बलविन्दर ‘बालम’ गुरदासपुर
चार दानव घरों को जलाते रहे ।
लोग आते रहे लोग जाते रहे ।
इस अदालत के मुनसिफ तो बहरे बने,
लोग फरियाद अपनी सुनाते रहे ।
धर्म वाले यहां धर्म की आग को,
खुद लगाते रहे खुद बुझाते रहे ।
लोग भोले न थे लोग नादां न थे,
आग रूई में रख कर छुपाते रहे ।
कुछ थे जिन की फितरत में धोखे लिखे,
कुछ ज़माने को उंगली लगाते रहे ।
जब भी मौका मिला उम्र की राह में,
खुद भी संभले, गिरे को उठाते रहे ।
ज़िंदगी में अगर वेवफा मिल गया,
दूर रह कर भी उन से निभाते रहे ।
ज़िंदगी क्या हैघ् हम से कोई सीख ले,
चोट खा कर भी हम मुस्कुराते रहे ।
ज़िंदगी गीत के बिन हमें है मिली,
फिर भी ‘बालम’ इसे गुनगुनाते रहे ।
ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब)
मोबाईल: 9815625409
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