इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

शनिवार, 27 मई 2023

अचिंत्य का हलुवा

राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल
दादी ने कहा,' अचिंत्य के सेब का हलुवा खाने का समय हो चुका है । मैं बनाये लाती हूं ।'
अचिंत्य छह महीने का हो चुका था । उसके निचले जबड़े में आगे के दो दांत निकल आये थे । उसका अन्नप्राशन भी हो गया था । अब वह कुछ खा सकता था । जब उसे पहली बार मां के दूध के अलावा अन्न खिलाया गया, तो उसे बड़ा अच्छा लगा था । उसने सब स्वाद ले लेकर खाया था । खूब हाथ पैर चलाये थे ।
दादी ने सेब का हलुवा खिलाया । अचिंत्य को बड़ा मजा आया । वह कुछ ज्यादा खाना चाहता था । पर दादी ने कहा, ' अब बस । बहुत हो गया । तुझे बदहजमी हो जायेगी ।'
अचिंत्य को कुछ समझ में नहीं आया । जो समझ में आया, वह यह था कि दादी उसे और हलुवा देना नहीं चाहती थी । वह चीखने चिल्लाने लगा । दादी नहीं मानी । अचिंत्य चीख चिल्ला कर थक गया । सोचने लगा अब क्या करे ।
उसने इधर उधर देखा । सभी लोग थे । मां, मौसी, बुआ, आदि आदि । वह मां को देख मुस्कराया । मां ने प्यार से कहा,' मेरा अच्ची ।' इतना कह कर मां अपने काम पर लग गयी । पर अचिंत्य को हलुवा नहीं मिला ।
अब अचिंत्य मौसी की तरफ घूमा । मौसी निहाल हो गयी । गोद में उठा कर बोली,' अच्ची मेरा प्यारा, मम्मी का दुलारा । ' यह गीत वह कई बार दोहराती रही । पर अचिंत्य को हलुवा नहीं दिलाया । अचिंत्य मौसी के बार बार एक ही लाइन दोहराये जाने से बोर हो गया । कितनी देर तक मुस्कान बिखेरता रहता । बिना हलुवा के मुस्कान भी चेहरे पर कहां आती है । इसलिए अचिंत्य ने मौसी के बाल नोच लिये । मौसी प्यार से चीखने लगी । अचिंत्य मुंह बिगाड़ कर रोने लगा ।
यह देख कर बुआ दौड़ी आयी । अचिंत्य को गोद में ले लिया । अचिंत्य को लगा बुआ हलुवा दिला सकती है । वह उन्हें देख कर मुस्कराने लगा । बुआ निहाल हो गयी । अचिंत्य को गले से लगा लिया । अचिंत्य को भी अच्छा लगा । वह बुआ बुआ बुदबुदाने लगा । बुआ को और प्यार आ गया । इसके बावजूद अचिंत्य को हलुवा नहीं मिला । पर बुआ कहानी सुनाने लगीं । परियों की कहानी । शैतान बच्चे की कहानी । बाजार में घूमने की कहानी । हालांकि, अचिंत्य हलुवा खाना चाहता था । पर बुआ की कहानियां उसे अच्छी लग रही थीं । वह बहल गया ।
दोपहर में दादी ने दूध में केला मिला कर खिलाया । यह भी अचिंत्य को बड़ा अच्छा लगा । अचिंत्य को इस बार भर पेट खिलाया गया । अचिंत्य को मजा आया । वह सो गया । शाम को उसे दाल का रस पिलाया गया । यह स्वाद उसके लिए नया था । सो उसने इसका भी खूब मजा लिया । फिर अचिंत्य मां का दूध पीता पीता न जाने कब सो गया ।
दूसरे दिन जब अचिंत्य की आंख खुली, उसे भूख लग रही थी । मां तुरन्त आ गयी । उसे दूध पिलाया । अचिंत्य को मां का दूध सबसे ज्यादा अच्छा लगता था । उसने जम कर दूध पिया । दूध पीते पीते न जाने कब उसे नींद आ गयी ।
नींद खुली तो दादी सेब का हलुवा तैयार कर रही थीं । अचिंत्य की नाक में उसकी खुशबू पहुंच रही थी । वह हाथ पैर फेंकने लगा । सब दौड़े चले आये । अचिंत्य की बाल सुलभ हरकतों का मजा लेने लगे । अचिंत्य उन्हें खुश करने के लिए कि आज कुछ ज्यादा हलुवा मिलेगा, कुछ अलग प्रकार की हरकतें करने लगा । सब बड़े खुश हुए तालियां बजाने लगे । अचिंत्य को लगा कि काम बन गया ।
दादी हलुवा लायीं । अचिंत्य को खिलाया जाने लगा । अचिंत्य अपनी नन्हीं जीभ निकाल निकाल कर हलुवा खाने लगा । थोड़ा हलुवा खिलाने के बाद दादी ने फिर से कहा, ' अब बस ।' अचिंत्य कुछ ज्यादा खाना चाहता था । रोने लगा । हाथ पांव कुछ ज्यादा तेजी से फेंकने लगा । एक बार फिर मां ने दुलारा, मौसी ने अच्ची मेरा प्यार गीत सुनाया । पर किसी ने ज्यादा हलुवा नहीं दिया । फिर उसे बुआ की कहानियों से ही बहल जाना पड़ा ।
अचिंत्य समझ गया कि वह लाख कोशिश करे, उसे जरूरत से ज्यादा हलुवा नहीं मिलेगा । उसके लिये जितना उचित है, दादी उतना ही हलुवा खिलायेंगी । इसलिए अब भी वह चीखता-चिल्लाता और हाथ पांव फेंकता जरूर था । क्योंकि, वह जानता था कि इससे हलुवा तो नहीं मिलेगा लेकिन मां का अतिरिक्त दुलार । मौसी का प्यार भरा गीत । और बुआ की नयी नयी कहानियां सुनने को जरूर मिल जायेंगी ।
राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल
सी-1/120, विष्वास खण्ड-1,
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मोबाइल 9451896553
rajendrakandpal@gmail.com

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