इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

शनिवार, 27 मई 2023

रिश्ते नातों में ...

बलविंदर

रिश्ते नातों में सर्वोत्तम प्यार होती लड़कियां।
घर की सुष्मा के लिए सत्कार होती लड़कियां।
अब तो अपने दायित्व पर सागरों की सतह पर,
आर होती लड़कियां और पार होती लड़कियां।
चमन को फिर खूबसूरत जिंदगी हैं बख्शतीं,
पतझड़ों की फसल में इकरार होती लड़कियां।
अगर चाहें तो तख्¸त ओ ताज तक भी रौंद दें,
जुल्म अत्याचार में तलवार होती लड़कियां।
शोख,चंचल प्यार और इतबार का मिश्रण भी है,
रेशमी धागे की इक दीवार होती लड़कियां।
मालियों के प्यार में आयु के लम्बे सफर में,
खिल रहे फूलों का इक गुलज़ार होती लड़कियां।
चांद तारों के ऊपर जाती हैं ज्ञान विज्ञान से,
धरती और खागोल के जब पार होती लड़कियां।
सिर्फ सूई मुई नहीं हैं जिंदगी की शाख पर,
बदसलूकी में तो तीखे खार होती लड़कियां।
जब कभी मुश्किल बने तो परख कर के देख लो,
करनी कथनी में सदा दिलदार होती लड़कियां।
पौ फुटाले में जैसे जन्नत दिखे है दूर तक,
इस तरह इन्सान का दीदार होती लड़कियां।
देश की सरहद ऊपर पहरा देती हैं रात दिन,
शेर जैसी गरज की ललकार होती लड़कियां।
मायके ससुराल के लिए मान और सम्मान है,
पर पति के प्यार में श्रृंगार होती लड़कियां।
जिंदगी खुशहालियों के ताज है फिर पहनती,
फुट रहे जब निर्झरों का हार होती लड़कियां।
डूब जाती कश्तियों को पार कर ले जाती हैं,
सागरों के बीच खेवनहार होती लड़कियां।
आन होती शान होती मान होती हैं सदा,
शुभ मंगल शुभ शगुन बंदनवार होती लड़कियां।
जिगर का टुकड़ा, सदा अभिभावकों के वास्ते,
मुख का पेड़ा मक्खनी,कंचनार होती लड़कियां।
पीढ़ियों का अस्तित्व इन से ही है संसार में,
इसलिए संसार में संसार होती लड़कियां।
देश की हर चीज बालम इन से ही खुशहाल है,
वक्त का किरदार सभ्याचार होती लड़कियां।

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