बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

फरवरी 2014 से अप्रैल 2014



सम्पादकीय 
'' चढ़ने '' का मतलब समझते हैं राजभाषा आयोग के सचिव ? 
न छत्‍तीसगढ़ी में कुछ सोचो  और न ही कुछ लिखो, बस
छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का झुनझुना बजाने में मस्‍त रहो ?
आलेख
मालवा के लोकगीतों में देशोत्थान के स्वर : संध्या विश्व
महापर्व -  शिवरात्रि : सुरेन्द्र वर्मा ( पूर्व प्राचार्य )
कहानी
अरमान : मुकुन्‍द कौशल
फूलो : कुबेर
व्यंग्य
आधुनिक आदर्श आदमी : वीरेन्द्र '' सरल ''
आजादी की लड़ाई : प्रमोद ताम्बट
लघुकथाएं
बदली हवा : राजेन्द्र मोहन द्विवेदी '' बन्धु ''
लघुकथाएं  : आकांक्षा यादव
गीत / गज़ल / कविता
गज़ल : मो.कासिम खॉन तालिब की गजल
कविता : जाग वोटर जाग : आनन्द तिवारी पौराणिक
दो गज़लें : जितेन्द्र सुकुमार
कविता :  फिर हिटलर : डॉ.थानसिंह वर्मा
नवगीत : दीवाली किस तरह मनाऊँ / डाँ. केवल कृष्ण पाठक
दोहा : लोकतंत्र का रास  / अशोक  '' अंजुम ''    
दो गज़लें : अल्पेश पी. पाठक  '' पागल ''
गज़ल : महेन्द्र राठौर
नवगीत : बिछुड़े प्रियतम की प्रीति पुरानी / विद्याभूषण मिश्र
सुरता
हिन्दी साहित्य के  अनन्य उपासक : प्रो. देवीसिंह चौहान
मनोज कुमार शुक्ल  '' मनोज  ''        
पुस्तक समीक्षा
कला की अपेक्षा चिंतन के लिए झकझोरती कहानियाँ
समीक्षक -  यशवंत मेश्राम         
फिल्म समीक्षा
हिन्दी फिल्मों के आइने में नक्सलवाद
समीक्षक - डॉ. पूनम रानी

न छत्‍तीसगढ़ी में कुछ सोचो, न ही कुछ लिखो बस छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना बजाने में मस्‍त रहो ?

'' चढ़ने '' का मतलब समझते  है राजभाषा आयोग के सचिव.......?

24 और 25 फरवरी को राजधानी के रवीन्द्र सांस्कृतिक सभागार, कालीबाड़ी स्कूल परिसर में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का द्वितीय ’प्रांतीय सम्मेलन 2014’ संपन्न हुआ। कहा जा रहा है कि इस दो दिवसीय आयोजन में छत्तीसगढ़ के लगभग 500 विद्वान-साहित्यकार, कलाकार एवं पत्रकार एकत्रित हुए। छत्तीसगढ़ में और भी बहुत से विद्वान हैं जिनका उल्लेख न तो आयोग द्वारा छपवाए गए आमंत्रण-पत्र में हुआ है और न ही जो पाँच सौ विद्वानों-कलाकारों की भीड़ थी उसमें नजर ही आये। पिछले आयोजन में भी ऐसा ही कुछ नजारा देखने में आया था। साहित्यिक अस्पृष्यता और वर्गभेद की आशंका को जन्म देने वाली ऐसी घटना क्या अनजाने में हो रही है, या किसी नीति के तहत हो रही हैं ? जैसा भी हो, पर है यह दुखद।
दो दिनी इस आयोजन में उपस्थित साहित्यकारों को अपनी बातें कहने के लिये और विभिन्न मुद्दों-विषयों पर गहन चर्चा-विमर्श करने के लिये कुल सात सत्रों (समापन सत्र को मिलाकर) का आयोजन किया गया था। उम्मीद थी कि इन सत्रों में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के उद्देश्यों और लक्ष्यों पर और इन उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राप्त करने के विभिन्न उपायों और प्रयासों पर चर्चाएँ होगी, और इस हेतु योजनाएँ भी बनाई जायेगी। परंतु खेद का विषय है कि इन सत्रों के लिये निर्धारित विषयों में से ’छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’ गठन के पीछे का उद्देश्य और लक्ष्य पूरी तरह गायब थे, चर्चाएँ क्या खाक होती। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के वेब साइट पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के पीछे निम्न उद्देश्यों और लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है -
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग
(छत्तीसगढ़ शासन)
उद्देश्य/लक्ष्य
राज्य के विचारों की परम्परा और राज्य की समग्र भाषायी विविधता के परिरक्षण, प्रचलन और विकास करने तथा इसके लिये भाषायी अध्ययन, अनुसंधान तथा दस्तावेज संकलन, सृजन तथा अनुवाद, संरक्षण, प्रकाशन, सुझाव तथा अनुशंसाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी पारम्परिक भाषा को बढ़ावा देने हेतु शासन में भाषा के उपयोग को उन्नत बनाने के लिए ‘‘छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग’’ का गठन किया गया है। आयोग के प्राथमिक लक्ष्य एवं उद्देश्य निम्नांकित हैं:-
1. राजभाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज कराना
2. राजकाज की भाषा में उपयोग
3. त्रिभाषायी भाषा के रूप में प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम में शामिल करना
ऐसे उद्देश्यहीन आयोजनों का क्या औचित्य जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपयों की आहूति दे दी जाती हो?
छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाये जाने के संबंध में हो अथवा प्राथमिक कक्षाओं के लिए शिक्षण का माध्यम बनाने के विषय में हो, चाहे आयोजन के किसी सत्र में इस पर कोई चर्चा न की गई हो, परंतु सत्र के बाहर और मंच के नीचे उपस्थित लगभग हर साहित्यकार परस्पर केवल इन्हीं विषयों पर चर्चा कर रहे होते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ही ये ऐसे बहुचर्चित विषय रहे हैं जो चर्चा के रूप में पढ़े-लिखे लोगों के बीच हर जगह और हर मौके पर उपस्थित रहते आये हैं और जिसके लिए किसी विशेष चर्चा-गोष्ठी के आयोजनों की दरकार भी नहीं है। पर इस प्रकार की चर्चाएँ मूल्यहीन होती है। पान ठेलों में गपियाते हुए, बाजारों, सड़कों और सफर के दौरान टाईम पास करने के उद्देश्य से चर्चा करते हुए ऐसे बहसों का वह मूल्य तो कदापि नहीं हो सकता जो राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित इन आयोजनों के विभिन्न सत्रों में विद्वानों के बीच होने से होता। 
पर ठहरिये। जरा सोचें। कल्पना करें कि बच्चा बिगड़ा हुआ है, किसी चीज के लिए मचल रहा है। अभिभावक को काम करने में बाधा पड़ रही है। समझदार अभिभावक बच्चे को उसकी इच्छित वस्तु देकर चुप करा देता है। बच्चे का ध्यान अब अपने अभिभवक की ओर से हटकर झुनझुना बजाने की ओर चला जाता है। तब अभिभावक अपनी मनमानी करने के लिये स्वतंत्र हो जाता है।
छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने अथवा त्रिभाषायी भाषा के रूप में प्राथमिक एवं माध्यमिक कक्षाओं में पाठ्यक्रम में शामिल करने की बातें, ऐसा ही एक झुनझुना है। छत्तीसगढ़ के लोगों, न तो छत्तीसगढ़ी में कुछ सोचो और न ही कुछ लिखो; बस, छत्तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना बजाने में मस्त रहो।
छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों के बीच साहित्यिक अस्पृष्यता और वर्गभेद जैसी लकीर खीचने वाले और यहाँ के पढ़े-लिखे लोगों को छत्तीसगढ़ी राजभाषा का झुनझुना पकड़वाने वाले ऐसे आयोजनों को आप असफल कह सकते हैं?
तब भी छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी को मातृतुल्य प्रेम करने वाले ऐसे छत्तीसगढ़िया साहित्यकारों की कमी नहीं है जो पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले से ही ( और कई उसके बाद में भी ) छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों, गाँवों और कस्बों के स्तर में साहित्यिक संस्थाएँ बनाकर बिना किसी शासकीय अनुदान के ही ( क्योंकि मांगने पर भी इन्हें आश्वसनों के अलावा कुछ मिलता ही नहीं ) अपनी प्रिय मातृभाषा छत्तीसगढ़ी की सेवा और साहित्य सृजन में निरंतर रत हैं। इनमें से कई साहित्यिक संस्थाएँ पंजीकृत भी हैं। इन संस्थाओं को अपने दम पर चलाने वाले समर्पित और जुनूनी साहित्यकारों के द्वारा निरंतर साहित्यिक संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं, जिनका स्तर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा करोड़ों रूपयों के आयोजन के स्तर से कही लाख दर्जे की होती हैं। ये लोग अपनी खून-पसीने की कमाई खर्च करके अपनी पुस्तकों को छपवाते हैं और छपवाकर मुफ्त में बाँटते भी हैं।
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पास ऐसी कितनी साहित्यिक संस्थाओं की और उनसे जुड़े हुए कितने साहित्यकारों की जानकारी है ? आयोग अपने प्रान्तीय सम्मेलनों में इनमें से कितनी संस्थाओं को सहभागी बनाता है अथवा कम से कम उन्हें आमंत्रित ही करता है ? क्या आयोग ने ऐसी संस्‍थाओं को कभी वित्तीय सहायता भी प्रदान किया है ?
छत्तीसगढ़ी भाषा कहावतों और मुहावरों की भाषा है। छत्तीसगढ़ी में कहावतों और मुहावरों को हाना कहा जाता है। बात-बात में हानों का प्रयोग करना छत्तीसगढ़ी बोलने वालों का स्वभाव है। एक हाना है - ’’ किसी के ऊपर या किसी की माँ-बहन के ऊपर चढ़ना ’’ जिसका अर्थ होता है माँ-बहन की इज्जत से खेलना अथवा बलात्कार करना। गौरव की बात है कि देश ही नहीं विदेशों में भी समादृत हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध  कवि पदश्री डॉ. सुरेन्‍द्र दुबे छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के सचिव है। डॉ. दुबे जी वर्षों से छत्तीसगढ़ के हर कवि सम्मेलन में एक कविता सुनाते आ रहे हैं जिसकी कुछ पक्तियाँ इस प्रकार हैं - ’’बस्तर ले निकल, अमटहा भाटा ल चुचर, बमलई म चढ़, इही ल कहिथे छत्तीसगढ़।’’ माँ बमलई न केवल छत्तीसगढियों की़ अपितु संसार भर में निवासरत अनेक हिन्दुओं की आराध्या देवी हैं। डोगरगढ़ की पहाड़ियों में स्थित माँ बमलेश्वरी मंदिर की गिनती हिन्दुस्तान के प्रमुख शक्तिपीठों में होती है। मंचों पर काव्यपाठ करते हुए और बड़े गर्व के साथ ’बमलई म चढ़’ कहते हुए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के यशस्वी सचिव व हमारे प्रदेश के महान साहित्यकार डॉ. सुरेन्द्र दुबे को तनिक भी लाज नहीं आती होगी ? क्या छत्तीसगढ़ की प्रमुख आराध्या देवी के लिये इस हद दर्जे की कविता लिखने वाले और छत्तीसगढ़ के सवा दो करोड़ लोगों की भावनाओं को आहत करने वाले ऐसे तथाकथित महान कवि-साहित्यकार को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव पद पर बने रहने का अधिकार भी बनता है?
सोचिये।

मो. कासिम खॉन तालिब की गज़ल़

सबने ही यौवन देखा है।
किसने पावन मन देखा है।
अब तो दोस्त बनाकर देखो
अब तक तो दुश्मन देखा है
मुझपे दोष बताने वाले
क्या तूने दरपन देखा है
चंदा को रोटी समझा था
हाँ, मैने बचपन देखा है।
सच्चाई के पथ पर मैंने
उलझन ही उलझन देखा है
जिनमें कोई बात नहीं है
उनका भी वन्दन देखा है
अच्छे - अच्छे लुट जाते हैं
फनकारों का फन देखा है
' तालिब ' रेगिस्तानों में भी
हमने तो उपवन देखा है
पता-
14, अमीर कम्पाउण्ड, बीएनपी रोड
देवास (म.प्र.)
मोबा. 9754038864

कहानी प्रतियोगिता 2014 हेतु प्रविष्टियां आमंत्रित

साहित्य - कला संस्कृति की त्रैमासिकी '' विचार वीथी '' द्वारा कहानी प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। चार कहानियां प्रतियोगिता में चयनित की गई। जिसमें कथाकार कुबेर की कहानी '' लाजो '' मनोज कुमार शुक्‍ल ' मनोज' की कहानी '' रोपवे '' कवि एवं कथाकार मुकुन्‍द कौशल की कहानी '' अरमान '' एवं सनत कुमार जैन की कहानी '' फॉंस '' शामिल है। उक्‍त पुरस्‍कार का वितरण आगामी आयोजन  में किया जायेगा जिसकी सूचना पुरस्‍कृत कहानीकारों को यथासमय पर दी जायेगी।
                                     संपादक
विचार वीथी
17/ 297, पूनम कालोनी, वर्धमान नगर
शिव मंदिर के पास, राजनांदगांव (छत्‍तीसगढ़)
मोबाईल : 94241 - 11060
मेल : vicharvithi@gmail.com

