शनिवार, 28 अगस्त 2021

इनकी भी तो सुनो

डॉ आर बी भण्डारकर


      पुस्तकों के एक पैकेट को चिपकाना था सो दादा जी सैलो टेप का छोर ढूंढ रहे थे,जो ऐसा चिपक गया था ,कि मिल ही नहीं रहा था।
      नाखून की सहायता से सब जगह आजमा लिया;छोर नहीं मिला सो नहीं ही मिला।
      उनके पास में बैठी हुई उनकी ढाई वर्षीय पोती बीच बीच में कुछ कुछ बोल रही थी,जिस पर अपनी धुन में मस्त दादा जी ध्यान ही नहीं दे रहे थे।
      दादा जी को उपाय सूझा। कैंची के एक किनारे से टेप के बंडल को एक जगह पर हलके से खुरचा। बस छोर मिल गया इसी के सहारे; वे टेप को इच्छानुसार निकालने लगे।
      पोती बोली "मैं तो कब थे यही बोल लही थी आप थुन ही नहीं लहे थे,अपनेहहहह ही काम में लदे थे।"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें