सोमवार, 29 अगस्त 2016

अगस्‍त 2016 से अक्‍टूबर 2016

सम्‍पादकीय
पानी और वृक्ष, सब पर भारी अब न चेते तो पछताना पड़ेगा ... 

आलेख
नामवर के बहाने : रवीन्‍द्र गोयल
भारत का अभागा गोर्की : साहित्‍यकार सपना मांगलिक

शोध लेख
नासिरा शर्मा के उपन्‍यासों का राष्‍ट्रीय एवं अर्तराष्‍ट्रीय परिदृश्‍य : शोधार्थी पूजा

कहानी
शेकी का घर : मनीष कुमार सिंह
दादा : राजा सिंह

गीत / गजल / कविता
राष्‍ट्रभाषा - गान : हरीलाल ' मिलन '  
वाक्‍या ऐसा हुआ : हरदीप बिरदी
तरूनाई को चुप .... : ठाकुरदास ' सिध्‍द ' 

पानी और वृक्ष, सब पर भारी। अब न चेते तो पछताना पड़ेगा

        प्यास से आकुल - व्याकुल संतान कहेगी - माँ, अब तो प्यास सही नहीं जाती। कहीं से भी एक घूंट पानी की व्यवस्था कर दो।''
       माँ कहेगी - '' कुछ देर और ठहर। तेरे पिता कांवर लेकर नदी गये हैं। झिरिया खोदकर पानी लाएंगे फिर जी छकते तक पी लेना।''  माँ जानती है - वह संतान को मात्र दिलासा दे रही है। नदी - नाले सूख गए हैं। बोर और कुँए के पानी का जल स्तर एकदम नीचे जा चुका है। जिस नदी पर बीता भर खोदते ही पानी आ जाता था, अब कमर तक खोदने पर भी बूंद भर पानी नहीं आता। सिवाय बालू के। नल में घंटों प्रतीक्षा के बाद भी बूंद भर पानी नहीं टपकता। कुँए और बोर सूख गए हैं। माँ अपनी संतान को लाख कोशिशों के बावजूद बूँद भर पानी नहीं दे सकती। फिर छकते तक पानी, वह अपनी संतान को कहाँ से, कैसे पिला सकेगी ?
       यदि अब भी हम अपनी आँखों से पट्टी नहीं हटाये तो यह दुर्दिन आने में देर नहीं। आज जिस तरह धड़ल्ले से वृक्ष कट रहे हैं। वृक्षारोपण का दिखावा मात्र किया जा रहा है। इसके कारण अवर्षा - खंडवर्षा की स्थिति निर्मित हो रही है। धरती के पानी का हम दोहन की जगह, शोषण कर रहे हैं। जगह - जगह धरती को छेदकर पानी पाने प्रयासरत हैं। इन तमाम कृत्यों का दुखद परिणाम आगामी समय में आये इसमें आश्चर्य नहीं।
       आप हजारों, लाखों, करोड़ों रुपये गिन रहे हैं। नोटों की गिनती करते - करते आप पसीना से तरबतर हो गये हैं। गला सूख गया हैं। आप ग्लास भर पानी हलक से उतारना चाहते हैं। गला तर करना चाहते हैं। पर यदि ग्लास भर पानी मिलना तो दूर, यदि जिव्हा भी तर करने बूँद भर पानी न मिले तो ऐसी स्थिति में आपकी क्या गति होगी,इसका सर्वेक्षण आप स्वयं करें।
      लगातार हम पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे हैं। वातावरण दूषित और प्रदुषित होते जा रहा है। आज पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति हमारी लापरवाही, हमें दूषित -प्रदुषित वातावरण में जीने बाध्य कर रही है। स्वच्छ वातावरण से मनुष्य स्वस्थ रहेगा। स्वच्छ वातावरण से हमें जीवनदायिनी पानी मिलेगा वरन विषैला खाद्य पदार्थ तो खा ही रहे हैं, आगामी समय में विषैला पानी पीने की बाध्यता से कोई रोक नहीं सकेगा।
      फसल पर हम सब का जीवन टिका हुआ है। बरसात के पूर्व किसान खेतों में फसल बोने की तैयारी करता है। खेतों की साफ - सफाई करता है। बादल उमड़ते - घुमड़ते हैं तो कई किसान वर्षा होने के पूर्व खेतों की जुताई करते हैं ताकि बन दुबी खत्म हो जाये और अच्छी फसल हो। फिर किसानों को वर्षा होने की प्रतीक्षा रहती है। प्रकृति से लगातार खिलवाड़ के परिणाम, बादल उमड़ - घुमड़ कर लौट जाता है। अवर्षा से किसान हताश - परेशान - निराश हो जाता हैं। जिन खेतों में फसलें लहलहाती, वहां सूखे की मार होती है और धरती फटती चली जाती है। इत्तफाकन फसल बोने लायक वर्षा हो गयी। बीज अंकुरित हो गये फिर वर्षा रुक गई तब  धरती पर उगी फसलें, फसलें नहीं रह जाती। धरती में जगह - जगह दरारें पड़ती हैं। अवर्षा हरियाली छीन लेती है। अकाल की मार सिर्फ किसानों को ही नहीं, सबको पड़ती हैं।
       '' जल ही जीवन है '' '' जल है तो कल है '' पानी बचाने के उद्देश्य से ऐसे अनेक नारे लगाए जाते हैं। पर क्या इसे जमीनी हकीकत में उतारने हम ईमानदारी दिखाते हैं। जहाँ एक ओर एक - एक बूंद पानी पाने पूरे परिवार जुटे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पानी का भारी मात्रा में दुरुपयोग किया जाता है। नल की टोटियां खुली रहती हैं और लाखों लीटर पीने योग्य पानी बहकर नालियों में समाहित हो जाता है। पेयजल पाने कितना युद्ध करना पड़ता है यह देखना हो तो आप ऐसे क्षेत्र में जाइये जहां एक - दो सार्वजनिक नल हो, पेयजल आपूर्ति के लिए टैंकर आता हो।
       छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है। यहां के अधिकांश परिवार का जीवन कृषि पर टिका हुआ है। कृषि पूर्णता: पानी पर निर्भर होता है। और यदि कृषि कार्य के लिए पानी न मिले तो क्या होगा इस पर विचार करें। आज हम पानी संरक्षण - सवर्धन की बातें तो बहुत करते हैं। भाषणबाजी करते हैं। सलाह मश्विरा देते हैं पर स्वयं पानी के संरक्षण और संवर्धन के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। वृक्षारोपण की बातें कागजों पर सिमट कर रह जाती है। कितने ऐसे पौधे हैं, जिसका रोपण किया गया। उसके साथ फोटो खिचाया गया। अखबारों में प्रकाशित हुआ, वे वृक्ष का रुप ले पाए और आज जीवित है ? मात्र वृक्षारोपण कर देने, अखबारों में फोटो छपवा लेने से पौधा वृक्ष नहीं जाएंगे। भले एक ही पौधा क्यों न हो, उसका रोपण करने के साथ यह भी संकल्प लें कि उसे वृक्ष बनते तक संरक्षण एवं सवर्धन करेंगें।
       मुझे अपना बचपना याद आ रहा है। गाँव में हमारी थोड़ी सी खेती है। एक दिन मेरे पिताजी सेठ की दूकान से '' पैरी '' बीज ले आये। उन्होंने मेरी माँ से कहा - '' इसे, खेत की मेड़ में बो आओ। ''
       मेरी माँ और चाची खेत में गये। दातारी से मेड़ों की जुताई की और लगे पैरी बीज बोने। गाँव के लोगों ने देखा तो हंसी उड़ाते हुए कहा -  '' नूतन गुरुजी ल घलक रिकम -  रिकम के सुझथे। बहू बिचारी मन ल पइरी बोये बर भेज दे हे। अरे, दुनिया लीम, आमा, जाम लगाथे ता ये ला बबूल बोये के सूझे हवे। ''
       मेरे पिता जी की दृष्टिकोण एकदम साफ थी। वे जानते थे, आम - जाम के वृक्ष लगाने के बाद उसके देख रेख की आवश्यकता बहुत पड़ती है। बबूल एक ऐसा वृक्ष है जिसके देख - रेख की आवश्यकता उतनी नहीं पड़ती, हां, बीच - बीच में उसे सीधा ले जाने के लिए कटाई - छंटाई की जरुरत होती है। मैंने देखा कुछ ही दिनों में माँ और चाची द्वारा बोये बबूल बीज अंकुरित हो गये और धीरे - धीरे वह वृक्ष का रुप लेने लगा। आज भी हमारी उस खेत की मेड़ पर जो बबूल के वृक्ष है वे मेरी माँ और मेरी चाची द्वारा बोये पैरी बीज का ही वृक्ष है।
       हर वर्ष वर्षा ऋतु में वृहद मात्रा में वृक्षारोपण का कार्यक्रम चलाया जाता है, पर सोचनीय तथ्य यह है कि जिस पौधा का रोपण किया गया क्या वह वृक्ष बन पाया ? हमें वृक्षारोपण के साथ उसके संरक्षण एवं सर्वधन के प्रति पूरी ईमानदारी बरतनी पड़ेगी तभी हमारा वृक्षारोपण का वृहद कार्यक्रम सफल माना जायेगा। यदि हम समय रहते नहीं चेते, जागरुक नहीं हुए तो वृक्ष और पानी से खिलवाड़ हमें बहुत ही भारी पड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ के कवि एवं गीतकार मुकुन्द कौशल की पंक्तियाँ :-
       लीम डँगाली चघे हे करेला के नार
       इतरावथे लबरा बादर, घेरी - बेरी नाचै रे बीच बाजार
       ये मीठलबरा ह,
       ठगुवा कस पानी ह ठगै अऊ मूड़ धरे बइठे किसान -
       ये हो भइया गा मोर, कइसे बचाबो परान।
       ये बिधाता गा मोर, कइसे बचाबो परान।।

***
       कलपत खेत, गोहारत हे तोला, आके अगास ला छादे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।
                      तरिया सुखागै, नंदिया सुखागै
                      कूआँ अंउटगे, बारी लसागै
                      झरगे जम्मों पेड़ के पाना
                      गाय - गरुवा के सिरागे रे दाना
       आजा रे आजा बजावत बाजा, छल छल पानी बोहा दे रे बादर।
       दुब्बर के दुसकाल बोहा दे, परानी के भाग जगा दे रे बादर।।

                                                                                                                            संपादक
                                                                                                                           सुरेश सर्वेद

शनिवार, 27 अगस्त 2016

नामवर के बहाने

नामवर सिंह
रवींद्र गोयल

          नामवर सिंह द्वारा 90 बरस की उम्र में संघ का पल्ला पकड़ लेने की सही ही आलोचना हो रही है। सवाल है कि क्या यह नामवरजी की ही समस्या है या और साहित्यकार - बुद्धिजीवी भी इस बीमारी से ग्रस्त हैं। क्या यह एक व्यक्ति विशेष का ही चरित्र है कि तात्कालिक सत्ता को सम्मान के एवज में वैधता प्रदान करे या इस बीमारी के स्रोत कहीं ज्यादा गहरे हैं। अज्ञेय की कविता '' बौद्धिक बुलाये गए '' याद आती है। देखें कविता लेख के अंत में।
          सम्मान के बदले में अपने चेहरे, पद और नाम सरकार को समर्पित कर देना या समर्पित करने को लालायित रहना, भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की, खासकर हिंदी बुद्धिजीवी वर्ग की लाक्षणिक विशिष्टता है। अंग्रेज़ों द्वारा दी गयी शिक्षा प्रणाली में पढ़े - लिखे ये बुद्धिजीवी जब पढ़ - लिख कर बाहर आते हैं तो ये अपने परिवेश से अपने आपको बेगाना पाते हैं। अपने रिश्तेदारों, नातेदारों, भाई.बिरादरी और जवार - टोले के अन्य व्यक्तियों के साथ इनका संवाद ही नहीं हो पाता। इनकी पढाई - लिखाई ने भारतीय समाज या परिवेश की कोई समझ इन्हें नहीं दी। और जो सोच- समझ इन्होंने पाई। उससे इनके करीबी लोगों का कोई अर्थपूर्ण या मानीखेज जुड़ाव नहीं हो पाता। कबीर ने यूँ ही तो नहीं कहा -
पढ़ि - पढ़ि के पाथर भया, लिख - लिख भया जू ईंट।
कह कबिरा प्रेम की लगी न लगि ने अंतर छींट।।
          ऐसे में अगर ये डॉक्टर या कोई सरकारी अफसर हैं तो और बात हैं क्योंकि तब ये उनके कुछ काम कर सकते हैं या करवा सकते हैं। नहीं तो इनके नातेदार- रिश्तेदार इनसे एक ही उम्मीद करते हैं कि ये उनकी गाहे - बगाहे आर्थिक मदद कर दें। नतीजा, नवउदारवादी नीतियों के चलते ग्रामीण जमीनों के दाम बढ़ने से पहले तक तो इनमें से कई गांव जा कर झांकते भी नहीं थे। कई बुद्धिजीवियों ने तो बचपन की ब्याहता पत्नी को छोड़ दिया और शहरों में नए ब्याह कर लिए। उनमें से जो थोड़े.बहुत सामंती संस्कार से ग्रस्त हैं, वो तो गांव पर उस पत्नी के रहन - सहन का खर्च भेज भी देते हैं, नहीं तो प्रगतिशीलता के तहत उससे भी अपने को मुक्त समझते हैं।
          अपने परिवेश से बेगाने ये गमले के गुलाब स्वीकृति खोजते हैं। वाज़िब इच्छा है। किसे शिकायत हो सकती है। इसके दो ही रास्ते हैं। यदि अपने स्वाभाविक परिवेश में स्वीकृति पानी है तो अपने आपको लोगों से एकीकार करना होगा और उसके लिए व्यक्तित्वान्तरण की कष्टसाध्य प्रक्रिया से गुज़रना होगा। जो सीखा नहीं है, सीखना होगा। मध्यम वर्ग की सुविधाओं में जीने के मोह को लगाम देकर जीवन में सादगी को अपनाना होगा और जहाँ तक हो सकेए कथनी और करनी के फर्क को ख़त्म करना होगा। या दूसरे शब्दों में कहें तो अपने वर्ग की सीमाओं को समझते हुए अपने आप को मेहनती आमजन, मज़दूर - किसानों की आशाओं, उम्मीदों, आकाँक्षाओं, सपनों, दुख - दर्द और ख़ुशी - गम, सभी से जोड़ना होगा। सच्ची वर्ग चेतना से जोड़ना होगा। नामवर के ही शब्दों में '' उसकी सच्ची वर्ग चेतना इस बात में है कि वो मज़दूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंतत: अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके लिए पूंजीवाद के विनाश में मज़दूर वर्ग का साथ दे।''  देखें - कविता के नए प्रतिमान . पेज 246  इसी बात को कबीर ने दूसरे शब्दों में यूँ कहा है 
'' यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहीं।
सिर उतारे भूँई धरे, तब पैठे घर माहीं।''
          यह कार्य व्यक्तिगत स्तर पर एक सीमा से आगे नहीं जा सकता। किसी आंदोलन के हिस्से के तौर पर ही हो सकता है। आज़ादी की लड़ाई में यह कार्य गाँधी के नेतृत्व में मुख्यत: संपन्न हुआ। आज़ादी के बाद एक हद तक समाजवादी आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन की रहनुमाई में संपन्न हुआ। 1959 में ही नामवर कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पूर्वी यूपी से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। लेकिन अब नक्सलवादी आंदोलन की भिन्न धाराओं या कुछ थोड़े से समाजवादियों को छोड़ कर, व्यक्तित्वान्तरण या आमजन से एकीकरण के सवालों को कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं उठाता और नक्सलवादी.समाजवादी आंदोलन कि धाराएं भी आज समाज में हाशिए की ताकतें हैं। वैसे भी दुनिया के पैमाने पर प्रभावी माहौल इनके पक्ष में नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति की अपनी यांत्रिक सोच के चलते भी ये धाराएं बुद्धिजीवियों के बहुलांश को आकर्षित नहीं कर पातीं।
          अब दूसरा रास्ता भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग के पास है तो विदेशों में या सरकारी तंत्र द्वारा स्वीकृति पाना। विदेशों में स्वीकृति का रास्ता बड़ा मुश्किल है। एक तो अंग्रेजी में महारत चाहिए, दूसरे विदेशी आबोहवा से कुछ पहचान भी चाहिए और आजकल तो टेंट में पैसा भी चाहिए। प्रथम पीढ़ी के पढ़ने वालों के सामने या हिंदीभाषी छात्रों को ये मामला बहुत दुरूह लगता है। कोई गलत भी नहीं, स्वाभाविक ही है। हाँ, देखा जा रहा है कि हिंदी - हिंदीभाषी बुद्धिजीवियों के लड़के - बच्चे आज़ाद भारत में गांधीजी की भारत छोडो आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं या उस दिशा में प्रयासरत हैं। मैं स्वयं कोई इसका अपवाद नहीं हूँ। मेरा बेटा स्वयं विदेश जाने की कोशिश कर रहा है।
          आखिरी राह है सरकारी तंत्र द्वारा स्वीकृति की। सरकारी तंत्र में कई संवेदनशील प्रतिभाशाली कवि, साहित्यकार अफसर बन कर धंस जाना चाहते हैं और कई धंसे भी हैं। शेष जो बचे वो पुरस्कृत हो कर अपने को धन्य समझते हैं। नामवर जी कोई ऐसे अनोखे अपवाद नहीं हैं।
          लेकिन इस रास्ते की कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है, उसको उकेरते हुए बहुत पहले महाकवि निराला ने सत्ता की '' गिलौरियाँ '' खाने को लालायित सुधीजनों को चेताते हुए कहा था-
'' साथ न होना।
गांठ खुलेगी।
छूटेगा उर का सोना।
पाना ही होगा खोना।
साथ न होना।
हाथ बचा जाए कटने से माथ बचा जा
अपने को सदा लचा जाए
सोच न कर, मिला अगर कोना।
साथ न होना।''
           वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ सिंह इसको विस्तारित करते हुए सही ही कहते हैं
'' फिर से मुड़कर वहीं मत जाना। फिर उसी अल्पमत में अपनी जगह बनाने की कोशिश न करना। अपने लोगों के बीच रहना। वरना तुम्हारी गांठ का सोना वे लुटेरे लूट लेंगे। तुम्हारी प्रतिभा, वर्चस्विता, तेजस्विता का इस्तेमाल.उपयोग करके तुम्हें रिक्त कर देंगे। जिसे तुम अपनी उपलब्धि समझोगे, जिस सुविधा, सुरक्षा, ऐश्वर्य और स्थापना को तुम '' पाना '' समझोगे, दरअसल वही तुम्हारा सबसे बड़ा '' खोना '' होगा। तुम अपना निजत्व अपना '' मैं '' सदा के लिए हार जाओगे। अत: किसी प्रलोभन में पड़कर उस राजेष् के समाज के जादू में मत फँसना।''
          सोचना होगा कि क्या भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग इस हश्र के लिए अभिशप्त है। शायद नहीं, फ़्रांसीसी लेखक ज्याँ पाल सार्त्र  ने 1964 में नोबेल प्राइज लेने से इनकार करते हुए शायद सही ही कहा था '' एक लेखक जो राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक अवधारणाओं की पैरवी करता है, उसे अपने ही साधनों यानी लिखित शब्द के साथ ही अपना कार्य करना चाहिए। सभी सम्मान जो लेखक को प्राप्त होते हैं, वो उसके पाठक पर एक ऐसा दबाव बनाते हैं जिसे वो सही नहीं मानते थे।''
           यह सही है कि तीसरी दुनिया के बुद्धिजीवियों में सार्त्र जैसी सार्वजनिक स्वीकृति और उससे उपजी नैतिक ताकत आज कम ही दिखाई देती है, पर इसकी उम्मीद रखना कोई गलत भी तो नहीं है। क्योंकि यह मनोभाव एक इंसानी जिंदगी की पूर्व शर्त होती है।
बौद्धिक बुलाये गए
.अज्ञेय
'' हमें
कोई नहीं पहचानता था।
हमारे चेहरों पर श्रद्धा थी।
हम सब को भीतर बुला लिया गया।
उसके चेहरे पर कुछ नहीं था।
उसने हम सब पर एक नज़र डाली।
हमारे चेहरों पर कुछ नहीं था।
उसने इशारे से कहा इन सब के चेहरे
उतार लो।
हमारे चेहरे उतार लिये गये।
उसने इशारे से कहा
इन सब को सम्मान बाँटो
हम सब को सिरोपे दिये गये
जिनके नीचे नये
चेहरे भी टँके थे
उस ने नमस्कार का इशारा किया
हम विदा कर के
बाहर निकाल दिये गये
बाहर हमें सब पहचानते हैं
जानते हैं हमारे चेहरों पर नये चेहरे हैं।
जिन पर श्रद्धा थी
वे चेहरे भीतर
उतार लिये गये थे - सुना है
उन का निर्यात होगा।
विदेशों में श्रद्धावान् चेहरों की
बड़ी माँग है।
वहाँ पिछले तीन सौ बरस से
उन की पैदावार बन्द है।
और निर्यात बढ़ता है
तो हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती है ''
मेल : ravi_goel2001@yahoo.com