हिन्दी साहित्य के अनन्य उपासक : प्रोफेसर देवीसिंह चौहान

मनोज कुमार  शुक्ल ‘‘मनोज’’
साहित्यकार  भूगोल की  सीमाओं से सदैव अपने आप को ऊपर पाता है तभी संस्‍कारधानी के माटी में जन्मा जब मैं छत्तीसगढ़ की माटी में गया तो वहॉं के सभी साहित्यकारों से मुझे इतना अपना पन मिला कि मुझे अपनी जन्म भूमि का अपनापन बौना नजर आने लगा। वहॉं साहित्य के ऐसे दो वट वृक्ष की छाया मिली जिनकी शीतल छाया में बैठ कर कब ग्यारह साल गुजर गये इसका मुझे भान ही नहीं रहा। एक थे साहित्य मनीषी आदरणीय देवी सिंह चौहान जो कि राजकुमार कालेज में उप प्राचार्य के पद पर रह चुके थे । कहते हैं  पहले इस कालेज में  कभी राजा रजवाड़ों के राजकुमार बगैरह पढ़ा करते थे। दूसरे थे आदरणीय सरयूकान्त  झा जो कि छत्तीसगढ़ कालेज के संस्थापक एवं प्राचार्य रहे हैं । रायपुर नगर में ही नहीं आसपास के दूर -  दूर क्षेत्रों में इनकी चर्चा  बनी रहती  थी । इनके बगैर  साहित्यिक  कार्यक्रम सदैव सूना -  सूना ही लगता था । सभी कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति रहती थी ।
रायपुर में चौहान जी एक समर्पित हिन्दी साहित्यकार थे । जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी की साधना में ही समर्पित कर रखा था  उन्होंने लगभग तीस ग्रंथों की रचना की थी । जिनमें आठ काव्य संकलन ' रक्त का प्रमाण दो ' , ' लहर और चाँद ' , ' क्रान्ति के शोले' , ' हॅंसते ऑंसू ' ' बढ़ो- बढ़ो बलिदानी ' ' इन्द्रधनुष ' ' सुमनांजलि ' आदि । एक खण्ड काव्य ‘‘खूब लड़ी मर्दानी ’’ महारानी लक्ष्मी बाई पर लिखा । सात बाल साहित्य एक निबंध संग्रह के साथ ही लगभग तेरह प्रेरक जीवनी ग्रंथ आजादी के परवाने, नये भारत के शिल्पी, आजादी और नेहरू, मुक्ति -आन्दोलन और क्रांतिकारी, याद करो कुर्बानी, महाक्रांति के उद्यांचल-रासबिहारी बोस, अखंड भारत के उद्घोषक-वीर सावरकर, गणेश शंकर विद्यार्थी एक अहिंसक क्रांतिकारी, शहीद शिरोमणि -रामप्रसाद बिस्मिल, क्रांतिवीर चन्द्रशेखर आजाद, शहीदे आजम - सरदार भगतसिंह, मेवाड़ और स्वातंत्रय सूर्य महाराणा प्रताप ,राष्ट्रनायक छत्रपति शिवाजी आदि पुस्तको का सृजन किया। राष्ट्रीय विचारधारा का रक्त उनके शरीर में सदैव मचलता रहता था। उनकी सभी पुस्तकों में देश हित, प्रेम सौहार्द और राष्ट्रवाद की प्रखर धारा बहती नजर आती है। संस्‍कारधानी जबलपुर में अशोका होटल के सामने रायबहादुर परिवार में उनकी ससुराल थी । उनके समस्त लेखन कार्य में उनकी सहधर्मिणी श्रीमती ऊषा चौहान का योगदान रहा है ये स्वंय एक प्रसिद्ध शिक्षाविद् रही हैं ।
रायपुर नगर में चौबे कालोनी स्थित एक भव्य दो मंजिला भवन कार्नर का प्लाट उसके आधे हिस्से में एक खूबसूरत बगीचा सलीके से बनी हुईं क्यारियॉं, फब्बारों के इर्द गिर्द  दुर्लभ रंगबिरंगे फूल पौधे हर मेहमान का मन मोह लेते थे । सामने लोहे की जाली से घिरा एक  बड़ा बरामदा जो प्रथम आगन्तुक कक्ष के रूप में था । दोनों ओर कुर्सियॉं लगी रहती थीं । सामने मेज के पीछे उनकी  एक कुर्सी जिस पर एक नेपकिन  लटकती रहती । मेज पर कागजों का एक पुलंदा और पेन स्टैंड । जब लिखते पढ़ते माथे पर पसीने की बूंदे झिलमिलाती तो वे पसीने को नेपकिन से पौंछतें। घर के बरामदे के दोंनो ओर स्टील की कॉच वाली आलमारियॉं जिसमें साहित्य का अपार भंडार भरा था। उनके गोल मटोल चेहरे में राजपूतों वाली उठी हुई मूॅंछे जो उनके स्वाभिमान एवं राजपूती आन बान को दर्शाती थी। किन्तु चश्में के अन्दर से झॉंकती मुस्‍कराती दो ऑंखें उनकी सहजता सरलता की राम कहानी कह जाती थीं। घर में आये सभी अतिथि को वे सदा बड़ी विनम्रता से  गले लगाकर अपनी आत्मीयता का परिचय दे देेते थे।
रायपुर में साहित्यिक संस्थाएॅं तो अनेकों थी। किन्तु नियमित पाक्षिक - मासिक गोष्ठी केवल हिन्दी साहित्य मंडल की ही होती थी। गोष्ठियॉं मोती बाग, सिन्धी धर्मशाला, सोनकर धर्मशाला, मैथिल ब्राम्हण सभा भवन, जैतू साव मठ आदि विभिन्न जगहों पर होती थीं। सरलता सहजता में वे इतने थे कि उनके साथ दो थेैले हमेशा चलते जिसमें संस्था का बैनर व अन्य आवश्यक सामग्री रहती। बिछावन के कार्य में भी वे तनिक संकोच न करते। संस्था का यह कार्य वे सरस्वती की आराधना स्थल कह कर बड़े मनोयोग से सम्पन्न कराते। ऐसे दुर्लभ ही  साहित्यकार इस दुनिया में होते हैं । तीज त्यौहर जैसे उत्सव मनाने का उनका विरला ही अंदाज था। होली-दीवाली-दशहरा पर उनके यहॉं हलवाई आकर मिठाई, पकवान,नमकीन बनाते सभी स्नेहीजनों को बुलाकर गले मिलते, त्यौहारों की बधाई देते, आतिथ्य सत्‍कार करते  और हर उत्सव का भरपूर आनंद उठाते। उनके बैठक रूम के हाल में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. शिवमंगल सिंह सुमन, श्री रामेश्वर शुक्ल अंचल, श्री भवानी प्रसाद मिश्र, श्री भवानी प्रसाद तिवारी, डा. राजेश्वर गुरू, श्री नर्मदा प्रसाद खरे, डा. रमेशचन्द्र मेहरोत्रा, डा. राममूर्ति त्रिपाठी, श्री हरिठाकुर, श्री दानेश्वर शर्मा ,आचार्य सरयूकान्त झा, डा. सालिकराम शलभ, डा. रामकुमार बेहर, श्री विनय पाठक, डा. रामप्रताप सिंह विमल,  मनोज श्रीवास्तव  लखनऊ, डा. कृष्णचन्द्र वर्मा, प्रो. बालचन्द कछवाहा, श्री अमर नाथ त्यागी, श्री लखन लाल गुप्ता, श्री  केयूर भूषण, डा. प्रेम शंकर, डा. शोभाकान्त झा, श्रीमती आशा श्रीवास्तव, डा. साधना कसार आदि अनेक साहित्य दिग्गजों की गोष्ठियॉं  होती रही हैं व उनका सानिध्य मिलता रहा है । उनका संदेश आज भी हमारे कानों में गूंजता है:-
‘‘ हर मानव अपने जीवन का भाग्य विधाता है ,
बोता  जैसे  बीज , कर्म - फल  वैसा पाता है ।
समय  शिला  पर  कर्मठ  ही पद - चिन्ह  बनाता  है ,
सुमन -सुमन पर वह मधुरिम -मधुमास खिलाता है । ’’
वहीं वे दूसरी ओर कहते हैं:-
‘‘उगता सूरज उन्नति के, सोपान दिखाता है । 
मंजिल पाता वही,जिसे चढऩा भी आता है ।
हर आने वाला पल ,कल का नव निर्माता है ।
फल पाता है वही ,कर्म से जिसका नाता है ।। ’’
उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था। वे सदा अपनी दो पंक्तियॉं को गुनगुनाया करते थे :-
‘‘ मुझको  दीपक  सा  जलना है ,आलोक   सभी को देना है ।
जग कह दे दीपक खूब जला,बस और मुझे क्या लेना है ?’’
उनकी कलम ने अपने खण्ड काव्य ‘‘खूब लड़ी मर्दानी में ’’ सुभद्रा कुमारी चौहान की याद तरोताजा कर दी है:-
‘‘जिस ओर झपट जाती रानी ,मैदान साफ  हो जाता था ।
जिस पर होता वार अभागा , विदा त्वरित हो जाता था ।।
जिस ओर भृृकृटियॉं तन जाती , उस ओर कहर सा छा जाता ।
श्मशान  दृष्य   समरांगण  में , आनन फानन  में छा जाता ।।’’   
राष्ट्रप्रेम की धारा उनके रग- रग में समायी थी तभी तो वे सीना तान के कहा करते थे:-
 ‘‘अगर देश पर गर्व न हो , तो जीने का अधिकार नहीं है ।
लानत है जीवन यदि, जननी-जन्मभूमि से प्यार नहीं है ।’’
पहले देश व्यक्ति है पीछे  वे सदा यही बात दोहराते थे:-
‘‘कष्टों के कंटक झेलो पर,मत पियो गरल अपमानों का।
शोलों  को  कुचलो पैरों   से ,रौंदो   घमंड   चट्टानों का ।’’
इस प्रखर राष्ट्रभक्ति शौर्य वीरता के साथ उनके अंदर एक कोमल मन भी छिपा था। प्रेमी मन भी बसा था तभी वे कह उठते थे:-
 ‘‘झाँकती जब तुम  सलिल में ,तो कमल के फूल खिलते।
हास से कलियाँ विहँसती , चूमने को अलि मचलते।
दृष्टि पड़ते ही तुम्हारी , सृष्टि में मधुमास छाता ,
चाल में नवताल का - सा , गीत हर मन को लुभाता।।’’
उनकी रचना में विरह वेदना कुछ यूॅ  झलकती है:-
‘‘ शूल  का  चुभना , मधुर  चुपचाप  मैं   सहता   रहा ,
क्योंकि परिमल स्त्रोत,अविरल श्वास में बहता रहा।।
विरह का दुख - मधु  मिलन की,राह में पलता रहा।
और मैं प्रेमी शलभ सा , अनवरत जलता रहा ।। ’’
वे देश की दिग्भ्रमित राजनीति को आगाह करते हुये कहते है:-
दिग्भ्रमित  दिशा निदेशक घातक होता है। उसकी प्रवंचना ही छलना बन जाती है।
 पर्याय ढूंढना अनिवार्य तब अवश्य मेव है, वरना निज तट पर नाव डूब ही जाती है ।
इसके बावजूद उनकी लेखनी आशाओं का संचार कर लोगों को जगाती है। देश में वर्तमान निराशा और विसंगतियों के बादलों के पीछे से एक आशा की किरण झाँकती हुई देश से कह  रही है:-
 ‘‘मजबूती से आशा का दामन थाम सखे ,विश्वास भरें लोगों में चेतना लायें।
थोथे नारों को निशा हवाले कर,हम  पुन:  उजाले को घर-घर छिटकायें।’’
ऐसे प्रखर राष्ट्रभक्त राष्ट्र ,समाज और मानव के हित चिंतक हमारे साहित्य के पुरोधा वीर और ओज के साहित्य मनीषीश्री देवी सिंह चौहान को उनकी 16 जुलाई 2013 की प्रथम पुण्य तिथि पर हिन्दी साहित्य जगत की ओर से विनम्र श्रृद्धाजंलि अर्पित है । जिन्होंने अपना सारा जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया। ऐसे दिव्य साहित्य पुरूष के चरणों में श्रृद्धा सुमन समर्पित है ।
पता - 58, आशिष दीप,
उत्तर मिलौनीगंज,जबलपुर  (म.प्र.)
मोबाईल:-09425862550
मेल : mkshukla48@gmail.com

जाग,वोटर जाग

आनन्द तिवारी पौराणिक
है वही डफली पुरानी,
और वही है राग।
होने लगी दस्तक घरों में,
जाग, वोटर जाग

