सावन के महीना
पानी गिरय झोर-झोर...
छानी परवा चूँहय
चिखला माते खोर-खोर...2
पुरवाही चलत हे, सरर- सरर
बियासी के बइला, तरर- मरर
काँसरा धरे होर- होर........
नंदिया-नरवा अघावन लागय
धरती के कोरा..भावन लागय
हरियर रुखवा चारों ओर.....
हाँका पारत हे,खेतिहारिन मन
ददरिया झड़के,बनिहारिन मन
निंदत हवय कोरे- कोर....
गदगद लागय,जम्मों खेती-खार
आरी-बारी झूमय,देख तुमा नार
हरेली के कर जोरा- जोर....
अनदाता के, दुख- पीरा हरागे
पाछु बछर के....घावे सूखागे
बने बरसबे बिनती हे मोर....
सावन के महीना
पानी गिरय झोर-झोर.....
छानी परवा चूँहय
चिखला माते खोर-खोर.....!
-- राजकुमार 'मसखरे'
14-07-2022
मु.-भदेरा-पैलीमेटा,जि.-KCG (cg)
इस अंक के रचनाकार
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बुधवार, 24 मई 2023
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