बुधवार, 18 अगस्त 2021

सपने का भी एक सपना होता है : गांधी चौक

( आनंद कश्यप के उपन्यास 'गांधी चौक' की समीक्षा ) 
                 
        यशपाल जंघेल

          साहित्य, जीवन की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है। जीवन की आशा, निराशा, आकांक्षा, द्वंद्व, संघर्ष, जिजीविषा, हर्ष, विषाद विविध भावों की अभिव्यंजना साहित्य में होती है। साहित्य का जीवन से जुड़ाव उसे कालजयी बनाता है। साहित्य एक ओर तो जीवन से प्रभावित होता है, दूसरी ओर वह जीवन को प्रभावित भी करता। यही साहित्य की ताकत है। इसी को लक्ष्य करके मुक्तिबोध लिखते हैं - 'साहित्य जीवन से उपजता है और अंततः उसका प्रभाव जीवन पर ही होता है।'1  हमारे जीवन में, या परिवेश में कुछ ऐसा घटित होता है, जिसे हम अभिव्यक्त करने के लिए व्याकुल हो उठते हैं । साहित्य शब्दों के माध्यम से इसे व्यक्त करने का हमें अवसर प्रदान करता है
            अगर हिंदी साहित्य की बात की जाए, तो स्वातंत्र्योत्तर काल में उपन्यासों ने महाकाव्यों का स्थान ले लिया है। यह युग की मांग भी है। गद्य की स्वच्छंद भाषा विविध भावों के प्रतिपादन का समुचित अवसर प्रदान करती है। वहीं महाकाव्य में अंत्यानुप्रास की अनिवार्यता भावों के प्रतिपादन में बाधा उत्पन्न करती है।
             इधर के वर्षों में उपन्यासकारों की संख्या बढ़ी है। प्रतिवर्ष सैकड़ों उपन्यास लिखे जा रहे हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश काल के गर्त में समा जा रहे हैं। दो-चार उपन्यास ही ऐसे होते हैं, जिनकी चर्चा साहित्य और पाठक-जगत में लंबे समय तक होती रहती है। इसीलिए हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को कहना पड़ा  - '  दुर्वार काल-स्रोत सबको बहा देगा। सुनहले अक्षरों में छपी हुई पोथियाँ उस स्रोत के थपेड़ों को बरदाश्त करने की शक्ति नहीं रखतीं। वही बचेगा, जिसे मनुष्य के हृदय में आश्रय प्राप्त होगा।'2
          युवा उपन्यासकार आनंद कश्यप का सद्य प्रकाशित उपन्यास 'गांधी चौक' काल के गर्त में समाता है या काल को मात देकर समय की पीठ पर कितना गहरा निशान छोड़ता है यह भविष्य की बात है, लेकिन एक सामान्य पाठक होने के नाते हम इसके सामान्य गुण-दोषों की चर्चा तो कर ही सकते हैं। आनंद कश्यप जी ने जिस जीवन को जिया है, जिस यथार्थ को भोगा है, उसे ही अपने उपन्यास का  विषय बनाया है। स्वानुभूति ही उपन्यास को विश्वसनीय बनाती है। प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना लेकर बिलासपुर आने वाले युवाओं के जीवन का प्रमाणिक दस्तावेज है - उपन्यास 'गांधी चौक'। गांधी चौक के प्रमुख पात्र सूर्यकांत, नीलिमा, भीष्म, अश्वनी के जीवन का संघर्ष मूलतः उपन्यासकार का जीवन संघर्ष है। यह संघर्ष केवल एक व्यक्ति का ही संघर्ष नहीं है, अपितु पूरे समाज का संघर्ष है। यह उपन्यास केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवकों का  संघर्ष नहीं है, यह बलभद्र सिंह जैसे तानाशाहों के पंजे से मुक्ति के लिए छटपटाते हुए गांवों का संघर्ष है, सामाजिक रूढ़ियों और थोथी नैतिकता के विरुद्ध प्रज्ञा जैसी स्त्री का एक नहीं, बल्कि दो मोर्चों पर संघर्ष है, भूख और बेकारी की यातना झेलने वाले खेतिहर मजदूर का संघर्ष है, नौकरी के अभाव में अपने ही घर में उपेक्षित व्यक्ति का संघर्ष है,  उत्तर-आधुनिक समय में अर्थ पर टिके रिश्तों के विरुद्ध मानवीय संवेदना का संघर्ष है ।
