इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

आत्म-समर्पण

 

संजय विद्रोही

'सुनो कँवर साब आज एक अजीब बात सुनी है.' पापाजी ने आकर बैठते हुए कहा.
'क्या पापाजी?' परेश ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए मुस्कुराकर पूछा.
'पूरी कॉलोनी में सबने अपने घरों के मुख्य-द्वार पर दोनों ओर हल्दी और मेंहदी के थापे मार रखे हैं.' उन्होंने अचरज के साथ बताया.
'क्या?' सुनकर परेश अचम्भित रह गया.
'हाँ, मुझे तो सुबह विपिन ने बताया तो एकाएक मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ. मगर जब मैं शाम को टहलने गया तो देखा, वाकई सबने थापे लगा रखे हैं. जगह-जगह औरतें भी खड़ी खुसुर-फुसुर करती दिखीं' उन्होंने आगे बताया. हम दोनों की बातें सुनकर प्रतिभा भी पास आकर बैठ गई.
'देखो प्रतिभा पापाजी क्या बता रहे हैं?' परेश ने पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा.
'हाँ पापाÊ सुबह सामने वाली भी बता रही थी. कहते हैं तीन चार चुडैलें कहीं से छूटकर यहाँ आ गई हैं. घर-घर जाकर रोटी-प्याज माँगती हैं. यदि कोई तरस खाकर रोटी-प्याज दे देता है, तो रोटी तो वहीं फेंक देती हैं, प्याज को दरवाजे पर ही मुठ्ठी में भींचकर फोड़ देती हैं और उसका रस चूसकर पी जाती हैं. जिस-जिस घर में उन्होंने एसा किया है, उसी घर के बच्चे बीमार पड़ने लग जाते हैं. घर में भी तरह-तरह की मुसीबतें आने लगती हैं. प्रतिभा ने पूरी बात बताई. परेश जानकर हैरान रह गया कि हमेशा पढ़ाई-लिखाई में लगी रहने वाली उसकी पत्नी इस तरह की बातों में भी रुचि लेती है. उसने इस तरह से पूरी घटना का वर्णन किया कि वो देखता ही रह गया.
'अच्छा, इसलिए सबने अपने घरों के मुख्य-द्वार पर दोनों ओर हल्दी और मेंहदी के थापे मार रखे हैं. क्योंÆ लोग भी बस, बात का बतंगड़ बना लेते हैं और अंधविश्वास में कुछ भी करने लगते हैं. रोटी मांगने-खाने वाली आती ही रहती हैं. चाँस की बात है उसी दिन किसी के घर में कोई बच्चा बीमार पड़ गया होगा. बस फिर क्या था? अफवाह उड़ते देर लगती है भला. रोटी-प्याज का किस्सा लोगों ने घड़ लिया और बस शुरु हो गये हल्दी और मेंहदी के थापे.' परेश के गले नहीं उतर रही थी ये बातें.
'हाँ कँवर साब मैं तो खुद ये देखकर हैरान हूँ. आज जबकि आदमी चाँद पर जा रहा है. हम अब भी अंधविश्वासों से घिरे पड़े हैं.'
'और नहीं तो क्या?' परेश ने तुरन्त जोड़ दिया.
'लेकिन सुनो, कुछ तो जरूर होता होगा. तभी तो सबने ऐसा किया है. हम भी थापे लगा लें क्या? देखो, अपने भी छोटे-छोटे बच्चे हैं.' प्रतिभा के चेहरे पर भय के भाव स्पष्ट दिख रहे थे.माँ जो ठहरी.
'क्या बेवकूफों जैसी बातें करती हो? इन सबसे क्या होता है. तुम तो पढ़ी लिखी हो प्रतिभा. तुम ऐसी बातें करोगी?' परेश ने हल्के-से क्रोध के साथ कहा.
'देखो पापा, आप समझाओ ना. यहाँ भी रोटी माँगने वाली आती रहती हैं. एक तो कल ही आई थी.' प्रतिभा ने अपने पिता को एप्रोच किया. किन्तु पिता इस पशोपेश में थे कि दामाद की बात को कैसे काटें. हालाँकी उनके मनोभावों से भी लग तो एसा ही रहा था कि वो भी वही चाहते हैं जो प्रतिभा चाहती है. लेकिन वे कुछ कहते उससे पहले ही परेश बोल पड़ा - 'देखो पापाजी. कैसी बातें करती है?’
'नहीं प्रतिभा ऐसा नहीं करते बेटा. ऐसा कभी होता है क्या ये सब अफवाहें हैं. अंधविश्वास के सिवा कुछ भी नहीं. अच्छा कँवर साब मैं चलता हूँ.' कहकर वो उठ खड़े हुए. परेश बाहर तक उनको छोड़कर आया और वापस कुर्सी पर आ बैठा. अखबार देखने लगा. प्रतिभा जाकर बच्चों का होमवर्क कराने लगी.