बुधवार, 24 अगस्त 2016

वाक्‍या ऐसा यह हुआ कैसे



हरदीप बिरदी

वाक्या ऐसा यह हुआ कैसे
सब हैं हैराँ कि मैं बचा कैसे
तूने सोचा नहीं कभी शायद
तेरा चेहरा निखर गया कैसे
यह ख़बर तू ही अब हवा ला दे
जी रहा है वो यह बता कैसे
मैंने ख़ुद को बहुत संभाला था
ले गई दिल वो इक अदा कैसे
बातों .बातों में रूठ जाओगे
ज़िन्दगी देगी फिर मज़ा कैसे
उसके हाथों का इक खिलौना हूँ
उसको देता भी मैं सज़ा कैसे
चाँद में दाग़ है मगर ' बिरदी' 
इतना लगता है वो भला कैसे
पता
लुधियाना
9041600900

शेंकी का घर


लेखक परिचय

मनीष कुमार सिंह
     जन्‍म पटना के निकट खगौल (बिहार) में हुआ। प्राइमरी के बाद की शिक्षा इलाहाबाद में।भारत सरकार,भारत सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में प्रथम श्रेणी अधिकारी। पहली कहानी1987में ‘नैतिकता का पुजारी’ लिखी। विभिन्‍न पत्र - पत्रिकाओं यथा - हंस , कथादेश , समकालीन भारतीय साहित्‍य , साक्षात्कार , पाखी , दैनिक भास्‍कर, नयी दुनिया, नवनीत, शुभ तारिका, अक्षरपर्व , लमही, कथाक्रम ,  परिकथा, शब्‍दयोग,अनभै सॉचा इत्‍यादि में कहानियॉ प्रकाशित। पॉच कहानी - संग्रह ‘आखिरकार’(2009),’धर्मसंकट’(2009), ‘अतीतजीवी’(2011),‘वामन अवतार’(2013) और ‘आत्‍मविश्‍वास’ (2014) प्रकाशित। 

          इंटरव्‍यू देने के लिए मुम्‍बई आया था। वैसे कभी न आता लेकिन नौकरी का सवाल था। वरना कहॉ इलाहाबाद और कहॉ मुम्‍बई। मैंने घर में पहले ही साफ कर दिया था कि अगर कम्‍पनी वाले मुझे आसपास पोस्टिंग दे देगें तो ठीक है वरना मुम्‍बई वगैरह नहीं जाऊगॉ। माता.पिता अपलक मुझे देखते रहे। उनकी निगाहों से लगता था कि वे सोच रहे थे कि कैसा इंसान है। अभी नौकरी लगी भी नहीं और नखरे शुरु कर दिए। भला मर्द और पंछी को बिना घर त्‍यागे दाना - पानी मिलता है। छोटी जगहों पर रहने वालों के लिए बड़े शहरों के प्रति एक धारणा होती है। शायद ऐसी ही पूर्वनिश्चित विचार उन शहरों के लोगों की भी इधर के बारे में होगी। कुछ भी हो मैं किसी को बुरा नहीं कहता लेकिन यदि यूपी के किसी शहर में नौकरी मिलती तो अच्‍छा था। घर नजदीक पड़ता। थोड़ा अपना कल्‍चर रहता।
         पिताजी ने रहने का इंतजाम करवा दिया। उनकी सर्विस के बैचमेट चढ़ढा साहब माहिम में रहते थे। दोनों ट्रेनिंग में साथ थे। एक ही ऑफिस में कुछ साल पोस्टिंग भी थी। उनकी जुबान से कुछ मित्रों के संस्‍मरण घर में सुने जाते थे। इनमें चढ़ढा साहब भी थे। बाद में उन्‍होंने समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेकर अब किसी एम.एन.सी. में कनसल्‍टेंट थे। काफी पैसे मिलते थे। इधर काफी समय से पिताजी का उनसे सम्‍पर्क नहीं था परंतु एक बार उन्‍हीं के मुख से मैंने सुना था कि चढ़ढा तो अब नोटों पर सोता है।