         ग्लोबल समय में स्थानीयता ( लोकल टच ) की उपेक्षा आश्चर्य की बात नहीं है, जीवन में भी और साहित्य में भी। सार्वभौमिकता के साथ-साथ लोक-चेतना की गहरी पकड़ एक साहित्यकार के लिए आवश्यक है। बाजारवाद के इस दौर में साहित्य में स्थानीयता, जिसे रामचंद्र शुक्ल ने 'दृश्यों की स्थानगत विशेषता' कही है,3 का रंग फीका पड़ता जा रहा है। इस मामले में यह उपन्यास हमें आश्वस्त करता है। पूरे उपन्यास में छत्तीसगढ़ी लोक-संस्कृति के तत्वों का जीवंत समावेश हुआ है। खानपान, रहन-सहन, तीज-त्यौहार, भाषा-बोली में स्थानीयता की रंगत देखी जा सकती है। खानपान में कोचई, खेड़हा भाजी, चरपनिया भाजी, लाल भाजी, जिमी कांदा, ईड़हर, गोंदली, जैसी सब्जियों का प्रयोग उपन्यास को समृद्ध बनाता है। थके-मांदे, गोरा-नारा, लतखोर जैसे विशेषण, सूरज का छत्तीसगढ़ी रूप 'सुरुज' और स्थानीयता की चाशनी में डूबे हुए शब्द जैसे छुईया तालाब, पचरी एवं ठेठ छत्तीसगढ़ी शब्द जैसे 'कथरी' उपन्यास की स्वाभाविकता और विश्वसनीयता को बढ़ाते हैं।
         कुछ अवसरों पर विशेषकर ग्रामीण पात्रों द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा में संवाद भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है। भोजपुरी क्षेत्र के लेखक जब हिंदी में लिखता है, तो उसके पात्र भोजपुरी में बात करते हैं,  राजस्थान के लेखक के पात्र राजस्थानी में, मैथिली क्षेत्र के लेखक के पात्र मैथिली में बात करते हैं, तो जाहिर सी बात है, कि छत्तीसगढ़ के लेखक के पात्र छत्तीसगढ़ी में बात क्यों नहीं करते? यह प्रश्न मुझ जैसे पाठको को अवश्य परेशान करता है। स्थानीय भाषा के प्रति इधर के वर्षों में लेखकों में एक नई चेतना आई है। उर्मिला शुक्ल की हिंदी कहानियों में छत्तीसगढ़ी भाषा का पुट मिलता है। क्षेत्रीय भाषाओं के रंगों से हिंदी फीकी नहीं होती, बल्कि और समृद्ध असरदार, संप्रेषणीय बनती है। बोलियों से हिंदी को एक नई ऊर्जा मिलती है। राजेंद्र उपाध्याय को दिए एक साक्षात्कार में केदारनाथ सिंह कहते हैं - 'बोली से शक्ति लेना हमारी अनिवार्यता है। बोलियाँ हमारी प्राण-शक्ति है। उसमें उर्जा बची हुई है। वह जनता की टकसाल से बन रही बोलियां है। वे हमारे काम की हैं। बोलियां अपरिहार्य हैं। '4 भीष्म के परिवारवालों का परिचय देते हुए उपन्यासकार लिखते हैं - 'मायके से लगाव उसके (मलिका, भीष्म की भाभी ) चेहरे की खुशी से पता चल जाता है। मायके का काला कुत्ता भी उसे अपना लगता है।'5  छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है - 'मइके के  करिया कुकुर अमोल'। इस मुहावरे का सटीक उपयोग मलिका के व्यवहार के संदर्भ में हुआ है । एक ओर 'गांधी चौक' की भाषा स्थानीय बोली से संपृक्त है, वहीं दूसरी ओर वह बोलचाल और सामान्य व्यवहार की भाषा से मेल खाती है। इस उपन्यास को पढ़ने के लिए हमें शब्दकोश लेकर बैठना नहीं पड़ेगा। अत्यंत ही सरल, सहज, बोधगम्य भाषा का प्रयोग हुआ है। इसके पात्र और उनकी भाषा सामान्य जन-जीवन से ही लिए गए हैं।
