सोमवार, 6 जनवरी 2020

डेरा तो शहर है गांव ही घर है

अभिषेक राज शर्मा


डेरा तो शहर है गांव ही घर है
सच को सच की तरह लिखा,
शहर को शहर की तरह लिखा

गांव को धरोहर की तरह लिखा,
मिट्टी से  खेत खलिहान लिखा
जमीन से खुली आसमान लिखा,
इश्क से नफरत की आग लिखा
दर्पण जैसे किताब तक लिखा
बेहिसाब बेबाक तक लिखा,
कुछ भी हो साहब ने
लाजवाब एक अंदाज लिखा।।
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खेत पर सरसों के फूल खिले
फूल खिले फूल खिले
बागों में बसंत की आहट आने लगे,
हवा के झोंको संग
भंवरा मुस्कुराने लगे,
मधुर मधुर तान गुनगुनाने लगे
एक प्रेमी का ह्रदय विचलित हो गया
देख कवि मुस्कुराने लगे,
हां लिखने को मिल गया मुझको
कलम कागज को बताने लगे,
देख प्रकृत की हो घटा
सुंदर यौवन शरमाने लगे,
कोयल कूक उठी बगियन में
मौसम झिलमिल आने लगे।।
अभिषेक राज शर्मा
जौनपुर उत्तर प्रदेश



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