'' तुम वहीं रुक  जाना।'' वे मुझसे बोले।  मैं अनजान लोगों में  बहुत संकोच करता हू।  बेहतर हो किसी मिडिल  क्‍लॉस के ठीक  - ठाक  होटल में ठहरू। इंटरव्‍यू देकर एकाध जगह  घूमघाम कर घर वापस।  पिताजी ने उसी दिन चढ़ढा  साहब के यहॉ फोन पर  बात की। फोन पहले उनकी  पत्‍नी ने उठाया। पति - पत्‍नी से काफी देर  तक बात करने के बाद  मुस्‍कराते हुए कहने  लगे '' जाओ भाई बॉम्‍बे भी घूम आना।'' बात से साफ लगा कि  मामला जम गया है।
          मॉ ने मेजबान के घर के लिए लड़डू और नमकीन जैसी चीजें बनानी शुरु कर दीं। पुराने ख्‍यालों और रिवाजों में पली थीं। ऐसे माहौल में अतिथि को भगवान तथा कहीं जाने पर घर की बनी चीजें भेंट में देना अपनेपन की पहचान मानी जाती थी। मेरे लिए रास्‍ते में खाने हेतु चीजें बनाने लगीं। मैं उनके भोलेपन और सादगी पर मन ही मन हॅसने लगा। जब न रहा गया तो बोल पड़ा '' मॉ वहॉ लोगों को यह सब क्‍या पसंद आएगा।'' 
           वे काम जारी रखती हुई बोलीं - '' बेटा दिल से कुछ भी करो तो भगवान हो या इंसान सभी को अच्‍छा लगेगा।'' मॉ की बातें तर्क से नहीं भावना से सराबोर होती थीं।
         मुम्‍बई पहुंचकर मुझे पानी के सड़ने और मछली जैसी गंध का आभास हुआ। अपनी संवेदनशील नाक को समझाता हुआ मैं पिताजी के दिए पते के सहारे चढ़ढा साहब के घर पहुचा। वे नहीं थे। लेकिन उनकी धर्मपत्‍नी ने मुझे पहचान लिया कि मैं ही वह व्‍यक्ति हू जिसे आना था। वे एक अधेड़ उम्र की थोड़ी शरीर वाली महिला थीं। मेरे नमस्‍ते का सर हिलाकर जवाब देने के बाद उन्‍होंने घर में नौकर को मेरा सामान एक कमरे में पहुचाने का आदेश दिया। उनका फ्लैट बड़ा और आरामदेह था। मैं ड्राइंग रुम में सोफे पर बैठ गया। सामने नौकर ने पानी रख दिया। थोड़ी देर बाद कोल्‍ड़ड्रिंक भी। मिसेज चढ़ढा किसी काम में तल्‍लीन थीं। मुझे लगा कि वे फुरसत पाकर बातचीत करेगीं। ड्राइंग रुम बेहद सलीके से सजा हुआ था। दीवार पर दो जगह मार्डन आर्ट की पेंटिंग टॅगी थी। थोड़ी देर बाद मिसेज चढ़ढा अन्‍दर से निकली और बस बाहर चली गयीं। कुछ पल बाद पूछने पर नौकर ने बताया कि मेमसाहब किसी जरुरी काम से गयी हैं। शाम तक आएगीं।
        उसे निर्देश दिया गया था कि वह मेरा ख्‍याल रखे। झल्‍लाहट का भाव मेरे मन में आया। शायद अपमान का भी। इससे अच्‍छा तो स्‍टेशन के पास का कोई होटल होता। अपनी मर्जी से रहो और खाली करो। घर बड़ा लेकिन खाली था। मुझे मालूम था कि चढ़ढा साहब के दो बेटे और एक बेटी थी। नौकर ने बताया कि बड़ा वाला बिजनेस कर रहा है। बेहद व्‍यस्‍त रहता है। लड़की कॉलेज में अभी पढ़ रही थी। छोटा वाला अभी.अभी फस्‍ट इअर में गया था। परसों इंटरव्‍यू था। मुझे लगा कि मैं कुछ पहले आ गया हॅू। 
         एक बार मन में आया कि सारा घर देख डालू लेकिन आंटी यानि मिसेज चढ़ढा का रुखा - सूखा स्‍वागत देखकर ऐसी हिम्‍मत नहीं कर पाया। पिताजी तो बस... । सबको अपने जैसा समझते हैं। अचानक ध्‍यान आया कि मॉ ने खाने की कुछ चीजें भिजवायी थीं। आंटी तो चली गयी अब किसे दू। नौकर ने मेरा कमरा और बिस्‍तर तैयार कर दिया। मैं फ्रेश होने चला गया।
        थोड़ी देर बाद खाने के लिए बुलाने पर जब मैं ड्राइनिंग टेबल पर पहुचा तो देखा कि एक हट्टा - कट्टा युवक पहले से ही बैठा था। वह चढ़ढा साहब का बड़ा लड़का था। '' हैलो '' मैंने खुद ही पहल की। उसने मुझे सरसरी निगाह से देखते हुए हाथ मिलाया। '' सौरभ '' बस इतना ही उसके बड़े मुख से निकला। हॉफ स्‍लीव वाली टी.शर्ट और जिंस में वह बेहद कसरती दिख रहा था। गले में एक मोटी सी चेन थी। सोने की ही होगी। दाहिनी कलाई पर ब्रेसलेट पहने था। टी शर्ट के सारे बटन खुले और सेंट की जबरदस्‍त गंध आ रही थी। शायद अभी - अभी नहा कर आया था।
- आप यहॉ इंटरव्‍यू के लिए आए  हैं।''
- जी हॉ।'' मैं जल्‍दी से बोला। जैसे  इस बात से उपकृत हो  गया हूं कि वह इस तथ्‍य से पूर्वपरिचित है। वह  पहले से ही खाना खा  रहा था। प्‍लेट में कुछ अपरिचित व्‍यंजन पड़ा था जिसे वह कांटे चम्‍मच के सुन्‍दर समन्‍वय द्वारा गटक रहा था। एकाध बार मिनरल वॉटर की बोतल से जल गिलास में निकाल कर पीता। मेरा खाना रोटी - चांवल, राजमा, दाल जैसी भली - भॉति परिचित पदार्थ थे। घर के बने।  मैंने बिना किसी के  अनुरोध किए खाना शुरु किया। जल्‍दी से भोजन समाप्‍त कर वह खड़ा  हुआ। '' ओ. के. मिस्टर '' '' मैं राजेश...।''
- यस राजेश सी.यू.।'' वह चला गया।
        अपने कमरे में जाकर मैं कुछ इम्‍पॉरटेंट पाइन्‍टस् दुहराने लगा। अपने रिजूइम को गौर से दुबारा निरीक्षण किया। थोड़ी देर बाद मेरी ऑख लग गयी।
        शाम में घर में कुछ चहल - पहल सुनी। चढ़ढा साहब और उनकी पत्‍नी दोनों थे। मेरी नमस्‍ते का एक ठीक - ठाक हैलो से जवाब देकर उन्‍होंने घर का हालचाल पूछा। मेरे पिता के ही उम्र के थोड़े नाटे व भारी शरीर के चढ़ढा साहब हाव.भाव से सफल व्‍यक्ति दिख रहे थे। उन दोनों के पीछे उनकी बेटी थी। मोबाइल पर कुछ कर रही थी। एस.एम.एस. वगैरह। मैंने सबको पाकर मॉ की भेजी चीजें सामने रख दीं। घर की मिठाई और नमकीन। चढ़ढा साहब के बदन में हॅसी की तरंगें दौड़ गयी। स्‍वीहॉट इज दिस।''
- मॉ ने भेजी हैं  सर।'' मैं संकुचा गया।  मिसेज चढ़ढा कुछ नहीं  बोलीं। बेटी ने सरसरी  तौर पर उन्‍हें देखा और दुबारा  अपने कार्य में लीन  हो गयी। किसी ने उसका  परिचय न कराया और न  ही उसने मुझसे कुछ कहा।
        तभी सामने के कमरे से एक लड़का प्रकट हुआ। दुबला - पतला,बाल बिखरे,दाढ़ी शायद दो - तीन दिन से नहीं बनायी गयी थी। घर का ही लगता था। '' ममी मेरी नयी शर्ट कहॉ रखी है '' मिसेज चढ़ढा के मुख पर जहॉ तक मैं देख पाया झुझलाहट उभरी। '' अरे तुम्‍हारे वार्डरोब में ही होगा। ''
        लड़के ने हाथ झटके - होता तो मैं क्‍यों पूछता।''
- चलो मैं ढूढ़  देती हू।'' वे उदारता का  परिचय देती हुई बोलीं।
         अचानक उसकी नजर मुझ पर पड़ी। '' हैलो सर! आई एम शलभ चढ़ढा।'' उसने गर्मजोशी से हाथ बढ़ाया। घर के माहौल और उनके बांशिंदों का मिजाज देखकर मुझे उसकी गर्मजोशी कृत्रिम दिखी। लेकिन मैंने भी हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया। उसका हाथ सौरभ के मुकाबले बेहद कोमल था। फिर वह मुझसे आने का मकसद, कब तक रुकने का इरादा है वगैरह बातें पूछने लगा। मैं उसके प्रश्‍नों का उत्‍तर देने लगा। तभी उसकी नजर मेरी लाई चीजों पर पड़ी। वह बिना पूछे उसे खोल कर देखने लगा। वंडरफुल! उसने लड़डू का एक टुकड़ा मुह में डाल लिया। शायद यह हरकत मिसेज चढ़ढा को कुछ जॅची नहीं। उसने बिना कोई ध्‍यान दिए एक और टुकड़ा मुह में डाला और मेरा हाथ पकड़ कर एक ओर ले गया। दरअसल अपने कमरे में '' यहॉ बैठो और प्‍लीज फील फ्री।'' वह उन्‍मुक्‍त भाव से बोला। मैं उसके बिस्‍तर पर ही बैठ गया। '' जूते - चप्‍पल उतार कर पैर ऊपर कर लो फ्रैंड।'' मैंने वही किया।
         - मेरे घर का नाम शैंकी है।'' यही नाम उसकी  मॉ ने लिया था। '' भाई एम.बी.ए.करने का प्‍लान है।''
'' अच्‍छा।'' मैंने उत्‍सुकता दिखायी। कहॉ  से...''
- एक रिपुटेट कॉलेज  से। कई एम.एन.सी.यहॉ से  लड़के - लड़कियों को छॉट  कर ले जाते हैं। मेरे ख्‍याल से हर इंसान  को जिंदगी में दो चीजें  जरुर करनी चाहिए। एक एम. बी. ए. और दूसरी एल. एल. बी.।'' मैं बस मुस्‍कराया। उसकी बातों  से लगता था कि वह दोनों में से किसी के प्रति सीरियस नहीं है। जाना है तो एक तरफ जाए। घरवालों के पास ढ़ेर सारा पैसा है। क्‍या करेगा कुछ करके। कमरा बिखरा - बिखरा था। दीवाल पर कहीं सड़क  की पटरी पर बिकते पोस्‍टर लगे थे तो  कहीं हाथ से बनी पेंटिंग। एक जगह एक कैलेन्‍डर टॅगा था जिसमें  कई धर्मो के चिन्‍ह थे। सेल्‍फ पर म्‍यूजिक सिस्‍टम और कुछ सी. डी. पड़े थे। किसी पोस्‍टर पर मानवों के  चित्र थे तो किसी में अंग्रेजी में सकारात्‍मक जीवन और मित्रता पर कुछ बातें लिखी थीं। सजावट ड्राइंग रुम से नितांत भिन्‍न थी। कमरे से लगे बॉलकनी में कुछ खाली डिब्‍बे और कागज के ढ़ेर दिखे। हवादार और  अच्‍छा कमरा था। लेकिन  मुझे लगा कि इधर शैंकी  को छोड़कर कोई आता नहीं  है।
- नौकरी मिलने पर कितनी सैलेरी मिलेगी।'' उसने पूछा। '' पता नहीं, देखो।'' मैंने कहा।
- ज्‍यादा ही हो तो  ठीक है। यहॉ मॅहगाई  काफी है।'' उसने सिगरेट निकाली। मुझे बढ़ाया। ''थैंक्‍स, मैं नहीं पीता।''
- अच्‍छा '' वह हॅसा। मैंने उसे स्‍पष्‍ट किया कि मैं यहॉ नहीं रहना चाहता। '' क्‍यों। '' वह आश्‍चर्य का प्रदर्शन करता हुआ बोला। वाई यार, यहॉ कितनी रंगीनियॉ हैं ? मुझे उसकी बेतकल्‍लुफी और आत्‍मीयता देखकर हैरानी हो रही थी। उसने सामने आलमारी से बिस्‍कुट का एक पैकेट निकाला। रैपर खोलकर मुझसे कहा - कुछ लो।'' मैं मुस्‍करा कर खाने लगा। '' यहॉ तुम्‍हें बन्‍द डिब्‍बे वाली चीजें ही मिलेगीं। घर की नहीं। वैसे जब तक तुम इंटरव्‍यू से लौटोगे तुम्‍हारी सारी मिठाई और नमकीन मैं चट कर चुका होऊगॉ। घर में सभी से  मिल लिए।'' उसने अचानक पूछा। '' हॉ '' मैंने अनायास कहा। बोलने के बाद सोचने लगा कि उसकी बात का कोई अर्थ है। '' तब तो बड़ी नाइस मीटिंग हुई होगी।'' वह हॅसने लगा। अब मुझे अर्थ कुछ समझ में आने लगा। कितनी देर की मीटिंग थी। पॉच सेकंड,पन्‍द्रह या पच्‍चीस सेकंड की।'' वह अभी भी हॅस रहा था। मैं उसे निर्निमेष देखता रहा। वह मेरी किंकर्तव्‍यविमूढ़ता देखकर खुद ही उससे मुझे निकालता हुआ बोला - चलो छोड़ो।'' अपने घर के बारे में किसी बाहरी से बेबाक टिप्‍पणी करने वाला इंसान पहली बार देख रहा था। पल भर में कई बातें मुझे सुस्‍पष्‍ट हो गयीं।
- तुम इंटरव्‍यू पर कन्‍संट्रेट करो। इसके बाद हम मुम्‍बई दर्शन करेंगे।'' उसने बिना औपचारिकता के बैठक समाप्‍त की। वह मुझे समय देना चाहता था।
        मेहनत रंग लायी। किस्‍मत भी अच्‍छी निकली। बोर्ड ने मुझे सेलेक्‍ट कर लिया। कहॉ पोस्टिंग होगी इस बारे में अभी कुछ नहीं बताया। नौकरी मिल जाने के बाद किसी दूसरे विकल्‍प के उसे छोड़ना अकलमंदी नहीं थी। मैं इतना गैरजिम्‍मेवार नहीं था।
        चढ़ढा साहब के घर मैं मिठाई लेकर खुशखबरी देने आया। पति.पत्‍नी ने मुस्‍करा कर मुबारकबाद दी। शैंकी मुझसे लिपटकर जोर से बोला - कॉनग्रैट! अब देखना तुम कितनी जल्‍दी तरक्‍की के रास्‍ते पर बढ़ोगे। लेकिन माई डियर जौपुर और आजमगढ़ मत जाना। यहॉ जितने मौके हैं उतना कहीं नहीं है।'' उसके फक्‍कड़ स्‍वभाव को देखते हुए लगता नहीं कि वह सांसारिक चीजों को इतना महत्‍व देता है। पर मुझे ऐसी सलाह दे रहा था। मैं बस मुस्‍कराया। '' पैसे कमाओगे तो मेरे साथ तफरीह करने चलोगे ना।'' वह बड़ी आत्‍मीयता से मेरे कंधे पर हाथ रखकर ऐसे बोला मानो हमारी बड़ी पुरानी जान पहचान है।
        हमारे बीच यह सब चल रहा था तब तक चढ़ढा परिवार के शेष सदस्‍य इस घटना को लगभग भूलाकर रुटीन में आ गए थे। '' आंटी मुझे कल लौटना है।'' मैंने यह बताकर उनका ध्‍यान खींचना चाहा। उन्‍होंने शायद सुना नहीं। दुबारा कहने पर ठंड़े स्‍वर में बोलीं - ओ.के.''
        मैं अपने कमरे में आ गया। थोड़ी देर आराम करके चैतन्‍य हुआ ही था कि शोर सुनकर ध्‍यान आकृष्‍ट हुआ। झगड़े जैसी कोई बात लग रही थी। मैं कमरे से बाहर आया। घटनास्‍थल की तरफ जाना एक मेहमान के लिए उचित नहीं था। उत्‍सुकता को दबाना भी मुश्किल था। इसलिए अपने स्‍थान से कान लगाकर समझने का प्रयास किया। शैंकी, उसके ममी - डैडी और उसकी बहन की आवाजें आ रही थीं। '' हाउ डेयर यू '' बहन चीखी। '' वाई आई एम ऑलसो दी मेम्‍बर ऑफ दिस फैमिली।'' शैंकी का जवाब था। '' काम डाउन।'' यह मॉ - बाप की सम्मिलित ध्‍वनि थी। '' बेटी तेरा भाई है वह भला - बुरा समझा सकता है।'' मिसेज चढ़ढा ने जाने दो माफ करो वाले अंदाज में समझाया। '' तुम्‍हें पता है इस भाई के इलाज में मेरी कमाई के कितने पैसे खर्च हुए हैं।'' छन छन ! जैसे कोई नाजुक सामान टूटने से कुछ देर तक सन्‍नाटा व्‍याप्‍त हो जाता है कुछ वैसा ही हुआ। सारी ध्‍वनियॉ शांत हो गयीं। केवल इसी के टूटने की प्रतिध्‍वनि व्‍याप्‍त रही। टूटने वाली चीज काफी समय से सॅभालकर रखी गयी थी।
         उतनी दूर से मुझे कुछ खास नहीं पता चला। लेकिन अस्‍पस्‍ट सी आवाजों के आधार पर मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुचा कि यह व्‍यसक शैंकी के सुबकने की आवाज हो सकती थी। अपने कमरे का दरवाजा बन्‍द करके वही अन्‍दर बंद हो गया। '' तुम्‍हें ऐसा नहीं कहना चाहिए था। इटस् टू मच।'' चढ़ढा साहब घर के बुजुर्ग की हैसियत से बोले। मुझे उनकी बात में बेटे के दुख की अभिव्‍यक्ति नहीं लगी। वे मात्र माहौल का तनाव और झगड़ा बंद करना चाहते थे। '' हॉ - हॉ आप सब लोग मुझे ही दोषी ठहराएगें।'' बहन ने प्रयत्‍न करके अपने गले को रुआंसा किया और घटनास्‍थल से चलती बनी।
        सहज बुद्वि यह कहती थी कि पराए मामले में पड़ना ठीक नहीं है। सो मैं चुप रहा। शाम को सब सामान्‍य दिख रहा था। शैंकी मेरे पास आया। '' आर यू फ्री..''
- हॉ.हॉ कहो।''
- चलो तफरीह करने  चलते हैं।'' वह बालसुलभ  उत्‍साह से कह रहा था। मुझे वैसे भी कल रवाना होना था। समय का इससे अच्‍छा सदुपयोग और क्‍या हो सकता था। मुम्‍बई के समुन्‍दर, रंगीनियों के बारे में सुना था। बेपरवाह शैंकी ने बस की बजाए टैक्‍सी की और हम सड़कों पर यूं ही घूमते - घूमते चौपाटी पहुचे। वहॉ समुद्र  भूरे रंग का था। लोग  बड़ी तादाद में थे। वह सीधा लहरों के पास  पहुच गया। अपने जूते  उतार कर उसने पानी को  उछालना शुरु किया। मैं यह सब देखकर भी दूर रहा। उसने मुझे बुलाया। थोड़ी देर तक पानी के  बीच रहकर हम बालू पर  बैठ गए। मेरे मन में  दोपहर वाली बात के बारे में जिज्ञासा थी। फिर  भी अपनी तरफ से कुछ कहना नहीं चाहता था। उसने  नारियल के पानी वाले  दो डाब मॅगाए। डाब पीते  हुए वह बोला - यार बड़े  काबिल और जहीन लोग हैं। लेकिन इंसानों से इन्‍हें एलर्जी है।''
- क्‍या बात हुई। '' मैं अपनी उत्‍सुकता रोक न सका।
        वह खामोश रहा। लेकिन उसकी सूरत से लग रहा था कि असमंजस यह है कि कहॉ से शुरु करे न कि यह कि कैसे बताए। '' डॉली का कई आवारा किस्‍म के लड़कों से अफेयर है। मैंने उसे ऐसा करते देखा था। यह बात ममी - डैडी को पहले भी कई बार बता चुका हू। आज कहा तो तूफान मच गया।'' उसके चेहरे पर विषाद फैल गया। न जाने कहॉ से मैं अपना संकोच और पराए घर की अंदरुनी बातें जानने की जिज्ञासा त्‍याग कर सच्‍ची आत्‍मीयता से उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला - जाने दो ना ... तुम्‍हें क्‍या। जो लोग तुम्‍हारी बात नहीं समझते उनसे क्‍यों बात करें।'' कुछ पल पहले का खिलन्‍दा शैंकी इतनी सी सहानुभूति पाकर रोनी सूरत वाले बच्‍चों की तरह हो गया। थोड़ी देर बाद उसने कहा - पर हैप्‍स् यू आर राइट।'' वह जिसे बहन समझकर भला - बुरा समझा रहा था वह बहन उसे अपनी आमदनी का उसके ऊपर हुए खर्च का हिसाब - किताब समझाने लगी।
        मैं शुरु से ही  अपने गोल को लेकर सीरियस नहीं रहा। वह बोलने लगा - पेंटिंग  और आट्स में इंस्‍ट्रेस्ट था सो उसका  कोर्स भी किया। घरवाले  इस पर मॅुह बिचकाते थे। वे चाहते थे कि  मैं बिजनेस में कुछ  करु। मेरी भी गलती थी। जिस तरफ रुचि थी उधर  भी कुछ खास नहीं कर पाया। फिर एम. बी. ए. करने  की सोची। देखो, मैं  सोचता रहा। ऐसा लग रहा  था कि जमाने के हिसाब से जितना होशियार या चालाक होना चाहिए उतना वह नहीं बन पाया था। असफल व्‍यक्ति और लॅगडे  घोड़े को झुण्‍ड़ नकार देता है। कुछ ऐसी ही अवस्‍था यहॉ थी। मेरे अन्‍दर शैंकी के प्रति  कई तरह के भाव उठ रहे  थे। हमदर्दी के , दया के भी। साथ - साथ एक और तथ्‍व भी था। उसके  दुख को मैं अन्‍दर से महसूस कर रहा था।'' हमारा घर सबसे अच्‍छा है।'' शैंकी विद्रुपता  से मुस्‍कराया अच्‍छी लोकेशन में है। सब कुछ नजदीक है। कॉलेज, एयरपोर्ट, स्‍टेशन, होटल, अस्‍पताल।जहॉ जाना हो जाइए। बीमार हैं तो अस्‍पताल मे भर्ती  हो जाइए। ठीक होने पर  घर तशरीफ ले आइए।'' वह बोलते - बोलते हॅसने लगा।  थोड़ी देर बाद मेरी  तरफ मुड़कर बोला - आज मैं  घर नहीं जाऊगॉ। मैं  अन्‍डर प्रोटेस्‍ट हॅू। मेरे फ्रैंड  के साथ घर के लोगों  ने अच्‍छा व्‍यवहार नहीं किया है। दिस इज नॉट दी वे टू बिहेव विद ए  गेस्‍ट।''
        मैं घबरा गया। अगर वह कंट्रोल से बाहर हो गया तो इस शहर में उसे कहॉ सॅभालूगा।
      वातावरण को हल्‍का - फुल्‍का बनाने की गरज से मैंने विषर्यान्‍तर जरुरी समझा। '' अच्‍छा, शैंकी बताओ तुम्‍हारी कौन - कौन से शौक हैं।''
- हॅू...। शौक यानि हॉबिज।'' कुछ पल सोचने की मुद्रा में लीन रहने के बाद कहने लगा म्‍यूजिक, सेवेंटीस् के हिन्‍दी फिल्‍मों के सॉगस्, किताबें, घूमना, गर्ल फ्रैंड बनाना। अब तक कोई बनी नहीं। वह खुद ही हॅसने लगा। और बचपन के कुछ शौक अभी भी चले आ रहे हैं। फ्रैंडशिप करना, पुराने फ्रैंडस् को याद करना।'' वह अपने दुबले - पतले  शरीर को उमंग से हिला रहा था। इससे मुझे कुछ याद आया। '' तुम्‍हारी तबियत पहले से ठीक नहीं थी ना। '' वह हौले से हॅसा कहा- '' कब ठीक थी।''
- मतलब '' मैं आशंकित हुआ। '' मतलब तो मुझे भी कभी समझ में नहीं आया न डॉक्‍टरों को। कभी कहते हैं पेट में अल्‍सर है। कोई फैंसी सा मेडिकल नेम बताते हैं। कमबख्‍त कभी याद नहीं रहता। इसके अलावा दूसरी बीमारियॉ भी बताते हैं।''
- कैसी बीमारियॉ ''
- यार जब तक शरीर रहेगा बीमारियॉ रहेगी  ही।'' वह दार्शनिक अंदाज  में बात को उड़ाने लगा। अपने दो पल के साथी को मैं अपलक निहारता रहा। कल सुबह मैं चला जाऊगॉ। वह इस बात को  जानता है। शायद दुबारा  ही कभी न मिले। मैं  उसके तरफ अभी भी देख रहा था। ऐसा लग रहा  था कि उसे एक दोस्‍त की जरुरत है। एक भाई की भी। शायद  एक बहन और मॉ - बाप इन सबकी।वह समुद्र की लहरों को देखकर मुस्‍करा रहा था। अंधेरा  होने को था। मैं लौटना चाहता था। सुबह की ट्रेन थी। पर शैंकी को घर  लौटने की कोई जल्‍दी नहीं दिख रही थी। वैसे भी मुझे लगा कि उसके लिए वहॉ कुछ है नहीं। न घर, न संवेदना, आत्‍मीयता,रिश्‍तों का जीवंत स्‍पंदन कुछ नहीं।  बस अन्‍दर दाखिल होकर कमरे में पड़े रहना।टी.वी. देखना, किताबों को दुबारा - तिबारा  पढ़ना और यही सब। जहॉ  तक मैं भॉप पा रहा था दरअसल वह उसका घर था ही नहीं। उसे दो - चार  पल का और साथ देने  के लिए मैं भी बैठा रहा।  
पता- 
एफ-2, 4/273, वैशाली, 
गाजियाबाद, उत्‍तर प्रदेश। पिन-201010

मोबाइल: 09868140022

भारत का अभागा गोर्की .शेलेश मटियानी

साहित्यकार सपना मांगलिक
परिचय
सपना मांगलिक
उपसम्पदिका- ' आगमन ' साहित्य पत्रिका , स्वतंत्र लेखन , मंचीय कविता , ब्लॉगर , संस्थापक – जीवन सारांश समाज सेवा समिति , बज्म - ए - सारांश (उर्दू हिंदी साहित्य समिति ) , सदस्य - ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया , अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव , महानगर लेखिका समिति आगरा , साहित्य साधिका समिति आगरा , सामानांतर साहित्य समिति आगरा , आगमन साहित्य परिषद् हापुड़ , इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन दिल्ली
प्रकाशित कृति - पापा कब आओगे , नौकी बहू (कहानी संग्रह) , सफलता रास्तों से मंजिल तक , ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्य संग्रह) कमसिन बाला , कल क्या होगा , बगावत (काव्य संग्रह ) जज्बा - ए - दिल भाग – प्रथम ,द्वितीय , तृतीय (ग़ज़ल संग्रह) टिमटिम तारे , गुनगुनाते अक्षर , होटल जंगल ट्रीट(बाल साहित्य), संपादन –तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह )स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान), प्रकाशनाधीन – इस पल को जी ले (प्रेरक संग्रह)एक ख्वाब तो तबियत से देखो यारो (प्रेरक संग्रह ), विशेष –आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रसारण।,सम्मान-विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित

होंठ हँसते हैं,  
मगर मन तो दहा जाता है
सत्य को इस तरह 
सपनों से कहा जाता है ।
शैलेश मटियानी
         शेलेश मटियानी जी की लिखी यह कविता उनके स्वंय के जीवन की गाथा है ।उस जीवन की जो कि हमेशा कुदरत की क्रूर प्रताड़ना सह - सह कर फौलाद सा मजबूत हुआ, मगर सहन शक्ति की भी एक सीमा होती है कहते हैं ना कि लोहा भी जरूरत से ज्यादा ठोका जाए तो अपनी आकृति खो देता है,ज्यादा तापमान पर तपाया जाए तो पिघल जाता है और पानी में डुबोया जाए तो एक समय के बाद जंग लगकर उसका अस्तित्व आहिस्ता - आहिस्ता खत्म हो जाता है । अल्मोड़ा के रम्य पहाड़ी इलाके में जन्मे मटियानी की जिन्दगी पहाड़ों की हरी भरी घाटियों सी सुन्दर कभी नहीं रही, बल्कि रात्री में पहाड़ की भयाभय निशब्दता, अँधेरे और दिल दहला देने वाले सन्नाटे से भी ज्यादा खौफनाक थी उनकी जिन्दगी । मात्र 12 वर्ष की उम्र में पिता - माता दोनों को खो देने वाले इस बच्चे ने 13 साल की नन्ही सी उम्र में अपनी पहली कविता लिखी थी। 15 वर्ष की छोटी सी उम्र में वह अपनी पहली किताब का मालिक था। जैसा कि लेखक अमूमन होते हैं, प्रमेश कुमार मटियानी, उर्फ शैलेश मटियानी पहले एक कवि थे। वे भी उसी तरह कविताएं लिखते रहें जैसे बहुत सारे लेखक अपने लेखन के शुरुआती काल में लिखते हैं। फिर उनका झुकाव गद्य - लेखन की तरफ हुआ और तब वह शैलेश मटियानी हो गए। वह हिन्दी साहित्य के महान लेखक थे और उनका साहित्य दबे - कुचले और समाज के पिछङे लोगों पर आधारित था ।दूसरे शब्दों में कहें तो उनका साहित्य उनकी ही भुक्ति गाथा थी जिससे उन्हें मुक्ति मृत्यु के उपरान्त ही प्राप्त हुई ।
         बचपन में ही मां.बाप का साया उठने पर, कम पढे - लिखे होने के बावजूद उन्होने हिन्दी में बेहतरीन कहानियां.उपन्यास लिखनी शुरु की। धन की कमी के कारण उन्हें घरेलू नौकर तक बनने को मजबूर होना पङा। अपने अन्तिम दिनों में उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पङा। उन्होंने यह साबित किया कि '' जुआरी का बेटा और बूचड़ का भतीजा'' कविता.कहानियाँ सिर्फ लिख ही नहीं सकता, बल्कि ऐसा लिख सकता है कि बड़े - बड़ों को उसमें विश्व का महान साहित्यकार गोर्की दिखाई दे ।बंबई प्रवास का उनका समय,समाज के हाशिए और फुटपाथों पर पड़ी जिंदगी से साक्षात्कार का ही नहीं बल्कि खुद उस जिंदगी को जीने का भी समय रहा है। चाट हाऊस और ढाबों पर जूठे बर्तन धोता, ग्राहकों को चाय का ग्लास पहुँचाता, रेलवे स्टेशनों पर कुलीगीरी करता बीस - बाईस साल का युवक '' पर्वत से सागर तक ''की  संघर्षपूर्ण यात्रा करता हुआ सिर्फ सपनों में ही नहीं हक़ीक़त में भी साहित्य रच रहा था। धर्मयुग जैसी देश की प्रतिष्ठित पत्रिका में इसी दौरान उस नवयुवक की रचनाएँ छप भी रही थीं।बंबई में सर छुपाने कि जगह न होने के कारण फुटपाथ पर रातें गुजारीं। कई बार भोजन और सर छुपाने की जगह के लिए जानबूझकर हवालात भी गए। रात में वह पुलिस की गश्त के वक़्त टहलने लगते और पुलिस उन्हें पकड़ कर ले जाती। वहाँ भूख की आग भी मिटती और साये विहीन सिर को छत भी मिल जाती। साथ में जेल के काम के बदले भत्ता भी मिलता। एक व्यक्ति पैसा और रोटी अर्जित करने के लिए किस हद तक जा सकता है उसकी बानगी देखिये कि मटियानी ने अपने उन संघर्ष के दिनों में कमाई के लिए अपना ख़ून भी बेंचा। ख़ून बेचकर जो पैसे मिलते उसका कुछ हिस्सा उन्हें उन दलालों को देना पड़ता जो गरीब और अफीमचियों का खून बेचते हैं । यहीं उनका बंबई के अपराध जगत से भी परिचय हुआ। अपराध जगत के इसी अनुभव को आधार बनाकर उन्होंने '' बोरीवली से बोरीबंदर तक '' उपन्यास की रचना की। और बंबई में प्राप्त अनुभव के आधार पर न जाने कितनी ही कहानियाँ भी लिखीं । इस संघर्षपूर्ण जीवन के समानान्तर वे लगातार साहित्य सृजन करते रहे। जिसकी वजह से उन्हें प्रेमचंद के बाद भारत का  दूसरा सबसे ज्यादा और बेहतरीन लिखने वाला कहानीकार माना जाता है ।
          उन्होंने जीवन से चाहे जितने समझौते किया हों मगर  लेखन के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। एक बार भूख की तीब्रता का अनुभव करते हुए उन्होंने बंबई में समुद्र के किनारे फेंका हुआ एक डब्बा उठाया, तो उसके भीतर पॉलीथीन में बंधा हुआ कुछ मिला। उसे खोलकर देखा तो उसमें मनुष्य का मल था। जैसा कि गोर्की ने कहा है कि '' हमारा सबसे बड़ा निर्दयी दुश्मन हमारा अतीत होता है '' ठीक उसी तरह मटियानी भी कभी अपना अतीत भुला न सके। वह अपनी किसी भी रचना को छापने की अनुमति देने से पूर्व पूछते थे '' पैसे कितने मिलेंगे मिलेंगे भी या नहीं'' निर्मल वर्मा के बाद पैसों के लिए पूछने वाले मटियानी दूसरे लेखक थे। ये दोनों ही लेखन के द्वारा आजीविका चलाते थे। अतीत की दुश्वारियां और अपमान उनकी आत्मा और मस्तिष्क को सदैव छीलते रहे जिसका परिणाम उनका आक्रोश भरा व्यक्तित्व था ।जीवन के ऐसे दारुण और घिनौने यथार्थ को उन्होंने भोगा शायद इसलिए ही व्यवहारिकता उनमें समा गयी थी । रूस के गोर्की का लिखा एक - एक शब्द शायद जीवन का वो कडवा यथार्थ था जो हमारे भारत का गोर्की मटियानी भी जी रहा था, जैसे कि गोर्की ने कहा है कि  '' जब काम में आनंद आता है तो जीवन खुशनुमा होता है, अगर जब वही काम नौकरी बन जाए तो जीवन गुलामी हो जाता है '' मटियानी ने लेखन को ही अपनी आजीविका का साधन बनाया और जैसे कि किसान बंजर भूमि पर भी अपनी मेहनत और लगन से फसल उगा सकता है उन्होंने भी जीवन की पथरीली माटी को खोदकर उनसे अपनी पुष्प और फल सी रचनाओं की पैदावार की। लेकिन यहाँ भी गोर्की की कही एक कडवी सच्चाई से मटियानी को भी रू - ब- रू होना पडा। जैसा कि गोर्की ने कहा है कि '' लेखक हवा में महल खड़े करता है,पाठक उस महल में रहते हैं, मगर उस महल का किराया प्रकाशक वसूलते हैं।'' मटियानी की लिखी यह कविता मेरे इस तर्क को पुष्टि देगी .
लेखनी का 
धर्म है, 
युग - सत्य को 
अभिव्यक्ति दे !
          शैलेश मटियानी की रचनाओं में '' अनुभव की आग और तड़प '' आकाश या हवा से नहीं आयी , बल्कि काँटों भरा एक संघर्षपूर्ण जीवन उन्होंने खुद ही जिया।जिन परिस्थितियों में एक साधारण आदमी को मौत ज्यादा आसान लग सकती है उन्हीं परिस्थितियों में मौत के बारे में सोचकर भी वह बार - बार जीवन की तरफ लौटते रहे ।
उगते हुए 
सूरज - सरीखे छंद दो
शौर्य को फिर 
शत्रु की 
हुंकार का अनुबंध दो ।
          गांव की बीरानियों से लेकर इलाहाबाद, मुजफ्फरनगर व दिल्ली के संषर्घों के साथ मुंबई के फुटपाथ और जूठन पर गुजरी जिन्दगी के बावजूद उनका रचना संसार आगे बढ़ता गया। '' चील माता '' और '' दो दुखों का एक सुख '' वे अन्य महत्वपूर्ण कहानियां हैं जिनके कारण उनकी तुलना मैक्सिम गोर्की और दोस्तोवस्की से की जाती रही। उनके 30 कहानी संग्रह, 30 उपन्यास, 13 वैचारिक निबंध की किताबें, दो संस्मरण और तीन लोक.कथाओं की किताब इसका उदाहरण हैं। इस मामले में उनकी तुलना बांग्ला भाषा के लेखकों से की जा सकती है। हालांकि इतना लिखना एक बहुत मुश्किल काम है। नए विषयों की खोज, उसका सुंदर और प्रमाणिक निर्वाह और साथ ही दोहराव से बचाव, अगर असंभव नहीं तो कष्टकर तो है ही। लेकिन मटियानी के यहां विषयों का दुहराव कहीं नहीं मिलता। शायद इसलिए भी कि जिंदगी उनके लिए रोज नई चुनौतियां गढ़ती रही और यह लेखक उन्हें अपनी रक्त को स्याही बनाकर लिखता रहा। करीब 100 से अधिक प्रकाशित पुस्तकों का लेखन करने वाले शैलेश मटियानी को उनकी रचनाओं ने ही साहित्य के विश्व पटल पर एक अलग पहचान दिलायी। उनके रचना कर्म पर टिप्पणी करते हुए हंस संपादक ने अपने बहुचर्चित संपादकीय शैलेश मटियानी बनाम शैलेश मटियानी में लिखा था '' मटियानी को मैं भारत के उन सर्वश्रेष्ठ कथाकारों के रूप में देखता हूं, जिन्हें विश्व साहित्य में इसलिए चर्चा नहीं मिली कि वे अंग्रेजी से नहीं आ पाए। वे भयानक आस्थावान लेखक हैं और यही आस्था उन्हें टालस्टाय,  चेखव और तुर्गनेव जैसी गरिमा देती है। उन्होंने अर्द्धागिनी,  दो दु:खों का एक सुख, इब्बू - मलंग, गोपुली - गफुरन, नदी किनारे का गांव, सुहागिनी, पापमुक्ति जैसी कई श्रेष्ठ कहानियां तथा कबूतर खाना, किस्सा नर्मदा बेन गंगू बाई, मुख सरोवर के हंस,  छोटे - छोटे पक्षी जैसे उपन्यास तथा लेखक की हैसियत से बेला हुइ अबेर जैसी विचारात्मक तथा लोक आख्यान से संबद्ध उत्कृष्ट कृतियां हिंदी जगत को दीं। अपने विचारात्मक लेखन में उन्होंने भाषा, साहित्य तथा जीवन के अंत:संबंध के बारे में प्रेरणादायी स्थापनाएं दी हैं।'' भारतीय कथा में साहित्य की समाजवादी परंपरा से शैलेश मटियानी के कथा साहित्य का अटूट रिश्ता है। वे दबे - कुचले भूखे नंगों दलितों उपेक्षितों के व्यापक संसार की बड़ी आत्मीयता से अपनी कहानियों में पनाह देते हैं। मटियानी वाकई सच्चे अर्थो में भारत के गोर्की थे ।
मटियानी का पारिवारिक जीवन
          संघर्ष का यह दौर चल ही रहा था कि 1958 ई में नीला मटियानी से उनका विवाह हो गया। परिवार और पारिवारिक जीवन के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा का परिचय मिलने लगा। वह अपनी कहानियों के सन्दर्भ में कहते थे कि '' मेरे लेखक - जीवन की नींव में दादी के मुख से निकली लोक - कथाओं की ईंटें पड़ी हुई हैं।''   स्त्रियों के लिए एक गहरी संवेदना शैलेश मटियानी जीवन और लेखन में हमेशा मौजूद रही। प्रेयसियों को और उनके प्रेम को केंद्र में रखकर लिखने वाले तो न जाने कितने लेखक हुए, मटियानी अकेले लेखक हैं जो पत्नी प्रेम को अपनी कहानी का केंद्रबिंदु बनाते हैं '' अर्धांगिनी '' कहानी इस प्रतिबद्धता के साथ - साथ पर्वतीय पृष्ठभूमि और घर - परिवार से सहज संवेदनात्मक और प्रगाढ़ जुड़ाव का ही प्रतिफलन है। कहते हैं न कि एकदम से आई शांति आने वाले तूफ़ान का प्रतीक होती है उसी तरह सुखद दाम्पत्य जीवन जी रहे मटियानी को लग रहा था कि उनके जीवन को एक आधार मिल चुका है जिस पर अपने मेहनत और लगन की ईंट से वह ख़्वाबों का महल बनायेंगे मगर 1992 में आया उनके जीवन का वह तूफ़ान उनके महल को बनने से पूर्व ही उजाड़ गया और मटियानी लाचार विवश उसे ध्वस्त होते देखते रह गए, ठीक वैसे ही जैसे बंदर और बया की बाल कथा में बया अपने घोंसले को चुपचाप असहाय बंदर को क्रूरता से मिटाते हुए देखती रह गयी थी। उनके छोटे बेटे की जो उनके हृदय के सबसे करीब था। कुछ भू - माफियाओं द्वारा हत्या कर दी गयी। इस करुण घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया।
हमारी 
शांतिप्रियता का 
नहीं है अर्थ कायरता।
हमें फिर 
ख़ून से लिखकर 
नया इतिहास देना है !
          अपनी कविता में व्यक्त इसी जज्बे को लेकर वह इससे भी लड़े। इस लड़ाई ने उन्हें मानसिक विक्षिप्तता की हालत में पहुँचा दिया। उन्हें बार - बार दौरे पड़ने लगे। इसी बीच उन्होंने अपने बेटे की हत्या वाली घटना को आधार बनाकर '' नदी किनारे का गाँव '' कहानी लिखी।
खुद ही सहने की जब 
सामर्थ्य नहीं रह जाती
दर्द उस रोज़ ही 
अपनों से कहा जाता है !
          सबको लगा वे लौट रहे हैं, ठीक हो रहे हैं। लेकिन ठीक वैसे ही जैसे बुझने से पहले लौ तेजी से फडफडाती है। लंबे समय से चल रही सिर दर्द की एक रहस्यमय बीमारी ने अंतत: 24 अप्रैल 2001 को उनके शरीर से उनकी रूह को जुदा कर दिया। जाते - जाते वे छोड़ गए एक बड़ा उपन्यास और '' जुआरी के बेटे और बूचड़ के भतीजे की आत्मकथा '' लिखने की हसरत।जिस परिवार के साथ मटियानी ने सुख के दिन रैन देखने की कल्पनाएँ संजोयीं थीं आइये मालूम करते हैं उनके जाने के बाद उनके परिवार की क्या दशा हुई। मटियानी की मौत के बाद उनके परिवार का संघर्ष और अधिक बढ़ गया है।बड़ा बेटा राकेश मटियानी इलाहाबाद छोड़कर हल्द्वानी चला आया है। कभी अपने पिता की कहानी संग्रह का संपादन करने वाला राकेश आज फेरीवाला बुकसेलर बन चुका है। मां नीला मटियानी, पत्नी गीता , बेटा 15 वर्षीय निखिल, 11 वर्षीय बेटी राधा की जिम्मेदारियों ने उसे फेरीवाला बना दिया है। वह आजकल अपने पिता की पुरानी किताबों को बेचकर परिवार का गुजारा करने के साथ ही स्टेशनरी का सामान भी फेरी लगाकर बेच रहे हैं। मां नीला मटियानी को भी एचआरडी की पेंशन समय पर नहीं मिलती है। तत्कालीन यूपी सरकार की ओर से दिए गए टूटते व टपकते मकान में किसी तरह से पूरा परिवार रह रहा है।पिता के जन्मदिन के कार्यक्रम तक को मनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाने वाले राकेश मटियानी कहते हैं कि '' प्रदेश के मुख्यमंत्री पिता की किताबें यदि स्कूलों में लगा देते तो शायद रायल्टी से परिवार को गुजारा चल जाता।'' प्रख्यात साहित्यकार शैलेश मटियानी ने जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव में '' जुआरी का बेटा व बुचड़ के भतीजे की आत्मकथा '' को लिखने का साहस जुटाया था, लेकिन उनके जीवित रहते उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो सकी। आज स्थिति यह है कि उनका बड़ा बेटा राकेश मटियानी  फेरीवाला बुकसेलर बन चुका है। ऐसे में यदि शैलेश मटियानी जिंदा होते तो वह अपने बेटे के इस किरदार को अपनी कहानी का हिस्सा बनाने की हिम्मत शायद ही जुटा पाते।
खंडित हुआ 
ख़ुद ही सपन,
तो नयन आधार क्या दें
नक्षत्र टूटा स्वयं, 
तो फिर गगन आधार क्या दे
          मेक्सिम गोर्की और मटियानी के जीवन में तमाम समानताओं के वावजूद एक मात्र अंतर यह रहा कि गोर्की को एक बार में जहर देकर मार दिया गया । और हमारे भारत का अभागा गोर्की मटियानी जब तक जिया हर पल हर रोज़ जहर पी पीकर जिया और यूँ ही घुटते घुटते एक दिन चला भी गया। उस असीम अनन्त आकाश की ओर जिसे वो जीते जी छूना चाहता था ।
सन्दर्भ
सन्दर्भ-
पंत, कैलाशचन्द्र, शैलेश मटियानी की वैचारिक आधार भूमि (लेख), सृजन यात्रा : तीन शैलेश मटियानी, कैलाशचन्द्र पंत (संपा ), मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, भोपाल, प्रथम संस्करण : 2002, पृ। सं। : 15 
मटियानी, शैलेश, मैं और मेरी रचना-प्रक्रिया (लेख), सृजन यात्रा : तीन शैलेश मटियानी, कैलाशचन्द्र पंत (संपा।), मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन,भोपाल, प्रथम संस्करण : 2002, पृ। सं। : 98-99 
मेहता, श्री नरेश, यात्रा एक तापस की (लेख), अक्षरा, अंक : 56, विजय कुमार देव (संपा।), नवंबर-दिसंबर : 2001,
पता
एफ .659 कमला नगर आगरा 282005
मोबा. 9548509508
मेल : sapna8manglik@gmail।com




दादा

राजा सिंह

          कई एकड़ में फैले उस विशालकाय अस्पताल को देखकर मलय चकित और कुछ भयभीत सा था। उस परिसर में फैली कई - कई मंजिला ईमारतें और उनके बीच सर्पाकार ढंग से पसरी सड़कें। उनमें विचरते उदास, बीमार, थके पस्त चेहरे। कर्मचारियों, वार्ड-बायों, नर्सों और डाक्टरों के झुंझलाये बेतरतीब चेहरे। तीमारदारों के रोते झिझकते परेशान होते शरीर। वह सोचता रह गया कि अपना भाई यहॉं से ठीक होकर निकल पायेगा ? उसके स्थानीय डाक्टर ने उसे इसी अस्पताल के लिये सुपूर्द किया था। हर तरह की तकनीकी सुविधाओं से लैस और उच्चस्तरीय डाक्टरों के हुजूम वाला बहु प्रसारित बहुप्रसंशित अस्पताल। सुना है यह शोध संस्थान भी है, तो क्या दादा पर प्रयोंग किये जायेगें? स्थानीय डाक्टरों के अनुसार जो कुछ हो सकता है यहीं पर हो सकता है। मलय अपनी पत्नी काजल के सहयोग से दादा को ले आ पाया था। दोनों बच्चें घर पर ही छोड़ दिये गये थें। नीरव एवं निशा दस एवं सात साल के अबोध बच्चें। समझा बुझाकर और जल्दी लौट आने का वादा करके, उन्हें घर पर ही ऐतिहात से रहने को कहा गया था। काजल ने बड़े मासूमियत एवं शालीनता से उन्हें आवश्यक दिशा-निर्देश दिये थे। अकेले रहने के, सावधानी के टिप्स दियेेे थे। उसने गाड़ी से दादा को काजल के सहयोग से गेट पर छोड़ा और वह गाड़ी पार्क करने के लिए चला। पार्किंग स्थल काफी दूर था। वहॉ से पैदल आते-आते काफी देर हो गयी और वह कुछ थक भी गया था। सूरज सर पर चढ़ कर बोल रहा था। वह पसीने से तरबतर जब गेट पर पहॅंचा तो देखा दादा चलायेमान कुर्सी पर बैठे थे और काजल उनके पास खड़ी उत्सुकता से उधर की ओर ही निहार रही थी, जिधर से वह आने वाला था। चलो यह अच्छा हुआ कि काजल ने दादा के लिए चलायेमान     कुर्सी बुक करवा ली थी, जिसके कारण दादा को ले चलने में बड़ी आसानी हो गई। एडमीशन के सारी औपचारिकताऐं पूरी करते-करते और फिर उसके बाद डॉक्टर मिश्रा ने अपने कक्ष में उनका निरीक्षण करने के बाद उन्हें वार्ड एलाट किया। मरीज बेड पर लिटाते लिटाते दोपहर के दो-ढाई बज गये और वे दोनों बेहाल हो गए थे। काजल को भूख-प्यास और दादा से ज्यादा चिंता अपने बच्चों पर थी। जब भी मौंका मिलता वह मोबाइल से घर संदेश भेजती और बातचीत करती-करती संतुष्ट हो जाती। फिर कुछ याद आता तो फिर अपने बच्चों में जुट जाती। यह सब करते हुये भी वह दादा का साये की तरह ख्याल रखे हुए थी। मलय, भागदौड़ आदि में लगा था। फाइल बनवाना, टेस्ट करवाना, डाक्टर को दिखाना, पैसे जमा करना आदि। अब बेड पर दादा को लिटाकर कुछ चैन महसूस कर रहे थे।
          काजल घर जा चुकी थी और वह बेड के पास स्टूल पर बैठा दादा को इस मरणासंन्न स्थिति में देख रहा था। उनको ग्लूकोश चढ़ाया जा रहा था और उसी के साथ दवाईयां आदि दी जा रही थीं। मलय के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। वह सिर्फ दादा को देखे जा रहा था। वह डर रहा है। उसे लगता है कि दादा की मौत इतनी करीब है कि वह उनके बगैर ही वापस लौटेगा।
...........मलय घिरा हुआ है। एक पुराने टूटे फूटे मकान में कैद है। उसके शरणदाता बुर्जुग दम्पति हैं। दयालू हैं इसलिए उसे न निकलने की सलाह भी दे रहे हैं बाहर एक भीड़ है। दस बारह दर्जे के विद्यार्थी थे उनका नेतृत्व कर रहा है हरीश पांडे। उनके कालेज का यूनियन लीडर। लगातार धमकियां दिए जा रहा है बाहर निकलने में उकसा रहा हैं, गाली गलौज की इंतहा हो रही है। उसकी मर्दानगी को ललकारा जा रहा है और वह सहमा सिकुड़ा और भयभीत अपने किये कृत्य पर पछता रहा है परन्तु उसके कृत्य की इतनी भयंकर प्रतिक्रिया होगी वह अंजान था।.............वह और रागिनी सहपाठी थे सेंट जान स्कूल के और हरीश पाण्डे था रागिनी के मोहल्ले का एक उदंड लड़का, जो एक स्थानीय इण्टर कालेज में यूनियन लीडर था, जिसका भान मलय को नहीं था। उसके सामने उस पांडे ने रागिनी को छेड़ा उसकी कलाई पकड़ कर खड़ा हो गया। और अपने प्यार का इजहार करने लगा। इससे रागिनी कसमसा रही थी अपने को छुड़ाने के लिए बलपूर्वक प्रयत्न कर रही थी उसका चेहरा लाल और अपमानित होने के कारण बेचारगी में इधर-उधर देख रही थी। पांडे बेकाबू होता जा रहा था और अपने को स्वीकार कर लेने का जबरदस्त बलपूर्वक आग्रह करता ही जा रहा था। स्कूल से निकलते मलय ने ये नजारा देखा तो अपने आप को काबू में न रख सका। उसने पांडे की जबरदस्त धुनाई कर दी और रागिनी को छुड़ाया। रागिनी रिक्शा करके अपने घर चली गई और वह खरामा-खरामा पैदल ही अपने घर चल पड़ा जो बामुश्किल आधा किलोमीटर पर था। उधर पांडे भाग कर अपने स्कूल पहॅुचा और अपने साथ काफी साथिओं को लेकर अपना बदला लेने, मलय को आता दिखाई पड़ा। वह भाग उठा। छात्रों की भीड़ उसके पीछे-पीछे, उसे दौड़़ाती हुयी। मलय को अचानक एक मकान खुला दिखाई पड़ा और उसने उसमें घुसकर अपनी जान बचाई। परन्तु जान पर संकट अब भी बना हुआ था। वह उस मकान में कैद है और बाहर दुश्मनों का पहरा चल रहा है उसको पूरी तरह नेस्तनाबूत करने के लिए। समय बढ़ता जा रहा हैै और शिकंजा कसता जा रहा हैं अचानक वह अश्रुमिश्रित खुशी से झूम उठा। उसने देखा दादा अपने कुछेक साथियों के साथ वहां आते नजर आये। उनके हाथों में देशी कट्टे थे और रामपूरी। उनका एक चेला ल_ भी हांथ में लिए था। दादा को देखते ही भीड़ कुछ छंटने लगी थी और हरीश हतप्रभ था उसे आभास नहीं था कि मलय गोपाल पंडित का भाई है। पांडे ने अपने कदम वापस किये परन्तु उसने दादा से उसकी जमकर शिकायत की जिसके फलस्वरूप मलय को रास्ते भर दादा की हिदायतें सुननी पड़ी और उन्होने लौडियाबाजी से तौबा करने की सलाह दी। दादा इतने गुस्सा थे कि सिर्फ उनका हांथ नहीं उठा था उस पर। मलय अपनी सफाई में कुछ भी न कह पाया वह दादा से डरता था। उनके विशालकाय डरावने व्यक्तित्व एवं कृतित्व वह हर समय सहमा रहता था।
          नर्स आई थी, उसने दादा का बी0पी0 नापा, ग्लूकोस ड्रिप की बोतल खत्म हो गई थी उसे बदला, टेम्परेचर नोट किया सारी इन्ट्री उसने कार्ड में की और उसने पेशाब वहीं पर निकलने के लिए दादा के नली फिट की और बोतल वहीं लटका दी और चली गईं। मलय फिर देखता रह गया। दादा के कृशकाय शरीर को। मलय को भूख लगने लगी थी सुबह से ही चल पड़ा था, यहॉ जल्दी न आओ तो एडमीशन मिलना मुश्किल। अब दादा को अकेले छोड़कर कैसे जाये। वह सोचता था शायद काजल खाना लेकर आयेगी। वह उसका इंतजार कर रहा था। वह काजल पर पड़ने वाली समस्याओं से वाकिफ था और द्रवित था। वह कैसे मैनेज करती है वह यह सोचकर अभिभूत था। .............दादा यानि कि गोपाल शास्त्री उर्फ गोपाल पंडित पिता राम अधार शास्त्री की पहली सन्तान। मां बाप के लाड़़ दुलार से बिगड़ी सन्तान। पढ़ने लिखने से परहेज करने वाले कई बार इम्तहान देने के बाद भी हाई स्कूल पास नहीं कर पाये। माता भगवती देवी को गोपाल के लिए एक भाई चाहिए इस कारण उसके बाद तीन-तीन लड़कियॉ होती चली गई तब जाकर मलय का जन्म हुआ। शास्त्री जी को दूसरा बेटा मिला और गोपाल को भाई। श्रीमती शास्त्री का भी लाजिक अजीब था। गर एक लड़का साथ न दे तो कम से कम दूसरा तो हो जों बुढापे में ख्याल रख सके। श्री शास्त्री का धंधा पुस्तैनी था पंडिताई का और कुछ ज्योतिष का काम भी देख लेते थे। नियमित कार्य था, दूर एक हनुमान मंदिर में सांय पूजा आरती करना। पंिडताई की आमदनी से घर का खर्चा आसानी से चल जाता था। गोपाल बिगड़ता ही चला गया और कालेज समाप्त होने पर मोहल्ले की गुंडागर्दी चालू हो गई थी। कुछेक चेले चापड़ जुट गये थे। तीन-चार घर के बिगडें़ लड़कों का समूह बन गया था। घर सिर्फ भोजन और रहने का अड्डा था। उसमें भी कभी-कभी आना कभी न आना दिनचर्या में शामिल था। पिता जी की मार डॉंट खतम हो चुकी थी। उस पर एक बार गोपाल तन कर खड़ा हो गया और उनका हाथ पकड़ लिया था। शास्त्री जी चाहते थे गोपाल का यदि पढने लिखने में मन नहीं लगता तो लोफड़बाजी बंद करके उसके पुस्तैनी धन्धें को अपना ले और उसकी तरह सफल जिंदगी गुजारे। परन्तु गोपाल ने न पढकर दिया और न पंडिताई का धंधा अपनाया। वह इस धंधे से एक तरह से नफरत करता था और इसे भीखारी धंधा बताता था। माता ने सोचा उसकी शादी कर दी जाये जिससे वह सुधर जायेगा। जिम्मेदारी पड़ने एवं उसके प्रभाव से वह अपना धंधा अपना लेगा। परन्तु गोपाल ने शादी से साफ इन्कार कर दिया कहा ''अपने पेट का तो जुगाड़ नहीं है गैर का पेट कहॉं से भरेगें? अपन तो ऐसे ही मस्त है। जोरू न जाता अल्ला मियॉं से नाता। अल्ला-खुदा का नाम सुनकर पंडित जी, विफर जाते थे। सनातन धर्म के संस्कारों और पुराने नियम कायदे और पंड़िताई से घर का हर बंदा चल रहा था, सिर्फ गोपाल को छोड़ कर। वह नास्तिक कुलबोरन है ऐसा माता-पिता का मानना है पंड़ित जी गोपाल से पूरी तरह से अपने को असंपृक्त कर लिया था। जैसे की इस घर में उसका कोई अस्तित्व ही न हो। मलय के लिए बड़ा भाई दादा और बड़ी बहनें दीदी थी जो उसे बेइन्तहा प्यार करतें थे। विशेषरूप से दादा उसे बहुत प्यार करते थे और ख्याल रखते थे। अक्सर कहते थे शास्त्री खानदान का चिराग मलय ही रौशन करेगा और आगे बढायेगा, मैं तो निरर्थक हॅू। रामाधर शास्त्री घर के मुखिया जरूर थे परन्तु हुकूमत गोपाल शास्त्री की चलती थी। वह तो बिगड़ गये थे मगर कोई और घर का बिगड़ न जाये इसकी पूरी ठेकेदारी उन्होनें स्वयं ले रखी थी, अनीता को नृत्य के लिये सुनीता को गायन के लिये और रीता को वादन नहीं लेने दिया उनके अनुसार ये तीनों विषय ठीक नहीं है। घर को कोठा नहीं बनाना है घर से स्कूल कालेज और वापस स्कूल समय से घर आना, सभी भाई बहनों पर उनकी नजर रहती थी। अनावश्यक देर होने पर उनकी बड़ी-पूॅछ तॉंछ से गुजरना पड़ता था जिसे सभी लोगों को नागवार गुजरता था, परन्तु सभी विवश थे। उन पर लगाम कसने वाले पिता उनसे पस्त हो चुके थे। परन्तु इस मामलें में माता जी पिता जी उनके साथ थे। बड़े भाई के रूप में वह पुरातन पंथियों की तरह से पूरी तरह सख्त थे। स्नातक होने पर हर बहिन की शादी उच्चकुल में योग्य वर से ही हो रही है, यह वह सुनिश्चत कर लेते थे। वरना उनका हस्तक्षेप निश्चित था।  अनीता, सुनीता एवं रीता की शादी हो जाने पर वह मुक्त हुये जैसे कि बहुत बड़ा बोझ उनके सर ही था। हालॉंकि सारा कार्य और पैसों का प्रबन्ध पिताजी शास्त्री ने सम्पन्न किया परन्तु इन्तजाम दादा का था। उनका इतना रूतबा था कि जो काम शास्त्री जी सौ रूपये में करवातें वह पचास रूपयें में हो जाता। पंडित जी ने तीनों लड़कियों की शादी के बाद एक बार फिर प्रयास किया कि गोपाल की शादी हो जाये जिससे उसकी भी गृहस्थी बस जाये और जिम्मेदारियां पड़ने से वह लाइन पर आ जाये। परन्तु दादा ने साफ मना कर दिया और मलय की शादी कर देने का सुझाव रख दिया, जिसे मलय ने पूरी तरह नकार दिया और जिद कर बैठा पहले बड़े की फिर छोटे इसमें कोई समझौता नहीं। मामला घिसटता रहा। .........
          काजल आ गई थी। सायं के पॉंच बजे थे। काजल ने भी खाना नहीं खाया था, दोनों ने मिलकर खाना खाया। दादा का खाना तरल रूप में दिया जा रहा था। दादा जो हरदम इस बात का ख्याल रखते थे कि काजल का मुॅंह न दिख जाये, उसके सामने हरदम घूघॅट में रहे, आज असहाय थे विरोध अवरोध से परे । उन्हें खुद अपना होश नहीं था कि वह कैसे है ?
          ...........शादी के दूसरे दिन काजल दीदीयों से वार्तालाप में व्यस्त थी। काजल की आवाज की गति और ध्वनि सामान्य हीं थी। दादा बैठक में बैठे थे। एक दो शिष्य भी थे। पंडित जी की दुकान जो बैठक में सजती थी जहॉं पर वह अपने यजमानों से मिलते थे और उनकी समस्याओं के समाधान बताते थे, उस पर दादा ने अधिकार कर लिया था। पंडित जी ने बिना किसी विरोध के अपना कार्य हनुमान मंदिर के प्रांगण में स्थापित कर लिया था। काजल और बहनों की आवाज छनछन कर बैठक में आ रही थी। उन्होंने शिष्यों को भी विदा किया। दादा गरजें और मनु को तलब किया ।
           दो दिन भी आये हुये नहीं है और बहू की आवाज यहॉं तक सुनाई पड़ रही है। उसे समझा दो ऐसा बोले कि आवाज सुनाई न पड़े, समझे। उन्होनें मलय को बहुत ही धीमें से आदेशित स्वर में समझाया।
          जी दादा। मलय ने इतना ही कहा। परन्तु वह नाखुश था। दादा के इस निर्णय से और उसने काजल से कुछ भी नहीं कहा। परन्तु काजल अपने आप समझ गई शायद रीता ने कुछ ईशारा किया था। उसके बाद दादा को कभी काजल की आवाज नहीं सुनाई पड़ी। दादा को खाना-पीना आदि देना भी बेआवाज ही होता रहा था। उसमें दादा को कभी सम्बोधित भी नहीं किया था।
           ..........मलय एम.एस.सी. फाइनल ईयर में था और उसकी बैचमेट भी विजया एक दक्षिण भारतीय लड़की। जन्तु विज्ञान प्रयोगशाला में एक अलमारी, दराज आवंटित थी। प्रीवियस ईयर से वे दोनों साथ-साथ थे। निकटता बदल रही थी अंतरगता में। मलय उसकी सुन्दरता एवं भारतीयता से प्रभावित था और वह भी उसके सुदर्शन व्यक्तित्व से आकर्षित थी। परन्तु उसके इस मेल जोल में बाधक एक खलनायक था। उन्ही के साथ पढने वाला एक लड़का समर सिंह। जिसके सम्बन्ध बाहर के रहने वाले गुंडों से थे। जिसके कारण सभी उससे भय खाते थे उससे उलझने का मतलब था कालेज की भीतर या बाहर अपनी पिटााई करवांना। समर सिंह विजया पर अपना अधिकार समझता था। उसने उसे अपनी धर्म बहन बनाकर उससे सम्बन्ध बना रखें थे। वह विजया श्री के घर भी आता जाता था और उसके घर वालों से कालेज में उसके संरक्षक की भूमिका ले रखी थी। समर सिंह ने आवरण भाई का ओढ रखा था परन्तु आन्तरिक रूप से वह विजया का प्रेमी था। विजया को हासिल करने में मलय एक बाधा के रूप में उभरता जा रहा था। उन दोनों को साथ तोड़ना जरूरी था और इसके लिये मलय को डरा धमका कर अलग करना जरूरी था। एक दिन मलय को अकेले कालेज कम्पाउन्ड में समर सिंह और उसके बाहरी साथियों ने एक कोने में उसे समेट लिया।
' विजया से बहुत चिपक रहे हो ? अच्छा नहीं है। अपना भला चाहते हो तो उसको छोड़ दो।'
' आप से क्या मतलब ? आपने तो उसे बहन बना रखा है।' मलय बहस करने लगा।
' यह भी एक तरीका है पास आने का अपना बनाने का। यह बात अच्छी तरह जान लो वह मेरी है। कोई उस नजर से देखगा तो ऑंख निकाल लेगें। समर सिंह क्रोध में था। '
' कोई माई का लाल विजया से जुदा नहीं कर सकता।' मलय भी आवेश में आ गया था।