         इसकी भाषा की एक और विशेषता - इसका 'फिल्मीपन' है। यह उपन्यास फिल्मों से आक्रांत दिखलाई देता है। पात्रों की भाषा बहुत कुछ फिल्मीपन लिए हुई है, घटनाएं भी फिल्मों से प्रभावित है । पात्रों की तुलना बॉलीवुड के हीरो से कई बार की गई है। यही विशेषता इसकी सीमा भी बन जाती है। विशेषता इस अर्थ में कि युवाओं में इस उपन्यास के लोकप्रिय होने की प्रबल संभावना है और सीमा इस अर्थ में कि साहित्य के गंभीर पाठकों को इसकी हल्की-फुल्की या फ़िल्मी भाषा के कारण संतोष नहीं मिल सकता। आश्चर्य नहीं कि भविष्य में इस उपन्यास को लेकर कोई फिल्म बनें। प्रेम को 'इश्केरिया'  कहना, प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट आने पर रिजल्ट देखने वाली भीड़ की तुलना अमिताभ बच्चन की किसी फिल्म में लगने वाली भीड़ से करना जैसे अनेक उदाहरण है। उपन्यास एक अंश उद्धृत करना चाहूंगा - 'इतनी गाड़ियों का काफिला देखकर लोगों की भीड़ बढ़ गई। लग रहा था मानो सलमान खान की फिल्म की शूटिंग चल रही हो। योगानंद भी क्या सलमान खान से कम थे। वे भी एक बार जो कमिटमेंट कर देते थे, फिर अपने आप की भी नहीं सुनते थे।'6 उपन्यासकार आनंद कश्यप जी फिल्म के क्षेत्र में भी अच्छे काम कर सकते हैं। 
         साहित्य की किसी भी विधा में जो नहीं कहा गया है, या जिसे अप्रत्यक्ष रूप में कहा गया है, वह भी महत्वपूर्ण होता है। वैसे तो पूरा उपन्यास अभिधात्मक शैली में ही लिखा गया है, लेकिन कुछ ऐसे स्थल हैं, जहां प्रतीक के रूप में भावों को व्यक्त किया गया है। भीष्म अपने दोस्त अश्वनी को लेकर अपने गांव गए हुए थे। वे दोनों  तालाब में नहाने के लिए जाते हैं। लेखक के शब्दों में - 'तालाब के बीच कमल भी खिले थे। अश्वनी तैरते-तैरते कमल के फूल को ले आया। भीष्म भी अश्वनी को देखकर कमल के फूलों के पास पहुंच जाता है।'7 यह अंश पढ़कर हमें सहसा मुक्तिबोध याद आ जाते हैं - ' तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब / पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार / तब कहीं देखने को मिलेंगी बाँहें / जिनमें कि प्रतिपल काँपता रहता / अरुण कमल एक।' गांधी चौक में भीष्म के गांव के तालाब का यह कमल सिविल सर्विस का सुंदर प्रतीक बन जाता है।
         आनंद कश्यप ने अपने जीवन का एक अहम हिस्सा प्रतियोगी परीक्षार्थी के रूप में बिताया है। अपने छात्र जीवन के संघर्षों के महासागर में लेखक ने बार-बार डुबकी लगाई है, सतह पर नहीं, गहराई में। वहां मिले अनुभवों के मोतियों को शब्दों के धागों में पिरोकर उन्होंने 'गांधी चौक' नामक एक खूबसूरत माला तैयार की है। ऐसी माला जिसको फेरकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राएं सिविल सर्विस के भगवान को खुश कर सकते हैं। उपन्यास में प्रतियोगी छात्र के मन में चलने वाले अंतर्द्वंद को सफलतापूर्वक चित्रित किया गया है। परीक्षार्थी को किस तरह से पढ़ना चाहिए? तथ्यों को याद करने के लिए कौन सी ट्रिक अपनानी चाहिए? परीक्षा-पूर्व की रात्रि को ज्यादा देर तक जगना चाहिए या नहीं? अपने मन को एकाग्र रखने के लिए क्या करना चाहिए? इन सभी सवालों के जवाब हमें उपन्यास में मिलते हैं। इसे उपन्यास के साथ-साथ परीक्षार्थियों के लिए तैयार की गई परीक्षा निर्देशिका भी कह सकते है। उपन्यास में कई जगहों पर सरकारी अमलों और शासन-प्रशासन की कमियों पर प्रहार करने