महेश कुमार केशरी
सुना है , धरती पर तीन
चौथाई खारा पानी है..और
समुंदर का जलस्तर भी लगातार
बढ़ रहा है..
धीरे - धीरे हमारे तटीय क्षेत्र गायब होते
जा रहें हैं ..
एक समय के बाद बंबई बिला जायेगा...
आदमी ने कभी नहीं सोचा कि
इस धरती पर जो तीन चौथाई खारा पानी...है ..
वो
आखिरकार क्यों है ..?
क्यों , मीठे पानी के
सोते सूखते जा रहें हैं ...?
क्यों... सूखती जा रही है
बूढ़ी ..गंडक और यमुना..
क्यों सूखती जा रही है ..
हमारी संवेदनाएँ ...
स्त्रियों को लेकर ...!
सभ्यता के शुरूआती दिनों से ही
स्त्रियाँ लगातार रोए जा रही है .. !
इनके रोने से ही ये समुंदर बने हैं...!
उनके रोने से ही मीठे जल के सोते सूखते जा हैं..
और इन स्त्रियों के
लगातार रोने से ही हमारे समुद्र लगातार
बढ़ रहे हैं....
सुना है , ये जो खारा पानी है ..वो
स्त्रियों का दु:ख है ....
जो .. पृथ्वी पर तीन चौथाई
समुंदर के तौर पर पड़ा है...
स्त्री दु:खों को पी जाती है ..
बहुत बुरे वक्त में जो कि बहुत जल्द
ही आदमी का आयेगा
तब , शायद
खारे पानी की तरह ये तीन
चौथाई दु:ख भी पी जाती हमारी स्त्री ...!
लेकिन , अब लगता है , कि ये पूरी दुनिया
एक दिन साबुत खारे पानी में डूब जायेगी
क्योंकि आजकल एक नयी कवायद
चल पड़ी है ...
स्त्री को हिस्सों में काटकर फ्रिज
में रखने की कवायद....
फिर ... दु:खों को पीने वाली स्त्री
इस धरती पर कहाँ बचेगी ?
जो , सोचेगी .. हमारे संकट या अस्तित्व के बारे में...!
उस समय ये जो धरती का तीन चौथाई दु:ख है
उसको कौन पियेगा ?
नीलकंठ की तरह ...!
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