शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

तीन ग़ज़लें : सत्येन्द्र गोविन्द


ग़ज़ल-1

दो क़दम भी न साथ चलता क्या
रास्ता यूँ अलग-अलग था क्या
.
मुझको गुमराह राहबरों ने किया
मै इधर भूलकर भी आता क्या
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नेस्तनाबूद कर दिया उसको
उससे मै बार-बार लड़ता क्या
.
दूर तुमसे हुआ तो क्यूँ आख़िर
तुमने मुझसे कभी ये पूछा क्या
.
दिल कहे जो वही तो करते हो
यार तुमको किसी ने रोका क्या
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नैन से नैन क्यूँ नहीं मिलते
इश्क़ तेरा भी है ये पहला क्या
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ग़ज़ल-2

मुझे तो ख़ुशी बस इसी बात की है
जली ही सही एक रोटी मिली है
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मैं अपना निवाला उठाऊँ तो कैसे
मेरे दर पे भूखी भिखारन खड़ी है
.
न पूछो अभी हाल कैसा है मेरा
मेरे साथ फिर मुफ़लिसी चल पड़ी है
.
अगर पढ़ सकें तो निहाँ हर्फ़ पढ़िए
वरक़ दर वरक़ बस मुहब्बत लिखी है
.
मुझे माँ ने जिस पल सिखाया था चलना
उसी पल की तस्वीर दिल पर लगी है
.
वो अपना सा लगता था गोविन्द पहले
मगर जब मिला तो लगा अज़नबी है

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ग़ज़ल-3

बहुत अनमोल-सी इक चीज़ है तू
हमारी जीत की दहलीज़ है तू
.
पहनकर हम जिसे रहते सलामत
ख़ुदा का वो दिया ताबीज़ है तू
.
हमारी चेतना है,कल्पना है
हमारी अल्पना का क्रीज़ है तू
.
हमारे दिल को पहुँचाए जो ठंडक
वो कार्नर का बड़ा-सा फ़्रीज़ है तू
.
तुम्हारे बिन कहाँ मुमकिन गुज़ारा
हमारी साँस की सीरीज़ है तू
.
तुम्हारे बाद तो हम भी न होंगे
हमारी ज़िन्दगी की लीज़ है तू

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शांतिपुरी,(एम० के० डी० विद्यालय के पास) 
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