इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

बुधवार, 11 सितंबर 2013

सरकारी डाक्टर

भावसिंह हिरवानी
अन्य पेंशनरों की भांति पंचोली बाबू भी सरकारी दवाई का मोह छोड़ नहीं पाये थे। माड़ी और एड़ी में दर्द के बावजूद खुद को लगभग धकेलते हुए पत्नी की सहायता से जिला सरकारी अस्पताल पहुंच गये।
पहले तो पर्ची बनवाने के लिए उन्हें अंाधा घंटा लाइन में खड़ा रहना पड़ा। फिर दो घंटे बाद डाक्टर के पास उनका नंबर आया। उनकी तकलीफ सुनकर डाक्टर ने पेशाब और खून जांच के लिए उन्हें तकनीशियन के पास भेजा। वहां रिपोर्ट जल्दी देने के लिए उन्होंने बार - बार तकनीशियन से अनुनय करते रहे फिर भी लगभग दो बज ही गये।
पंचोली बाबू जब दोबारा डाक्टर के पास पहुंचे तो वे अन्य मरीजों को देखने में व्यस्त थे। जैसे ही उन्होंने अपनी पर्ची आगे बढ़ायी, डाक्टर साहब बोले - बस, अब कल देखेगे। आप कल आइये ...।
पंचोली बाबू लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोले - सर आपने रिपोर्ट लाने के लिए कहा था, वही लेकर आया हूं। देख लीजिए न। वैसे भी अब मेरे बाद कोई मरीज नहीं हैं। मैं आखिरी मरीज हूं।
- नहीं, टाइम हो गया है। आज हम बहुत थक गये हैं। डाक्टर साहब ने कहा और उनकी ओर से मुंह फेर कर सामने बैठे मेडिकल रिप्रजेन्टेटिव की ओर देखने लगे।
पंंचोली बाबू कुछ देर  किंकर्तव्यविमूढ़ वहीं खड़े रहे। फिर घोर निराशा में डूबे कमरे से बाहर आ गये। बरामदे में प्रतीक्षा करती उनकी पत्नी बैठी थी। वह पंचोली बाबू की हालात देख घबरा उठी। बोली - क्या हुआ ?
दुखी पंचोली बाबू ने कहा - कुछ नहीं, मरीजों का इलाज करते - करते गद्देदार रिवाल्विंग चेयर में बैठे डाक्टर साहब थक गये हैं। उन्होंने कल आने को कहा है। चलो, किसी प्राइवेट डाक्टर के पास चलते हैं। सरकारी डाक्टर की तरह वे इतनी जल्दी नहीं थकते। फिर दोनों धीरे - धीरे चलते हुए अस्पताल से बाहर आ गये।
कबीर प्रिंटिंग प्रेस गुरूर
मु. पो. - गुरूर
जिला - दुर्ग6छ.ग.8

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