के लिए व्यंग्य का सहारा लेने का प्रयास किया गया है। लेकिन यह प्रयास हास्य के स्तर तक ही रह गया है, व्यंग्य के स्तर को छू नहीं पाया है। यदि एक कवि या लेखक को अपनी रचना के माध्यम से व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करना है, तो उसे अपनी भाषा में बरते जाने वाले शब्दों के प्रयोग प्रति विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है। अगर ऐसा नहीं है, तो भाषा के लाउड होने का खतरा हमेशा बना रहता है। कभी-कभी यह नारेबाजी के स्तर को भी पार कर जाता है। इस उपन्यास में यह बार-बार हुआ है। उपन्यास में घटनाओं की जगह अगर लेखक ही ज्यादा बात करने लगे, तो उपन्यास-कला को आघात पहुंचता है। एक उदाहरण देखिए - 'ट्रेन का सही समय पर पहुंचना एक चमत्कार ही था। शायद आज ट्रेन को सही समय पर पहुंचाने के लिए ड्राइवर पर जुर्माना जरूर लगा होगा। शायद ट्रेन चालक ने भगवान शंकर के महाप्रसाद (भांग)को ग्रहण करके यह चमत्कार किया होगा। '8
          उपन्यास में घटित कुछ घटनाएं बिल्कुल अस्वाभाविक लगती हैं। एक दिन सूर्यकांत और उसके मित्र राजा अचानकमार जंगल के 'अनाया रिजॉर्ट'  में पार्टी करने जाते हैं। रात को दोनों दोस्त घूमने के लिए जंगल चले जाते हैं। सूर्यकांत ने गाड़ी में जानवरों के शिकार के लिए बंदूक रखी थी। लेखक के ही शब्दों में - 'अचानकमार का घना जंगल रात को बहुत डरावना लगता है। चारों ओर शांति थी। केवल मेंढकों और झींगुरों की आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। ..... वनभैंसों के क्रॉस होते ही वे आगे बढ़े। आगे उन्हें एक जगह हिरण पसरे दिखाई दिए। वे निश्चिंत होकर बैठे थे। तभी सूर्यकांत ने पीछे की सीट से बंदूक निकाल कर गोली चला दी।'9  पत्ते की एक हल्की आहट से चौकड़ी भरने वाले हिरणों को रात्रि के सन्नाटे में गाड़ी की आवाज न सुनाई देना अस्वाभाविक लगता है। अगर मान लेते हैं गाड़ी बंद थी, तो यह सवाल उठता है, कि सूर्यकांत और राजा की नजर हिरणों पर कैसे पड़ी? क्या उन्हें संजय की तरह दिव्य-दृष्टि मिली हुई थी? क्या हिरणों ने अपने कानों में ईयर-फोन लगाकर पॉप-म्युजिक सुन रहे थे। प्रश्न अनसुलझा ही रह जाता है और कहानी आगे बढ़ती है। उपन्यास के प्रथम अध्याय - 'सपनों का बीज' में लेखक बताते हैं, कि समयलाल अपने बेटे अश्वनी के साथ बहुत मारपीट करता है। एक दिन गाँव के जमीदार बलभद्र सिंह से बहस हो जाने के कारण समयलाल को काम से निकाल दिया गया। भुखमरी और गरीबी के कारण वे हमेशा तनाव में रहते थे। अपने दोनों बच्चों ( अश्वनी की एक बहन भी थी -  माया ) को पालने की चिंता में वे दिन-रात घुलते रहते थे। 'एक बार समयलाल की सारी चिंताओं का गुस्सा अश्वनी पर उतरा और रात भर उसकी खाल उधेड़ी गई। सवेरे वह कराह रहा था। पीठ पर बेल्ट के निशान थे। उस पर खून के धब्बे स्पष्ट दिख रहे थे।'