ठुर निडर उदाघ ने

शिवशरण दुबे

निष्ठुर निडर उदाघ ने, निगल लिया नेह।
ढूँढे नदिया रेत में, अपनी चंचल देह।।
शुष्क नदी के तीर पर, खड़े रोवासे पेड़।
तपी दुपहरी ले गई, सबकी खाल उधेड़।।
चिड़ियों के जल - पात्र हों, प्याऊ के घट चार।
उसी गृही का घर लगे, गर्मी में हरि - द्वार।।
लहरों ने स्वागत किया, पढ़ें माङ्गलिक छन्द।
सागर के छूकर चरण, चले बलाहक वृन्द।।
मेघ मरुत - सहयोग से उड़कर चले सवेग।
ठहर - ठहर देते चले, गाँव - नगर को नेग।।
अनगिन जल - याचक मिले, खेत, पठार, पहार।
मेघों ने उपकृत किया, देकर शीतल प्यार।।
बहुत दिनों के बाद फिर लौटे हैं घनश्याम।
एक शाम आओ लिखें इन बूँदों के नाम।।
उतरी हिना हथेलियाँ, चढ़ा महावर पाँव।
सावन के आँगन नचा, फागुनवाला गाँव।।
झूमे लट, नथ, झुबझुबी ईंगुर चमके भाल।
सावन में झूले चढ़ी, चुनरी लगे रुमाल।।
नदिया अल्हड़ मनचली, चंचल लड़की एक।
हँसती रहती है सदा, सभी खिलौने फेंक।।
नदी नहीं अभिमानिनी, देती सबको ठाँव।
जो भी आये पास में, धोती सबकी पाँव।।
मन में सुन्दर भाव तो सुन्दर यह संसार।
बेटा, पिल्ला देखकर मन में उपजे प्यार।।
मन चंगा रैदास - सा हो जाये इक बार।
मिले कठौती में उसे गंगा जी का प्यार।।
जिसकी जैसी प्रकृति है उसका वैसा वास।
भौंरा रहता फूल में, गीदड़ मरघट - पास।।
जिससे हित, उसकी सुचित, सुन लो कड़वी बात।
बन्धु, दुधारु गाय की, सहनी पड़ती लात।।
सङ्कट को मत न्योतिये, करके अग्रिम शोर।
टेरे टिटिही साँप को, ज्यों चिंगनों की ओर।।
कूटनीति परिवार में, घुसी तोड़ दीवार।
डॉट - डपट आँगन करे, द्वार - देहरी रार।।
राजनीति के कर्म में, पेट - पीठ दो मर्म।
पेट दिखाना शर्म है, पीठ दिखाना धर्म।।
प्रेम कभी याचक नहीं, न ही याचना - दान।
प्रेम न प्रेमी से पृथक, प्रेम स्वयं भगवान।।
होती अन्धी वासना - वशीभूत जब वृत्ति।
होती हिरनाकुश - सदृश, असुरों की उत्पत्ति।।
जीवन मधुवन की हवा, जीवन संगीत।
जीवन अमृत - पान तब, जब जीवन से प्रीत।।
जीवन जगमग दिवास है, मौत अँधेरी रात।
जन्में दोनों साथ में चलते दोनों साथ।।
व्याही दसा जिन्दगी, बिना विवाही सौत।
आगे - पीछे चल रही, परछाई की मौत।।
मानव लोहा - वज्र है, मानव पत्थर - मोम।
मानव तारा - दीप है, मानव सूरज - सोम।।
लोभ - काम की बाढ़ में, घिरा फँसा संसार।
बही जा रही सभ्यता, तड़प रहे संस्कार।।
मिटे न कोरे ज्ञान से, भूख - ज्वाल विकराल।
पाणिनि प्रिय जब पेट में, पहुंचे रोटी - दाल।।
मैंने पूछा साधु से, क्या है यह संसार।
खाक हथेली पर रखा, फूँका हाथ पसार।।
आँगन ही देखो नहीं, देखो कभी पछीत।
कितने उगे बबूल या, लगे कहाँ भिड़ भीत।।
संबंधों की भीड़ में, सुख समीप भरपूर।
है सब कुछ तृण - तुल्य यदि माँ की ममता दूर।।
लघु दोहा प्रस्तुत करे, अमित अर्थ - विस्तार।
शहनाई प्रगटे यथा, बहुतक सुर - सिंगार।।

पता - 
दमदहा पुल के पास
कटनी मार्ग,
बरही म.प्र. - 483770 

वापसी

अनामिका

उन्होंने कहा - हैण्ड्स अप
एक - एक अंक फोड़कर मेरा
उन्होंने तलाशी ली।
मेरी तलाशी में क्या मिला उन्हें ?
थोड़े से सपने मिले और चाँद मिला-
सिगरेट की पन्नी - भर
माचिस - भर उम्मीद
एक अधूरी चिठ्ठी जो वे डी कोड नहीं कर पाए
क्योंकि वह सिंधु घाटी की सभ्यता के समय मैंने
लिखी थी -
एक अभेद्य लिपि में
अपनी धरती को-
हलो धरती, कही चलो धरती।
कोल्हू का बैल बने गोल - गोल घूमें हम कब तक?
आओ, अगिन बान - सा छूटें
ग्रहपथ से दूर।
उन्होंने चि_ी मरोड़ी
और मुझे कोच दिया कालकोठरी में।
अपनी कलम से लगाता
खोद रही हूं तबसे
कालकोठरी में सुरंग।
एक तरफ से तो खुद भी गई है वो पूरी।
ध्यान से जरा झुककर देखो -
दीख रही है कि नहीं दिखती
पतली रोशनी
 और खुली खिली घाटी।
वो कौन है कुहरे से घिरा ?
क्या हबीब तनवीर -
बुंदेली लोकगीत छीलते - तराशते,
तरकश में डालते।
नीचे कुछ बह भी रहा है।
क्या कोई छुपा हुआ सोता है।
सोते का पानी
हाथ बढ़ाने को उठता है
और ताजा खुदी इस सुरंग के
दौड़ आती है हवा।
कैसी खुशनुमा कनकनी है -
घास की हर नोंक पर।

सपनों के संसार बहुत है

योगेन्‍द्र वर्मा '' व्‍योम '' 

सपनों के संसार बहुत हैं।
मन में तोरणद्वार बहुत हंै।।

पोंछ किसी के बहते आँसू,
सम्मानों के हार बहुत हैं।

काँप रहे हैं भय से पत्ते,
आँधी को अधिकार बहुत हैं।

प्रेम - सत्य - ईमान सहजता,
ये सारे बीमार बहुत हैं।

स्वार्थ सिद्ध कर बने अपरिचित,
ऐसे रिश्तेदार बहुत हैं।

चुका नहीं सकता जीवन भर,
माँ तेरे उपकार बहुत हैं।

'' व्योम '' नहीं कर पाया अभिनय,
जीवन में किरदार बहुत हैं।
पता - 
पो.बा. 139, एल - 49,
सचिन स्वीट्स के पीछे
दीनदयाल नगर, फेज़ - प्रथम
कौंठ रोड, मुरादाबाद उ.प्र.
मोबाईल : 0941280598

