सोमवार, 31 मई 2021

खामोशी

अंजु ' अना '


' कहाँ फोन पर उलझी हो एक घंटे से, भूख से व्याकुल वृद्धा के कानों में बेटे की तहदार आवाज पड़ी तो दिल डोल गया। भगवान! फिर महाभारत न शुरू हो जाए। दिल ही दिल में ईश्वर को याद किया। बाहर बहस शुरू हो गई थी।
' घड़ी भर को बर्दाश्त नहीं होता आप लोगों को मेरा हँसना , मैं  हूंँ जो सबके लिए मरती रहती हूँ। '' बहू नें ' आ देखें ज़रा' वाले अंदाज में ललकारा तो बेटा भी पीछे न रहा।
' कब से फोन पर लगी हो, माँ को नाश्ता देना भी याद रहता है कि नहीं ' 
' क्‍यों नहीं, तुम, तुम्हारी माँ,तुम्हारे बच्चे,ये.वो ' 
बेटा कमरे में आया तो बहू की चीखती आवाज भी साथ में आ गई।
- माँ! नाश्ता किया कि नहीं।'
-  खाने का नाम न लेना बेटा, सुबह से खट्टे डकार आ रहे हैं। रात को सो नहीं पाई  ठीक से,थोड़ी देर सोउंँगी तो ठीक हो जाएगा।' माँ नें बेटे की हर चिंता पल भर में दूर कर दी।


जमशेदपुर,झारखंड

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