         उसे दादा की शक्ति का गरूर था। लल्लू सिंह वेसे भी उससे खफा था एक बार उसने उसकी दराज की चाबी मांगी थी परन्तु उसने मना कर दिया था वह जानता है कि तीस से सौ प्रतिशत अल्कोहल की बोतलें जो उसकी दराज में रखीं थी जिनका उपयोग आब्जेक्ट के डिहाईडेऊेशन करके स्लाइड बनाने के लिए किया जाता था। अल्कोहल पूरे साल के लिए आवंटित कर दी जाती थी। वह जानता था कि लल्लू अल्कोहल लेकर  पानी मिला कर अपने नशे के लिये इस्तेमाल करेगा। यह अक्सर वह जबरदस्ती बाहर से आकर किया करता था उसने उसकी मॉंग ठुकरा दी थी। लल्लू सिंह उससे तबसे चिढ़ा बैठा था। उसको किसी ने ऐसा मना नहीं किया था। समर सिंह और लल्लू सिंह ने उस पर प्रहार कर दिया और उसे बुरी तरह से पीट दिया । एक बार फिर चेतावनी दी, अब कि बार जिंदा न छोड़ेगें।
          मलय अपमानित, प्रताणित और चोटिल फिर क्लास में न गया। वह सीधे अपने घर आ गया और दादा से सारा किस्सा बंया कर दिया। दादा उसी वक्त उसके साथ वापस कालेज चल दिये। वे समर सिंह एवं लल्लू से मिले । उनसे मिलकर पूरी कहानी समझी। पूरी बातचीत के दौरान वह गम्भीर और शान्त बने रहे एक गार्जियन की तरह। वापस आते हुए वह मलय पर पूरी तरह बिगड़ रहे थे। 'मना किया था लौडियाबाजी के चक्कर में मत पड़ो। मानते नहीं हो। परिणाम देखा। खबरदार यदि भविष्य में उस लौडिया के साथ रहे, तो सबसे पहले मैं तुझे तोडूॅंगा।' पढने लिखने वाले लड़के हो पढाई में ध्यान दो। पिता जी से कह दूॅंगा सबसे पहले तुम्हारी शादी का इन्तजाम करें। वह रूआंसा हो आया था। उसे मारपीट का इतना दुख नहीं हुआ जितना कि दादा का उसका अपमान हल्का लेना लगा। मगर दादा ने बदला लिया था। अगले दिन खबर जब वह कालेज गया तो सुनाई पड़ा कि समर सिंह और लल्लू सिंह को रात में अज्ञात लोगों द्वारा हाकी और चाकू से हमला करके बुरी तरह से घायल कर दिया गया है और वे दोनों अस्पताल में भर्ती है। सिर्फ जान बच गई थी। विजया दुखी थी जब मलय पिटा था। समर सिंह को शह उसके पिता द्वारा मिली थी। वह गर्व से घर में बता रहा था कि अब मलय विजया का साथ छोड़ देगा। वह फिर दुखी हुयी जब उसने समर सिंह को घायल सुना, उसका धर्म भाई उसकी वजह से हास्पिटल में है । वह समझ रही थी कारण वह है। मलय को बदला मिल गया था परन्तु उसे विजया को छोड़ना पड़ा था। वह दादा की अवहेलना नहीं कर सकता था। विजया ने भी उससे किनारा कर लियां। उनका प्रेम प्रसंग समाप्त हो गया था। आज मलय सोचता है, अच्छा ही हुआ काजल जैसी पत्नी कोई और नहीं हो सकती थीं खूबसूरत, बुद्धिमान, सलीकेदार और केयरिंग। इसके अलावा उसमें समझदारी बहुत है। उस बात के लिए वह दादा का कृतज्ञ हैं
          दादा का शरीर सूज रहा था। हालत बिगड़ रही है वह दौड़कर नर्स के पास गया। नर्स ने आकस्मिक डाक्टर से सम्पर्क किया। रात के 12 बजे थे और भाई को डायलासिस पर रख दिया गया। दादा को डायलेसिस हो रहा था और वह अनिश्चय की आशंका से ग्रस्त भीतर ही भीतर सिहर रहा था। दादा की दोनों किडनी खराब हो गयी वह पहले भी डायलेसिस करवाने दादा को लेकर आता रहता था। .........पहले हफ्ते में, फिर महीने में, और तीन-तीन महीने में यह प्रक्रिया दोहराई जाती थी। अभी कुछेक दिनों पहले ही वह दादा की डायलेसिस करवॉके गया था। अब अचानक ये क्या हो गया? वह शून्य में बिचर रहा था।
...........उसे लगता है कि दादा की जबरदस्ती अक्सर उसके लिए फायदेमंद रही है हालांकि उस समय उसे बहुत बुरा लगता था और मन ही मन वह दादा को बहुत बुरा भला कहता था। याद आ रहा है उसका परिचय एक क्रान्तिकारी समाजवादी व्यक्ति मोहन महाजन से सार्वजनिक पुस्तकालय में हो गई थी। मलय के एम.एस.सी. की फाइनल परीक्षा हो गई थी और वह अक्सर पुस्तकालय की शरण में चला जाता। मोहन कार्ल मार्कस और डा0 लोहिया की किताबें पढ़ा करता था। उसके बातें इतनी विद्वतापूर्ण आकर्षक और अपने में समोहित करने वाली थी कि वह उसके विचारों से खिंचता चला गया। उसने उसे कम्यूनिष्ट विचारधारा, क्रान्तिकारी छवि वाली किताबें पढ़ने को प्रेरित किया। वह उससे और समाजवाद से प्रभावित था। मोहन समाजवादी युवजन सभा का मेम्बर था, और अक्सर मजदूरों की हड़ताल आदि में शामिल हुआ करता था। और उन्हें अन्याय के विरूद्व संघर्ष के प्रति प्रेरित किया करता था। मलय उसका अनुयायी बन गया था। संयोग से वह दादा का पुराना प्राथमिक स्तर का दोस्त निकल आया और उसने दादा को भी अपने विचारों से प्रभावित कर लिया।..... अमीरों से सम्पत्ति छीन कर गरीबों में बांट देनी चाहिए। ....... आजकल की व्यवस्था भ्रष्ट है। ....... इसको बदलने की जरूरत है।........ लोकतांत्रिक तरीके से नहीं बदली जा सकती है, इसे उखाड़ फेंकना चाहिए। अब वह मोहन महाजन से मोहन नेता में बदल गया था और एक दिन उसने अपना गुप्त चेहरा दिखा दिया। वह भीतर ही भीतर नक्सलवादी आन्दोलन का सक्रिय समर्थक था इस संगठन के उसके पास 10-12 साथी थे। उसने एक दिन तय किया कि नक्सलवादी पोस्टर लगाये जायेंगे। इसके लिए रात का समय तय किया गया। पांच-छै व्यक्तियों की टोली के सात ग्रुप बनाये गये जो पूरे शहर में पोस्टर चिपकाने का कार्य करेंगें। मलय भी शामिल था और दादा का गैंग भी। मलय खुश था नेक काम करने का मौका मिलेगा। जब दादा को पता चला तो उन्होंने मना कर दिया मलय नहीं जायेगा। एक घर से एक ही काफी है। वह मलय को ऐसे जोखिम भरे कामों में शामिल नहीं होने देंगे। आखिरकार मोहन नेता को दादा की बात माननी पड़ी और मलय को छोड़कर उस काम को रातों रात अंजाम दिया गया। उसमे कई लड़के गिरफ्तार भी हुये। दादा और उसका गैंग पुलिस वालों से मारपीट कर सही सलामत वापस आ गया था। वह भी कंाप गया था उस अभियान की खतरनाक परिणति को देखकर। दादा खुश था कि उसने मनू को खतरनाक काम में पड़ने से बचा लिया। दादा ने मोहन को अपना गुरू मान लिया था और मोहन नेता को भी दादा के रूप में एक शक्तिशाली साथी मिल गया था। उसको अपनी सुरक्षा के लिए दादा का साथ मिल गया। दादा की कम्पनी से उसका रूतबा काफी बढ़ जाता था। दादा को भी एक राजनैतिक व्यक्ति की दोस्ती प्राप्त हो गयी थी, इस लिए छोटे मोटे मामलों में वह पुलिस से आसानी से छूट जाता था, नही ंतो मोहन नेता अपने प्रभााव को इस्तेमाल करके,अपना आदमी कहकर छुटवॉ लिया करते थे। दादा ने ब्याजू का धंधा चालू कर दिया था, जो बिना लिखा पढ़ी के आराम से चल निकला था। दादा की गुंडागर्दी चमक उठी थी और मोहन की नेतागीरी चल निकली थी।
          डायलेसिस का काम समाप्त हो चुका था और दादा को वापस इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। मलय दादा की बेड के पास जमीन में चादर बिछाकर लेट गया। रात के दो बजे थे और वार्ड में सन्नाटा नदारत था। कोई न कोई दर्द से कराह अवश्य रहा था। अलबत्ता दादा को कुछ सुकून आ गया था और वह सो रहे थे। मलय भी सोने की कोशिश कर रहा था, परन्तु नींद नहीं आ पा रही थी। थकावट बहुत लग रही थी वह टूट रहा था, झपकी आ आ कर चली जा रही थी।
        गोपाल पंडित बाहर के लिए एक भय की हस्ती और घर के लिए सुरक्षा कवच। मजाल है कि कोई घर की तरफ बुरी निगाह से देख सके वे सभी पर नजर रखते थे परन्तु उनका दुलारा था मलय, मनू। पिताजी बूढ़े हो चले थे उनकी पंडिताई की आमदनी कम हो रही थी। घर किसी तरह घिसट रहा था। दादा अपनी दुनियां में मग्न थे। मलय के एम.एस.सी. करने के बाद, नौंकरी करके अपने पैरों खड़े होने की बात कही थी पिता जी ने, परन्तु मलय पी.एच.डी. करना चाहता था। पंडित जी आगे की पढ़ाई का खर्चा उठाने में असमर्थ थे उनकी सारी जमा पूॅंजी तीनों लड़कियों की शादी में स्वाहा हो चुकी थी। दादा के लिये अब तो घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो रहा था।
         सारा पी.एच.डी. का प्लान चौपट हो रहा था, हॉंलाकि यूनीवसिर्टी से गाइड डा0 विशेषश्वर श्रीवास्तव की स्वीकृति आ गई थी और विषय  'मछलियों पर नशे का प्रभाव' भी स्वीकृत था। मनू को पढाई पर खर्च का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। दादा को पता चलने पर उन्होनें मनू की पढ़ाई का खर्चा उठाने का शर्तिया ऐलान कर दिया। सभी आश्चर्यचकित थे जो अपना खर्चा नहीें चला पा रहा था, या कैसे चला रहा था और किस ढंग से चला रहा था, कुछ पता नहीं ? सब उसके कार्यकलापों से असहमत थे। इस तरह से की आमदनी से मनू की पढ़ाई होगी ? राम-राम कहते पंडित और पंडिताइन दुखी निराश और असहाय थें। परन्तु मलय को सिर्फ अपनी मंजिल दादा के सौजन्य से पास आती दिखाई पड़ी थी। दादा ने अपना वादा निभायां शोधकार्य में धन की कमी आड़े नहीं आई थी। मलय दादा के प्रति अनुगृहीत हो उठा था। दादा मनू की हर सफलता पर हर्ष के अतिरेक में डूब जाते थे। खुशी सभी होते थे पिताजी माताजी और दीदियों तो मलय की हर क्लास टाप कर जाने की अभ्यश्त हो चुकी थीं। परन्तु दादा को अपने पढ़ाई के अनुभव को ध्यान में रखते हुए उसकी अव्वल दर्जे से पास होने की खुशी अनगिनत होती थी और हर बार दादा अपनी खुशी को सभी को मिठाई बांटकर मनाते थे। जैसे कि वह खुद कालेज टाप करके के पास हुये हों। उसे याद आता है जब उसकी डिग्री कालेज में लेक्चरशिप की नौंकरी मिली तो ऐसा लगा कि दादा की ही नौंकरी लगी हो। कई दिनों तक दादा ने जश्न का माहौल बनाये रखा था और जब उन्हें ये पता चला कि मलय की नौंकरी दूसरे शहर में है तो वह बुझ से गये थे। इस बात से नहीं कि मनू की नौंकरी से उन्हें कुछ फायदा पहॅुचेगा, परन्तु इस बात से कि मनू अब बिछड़ जायेगा और दूसरे शहर में बिना उनकी छत्रछाया के कैसे निर्बाध जीवन यापन कर पायेगा ? मलय के नौंकरी पर जाते समय यह वादा ले लिया था, अपने सर पर मनू का हांथ रखवाते हुए कि वह किसी भी परेशानी में अपने दादा को जरूर याद करेगा। मनू को विदा करते हुए उनकी आंखों की कोर गीली हो गई थी, जो अनीता, सुनीता एवं रीता की विदाई पर न हुई।
         मलय ने दादा के लिए एक प्राइवेट रूम बुक करवा दिया था। आज ही शिप्‍ट किया गया था। इसमें अकेले वह अच्छी तरह से दादा की देखभाल कर पायेगा और शायद डाक्टर नर्स भी ज्यादा ध्यान देते हैं, ऐसा उसकी मान्यता थी या जानता था। दादा की तबियत उसे कुछ ठीक लग रही थी उन्होंने उसे देखा था और हल्के से कुछ बोलकर ईशारा भी किया था।
         दादा मलय के जाने से निर्द्वन्द हो गये थे। उनकी असामाजिक गतिविधियां बढ़ गई थीं। पंडित जी निरूपाय थे और पंडिताइन भगवान भरोसे हो गई थीं। दादा का थाने और जेल जाना बढ़ गया था। पंडित जी जमानत करवाने और कोर्ट कचहरी में चक्कर लगाते निढाल होते जा रहे थे। मोहन नेता ने दादा से किनारा कर लिया था। अचानक एक कत्ल के इल्जाम में दादा को लम्बी जेल हो गईं। उनको छुड़ाने के खर्चे में घर भी गिरवी हो गया। पंडित जी चल बसे। उनके अंतिम क्रियाकर्म के लिए दादा जेल से जमानत पर आये और फिर चले गये। कुछेक दिनों के भीतर माता भी परलोक सिधार गईं। वह किसी भी हालात में मलय के साथ जाने को तैयार नहीं हुईं अपनी देहरी का मोह और दादा का ख्याल उनसे छूटा नहीं। अपने घर में मलय के लिए कुछ नहीं रह गया था। माता पिताजी रहे नहीं और दादा जेल में, बहनें अपने अपने घर में ।
            दादा जेल से छूट कर आ गये। घर कर्ज में डूबा इुआ। आमदनी नगण्य थी और संगी साथी बेसहारा होने के कारण कहॉ मर खप गये पता नहीं था। दादा अकेले निराश और हताश फिर भी हार नहीं मानी। जेल काट आने के कारण रूतबा बढ़ गया था परन्तु अब मन नहीं लगता था। जेल में की गई कमाई ने एक आधार फिर प्रदान कर दिया था, और ब्याजू पैसा बांटने का काम फिर चल निकला। एक नया साथी छविराम उनसे आ मिला था और कुछ दादागिरी का भी काम चलने लगा था। परन्तु इसके बाबजूद सब कुछ बेमन चल रहा था। जेल प्रवास ने उनको मन और शरीर से पूरी तरह तोड़ दिया था। मदिरा की शरण में पूरी तरह आ गये। खाना-पीना होटल आदि के कारण स्वास्थ भी खराब रहने लगा। सायं होते ही मदिरा चल निकलती थी और देर रात तक समेटती नहीं थी। मनू एक बार आया दादा से मिलने और सब काम छोड़कर साथ चलने के लिए कहा, नहीं माने। अपनी जिंदगी खुद जिऊॅगा किसी के सहारे नहीं। शायद नाराज थे कभी मनू जेल में मिलने नहीं आया। .........मलय को खबर मिली कि दादा सख्त बीमार हैं। हास्पिटलाइज हैं। उसे पता चला कि अत्यधिक शराब पीने और अगड़म-बगड़म खाने से उनका लीवर खराब हो गया है। मनू जुट गया था दादा का ईलाज करवाने में। वह करीब 15-बीस दिन रूका था और दादा को स्वस्थ कराकर ही घर लाया। अबकी बार मनू दादा को समझाने में कामयाब हुआ था। वह उनके साथ बरेली में रहें कोई काम करने की जरूरत नहीं है सिर्फ आराम से रोटी खाये ओैर घर में अपनी छत्रछाया बनाये रखे। कानपुर का मकान बेच दिया गया और सारा कर्ज निपटा कर पुराने शहर को अलविदा कह दिया गया।
             दादा के सब लोगों के साथ रहने से उनका अकेलापन दूर हो गया और एकबार फिर उन्हें जिंदगी अच्छी लगने लगी थी। नीरव और निशा के रूप में उन्हें अपना बचपन लौट आया लगता था। बच्चों के लिये ताऊ जी सबसे बड़े थे जिनसे मम्मी एवं डैडी की भी शिकायत की जा सकती थी और अपनी जिद पूरी करवाई जा सकती थी। काजल को कुछ अटपटा जरूर लगा था परन्तु एक सुरक्षित माहौल के अहसास ने उसको सहज कर दिया था। मलय प्रोफेसर हो गया था इसलिये उसे एक बंगला एलॉट था जिसके प्रथम कमरे पर दादा को स्थापित कर दिया गया। उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ खुलता था जिससे दादा मुख्य हाल में आ जाते थें। दादा का खाना पीना और आवश्यक दिनचर्या उस कमरे से सटे कम्बाइन्ड लैट्रीन बाथरूम में हो जाती थी। थोड़े दिनों बाद दादा ने अपना ब्याजू का धंधा फिर चालू कर दिया था। पास में ही रेलवे कालोनी थी जिससे उनका धंधा चमक उठा था। मनू ने भी कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि आखिर आदमी कुछ तो करेगा इतना बड़ा टाइम कैसे कटेगा? कुछ तो बिजी रहने का साधन होना चाहिये था। इसी बहाने कुछ पैसे आ जाते थे, जिससे उनको यह अहसास था कि वह किसी पर बोझ नहीं है। इसी कारण उनमें संतोष का भाव रहता था।
        आज डाक्टर से हुयी बातचीत के बाद मलय अस्थिर हो गया। उसने पत्नी से कहा ' अब नहीं रूका जाता। '
' बात क्या हो गयीं...क्या हालत और बिगड़ रही है ? '

