राम-राम जी कहिथन लेकिन,
बात राम के हम नइ मानी ।
सिख हिन्दू मुस्लिम ईसाई,
जैन बौद्ध सब सम नइ जानी ।।1।।
भेदभाव अंतस घट भीतर,
महुरा जइसे भरे पड़े हे ।
हिन्दू-हिन्दू ल हम बाँटेन,
पर धर्मी मुस्कात खड़े हे ।।2।।
शूद्र जाति अउ छुआछूत ला,
नेता शासन हवा देत हे ।
निज शासित मा मुँह सी लेथे,
पर शासित के सोर लेत हे ।।3।।
धूर विरोधी नेता गण के,
हाल अलग नइ परै दिखाई ।
अपन-अपन रोटी सेंकत हे,
सोंचव कइसे देस बँचाई ।।4।।
मर्यादा पुरुषोत्तम रघुवर,
जेकर हिन्दू जन गुन गाथे ।
बिरले अनुयायी के कथनी,
अउ करनी हर सम हो पाथे ।।5।।
संत-महंतन सत्ता पाके,
मानवता ला बिसराए हे ।
दुश्मन जेन जनाइस वोला,
धुर्रा अविलंब बनाए हे ।।6।।
राम राज मा सुखी रहिन सब,
दुनिया वाले मन कहिथे जी ।
लेकिन अंतस राम भक्त के,
अब रावण बसके रहिथे जी ।।7।।
राम भक्त बन कहत फिरत हे,
जो है नहीं मेरे राम का ।
हमर संग नइ देवय जे मन,
वोकर जीवन किस काम का ।।8।।
अंधभक्त मन के मारे अब,
मोर राम होत बदनाम हे ।
संसो मा दिन-रात पहाथे,
सदा समय होत बलवान हे ।।9।।
जानबूझ के जहर पियत हन,
अइसनहे सब झन मर जाबो ।
काली नाग नथइया बन फिर,
मोहन आही तव बच पाबो ।।10।।
रचयिता- मोहन लाल कौशिक, बिलासपुर (छ.ग.)
इस अंक के रचनाकार
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बुधवार, 9 अक्टूबर 2024
राम कहाँ आदर्श रह गया
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