10 दूसरे दिन काम न मिलने के कारण समयलाल बहुत उदास था, तब उसे देवदूत की तरह उसके बचपन का मित्र चंगूलाल मिल गया। चंगूलाल आला दर्जे का पियक्कड़ था। चंगूलाल मित्रधर्म का पालन करते हुए जमीदार बलभद्र सिंह से सिफारिश करता है, कि उसके मित्र को काम पर वापस रख लिया जाए। इस कार्य में वह सफल हो जाता है। समयलाल अपने मित्र के प्रति कृतज्ञता से भर जाता है। इस खुशी के मौके दोनों मित्र शराब पीते हैं। समयलाल उस दिन जीवन में पहली बार शराब पीता है। वह अपने बेटे अश्वनी की पढ़ाई की बात चंगूलाल को बताता है। चंगूलाल पढ़ाई के महत्व पर एक जबरदस्त खौलता हुआ भाषण दे डालता है। उसे सुनकर समयलाल की दिमाग की बत्ती जल जाती है और वह चंगूलाल को दार्शनिक की उपाधि दे देता है। इस पर चंगूलाल कहता है  - तू भी रोज एक देसी मार लिया कर, फिर देखना मेरी तरह तू भी दार्शनिक बन जाएगा'  और सचमुच पउवा मारने के कुछ क्षण पश्चात समयलाल के हृदय में प्रेम, स्नेह और वात्सल्य का सोता फूट पड़ता है। रोज अश्वनी के साथ मारपीट करने वाला समयलाल उस दिन घर जाकर उसके सिरहाने बैठ जाता है और उसके सिर को सहलाने लगता है। अश्वनी को भी उस जादुई टॉनिक के प्रभाव को स्वीकार करना पड़ता है - 'यदि शराब पीने से किसी को बाबूजी का प्यार मिले तो कोई बुराई नहीं।'11 शराब के महत्व पर लेखक  'मेहनतकश' नामक अध्याय में लिखते हैं - 'राजा के रूम में बिस्तर के नीचे एक पेटी थी जिसमें वह शराब छुपा कर रखता था। शाम होते ही वह नीलिमा के वहां से हटने का इंतजार करता रहता था। जैसे ही राजा को मौका मिलता, उसमें से एक-दो पैग लगाकर चुपचाप पढ़ने बैठ जाता था। पीने के बाद उसका दिमाग दुगना काम करने लगता था। उस समय वह चाचा चौधरी के दिमाग को भी मात दे सकता था।12 ऐसा लगता है कि शराब, शराब न होकर कोई ज्ञानवर्धक टॉनिक है, जिसके पीते ही राजा और समयलाल के ज्ञान-चक्षु खुल जाते हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ राज्य शराब पीने वालों के मामले में पूरे देश में प्रथम स्थान पर है। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में हमारे प्रदेश में दार्शनिकों और विद्वानों की एक बड़ी फ़ौज खड़ी हो जाए।
         कहीं-कहीं लेखक के विचारों में विरोधाभास भी दिखाई देता है। प्रेम के बारे में अपनी राय रखते हुए वे उपन्यास के पृष्ठ 14 में लिखते हैं - 'उस समय प्रेम आंखों आंखों में हुआ करता था। लेकिन अब प्रेम लड़की की आंख और लड़के की जेब के बीच होता है।' फिर पृष्ठ 93 में वे लिखते हैं - 'इस जमाने में सब समझदार हैं। प्रेम के महत्व को समझने वालों की संख्या बढ़ी है।' आश्चर्य होता है कि उपन्यास के केवल 79 पृष्ठ लिखते-लिखते लेखक के लिए दुनिया इतनी जल्दी कैसे बदल जाती है ? या प्रेम के प्रति लेखक का दृष्टिकोण कैसे बदल जाता है ?
            अंतिम अध्याय 'संबंधों का प्रोटोकॉल' उपन्यास का प्रक्षिप्त अंश जान पड़ता है। उपन्यासकार 'धड़कनों का स्पंदन' नामक अध्याय में सफलतापूर्वक उपन्यास को समाप्त कर चुके थे। संघर्षरत लगभग सभी पात्र सफलता प्राप्त कर चुके थे। सूर्यकांत तथा नीलिमा का फिल्मी स्टाइल में मिलन हो चुका था। अंतिम अध्याय को लिखने में मुझे उपन्यासकार का एक ही औचित्य जान पड़ता है, वह है - 'अपने विचारों को समाज तक, शासन तक पहुंचाना।' तब यह सवाल उठना लाजमी है, कि लेखक पूरी कहानी लिखने तक कर क्या रहे थे? ज्ञापननुमा यह अध्याय उपन्यास की चमक को धूमिल करता है। उपदेशात्मक शैली में लिखा गया उपन्यास का यह अंश नीरस और बेतुका सा लगता है। साहित्यकार को अपने अनुभूत यथार्थ के साथ  कल्पना का मिश्रण करके पाठक के मन में एक नया भाव-बोध जागृत करना होता है। यथार्थ, कल्पना और भाव के माध्यम से लेखक को अपने