इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

गुरुवार, 25 मई 2023

राजनीति बना व्यापार !

देखो आज  इस राजनीति को
कैसे बना लिए ये  व्यापार जी,
लोकसेवक  अब गायब जो हैं
मिला  बड़ा उन्हें  रोजगार जी !
राजनीति अब स्वार्थ की नीति
कर रहे अपनों का उपकार जी,
कुर्सी  में चिपके  रहने की लत
बस एक ही इनका आधार जी !
चमचा बनो, जयकारा लगाओ
फलफूल रहा  है ये बाज़ार जी,
छुटभैये नेता पीछे झंडा उठाये
इस धन्धे का है ख़ूब पगार जी !
कुछ नही करते तो नेताजी बनो
या नेता के अच्छे चाटुकार जी ,
न देश  से मतलब  न जनता से
बस  बन तो जाए सरकार जी !
कई पीढ़ियों के भरे जो ख़ज़ाने
सोना-चाँदी है इनके आहार जी,
इन बंगलों में ख़ूब गुलछर्रे उड़ाते
जनता बने हैं इनके पहरेदार जी !
 टमाटर के भाव बढ़न दे !


आज़कल  टमाटर  के ख़ूब होवत हे चर्चा
ये जम्मों  काहत  हवँय बाढ़गे हवय खर्चा,
कभू लिम्बु, कभू आलू  त कभू प्याज के
मीडिया ह महँगाई के बनावत रहिथे भर्ता !

थोरिक  किसानी उपज के बढ़ जाथे भाव
संसद म घलो रोवा-राही,करथें काँव-काँव,
बाढ़,सूक्खा,रोग,राई ले परथे जब दुकाल
तहां चुप मिटका देथे,नइ करंय चाँव-चाँव !

ये सब किसान के  किसानी के उपज आय
इंखर महंगाई नेता,बेपारी ल एको नइ भाय,
घाम,पानी,जाड़,चिखला,माटी ल नइ जाने
तभेच तो चिल्लावत रथें, करथे कांय-कांय !

येहा कोनो मशीन,कारखाना ले नइ तो झरै
कतको पसीना  बोहाथे तभो करजा म मरै,
उपज  हे इंखर  अउ भाव ल करत हे दूसर
अइसन होथे काबर जी,कोनों चेत नइ करै !

तब  अतेक हल्ला  कोनों काबर नइ मचाय
जब रोड म टमाटर,आँसू बोहात ले फेकाय,
पेट्रोल,गैस,छड़,सीमेंट आदि के भाव बढ़थे
तब कोनों  अंखफुट्टा  मन नइ तो चिल्लाय !

                       ~~ राजकुमार 'मसखरे'


          -- राजकुमार 'मसखरे'
भदेरा (पैलीमेटा), जि.-केसीजी, (छ.ग.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें