मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

अलग- अलग वैतरणी

डॉ. अखिलेश कुमार शर्मा


           एक तरफ है उपन्यास सम्राट और कथा सम्राट प्रेमचंद की कालजयी कृति ’ गोदान’ उपन्यास की कथा। तो दूसरी तरफ है लोक कथा के पुरोधा विजयदान देथा उर्फ  बिज्जी की कहानी ’ वैतरणी’। एक तरफ उपन्यास की कथा का ढाँचा है, तो दूसरी तरफ कहानी की कथा का गुंफन। ’ गोदान और वैतरणी’ की कथा एक धार पर चलती है। दोनों के कथानक में समानता खोजी जा सकती है, परंतु कथा के मूलभाव या संदेश की परिणति पर आकर दोनों अलग - अलग हो जाते हैं। यह अलग - अलग होना महज एक संयोग नहीं, वरन देशकाल वातावरण और परिस्थिति से प्रभावित विचार - संवेदना की कलम का अलग - अलग होना है।

          ’ गोदान’ प्रेमचंद का चिर अमर कीर्ति - स्तंभ। जिसमें ’ होरी’ के किसान से मजदूर हो जाने की व्यथा - कथा यथार्थ चित्रण है। होरी उपन्यास का नायक है। वह किसानों का प्रतिनिधि है। धर्म के ठेकेदारों, छोटे बड़े महाजनों और जमींदारों के जाल में उलझा हुआ मर्यादावादी किसान घिसते - घिसते मजदूर हो जाता है और पिसते - पिसते शव। संक्षेप में यही उसका जीवन है। 1 गोदान का रचनाकाल सन् 1935 - 36 का है। इस समय भारत पराधीन था। ’ गोदान’ उस पराधीन भारत और सामंतवादी युग का सच है, हकीकत है। जिसमें एक तरफ  ’ होरी’ जैसे गाँव के किसान हैं, दूसरी तरफ नगरीय सभ्यता में मिस्टर मेहता जैसे लोग हैं जो मजदूरों की हड्डी पर महल खड़ा करते हैं। और तीसरी तरफ  है जमींदारी व्यवस्था का वह अभिषाप जो किसानों को चूस - चूसकर असहाय, निर्बल और मजदूर बनने के विवष कर देता है।

          असल में बात यह है कि ’ गोदान’ में आजादी का स्वप्न है तो सहीय पर साकार नहीं हो पाता। ’ होरी’ अपनी जिंदगी में एक गाय का स्वप्न पालता है, परंतु जिंदगी में उसे साकार नहीं कर पाता। जीवन के अंतिम समय में जब होरी के प्राण अटक जाते हैं,तो पंडित दातादीन धनिया से ’ गोदान’ करने को कहता है। धनिया यंत्र की भाँति उठी। आज तो सुतली बेची थी उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली - महाराज, घर में न गाय है न बछिया, न पैसा। यही पैसे है, यही इनका गोदान है और पछाड़ खाकर गिर पड़ी। 2 बस। पछाड़ खाकर गिरना स्वप्नों का चूर- चूर होना है। जो बहुत दर्दनाक और असहनीय पीड़ा के बराबर है। प्रेमचंद का होरी अपनी जिंदगी की एकमात्र अभिलाषा गाय पालने की पूरी नहीं कर पाता और जिंदगी के आखिरी क्षण में हमारी व्यवस्था ही उससे ’ गोदान’ माँगती है और जिसे उसके घरवाले जैसे - वैसे पूरा भी करते हैं। पर प्रतिकार नहीं करते अंधी और शोषण करने वाली व्यवस्था का। प्रेमचंद ’ गोदान’ में सत्य को छिपाते नहीं। ढाँपते नहीं, वरन् अनावृत कर देते हैं। बस कसक इस बात की रह जाती है कि ताउम्र ’ होरी’ अपनी एकमात्र अभिलाषा पूरी नहीं कर पाया।

          प्रेमचंद के ’ गोदान’ के स्वप्न और होरी की अभिलाषा को पूर्ण किया विजयदान देथा ने अपनी कहानी ’ वैतरणी’ में। लेकिन बिल्कुल अलग तरीके से। ’ वैतरणी’ कहानी में एक जाट चौधरी होता है। खेतिहर चौधरी अपनी पत्नी की असमय मृत्यु के बाद अपने चारों बेटों को पालता - पोसता है। चौधरी की भी होरी की तरह मन में एक अभिलाषा होती ही है,गाय रखने - पालने की। पर वह चौधरी की तरफ से उभर कर सामने नहीं आ पाती। चौधरी का सबसे छोटा बेटा ’ होरी के बेटे गोबर’ जैसा क्रांतिकारी, आक्रोषी और स्वतंत्र भारत का चेहरा होता है। उसके सपने में आती है। बाड़े में सफेद गाय। सफेद बछिया। चारों थनों से झरती सफेद धारे। हाण्डियों में सफेद दही। अरड़- झरड़ बिलोना। घी, छाछ,राब। 3

