सुखदेव सिंह"अहिलेश्वर"
चल असाढ़ तैं जाती-खानी¹, बरस झमाझम पानी।
बखत-बखत² बड़-कन करना हे, बाटुर-बुता³ किसानी।
परहा बर थरहा देना हे, दिन-दिन हे पछुवावत।
नट⁴ दे हे नलकूप तोर बिन, पानी नइ हे आवत।
सोयाबीन उरिद अउ राहर, कोदो ला हे बोना।
काम-बुता सब तोर भरोसा, तोर बिना का होना।
बरसे बर बादर ला कहि चल, करय न आनाकानी।
बखत-बखत बड़-कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
बादर बरसे बर लउहावय⁵, अब झन देर लगावय।
गरमी गदक निचोवत हावय, जल्दी जीव जुड़ावय।
गरमी छुट्टी अउ झन बाढ़य, सुनव निवेदन हावय।
मोबाइल के मतरे⁶ लइका, जल्दी इस्कुल जावय।
सुटुर-सुटुर⁷ झन रेंगव देखव, बादर के बयमानी।
बखत-बखत बड़-कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
खातू-माटी बीज-भात मा, लगत अजीरन⁸ खरचा।
टोंटा भर कर्जा काढ़े हन, लिखा-फँसा के परचा।
गरुवा-गाय गली के होगे, छुहनय खोजय पैरा।
चल तो आज बेड़⁹ के लादवँ, कहय न लइका ऐरा¹⁰।
तोर असीस कृपा छत होगे, छाये छइहाँ छानी।
बखत-बखत बड़-कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
नदिया नरवा ताल-तलइया, कचरा ले भर गे हें।
मनखे मन सो अकताइस¹¹ का? बिन माँगे दे दे हें।
बीज बिचेत¹² परे भुँइया मा, जेठ जरोइस भारी।
रुखराई बर उम्हियाइन¹³ बड़, टँगिया आरा-आरी।
पा असाढ़ के आरो¹⁴ जगथे, जीव-जगत जिनगानी।
बखत-बखत बड़-कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
देय तुँहर भर-भर¹⁵ पाये हन, जय हो असाढ़ राजा।
बादर ला तुम तियार¹⁶ जाहू, खूब बजाहय बाजा।
सावन सन तुँहरो गुण महिमा, गाबो बड़ सँहराबो।
रिमझिम असीस पाबो तब तो, खाबो घलो खवाबो।
आमा के अथान ले जाहव, चर-चर के हे चानी।
बखत-बखत बड़-कन करना हे, बाटुर बुता किसानी।
गोरखपुर कबीरधाम छत्तीसगढ़
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