गुरुवार, 19 अगस्त 2021

सुहाना सफर

अजीत सिंह चारण


       मैंने टिकट ली। ट्रेन में चढ़ा और वह चल पड़ी क्योंकि उसे तो चलना ही था। अपनी मस्ती में मस्त हॉर्न रूपी मुख से कुछ गीत गुनगुनाते हुए अपनी ही धुन में कुछ गाए जा रही थी.. क्या गा रही थी मेरी समझ से बाहर था। पर शोर टाइप का कुछ था जरूर जहां उसे श्रोता टाइप की कुछ भीड़ दिखती वह खुशी से झूम के रुक जाती,  और उन्हें अपने में समाहित करते हुए भारतीय संस्कृति का परिचय देती और आगे चल पड़ती।
       चलते चलते वह मुकाम भी आया जहां पहुंचने के बाद मेरी टिकट की शारीरिक और मानसिक यानी के आर्थिक शक्ति चुक गई। इसलिए मैं ट्रेन से नीचे उतरा या यूं समझिए कि उतार दिया गया। मैं जहां उतरा वह कोई खास जगह नहीं थी फिर भी दिल बहलाने के लिए दो ठंडे जल की प्याऊ जिनमें पानी लगभग नहीं था क्योंकि वह स्वचालित थी। दो कांट्रेक्टर जो सुबह की चाय को ताजा कहकर अब तक बेच रहे थे। पास ही एक ब्रेड के टुकड़े को घेरकर दो कुत्ते खड़े थे। जो न लड़ते थे न भौंकते थे, बस बड़े-बड़े सफेद दांत दिखा रहे थे। जैसे पेप्सोडेंट का विज्ञापन कर रहे हों। मैं उस विज्ञापन में दिलचस्पी लेने लगा, तभी जीआरपी वालों का एक कुत्ता आया…. उस ब्रेड के टुकड़े को उठाया और वहां से चला गया। पर वे दोनों कुत्ते कुछ भी बोलने यानी कि गुर्राने की बजाए बस पूंछ हिलाकर खुशामद कर रहे थे। जीआरपी का कुत्ता गर्व से सीना ताने उन पर कृपा दृष्टि की और चला गया। वे खुश थे - चलो झंझट मिटा। एक ब्रेड का टुकड़ा और हम दो। क्या फायदा ,अच्छा किया जो ले गया। ऐसी भारतीयता और कहां है ?
        मैं फिर नर्वस होने लगा। तभी मॉडल टाइप की कुछ लड़कियां आईं। मैं खुश हुआ बचपन से दो ही शौक रहे हैं - साहित्य पढ़ना और सौंदर्य देखना। साहित्य मेरे पास था नहीं सौंदर्य आ पहुंचा। लाइन मारने के इरादे से मैंने सोचा पहले मुंह हाथ धो लिया जाए। इंप्रेसन जमेगा यही सोचकर नल के पास आया। पानी कम था फिर भी मैंने ड्राई क्लीन कर ली। तभी मुझे लगा कि आयकर विभाग के अधिकारियों की तरह कोई मेरे जेब की लक्ष्मी पर कुदृष्टि डाल रहा है। मेरे होते हुए कोई मेरा धन चुराने का प्रयास करें यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि यह राष्ट्रीय नहीं व्यक्तिगत अस्मिता का भी सवाल था। मैंने तुरंत उस टपोरी टाइप के लड़के को पकड़ा, जो मेरी जेब की एकमात्र इज्जत आबरु सौ सौ के पांच हरे पत्ते अपनी मुट्ठी में दबाना चाह रहा था। पर एन वक्त पर चश्मे से झांकती मेरी छोटी छोटी आंखों ने उसे धर दबोचा। मैंने उससे अपने रुपए वापस ले लिए। यानी कि छीन लिए।
अब मुझे उस भारत के भविष्य से कोई सरोकार नहीं था। लेकिन फिर भी बुद्धिजीवी और विद्वान होने के नाते मैं अपने ज्ञान के थोक भंडार से राष्ट्र की सेवा हेतु कुछ ज्ञान खर्च करना आवश्यक समझा। या यूं समझ लीजिए उन कन्याओं को अपने ज्ञान की होलसेल दुकान दिखाकर इंप्रेस करने हेतु मैं उस बालक पर ज्ञान की बौछार एक साथ करने लगा। वह इस ज्ञान की बारिश से लगभग भीग गया। लेकिन मुझे उसकी कोई परवाह नहीं थी। चोरी करना पाप है। भगवान ने दो हाथ दिए हैं, कमाकर खाने की नियत नहीं। घरवालों ने चोरी करना सिखाया क्या? बोल अंदर करवा दें? पता नहीं थोक भाव से कहां-कहां के पैदा हो जाते हैं.. ऐसी अनेक पंक्तियां मेरे मुंह से नॉन स्टॉप बिना ब्रेक लिए निकलती जा रही थी। आसपास की भीड़ और उन कन्याओं की तिरछी नजर मुझ पर कटाक्ष कर रही थी|