          असल में यही एक भारतीय किसान या नागरिक की अभिलाषा होती है कि उसके घर के आँगन में गौ माता के पग हों। इस अभिलाषा को पालते - पालते ’ होरी’ मर ही जाता है, परंतु उसकी अभिलाषा पूर्ण नहीं हो पाती। ’ वैतरणी’ में चौधरी का सबसे छोटा बेटा न केवल गाय माता का स्वप्न ही देखता, वरन् घर के बाड़े में खूँटे पर गाय बाँध देता है- नाम रखा बगुली। बगुलों को भी मात करे जैसा सफेद रंग। रेशम जैसी कोमल रोमावली। छेटा मुँह। कुण्डलिया सींग। छोटे कान। छोटी दंतावली। सुहानी गलकंबल। चोंडी माकड़ी। छोटी तार। पतली लंबी पूँछ। एक सरीखे गुलाबी थन। 4 ’ होरी’ ’ वैतरणी’ में पूरी होती है। बिज्जी लोक चितेरे हैं। वे लोक के मन दिल को भाँप जाते हैं। असल में भारतीय ग्रामीण परिवेष में आज भी घर के आँगन में गाय बाँधने की अभिलाषा है, परंतु लार्ड मैकाले की शिक्षित युवा पीढ़ी, बेटी - बहू इस अभिलाषा से मुँह मोड़ रही है।

          प्रेमचंद के समय यह समस्या अलग ढँग से थी। ’ होरी’ का’ स्वप्न’  मात्र ’ स्वप्न’ ही बनकर रह जाता है। जमींदार और महाजन के लगान व कर से वह जमीन तक नहीं बचा पाता। गौ माता कहाँ से लाये और पाले। शोषण पहले भी होता था, आज भी होता है। अंतर सिर्फ इतना है कि आज शोषण का प्रतिकार, विरोध करने की व्यवस्था स्थापित सी हो गई है। यहाँ ’ स्थापित सी’ होने का मतलब है - लोकतंत्र है, कानून है, अधिकार है, पर शोषण के खिलाफ सीना ठोंककर खड़ा होने का गुर्दे वाला व्यक्ति ही नहीं हैं तो उसके लिए यह व्यवस्था मात्र ’ स्थापित सी’ ही है। जो लड़ेगा, साहस करेगा, स्वाभिमान रखेगा,उसी की ही जीत होगी।

          मरणासन्न स्थिति में गोदान कराना पंडों - पुरोहितों का धंधा है। इस बात को प्रेमचंद भी जानते थे और बिज्जी भी। पर प्रेमचंद के संस्कार विवश हो जाते है तत्कालीन सामंती व्यवस्था के आगे। और ’ होरी’ के लिए ’ गोदान’ कराते हैं धनिया के बीस आने पैसे से। और बिज्जी 3 जानते सब हैं कि पुरोहित संस्कार को हमारा समाज छोड़ नहीं पा रहा है। परंतु प्रेमचंद के ’ गोदान’ को निगलने को तैयार भी नहीं है। ’ वैतरणी’ कहानी में चौधरी का गुरू होता है - एक बाँभन। बगुली पर उसकी नजर होती है। एक दिन चौधरी बीमार पड़ गया। अंतिम समय जो आ गया। प्राण आँखों में अटक गये। बाँभन मुक्ति के लिए वहीं मौजूद। बूढ़े बाँभन ने मुक्ति के लिए पंचामृत पिलाया। अब तो घड़ी पलक की देर। बाबा के कहने पर सब ने श्रद्धा अनुसार दान पुण्य उसके कानों में डाला। किसी ने ग्यारस बोली तो किसी ने अमावस। छोटे बेटे ने पाँच हाण्डी दूध दही। किसी ने धानी गुड़ तो किसी ने मन बाजरा बोला। 5 पर इतने में भी न बाँभन खुश और न ही मुक्ति। चौधरी की साँस अटकी हुई। मुक्ति अटकी हुई। मुक्ति की आशा दृष्टि बाँभन की ओर। और बाँभन रहते गति न हो, यह हो नहीं सकता। बाँभन जोर से बोला - बगुली की पूँछ पकड़ने से चुटकियों में वैतरणी पार हो जायेगी। बगुली का दान किये बिना बाबा की मुक्ति नहीं होगी। 6 छोटे बेटे की ना - नुकर। बाँभन की जिद। वैतरणी की लहरों का झाँसा। बाबा की आँखों से झर - झर बहते आँसू। छोटा बेटा भी ’ धनिया’ की तरह परास्त। बाबा के कान में बगुली के दान का बोल। बाबा की मुक्ति।