विचार पाठकों तक संप्रेषित करना होता है। अगर ऐसा न करके वहा केवल अपने विचार ही रखते जाएं और वह भी उपदेशपरक शैली में, तो पाठकों का ऊब जाना स्वाभाविक है। यह होना चाहिए! यह नहीं होना चाहिए! यह करना चाहिए! यह नहीं करना चाहिए! इस तरह की भाषा साहित्य-कला को आघात पहुंचाती है। हाँ, इससे भाषण-कला में अवश्य निखार आ सकता है। लेकिन यह समझना भी जरूरी चाहिए कि साहित्य-कला और भाषण-कला में स्थूल अंतर है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहा भी है - 'सदा सत्य बोलो', 'दूसरों की भलाई करो', 'क्षमा करना सीखो' - ऐसे-ऐसे सिद्धांत वाक्य किसी को बार-बार बकते सुन वैसा ही क्रोध आता है जैसे किसी बेहूदे की बात सुनकर। जो इस प्रकार की बातें करता चला जाय उससे चट कहना चाहिए - 'बस चुप रहो, तुम्हें बोलने की तमीज नहीं, तुम बच्चों या कोल-भीलों के पास जाओ। यह बातें हम पहले से जानते हैं। मानव-जीवन के बीच हम इसके सौंदर्य का विकास देखना चाहते हैं। यदि तुम्हें दिखाने की प्रतिभा या शक्ति हो तो दिखाओ, नहीं तो चुपचाप अपना रास्ता लो।'13
          अपनी तमाम कमियों के बावजूद ' गांधी चौक' उपन्यास के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। इसमें कमी है, तो गुण भी है। अंधेरे के धब्बे हैं, तो  उजाले की रेखाएँ भी हैं। शिल्प की अनगढ़ता है, तो भावों का उदात्त स्वरूप भी है। कीचड़ है, तो पुष्प भी है। वैसे कोई भी कृति पूर्णतः निर्दोष नहीं हो सकती। जब मनुष्य ही अपूर्ण है, तो उसके द्वारा रची हुई कृति कैसे पूर्ण हो सकती है? आनंद कश्यप का यह प्रथम उपन्यास है। कुछ गलतियां होनी स्वाभाविक है। बावजूद इसके यह कम महत्वपूर्ण उपन्यास नहीं है। सिविल सर्विस की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए यह गीता की तरह स्तुत्य है। यह केवल छात्रों के लिए ही  नहीं, अपितु कामकाजी व्यक्तियों और बुजुर्गों के लिए भी पठनीय और संग्रहणीय उपन्यास है। इस उपन्यास को पढ़कर प्रत्येक व्यक्ति अपने छात्र जीवन को फिर से कुछ क्षण के लिए ही सही, जी सकता है। उम्मीद करते हैं, कि आनंद कश्यप जी शीघ्र ही अपना दूसरा उपन्यास लेकर हमारे बीच उपस्थित होंगे। हिंदी साहित्य के पाठकों को इसका बेसब्री से इंतजार रहेगा। 
संदर्भ ग्रंथ : -
1. मुक्तिबोध रचनावली, खंड 4,पृष्ठ 69
2. द्विवेदी हजारीप्रसाद, अशोक के फूल, लोकभारती प्रकाशन, पेपरबैक संस्करण 2013,पृष्ठ 86
3. शुक्ल रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, कमल प्रकाशन, पृष्ठ 150
4. साखी -त्रैमासिक, मास जून 2019 ( अंक 29-30 ), संपादक सदानंद शाही, पृष्ठ 568
5. कश्यप आनंद, गांधी चौक, हिंद युग्म ब्लू नोएडा ( उ. प्र. ), पहला संस्करण 2021, पृष्ठ 122
6. वही, पृष्ठ 40
7. वही, पृष्ठ 125
8. वही, पृष्ठ 106
9. वही, पृष्ठ 28-29
10. वही, पृष्ठ 12
11. वही, पृष्ठ 13
12. वही, पृष्ठ 156
13. शुक्ल रामचंद्र, चिंतामणि भाग 1, लोक भारती प्रकाशन, संस्करण 2014,पृष्ठ 20

                  *  *
               शोधार्थी, हिंदी विभाग
           दानवीर तुलाराम शासकीय  
             स्नातकोत्तर महाविद्यालय -  
                उतई जिला - दुर्ग ( छ.ग. )
                 मो. 9009910363

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