       अचानक जीआरपी वाले मामाजी मेरे पास आए। यानी के कांस्टेबल। एक बार कि मैं घबरा गया क्योंकि मुझे जन्मजात पुलिस फोबिया है। लेकिन सज्जनता उनके चेहरे पर फेयर एंड लवली की तरह चमक रही थी । उन्होंने हाथ मिलाना चाहा पर मैंने नहीं मिलाया। मन के किसी कोने में डर अभी भी दबा हुआ बैठा था। मेरे को घूर कर पूछा क्या बात हुई ? मैंने कहा - कुछ नहीं यह लड़का मेरे जेब काट रहा था। तो ……….तो आपने मुझे सूचना क्यों नहीं दी ? ऐसी कोई खास बात नहीं हुई ….. सौ ही रुपए की बात थी, तो मैंने सोचा जाने दो। पर लड़के को थोड़ा समझाना उचित समझा इसलिए …….मैंने अटकते हुए कहा।..... सारे समाज को सुधारने का ठेका आपने ले रखा है ? हम क्यों बैठे हैं यहां ? उसने धमकाते हुए कहा।
       मैं सकुचाते हुए बोला अजी छोड़िए भी ! कुछ खास नहीं ! उसका तमतमाया चेहरा अपनी वाली पर उतर आया कड़क कर बोला ….
“बुद्धिजीवी के बच्चे ! तुम्हें भी अंदर कर दूं तो कैसी रहे “..साले.. पुलिस कुछ करती है तो करने नहीं देते। ना करें तो भ्रष्टाचार का लांछन लगाते हैं। आए बड़े समाज सुधारक ! चल मुकदमा दर्ज करवा। अब तक उन कन्याओं की सहानुभूति पुलिस वाले के साथ हो चुकी थी। उन्होंने कहा भाई साहब यह सही कह रहे हैं। आज आपकी जेब कटी है कल किसी और की कटेगी। आप इनका कहना न मान कर अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं !
       कॉन्स्टेबल ने मूछों पर ताव देते हुए कहा चल रहे हो या तांगा मंगवाऊँ साहब के लिए? उनका यह व्यंग्य बाण मेरे हृदय को चीरता हुआ निकल गया। मैं शर्म से पानी पानी हो गया। वह टपोरी टाइप का बालक मुझे देख कर हंस रहा था, और वे कन्याएं यह नजारा देखकर!
       मैं डरा, कहीं फिर से न धमकाए। इसलिए मैंने डरना उचित समझा और डरते-डरते उनके पीछे चल पड़ा। थाने की ओर भारत से भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार ,अपराध आदि को नष्ट करने के लिए। मैं मुकदमे रूपी मिसाइल को छोड़ने के लिए जा रहा था।
       पुलिस चौकी पहुंचने पर उन्होंने मेरी और उस बालक की बड़ी खातिर की। उस बालक को ही भेज कर एक पैन 50 पेपर 10 कार्बन मंगवाए। नाश्ते के लिए गर्म समोसा और चाय मंगवाई। मैं बहुत खुश हुआ और उनकी कीरत में एक कविता पढ़ डाली ...। पर मेरा दिल उस समय बैठ गया जब उस नाश्ते और अन्य सामान यानी कि स्टेशनरी का बिल मुझे चुकाना पड़ा। उन्होंने रोजनामचे में पूरी घटना लिखी। बालक ने अपना पेट भरने के लिए जेब काटी थी। पर मामा जी ने रोब और ईमानदारी से भारत सरकार सेवार्थ 1 मिनट में मेरे गुलाबी पत्ते को झटक लिया !
       उन्होंने एफ आई आर की पेशकश की जिसमें बालक द्वारा मारपीट करना भी शामिल था। मैं उनका प्रस्ताव सुनकर लगभग कांप उठा। ऐसे मामलों में मैं भुक्तभोगी रहा हूं। मैंने विनती की कि आप यह सब रहने दीजिए , मुझे अगली ट्रेन पकड़नी है। वे बोले नहीं यह नहीं हो सकता। मैंने रजिस्टर में दर्ज कर लिया। मैं रो पड़ा उन्होंने मेरे कंधे को संभाल कर बोला - मामला रफा-दफा कर दूं मैंने कहा ...हां सर। वह दाई आंख दबाकर बोले - कुछ चाय पानी का खर्चा करना होगा !
        मैं भारत सरकार की सेवा में 2000 खर्च कर चुका था, पीछा छुड़ाने के लिए 500 और निकाले। उन्होंने बाज की तरह झपट्टा मारा - बोले और निकालो …..? मैंने कहा नहीं सर मुझे आगे जाना है ,फिर भी आपकी सेवा करुंगा। मैं जल्दी से बाहर निकला। मामा जी बोले जरा आराम से चले जाना भाग क्यों रहे हो ? मेरे पीछे वह बालक भी था। हम दोनों ही खुश थे चलो पीछा छूटा। वरना रोज कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते ! …..मैं एक क्षण रुका फिर पीछे मुड़कर देखा... उस बालक ,...कॉन्स्टेबल और फिर अपने को….। यकायक कुत्ते वाला दृश्य मेरे दिमाग में घूमने लगा ..। मुझे पश्चाताप हुआ ..। यदि मैं उस बालक को नहीं पकड़ता , तो उसे अपने हुनर पर गर्व होता और मुझे केवल कुछ ही पैसों की चपत लगती।




 रतनगढ़

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