देखो आज इस राजनीति को
कैसे बना लिए ये व्यापार जी,
लोकसेवक अब गायब जो हैं
मिला बड़ा उन्हें रोजगार जी !
राजनीति अब स्वार्थ की नीति
कर रहे अपनों का उपकार जी,
कुर्सी में चिपके रहने की लत
बस एक ही इनका आधार जी !
चमचा बनो, जयकारा लगाओ
फलफूल रहा है ये बाज़ार जी,
छुटभैये नेता पीछे झंडा उठाये
इस धन्धे का है ख़ूब पगार जी !
कुछ नही करते तो नेताजी बनो
या नेता के अच्छे चाटुकार जी ,
न देश से मतलब न जनता से
बस बन तो जाए सरकार जी !
कई पीढ़ियों के भरे जो ख़ज़ाने
सोना-चाँदी है इनके आहार जी,
इन बंगलों में ख़ूब गुलछर्रे उड़ाते
जनता बने हैं इनके पहरेदार जी !
कैसे बना लिए ये व्यापार जी,
लोकसेवक अब गायब जो हैं
मिला बड़ा उन्हें रोजगार जी !
राजनीति अब स्वार्थ की नीति
कर रहे अपनों का उपकार जी,
कुर्सी में चिपके रहने की लत
बस एक ही इनका आधार जी !
चमचा बनो, जयकारा लगाओ
फलफूल रहा है ये बाज़ार जी,
छुटभैये नेता पीछे झंडा उठाये
इस धन्धे का है ख़ूब पगार जी !
कुछ नही करते तो नेताजी बनो
या नेता के अच्छे चाटुकार जी ,
न देश से मतलब न जनता से
बस बन तो जाए सरकार जी !
कई पीढ़ियों के भरे जो ख़ज़ाने
सोना-चाँदी है इनके आहार जी,
इन बंगलों में ख़ूब गुलछर्रे उड़ाते
जनता बने हैं इनके पहरेदार जी !
टमाटर के भाव बढ़न दे !
आज़कल टमाटर के ख़ूब होवत हे चर्चा
ये जम्मों काहत हवँय बाढ़गे हवय खर्चा,
कभू लिम्बु, कभू आलू त कभू प्याज के
मीडिया ह महँगाई के बनावत रहिथे भर्ता !
थोरिक किसानी उपज के बढ़ जाथे भाव
संसद म घलो रोवा-राही,करथें काँव-काँव,
बाढ़,सूक्खा,रोग,राई ले परथे जब दुकाल
तहां चुप मिटका देथे,नइ करंय चाँव-चाँव !
ये सब किसान के किसानी के उपज आय
इंखर महंगाई नेता,बेपारी ल एको नइ भाय,
घाम,पानी,जाड़,चिखला,माटी ल नइ जाने
तभेच तो चिल्लावत रथें, करथे कांय-कांय !
येहा कोनो मशीन,कारखाना ले नइ तो झरै
कतको पसीना बोहाथे तभो करजा म मरै,
उपज हे इंखर अउ भाव ल करत हे दूसर
अइसन होथे काबर जी,कोनों चेत नइ करै !
तब अतेक हल्ला कोनों काबर नइ मचाय
जब रोड म टमाटर,आँसू बोहात ले फेकाय,
पेट्रोल,गैस,छड़,सीमेंट आदि के भाव बढ़थे
तब कोनों अंखफुट्टा मन नइ तो चिल्लाय !
~~ राजकुमार 'मसखरे'
-- राजकुमार 'मसखरे'
भदेरा (पैलीमेटा), जि.-केसीजी, (छ.ग.)
आज़कल टमाटर के ख़ूब होवत हे चर्चा
ये जम्मों काहत हवँय बाढ़गे हवय खर्चा,
कभू लिम्बु, कभू आलू त कभू प्याज के
मीडिया ह महँगाई के बनावत रहिथे भर्ता !
थोरिक किसानी उपज के बढ़ जाथे भाव
संसद म घलो रोवा-राही,करथें काँव-काँव,
बाढ़,सूक्खा,रोग,राई ले परथे जब दुकाल
तहां चुप मिटका देथे,नइ करंय चाँव-चाँव !
ये सब किसान के किसानी के उपज आय
इंखर महंगाई नेता,बेपारी ल एको नइ भाय,
घाम,पानी,जाड़,चिखला,माटी ल नइ जाने
तभेच तो चिल्लावत रथें, करथे कांय-कांय !
येहा कोनो मशीन,कारखाना ले नइ तो झरै
कतको पसीना बोहाथे तभो करजा म मरै,
उपज हे इंखर अउ भाव ल करत हे दूसर
अइसन होथे काबर जी,कोनों चेत नइ करै !
तब अतेक हल्ला कोनों काबर नइ मचाय
जब रोड म टमाटर,आँसू बोहात ले फेकाय,
पेट्रोल,गैस,छड़,सीमेंट आदि के भाव बढ़थे
तब कोनों अंखफुट्टा मन नइ तो चिल्लाय !
~~ राजकुमार 'मसखरे'
-- राजकुमार 'मसखरे'
भदेरा (पैलीमेटा), जि.-केसीजी, (छ.ग.)
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