इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

शुक्रवार, 26 मई 2023

प्रेरणा

अशोक मिश्र

     प्रतीक कम्पयुटर साइंस में बी ई करने के उपरांत छः महीने से नौकरी के लिए भटक रहा था। रोज सुबह - सुबह दफ्तरों में इन्टरव्यू के लिए निकल जाता था। कदाचित् कुछ स्टेज क्लीयर भी कर लेता था पर फाइनली सेलेक्ट नहीं हो पाता था।
     एक बार फिर प्रतीक एक कम्पनी में अन्ततः चयनित नहीं हो पाने के कारण हताश और निराश होकर लौट रहा था तो देखा कि मुहल्ले का ही एक पांव से पोलियोग्रस्त सात - आठ साल का लड़का,त्रिलोचन पैर घसीट - घसीट कर आगे बढ़ रहा था। पसीना से तर - बतर त्रिलोचन थक कर किसी घर के आगे बने चबूतरे पर जब बैठ गया तो प्रतीक भी अपनी बाइक खड़ी कर उसके बगल में बैठ गया और अपने बैग से पानी का बोतल निकाल कर त्रिलोचन की ओर बढ़ा दिया।
     त्रिलोचन ने पानी पीने के बाद सधन्यवाद बोतल वापस किया। प्रतीक ने त्रिलोचन से कहा - चलो मैं तुम्हें बाइक से घर छोड़ देता हूँ,लड़के ने बड़ी मासूमियत से कहा - अरे! नहीं भैया, इसकी जरूरत नहीं है। यह तो मेरा रोज का काम है। वह कहने लगा - पता है! पापा मुझे आइ ए एस बनाना चाहते हैं और इसके लिए इन्सान को हर तरह की चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए। असल में आज गरमी थोड़ी बढ़ी हुई है,कुछ दिनों में बर्दाश्त करने की क्षमता आ जाएगी।
     उस दिव्यांग बालक की बातें सुनकर प्रतीक उत्साह से भरा जा रहा था और उसमें अब किसी प्रकार की निराशा नहीं थी क्योंकि  उसको जीवन की प्रेरणा मिल चुकी थी।

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