राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल
दादी ने कहा,' अचिंत्य के सेब का हलुवा खाने का समय हो चुका है । मैं बनाये लाती हूं ।'
अचिंत्य
छह महीने का हो चुका था । उसके निचले जबड़े में आगे के दो दांत निकल आये थे
। उसका अन्नप्राशन भी हो गया था । अब वह कुछ खा सकता था । जब उसे पहली बार
मां के दूध के अलावा अन्न खिलाया गया, तो उसे बड़ा अच्छा लगा था । उसने सब
स्वाद ले लेकर खाया था । खूब हाथ पैर चलाये थे ।
दादी ने सेब का
हलुवा खिलाया । अचिंत्य को बड़ा मजा आया । वह कुछ ज्यादा खाना चाहता था । पर
दादी ने कहा, ' अब बस । बहुत हो गया । तुझे बदहजमी हो जायेगी ।'
अचिंत्य
को कुछ समझ में नहीं आया । जो समझ में आया, वह यह था कि दादी उसे और हलुवा
देना नहीं चाहती थी । वह चीखने चिल्लाने लगा । दादी नहीं मानी । अचिंत्य
चीख चिल्ला कर थक गया । सोचने लगा अब क्या करे ।
उसने इधर उधर देखा
। सभी लोग थे । मां, मौसी, बुआ, आदि आदि । वह मां को देख मुस्कराया । मां
ने प्यार से कहा,' मेरा अच्ची ।' इतना कह कर मां अपने काम पर लग गयी । पर
अचिंत्य को हलुवा नहीं मिला ।
अब अचिंत्य मौसी की तरफ घूमा । मौसी
निहाल हो गयी । गोद में उठा कर बोली,' अच्ची मेरा प्यारा, मम्मी का दुलारा ।
' यह गीत वह कई बार दोहराती रही । पर अचिंत्य को हलुवा नहीं दिलाया ।
अचिंत्य मौसी के बार बार एक ही लाइन दोहराये जाने से बोर हो गया । कितनी
देर तक मुस्कान बिखेरता रहता । बिना हलुवा के मुस्कान भी चेहरे पर कहां आती
है । इसलिए अचिंत्य ने मौसी के बाल नोच लिये । मौसी प्यार से चीखने लगी ।
अचिंत्य मुंह बिगाड़ कर रोने लगा ।
यह देख कर बुआ दौड़ी आयी ।
अचिंत्य को गोद में ले लिया । अचिंत्य को लगा बुआ हलुवा दिला सकती है । वह
उन्हें देख कर मुस्कराने लगा । बुआ निहाल हो गयी । अचिंत्य को गले से लगा
लिया । अचिंत्य को भी अच्छा लगा । वह बुआ बुआ बुदबुदाने लगा । बुआ को और
प्यार आ गया । इसके बावजूद अचिंत्य को हलुवा नहीं मिला । पर बुआ कहानी
सुनाने लगीं । परियों की कहानी । शैतान बच्चे की कहानी । बाजार में घूमने
की कहानी । हालांकि, अचिंत्य हलुवा खाना चाहता था । पर बुआ की कहानियां उसे
अच्छी लग रही थीं । वह बहल गया ।
दोपहर में दादी ने दूध में केला
मिला कर खिलाया । यह भी अचिंत्य को बड़ा अच्छा लगा । अचिंत्य को इस बार भर
पेट खिलाया गया । अचिंत्य को मजा आया । वह सो गया । शाम को उसे दाल का रस
पिलाया गया । यह स्वाद उसके लिए नया था । सो उसने इसका भी खूब मजा लिया ।
फिर अचिंत्य मां का दूध पीता पीता न जाने कब सो गया ।
दूसरे दिन जब
अचिंत्य की आंख खुली, उसे भूख लग रही थी । मां तुरन्त आ गयी । उसे दूध
पिलाया । अचिंत्य को मां का दूध सबसे ज्यादा अच्छा लगता था । उसने जम कर
दूध पिया । दूध पीते पीते न जाने कब उसे नींद आ गयी ।
नींद खुली तो
दादी सेब का हलुवा तैयार कर रही थीं । अचिंत्य की नाक में उसकी खुशबू
पहुंच रही थी । वह हाथ पैर फेंकने लगा । सब दौड़े चले आये । अचिंत्य की बाल
सुलभ हरकतों का मजा लेने लगे । अचिंत्य उन्हें खुश करने के लिए कि आज कुछ
ज्यादा हलुवा मिलेगा, कुछ अलग प्रकार की हरकतें करने लगा । सब बड़े खुश हुए
तालियां बजाने लगे । अचिंत्य को लगा कि काम बन गया ।
दादी हलुवा
लायीं । अचिंत्य को खिलाया जाने लगा । अचिंत्य अपनी नन्हीं जीभ निकाल निकाल
कर हलुवा खाने लगा । थोड़ा हलुवा खिलाने के बाद दादी ने फिर से कहा, ' अब
बस ।' अचिंत्य कुछ ज्यादा खाना चाहता था । रोने लगा । हाथ पांव कुछ ज्यादा
तेजी से फेंकने लगा । एक बार फिर मां ने दुलारा, मौसी ने अच्ची मेरा प्यार
गीत सुनाया । पर किसी ने ज्यादा हलुवा नहीं दिया । फिर उसे बुआ की कहानियों
से ही बहल जाना पड़ा ।
अचिंत्य समझ गया कि वह लाख कोशिश करे, उसे
जरूरत से ज्यादा हलुवा नहीं मिलेगा । उसके लिये जितना उचित है, दादी उतना
ही हलुवा खिलायेंगी । इसलिए अब भी वह चीखता-चिल्लाता और हाथ पांव फेंकता
जरूर था । क्योंकि, वह जानता था कि इससे हलुवा तो नहीं मिलेगा लेकिन मां का
अतिरिक्त दुलार । मौसी का प्यार भरा गीत । और बुआ की नयी नयी कहानियां
सुनने को जरूर मिल जायेंगी ।
राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल
सी-1/120, विष्वास खण्ड-1,
गोमतीनगर, लखनऊ-226010
मोबाइल 9451896553
rajendrakandpal@gmail.com
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