                                   उड़ा करते थे जो खटोलों में।
                                    चल रहे पैदल, गली - मुहल्लों में।।
                                    नम्रता की मूर्ति बनते अनमने।
                                    दु:ख - दर्द, जनता का लगे बाँटने।।
                                                       हंसकर चोला पहनकर
                                                                      आ रहे हैं काग।
जाग, वोटर जाग
उद्देश्य सीमित वोट बस
पद, प्रतिष्ठा, नोट बस
फिर बन जाएंगे धृतराष्ट्र
रसातल में जाये चाहे राष्ट्र
जुगत लगाते - दिखाते सब्जबाग।
जाग, वोटर जाग
                                                                                       पता-
                                                                            श्रीराम टाकीज मार्ग
                                                                          महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

मालवा के लोक गीतों में देशोत्थान के स्वर


संध्‍या ' विश्‍व '

लोक गीत समाज,राष्ट्र तथा मानव जीवन की प्रत्येक हलचल का सजीव चित्रण करते हैं। स्वतंत्रता के बाद हमारे देश में नई चेतना का उदय हुआ। हमारे लोककवि, गायक भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद देश में होने वाले परिवर्तनों में अटक से कटक तथा कश्मीर से कन्या कुमारी तक के निर्माण कार्यों की सजीव झांकी को अपने लोक गीतों में जन - जाग्रति स्वरुप बांधा, संजोया और खूब गाया है। उदाहरण के लिए मालवा के कुछ लोक गीतों की झलक यहाँ प्रस्तुत है।
हमारे भारत देश में हो रहे नूतन परिवर्तनों को देखकर मालवा का एक किसान दूसरे किसान से कहता है। देश की आजादी के बाद हमारे प्रत्येक गाँव में नई - नई पाठशालाएं बन गई है। इतना ही नहीं, बल्कि  हमारे गाँव के कुछ बुजूर्ग लोग भी बच्चों के साथ अब पढऩे लगे हैं। सब में नई सोच, नई जागृति पैदा हो गई है। गाँवों में लोगों के अापसी झगड़े निपटाने के लिए पंचायतें बन गई है। पंचायतों द्वारा नये - नये स्‍कूल,कुएँ, बावडिय़ाँ, तालाबों का निर्माण किया जा रहा है। अर्थात चारों ओर नया परिवर्तन हो रहा है। यही भाव इस गीत की पंक्तियों में है -
देख जरा तू गाँव - गाँव में
कैसा मदरसा बणीं गया।
साठ बरस का बूढ़ा डोकरा
बिना भणया था भणीं गया।
जहां देखो वहां पंचायत का
तम्बू डेरा तणीं गया।
कुआँ - बावड़ी, ने तालाब,
सब नवा नवाणा वणीं गया।
देश के नव - निर्माण के लिए खूब मेहनत करते हुए खून पसीना एक कर दो यही हमारे देश के आदर्श नेताओं ने कहा है। हमारा देश जब तक पूर्णरूपेण समृद्धशाली न हो जाए तब तक हमारे लिए अब आराम हराम है। हमारा लोक कवि गायक इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर जन - मानस को राष्ट्रीय नव - निर्माण - कार्यों के लिए आव्हान करता है -
नवा बरस की बणीं योजना
देश में नव निरमाण करो।
प्यारो - प्यारो देश हमारो,
ईक गौरव पे अभियान करो।
यो जुग नव निर्माण को आयो
मेहनत और श्रमदान करो।
आलस त्यागो, नींद से जागो,
नवजुग की पहचान करो।
हमारे देश में नई - नई योजनाएं देश के लोगों के लिए कल्याण की बनती जा रही है। इस पर हमें गर्व करना चाहिए क्योंकि हमारा देश उन्नति की ओर अग्रसर है। यह निर्माण का युग है। सब मेहनत करें। श्रमदान करें। आलस को त्याग कर नव - निर्माण की बेला में श्रमरुपी गंगा में स्नान करें। राष्ट्र नव निर्माण में ऊँच - नीच का भेदभाव कभी सहायक नहीं हो सकता, इसके रहते हुए किसी भी देश की प्रगति और विकास नहीं हो सकता है। आज देश में हमें छुआछूत की भावनाओं को हमेशा के लिए दूर ·रना है। यही संदेश इस गीत से मिलता है-
धरती का घणी किसान उठो,
दिन उग्यो ने रात गई।
स्वतंत्रता को सूरज उग्यो,
और दो भांत गई।
एक हुकुमत दूजी गुलामी,
एकज साथ गई।
देश में नव निरमाण करो,
अब सब पंचात गई।
अर्थात किसान भाईयों, अब तुम सब उठो। सूर्य उदय हो गया है। हमारी गुलामी की रातें सदा के लिए चली गई है। ब्रिटिश[अंग्रेजी ] शासन का हिंसात्मक अत्याचारपूर्ण घृणित कार्यों का अंत हो चुका है। अब हम और हमारा देश हर तरह से जागृत है। अब आपस के सब झगड़ों को त्यागें, इसी में हम सबका और देश का भला है।
पता - 
श्रीजी निवास, जैन कॉलोनी,
जवाहर मार्ग, नागदा जं. [ म.प्र.] 456335
फोन : 07366 - 242336

जितेन्द्र सुकुमार : दो गज़लें

( 1 )
तुम्हें अच्छा कहूँ या बुरा कहूँ
तुम्हें दर्द कहूँ या दवा कहूँ
कुछ तपन सी है दिल में यारों
तुम्हें आग कहूँ या धुँआ कहूँ
सर झुक जाता है तुम्हारे आगे
तुम्हें इश्‍क  कहूँ या खुदा कहूँ
दीवाने सारे मचल रहे खुशी में
तुम्हें हुस्न कहुँ या नशा कहुँ
आखिरी तमन्ना सी लगती हो
तुम्हें हयात कहूँ या कजा कहूँ
हर बूँद में इक  नया रंग है
तुम्हें नीर कहूूँ या सुधा कहूं
( 2 )
फलक पर सितारे बहुत हैं
मुकद्दर के मारे बहुत है
इक दफा निगाहें खोलों
यहाँ हसीन नजारे बहुत है
जिंदगी कुछ इस तरह है
इक  दरिया, किनारे बहुत है
जाकर देखो हालत - ए - वतन
फूटपाथों पे बेसहारे बहुत है
सोच - समझ के आना मिलने
मेरे मकां में दरारें बहुत है
पता - उदय - आशियाना, चौबेबांधा [राजिम]
जिला - गरियाबंद [छ.ग.] 493885
मोबाईल : 9009187981  