रात को सोते समय अचानक प्रतिभा ने बात शुरू की 'देखो सब कह रहे हैं वो चुडैलें यहीं घूम रही हैं. कभी-कभार नजर आती हैं. अकसर नजर नहीं आतीं. सामने वाली कह रही थी, प्रतिभा तेरे तो छोटे-छोटे बच्चे हैं. तुझे तो अपने घर के बाहर जरूर लगाने चाहिए हल्दी और मेंहदी के थापे. आप समझते क्यों नहीं. कल को कुछ हो गया तो?' उसके स्वर में डर था.
'अरे पगली कुछ नहीं होगा. ऐसा कभी होता है?' परेश ने उसकी सामने झूलती लट को सम्हाल कर कान के पीछे करते हुए कहा.
'मुझे तो डर लग रहा है.'
'डरने की क्या बात है? मैं हूँ तो सही.'
'आप तो दिनभर ऑफिस में रहते हैं. मैं बच्चों के साथ घर में अकेले रहती हूँ. आपके पीछे से वो आ गई तो?’
'कोई नहीं आएगा. तुम तो बेवजह इतना डर रही हो. तुम इतनी पढ़ी-लिखी होकर कैसी बात करती हो?’
'माँ हूँ ना. ममता कब पढ़ी-लिखी होती है?'उसने बड़ी ही मासूमियत से कहा.
'पगली कहीं की.' लाड़ में परेश ने उसे गले से लगा लिया और वो बच्चों की तरह उससे लिपट कर सो गई. पास ही बच्चे भी सो रहे थेÊ निश्चिंत. परेश भी आँखें बन्द कर के लेट गया.
सुबह का समय. यानी भागदौड़ का समय. बच्चों को नहलाना धुलाना. फिर उनको नाश्ता कराना, दूध पिलाना. परेश को ऑफिस की जल्दी अलग. सबकुछ के बीच प्रतिभा बेचारी फिरकी हो जाती है. तिस पर बच्चों का खाने पीने मे नाक-भौं सिकोड़ना. प्रतिभा उनको डाँटती रहती है और बड़बड़ाती रहती है.
पम्मी तो ऐसी बदमाश है कि घण्टों मुँह में खाना लिए बैठी रहती है. खाती ही नहीं है. प्रतिभा बार-बार उसको टोकती रहती है' जल्दी खा ले. ऑटो वाला आने वाला है. जल्दी-जल्दी दूध पी फिर.' लेकिन वो है कि मुँह में रखे कौर को ही चिगलती रहती है.
'देखो आप कुछ कहते क्यों नहीं इसको? देखते रहते हो बैठे बैठे.' उसने परेश को डपट दिया.
'बेटा जल्दी-जल्दी खाओ. देखो बॉबी कितना अच्छा बच्चा है? फटाफट खा लेता है.' उसने तुरन्त बच्ची को टोक दिया. पास ही बैठा बॉबी मुस्कुरा दिया. परेश ने उसके गाल पर एक चपत लगा दी और झड़का कर मोजे पहनने लगा.