          अगर यह कहानी यहाँ खतम हो जाती तो प्रेमचंद के समय का ’ गोदान’ हो जाता। मन मारकर। व्यवस्था से हारकर। ’ गोदान’ का यथार्थ प्रेमचंद के समय का सच था। हकीकत थी। ’ होरी’ हार गया। व्यवस्था से। चुप। मौन। शिकस्त। यह चुप्पी प्रेमचंद की चुप्पी है व्यवस्था से। गोदान में। बिज्जी देशकाल और व्यवस्था परिवर्तन से ’ गोदान’ का अगला या दूसरा भाग लिखते है ’ वैतरणी’ में। असल में यह समय बदलाव की चिंगारी का उजियारा है। बगुली का दान कान में बोलकर ’ वैतरणी’ न खतम होती है और न ही पार होती है। यह आज का सच है। इसी सच का चेहरा दिखाया बिज्जी ने लोकमानस को। धनिया की तरह पछाड़ खाकर नहीं गिरती है छोटे बेटे की घरवाली। बल्कि होश में कहती है अपने पति से - ये तो बाँभनों की बातों की वैतरणियाँ हैं। बनियों की बहियाँ भी उनका मुकाबला नहीं कर सकतीं। बगुली तो पण्डित जी के बाड़े में बँधी है। मैं रात को ही उसको लाड़ करके आई। 7

          इतना सुनने के बाद छोटा बेटा कैसे रूके? यहाँ फिर गोदान के ’ गोबर’ का प्रतिरूप दिखाई पड़ता है। छोटा बेटा बाँभन के घर जाकर बछिया और बगुली को हाँकते हुए बाँभन से बोला - ’ वैतरणी’ के पार गया बाबा वापस तो आने से रहा। अब हमें दुनिया की वैतरणी पार करनी है। बगुली के दूध के बिना वह पार नहीं होगी। खबरदार जो मेरे घर की ओर मुँह भी किया तो सीधा हरिद्वार पहुँचा दूँगा। 8

          ये तेवर, ये साहस देशकाल, वातावरण और परिस्थिति की माँग है। व्यवस्था परिवर्तन से आगे की राह है। सच जानकर चुप बैठना नहीं, बल्कि उसका सामना करना, अपना रास्ता खुद तलाशना और परदाफाष कर तमाचा जड़ना ऐसी अंध परंपराओं के मुँह पर। बाबा भी वैतरणी पार कर गए और उसके घरवाले भी। दरअसल ’ वैतरणी’ की परंपरा प्रेमचंद के समय पर भी थी, बिज्जी के समय भी। आज भी है और बनी भी रहेगी। बस तौर तरीके बदल जाएँगे। उसे पार करने के। प्रेमचंद ’ गोदान’ में लोक परंपरा के अतिशय मोह को छोड़ नहीं पाते और बिज्जी ’ वैतरणी’ की लोक परंपरा में बदलाव कर देते हैं। निर्णय की स्वतंत्रता का। कर्म की स्वतंत्रता का। अलग - अलग होकर ’ वैतरणी’ की रूढ़, जड़ और अंधविश्वासी परंपरा से।

संदर्भः.

1 हिंदी का गद्य साहित्यः डॉ. रामचंद्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन,वाराणसी, अष्टम संस्करण - 2012, पृ. 548
2 गोदान : प्रेमचंद्र पृ .361
3 पाँचवाँ स्तंभः मासिक पत्रिका, संपादक मृदुला सिन्हा,फरवरी, 2014,अंक 84 पृ .51
4 वैतरणीः चौधराइन की चतुराई, विजयदान देथा, वाणी प्रकाशन, 2007, पृ .8
5 वही : पृष्ठ .10, वही : पृष्ठ .10,वही : पृष्ठ .11,वही : पृष्ठ .11

लेखक परिचय

राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर से पीएचडी की उपाधि प्राप्त। ’ कलम करे अभिषेक’ कविता संग्रह, अर्चना प्रकाशन,मोनोग्राफ.डॉ. बद्रीप्रसाद पंचोली, राजस्थान साहित्य अकादमी, लोक और वेदः संपादित,अनामिका प्रकाशन एवं सहजता की भव्यताः सम्पादन सहयोग, प्रभात प्रकाशन सहित अनेक पुस्तकें प्रकाशित। वर्तमान में मिज़ोरम विश्वविद्यालय,केन्द्रीय विश्वविद्यालय, आइजॉल,मिजोरम के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें