महेन्द्र राठौर
मेरी नज़र की धूप तो पहुंची किसी तरह
बरसों की जमी बर्फ तो पिघली किसी तरह
मुमकिन नहीं था खोलना अपनी ज़बान का
नज़रों से दिल की बात तो पहुंची किसी तरह
आने से उनके रूह को राहत हुई नसीब
मुश्किल से दिल में जान तो आयी किसी तरह
मिलने का उनसे शौक सताता है रात दिन
गर्दिश हमारे सर से ये टलती किसी तरह
आती न याद उनके सहारों की आज भी
लग्जिश हमारी हमसे संभलती किसी तरह
लहरों का तकाज़ा है किनारे पे रहें हम
कश्ती हमारी पार उतरती किसी तरह
उनकी हयात हमने संवारी है हां मगर
अपनी ये ज़िंदगी भी संवरती किसी तरह
बरसों की जमी बर्फ तो पिघली किसी तरह
मुमकिन नहीं था खोलना अपनी ज़बान का
नज़रों से दिल की बात तो पहुंची किसी तरह
आने से उनके रूह को राहत हुई नसीब
मुश्किल से दिल में जान तो आयी किसी तरह
मिलने का उनसे शौक सताता है रात दिन
गर्दिश हमारे सर से ये टलती किसी तरह
आती न याद उनके सहारों की आज भी
लग्जिश हमारी हमसे संभलती किसी तरह
लहरों का तकाज़ा है किनारे पे रहें हम
कश्ती हमारी पार उतरती किसी तरह
उनकी हयात हमने संवारी है हां मगर
अपनी ये ज़िंदगी भी संवरती किसी तरह
अपने ख्यालों ख्¸वाब से ख़ुद दूर कर दिया
मेरे जिगर के जख्¸म को नासूर कर दिया
समझा न दिल की बात लबों के बयान से
शीशा समझ के उसने मुझे चूर कर दिया
गुज़री है मेरे दिल पे क्या कुछ न पूछिए
जब इल्तजा वो मेरी नामंजूर कर दिया
मेरा तो काम है कि सितम उसके मैं सहूँ
ये ना बताऊं क्यूं मुझे रंजूर कर दिया
तारीफ़ क्या सुनेगा वो लफ़्ज़ों बयान से
उसको तो आइने ने ही मगरूर कर दिया
ये भी सितम है मुझपे मेरे ग़मगुसार का
दीवाना अपने नाम से मशहूर कर दिया
हैरां हूं उसकी आंख में मैं देखकर नमी
शायद मेरे ग़म ने उसे रंजूर कर दिया
मेरे जिगर के जख्¸म को नासूर कर दिया
समझा न दिल की बात लबों के बयान से
शीशा समझ के उसने मुझे चूर कर दिया
गुज़री है मेरे दिल पे क्या कुछ न पूछिए
जब इल्तजा वो मेरी नामंजूर कर दिया
मेरा तो काम है कि सितम उसके मैं सहूँ
ये ना बताऊं क्यूं मुझे रंजूर कर दिया
तारीफ़ क्या सुनेगा वो लफ़्ज़ों बयान से
उसको तो आइने ने ही मगरूर कर दिया
ये भी सितम है मुझपे मेरे ग़मगुसार का
दीवाना अपने नाम से मशहूर कर दिया
हैरां हूं उसकी आंख में मैं देखकर नमी
शायद मेरे ग़म ने उसे रंजूर कर दिया
जांजगीर (छ.ग.)
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