मेरे तुम्‍हारे बीच

प्रो.फूलचंद गुप्‍ता

मेरे तुम्हारे बीच अब पर्दा नहीं रहा।
सचमुच कहें तो आगे भरोसा नहीं रहा।।

लो अब हमारे आपसी झगड़े $खतम हुए,
चर्चा के वास्ते कभी, मुद्दा नहीं रहा।

वह हो गया स्वच्छंद करे वो जो दिल कहे,
मासूमियत में कैद वह बच्चा नहीं रहा।

मुझको बड़ा गुमान था रिश्ता है खून का,
रिश्ता बचा रहा मगर ज्यादा नही रहा।

उष्म खत्म हुई है नसों में लहू तो है,
ऐसा नहीं कि बाप या बेटा नहीं रहा।
पता - 
बी - 7, आनंद बेंगलोस,
गायत्री मंदिर रोड, महावीर नगर,
हिम्मत नगर, एस.के.गुजरात,
मोबाईल : 094263 79499

काले - काले बादल भी ला

चॉंद शेरी

काले - काले बादल भी ला
उन नयनों का काजल भी ला
सच को ताले में रखना है
दरवाज़े की सांकल भी ला
सावन की रिमझिम रिमझिम में
छम - छम करती पायल भी ला
सूरज लेकर आने वाले
छाया वाला पीपल भी ला
भर कर ऊपर तक उल्$फत से
अपने मन की छागल भी ला
मीठी - मीठी बोली बोले
घर में ऐसी कोयल भी ला
शेरी अपनी $गज़लों में अब
गंगा - जमुना - चम्बल भी ला
पता - 
के 30 आई.पी.आई. ए.
रोड नं. -1, कोटा- 5, राजस्थान
मोबाईल : 09829098530

नवगीत

सलीम खॉ फ़रीद़ 
कब तक जय - जयकार करेगा
अब तो भर हुँकार।
कस कर मुठ्ठी बाँध, गगन से
बरस उठें अंगार।।
तहसीलों में फैल गया है
वंश, हरामी का।
भोले हा$िकम के सर पर,
सेहरा बदनामी का।
बढ़कर गर्दन रेत,
खेत रह जाए खरपतवार।।
अब से सुख की खेती होगी
प्रथा पलटनी है।
दु:ख के माथे पर मिल - जुलकर
शिला पटकनी है।
एक लड़ाई लड़नी तय है,
मौसम से इस बार।।
पता - 
हसामपुर सीकेर
राजस्थान - 332718,
मोबाईल : 9413070032,
09636871101

बरसों बाद

आनन्‍द तिवारी पौराणिक 
सोंधी माटी गाँव की
फिर आई याद
बरसों बाद

    छू - छूव्वल, गिल्ली डंडे
    गोल - गोल रंगीन कंचे
    अमराई में आम तोड़ना
    कागज की नाव, नदी में छोड़ना
    चिड़ियों सी चहकने की साध
    बरसों बाद

चुम्मा अम्मा का
हुम्मा बछिये का
नानी के हाथों भुने भुट्टे
भइया के दिए पैसे छुट्टे
मंदिर में कीर्तन, शंखनाद
बरसों बाद

    शाला में टंगी पेंडुलम घड़ी
    गुरुजी की वह बड़ी छड़ी
    जलसे, मेले - ठेले, हाट
    खुशियों की नहीं तादाद
    बरसों बाद

दीदी की लाई गठरी
स्वाद भरी मिठाई - मठरी
चिड़ियों का कलरव बंसवारे
सोनकिरन सुबह पांव पखारे
हर दिन था आबाद
बरसों बाद

    वह निश्छल, अबोध बचपन
    कितना पावन, तन - मन
    आँखों में फिर नर्त्तन करता
    अतीत को वर्तमान में करता
    प्रेम, सुलह, नहीं विवाद
    बरसों बाद
पता -
श्रीराम टाकीज मार्ग,
महासमुन्‍द (छ.ग.) 549
3445




दो व्‍यंग्‍य गज़ल़ें - अशोक ' अंजुम '

( 1  )
आये थे थानेदार जिन्हें कल लताड़ के।
वे ले गये मुहल्ले का खम्बा उखाड़ के।।
हैरत है रेस कछुए ही क्यों जीते बारहा,
देखे नहीं है रंग क्या तुमने जुगाड़ के।
कुनबा जुटा है करने खुदाई यहाँ - वहाँ,
अम्माजी चल बसी है कहीं माल गाड़ के।
बीमा करा लो, कह रही हूं कब से आप से,
बीबी ने कहा रात में मुझसे दहाड़ के।
पहरे पे था रखा जिसे हमने यकीन से,
वो ले गया निकाल के पल्ले किवाड़ के।
किन बन्दरों के हाथ में है संविधान उफ।़
डर है यही कि ये इसे रख दें न फाड़ के।
हर एक शा$ख पे है उल्लुओं का बसेरा,
रख दी है मेरे देश की सूरत बिगाड़ के।
( 2 )
सच रह - रह कर बाहर आया, बोतल खुल जाने के बाद।
दीवानों ने जश्र मनाया, बोतल खुल जाने के बाद।।
सारी कसमें, धरम - करम सब, इधर गये, उधर गये,
पण्डित जी ने मुर्गा खाया, बोतल खुल जाने के बाद।
बाबू टाल रहा था कब से, आज पकड़ में आया तब,
उसने फाइल को सरकाया, बोतल खुल जाने के बाद।
गूँगा बोला पंचम सुर में, लंगड़ा नाचा ठुमक - ठुमक,
और अँधे  ने तीर चलाया, बोतल खुल जाने के बाद।
परिभाषाएँ बदल गयी सब, उल्टा - पुल्टा सब आलम,
घूरे ने गुलशन महकाया, बोतल खुल जाने के बाद।
पल - पल नाक रगड़ने वाला वो चपरासी दफ्तर का,
आज साब जी पर गुर्राया, बोतल खुल जाने के बाद।
वो काकू जिनसे डरते थे सभी लफंगे बस्ती के,
उनने वल्गर लोक सुनाया, बोतल खुल जाने के बाद।
पता - स्ट्रीट 2, चन्द्रविहार कॉलोनी,
नगला डालचन्द, क्वार्सी बाइपास,
अलीगढ़ - 202127 उ.प्र.
मोबाईल : 09258779744,09358218907 

दो लघुकथाऍ - अंकुश्री

शक्ति परीक्षा 
श्मशान में एक तांत्रिक शक्ति की दूर - दूर तक चर्चा थी। एक खोजी पत्रकार ने तांत्रिक की शक्ति की सत्यता जांच करनी चाही। वह इसी उद्देश्य से श्मशान की ओर जा रहा था। वह अभी श्मशान पहुंचने ही वाला था कि सुनसान रास्ते में एक आदमी दिखायी दिया। उसे देख कर पत्रकार ठिठक गया। वह दुबला - पतला आदमी मैला - कुचैला कपड़ा पहने था। उसने सोचा कि पहले उसी आदमी से तांत्रिक के बारे में पूछ लिया जाये - सुना है, यहां एक बहुत शक्तिशाली तांत्रिक रहते हैं ?
उस आदमी के चेहरे पर प्रश्न से उत्पन्न कोई भाव दिखलायी नहीं दिया - मैं नहीं जानता। कहता वह आदमी श्मशान की विपरीत दिशा में चला गया। पत्रकार आगे बढ़ कर श्मशान पहुंच गया।
श्मशान पहुंच कर पत्रकार ने जो देखा, उससे वह दंग रह गया। तांत्रिक की खुली कुटिया में वही आदमी बैठा था, जो अभी - अभी रास्ते में मिला था। बिना पूछे उसे उत्तर मिल गया था। वह वहां से चुपचाप वापस आ गया।
संकरीकरण 
संकर बीज का प्रचलन जोर पकड़ चुका है। गरीब किसान ही परम्परागत बीज का प्रयोग कर रहे हैं। उसने आगे कहा - आज फल सब्जी और बीज के जो अनेक रुप दिखाई दे रहे हैं, वह हायब्रीड का परिणाम है।
- तो ?
- जाति और धर्म का भेद भूलकर फल, सब्जी और बीज की तरह अपना गुण और स्वरुप बदल डालो ...।
प्रकार की बातें छोड़ कर आकार के बारे में सुझायी गयी बातें उसे भी अच्छी लगने लगी। इसीलिए उसे मानी पड़ीं। परिणामत: वह शीघ्र ही जातिगत और धर्मगत संस्कृति से अलग हो गया। उसे एक ऐसे माहौल में आना पड़ गया, जहां न उसकी संस्कृति थी और न अपना समाज। लेकिन वह खुश था कि उसने परम्परा तोड़ दी है। परम्परा को तोड़ना ही वह उपलब्धि मान रहा था। उसके परिणाम का उसे न तो बोध था और न ही ज्ञान ही।

दो लघुकथाऍं - डॉ. अशोक गुजराती

समरूपता 
वे दोनों बड़े गहरे दोस्त हैं, जैसा कि आजकल हर मामूली मित्र के लिए एक ही सूक्ति इस्तेमाल होती है - बेस्ट फ्रेंड ... उससे कहीं अधिक।
एक प्रोफेसर हैं विश्वविद्यालय में। वे जनवादी संगठन से जुड़े हैं। जीवित राजनीतिक दलों के प्रति पूरी तरह तटस्थ। या तो प्रत्याशी की चारित्रिक विशेषता अथवा सही दिशा में कार्य कर रही पार्टी को अपना वोट देते रहे हंै।
दूसरे हैं पार्टी डीलर। सब जानते हैं कि इधर अचानक बढ़ती रही फ्लैैटों की कीमतों की वजह से प्रापर्टी डीलर अनायास रईस हो गये है। कुछ बेईमानी से तो कुछ प्रमाणिकता के बावजूद।
अलावा इसके वे एक पार्टी के मंडल अध्यक्ष भी हंै। वही पार्टी जिससे प्रोफेसर को सख्त नफरत हंै। उसें सिद्धांतों से उसके साम्प्रदायिक एवं हिन्दु राष्ट्रीयता के कारण।
फिर भी दोनों अभिन्न हंै। वैचारिक मतभेद है परन्तु मनभेद बिल्कुल नहीं। दो एक दिन मुलाकात न हो तो बेचैन हो जाते हैं। एक बार प्राफेसर ने इस पहेली का रहस्य जानने के उद्देश्य से अपने प्रिय मित्र से कांटे का सवाल पूछ ही लिया- यार ये बताओं कि हम इतने अच्छे दोस्त हंै- तुम्हारी पार्टी मुझे पसन्द नहीं। तुम कारोबारी- मैं अध्यापक, विचारों से कम्यूनिस्ट। दोनों में कहीं कोई सरीखापन दिखाई नहीं देता तब भी...
 उनके व्यापारी दोस्त ने पलक झपकते जवाब दिया- हम में कुछ सामान्य है इसीलिए...
प्रोफेसर ने आश्चर्य पूछा - क्या ?
दोस्त ने सहजता से उनका समाधान किया- हम दोनों में दो समानताएं है- ईमानदारी और बौद्धिकता।
प्रोफेसर सहमति में गर्दन हिलाते उसकी ओर अवाक्  देखते रह गये।
जाल

सरकार ने घोषित कर दिया कि अब सब्सिडी वाले गैस सेलेण्डर पूरी कीमत अदा करने पर मिलेंगे। सब्सिडी के पैसे सीधे आपके बैंक अकाउंट में जमा हो जायेंगे। इसके लिए आपको आधार कार्ड देकर उसे अपने बैंक अकाउंट से जोड़ना होगा।
श्रीमान जी की मुसीबत हो गयी। पिछले पैंतालीस सालों से जो सिलेण्डर उनके घर आ रहा था, वह उनके पिताजी के नाम पर है और उनके साथ रह रहे पिताजी का देहावसान हुए पच्चीस वर्ष हो चुके हैं। उनका आधार कार्ड तो होने से रहा। हां, उनके पास अपना है। डीलर ने कहा कि सिलेंडर आपके नाम पर करने के लिए एफिडेविट देना होगा कि अन्य उत्तराधिकारियों को कोई एतराज नहीं है।
यह बेहद मुश्किल था। उनके सबसे बड़े भाई और बहन की मौत हो चुकी थी।उनका मृत्यु प्रमाण पत्र उनको दिल्ली से गोवा और इंदौर जाकर भतीजों - भांजों से जुटाना होगा। उनकी सहमति के साथ दूसरे नंबर के भाई महाराष्ट्र में बुढ़ापा गुजार रहे हैं लेकिन उनसे इनके रिश्ते सामान्य नहीं है। बड़ी एक बहन उत्तर प्रदेश में और उनसे छोटी गुजरात में है। इन सबसे संपर्क करना और एक अदने से गैस सेलेण्डर की विरासत साबित करना उनकी उम्र के व्यक्ति के वास्ते न सिर्फ कठिन है, बेहद खर्चीला और वक्त खाने वाला भी। साथ ही इन सब को राजी करने हेतु चिरौरी अलग से करनी पड़ेगी जो भयंकर तकलीफदेह है। इस पर तुर्रा यह कि सभी गैस कंपनियों के नये कनेक्शन देना बंद कर रखा है।
मरता क्या न करता ... इस गलत व्यवस्था के जाल से सुरक्षित निकलने का एक ही तरीका था - झूठा ऐफिडेविट बनवा लेना कि वे ही अकेले वारिस हंै ... चाहे उन्हें इसके चलते अपनी अद्यतन शाश्वत ईमानदारी का गला घोटना पड़े .....? 
पता - बी - 40, एफ - 1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली - 110095,
मोबाईल : 0997144164 मेल : ashokgujrati07@gmail.com
  

बदलती हवा

राजेन्‍द्र मोहन त्रिवेदी ' बन्‍धु ' 
हरीश जब कार्यालय से लौटा। माँ को उदास देखकर पूछा - मम्मी,क्या बात है। आज तुम उदास लग रही हो?
- क्या कहूं, बहू अब मेरी कोई बात नहीं सुनती। वह वही करती है जो उसे ठीक लगता है। हमारे कहने का उस पर कोई असर नहीं होती। मन की पीड़ा को बेटे के समक्ष उगल दिया।
- क्या करुं मम्मी, पढ़ी - लिखी, बड़े घर की बेटी होने के कारण मेरा भी कहना कहाँ सुनती है। उल्टा मुझसे ही सारे काम करवाने की इच्छा रखती है। उसे जब पैसा चाहिए तभी ढंग से बात करती है। अपनी विवशता बता रहा था कि उसकी पत्नी का कर्कश स्वर गूंजा - अब वहीं खड़े होकर भाषण देते रहोगे या अन्दर भी आओगे? सुबह जो काम कहे थे उसका क्या हुआ? हंगामा न हो जाए यह सोचकर हरीश पत्नी की ओर बढ़ गया।
उसके जाते ही माँ सोचने लगी - यह तो स्वयं पत्नी से घबराता है। उसे समझायेगा कैसे ... ? वह दुखी हो उठी, आगे का जीवन ऐसा ही कटेगा? उसकी दृष्टि  कमरे में रखी देवता की मूर्ति पर चली गई। भरी आँखों से उसने कमरे की बत्ती बुझा दी।
पता - 331, निराला नगर, निकट हनुमान मन्दिर,
रायबरेली - 229001
मोबाईल : 09005622219

उसकी रोटी

मोहन राकेश 
बालो को पता था कि अभी बस के आने में बहुत देर है। फिर भी पल्ले से पसीना पोंछते हुए उसकी आँखें बार - बार सड़क की तरफ उठ जाती थीं। नकोदर रोड के उस हिस्से में आसपास कोई छायादार पेड़ भी नहीं था। वहाँ की जमीन भी बंजर और ऊबड़ - खाबड़ थी । खेत वहाँ से तीस - चालीस गज के फासले से शुरू होते थे। और खेतों में भी उन दिनों कुछ नहीं था। $फसल कटने के बाद सिर्फ  जमीन की गोड़ाई ही की गयी थी। इसलिए चारों तरफ  बस मटियालापन ही नजर आता था। गरमी से पिघली हुई नकोदर रोड का हल्का सुरमई रंग ही उस मटियालेपन से जरा अलग था। जहाँ बालो खड़ी थी वहाँ से थोड़े फासले पर एक लकड़ी का खोखा था। उसमें पानी के दो बड़े - बड़े मटकों के पास बैठा एक अधेड़ - सा व्यक्ति ऊँघ रहा था। ऊँघ में वह आगे को गिरने को होता तो सहसा झटका खाकर सँभल जाता। फिर आसपास के वातावरण पर एक उदासी सी नज़र डालकर और अंगोछे से गले का पसीना पोंछकर वैसे ही ऊँघने लगता। एक तरफ अढ़ाई तीन फुट में खोखे की छाया फैली थी और एक भिखमंगा जिसकी दाढ़ी काफी बढ़ी हुई थी। खोखे से टेक लगाये ललचाई आँखों से बालो के हाथों की तरफ  देख रहा था। उसके पास ही एक कुत्ता दुबककर बैठा था,और उसकी नज़र भी बालो के हाथों की तरफ थी।
बालो ने हाथ की रोटी को मैले आँचल में लपेट रखा था। वह उसे बद नज़र से बचाये रखना चाहती थी। रोटी वह अपने पति सुच्चासिंह ड्राइवर के लिए लायी थी। मगर देर हो जाने से सुच्चासिंह की बस निकल गयी थी और वह अब इस इन्तज़ार में खड़ी थी कि बस नकोदर से होकर लौट आये,तो वह उसे रोटी दे दे। वह जानती थी कि उसके वक्त पर न पहुँचने से सुच्चासिंह को बहुत गुस्सा आया होगा। वैसे ही उसकी बस जालन्धर से चलकर दो बजे वहाँ आती थी। और उसे नकोदर पहुँचकर रोटी खाने में तीन - साढ़े तीन बज जाते थे। वह उसकी रात की रोटी भी उसे साथ ही देती थी जो वह आखिरी फेरे में नकोदर पहुँचकर खाता था। सात दिन में छ: दिन सुच्चासिंह की ड्यूटी रहती थी,और छहों दिन वही सिलसिला चलता था। बालो एक - सवा एक बजे रोटी लेकर गाँव से चलती थी और धूप में आधा कोस तय करके दो बजे से पहले सडक़ के किनारे पहुँच जाती थी। अगर कभी उसे दो - चार मिनट की देर हो जाती तो सुच्चासिंह किसी न किसी बहाने बस को वहाँ रोके रखता मगर उसके आते ही उसे डाँटने लगता कि वह सरकारी नौकर है। उसके बाप का नौकर नहीं कि उसके इन्तजार में बस खड़ी रखा करे। वह चुपचाप उसकी डाँट सुन लेती और उसे रोटी दे देती।
मगर आज वह दो - चार मिनट की नहीं, दो - अढ़ाई घंटे की देर से आयी थी। यह जानते हुए भी कि उस समय वहाँ पहुँचने का कोई मतलब नहीं। वह अपनी बेचैनी में घर से चल दी थी। उसे जैसे लग रहा था कि वह जितना वक्त सडक के किनारे इन्तजार करने में बिताएगी, सुच्चासिंह की नाराजगी उतनी ही कम हो जाएगी। यह तो निश्चित ही था कि सुच्चासिंह ने दिन की रोटी नकोदर के किसी तन्दूर में खा ली होगी। मगर उसे रात की रोटी देना जरूरी था और साथ ही वह सारी बात बताना भी जिसकी वजह से उसे देर हुई थी। वह पूरी घटना को मन ही मन दोहरा रही थी और सोच रही थी कि सुच्चासिंह से बात किस तरह कही जाए कि उसे सब कुछ पता भी चल जाए और वह खामखाह तैश में भी न आये। वह जानती थी कि सुच्चासिंह का गुस्सा बहुत खराब है और साथ ही यह भी कि जंगी से उलटा - सीधा कुछ कहा जाए तो वह बगैर गंड़ासे के बात नहीं करता।
जंगी के बारे में बहुत - सी बातें सुनी जाती थीं। पिछले साल वह साथ के गाँव की एक मेहरी को भगाकर ले गया था और न जाने कहाँ ले जाकर बेच आया था। फिर नकोदर के पंडित जीवाराम के साथ उसका झगड़ा हुआ तो उसे उसने कत्ल करवा दिया। गाँव के लोग उससे दूर - दूर रहते थे, मगर उससे बिगाड़ नहीं रखते थे। मगर उस आदमी की लाख बुराइयाँ सुनकर भी उसने यह कभी नहीं सोचा था कि वह इतनी गिरी हुई हरकत भी कर सकता है कि चौदह साल की जिन्दां को अकेली देखकर उसे छेडने की कोशिश करे। वह यूँ भी जिन्दां से तिगुनी उम्र का था और अभी साल भर पहले तक उसे बेटी - बेटी कहकर बुलाया करता था। मगर आज उसकी इतनी हिम्मत पड़ गयी कि उसने खेत में से आती जिन्दां का हाथ पकड़ लिया
उसने जिन्दां को नन्ती के यहाँ से उपले माँग लाने को भेजा था। इनका घर खेतों के एक सिरे पर था और गाँव के बाकी घर दूसरे सिरे पर थे। वह आटा गूँधकर इन्तजार कर रही थी कि जिन्दां उपले लेकर आये, तो वह जल्दी से रोटियाँ सेंक ले जिससे बस के वक्त से पहले सडक़ पर पहुँच जाए। मगर जिन्दां आयी, तो उसके हाथ खाली थे और उसका चेहरा हल्दी की तरह पीला हो रहा था। जब तक जिन्दां नहीं आयी थी। उसे उस पर गुस्सा आ रहा था। मगर उसे देखते ही उसका दिल एक अज्ञात आशंका से काँप गया।
- क्या हुआ है जिन्दो, ऐसे क्यों हो रही है ? उसने ध्यान से उसे देखते हुए पूछा।
जिन्दां चुपचाप उसके पास आकर बैठ गयी और बाँहों में सिर डालकर रोने लगी।
- ख़सम खानी,कुछ बताएगी भी,क्या बात हुई है?
जिन्दां कुछ नहीं बोली। सिर्फ  उसके रोने की आवाज तेज हो गयी।
- किसी ने कुछ कहा है तुझसे? उसने अब उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
- तू मुझे उपले - वुपले लेने मत भेजा कर। जिन्दां रोने के बीच उखड़ी - उखड़ी आवाज में बोली। मैं आज से घर से बाहर नहीं जाऊँगी। मुआ जंगी आज मुझसे कहता था.... और गला रुँध जाने से वह आगे कुछ नहीं कह सकी।
- क्या कहता था जंगी तुझसे .... बता .... बाल.... वह जैसे एक बोझ के नीचे दबकर बोलीं। ख़सम खानी, अब बोलती क्यों नहीं?
- वह कहता था, जिन्दां सिसकती रही। चल जिन्दां अन्दर चलकर शरबत पी ले। आज तू बहुत सोहणी लग रही है।
- मुआ कमज़ात! वह सहसा उबल पड़ी। मुए को अपनी माँ रंडी नहीं सोहणी लगती। मुए की नजर में कीड़े पड़ें। निपूते, तेरे घर में लडक़ी होती, तो इससे बड़ी होती। तेरे दीदे फटें! फिर तूने क्या कहा ?
- मैंने कहा चाचा, मुझे प्यास नहीं है। जिन्दां कुछ सँभलने लगी।
- फिर
- कहने लगा प्यास नहीं है, तो भी एक घूँट पी लेना। चाचा का शरबत पिएगी तो याद करेगी। और मेरी बाँह पकडक़र खींचने लगा।
- हाय रे मौत -मरे, तेरा कुछ न रहे, तेरे घर में आग लगे। आने दे सुच्चासिंह को। मैं तेरी बोटी - बोटी न नुचवाऊँ तो कहना। जल मरे! तू सोया सो ही जाए।
-हाँ, फिर...
-मैं बाँह छुड़ाने लगी तो मुझे मिठाई का लालच देने लगा। मेरे हाथ से उपले वहीं गिर गये। मैंने उन्हें वैसे ही पड़े रहने दिया और बाँह छुड़ाकर भाग आयी।
उसने ध्यान से जिन्दां को सिर से पैर तक देखा और फिर अपने साथ सटा लिया।
- और तो नहीं कुछ कहा उसने।
- जब मैं थोड़ी दूर निकल आयी तो पीछे से ही - ही करके बोला - बेटी, तू बुरा तो नहीं मान गयी? अपने उपले तो उठाकर ले जा। मैं तो तेरे साथ हँसी कर रहा था। तू इतना भी नहीं समझती ? चल, आ इधर। नहीं आती, तो मैं आज तेरे घर आकर तेरी बहन से शिकायत करूँगा कि जिन्दां बहुत गुस्ताख़ हो गयी है। कहा नहीं मानती। .... मगर मैंने उसे न जवाब दिया, न मुड़कर उसकी तरफ  देखा। सीधी घर चली आयी।
- अच्छा किया। मैं मुए की हड्डी - पसली एक कराकर छोड़ूँगी। तू आने दे सुच्चासिंह को। मैं अभी जाकर उससे बात करूँगी। इसे यह नहीं पता कि जिन्दां सुच्चा सिंह ड्राइवर की साली है, जरा सोच - समझकर हाथ लगाऊँ। फिर कुछ सोचकर उसने पूछा-  वहाँ तुझे और किसी ने तो नहीं देखा?
- नहीं। खेतों के इस तरफ  आम के पेड़ के नीचे राधू चाचा बैठा था। उसने देखकर पूछा कि बेटी- इस वक्त धूप में कहाँ से आ रही है, तो मैंने कहा कि बहन के पेट में दर्द था। हकीमजी से चूरन लाने गयी थी।
- अच्छा किया। मुआ जंगी तो शोहदा है। उसके साथ अपना नाम जुड़ जाए तो अपनी ही इज़्ज़त जाएगी। उस सिर - जले का क्या जाना है? लोगों को तो करने के लिए बात चाहिए।
उसके बाद उपले लाकर खाना बनाने में उसे काफी देर हो गयी। जिस वक्त उसने कटोरे में आलू की तरकारी और आम का अचार रखकर उसे रोटियों के साथ खद्दर के टुकड़े में लपेटा। उसे पता था कि दो कब के बज चुके हैं और वह दोपहर की रोटी सुच्चासिंह को नहीं पहुँचा सकती। इसलिए वह रोटी रखकर इधर - उधर के काम करने लगी। मगर जब बिलकुल खाली हो गयी तो उससे यह नहीं हुआ कि बस के अन्दाजे से घर से चले। मुश्किल से साढ़े तीन - चार ही बजे थे कि वह चलने के लिए तैयार हो गयी।
- बहन, तू कब तक आएगी ? जिन्दां ने पूछा।
- दिन ढलने से पहले ही आ जाऊँगी।
- जल्दी आ जाना। मुझे अकेले डर लगेगा।
- डरने की क्या बात है ? वह दिखावटी साहस के साथ बोली - किसकी हिम्मत है जो तेरी तरफ  आँख उठाकर भी देख सके ? सुच्चासिंह को पता लगेगा तो वह उसे कच्चा ही नहीं चबा जाएगा। वैसे मुझे ज़्यादा देर नहीं लगेगी। साँझ से पहले ही घर पहुँच जाऊँगी। तू ऐसा करना कि अन्दर से साँकल लगा लेना। समझी। कोई दरवाजा खटखटाए तो पहले नाम पूछ लेना। फिर उसने जरा धीमे स्वर में कहा - और अगर जंगी आ जाए, और मेरे लिए पूछे कि कहाँ गयी है। तो कहना कि सुच्चासिंह को बुलाने गयी है। समझी ... पर नहीं। तू उससे कुछ नहीं कहना। अन्दर से जवाब ही नहीं देना समझी।
वह दहलीज के पास पहुँची तो जिन्दां ने पीछे से कहा- बहन, मेरा दिल धडक़ रहा है।
- तू पागल हुई है। उसने उसे प्यार के साथ झिडक दिया - साथ गाँव है, फिर डर किस बात का है ? और तू आप भी मुटियार है। इस तरह घबराती क्यों है?
मगर जिन्दां को दिलासा देकर भी उसकी अपनी तसल्ली नहीं हुई। सडक़ के किनारे पहुँचने के वक्त से ही वह चाह रही थी कि किसी तरह बस जल्दी से आ जाए जिससे वह रोटी देकर झटपट जिन्दां के पास वापस पहुँच जाए।
- वीरा, दो बजे वाली बस को गये कितनी देर हुई है? उसने भिखमंगे से पूछा जिसकी आँखें अब भी उसके हाथ की रोटी पर लगी थीं। धूप की चुभन अभी कम नहीं हुई थी, हालाँकि खोखे की छाया अब पहले से काफी लम्बी हो गयी थी। कुत्ता प्याऊ के त$ख्ते के नीचे पानी को मुँह लगाकर अब आसपास चक्कर काट रहा था।
- पता नहीं भैणा, भिखमंगे ने कहा - कई बसें आती हैं। कई जाती हैं। यहाँ कौन घड़ी का हिसाब है!
बालो चुप हो रही। एक बस अभी थोड़ी ही देर पहले नकोदर की तरफ  गयी थी। उसे लग रहा था धूल के फैलाव के दोनों तरफ  दो अलग - अलग दुनिया हैं। बसें एक दुनिया से आती हैं और दूसरी दुनिया की तरफ  चली जाती हैं। कैसी होंगी वे दुनियाँ जहाँ बड़े - बड़े बाजार हैं, दुकानें हैं, और जहाँ एक ड्राइवर की आमदनी का तीन - चौथाई हिस्सा हर महीने खर्च हो जाता है ?  देवी अक्सर कहा करता था कि सुच्चासिंह ने नकोदर में एक रखैल रख रखी है। उसका कितना मन होता था कि वह एक बार उस औरत को देखे। उसने एक बार सुच्चासिंह से कहा भी था कि उसे वह नकोदर दिखा दे पर सुच्चासिंह ने डाँटकर जवाब दिया था - क्यों, तेरे पर निकल रहे हैं ? घर में चैन नहीं पड़ता। सुच्चासिंह वह मरद नहीं है कि औरत की बाँह पकडक़र उसे सडक़ों पर घुमाता फिरे। घूमने का ऐसा ही शौक है तो दूसरा खसम कर ले। मेरी तरफ  से तुझे खुली छुट्टी है।
उस दिन के बाद वह यह बात जबान पर भी नहीं लायी थी। सुच्चासिंह कैसा भी हो। उसके लिए सब कुछ वही था। वह उसे गालियाँ दे लेता था। मार - पीट लेता था फिर भी उससे इतना प्यार तो करता था कि हर महीने तनख़ाह मिलने पर उसे बीस रुपये दे जाता था। लाख बुरी कहकर भी वह उसे अपनी घरवाली तो समझता था! जबान का कड़वा भले ही हो पर सुच्चासिंह दिल का बुरा हरगिज नहीं था। वह उसके जिन्दां को घर में रख लेने पर अक्सर कुढ़ा करता था। मगर पिछले महीने खुद ही जिन्दां के लिए काँच की चूडिय़ाँ और अढ़ाई गज़ मलमल लाकर दे गया था।
एक बस धूल उड़ाती आकाश के उस छोर से इस तरफ  को आ रही थी। बालो ने दूर से ही पहचान लिया कि वह सुच्चासिंह की बस नहीं है। फिर भी बस जब तक पास नहीं आ गयी। वह उत्सुक आँखों से उस तरफ  देखती रही। बस प्याऊ के सामने आकर रुकी। एक आदमी प्याज और शलगम का गट्ठर लिये बस से उतरा। फिर कंडक्टर ने जोर से दरवाजा बन्द किया और बस आगे चल दी। जो आदमी बस से उतरा था। उसने प्याऊ के पास जाकर प्याऊ वाले को जगाया और चुल्लू से दो लोटे पानी पीकर मूँछें साफ  करता हुआ अपने गट्ठर के पास लौट आया।
- वीरा, नकोदर से अगली बस कितनी देर में आएगी ? बालो ने दो कदम आगे जाकर उस आदमी से पूछ लिया।
- घंटे - घंटे के बाद बस चलती है, माई। वह बोला - तुझे कहाँ जाना है ?
- जाना नहीं है वीरा, बस का इन्तजार करना है। सुच्चासिंह ड्राइवर मेरा घरवाला है। उसे रोटी देनी है।
- ओ सुच्चा स्यों! और उस आदमी के होंठों पर खास तरह की मुस्कराहट आ गयी।
- तू उसे जानता है?
- उसे नकोदर में कौन नहीं जानता?
बालो को उसका कहने का ढंग अच्छा नहीं लगा इसलिए वह चुप हो रही। सुच्चासिंह के बारे में जो बातें वह खुद जानती थी। उन्हें दूसरों के मुँह से सुनना उसे पसन्द नहीं था। उसे समझ नहीं आता था कि दूसरों को क्या हक है कि वे उसके आदमी के बारे में इस तरह बात करें?
- सुच्चासिंह शायद अगली बस लेकर आएगा ? वह आदमी बोला।
- हाँ! इसके बाद अब उसी की बस आएगी।
- बड़ा जालिम है जो तुझसे इस तरह इन्तजार कराता है।
- चल वीरा, अपने रास्ते चल! बालो चिढक़र बोली - वह क्यों इन्तजार कराएगा? मुझे ही रोटी लाने में देर हो गयी थी जिससे बस निकल गयी। वह बेचारा सवेरे से भूखा बैठा होगा।
- भूखा, कौन सुच्चा स्यों। और वह व्यक्ति दाँत निकालकर हँस दिया। बालो ने मुँह दूसरी तरफ  कर लिया। या साईं सच्चे! कहकर उस आदमी ने अपना गट्ठर सिर पर उठा लिया और खेतों की पगडंडी पर चल दिया। बालो की दाईं टाँग सो गयी थी। उसने भार दूसरी टाँग पर बदलते हुए एक लम्बी साँस ली और दूर तक के वीराने को देखने लगी।
न जाने कितनी देर बाद आकाश के उसी कोने से उसे दूसरी बस अपनी तरफ  आती नजर आयी। तब तक खड़े - खड़े उसके पैरों की एडियाँ दुखने लगी थीं। बस को देखकर वह पोटली का कपड़ा ठीक करने लगी। उसे अफसोस हो रहा था कि वह रोटियाँ कुछ और देर से बनाकर क्यों नहीं लायी, जिससे वे रात तक कुछ और ताजा रहतीं। सुच्चासिंह को कड़ाह परसाद का इतना शौक है। उसे क्यों यह ध्यान नहीं आया कि आज थोड़ा कड़ाह परसाद ही बनाकर ले आये ... ख़ैर, कल गुर परब है। कल जरूर कड़ाह परसाद बनाकर लाएगी।
पीछे गर्द की लम्बी लकीर छोड़ती हुई बस पास आती जा रही थी। बालो ने बीस गज दूर से ही सुच्चासिंह का चेहरा देखकर समझ लिया कि वह उससे बहुत नाराज है। उसे देखकर सुच्चासिंह की भवें तन गयी थीं और निचले होंठ का कोना दाँतों में चला गया था। बालो ने धडक़ते दिल से रोटी वाला हाथ ऊपर उठा दिया। मगर बस उसके पास न रुककर प्याऊ से जरा आगे जाकर रुकी।
दो - एक लोग वहाँ बस से उतरने वाले थे। कंडक्टर बस की छत पर जाकर एक आदमी की साइकिल नीचे उतारने लगा। बालो तेजी से चलकर ड्राइवर की सीट के बराबर पहुँच गयी।
- सुच्चा स्यां! उसने हाथ ऊँचा उठाकर रोटी अन्दर पहुँचाने की चेष्टा करते हुए कहा- रोटी ले ले।
- हट जा, सुच्चासिंह ने उसका हाथ झटककर पीछे हटा दिया।
- सुच्चा स्यां, एक मिनट नीचे उतरकर मेरी बात सुन ले। आज एक खास वजह हो गयी थी। नहीं तो मैं।
- बक नहीं, हट जा यहाँ से। कहकर सुच्चासिंह ने कंडक्टर से पूछा कि वहाँ का सारा सामन उतर गया है या नहीं।
- बस एक पेटी बाकी है, उतार रहा हूँ, कंडक्टर ने छत से आवाज दी।
