सोमवार, 6 जनवरी 2020

नज़्मसुभाष की लघुकथाएं

1 अजनबी(लघुकथा)

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कुछ सोचते हुए उसने आगे बढ़कर रैक से शादी का कार्ड उठाया और उसपर बड़ी आहिस्ता से हाथ फेरा ठीक वैसे जैसे कभी उसने दीपशिखा के नाजुक हाथों को अपने हाथ में लेकर फेरा था और बदले में उसने उसके कंधे पर सर रखते हुए बड़ी मासूमियत से पूछा था-"असीम क्या तुम मुझे यूं ही जिंदगी भर चाहोगे?"
इस बात पर उसने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा था-"तुम्हें कोई शक है क्या...?"
    फिर जैसे अपनी ही बात को विस्तार देते हुए वो बोला-"मैं तो उसदिन का इंतजार कर रहा हूं जब तुम मेरे खयालों से निकलकर मेरी जिंदगी में शामिल हो जाओगी"
          दीपशिखा ने इसके बाद कुछ न पूछा बस आंखें बंद करके वो उसके कंधे पर सर टिकाये बड़ी देर तक लेटी रही....।
           वक्त बीता।फिर जब वो मिलने आयी तो उसके हाथों में कार्ड था...जिसे उसने उसकी ओर बढ़ा दिया ।उसने देखा पहले किसी और का नाम लिखा गया था फिर ह्वाइटनर से मिटाकर उसका नाम अंकित कर दिया गया ।उसे गौर से देखते हुए उसने बड़ी मासूमियत से कहा-"यूं तो अपनों को कार्ड नहीं दिया जाता मगर कहीं तुम नाराज न हो जाओ बस इसलिए ही दे रही हूं...आना जरूर।"
           जिंदगी भर उसके साथ प्यार की कसमें खाने वाली दीपशिखा.... अब किसी और की हो रही थी...वो जैसे चेतनाशून्य था। बड़ी मुश्किल से वो कह पाया था-"तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया दीपशिखा.... कमसेकम ऐसे जरूरी मौके पर मैं याद तो रहा"
          और आज उसी दीपशिखा की शादी थी जिसके शादी के कार्ड पर उसका नाम लिखा भी गया तो मात्र फार्मेलिटी के लिए.....ये बात जेह्न में जैसे बोझ की तरह पैबस्त हो गयी थी...  "जाऊं या न जाऊं" की जद्दोजहद में वो बड़ी देर तक उलझा रहा।क्या उसे किसी और की होते हुए वो देख पाएगा?ये सवाल लगातार उसके जेहन में धमाचौकड़ी मचाए था।बड़ी देर की जद्दोजहद से जूझने के बाद अंततः वो तैयार ही हो गया।
          विवाह स्थल पर पहुंचा तो जयमाल हो चुका था।दीपशिखा दुल्हन के लिबास में बड़ी प्यारी लग रही थी...मगर दूल्हे की जगह कोई और..आखिर उसमें क्या कमी थी?
             उसने दूल्हे को देखा तो कलेजे पर जैसे साँप लोटने लगे थे।
          वो उस जगह को दूर से ही देख रहा था कि अचानक दीपशिखा की नजर उस पर पड़ी तो उसे हाथ के इशारे से ऊपर बुलाया।वो एकपल को खड़ा रहा.." आखिर किसके लिए वो वहां तक जाए" मगर जब वो लगातार बुलाती रही तो मन मारकर उधर बढ़ ही गया।
           ऊपर चढ़ते ही दीपशिखा ने अपने होने वाले हस्बैंड से उसका परिचय कराते हुए कहा-" रिशू,ये हैं मेरे बहुत प्यारे मित्र असीम...आज अगर मैं जॉब में हूं तो उसमे इनका बहुत बड़ा हाथ है...दरअसल कम्पटीशन की सारी तैयारी इन्होंने ही कराई थी"
          रिशू ने मुस्कुराते हुए असीम की तरफ हाथ बढ़ाया...मगर  उसने बदले में हाथ जोड़ दिये।
हवा में लहराते हुए हाथ को समेटकर रिशू ने एक खोखली मुस्कुराहट चेहरे पर लपेटी।