अरमान

 मुकुन्‍द कौशल 

आज का दिन किरन के लिये सर्वाधिक खुशी का दिन है। आज न केवल वह कम्‍प्यूटर इन्जीनियर बन गई है बल्कि उसे सन्तोषप्रद पैकेज के साथ जॉब भी मिल गया है। रविवार होने के कारण मम्मी - पापा दोनों आज घर पर ही है। यूं तो अक्सर सण्डे को भी पापा आधा दिन के लिये वर्कशॉप चले जाते हैं किन्तु आज कैसे जाते ? बेटी किरन जो आने वाली है।
पूना से दुर्ग तक की लम्बी यात्रा के बावजूद, माता - पिता से मिलकर किरन की सारी थकान छू - मंतर हो गई थी। सर्वाधिक अंक प्राप्त  करके नगर का नाम रोशन करने वाली यशस्वी छात्रा किरन वर्मा के विषय में सूचना मिलते ही कुछ पत्रकार भी आ जुुटे। खटाखट कैमरों के फ्लैश चमके और साक्षात्‍कार  आरम्भ हो गया। एक पत्रकार ने अंतिम प्रश्र किया - अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देना चाहेंगी ?
- ऑफ कोर्स, अपने पापा मम्मी को ही ...।''  बोलते बोलते पल भर के लिये खामोश हो गई किरन ... सहसा आँखें डबडबा आई उसकी, फिर क्षण में ही स्वयं को संयत करते हुए उसने कहा - मेरे मम्मी - पापा डिसएबल है। किन्तु आप लोग उनसे मिलकर महसूस करेंगे कि एक्चुअली वे कितने एबल है।''
पत्रकारों की उत्सुकता और बढ़ गई।
किरन ने पुकारा - मम्मी, पापा। आइये न..। भीतर से कमरे का पर्दा हटाते हुए एक हँसमुख व्यक्ति ने लँगड़ाते हुए कमरे में प्रवेश किया। साथ में थी एक सीधी - सादी सुशील महिला। आते ही उन्होंने सबको अभिवादन किया। स्थानाभाव के मद्देनजर दो युवा पत्रकारों ने उठकर उन्हें स्थान दिया।
वर्मा जी ने किरन से कहा - बेटा, इन्टव्र्यू तो हो चुका। अब सभी का मुँह मीठा नहीं कराओगी ?''
किरन मिठाई का पूरा डिब्बा उठा लाई।
मिठाई खाते हुए पत्रकारों ने किरन को एक बार फिर बधाई दी साथ ही माता - पिता के साथ तस्वीर भी खींची। जाते - जाते एक पत्रकार ने वर्मा जी से निवेदन के अंदाज में कहा - कभी मैं आपको भी कष्ट दूंगा वर्माजी, आपका जीवन संघर्ष जानने की भी उत्‍कंठा है।''
उत्तर में वर्मा जी केवल मुस्‍करा दिये।
समय पंखा लगाकर उड़ जाता है और यादों के रुप में अपने निशान छोड़ जाता है। नेपाली पहरेदार की सीटी और उसकी लाठी पटकने का स्वर कानों में पड़ा, तो निगाहें दीवाल घड़ी की ओर घूम गई। रात के बारह बज चुके थे किन्तु नींद नहीं थी धनुष की आँखों में। दुलारी और किरन थककर सो चुके थे। इतमिनान गहरी नींद में सोयी किरन बिटिया का सुंदर और सौम्य चेहरा देखकर धनुष को दुलारी का यौवन याद हो आया। टकटकी लगाये वह छत की ओर निहारने लगा। विगत एक -  एक कर सारी घटनाएँ याद आने लगी और स्मृतियों की फिसलपट्टी से फिसलते हुए वह जा पहुँचा बचपन की दहलीज पर ....।
लगभग 25 वर्ष पहले की बात होगी, जब समोदा गाँव में स्थित श्यामजी भाई के सब्जी - बगीचे में काम कर रहे किसान मजदूर पुनीतराम वर्मा एवं उनकी पत्नी जगौती बाई का  तडि़त बिजली गिरने से देहान्त हो गया था। उस दम्पति का इकलौता पुत्र धनुष तब कक्षा ग्यारहवीं का विद्यार्थी था। मेहनत - मजदूरी कर के जीवन यापन करने वाले उसके माता - पिता उसे पढ़ा - लिखा कर आगे बढ़ाना चाहते थे। धनुष एक होनहार विद्यार्थी के रुप में जाना जाता था। छुटपन से ही पोलियोग्रस्त होने के कारण उसे विगलांग सहायता कोष से एक ट्रायसिकल भी प्राप्त हो गई थी। यही ट्रायसिकल धनुष की कल्पनाओं में मानों पंख लगा देती थी, किन्तु माता - पिता के असमय देहान्त से वह भीतर ही भीतर टूट सा गया था। आगे की पढ़ाई जारी रख पाना अब उसके लिये सम्भव न था।
गाँव - गाँव घूमकर महिलाओं को रंग - बिरंगी चूडिय़ाँ पहनाने वाली वृद्ध तुरकिन दाई रुखसाना बी का नाती कादर, आज गाँव आया हुआ था। पड़ोस में रहने वाले धनुष को उदास बैठे देख उससे रहा न गया। बोला - अगर वेल्‍िडंग का काम सीखेगा तो चल मेरे साथ।''
कहते है न, कि डूबते को तिनके का सहारा ?
मरता क्या न करता .... धनुष चल पड़ा कादर के साथ शहर की ओर ...।
दुर्ग के कब्रस्तान के पास एक छोटे से टपरे में कादर की वेल्डिंग - वर्कशॉप थी। इसी में काम सीखने लगा धनुष। कब्रस्तान से लगी मिलपारा की लम्बी गली के अंतिम छोर की नज़ूली ज़मीन पर कामगारों ने अपने छोटे - बड़े कुंदरे बना रखे थे, इन्हीं में एक कुंदरा कादर मिस्त्री का भी था। जिसमें वह अपनी बीबी के साथ रहता था। बाजू में ही था एक  बड़ा सा झोपड़ा जो खासा चौड़ा और गहरा था अत: भदरी की पतली आड़ उठाकर उसमें एक अतिरिक्त खण्ड बना दिया गया था। भरी जवानी में अपने पति खो चुकी परेमिन बाई अपनी बेटी दुलारी के साथ इसी झोपड़ें में अपनी जिन्दगी गुजार रही थी। सुबह होते ही फलों का टोकरा सिर पर उठाए, वह निकल पड़ती शहर की कॉलोनियों की ओर। दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी दुलारी, तब खाना पकाकर स्‍कूल  चली जाती। बस्ती के सारे लोग भी अपने - अपने काम में चले जाते। चहल - पहल सन्नाटे में बदल जाती।
धनुष के रहने के लिए कादर ने परेमिन बाई से जब उसका अतिरिक्त कमरा किराये पर माँगा, तो पूछ ही लिया परेमिन ने - का नांव हे बाबू ?''
- धनुष वर्मा .. ।''  कादर ने बताया।
परेमिन बाई देशमुख को धनुष की दशा पर तो दया आ ही रही थी, नाम सुनकर मया भी  उमड़ आई। उसने सहर्ष हाँ कह दी।
हर सुबह मुहल्ले भर में शोर सा उठने लगता।  मुर्गों की बाँग  और बकरे - बकरियों की मिमियाहट के साथ स्त्री - पुरुषों का समवेत स्वर मानों एक कोलाहल में तब्दील हो जाता। लोग प्लास्टिक की पानी बोतलें और डिब्बे ले - लेकर दिशा - मैदान के लिये सुलभ की ओर दौडऩे लगते। महिलायें बाल्टियाँ, बर्तन और कपड़ों के साथ सार्वजनिक नल के आस पास एकत्र हो जातीं। हिन्दू - मुसलमानों सहित अनेक भिन्न - भिन्न जातियों की इस संयुक्त बस्ती की एक मिली - जुली संस्‍कृति  थी। जातिगत भेदभाव तो जैसे था ही नहीं। वैसे भी मजदूरों की तो बस एक  ही जाति होती है, श्रमिक जाति।
समय गुजरते धनुष ने गैस वेल्डिंग के साथ - साथ इलेक्ट्रोवेल्डिंग में भी दक्षता प्राप्त कर ली थी। स्‍कूटर  और मोटरसाइकलों आदि के कलपुर्जों की वेल्डिंग के अतिरिक्त, अब वह खिड़कियों की ग्रिल्स और छोटे बड़े गेट भी बनाने लगा था। बचपन से पोलियो ग्रस्त अपने बाएँ पैर को उसने लाचारी नहीं, चुनौती मान लिया था। भरपूर दमखम के साथ वह अपने हुनर में महारत हासिल करता चला जा रहा था। कादर की वर्कशॉप अब वही सम्हालता। काम का दबाव इतना था कि कभी - कभी तो रात के 9- 10 बज जाते।
कादर आज अपनी बीबी के साथ बकरीद का त्यौहार मनाने समोदा गया हुआ था। वर्कशॉप इन त्यौहारों पर अक्सर बंद रहा करती सो उस दिन भी थी। परेमिन बाई फल बेचने जा चुकी थी और छुट्टी होने के कारण दुलारी भी स्‍कूल  नहीं गई थी। खाना पकाते - पकाते धनुष की एक आहट पाने के लिये न जाने क्यों वह उत्सुक हुई जा रही थी। वह बगल के कुरिया में झाँक आई, सहसा नल की तरफ से धनुष को नहाकर लौटते देखा तो मुँह से निकल ही पड़ा - चाय पियोगे ?''
गीले कपड़े सुखाते हुए धनुष ने आश्चर्य से पूछा - सिर्फ चाय ? अरे,कल रात से कुछ नहीं खाया। पेट में उथल - पुथल मची है। खाली चाय क्या होगा ?''
दुलारी को उसकी यह बेतकल्लुफी अच्छी लगी। बोली - भात चुरने में अभी देर लगेगी। बाहर से कुछ ला देती हूं।''
धनुष ने उसे पचास रुपये पकड़ा दिये। पास की दुकान से दुलारी मिक्सचर का पैकेट, ब्रेड और बिस्‍केट्स ले आई। थाली में रखकर धनुष के आगे खिसका दिया और चाय चढ़ाने के लिये गंजी माँजने लगी।
साल भर बीत चुका था यहाँ रहते, लेकिन इतने दिनों में पहली बार धनुष, परेमिन बाई की अनुपस्थिति में आज उसके घर पर दुलारी के साथ बैठा था। बिस्‍कुट का पैकेट खोलकर वह शुरु तो ही हो गया। उसने देखा कि चाय चढ़ाने, चाय की गंजी उतारते, चाय को छानकर कप में डालते और कप को धनुष की ओर बढ़ाते समय दुलारी ने सिर्फ दाहिने हाथ  ही उपयोग किया। बाएँ हाथ का पंजा उसने ओढऩी से ढँक रखा था। धनुष का ध्यान आज से पहले कभी इस ओर नहीं गया। अभी वह सोच ही रहा था कि उसकी जिज्ञासा दुलारी ने शांत कर दी। बोली - मेरा बायाँ हाथ पोलियो वाला है। कलाई तक तो ठीक है पर उँगलियाँ काम नहीं करतीं।''
फिर मुस्‍कुरा कर बात पूरी की - लेकिन मैं एक हाथ से सारा काम कर लेती हूं।''
- तुम क्यों नहीं ले रही ? लो, तुम भी लो ...। धनुष ने खाने का आग्रह किया।''
- नहीं, मैं चाय भर पियुंगी। आप खाओ ... रात को क्यों नहीं खाए ?''
- कादर भाई के यहाँ मटन जो बना था ...।''
- तो .....।''.
- अँहँ मैं नहीं खाता। हम लोग शाकाहारी है।''
- हम लोग भी ''
कुछ देर चुप्पी रही। केवल चाय की चुस्‍कियॉ  रह - रह कर सन्नाटे को तोड़तीं।
बात का अगला सिरा दुलारी ने ही पकड़ा - मेरे बाबू ( पिता ) ड्रायवर थे। उनके बीतने के बाद हम बिल्‍कुल अकेले पड़ गए थे। बगल वाली शांति काकी  पहले से फल बेचने का काम कर रही थी। उसी ने माँ को समझाया - सिखाया। उन्हीं के साथ माँ भी यही धंधा करने लगी। तब मैं छोटी थी, पर अब मुझे अच्छा नहीं लगता। माँ बेचारी दिन - दिन भर अकेली खटती रही है ...।''  बोलते - बोलते उदास हो उठी दुलारी। विषाद की रेखाओं ने उसके सुन्दर चेहरे पर व्याकुलता अंकित कर दी।
उस दिन के बाद धनुष और दुलारी के बीच, मानो एक नई दर्द का रिश्ता कायम हो गया। दोनों में निरन्तर संवाद होने लगा। परेमिन बाई के समक्ष भी और उसकी अनुपस्थिति में भी। दुलारी की माँ को जब पता चला कि  धनुष शाकाहारी है, तो उसने उसे विन्रमता पूर्वक अपने ही घर पर खाने के लिए राजी कर लिया। परेमिन बाई के परिवार के साथ निकटता में, कादर भाई को भी धनुष का हित नजर आया।
चाय - नास्ता और भोजन आदि के एवज में धनुष पर्याप्त धन राशि परेमिन बाई को दे दिया करता। अधिक दौड़धूप न करनी पड़े इसलिये परेमिन अब जिला कचहरी के सामने फलों का ठेला लगाने लगी थी। यह ठेला उसे धनुष ने ही खरीद कर दिया था।
एक दिन अखबार में नि:शक्तजनों के लिए स्वरोजगार हेतु ऋण उपलब्ध होने की योजना के विषय में पढ़कर धनुष ने भी प्रयास आरंभ कर दिया। प्रमाण पत्रों के साथ बैंक में आवेदन देने की प्रक्रिया  सहित दौड़ धूप तो बहुत करनी पड़ी किन्तु ऋण स्वीकृत हो गया। नगर पालिक निगम की ओर से उसे एक गुमटी भी आबंटित हो गई। गुमटी के आस - पास के स्थान पर बॉस गड़ाकर ताल पत्री की छाँव में उसने दो सहायको के साथ नई वर्कशॉप आरम्भ की। इस नये प्रयास में गैस वेल्डिंग का काम तो चल निकला किन्तु विद्युत कनेक्शन न होने के कारण इलेक्ट्रोवेल्डिंग का मशीन बन्द पड़ा था।
परेमिन बाई धनुष को पुत्र की तरह चाहने लगी थी। उसे पता चला तो बोली - आदर्श नगर के एक साहब बिजली विभाग में है। उसकी बाई मुझसे रोज फल खरीदती थी। उससे मेरी अच्छी पहचान है। साहब भी बड़े दयालु हैं। मैं उनसे बात करके देखती हूं।''
कहते हैं कि प्रेम और परिचय से बड़ी - बड़ी समस्याओं का भी हल निकल आता है। परेमिन ने साहब के सामने बात रखी और हफ्ते भर में ही मीटर भी लग गया। जीवन में जब अच्छा समय आता है तो कॉंटे भी महकने लगते हैं।
उत्सवधर्मी नई खबरें इस बस्ती की महिलाओं के बीच रुचिकर चर्चा का विषय होती। परेमिन को भी जब पता चला कि नगर निगम, विकलांग जोड़ों का सामूहिक विवाह आयोजित करने जा रही है तो रात की बियारी के बाद उसने धनुष से पूछ ही लिया - बाबू, तुमको मेरी दुलारी कैसी लगती है।''
धनुष जिस बात को कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था वह इस तरह सहज हो जाएगी ऐसा तो उसने सोचा ही नहीं था। धनुष ने संयत स्वर में उत्तर दिया - काकी , सवाल यह नहीं है कि दुलारी मुझे कैसी लगती है। खास बात तो यह है कि मैं उसे कैसा लगता हूं ?''
दरवाजे के पास खड़ी दुलारी ने लजाकर मुस्‍कुराते  हुए अपना सिर झुका लिया और दुपट्टे से अपना चेहरा छुपाकर भाग गई।
फिर कैसे वह सामूहिक विवाह सम्पन्न हुआ .... कितने उपहार मिले, कब वे लोग उस झोपड़ी से निकलकर किराये के इस नये मकान में रहने चले आए ... कैसे उसने बड़ी वर्कशॉप डाली ... किस तरह किरन सी बेटी आ गई और कैसे उन्होंने उसे के.जी. वन की कक्षा में दाखिला दिलाया ... कितने बड़े आर्डर मिलते चले गए ... एक लम्बी कहानी ही तो है, लेकिन सब याद है उसे।
शादी के बाद भी धनुष ने दुलारी से स्‍कूल  नहीं छुड़वाई थी। वह तो चाहता था कि उसकी शिक्षा जारी रहे पर उन्हीं दिनों दुलारी माँ बन गई। अपनी सारी ऊर्जा उसने घर सम्हालने और किरन की परवरिश में लगा दी। उसे अच्छी तरह याद है दुलारी ने एक दिन भावुक होकर उससे कहा था - हम आप भले ही आगे नहीं पढ़ सके, किन्तु अपनी किरन को हम खुब पढ़ाएंगे।''
दूसरी संतान न धनुष ने चाही न दुलारी ने। समय की गाज अगर असमय उन पर न गिरी होती तो आज वे भी पढ़े - लिखे होते ... किन्तु किरन ने ? किरन ने तो उनके सारे अरमान पूरे कर दिये। क्या पूछेंगे, उससे पत्रकार ... और क्या बता पाएगा वह इतना सब ? काश वह लेखक होता तो अपनी आप बीती खुद ही लिख देता। पता नहीं क्या समय हुआ होगा ? रात काफी बीत चुकी है .... नींद अब आँखों को घेरती चली जा रही है ... पलकें भी बन्द हो रही है ....।
पता 
एम - 516, पद्यनाभपुर, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

