हर लम्हा हमारा
तूफा़नों से गुजरता है
तिनका तिनका बिख़रने की
आदत सी हो गई है.
उजड़ा है आशियाना
पर खौफ़ नही हमें
बिजली हम पर गिरने की
आदत सी हो गई है.
मिलते हैं गले मिल कर
ज़माने में हम सभी से
पर पीठ पर खंज़र की
आदत सी हो गई है.
ना चाहत ना शिकवा
हमको अब किसी से
ख़ुद ही बुदबुदाने की
आदत सी हो गई है.
दरगाहों पर मन्नत
मंदिरों में की अरदास
ख़ुदा को हमसे रूठने की
आदत सी हो गई है.
नहीं मांगते पल दो पल
अब हम सूकून के
बेचैन रहने की हमें
आदत सी हो गई है.
✍️ईति ✍️
प्रमदा ठाकुर
अमलेश्वर रायपुर छत्तीसगढ़.
इस अंक के रचनाकार
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
आदत
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