बुधवार, 18 अगस्त 2021

राजकुमार मसखरे की रचनाएं

 राजकुमार मसखरे

घपटे करिया बादर
पवन हिलोरत हे आगर,
सावन ह अधियागे
पानी गिरत नइहे काबर !
किसान ह करियागे
निचट...संसो म दुबरागे,
कर्जा ल सरेख के
अंग अंग म पीरा अमागे !
किसान के किसानी
दूभर होगे जी जिनगानी,
इतरावत ब्यपारी
नेता करत हे मनमानी !
किसान हे दाहरा म
रात-दिन खेत के पाहरा म,
मानसून के जुआ
भरोसा..ओखरे लाहरा म !
रजधानी सुलगत हे
उद्योगपति मन कुलकत हे ,
नेता जी मेछरावत 
बिच्छल होके बुलकत हे !
गिर पानी सरकार
इंकर करिया मुख ल टार,
उंखर का बिस्वाँस
हमर बाँहों भरोसा हे सार !

तँय अतेक शरीफ़ !
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तँय अतेक शरीफ़
कभू तँय दारू के
छिटका नइ लेयेस !
         रोज दरूवाहा मन के
         ओखर  खानदान  के
         तँय का का नइ कहेस !
तँय आज भी नइ पियस
येला...अपराध मानथस
रंग रंग के भासन देयेस!
            तँय अतेक के शरीफ
            दारू  के पियई छोड़
            शीशी ल नइ छुयेस !
पड़गेस चुनाव के सपड़
पेटी,पेटी अउ ड्राम ड्राम
का  नइ  जुगाड़  धरेस !
          नइ सोचेस पियंव नही
          त  पियाहूं  मँय काबर
          नाम के शरीफ बनेस !
तोर ले बने मंदहा हे
जेन  खुद  बिगड़े  हे 
तँय का...नइ करेस !
       अब  तहिं बता कोन बने
       पिअइया  के  पिलवइया
        कइसे रे  ! पापी धनेश !
पापी नही,पाप ले डर
उपर- छावा रे सिधवा 
तँय अइसे गोबर गनेस !

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