- सुच्चा स्यां, मैं दो घंटे से यहाँ खड़ी हूँ। बालो ने मिन्नत के लहजे में कहा - तू नीचे उतरकर मेरी बात तो सुन ले।
- उतर गयी पेटी सुच्चासिंह ने फिर कंडक्टर से पूछा।
- हाँ, चलो। पीछे से कंडक्टर की आवाज आयी।
- सुच्चा स्यां! तू मुझ पर नाराज हो ले, पर रोटी तो रख ले। तू मंगलवार को घर आएगा तो मैं तुझे सारी बात बताऊँगी। बालो ने हाथ और ऊँचा उठा दिया।
- मंगलवार को घर आएगा तेरा। और एक मोटी - सी गाली देकर सुच्चासिंह ने बस स्टार्ट कर दी।
दिन ढलने के साथ - साथ आकाश का रंग बदलने लगा था। बीच - बीच में कोई एकाध पक्षी उड़ता हुआ आकाश को पार कर जाता था। खेतों में कहीं - कहीं रंगीन पगडिय़ाँ दिखाई देने लगी थीं। बालो ने प्याऊ से पानी पिया और आँखों पर छींटे मारकर आँचल से मुँह पोंछ लिया। फिर प्याऊ से कुछ फासले पर जाकर खड़ी हो गयी। वह जानती थी। अब सुच्चासिंह की बस जालन्धर से आठ - नौ बजे तक वापस आएगी। क्या तब तक उसे इन्तजार करना चाहिए। सुच्चासिंह को इतना तो करना चाहिए था कि उतरकर उसकी बात सुन लेता। उधर घर में जिन्दां अकेली डर रही होगी। मुआ जंगी पीछे किसी बहाने से आ गया तो ? सुच्चासिंह रोटी ले लेता तो वह आधे घंटे में घर पहुँच जाती। अब रोटी तो वह बाहर कहीं न कहीं खा ही लेगा मगर उसके गुस्से का क्या होगा? सुच्चासिंह का गुस्सा बेजा भी तो नहीं है। उसका मेहनती शरीर है और उसे कसकर भूख लगती है। वह थोड़ी और मिन्नत करती तो वह जरूर मान जाता। पर अब प्याऊ वाला प्याऊ बन्द कर रहा था। भिखमंगा भी न जाने कब का उठकर चला गया था। हाँ, कुत्ता अब भी वहाँ आसपास घूम रहा था। धूप ढल रही थी और आकाश में उड़ते चिडियों के झुंड सुनहरे लग रहे थे। बालो को सडक के पार तक फैली अपनी छाया बहुत अजीब लग रही थी। पास के किसी खेत में कोई गभरू जवान खुले गले से माहिया गा रहा था
बोलण दी थां कोई नां
जिहड़ा सानूँ ला दे दित्ता
उस रोग दा नां कोई नां।
माहिया की वह लय बालो की रग - रग में बसी हुई थी। बचपन में गरमियों की शाम को वह और बच्चों के साथ मिलकर रहट के पानी की धार के नीचे नाच - नाचकर नहाया करती थी तब भी माहिया की लय इसी तरह हवा में समाई रहती थी। साँझ के झुटपुटे के साथ उस लय का एक खास ही सम्बन्ध था। फिर ज्यों - ज्यों वह बड़ी होती गयी। जिन्दगी के साथ उस लय का सम्बन्ध और गहरा होता गया। उसके गाँव का युवक लाली था जो बड़ी लोच के साथ माहिया गाया करता था। उसने कितनी बार उसे गाँव के बाहर पीपल के नीचे कान पर हाथ रखकर गाते सुना था। पुष्पा और पारो के साथ वह देर - देर तक उस पीपल के पास खड़ी रहती थी। फिर एक दिन आया जब उसकी माँ कहने लगी कि वह अब बड़ी हो गयी है उसे इस तरह देर - देर तक पीपल के पास नहीं खड़ी रहना चाहिए। उन्हीं दिनों उसकी सगाई की भी चर्चा होने लगी। जिस दिन सुच्चासिंह के साथ उसकी सगाई हुई। उस दिन पारो आधी रात तक ढोलक पर गीत गाती रही थी। गाते - गाते पारो का गला रह गया था फिर भी वह ढोलक छोडने के बाद उसे बाँहों में लिये हुए गाती रही थी.
बीबी चन्नण दे ओहले ओहले किऊँ खड़ी
नीं लाडो किऊँ खड़ी
मैं तां खड़ी सां बाबल जी दे बार
मैं कनिआ कँवार
बाबल वर लोड़िए।
नीं जाइए, किहो जिहा वह लीजिए
जिऊँ तारिआँ विचों चन्द
चन्दा विचों नन्द
नन्दां विचों कान्हकन्हैया वर लीड़िए!
वह नहीं जानती थी कि उसका वर कौन है, कैसा है, फिर भी उसका मन कहता था कि उसके वर की सूरत - शक्ल ठीक वैसी ही होगी जैसी कि गीत की कडियाँ सुनकर सामने आती हैं। सुहागरात को जब सुच्चासिंह ने उसके चेहरे से घूँघट हटाया तो उसे देखकर लगा कि वह सचमुच बिलकुल वैसा ही कान्ह - कन्हैया वर पा गयी है। सुच्चासिंह ने उसकी ठोड़ी ऊँची की तो न जाने कितनी लहरें उसके सिर से उठकर पैरों के नाख़ूनों में जा समाईं। उसे लगा कि जिन्दगी न जाने ऐसी कितनी सिहरनों से भरी होगी जिन्हें वह रोज - रोज महसूस करेगी और अपनी याद में सँजोकर रखती जाएगी।
- तू हीरे की कणी है, हीरे की कणी। सुच्चासिंह ने उसे बाँहों में भरकर कहा था।
उसका मन हुआ था कि कहे - यह हीरे की कणी तेरे पैर की धूल के बराबर भी नहीं है, मगर वह शरमाकर चुप रह गयी थी।
- माई, अँधेरा हो रहा है। अब घर जा। यहाँ खड़ी क्या कर रही है ? प्याऊ वाले ने चलते हुए उसके पास रुककर कहा।
- वीरा, यह बस आठ - नौ बजे तक जालन्धर से लौटकर आ जाएगी न ? बालो ने दयनीय भाव से उससे पूछ लिया।
- क्या पता कब तक आए ? तू उतनी देर यहाँ खड़ी रहेगी?
- वीरा, उसकी रोटी जो देनी है।
- उसे रोटी लेनी होती, तो ले न लेता ? उसका तो दिमाग ही आसमान पर चढ़ा रहता है।
- वीरा, मर्द कभी नाराज हो ही जाता है। इसमें ऐसी क्या बात है?
- अच्छा खड़ी रह, तेरी मर्जी। बस नौ से पहले क्या आएगी!
- चल, जब भी आए।
प्याऊ वाले से बात करके वह निश्चय खुद ब खुद हो गया जो वह अब तक नहीं कर पायी थी। कि उसे बस के जालन्धर से लौटने तक वहाँ रुकी रहना है। जिन्दां थोड़ा डरेगी। इतना ही तो न जंगी की अब दोबारा उससे कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ सकती। आखिर गाँव की पंचायत भी तो कोई चीज है। दूसरे की बहन - बेटी पर बुरी नजर रखना मामूली बात है ? सुच्चासिंह को पता चल जाए तो वह उसे केशों से पकडक़र सारे गाँव में नहीं घसीट देगा मगर सुच्चासिंह को यह बात न बताना ही शायद बेहतर होगा। क्या पता इतनी - सी बात से दोनों में सिर फुटव्वल हो जाए। सुच्चासिंह पहले ही घर के झंझटों से घबराता है। उसे और झंझट में डालना ठीक नहीं। अच्छा हुआ जो उस वक्त सुच्चासिंह ने बात नहीं सुनी। वह तो अभी कह रहा था कि मंगलवार को घर नहीं आएगा। अगर वह सचमुच न आया तो? और अगर उसने गुस्से होकर घर आना बिलकुल छोड़ दिया तो ? नहीं, वह उसे कभी कोई परेशान करनेवाली बात नहीं बताएगी। सुच्चासिंह ख़ुश रहे, घर की परेशानियाँ वह ख़ुद सँभाल सकती है।
वह जरा सा सिहर गयी। गाँव का लोटूसिंह अपनी बीबी को छोडक़र भाग गया था। उसके पीछे वह टुकड़े - टुकड़े को तरस गयी थी। अन्त में उसने कुएँ में छलाँग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पानी से फूलकर उसकी देह कितनी भयानक हो गयी थी ?
उसे थकान महसूस हो रही थी इसलिए वह जाकर प्याऊ के त$ख्ते पर बैठ गयी। अँधेरा होने के साथ - साथ खेतों की हलचल फिर शान्त होती जा रही थी। माहिया के गीत का स्थान अब झींगुरों के संगीत ने ले लिया था। एक बस जालन्धर की तरफ  से और एक नकोदर की तरफ  से आकर निकल गयी। सुच्चासिंह जालन्धर से आखिरी बस लेकर आता था। उसने पिछली बस के ड्राइवर से पता कर लिया था कि अब जालन्धर से एक ही बस आनी रहती है। अब जिस बस की बत्तियाँ दिखाई देंगी, वह सुच्चासिंह की ही बस होगी। थकान के मारे उसकी आँखें मुँदी जा रही थीं। वह बार - बार कोशिश से आँखें खोलकर उन्हें दूर तक के अँधेरे और उन काली छायाओं पर केन्द्रित करती जो धीरे - धीरे गहरी होती जा रही थीं। जरा सी भी आवाज होती तो उसे लगता कि बस आ रही है और वह सतर्क हो जाती। मगर बत्तियों की रोशनी न दिखाई देने से एक ठंडी साँस भर फिर से निढाल हो रहती। दो - एक बार मुँदी हुई आँखों से जैसे बस की बत्तियाँ अपनी ओर आती देखकर वह चौंक गयी मगर बस नहीं आ रही थी। फिर उसे लगने लगा कि वह घर में है और कोई जोर - जोर से घर के किवाड़ खटखटा रहा है। जिन्दां अन्दर सहमकर बैठी है। उसका चेहरा हल्दी की तरह पीला हो रहा है। हट के बैल लगातार घूम रहे हैं। उनकी घंटियों की ताल के साथ पीपल के नीचे बैठा एक युवक कान पर हाथ रखे माहिया गा रहा है। जोर की धूल उड़ रही है जो धरती और आकाश की हर चीज को ढके ले रही है। वह अपनी रोटी वाली पोटली को सँभालने की कोशिश कर रही है मगर वह उसके हाथ से निकलती जा रही है। प्याऊ पर सूखे मटके रखे हैं जिनमें एक बूँद भी पानी नहीं है। वह बार - बार लोटा मटके में डालती है पर उसे खाली पाकर निराश हो जाती है। उसके पैरों में बिवाइयाँ फूट रही हैं। वह हाथ की उँगली से उन पर तेल लगा रही है मगर लगाते - लगाते ही तेल सूखता जाता है। जिन्दां अपने खुले बाल घुटनों पर डाले रो रही है। कह रही है - तू मुझे छोडक़र क्यों गयी थी? क्यों गयी थी मुझे छोडकर ? हाय, मेरा परांदा कहाँ गया। मेरा परांदा किसने ले लिया ?
सहसा कन्धे पर हाथ के छूने से वह चौंक गयी।
- सुच्चा स्यां! उसने जल्दी से आँखों को मल लिया।
- तू अब तक घर नहीं गयी? सुच्चासिंह त$ख्ते पर उसके पास ही बैठ गया। बस ठीक प्याऊ के सामने खड़ी थी। उस वक्त उसमें एक सवारी नहीं थी। कंडक्टर पीछे की सीट पर ऊँघ रहा था।
- मैंने सोचा रोटी देकर ही जाऊँगी। बैठे - बैठे झपकी आ गयी। तुझे आये बहुत देर तो नहीं हुई ?
- नहीं, अभी बस खड़ी की है। मैंने तुझे दूर से ही देख लिया था। तू इतनी पागल है कि तब से अब तक रोटी देने के लिए यहीं बैठी है ?
- क्या करती, तू जो कह गया था कि मैं घर नहीं आऊँगा! और उसने पलकें झपककर अपने उमड़ते आँसुओं को सुखा देने की चेष्टा की।
- अच्छा ला, दे रोटी और घर जा! जिन्दां वहाँ अकेली डर रही होगी। सुच्चासिंह ने उसकी बाँह थपथपा दी और उठ खड़ा हुआ।
रोटीवाला कटोरा उससे लेकर सुच्चासिंह उसकी पीठ पर हाथ रखे हुए उसे बस के पास तक ले आया। फिर वह उचककर अपनी सीट पर बैठ गया। बस स्टार्ट करने लगा तो वह जैसे डरते - डरते बोली - सुच्चा स्यां, तू मंगल को घर आएगा न?
- हाँ, आऊँगा। तुझे शहर से कुछ मँगवाना हो तो बता दे।
- नहीं, मुझे मँगवाना कुछ नहीं है।
बस घरघराने लगी तो वह दो कदम पीछे हट गयी। सुच्चासिंह ने अपनी दाढ़ी - मूँछ पर हाथ फेरा। एक डकार लिया और उसकी तरफ  देखकर पूछ लिया-  तू उस वक्त क्या बात बताना चाहती थी?
- नहीं, ऐसी कोई खास बात नहीं थी। मंगल को घर आएगा ही।
- अच्छा, अब जल्दी से चली जा, देर न कर। एक मील बाट है ...!
सुच्चा स्यां, कल गुर परब है। कल मैं तेरे लिए कड़ाह परसाद बनाकर लाऊँगी ...।
- अच्छा, अच्छा ....।
बस चल दी। बालो पहियों की धूल में घिर गयी। धूल साफ  होने पर उसने पल्ले से आँखें पोंछ लीं और तब तक बस के पीछे की लाल बत्ती को देखती रही जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गयी।