' हॉ। डाक्टर ने कहा है कि कोई एक किडनी डोनेट कर दे तो बच सकते है।.......मैं निर्णय नहीं ले पा रहा हॅू।'

' क्या निर्णय लेना है ? '
' मैं दादा को एक अपनी किडनी डोनेट करना चाहता हॅू। शायद बच जाये '
' शायद.......क्‍यों ?
' डाक्टर ने सम्भावना व्यक्त की है कि हो सकता है कि पेशेन्ट की बॉडी दूसरे की किडनी एक्सेप्ट न करें। अगर एक्सेप्ट भी कर लेगी तो भी ज्यादा से ज्यादा 5 - 6 साल ही चल पायेगें।'
' ऐसा क्या ......? फिर आपका एक किडनी से काम चलेगा। कब तक ? अगर आपकी एक किडनी खराब हो गई तो आपके लिये कहॉं से आयेगी ? '
         मलय चुप है और सोच में पड़ जाता है।
' देखिये, दादा के बाद उनके पीछे कोई नहीं है मगर आपको कुछ हो गया तो आपके बीबी बच्चे क्या करेंगें ? अनाथ नहीं हो जायेगें ? कुछ अपने बाद की भी सोचों ' वह अस्मंजस में पड़ जाता है, एक तरफ दादा और दूसरी तरफ अपनी भरी - पूरी गृहस्थी।
' मेरी मानों यह विचार छोड़ दो।' मैं आपको यह हरगिज नहीं करने दॅूगी।' मलय अतीत में धंसता चला जा रहा है। अतीत की खटटी-मीठी यादें उसे भीतर ही भीतर मथती चली जा रही थी। उसे लगता है कि वह काजल को धिक्कारे और दादा पर अर्पित हो जाये परन्तु वह ऐसा नहीं कर सका। उसके ऑखों के सामने एक-एक करके नीरव, निशा और काजल तैरने लगे थे। रोते-बिलखते चिल्लाते।
         दादा को तीन - तीन डाक्टर देख रहे है। किडनी के मामले में डाक्टर चौधरी देख रहे है, हृदय रोग विशेषज्ञ है डाक्टर गुलाटी और पूरे मामले की देखभाल कर रहे है डाक्टर मिश्रा। डा0 मिश्रा की सलाह पर दादा को आई0सी0यू0 पर शिफ्ट किया जा रहा है। उसका खर्चा काफी आता है और मलय पैसों के मामलें में खलास होता जा रहा है। पहले कानपुर मे दादा के लीवर का ऑपरेशन कराने में काफी खर्चा आ गया था और इधर जब से डायलिसिस करवाने, हफ्ते महीने आना पड़ता था उसका खर्चा भी तल्ला निकल रहा था।
          मलय ने तीनों दीदीयों को खबर कर दी थी, शायद कोई हैल्प दादा के ईलाज में मिल जाये। परन्तु किसी का भी उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था। वह सब दादा को देखने आयेंगी भी या नहीं, यह भी संशय था। दिन भर मलय के परिचित और परिजन भी आते जाते रहे। पारदर्शी कॉच के इस तरफ से ही सबने दादा को देखा, कि उनके सारे शरीर में मशीन के तार लगे हुए है, उससे और काजल से चर्चा करते हुए लौट भी गये। प्रतिदिन खर्चे का बोझ असहनीय होता जा रहा था।
           दादा को वेंटिलेटर पर रख दिया गया था। उनके आस-पास जाना मना हो गया था। केवल नर्स और डाक्टर आते जाते थे। कभी नर्स आकर आक्सीजन के नाब को घुमाती है कभी हार्ट मशीन को एडजस्ट किया जाता। तरह-तरह के मानीटर लगे थे और तारों का जाल बिछा हुआ था। दादा का विशाल शरीर बिल्कुल कृशकाय हो गया था। वे मरणासन्न थे। वे शान्ति की गहरी नींद में थे। शायद उन्हें अपना अन्त समझ में आ गया था। चेहरे पर कुछ ऐसे ही भाव प्रतिविम्बित हो रहें थे।
             दीदी लोग अगले दिन आ गई थी। अनिता अपने पति के साथ, सुनीता कुछ देर बाद अपने देवर के साथ और अन्त में रीता अकेले ही आयी थी। डाक्टर मिश्रा से मलय और दीदीयों की बात हो गई थी । डाक्टर ने कोई उम्मीद बताने से इन्कार कर दिया था, कब तक वेन्टिलेटर के जरिये उनमें सॉंस डाली जाती रहेगी। उसका खर्चा वहन करने की सामर्थ, यह प्रश्नचिन्ह उसके चेहरे पर अपने खौफनाक अन्दाज में खड़ा था। काजल डाक्टर मिश्रा से अलग से मिली और गम्भीर उदासी और निराशा से उसने कुछ अपना कहा जिसे डाक्टर ने सिर हिला कर सहमति दी। वह तनाव में थी औऱ़़ एकदम मलय से मिलने पर कांप गई ।
         एक हफ्ता हो गया था और बोलते-चालते लाये, दादा स्पन्दनहीन पड़े थे। सबके चेहरे पर तनाव था। कब ? अब तो दिन गिनना शेष रह गया था। मलय रात को अस्पताल में ही रूक गया था। रोज ही रूकता था। काजल और बहनें घर पर आ गये थे। सुबह तड़के उठकर वह धड़कते दिल से वार्ड में दाखिल हुआ। उसने देखा अन्तिम सांसे चल रही थी। उसका गला भर आया और वह रोने लगा। वातावरण में अजीब सी गम्भीरता और संनाटा छाया हुआ था। थोड़ी देर बाद डाक्टर मिश्रा आये और नब्ज देखी। जॉंच पड़ताल खत्म हो गई। दादा को वेन्टीलेटर से निकाल लिया गया और सबकुछ समाप्त हो गया। डाक्टर ने मृत्यु की घोषणा की और संनाटा टूट गया। वातावरण भारी हो गया था और मलय अपने अपरोध बोध से ग्रसित,  दर्द की भारी व्यथा उस पर छायी थी। उधर काजल भी अनमनी और गम्भीर थी, अपने को समझाते हुये, वह रो पड़ी थी। दादा को मुक्ति मिल गई यह सोंच कर दादा की तीनों बहनों में संतोष व्याप्त था और सामान्य रूदन प्रारम्भ कर दिया था। बहनोई निरक्षेप भाव से अलग टहल लिये थे। सभी को खबर कर दी गई थी। मलय को जानने वाले और कुछ दादा को जानने वाले आ गये थे। मलय की व्यस्तता बढ़ गई थी, परन्तु मलय के चेहरे पर एक लम्बे तनाव के बाद, उसमें थकी हुयी शान्ति दिखाई दे रही थी।         

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राष्‍ट्रभाषा - गान

हरीलाल ' मिलन '

रस - रस पूरित, छन्‍द अलंकृत,
उर - वाणी - वीणा में झंकृत,
मृदु - स्‍वर - स्‍नाता भारत माता
          जय भाषा, जय देश महान,
          जय हिन्‍दी, जय हिन्‍दुस्‍तान
नग - नागेश - प्रिय भू - सुषमामय,
पुष्‍प - अन्‍न, द्रुम - फल - उपमामय,
चिर - सुपाच्‍य - कृति, श्रेष्‍ठ - संस्‍कृति
          यश - समर्थ - लिपि - सुष्‍ठ - विधान,
          जय हिन्‍दी , जय हिन्‍दुस्‍तान।
सन्धि - शान्ति - नित,पद गंगामृत,
जन - अखण्‍ड, आदर्श - अपरिमित,
राष्‍ट्र - विधात्री, युग - निर्मात्री,
          विषय - कल्‍पना - तर्क निधान,
          जय हिन्‍दी, जय हिन्‍दुस्‍तान।
शब्‍द - कलानिधि, अर्थ - पयोनिधि,
चित्‍त, बुध्दि, मन की प्रकाशविधि,
प्राइज़ - पूजिता, सिन्‍धु - नि:सृता,
          ज्ञान - मन्‍जरी - मधु की खान,
          जय हिन्‍दी, जय हिन्‍दुस्‍तान।
भाव - भाषिणी, हिन्‍द - वासिनी,
दृश्‍य - श्रव्‍य - सुख - हेम स्‍वामिनी,
छान्‍दस् - तनुजा , कवि-कलिन्‍दजा,
           सत्‍यं शिवं सुन्‍दरम् गान,
           जय हिन्‍दी, जय हिन्‍दुस्‍तान
पता
300 ए / 2 ( प्‍लाट - 16 )
दुर्गावती सदन, हनुमन्‍त विहार
नौबस्‍ता, कानपुर - 208 021
मो: 09935299939

नासिरा शर्मा के उपन्‍यासों का राष्‍ट्रीय एवं अर्तराष्‍ट्रीय परिदृश्‍य

पूजा ( शोधार्थी )