फूलो

  • कुबेर
फगनू के घर में शादी का मंडप सजा हुआ है। कल बेटी की बरात आने वाली है।
फगनू उस खानदान का वारिस है जिन्हें विरासत में मिला करती हैं सिर्फ और सिर्फ गरीबी, असमानता, अशिक्षा और अपमान। इनके शिक्षा, समानता, संपत्ति, सम्मान आदि सारे अधिकार छीन लिये गये हैं, सदियों पहले, छल से या बल से। जिस दुनिया में उसने आँखें खोली हैं, वह उसका नहीं है, यहाँ उसका कुछ भी नहीं है, सब कुछ मालिको का है। मालिको के उसके हम उम्र बच्चे जिस उम्र में पालने के नीचे पाँव भी नहीं धरते हैं, फगनू मालिको की चाकरी करता था।
मालिका का चेहरा उसे फूटी आँख भी नहीं सुहाता है। अँखफुट्टा और हरामी खानदान के इस वारिस ने गाँव में किस बहू-बेटी की आबरू बचाई होगी ? किस मर्द के सम्मान को न कुचला होगा ? किस किसान की जमीन को न हड़पा होगा ?
फगनू  सोचता है - वाह रे किस्मत, हमारी माँ-बहनों की इज्जत लूटने वालों की ही हमें चाकरी करनी पड़ती है, बंदगी करनी पड़ती है। अरे पथरा के  भगवान, गरीब को तूने क्यों इतना लाचार बनाया होगा ? फिर सोचता है, भगवान को दोष देना बेकार है। न भगवान का दोष है, और न ही किस्मत का, अपनी ही कमजोरी है, अपनी ही कायरता है। सब कुछ जानते हुए भी सहते हैं हम। क्यों सहते हैं हम ? इज्जत बेचकर जीना भी कोई जीना है ?
गाँव में और बहुत सारे फगनू हैं, क्या सभी ऐसा ही सोचते होंगे ? सब मिलकर इसका विरोध नहीं कर सकते क्या ? कोई आखिर कब तक सहे ?  फगनू सोचता है - और लोग सहें तो सहें, वह नहीं सहेगा।''
फगनू ने मन ही मन निश्चय किया - इस गाँव में नहीं रहेगा अब वह। बिहाव भी नहीं करेगा, पहले इज्जत और सम्मान की बात सोचना होगा।
सोचना सरल है, करना कठिन। जहाज का पंछी आखिर जहाज में ही लौटकर आता है।
बाप का चेहरा उसे याद नहीं है। ले देकर नाबालिग बड़ी बहन का बिहाव निबटाकर माँ भी चल बसी। फगनू अब अकेला है, उसकी न तो अपनी कोई दुनिया है, और न ही दुनिया में उसका कोई अपना है। दुनिया तो बस मालिको की है।
मालिक बड़े शिकारी होते हैं,छल-प्रपंच में माहिर, बिलकुल बेरहम और शातिर। उसके पास बड़े मजबूत जाल होते हैं, सरग-नरक , धरम - करम, पाप-पुण्य और दीन-ईमान के रूप में। कैसे कोई इससे बचे ? लाख चालाकी करके भी गरीब आखिर इसमें फंद ही जाता है। कहा गया है -  '' पुरूष बली नहि होत है, समय होत बलवान।''
गाँव की आबादी वाली जमीन में मालिक ने फगनू के लिये दो कमरों का एक कच्चा मकान बनवा दिया है। बसुंदरा को घर मिल गया, और क्या होना ? सजातीय कन्या से फगनू का बिहाव भी करा दिया। फगनू  को घरवाली मिल गई और मालिक को एक और बनिहार।
0
एक दिन फगनू बाप भी बन गया। जचकी कराने वाली दाइयों ने फगनू से कहा - ’’अहा! कतिक सुंदर अकन नोनी आय हे रे ,फगनू बेटा, फकफक ले पंडऱी हे, न दाई ल फबत हे, न ददा ल, फूल सरीख हे, आ देख ले।’’
बाप बिलवा, महतारी बिलई, बच्ची फकफक ले पंडऱी, और क्या देखेगा फगनू ? उठकर चला गया। दाइयों ने सोचा होगा - टूरी होने के कारण फगनू  को खुशी नहीं हुई होगी।
बच्ची बिलकुल फूल सरीखी है, नाम रख दिया गया फूलो।
इसी फूलो की कल बरात आने वाली है।
0
दो खोली का घर, शादी का मंड़वा सड़के के एक  किनारे को घेर कर सजाया गया है। जात-गोतियार और गाँव-पार वालों ने पता नहीं कहाँ- कहाँ से बाँस-बल्लियों का जुगाड़ कर के बिहाव का मड़वा बनाया है। बौराए आम और चिरईजाम की हरी टहनियों से मड़वा को सजाया है। बैसाख की भरी दोपहरी में भी मड़वा के नीचे कितनी ठंडक है ? इसी को तो कहते हैं, हरियर मड़वा।
मड़वा के बाजू में ही चूल बनाया गया है, बड़े-बड़े तीन चूल्हों में खाना पक रहा है। भात का अंधना सनसना रहा है। बड़ी सी कड़ाही में आलू-भटे की सब्जी खदबद-खदबद डबक रहा है। साग के मसालों की खुशबू से सारा घर महक रहा है। आज जाति-बिरादरी वालों का पंगत जो है।
आज ही तेलमाटी-चुलमाटी का नेग होना है। तेल चढ़ाने का नेग भी आज ही होना है। तेल उतारने का काम बरात आने से पहले निबटा लिया जायेगा।  बरात कल आने वाली है। माँ-बाप की दुलारी बेटी फूलो कल पराई हो जायेगी, मेहमान बन जायेगी।
सज्ञान बेटी कब तक महतारी-बाप के कोरा में समायेगी ? माँ-बाप का कोरा एक न एक दिन छोटा पड़ ही जाता है। दो साल पहले से ही फूलो के लिये सगा आ रहे थे। सरकारी नियम-कानून नहीं होते तो फगनू अब तक नाना बन चुका होता। फिर बेटी का बिहाव करना कोई सरल काम है क्या ? हाल कमाना, हाल खाना। लाख उदिम किया गया, बेटी की शादी के लिये चार पैसे जुड़ जाय,पर गरीब यदि बचायेगा तो खायेगा क्या ?
घर में शादी का मड़वा सजा हुआ है और फगनू  की अंटी में आज कोरी भर भी रूपया नहीं है।
बहन-भाँटो का फगनू को बड़ा सहारा है। सारी जिम्मेदारी इन्हीं दोनों ने उठा रखी है। ढेड़हिन-ढेड़हा भी यही दोनों हैं, फूफू - फूफा के रहते भला कोई दूसरा ढेड़हिन-ढेड़हा कैसे हो सकता है ? बहन-भाँटो बिलकुल बनिहार नहीं हैं, पुरखों का छोड़ा हुआ दो एकड़ की  खेती है, साल भर खाने लायक अनाज तो हो ही जाता है, फिर रोजी मजूरी तो करना ही है। फूफू  ने भतीजी की शादी के लिये काफी तैयारियाँ की हुई है। भाई की माली हालत तो जानती ही है वह। झोला भर कर सुकसा भाजी,काठा भर लाखड़ी का दाल, पैली भर उड़द की दाल और पाँच काठा चाँउर लेकर आई है। बाकी सगे-संबंधियों ने भी इच्छा अनुसार मदद किया है फगनू की। पारा-मुहल्ला वालों ने भी मदद की है, आखिर गाँव में एक की बेटी सबकी बेटी जो होती है। गरीब की मदद गरीब नहीं करे तो और कौन करेगा। फगनू को बड़ा हल्‍का  लग रहा है।
मुहल्ले के कुछ लड़कों ने बजनहा पार्टी बनाया हैं, अभी-अभी  बाजा खरीदे हैं और बजाना सीख रहे हैं। कल ही की बात है, लड़के लोग खुद आकर कहने लगे - ’’ जादा नइ लेन कका · , पाँच सौ एक दे देबे। फूलों के बिहाव म बजा देबों।’’
फगनू ने हाथ जोड़ लिया। कहा - ’’काबर ठटठा मड़ाथो बेटा हो, इहाँ नून लेय बर पइसा नइ हे, तुँहर बर कहाँ ले लाहू ? ’’
बजनहा लड़के  कहने लगे - ’’हमर रहत ले तंय फिकर झन कर कका, गाँव-घर के बात ए, बस एक ठन नरिहर बाजा के मान करे बर अउ एक ठन चोंगी हमर मन के मान करे बर दे देबे, सब निपट जाही।’’
इसी तरह से सबने फगनू की मदद की। सबकी मदद पाकर ही उसने इतना बड़ा यज्ञ रचाया है।
भगवान की भी इच्छा रही होगी, तभी तो मनमाफिक सजन मिला है। होने वाला दामाद तो सोलह आना है ही, समधी भी बड़ा समझदार है। रिश्ता एक  ही बार में तय हो गया।
पंदरही पीछे की बात है, सांझ का समय था। कुछ देर पहले ही फगनू मजदूरी पर से लौटा था। समारू कका आ धमका। दूर से ही आवाज लगाया - ’’अरे ! फगनू , हाबस का जी ? ’’
समारू कका की आवाज बखूबी पहचानता है फगनू, पर इस समय उसके आने पर वह अकचका गया। खाट की ओर ऊँगली से इशारा करते हुए कहा - ’’आ कका, बइठ। कते डहर ले आवत हस, कुछू बुता हे का ? ’’
समारू के पास बैठने का समय नहीं था। बिना किसी भूमिका के शुरू हो गया - ’’बइठना तो हे बेटा, फेर ये बता, तंय एसो बेटी ल हारबे का ? सज्ञान तो होइच् गे हे, अब तो अठारहा साल घला पूर गे होही। भोलापुर के सगा आय हें, कहितेस ते लातेंव।’’
फगनू  का आशंकित मन शांत हुआ। हृदय की धड़कनें संयत हुई, कहा - ’’ठंउका केहेस कका, पराया धन बेटी; एक न एक दिन तो हारनच् हे। तंय तो सियान आवस, सबके कारज ल सिधोथस, कइसनों कर के मोरो थिरबहा लगा देतेस बाप, तोर पाँव परत हँव।’’
समारू कका फगनू को अच्छी तरह जानता है। बिरादरी का मुखिया है वह। सज्ञान बेटी के बाप पर क्या गुजरता है, इसे भी वह अच्छी तरह जानता है। ढाढस बंधाते हुए कहा - ’’होइहैं वही जो राम रचि राखा। सब काम ह बनथे बइहा, तंय चाय-पानी के तियारी कर, फूलो ल घला साव-चेती कर दे। मंय सगा ल लावत हँव।’’
समारू कका  अच्छी तरह जानता है - चाय-पानी की तैयारी में वक्त लगेगा। बेटी को भी तैयार होने में वक्त लगेगा। इसीलिये सगा को कुछ देर अपने घर बिलमाये रखा। तैयारी के लिये पर्याप्त समय देकर ही वह मेहमानों को लेकर फगनू के घर पहुँचा। इस बीच समय कैसे बीता, फगनू को पता ही न चला। उसे समारू कका की जल्दबाजी पर गुस्सा आया, सोचा - कितनी जल्दी पड़ी है कका को, तैयारी तो कर लेने दिया होता ? पर मन को काबू में करते हुए उसने मेहमानों का खुशी-खुशी स्वागत किया।
हाथ-पैर धोने के लिये पानी दिया गया। आदर के साथ खाट पर बिठाया गया। चाय-पानी और चोंगी-माखुर के लिये पूछा गया।
वे दो थे। फगनू ने अंदाजा लगाया - साथ का लड़का ही होने वाला दामाद होगा। बुजुर्ग चाहे उसका बाप हो या कोई और। मौका देखकर फगनू ने ही बात आगे बढ़ाई। मेहमानों को लक्ष्य करते हुये उसने समारू कका से पूछा - ’’सगा मन ह कोन गाँव के कका ?’’
जवाब देने में बुजुर्ग मेहमान ही आगे हो गया, कहा - ’हमन भोलापुर रहिथन सगा, मोर नाँव किरीत हे।’’ अपने बेटे की ओर  इशारा करके कहा - ’’ये बाबू ह मोर बेटा ए, राधे नाँव हे। सुने रेहेन, तुँहर घर बेटी हे, तब इही बेटा के बदला बेटी माँगे बर आय हंव।’’
फगनू अनपढ़ है तो क्या हुआ, बात के एक-एक आखर का मतलब निकाल लेता है, बोलने वाले की हैसियत को तौल लेता है। मेहमान की बात सुनकर समझ गया, सगा नेक है। वरना लड़की मांगने आने वालों की बात ही मत पूछो। कहेंगे, ’गाय-बछरू खोजे बर तो आय हन जी।’ इस तरह की बातें सुनकर फगनू का, एड़ी का रिस माथा में चढ़ जाता है। बेटी को पशु समझकर ऐसी बात करते हैं क्या ये लोग ? इस तरह के दूषित भाव यदि पहले से ही इनके मन में है तो पराए घर की बेटी का क्या मान रख सकेगा  येे ? कितना दुलार दे सकेगे ये लोग ? पर यह सगा ऐसा नहीं है। कहता है, बेटा के बदला बेटी मांगने आए हैं। कितना सुंदर भाव है सगा के मन में। लड़का भी सुंदर और तंदरूस्त दिख रहा है। ठुकराने लायक नहीं हैं यह रिश्ता। फगनू  ने मन ही मन बेटी को हार दिया। रह गई बात लड़की और लड़के की इच्छा की,घर गोसानिन के राय की। यह जानना भी तो जरूरी है।
सबने हामी भरी और रिश्ता तय हो गया।
लड़के के बाप ने कहा - ’’ जनम भर बर सजन जुड़े बर जावत हन जी सगा, हमर परिस्थिति के बारे म तो पूछबे नइ करेस, फेर बताना हमर फरज बनथे। हम तो बनिहार आवन भइ, बेटी ह आज बिहा के जाही अउ काली वोला बनी म जाय बर पड़ही, मन होही ते काली घर देखे बर आ जाहू।’’
फगनू भी बात करने में कम नहीं है। बात के बदला बात अउ भात के बदला भात, कहा - ’’बनिहार के घर म काला देखे बर जाबो जी सगा, हमूँ बनिहार, तहूँ बनिहार। चुमा लेय बर कोन दिन आहू , तउन ल बताव।’’
इसी तरह से बात बनी और कल फूलों की बारात आने वाली है। आज फूलो की तेल चढ़ाई का रस्म पूरा किया जायेगा। एक - एक  करके नेंग निबटाये जा रहे हैं।
0
शाम का वक्त है। घर में सभी ओर गहमा-गहमी का माहौल है। कोई नाच रहा है तो कोई गा रहा है। फगनू  चिंता में डूबा हुआ कुछ सोंच रहा है। ठीक ही तो कहती है फूलो की माँ - ’’बेटी ल बिदा करबे त एक ठन लुगरा-पोलखा घला नइ देबे ? एक ठन संदूक ल घला नइ लेबे ? नाक - कान म कुछू नइ पहिराबे ? सोना-चाँदी ल हम बनिहार आदमी का ले सकबो, बजरहूच् ल ले दे। लइका ह काली ले रटन धरे हे।’’
पर क्या करे फगनू ? अंटी में तो पैसा है नहीं। कल से जुगाड़ में लगा हुआ है। किस- किस के पास हाथ नहीं फैलाया होगा ? सेठ लोग कहते हैं - ’’रहन के लिये कुछ लाए हो ? ’’
रहन में रखने के लिए क्या है उसके पास ? वह मेहनती है, ईमानदार है, सच्चा है सद्चरित्र है। पंडे-पुजारी और ज्ञानी-ध्यानी लोग मनुष्य के अंदर जितनी अच्छी-अच्छी बातों की अनिवार्यता बताते हैं। वह सब हैं फगनू के पास। और यदि इन ज्ञानी-ध्यानियों की बातों का विश्वास किया जाय तो ईश्वर भी फगनू के ही पास है, क्योंकि भगवान सबसे अधिक गरीबों के ही निकट तो रहता है। इस दुनिया में फगनू के समान गरीब दूसरा कोई और होगा क्या ? पर ये सब बेकार की चीजें हैं, इसके बदले में फगनू को पैसा नहीं मिल सकता। मंदिर का भगवान भले ही लाखों-करोड़ों का होता है, पर जो भगवान उसके निकट है, दुनिया में उसका कोई मोल नहीं है। उसे रहन में रखने के लिये कोई तैयार नहीं है। इससे फूलो की बिदाई के लिये सामान नहीं खरीदा जा सकता। फूलो के लिये कपड़े और गहने नहीं मिल सकते हैं इसके बदले में।
पंडे-पुजारी और ज्ञानी-ध्यानी लोग मनुष्य के अंदर जितनी अच्छी-अच्छी बातों की अनिवार्यता बताते हैं। मालिके के पास उनमें से कुछ भी नहीं है। भगवान भी उसके निकट नहीं रहता होगा, फिर भी उसके पास सब कुछ है। पैसा जो है उसके पास। वह कुछ भी खरीद सकता है।
फगनू  ने जीवन में पहली बार अपनी दरिद्रता को , दरिद्रता की पीड़ा को, दरिद्रता की क्रूरता  को उनके समस्त अवयवों के साथ,  अपने रोम-रोम के जरिये, दिल की गहराइयों के जरिये,अब तक  उपयोग में न लाये गए दिमाग के कोरेपन के जरिये, मन के अनंत विस्तार के जरिये, और आत्मा की अतल गहराइयों के जरिये महसूस किया।
थक -हार कर, आत्मा को मार कर, न चाहते हुए भी वह मालिके के पास गया था। उनकी बातें सुनकर फगनू का खून खौल उठा था। जी में आया, साले निर्लज्ज और नीच के शरीर की बोटियाँ नोचकर कुत्तों और कौओं को खिला देेना चाहिये। कहता है - ’’तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी का मैं क्या करूँगा रे फगनू । मैं तो एक हाथ से देता हूँ और दूसरे हाथ से लेता हूँ। जिसके लिये तुझे पैसा चाहिये, जा उसी को भेज दे, सब इंतिजाम हो जायेगा, जा।’’
फूलो की माँ को उसने अपनी बेबसी बता दिया है और सख्त ताकीद भी कर दिया है कि अब किसी के सामने हाथ फैलाने की कोई जरूरत नहीं है। लड़की कल तक जो पहनते आई है, उसी में बिदा कर देना है। लड़की को दुख ज्यादा होगा, थोड़ा सा और रो लेगी, माँ-बाप को बद्दुआ दे लेगी। रही बात दुनिया की, उसकी तो आदत है हँसने की, करोड़ों रूपये खर्च करने वालों पर भी हँसती है वह। वह तो हँसेगी ही।
फूलो को तेल चढ़ाने का वक्त आ गया है। ढेड़हिन-सुवासिन सब हड़बड़ाए हुए हैं। सब फूलो और उसकी माँ पर झुँझलाए हुए हैं। फूफूू  कह रही है - ’’अइ ! बड़ बिचित्र हे भई, फूलो के दाई ह, नेंग-जोग ल त होवन देतिस, बजार ह भागे जावत रिहिस ? नोनी ल धर के बजार चल दिस।’’
0
आज फूलो की बारात आने वाली है। फगनू  बेसुध होकर नाच रहा है। मंद- महुवा का कभी बास न लेने वाला फगनू आज सुबह से ही लटलटा कर पिया हुआ है। फूलो का मासूम और सुंदर चेहरा रह-रह कर उसकी नजरों में झूम रहा है। चाँद-सा सुंदर चेहरा है, नाक में नथनी झूम रहा है, कान में झुमका और पैरों में पैरपट्टी पहनी हुई है। सरग की परी से भी सुंदर लग रही है फूलो।
फूलो के लिये खरीदा गया बड़ा सा वह संदूक भी उसकी नजरों से जाता नहीं है, जो नये कपड़ों, क्रीम-पावडरों और साबुन-शेम्पुओं से अटा पड़ा है।
अब सबको बारात की ही प्रतीक्षा है। सब खुश हैं। सबको अचरज भी हो रहा हैं, सुबह से फगनू के मंद पी-पी कर नाचने पर। कोई कह रहा है - ’’बेटी ल बिदा करे म कतका दुख होथे तेला बापेच् ह जानथे, का होइस, आज थोकुन पी ले हे बिचारा ह ते ? ’’
जितने मुँह, उतनी बातें।
फगनू अब नाच नहीं रहा है, नाचते-नाचते वह लुड़क गया है। कौन क्या कर रहा है, कौन क्या बोल रहा है, उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। उसके कानों में तो मालिक की बातें पिघले शीशे की तरह ढल रही हैं - ’’ तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी का मैं क्या करूँगा रे फगनू । मैं तो एक हाथ से देता हूँ और दूसरे हाथ से लेता हूँ। जिसके लिये तुझे पैसा चाहिये, जा उसी को भेज दे, सब इंतिजाम हो जायेगा, जा।’’
फगनू  सोच रहा है, जीवन में पहली बार सोच रहा है - ताकत जरूरी है। शरीर की भी और मन की भी। बिना ताकत सब बेकार है। ताकत नहीं है इसीलिये तो उसके पास कुछ नहीं है।
और उसकी नजरों में वह कुल्हाड़ी उतर आया जिसकी धार को उसने दो दिन पहले ही चमकाया था। वह सोच रहा था - आज तक कितने निरीह और निष्पाप पेड़ की जड़ों को काटा है मैंने इससे। क्या इससे अपनी जहालत और दरित्रता की जड़ों को नहीं काट सकता था ?
पता -
व्याख्याता,
शास. उच्च. माध्य. शाला कन्हारपुरी,
 राजनांदगांव 

दीवाली किस तरह मनाऊँ


डॉ. केवल कृष्ण '' पाठक '' 

जहां  द्वेष-भावना  प्रबल हो
जातिवाद   परचम   लहराए
ऊपर-ऊपर मीठा-मीठा बोले
अन्दर-अन्दर  छुरी  चलाए
ऐेसे  वातावरण  में कैसे
प्रेम ज्योति की ज्योत जलाऊँ
दीवाली किस तरह  मनाऊँ
                                  हर एक  को पैसे की चिंता
                                  देखने  में  लगता  है  साधु
                                 लूट- मार कर के  घर भरना
                                 धनपति  हो जाने  का जादू
                                 देश-प्रेम  की नहीं है चिंता
                                 ऐसे में  अब  कहां मैं जाऊँ
                                दीवाली किस  तरह मनाऊँ
चाहते सबका मालिक बनना
पर  अपने  को नहीं  जानते
अनुशासन  का  करें उलंघन
संयम  करना   नहीं  जानते
दूजे का घर   उजड़  रहा तो
कैसे  घर  में  खुशी  मनाऊँ
दीवाली  किस  तरह मनाऊँ
                           उग्रवाद  का  साम्राज्य  है
                           हत्या  को  ही  धर्म   मानते
                           दया-भाव न  मनमें किसी के
                           वे तो हत्या  करना जानते
                           ऐसा  ही  सब  हाल  देख के
                           विचलित  होकर  नीर बहाऊँ
                           दीवाली किस  तरह  मनाऊँ
झूठ - कपट सबके मन में है
नहीं  चरित्र निर्माण हो रहा
भारत  एक  महान  देश था
शनै-शनै अब प्राण खो रहा
युवा देश को गलत दिशा लें
तब  मैं कैसे   हर्ष  मनाऊँ
दीवाली  किस तरह मनाऊँ
                          अब तो सब  फीका लगता है
                          उत्सव  का   उत्साह  नहीं है
                          मन  में  कोई  खुशी न हो तो
                          लीक  पीटना   चाह  नहीं हैे
                          जब सबके  मन ज्योतित हों
                         तब  ही  मैं  दीवाली मनाऊँ
                         चहूं  दिशा  में दीप   जलाऊँ
                         अन्तर-मन   प्रकाश  फैलाऊँ 
पता - 
343/ 19, आनन्द निवास, 
गीता  कॉलोनी, 
जीन्द - 126102 हरियाणा
मोबाईल : 941638948

फिर हिटलर


प्रोफेसर थानसिंह वर्मा

फिर हिटलर के कदमों की आहट है
हिटलर तब आया था
लोकतंत्र की हत्या के लिए
जर्मन संसद पर हमला 
दोष विरोधियों के सर
दे विकास का वास्ता 
किया सत्ता पर अधिकार
किया यहूदियों का संहार 
फिर धावा कमेरों पर
मार्क्‍स , लेनिन, समाजवाद पर
गल्फस्ट्रीम की गर्मधाराएं भले नहीं मुड़ी
हिटलर के लिए / चुप रह साथ दिए
टैंक - मोर्टर लंदन - वाशिंगटन के
कमेरों की हड्डियां बने बज्र
हिटलर के लिए बना वाटरलू लेनिनग्राद.
अब फिर हिटलर के
कदमों की आहट है
दसों दिशाओं, दसमुख से वृन्दगान
ओ हिटलर ! विकास  पुरुष
एजेण्डा दिल्ली
खाद - पानी, अयोध्या,काशी, मथुरा
रसद् वाशिंगटन का
निशाने पर फिर लोकतंत्र
गांधी, अम्बेडकर, संविधान, समाजवाद
यहुदियों की जगह मुसलमान
इसाई, दलित, आदिवासी, कमेरे ( मजदूर )
देखना है बर्लिन से दिल्ली का
फासला कैसे तय करता है हिटलर,
क्या कमेरों की हड्डियां फिर बनेंगे बज्र
और दिल्ली वाटरलू ?

पता 
शांतिनगर, गली नं. 2
राजनांदगांव [छत्तीसगढ़]
मोबाईल : 9406272857  

बदली हवा

राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी '  बन्धु '

हरीश जब कार्यालय से लौटा, माँ को उदास देखकर पूछा - मम्मी, क्या बात है। आज आप उदास लग रही हैं ?''
- क्या कहूँ बेटा ? बहू अब मेरी एक भी बात नहीं सुनती। वह वही करती है जो उसे ठीक लगता है। हमारे कहने का उस पर कोई असर नहीं होता। '' माँ ने मन की पीड़ा बेटे के समक्ष उगल दिया।
- क्या करुँ मम्मी, पढ़ी - लिखी बड़े घर की बेटी होने के कारण वह मेरा भी कहना कहाँ सुनती है। उल्टा मुझसे ही सारे काम करवाने की इच्छा रखती है। उसे जब पैसा चाहिए तभी ढंग से बात करती है।''  अपनी विवशता बता रहा था कि उसकी पत्नी कर्कश स्वर गूँजा - अब वहीं खड़े होकर भाषण देते रहोगे या अन्दर भी आओगे। सुबह जो काम कहे थे उसका क्या हुआ ?''  हंगामा खड़ा न हो जाय यह सोचकर हरीश पत्नी की ओर बढ़ गया।
उसके जाते ही माँ सोचने लगी - यह तो स्वयं पत्नी से घबराता है तो उसे समझायेगा कैसे ?'' वह दु:खी हो उठी। आगे का जीवन क्या ऐसे ही कटेगा ? उसकी दृष्टि कमरे में रखी देवता की मूर्ति पर चली गई। भरी आँखों से उसने कमरे की बत्ती बुझा दी।   
पता - 
331 - निराला नगर,
नि·ट हनुमान मन्दिर
रायबरेली - 229001
मोबाईल - 09005622219

लोकतंत्र का रास


  • अशोक '' अंजुम ''
लोकतंत्र से लोक का, मुश्किल हुआ निबाह
राजाजी की जीभ पर, बैठा तानाशाह
लोकतंत्र की खाद का ये था असर महीन
समरसता की अंतत: बंजर हुयी ज़मीन

लोकतंत्र की राह में, राजतंत्र की धूम
शीश झुका जय - जय करे, उमड़ा हुआ हुजूम

बाहुबली कुर्सी चढ़े, हुए श्रेष्ठतम सिद्ध
जनता गौरैया बनी, नेता जैसे गिद्ध

मनमोहन की बाँसुरी, लोकतंत्र का रास
आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास

अंधकार का हो रहा, लोकतंत्र अभ्यस्त
करते - करते जागरण, हरकारे है त्रस्त

पोस्टमार्टम से हुआ, ये जनता को ज्ञान
नेताजी की अब तलक, थी कुर्सी में जान

समरसता के नाम पर, कर बापू को याद
राजघाट पर रोज ही, सिसके गाँधीवाद

मुँह बिचकार कह रही, ' अंजुम' जेल तिहाड़
कहाँ - कहाँ से भर दिया, लाकर यहाँ कबाड़

' अंजुमजी ' इस दौर में, यही कष्ट है मात्र
हो प्रविष्ट किस भाँति अब सही जगह पर पात्र 