- " आपसे मिलकर खुशी हुई...जॉब वाली बीवियाँ आजकल बड़े नखरे करती हैं मगर अच्छा हुआ दीपशिखा वैसी नहीं है।"
          उसने बस सहमति में सर हिला दिया। उसके सिर हिलाने पर रिशू को जैसे कुछ याद आया-" लेकिन मैं समझता हूं नखरे करती भी क्यों....आखिर मेरा वेतन इससे ज्यादा भी तो है।"
- "हाँ....बात तो सही है आपकी...अपने से कमतर के साथ कोई लड़की क्यों जुड़ेगी"
          वो बुदबुदाया जैसे ये बात खुद से कह रहा हो।
          रिशू ने सिर हिलाकर समर्थन किया और एक नया सवाल उसकी ओर उछाल दिया-"वैसे एक बात पूछूं....आप कब शादी कर रहे हैं?"
          सवाल अप्रत्याशित था।वो कुछ कहता मगर अचानक उसकी नजर दीपशिखा पर पड़ी जिसके चेहरे पर इस सवाल के बाद कश्मकश साफ झलक रही थी।लिहाजा वो मुस्कुराते हुए बोला-"बस कोई अजनबी लड़की मिल जाए"
- "अजनबी लड़की....वो भला किसलिए?"
उसने हैरत से उसे देखते हुए कहा।
- "बात ये है कि मैं एक नम्बर का भुलक्कड़ हूं अक्सर वादे करके भूल जाता हूं लिहाजा यदि लड़की अजनबी होगी तो उससे कोई वादा तो न होगा..."
- "आप भी कमाल हैं"
          और इसके साथ ही रिशू का जोरदार ठहाका गूंज उठा मगर दीपशिखा अब भी मुस्कुराने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी।
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2 आखिरी पन्ने(लघुकथा)
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          वो पूरे मनोयोग से उपन्यास पूरा करने में लगा था।रियल लाइफ में जिस नायिका को वो पा नहीं सका कल्पना के जरिये ही उसके करीब जाने की कोशिश कर रहा है।कागजों पर ही सही खिजाँ को बहार में बदलने की एक नाकाम कोशिश...ये उसकी कोशिश ही थी कि पूरे उपन्यास में नायिका खिलखिलाती रही जिसे वह अपलक देखते हुए महसूस करता रहा। जब जब उसने उसके प्रसंगों पर कलम चलाई, लगा जैसे वो करीब ही मौजूद हो।बहुत सोच समझकर उसने निर्णय लिया कि अंत के चार पन्ने काल्पनिक ही सही मगर सुखांत हों।आखिर किसे पता है कि वो रियल स्टोरी लिख रहा है या काल्पनिक... यही सोचकर उसने थोड़ा सा रद्दोबदल किया था। जिसपर इस वक्त कलम चल ही रही थी कि अचानक मोबाइल बज उठा।
- "हेलो..." एक बदहवास सी आवाज उधर से गूंजी।
- "जी बताएं"
- "देखिए! मेरी बात ध्यान से सुनिये...अभी- अभी एक रोड़ एक्सीडेंट हुआ है।दो लोग घायल हुए हैं और एक मैडम की दर्दनाक मौत हो गयी है...उम्र यही कोई 26-27 साल......दो नम्बर मैं मिला चुका हूं।एक नम्बर उठ नहीं रहा...दूसरा बंद है...तीसरा नम्बर 'माइ बेस्ट फ्रेंड' के नाम से आपका है.।"
- "क्या......आप कौन हैं...कहाँ से बोल रहे हैं... कौन मैडम? 
एक साथ कई सवाल उसके होंठो से बेसाख्ता निकल गये।
- "मैं फैजाबाद से बोल रहा हूं....उनके पर्स में एक आईडी मिली है...."
- "आईडी.....क्ययययया नाम दर्ज है उसमे ?" वो बदहवासी में चीखा।
- "अंशिका राय"
कानों मे जैसे विस्फोट हुआ था।
- "अंशिका राय"
          नाम सुनते ही जैसे जेह्न सुन्न हो गया था। उसने सर थामकर आंखें बंद कर लीं। हवा का एक तेज झोंका आया और रजिस्टर के सारे पन्ने फड़फड़ा उठे।


356/केसी-208
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