     महिला कथाकारों में नासिरा शर्मा एक सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी दृष्टि में परिपक्वता और लेखन में व्यापकता है। दैनिक जीवन की घटनाओं, घर-परिवार की विडम्बनाओं और नारी जीवन की पीड़ा के साथ - साथ अपने समय में व्याप्त विसंगतियों और कुरूपताओं को रचनाकार ने यथार्थता के साथ आंका और किसी विषेष क्षेत्र में बंधकर नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्‍व को केन्द्र में रखकर अभिव्यक्ति प्रदान की।
      उपन्यासकार के रूप में नासिरा शर्मा ने हिन्दी साहित्य जगत् को आठ उपन्यास दिये हैं। वर्ष 1984 में ‘सात नदियां एक समंदर’ से प्रारम्भ उनकी औपन्यासिक यात्रा अनवरत विकास करती तथा विविध विषयों को समेटती हुई सन् 2011 में पारिजात तक विस्तृत है। रचनाकार के शब्दों में -‘‘एक के बाद एक तीन उपन्यास इलाहाबाद के परिवेश पर आये वरना पिछले चार उपन्यासों का परिवेश तो ईरान, पैरिस, दिल्ली, दुबई, यू॰ पी॰ का कस्बा-बस्ती और फैज़ाबाद लाहौर रहा। ....मेरी रचनाएँ हिन्दुस्तान के बाहर विभिन्न देशों व शहरों पर लिखी गई।’’1
     नासिरा शर्मा के प्रथम उपन्यास ‘सात नदियां एक समंदर’ की कथावस्तु का ताना-बाना ईरानी क्रांति से संपृक्त, सात सहेलियों के जीवन की उठापटक के साथ-साथ एक साम्राज्य के अंत व दूसरे के प्रारंभ से उपजे द्वंद्व की कथा को प्रस्तुत करता है। ‘ इन्कलाब - ए - सफेद ’ के नाम से चर्चित यह क्रांति ईरान में पश्चिमीकरण के बढ़ते सैलाब पर बाँध बाँधने के लिए प्रभाव में आई थी ‘‘ जिसका मूक संदेश धार्मिक एकता और मॉडर्नाइजेशन के विरूद्ध प्रतिरोध ’’ 2 था। आंदोलन के परिणामस्वरुप अंततः सत्ता परिवर्तित हुई और लोगों का धार्मिक नेता अय्यातुल्ला खुमैनी शासनारूढ़ हो गया। अब धर्म सर्वशक्तिमान हो गया था और जिस धर्म की रक्षा हेतु यह क्रांति वजूद में आयी थी वही धर्म अब निरंकुश तानाशाह में परिवर्तित हो चुका था। उपन्यास में आई सात सहेलियों ( महनाज़, सूसन, परी, मलीहा, तय्यबा, अख़्तर, सनोबर ) में तय्यबा एक ऐसी सशक्त पात्रा है जो एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी है। वह पेशे से पत्रकार है तथा कलम के सहारे जनसामान्य में चेतना उत्पन्न करती है कि ‘‘मौलवियों का हमारे प्रति झुकाव सिर्फ एक चाल है, वह भी हमें जानने की, पहचानने की, हमें फँसाने की इसलिए मौलवियों के हाथों में नकेल थमाना उचित नहीं क्योंकि धर्म और कम्यूनिज़्म तर्क के स्तर पर कभी एक म्यान में नहीं रखे जा सकते और न ही एक साथ चल सकते हैं।’’3 इतिहास साक्षी है कि सत्ता के विरोधियों को कारावास में यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं। तय्यबा इसी शोषण का शिकार हुई किंतु न पथ विचलित हुई और न ही पीछे हटी अपितु अंतिम साँस तक परिस्थितियों से संघर्ष करती रही। ईरान की कारावासों में तय्यबा व अन्य महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के माध्यम से रचनाकार ने संपूर्ण विश्‍व में स्त्रियों की स्थिति पर प्रकाश डाला है। अंततः अत्यंत निर्भीकता से समाज से यह पूछती हैं कि ‘‘समाज के हर बदलाव की मार औरत की पीठ पर ही क्यों पड़ती है?’’4
     भारतीय परिवेश पर आधृत ‘शाल्मली’(1987) और ‘ठीकरे की मंगनी’(1989) में दो विभिन्न समाजों में नारी के संघर्ष को लिपिबद्ध किया गया है। शाल्मली भारतीय परिवेश के हिन्दू समाज में दाम्पत्य संबंधों में आए तनाव के साथ साथ स्त्री अस्तित्व पर प्रश्‍नचिह्न लगाया गया है कि ‘‘स्त्री आखिर है क्या ? युगों - युगों से पीढ़ी - दर - पीढ़ी चली आ रही मान्यताएं तथा संस्कार औरत को गीली मिट्टी से अधिक संज्ञा नहीं देते। पहले पिता की छत्रछाया में उनके अनुरूप वह ढलती है, बाद में पति उसे अपनी इच्छानुसार ढालता है और उसके बाद पुत्र; स्त्री का अपना कोई अस्तित्व है ही नहीं।’’5 ऐसी ही स्थिति शाल्मली की है जो कार्यक्षेत्र में तो सम्मान की अधिकारिणी बन चुकी है लेकिन घर में विशेषकर पति (नरेश ) की दृष्टि में उसका कोई अस्तित्व नहीं है। वह उसे मात्र भोग्या समझ निरंतर उसका तिरस्कार करता है। शाल्मली, नरेश के दुर्व्यवहार से कुंठित होती किंतु उसे क्षमा भी करती है। शाल्मली आधुनिक और स्वावलम्बी होते हुए भारतीय नारी के संस्कार, विवाह संस्था के प्रति निष्ठा तथा पति के प्रति अगाध प्रेम व सत्कार भावना समाहित हैं इसीलिए शाल्मली का ‘‘विश्‍वास न घर छोड़ने पर है, न तोड़ने पर, न आत्महत्या पर है, न अपने को किसी एक के लिए स्वाहा करने पर। मैं तो घर के साथ - साथ औरत के अधिकार की कल्पना भी करती हूँ और विश्वास भी। अधिकार पाना यानी ‘ घर निकाला ’ नहीं और घर बनाए रखने का अर्थ ‘ सम्मान ’ को कुचल फेंकना नहीं है।’’ 6 इसी सकारात्मक प्रवृत्ति के कारण वह न तो तलाक लेती और न ही पुनर्विवाह करती है क्योंकि ” इतना बड़ा संसार तो यही, जब उसमें खुशियाँ प्राप्त न हो सकीं, तो द्वार - द्वार भटकने से भीख मिलेगी, प्रेम और आदर नहीं।’’7
     मुस्लिम परिदृश्य पर आधृत ‘ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास शाल्मली का ही विस्तार है जो स्वतंत्र अस्तित्व हेतु संघर्षरत स्त्री की दास्तान से सम्बद्ध है। शिक्षा ने नारी को एक नवीन पथ प्रदान किया जिससे वह आत्मनिर्भर होकर नारी शोषण व जड़ रूढ़ियों का विरोध करने में सक्षम हो पाई जिसका सटीक उदाहरण है उपन्यास की नायिका महरुख़। इसीलिए नारी शोषण के विरूद्ध प्रश्‍न उठाती हुई कहती है- ‘‘ सही गलत की कसौटी औरत होती है, मज़हब और रीति - रिवाज़ों की ज़िम्मेदारी भी औरत होती है, राजनीतिक बदलाव को दर्शाने वाली भी औरत होती है। कुल मिलाकर इस दुनिया को ज़िंदा रखनेवाली शै भी औरत होती है।’’8 तो ‘‘फिर औरत को इतनी हिकारत की नज़र से क्यों देखा जाता है? ’’ 9 परिस्थितियों की समझ महरुख़ को सुदृढ़ता प्रदान करती है और मंगेतर रफत के पर- स्त्री से संबंधों का भान होते ही उसके प्रति अनासक्त हो विवाह का प्रस्ताव ठुकराती है। लेकिन वह पुरूष विरोधी नहीं है अपितु वह मानती है कि ‘‘मर्द न हमारा दुश्‍मन है न हरीफ। वह हमारी तरह इन्सान है।’’10 लेकिन पुरूष का नारी के प्रति परिवर्तित व्यवहार का सबसे बड़ा कारण ‘‘आज की बदलती औरत है जिसे वह समझ नहीं पा रहा है’’,11 को मानती है। इसके द्वारा रचनाकार की साकारात्मक दृष्टि उजागर होती है कि न तो हमें (स्त्रियों) पुरूष बनना है और न ही पुरूषों को स्त्रियां। अपितु अपने - अपने कर्तव्‍यों का भलीभांति निर्वाह करना है। यही सब समझाकर महरुख़ रफत की कुंठाओं का निवारण करती हुई अन्यत्र विवाह हेतु परामर्श देती है। केवल इतना ही नहीं अपितु वह भारतीय परम्परागत समाज में व्याप्त रूढ़ियों विषेषकर ‘स्त्री की एकमात्र धुरी पुरूष है’, ‘नारी पुरूष पर अवलम्बित है’, ‘नारी अस्तित्व पुरूष के कारण है’, की भी विरोधिनी है। वह स्वयं को किसी पर आश्रित न मानते हुए अपने स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा करते हुए कहती है-‘‘एक घर औरत का अपना भी तो हो सकता है उसके बाप या पति से अलग, उसकी मेहनत और पहचान का।’’12 महरुख़ का रफत के प्रति प्रेम व समर्पण उदारीकृत होकर समाज के प्रति प्रेम व समर्पण में परिवर्तित हो जाता है। सामाजिक समस्याओं की जटिलता और उन्हें सुलझाने की कर्मठता में प्रेम की असफलता और मंगेतर रफत के आचरण से उत्पन्न हुई खीझ पूर्णतः विगलित हो जाती है तथा वह कुंठाविहीन नारी के रूप में पाठकों के समझ आती है।
     राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिदृष्य में मुसलमानों की स्थिति को केंद्र में रखकर लिखा गया उपन्यास ‘जिंदा मुहावरे’(1994) में ‘‘विभाजन की पीड़ा, दंगे, असुरक्षा, महाजिर की विडम्बना, सम्बन्धों में समाई प्रतीक्षा, यादों के तहखाने, स्वार्थी राजनीतिक अस्मिता का संघर्ष, धर्म, षिक्षा, संस्कृति, अर्थ’’13 जैसे ज्वलन्त प्रष्न उठाए गए हैं। विभाजन एक ऐसी त्रासदी थी जिसने हँसते-खेलते परिवारों को बाँटकर रख दिया और ये परिवार आज भी विभाजन के दर्द को झेल रहे हैं। रहीमुद्दीन का परिवार ऐसे ही परिवार का प्रतिनिधित्व करता है जिसका बड़ा पुत्र इमाम तो उनके पास है किंतु छोटा बेटा निजाम बंटवारे के समय पाकिस्तान को अपना देष मान कराची में जा बसता है। समयोपरांत प्रतिष्ठित व्यापारी बनने पर भी सम्मान न मिला और ‘मुहाजिर’ की संज्ञा पा उसका अंतर्मन व्यथित है। भारत में सम्बन्धियों से मिलने पर सत्य उसके समक्ष आया कि ‘‘रिष्ते तो टूट चुके हैं, मियां.....रिष्तों को अब कोई नहीं पहचानता। एक चने की दाल दो दरख्तों में बदल चुके हैं, हमारा माहौल, हमारी सोच, हमारी चुनौतियां सब एक-दूसरे से जुदा हैं।’’14 इस प्रकार निजाम निरंतर मानसिक षांति का अनुभव करता है। विवेच्य रचना में नासिरा ने मुस्लिम समाज की दयनीय दषा के निरूपण के साथ-साथ भारतीय समाज में उनके बढ़ रहे सम्मान को गोलू के माध्यम से यह कहते हुए दर्षाया है कि ‘‘एक मुसलमान अफसर के नीचे हजारों मातहत हिंदू भी हो सकते हैं और .......दंगे-फसाद.....असलियत वह नहीं, जो बताई जाती है, बल्कि सच्चाई वह है, जो नज़र आ रही है।’’15 इन सभी तथ्यों से अवगत हो निजाम निरंतर पष्चाताप की अग्नि में जलता रहता है और अपनी विवषता पर केवल आँसू बहाने का मजबूर है। यह केवल विभाजन और उसके पष्चात् की समस्या नहीं है अपितु इतिहास में हुए अमानवीय अत्याचार के परिणामस्वरूप समसामयिक परिवेष में भी मनुष्य जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के नाम पर टुकड़ों में बंटा है और उसकी सोच इन्हीं दायरों में सिमटकर रह गई है। इसी सोच से उबारने के लिए नासिरा आने वाली पीढ़ियों को संदेष देती है कि ‘‘विष्वास है कि वे मानवीय पीड़ा और पहले अनुभवों से सबक लेंगीं और ऐसी राजनीति से हाथ खींचेंगी जो अभिषाप बन दिलों को काटती, जमीन को बाँटती, घरों को उजाड़ती, बारूद के ढेर पर बैठे इन्सान को रूहानी तौर पर लगातार कमजोर बनाती जा रही हैं।’’16
      ‘अक्षयवट’ ( 2003 ) और ‘कुइयांजान’ ( 2005 ) की कथावस्तु का गठन इलाहाबाद को आधार बनाकर किया गया है लेकिन दोनों के सरोकार वैश्‍िवक हैं। ‘अक्षयवट’ की पृष्ठभूमि इलाहाबाद है जिसमें नासिरा शर्मा ने विभिन्न घटनाक्रमों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझते, डूबते - उतराते मनुष्य और जर्जरित जीवन से त्रस्त किंकर्त्तव्यमूढ़ समाज का खाका खींचा है। पुलिस और अपराधियों की साँठगाँठ, चोरी, डकैती, जेबकतरी, लूटमार, अपहरण, हत्याएँ, बलात्कार, फिरौती, अवैध कब्ज़े, जमीन के घपले, तस्करी, माफिया, शराब की भट्टी के कारनामों का सुसंगत तरीके से पर्दाफ़ाश किया है। सरकारी अस्पतालों, दफतरों, महापालिका, कचहरी और शंकित न्यायपालिका पर तीखी नज़र डाली है। नस- नस में व्याप्त भ्रष्टाचार के माहौल में पल रहे नौजवानों, बेरोज़गारों की पीड़ा को गहराई से विश्लेषित किया है। यदि कह दिया जाए कि इसके माध्यम से लेखिका ने केवल इलाहाबाद के ही नहीं अपितु वैश्विक स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को दर्शाया है तो अतिश्‍योक्ति न होगी। इन सभी को उद्घाटित करने में उपन्यास का मुख्य पात्र ज़हीर व उसके अन्य साथी रमेश, जुगनु, मुरली, बसंत, सुुरेंद्र, सतीश मोजमदार, अशोक मिश्रा व श्यामलाल त्रिपाठी महत्‍तवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज़हीर, मुरली, सलमान, बसंत, रमेश, जगन्नाथ मिश्रा ऐसे पात्रों के रूप में उभरे हैं जिनके स्वप्न विपरीत परिस्थितियों के कारण पूरे न हो सके। ये सभी घनिष्ठ मित्रता के सूत्र में बँधकर न केवल समाज में हो रहे अनाचार व दुराचार के विरूद्ध आवाज उठाते हैं अपितु शोषित जनों की सहायता को तत्पर रहते हैं।
     इंस्पेक्टर त्रिपाठी उपन्यास में खलनायक की भूमिका का निर्वाह करता है। स्वयं पर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए इलाहाबाद में ही पुलिस इंस्पेक्टर का पद प्राप्त करता है तथा अत्याचार, जालसाज़, भ्रष्ट और घिनौनी हरकतों का प्रतीक बन जाता है। ‘‘ऐसा कोई भी अपराध नहीं था जो उसने न किया हो। हत्या, अपहरण, कत्ल, कब्ज़ा, बलात्कार न जाने क्या - क्या कर डाला है। इतना बडा़ क्रिमिनल पुलिस डिपार्टमैंट में, पुलिस की वर्दी पहने बैठा है, यह बहुत आश्‍चर्य की बात है। ’’ 17 इन सब कार्यों में वह अकेला नहीं था बल्कि राजनीतिज्ञ देवीशंकर, विश्वकर्मा, रामसेवक, वकील जमील अंसारी इसका साथ देते हैं। लेकिन कहा जाता है कि ‘ सत्यमेव जयते ’ अर्थात् सत्य की हमेशा जीत होती है। इसीलिए श्यामलाल व उसके अत्याचारों का अंत होना अनिवार्य था। एस॰ एस॰ पी॰ सतीश मोजमदार, गौरव दत्ता व अशोक मिश्रा द्वारा श्यामलाल को पकड़ने का प्रयास किया जाता है जिसमें वे सफल भी होते हैं और वह इन सबसे बचने के लिए आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। इस स्थानीय संघर्ष के पश्चात् जहीर और उसके मित्रों की मनोदशा भी परिवर्तित हो चुकी थी। उनके अन्दर का आक्रोश अब तर्कसंगत सोच में बदल चुका था। जहाँ ललकार, पुकार, चुनौती का कोई अर्थ नहीं रह गया था बल्कि उस परिसंवाद की उन्हें तलाश थी जिससे वह अपना और दूसरों का जीवन सुधार सकें। मगर उन्हें गलत समझौता अब भी मंजूर न था अतः अब उनका एकमात्र मंतव्य यही है कि ‘‘ जहाँ अन्याय हो रहा हो, वहाँ न्याय दिला सकें। जहाँ अत्याचार हो रहा है, उसके विरूद्ध आवाज उठा सकें। जहाँ कोई किसी को सता रहा हो उसको मुक्ति दिला सकें तो दिलाएं। ’’ 18 इस सोच के माध्यम से उपन्यासकार समाज को सकारात्मक सोच अपनाने का संदेश भी देती हैं।
     जल धरती पर पाए जाने वाले पदार्थों में सबसे साधारण लेकिन गुणों में विशिष्ट एवं असाधारण है। इसके इन्हीं गुणों के कारण पृथ्वी पर जीवन न केवल अस्तित्व में आया और विकसित हुआ अपितु आज भी पृथ्वी पर बरकरार है। लेकिन वर्तमान समय में जल का गिरता स्तर केवल भारत के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्‍व के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है जिसके लिए सभी चिंतित हैं। इन्हीं जल समस्याओं को केंद्र में रखकर ‘ कुइयांजान ’ ( 2005 ) की कथा का ताना - बाना बुना गया है और गिरते जल - स्तर की वैश्‍विक विकरालता से साक्षात्कार करवाती लेखिका कहती हैं - ‘‘ आज विश्‍व के आँकड़ों द्वारा ज्ञात होता है कि लगभग एक अरब से ज्यादा लोगों को साफ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। दो अरब लोगों को नहाने - धोने के लिए पानी नहीं मिल पाता, जिससे लोग अनेक तरह के रोगों का शिकार हो रहे हैं। मृत्यु - दर दिन - प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है। भारत में गाँवों, कस्बों, शहरों में लोग कुआँ, तालाबों और नदियों से पानी लेते हैं जो अधिकतर गंदा और कीटाणुयुक्त होता है। उसमें प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले संखिया की मिलावट होती है।...’’ 19 इसीलिए राजस्थान में लोग कहीं सूखेपन से व्याकुल हैं तो कहीं गंदे पानी से वहाँ ऐसी बीमारियाँ फैल रही हैं कि ‘‘ पैरों से पतले - पतले केचुएनुमा लंबे - लंबे कीड़े बाहर निकलते थे जो पैरों की माँसपेशियों को शिथिल बना देते थे। ’’ 20 नासिरा शर्मा ने उपन्यास में इस तथ्य की ओर भी इंगित किया है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो ‘‘ ऐसा दौर जल्द ही आ जाएगा जब हीरे के मौल पानी मिलेगा और पूँजीपति उसको अपनी तिजोरी में बंद कर रखेंगे। तब डकैतियाँ पानी की बोतल के लिए पड़ेंगीं। बैंक लॉकर लूटे मिलेंगे केवल खालिस पानी के लिए जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में करोड़ों होगी। यह फैंटसी नहीं, बल्कि आने वाले समय में पानी की दुर्लभता की पूर्वघोषणा है। यह मज़ाक नहीं, बल्कि पानी के बढ़ते महत्‍तव का सच है। ’’ 21 इस प्रकार रचनाकार ने भविष्य के यथार्थ का चित्रांकन कर अपनी सूक्ष्म दृष्टि का परिचय दिया है। ऐसा नहीं है कि लेखिका ने केवल समस्या को ही उभारा है अपितु उसके समाधान के रूप में जहाँ एक ओर ‘ कुइयांजान ’ में बरसात के पानी को एकत्रित करने के साथ राजस्थान की प्राचीन जल - संचय परम्परा ‘ वोज ’ और ‘ कुइयां ’ के द्वारा अधिकाधिक जल संचय का तथा ‘ ज़ीरो रोड ’ उपन्यास में ‘‘ गंदे पानी को रिसायकिल कर काफी हद तक समस्या को हल करने ’’ 22 का संदेश दिया है। पानी की भीष्ण व ज्वलंत समस्या के साथ - साथ मध्यवर्गीय जीवन की दास्तान को भी उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है जिसमें प्रेम, छेड़छाड़ तथा विभिन्न परिस्थितियों में पारिवारिक - सामाजिक बनते - बिगड़ते संबंधों का प्रकटीकरण किया गया है। इन सभी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध आलोचक डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘ कुइयांजान ’ को सन् 2005 का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित किया और इसी उपन्यास के लिए सन् 2008 में हाऊस ऑफ लॉर्डस ( लंदन )  में नासिरा शर्मा को 14 वें अंतरराष्ट्रीय ‘ इंदू कथा सम्मान ’ से सम्मानित किया गया।
      लेखिका ने अपने दो अंतिम उपन्यासों ‘ ज़ीरो रोड ’ (2008) व ‘ पारिजात ’ (2011) में मनुष्य की संवेदना - शून्य मानसिकता एवं परिवर्तित संबंधों की कहानी को कहा है। ‘ ज़ीरो रोड ’ के कथातंतु इलाहाबाद से दुबई तक विस्तृत हैं जिसमें रचनाकार ने न केवल निम्न मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों की आर्थिक तंगी को उभारा है अपितु प्रवासी मानसिकता, बड़े शहरों का अकेलापन, साम्प्रदायिकता और आतंकवाद से जूझती पूरी दुनिया को एकसूत्र में गूंथकर उपन्यास के माध्यम से पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। सिद्धार्थ व उसके मित्रों - केरलवासी रामचंद्रन, इंजीनियर श्रीनिवासन, ईरानी फिरोज़ मीखची, जाज़फ सउद, पाकिस्तानी बरकत उसमान, बंग्लादेशी सुदर्शन, सूरत के डॉ॰ शाहआलम, इराकी असद खजूरी, लतीफ फरमान, फिलिस्तीन सफीर, जारयाब, गुलफाम आदि सम्मिलित हैं जो किसी न किसी कारणवश अपने देश से उखड़, अपने परिवारों को छोड़ दुबई में रहते हैं। प्रत्येक शाम इकट्ठे होकर अपने दुःखों व अकेलेपन को बांटने का प्रयास करते हैं। इन बैठकों में आधुनिक समस्याओं से जुड़ी विभिन्न प्रकार की वार्ताएँ होतीं। इनकी बातचीत के माध्यम से ही नासिरा शर्मा ने विश्व में हो रही हिंसा को व्यक्त किया है। जैसे - गोधरा कांड, निठारी कांड में बच्चों पर हुए अमानवीय अत्याचार, रामजन्मभूमि-बाबरी - मस्जिद विवाद में हिंदू - मुस्लिम मतभेद, मुम्बई में बम - विस्फोट, अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला, अमेरिका का कुवैत पर आक्रमण, ईरान - इराक युद्ध आदि। भारतीय परिवेश में ‘‘आज भ्रष्टाचार, दुल्हन को जलाना, बाबरी - मस्जिद व रामजन्म भूमि समस्या, भूख से दम तोड़ते लोग, आत्महत्या करते किसान ’’ 23 आदि समस्याएँ प्रमुख रूप से देश के विकास को अवरूद्ध करती है। आधुनिक युग में मानव - मानव का तो शत्रु बनता ही जा रहा है। साथ ही साथ उन बच्चों के प्रति भी, जो मासूम व दुनिया के छल - कपट से दूर हैं, वैमनस्य रखता है। स्पष्ट है कि ‘ज़ीरो रोड’ उपन्यास में युगीन परिवेश की यथार्थता व उससे जूझते मानव की दशा को प्रकट किया है। उनके शब्दों में ‘‘यह समय, जिसमें हम जी रहे हैं, वास्तव में सनसनी और सदमों से भरा हुआ है। घटनाएँ हर दिन नये ढंग से इन्सान के विश्वास को तोड़ने का षड्यंत्र रचती है। ...लाख अवसाद से भागने, बचने की कोशिश करो मगर वह आपका पीछा लगातार करता रहता है। एक भय की संरचना लगातार आपकी कोशिकाएँ रचती रहती हैं जो आपको निरंतर निर्बल बनाती हैं, लाख आप आत्मा को मजबूत रखने की कोशिश करें मगर शरीर इन सदमों से कमज़ोर पड़ता है। ’’ 24
     ‘पारिजात’ उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता साम्प्रदायिक सद्भाव है जिसका प्रकटीकरण तीन मित्रों प्रह्लाद दत्त, बशारत हुसैन, जुल्फिक़ार अली के माध्यम किया है जो प्रत्येक स्तर पर एक - दूसरे का साथ देते हुए भावनाओं को महत्त्व देते हैं। नासिरा शर्मा ने किसी एक धर्म को विशेष महत्त्व न देकर सभी धर्मों को समान माना है क्योंकि ‘‘ धर्म केवल योजनाबद्ध तरीके से जीवन जीने का एक रास्ता है। आज धर्म को समझना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि उसका गलत प्रयोग इंसानों की जिंदगी को बेहद दुश्वार बना रहा है। ’’ 25 अतः स्पष्ट है कि इसका नामकरण ‘ पारिजात ’ भी शायद इसी आधार पर रखा गया है। जब यह पेड़ फूलता है तो बराबर इसके फूल झरते रहते हैं और यह फिर भी फूलों से लदा रहता है या इसलिए कि यह दोरंगी फूल हैं जिसमें फर्क कर पाना मुश्किल है कि एक रंग कहां खत्म होता है और दूसरा कहाँ से शुरू। जैसे भारत के दो धर्मों का एक - दूसरे में रचा - बसा होना या फिर इस फूल की यह खूबी कि सूख जाने के बाद भी अपनी खुशबू और रंग दोनों कायम रहते हैं जैसे इस देश में हिंदुओं और मुसलमानों का रिश्ता, जो लाख अलगाववाद के बाद भी दोस्ती और मोहब्बत से महकता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि नासिरा शर्मा का औपन्यासिक साहित्य राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिदृष्य को अपने में समाहित किये हुए है। भू - मण्डलीकरण की जिस प्रवृत्ति ने विश्‍व को एक सूत्र में बांध दिया वह प्रवृत्ति नासिरा षर्मा के साहित्य में स्वतः उदघाटित हो उठती है जिसके माध्यम से लेखिका ने सम्पूर्ण विश्‍व की ज्वलंत समस्याओं को वाणी प्रदान की है। यही कारण है कि नासिरा शर्मा समसामयिक युग की पहचान बन सकी।
संदर्भ सूची :
1 रवींद्र कालिया ( संपादक ) - नया ज्ञानोदय, ( नासिरा शर्मा से जाबिर हुसैन की बातचीत ) , अंक - जून 2007, पृ॰ 62.
2 नासिरा शर्मा - सात नदियां एक समंदर, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, पृृ० 54.
3 यथावत्, पृृ० 289.
4 यथावत्।
5 नासिरा शर्मा-शाल्मली, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 1987, पृ॰ 75.
6 वही, पृ॰ 164.
7 वही, पृ॰ 161.
8 नासिरा शर्मा - ठीकरे की मंगनी, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 1989, पृ॰ 178.
9 पूर्ववत्।
10 पूर्ववत्, पृ॰ 179.
11 पूर्ववत्।
12 पूर्ववत्, पृ॰ 197.
13 मधु संधु - ‘ महिला उपन्यासकार 21वीं सदी की पूर्व संध्या के संदर्भ , दिल्ली: निर्मल पब्लिकेशन्स, सन्  2000 पृ॰ 17.
14 नासिरा शर्मा- जिंदा मुहावरे, नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन, सन् 1994, पृ॰ 123.
15 वही, पृ॰ 127.
16 वही, पृ॰ 08.
17 नासिरा शर्मा- अक्षयवट, नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ, सन् 2003, पृ॰ 312.
18 यथावत्, पृ॰ 228.
19 नासिरा शर्मा- कुइयांजान, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, सन् 2005, पृ॰ 88.
20 पूर्ववत्, पृ॰ 118.
21 पूर्ववत्, पृ॰ 37.
22 पूर्ववत्।
23 नासिरा शर्मा - ज़ीरो रोड, नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ, सन् 2008, पृ॰ 313.
24 नसिरा शर्मा - पारिजात, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 2011, पृ॰ 32.
25 नासिरा शर्मा - खुदा की वापसी, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 1998, पृ॰ 9.
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