पता
सम्पादक '  अभिनव प्रयास '
गली - 2,चन्द्रविहार कॉलोनी, 
क्वारसी बाइपास, अलीगढ़ 202001( उ.प्र.)
मोबाईल : 09258779744,09358218907

इक ये भी जिन्दगी



  • अर्पणा शाह
 इसे आप लोग कहानी कहिये या रुबरु अनुभुति पर सच तो ये भी है कि जिसे सुना जाता है ,गुना जाता है वो कहानी के भेष में ही तब्दील होता है।
सुबह बच्चों को स्‍कूल ,पतिदेव को ऑफिस भेज टीवी खोल,फोन हाथ फासले पर रख फुरसत के क्षणों को महसुस कर रही थी। अभी राहत महसूस करना शुरू कर दी थी ही कि मिसेज़ शर्मा का फोन आ गया - क्या हो रहा जी मिसेज साहा,मेरा तो आज सुबह - सुबह ही दिन खराब हो गये ।''
- क्या हुआ जी ? '' मैं थोड़ा घबड़ा सी गई।
- अभी दूसरी दाई से पता चला कि आज अनीता काम करने नहीं आयेगी। उसका दूसरा बेटा भी मर गया। आज सुबह, वैसे अब मैं 6 - 7 दिनों तक तो काम नहीं ही करवाउंगी।'' मिसेज शर्मा को काम की पड़ी थी पर मैं ये सुन सुन्न हो गई थी। तब तक मेरी बाई भी आ गई ऐसे भी एक ही बस्ती में रहती हैं। अत: उससे अनीता के बेटे के लिये पूछी।  दु:ख के साथ बताना शुरू की - क्या बतायें मेम साहेब। आज सुबह 4 बजे ही मरा। बुखार में था 5 - 6 रोज से। पैदाईशी तो हिलते रहता था। इलाज़ का भी तो पैसा नहीं था। बिना इलाज मर गया ।'' अनीता का पति महीना में 5 - 6 दिन काम  करता है बाकी दिन पीता है और अनीता को  पीटता है। अनीता 6 - 7 घर काम करके उसका और बच्चों का पेट भरती है। फिर भी वो इसपे शक करता है। उल्टा - पुल्टा बोलता है।  झगड़ा करता है। ये कुछ बोलती है तो पीटता है। बच्चों को भी पीटता है और सभी को दहशत में रखता है। मैं क्या सुनूँ ,कितना सुनूँ ,यहाँ तो हर एक के बाद दूसरी की यही कहानी है।
इन लोगों की यही जिंदगी होती है और इसे काफी स्वाभाविक रूप से ये लोग ग्रहण भी करती हैं। इसे अपनी किस्मत समझ अभयस्त सी हो जाती है। न शिकवा न शिकायत। कोई और किससे भला। अनीता को 14 - 15 सालों से मैं देख रही हूँ , जब शादी हो के पति के साथ इस कॉलोनी में आई थी। उसकी सौतेली माँ मेरे यहाँ काम करती थी। अनीता लड़की ऐसी थी। उस समय 2 सालों के बाद मेरे सामने ही उसकी शादी हुई थी। जैसी सुनीता है वैसी इन लोगों में कम ही होती है। एकदम गोरा रंग। तीखे नाक - नक्श। पतली - दुबली। छोटी सी। इतनी फुर्तीली कि लगता देह पे जिन्नात है। स्वाभाव की काफी मीठी और खुशमिजाज थी। सभी का काम चुटकियों में कर देना उसकी काबलियत थी। कभी - कभी मेरे यहाँ आती तो उसके हर गुण को निरखती और मुग्ध होती काश! उस कौम की नहीं होती वो। शादी उसकी अच्छी नहीं हुई थी। सुनी थी उसकी सौतेली माँ नहीं होने दी थी। पर इन लोगों को अच्छी शादी क्या ? बस एक मर्द के साथ रहने लगती है अलग झोपड़ी डाल और बालों के बीच सिंदूर लगाने लगती है। कुछ दिनों में सभी लड़के एक समान मर्द में तब्दील हो जाते हैं। पीना और रुआब झाडऩा शायद मर्दांनगी समझते हैं।
ये लड़कियाँ भी घर - घर जा के काम करना अपना धर्म या व्यस्तता में मन लगना जैसा कुछ समझती है। शादी के बाद भी ये लोग अपना काम नहीं छोड़ती हैं, तो लड़का यदि कमाते भी रहता है वो भी धीरे - धीरे काम करना छोड़ के दारु पीने लगता है। पहले कभी - कभी फिर रोज ब रोज।  उसके बाद तो कुछ गलत लगने पर पीटना भी शुरू कर देता है। फिर तो ये रोज की आदत हो जाती है। मानसिकता ही ऐसी हो गई है कि शादीशुदा मर्द,मतलब दारु पीना। घर देखना। पीटना। औरतें भी बड़ी मजे से हल्ला - गुल्ला कर के मार खाती हैं और संतुष्ट रहती हैं। बड़े नाज से बोलती है - मर्द है न मेरा,दूसरे का नहीं न। मुझे ही न मारेगा। अधिकार समझता है तब न। शादी के तुरन्त बाद से ही बच्चों की लाइन लग जाती है। और देखते ही देखते कुछ सालों में ये कब बूढ़ी हो जाती है पता ही नहीं चलता है। मन काफी क्षुब्ध,अवसादग्रसित हो गया। कैसी - कैसी जिंदगी गढ़ते रहते हैं भगवान। इक  ये भी जिंदगी है। मेरी बाई आगे जाने क्या - क्या बोलते जा रही। मैं अनमनी सी सुन के भी न सुन पा रही थी। पर जाने क्यूँ अनीता से एक बार मिलने की इच्छा बलवती हो गई। 2 - 4 दिनों के बाद ही अनीता रास्ते  में मिली अपने बस्ती की औरतों के साथ। पूछने पर बोली - मेमसाहेब जहा बच्चे को मिट्टी दी गई है वही से आ रही हूँ।  सियार, कुत्ता वगैरह मिट्टी  कुरेदकर शरीर बाहर निकाल के खा जाता है ,सो ठीक ठाक करके आ रही हूँ।
- क्वार्टर पर आना मेरे। '' कह कर मैं आगे बढ़ गई। कैसी तो बूढी,निरस्त सी लग रही थी अनीता। दूसरे दिन अनीता आई मेरे पास। बैठते फफकनेे लगी वह। मन भर के जब रो ली तब मैं दिलासा दे पूछी - क्या हुआ था तुम्हारे बच्चे को ? '' कुछ देर शांत बैठी रही फिर बताई - क्या बतायें मेमसाहेब ,क्या करें। हम लोगों की यही जिन्दगी है। छोटा बेटा भी बड़े की तरह ही हिलते रहता था। स्थिर कहाँ थोड़ी देर भी रह पाता था। कमजोर था ही। बुखार लगा। 5 - 6 दिन रहा। फिर जाने क्या हुआ कि चला गया।''
- बुखार में था तब डॉ. को नहीं दिखाई इलाज नहीं करवाई क्‍या । '' मेरे इतना बोलते मानो दु:ख में कातर हो चीत्‍कार की, जितना हुआ मेमसाहेब की। जितना भागदौड़ कर सकती थी की । पर क्या और करती। मेरे सामर्थ में और क्या है । हॉस्पिटल में मुफ्त का न ही डॉ. देखता है, न ही दवा मिलता है।  गरीबों का कोई नहीं है। उतना पैसा आखिर मैं कहाँ से लाती। खाने - पीने में ही तो सारा पैसा खत्म हो उधार चढ़ा रहता है।''
- अनीता पति को कहती नहीं, कमायेगा वह।''
- अरे मेमसाहेब वह कमाते रहता तो क्या सोचना था।  कमाने कहने पर पी के आयेगा और पीटेगा। तरह - तरह के शक करता है और माथे पे खून सवार किये रहता है। हर वक्त बबाल मचाये रहता है।'' 
- तुम लोग इतने बच्चे क्यूँ पैदा करती हो । पैसा नहीं होने से लालन - पालन ठीक नहीं  कर पाती हो। देखो सरकार मुफ्त का कैम्प लगवाती है। पैसा भी देती है। क्यूँ न ऑपरेशन करवा लेती हो। तुम कमजोर हो तो बच्चे कमजोर होंगे न।
- मेमसाहेब ऑपरेशन करवाने का समय कहाँ मिलता है। फिर क्या खाऊँगी और बच्चों को क्या खिलाऊँगी जब घर बैठ जाउंगी। जानती हैं मेमसाहेब मेरा मर्द एक तरीके से ठीक ही कहता है जितना इलाज में पैसा लगाओगी ,दिक्कत सहोगी। उससे कम में आसानी से दूसरा बच्चा पैदा कर लोगी।''  फिर अनीता मेरा मुहँ देखने लगी। और मैं भी सोचती हूँ कि कहीं ऐसा हो ही जाये कि अब की जो बच्चा होये कहीं वो हिलते नहीं रहे बिल्‍कुल दुरुस्त हो। उफ्फ  क्या बोल रही सुनीता। मैं उसकी मानसिकता। सोच पर विमूढ़ सी हो गई । उसके शरीर की अवस्था देख चुप सी हो गई। इसलिए अनीता इतनी आश्वत और आशान्वित सी लग रही है। व्यक्ति की मानसिकता भी हालात पर आधारित होते हैं। कितने अच्छे ढंग से वह अपने बेटा के मरने के दु:ख को किसी  बहाने के भीतर दबा के भूल रही है। कितनी सहजता से वह अपनी ममता और स्त्रीत्व को दफऩ कर दी है। या हो सकता है अभावग्रस्त ये लोग इन सभी  सोच के भी नहीं सोच पाते हों। तो क्या मानवीय गुण या भावनायें भगवान ही देन नहीं है।
पता -
एस. सी. साह, डी - 18,
सेक्टर - 3, पोष्ट - जयंत, जिला - सिनरौली [ म.प्र.] ४८६८८९

अल्पेश पी. पाठक '' पागल '' : दो गज़लें

आज दिल की कली कँवल हो गई।
बंद आँखों में इक शकल हो गई।।
आज तो .. बाग - बाग था लड़का
और लड़की गझल - गझल हो गई।।
निंद  में .. परियां को बुलाने में ..
कितनी दुश्वारी आजकल हो गई।
मैंने खुद को जरा संवारा है ...
मुश्किलें कितनी मेरी हल हो गई
छोटा था मैं तब दिल बड़ा सा था
आज दिल से बड़ी अकल हो गई
वक्त के ... कारसाझ हाथ से ...
मेरी दीवानगी ... कतल हो गई
क्या कहूँ मेरे देश को ''  पागल ''
दिल्ली अब दिल पे भी अमल हो गई 
( 2 )
चीख वो अखबार में छप आयेगी
आज की ताजा खबर कहलायेगी
चार दिन अफवाह दौड़ेगी जनाब
फिर तो यह आवाज़ भी थक जायेगी
चार पंछी .. एक पत्थर से गिरे ...
तब पुरानी सोच भी शरमायेगी
रात है तन्हाईयों के हाथ में
वक्त पे परछाईयाँ मर जायेगी
रंग अक्सर बात करतें है यहाँ
शायरी क्या - क्या गज़ब दिखलायेगी
पता -
अमि प्रभा, 101- ए 
डिवाइनगर, मेन रोड, 
माधव रेसीडेन्सी नजदीक, रैया चोकडी, 
राजकोट - 360005 मो. 8306105527    

आधुनिक आदर्श आदमी

  • वीरेन्द्र सरल

बहुत पुरानी बात है। एक राजा था। एक दिन राजा ने दरबार में दहाड़ते हुये कहा - '' मंत्रियों! ये मैं क्या सुन रहा हूँ ? क्या हमारे राज्य में एक भी ऐसा आदर्श आदमी नहीं है ,जिसका हम राजकीय सम्मान कर सके  या जिसका नाम राष्ट्रीय सम्मान हेतु प्रस्तावित कर सके ? क्या हमारे राज्य में आदर्श आदमियों का अकाल पड़ गया है ?''
एक मंत्री ने सिर झुकाकर कहा - '' जी हाँ महाराज! अखबारों में मैंने भी कुछ ऐसा ही समाचार पढ़ा है। राजा फिर गुर्राया -जब आपको यह बात पहले से ही मालूम है तो आपने अभी  तक किसी को पकड़कर जबरदस्ती आदर्श आदमी बनाया क्यों नहीं ? सिर झुकाकर खड़े रहने से काम चलने वाला नहीं है मंत्री जी, आप अभी जाइये और हमारे लिये एक आदर्श आदमी ढूंढकर हमारे सामने पेश कीजिए। हम अभी और यहीं उसका सम्मान कर देते हैं।''
मंत्री हाथ जोड़कर थर - थर कॉंपते हुये बोला- नहीं,नहीं महराज! ऐसा अन्याय मत कीजिये। इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं हैं। हमें कुछ समय दीजिये। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि इस राज्य मे जितने भी आदर्श आदमी हैं , उन्हें चुन - चुन कर आपके सामने पेश कर देंगें फिर आप उनका जितना और जैसा सम्मान करना चाहें कर लीजियेगा। हड़बड़ी में यदि किसी गलत आदर्श आदमी का सम्मान हो गया तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा, महराज। एक बार आप ठंडे दिमाग से सोच विचार कर लीजिये फिर हमें आदेश दे तो बड़ी कृपा होगी।''
कुछ समय तक सोचने के बाद राजा ने कहा - ठीक  है,हम आपको एक माह का समय देते है। एक माह के भीतर चाहे जैसे भी हो ,हर हाल में आप हमारे सामने एक आदर्श आदमी पेश करेंगें नहीं तो आपकी नौकरी गई , समझ गये ?''
मंत्री चुपचाप सिर झुकाकर  जो आज्ञा सरकार कहा और दरबार से बाहर निकल आया। राजा की झिड़की सुनने के कारण उसका दिमाग गरम हो गया था। इसलिये वह सिपाहियों को बुलाकर अपना गुस्सा उतारते हुये कहा - राजा का आदेश है कि इस राज्य का कोई भी आदर्श आदमी ,चाहे वह पाताल में ही क्यों न छिपा हो ,उसे पकड़कर पन्द्रह दिनों के भीतर मेरे सामने पेश करो। चारों तरफ  नाकेबंदी कर दो। कोई भागने न पाये। और यदि कोई भागने की कोशिश करे तो उसे पकड़कर उसका वहीं सम्मान कर दो,अंडरस्टेण्ड।''
आदेश मिलते ही सिपाही गाँव - गाँव ,शहर - शहर, घूम - घूम कर आदर्श आदमी तलाशने लगे। वे चप्पा - चप्पा छान मार रहे थे पर कहीं भी किसी आदर्श आदमी का उन्हें नामोनिशान तक नहीं मिल रहा था। सिपाहियों की हालत ठीक वैसे ही हो गई थी जैसे सुग्रीव के आदेश पर सीता माता की खोज में निकले वानरों की हुई थी। वे सोच रहे थे कि ये राजा को भी किसी आदर्श आदमी के सम्मान करने की क्या सनक सवार हो गई है ? आदर्श आदमी के पीछे हाथ धोकर पीछे पडऩे की क्या आवश्यकता है,सम्मान ही तो करना है ,कर देते किसी का भी। आखिर सम्मान तो सम्मान ही होता है। वह चाहे किसी आदर्श आदमी का हो ,चाहे किसी और का। पर क्या करें भाई,राजा का आदेश है तो ढूँढना तो पड़ेगा ही। थके  हारे सिपाही भगवान से बार - बार प्रार्थना कर रहे थे कि भगवन! किसी आदर्श आदमी का पता बतला दीजिये या उससे मिलवा दीजिये जिससे कम से कम प्राण तो बचे। नहीं तो भूख प्यास मे ही दम निकल जायेगा। बहुत प्रयास करने के बाद भी जब कोई आदर्श आदमी पकड़ में नहीं आया  तब सिपाहियों ने एक नया फार्मूला अपनाया।
जहाँ कहीं भी लोगों की ज्यादा भीड़ दिखती ,सिपाही वहीं पहुँच जाते और लोगों को धमकाते हुये कहते - तुममें से जो भी आदर्श आदमी हो सीधी तरह से अपने आपको हमारे हवाले कर दो। बाद में यदि तुम लोगों मे से किसी पर भी आदर्श आदमी होने का अपराध सिद्ध हो गया तो तुम्हारी खैर नहीं। धमकी सुनकर लोग सकपका जाते। डर के मारे सभी लोग कहते - नहीं ,नहीं माई बाप ! हममें से कोई भी आदर्र्श आदमी नहीं है। हम ही क्या हमारे खानदान में कोई भी आदर्श आदमी आज तक न हुआ है और न ही भविष्य में होगा। हूजूर , हम तो आम आदमी हैं , बस दो जून की रोटी की चिन्ता में मरे जा रहे हैं। आदर्श होना तो दूर ,हम तो ये आदर्श किस चिडिय़ा का नाम है ,ये भी नहीं जानते। जाने अंजाने यदि हमसे कभी कोई आदर्श काम हो भी गया हो  तो हमें माफ कर दीजिये सरकार। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि भविष्य में हमसे ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी ।''
ये सब देख सुनकर सिपाहियों की नजरें आपस में मिलती जैसे एक दूसरे को पूछ रही हो -  अब क्या करें ? ये फार्मूला तो बेकार गया फिर वे आगे बढ़ जाते। मंत्री से उन्हें इस काम के लिये पन्द्रह दिन का समय मिला था,जिसमें से तेरह दिन बीत चुके थे। इसलिये उनके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें स्पष्ट दिखलाई पडऩे लगी थी। उनका दिल धक - धक करने लगा था।
थक हार कर वे एक जगह बैठकर विचार विमर्श करने लगे। विमर्श के बाद सभी सिपाही अंतिम रूप से इस निष्‍कर्ष पर पहुँचे कि बिना मुखबिर की सहायता लिये इस आपरेशन आदर्श आदमी मे सफल होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। इसलिये जगह - जगह मुखबिर तैनात करना जरूरी हैं।
दूूसरे ही दिन सिपाहियों के द्वारा मुखबिर तैनात कर दिये गये। उनकी यह योजना तुरंत सफल हुई। एक मुखबिर ने उन्हें सूचना दी कि अमुक स्थान पर एक आदर्श आदमी छिपा है । सिपाही अविलंब दौड़ पड़े और उस स्थान को घेर कर खड़े हो गये।
एक सिपाही ने चिल्लाकर कहा - हमें पता चल गया है कि तुम एक आदर्श आदमी हो और यहाँ छिपे हो। सीधी तरह से हमारे सामने आत्मसमर्पण कर दो। भागने की कोशिश करना बेकार है। तुम चारों तरफ  से घिर चुके हो। भागने की कोशिश करोगे तो यही सम्मानित कर दिये जाओगे।''
उस धमकी का असर हुआ। सामने वाले मकान का दरवाजा खोलकर एक आदमी बाहर निकला। हाथ उठाकर आत्मसमर्पण की मुद्रा में आगे बढ़ते हुये सिपाहियों के पास आया । सिपाहियों की बंदूके उस पर तनी हुई थी। वह बहुत समय तक अपने आपको आदर्श आदमी होने से इंकार करता रहा पर सिपाहियों के सामने उसकी एक न चली। अन्तत: उसे कबूल करना पड़ा कि वह एक आदर्श आदमी है। उसे तुरंत गिरफ्तार कर के मंत्री जी के हवाले कर दिया गया। और मंत्री ने उसे राज दरबार मे राजा के सामने पेश कर दिया ।
राज दरबार में राजा ने उसे घूर - घूर कर देखा। फिर कड़क आवाज में पूछा - तुम पर एक आदर्श आदमी होने का गंभीर आरोप है । साफ  साफ  बताओ की तुम किस तरह के आदर्श काम में संलिप्त रहतें हो। राजा के सामने चालाकी करने का अंजाम तुम भली भांति जानते हो। इसलिये यहाँ जो भी कहना,बहुत सोच समझकर और सच - सच ही कहना ,समझ गये।''
उस आदमी पर राजा की धमकी का कोई असर नही हुआ। उसने निर्भीकतापूर्वक कहा-महाराज मैं सामाजिक समरसता , साम्प्रादायिक सौहाद्र्र और समता मूलक समाज की स्थापना के लिए सतत प्रयत्नशील हूं। अन्याय ,अत्याचार ,भ्रष्ट्राचार के विरूद्ध आवाज उठाता हूँ। भय , भूख ,भ्रष्ट्राचार मुक्त समाज व्यवस्था निर्माण के लिये लोगों में जागृति लाने के लिये अपना सारा जीवन सर्मिर्पत कर दिया है और इन्हीं पवित्र उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये निरन्तर प्रयास कर रहा हूँ।
वह आदमी राजा की परीक्षा मे सफल हुआ था। इसलिये राजा खुशी से उछल पड़ा। उसे गले लगाकर शाबासी देने के लिये राजसिहांसन से बस उतरने ही वाला था। तभी एक मंत्री ने कान में फुसफुसाते हुये कहा - जरा ठहरिये राजन ! ये आप क्या कर रहे हैं ? इसने अभी क्या कहा आपने सुना नहीं ? यदि ये अपने मकसद में कामयाब हो गया तो समझ लीजिये आपकी राजगद्दी गई। राजगद्दी प्यारी है तो इसके सम्मान को गोली मारिये और अपनी कुर्सी की फिक्र कीजिये ,समझ गये ना ?''
राजा के कान खड़े हो गये। उसने तुरंत पैतरा बदलते हुये कहा - अरे यार! तुम तो ओल्ड मॉडल के आदर्श आदमी हो। कहाँ ऐसे पुराने आदर्श काम के पीछे पड़े हो ? कुछ ढंग का काम करो और मजे से रहो। मुझे तो सम्मान करने के लिये आधुनिक आदर्श आदमी की तलाश है। तुम यहाँ से चुपचाप निकल ही जाओ, इसी में हमारा भला है।'' यह सुनकर वह आदमी दरबार से बाहर चला गया।
राजा ने उस आदमी को लाने वाले मंत्री को झिड़कते हुये कहा - क्या आपको अपने लिये अच्छे बुरे आदमी की पहचान नहीं है ? मैंने आपको लेटेस्ट मॉडल का आदर्श आदमी लाने के लिये कहा था , आदर्श काम में संलिप्त रहने वाले को लाने के लिये नहीं। जाओ कोई ढंग का आदर्श आदमी पकड़कर लाओ।''
मंत्री अपना मुँह लटकाये हुये फिर दरबार से बाहर निकल आया। इस बार उसे ज्यादा मेहनत मशक्कत नहीं करनी पड़ी। वह ज्यों ही दरबार से बाहर आया तो देखा कि एक आदमी अपने हाथ में एक मोटा फाइल लिये हुये चिल्ला रहा था। मैं ही हूँ वह आदर्श आदमी ,राजा को जिसकी तलाश है। मैं अपना सम्मान कराने के लिये मरा जा रहा हूँ। भगवान के नाम पर एक बार मेरा सम्मान कर दो बाबा,प्लीज।'' मंत्री जी ने उस आदमी को पहले ध्यान से देखा। पहली नजर में वह उसे पागल नजर आया। वह नजदीक जाकर उसे डाँटते हुये कहा - ये क्या पागलपन है , तुम होशहवाश में तो हो ? यहाँ ये क्या तमाशा बना रखा है ?''
वह आदमी मंत्री जी की चरणों में दण्डवत लोट गया फिर बोला - नहीं ,नहीं, श्रीमान मैं पागल नही हूँ । मैं एक आधुनिक आदर्श आदमी हूँ। आप मेरा फाइल देख लीजिये। यह कहते हुये उसने अपना फाइल मंत्री जी के हाथों में थमा दिया। मंत्री जी ने फाइल देखा ,उसमें तरह - तरह के प्रमाण पत्र और फोटोग्राफ्स बडे ही व्यवस्थित रूप में जमे हुये थे। मंत्री जी गदगद हो गये। उसने उस आदमी को पकड़ कर तुरंत राजदरबार में पेश किया ।
राजा ने वही प्रश्न उससे भी पूछा जो पहले आदमी से पूछा गया था। उस आदमी ने बड़े ही अदब से झुककर पहले राजा को प्रणाम किया फिर पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा की जय हो का जयघोष किया। उसके बाद बोला - '' राजन! मेरा तो हर काम आदर्श है। मैं फर्जी प्रमाण पत्र जुटाने में माहिर हूँ। चाटुकारिता में मुझे गोल्डमेडल प्राप्त है। जिधर दम उधर हम के सिद्धाँत को मैंने आत्मसात किया है। बिना पेंदी के लोटे की तरह लुढ़कने में मुझे दक्षता प्राप्त है। अपने स्वार्थ के लिये गधे को भी बाप कहने में मुझे कोई परहेज नहीं है। जुगाड़ भिड़ाने में एक्सपर्ट हूँ। कोई व्ही आई पी मुझे थप्पड़ भी मार दे तो भी मैं उससे इसका प्रमाण पत्र माँग लेता हूँ और फोटो खिंचवा लेता हूँ और नीचे लिखवा लेता हूँ फलाँ व्ही आई पी से मार खाते हुये। राजा चाहे जो भी करे , मै हमेशा उसका प्रशस्ति गान करता हूँ। मैं आदर्श काम करता ही नहीं बल्कि उसे धारण करता हूँ। आप मेरा फाइल देख लीजिये,इसमें भानुमति के पिटारे से भी ज्यादा प्रमाण पत्र रखे हुये हैं।'' वह कुछ और बताता उससे पहले ही सारे दरबारी ,महाराजाधिराज की जय -  जय कार करने लगे।
राजा ने उस आधुनिक आदर्श आदमी को देखकर कहा - मोगेंम्बो खुश हुआ। मुझे बस तुम्हारे जैसे ही आदर्श आदमी की तलाश थी आज वह पूरी हुई। अब मैं तुम्हें  चैन से सम्मानित कर सकूंगा। राजा ने  एक बार गौर से अपना सिहांसन देखा और मंत्रियो को उस आदमी के राजकीय सम्मान करने की तैयारी का आदेश दे दिया। 

पता - 
बोडऱा (मगरलोड)
पोष्ट-भोथीडीह व्हाया-मगरलोड़
जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)
मो-7828243377