'ले - खा.' प्रतिभा ने पम्मी के मुँह में एक कौर और ठूँस दिया था. उसका मुँह बिल्कुल भर गया था. उसको चबाने में भी बड़ी दिक्कत हो रही थी. बॉबी अपना नाश्ता पूरा करके अपना बैग सम्हालने में लगा था. अचानक पम्मी ने जबरदस्त उल्टी कर दी. पूरी यूनिफॉर्म और डाइनिंग टेबिल गंदी हो गई. परेश ने दौड़ कर उसे सम्हाला,' 'क्यों तुम इसके साथ जबरदस्ती करती हो? जितना खाये खाने दो. बेकार क्यों ठूँसती हो?' प्रतिभा एकदम जैसे जड़ हो गई थी. उसको समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? 'कोई कपड़ा लाओ भई.' परेश ने जोर से कहा, तब उसकी चेतना लौटी. भागकर उसने कपड़ा दिया. बच्ची के हाथ-मुँह धुलवाए, कपड़े बदले. इतने में ही ऑटो वाला आ गया और बच्चे स्कूल चले गए. अनमनी- सी प्रतिभा काम में लगी रही. परेश भी खा-पीकर ऑफिस के लिए निकल गया.
लंच के समय उसको याद आया कि बच्चे स्कूल से आ गए होंगे. चलो, पम्मी की तबीयत पूछ लूँ. फोन मिलाया, घंटी बजने लगी उधर. काफी देर बाद प्रतिभा ने उठाया, 'हैलो.'
'मैं बोल रहा हूँ. बच्चे घर आ गए? पम्मी की तबीयत कैसी है?' इधर से परेश ने रूटीन टोन में पूछा.
'बच्चे तो आज घण्टे भर बाद ही आ गए थे. स्कूल की वैन छोड़ गई थी. पम्मी को स्कूल में भी दो-तीन बार उल्टी हो गई थी.'
'अब कैसी है उसकी तबीयत?' उसके मन में अजीब-सी घबराहट होने लगी .
'अभी तो सो रही है.'
'बॉबी क्या कर रहा है?' परेश घबरा रहा था. कहीं प्रतिभा की बात ही सच ना हो रही हो.
'वो भी सो रहा है.'
'ठीक है. मैं आज जल्दी निकलने की कोशिश करता हूँ.'
'नहीं, आप आराम से आओ. अब तो वो ठीक है.' क़हकर प्रतिभा ने फोन रख दिया. किन्तु परेश के मन में अजीब-सी अकुलाहट होने लगी थी. किसी काम में जी नहीं लग रहा था. बार-बार मेंहदी हल्दी को थापों वाली बात याद आ रही थी. रात को जिसे उसने अंधविश्वास कह कर प्रतिभा को समझाया था. बार-बार उसका ध्यान अब उसी दिशा में जा रहा था. जी उचाट होता देख, अपने सहयोगी को काम सम्हला कर 'सिरदर्द हो रहा, यार.' कह कर वो ऑफिस से जल्दी निकल गया.
कभी मन में खयाल आता कि 'कहीं प्रतिभा जो कह रही थी वे सच तो नहीं.' फिर अगले ही पल सोचता 'ऐसा होता है कहीं? खाने पीने में कोई गड़बड़ी हो गई होगी. बच्चे हैं, सौ चीजें खाते हैं दिनभर में.' बस इसी उधेड़-बुन में खोया वो घर की तरफ स्कूटर दौड़ा रहा था.
...... पता ही नहीं चला कि कब घर आ गया. जल्दी से उसने स्कूटर को स्टैण्ड पर लगाया और तेजी से भीतर की ओर दौड़ा. उसने देखा घर के दरवाजे के दोनों ओर मेंहदी और हल्दी के दो-दो थापे लगे थे. ना जाने क्यों, उन थापों को देखकर उसको एक अजीब-सा संतोष हुआ और उसकी चाल अपने आप धीमी पड़ गई.

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