सोना चाँदी लोहा माटी, तोर पिंजरा कोन्हों होही।
तोर पिंजरा ले मैना हर, दिन एको दिन उढ़िहा जाही।।
भई रहय जी बंधु रहय जी, काम नइं जी कोन्हों आएँ।
दई रहय जी ददा रहय जी, जी एकेला सब्बो जाएँ।।
करम इहाँ जे जिसने करही, उसने फर ला जम्मो पाही।
तोर पिंजरा ले मैना हर, दिन एको दिन उढ़िहा जाही।।
तहूँ बनाएँ कतका महला, खेते बारी तैंहर जोड़े।
थोर-थोर बर तैंहर लड़थस, पर बर कतको खँचवा कोड़े।।
ओ खँचवा मा तहूँ झपागे, पाप जमा ला कोने खाही।
तोर पिंजरा ले मैना हर, दिन एको दिन उढ़िहा जाही।।
चार दिवस के जिनगी हावे, हाँस बोल के गोठीयाबे।
नाच-नाच के तैं जी ले, अँधवा मनला डहर बताबे।।
हाँसी बकबक बीते जिनगी, गीत मया के सुग्घर गाही।
तोर पिंजरा ले मैना हर, दिन एको दिन उढ़िहा जाही।।
सीताराम पटेल 'सीतेश'
इस अंक के रचनाकार
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बुधवार, 23 सितंबर 2026
तोर पिंजरा ले मैना
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