मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

लाचार आँखें

जयन्ति अखिलेश चतुर्वेदी


'' साहब वो फिर आ गया, '' चपरासी ने बोला।
'' कौन ? '' साहब ने पूछा
'' तुलसीराम, वहीं साहब जो हर दूसरे दिन अपनी जमीन के लिए आता हैं,
आप जरा उसका काम करवा देते तो ....। ''
'' क्यों ? तुम्हारा कोई सगा हैं क्या ? ''
'' नहीं साहबजी, मैं तो उसकी लाचार आंखें और इस उमर में यूं बार बार कचहरी के चक्कर काटना ...। ''
'' तो तुझे उससे क्या,जा चाय लेकर आ और हां बिस्किट भी लेते आना।''
'' जी, साहबजी। ''
          चपरासी को बाहर देखते ही तुलसीराम दौड़कर आया और बोला - '' भाई आज तू एक नहीं दो कप चाय के पैसे ले लें, पर काम जल्दी करवा दें, मैं तेरे हाथ जोडू। अब थक गया हूं,भला मेरी ही जमीन को मेरे नाम करवाने में इतनी देर क्यों।''  दुखी और लाचार हो वह जमीन पर ही बैठ गया जो सरकार की थी।
'' हावो काका, तुम्हारी ये रामकहानी बहुत बार सुन चुका हूं,बोला तो कोशिश कर रहा हूं। ''
'' बहुत धन्यवाद भाई। कल फिर आऊंगा। '' कहते हुए तुलसीराम वापस खाली हाथ लौट गया। रोज की तरह ...
'' साहब वो वो वो ...। ''
'' क्या हुआ, आवाज नहीं निकल रही तेरी,शेर देख लिया क्या ? ''
'' नहीं साहबजी ,वो तुलसीराम नहीं रहा। आज कचहरी आते समय रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया ...।''

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