रविवार, 17 मई 2015

मई 2015 से जुलाई 2015

कहानी 
फूलो ( पुरस्‍कृत कहानी) - कुबेर
रोपवे (पुरस्‍कृत कहानी )- मनोज कुमार शुक्‍ल ' मनोज '
अरमान ( पुरस्‍कृत कहानी) - मुकुन्‍द कौशल
फॉंस (पुरस्‍कृत कहानी) - सनत कुमार जैन
तारनहार ( छत्‍तीसगढ़ी कहानी ) - धर्मेन्‍द्र '' निर्मल ''
घरेलू पति - राजा सिंह
लघुकथा
दो लघुकथाएं : अशोक गुजराती
पुस्‍तक समीक्षा
माई कोठी के धान: समीक्षक - हीरालाल अग्रवाल
माई कोठी के धान: लेखक की समीक्षा पर विनम्र प्रतिक्रिया
माई कोठी के धान की समीक्षा एवं लेखक की विनम्र प्रतिक्रिया पर विचार वीथी के नियमित समीक्षक यशवंत मेश्राम की टिप्‍पणी 

सम्‍पादकीय


अरमान ( पुरस्‍कृत कहानी )

मुकुन्‍द कौशल

आज का दिन किरन के लिये सर्वाधिक खुशी का दिन है। आज न केवल वह कम्प्यूटर इन्जीनियर बन गई है बल्कि उसे सन्तोषप्रद पैकेज के साथ जॉब भी मिल गया है। रविवार होने के कारण मम्मी - पापा दोनों आज घर पर ही है। यूं तो अक्सर सण्डे को भी पापा आधा दिन के लिये वर्कशॉप चले जाते हैं किन्तु आज कैसे जाते ? बेटी किरन जो आने वाली है।
          पूना से दुर्ग तक की लम्बी यात्रा के बावजूद, माता - पिता से मिलकर किरन की सारी थकान छू - मंतर हो गई थी। सर्वाधिक अंक प्राप्त  करके नगर का नाम रोशन करने वाली यशस्वी छात्रा किरन वर्मा के विषय में सूचना मिलते ही कुछ पत्रकार भी आ जुुटे। खटाखट कैमरों के फ्लैश चमके और साक्षात्घ्कार  आरम्भ हो गया। एक पत्रकार ने अंतिम प्रश्र किया - अपनी सफलता का श्रेय आप किसे देना चाहेंगी ?
- ऑफ कोर्स, अपने पापा मम्मी को ही ...।'' बोलते बोलते पल भर के लिये खामोश हो गई किरन ... सहसा आँखें डबडबा आई उसकी, फिर क्षण में ही स्वयं को संयत करते हुए उसने कहा - मेरे मम्मी - पापा डिसएबल है। किन्तु आप लोग उनसे मिलकर महसूस करेंगे कि एक्चुअली वे कितने एबल है।''
          पत्रकारों की उत्सुकता और बढ़ गई।
किरन ने पुकारा - मम्मी, पापा। आइये न..। भीतर से कमरे का पर्दा हटाते हुए एक हँसमुख व्यक्ति ने लँगड़ाते हुए कमरे में प्रवेश किया। साथ में थी एक सीधी - सादी सुशील महिला। आते ही उन्होंने सबको अभिवादन किया। स्थानाभाव के मद्देनजर दो युवा पत्रकारों ने उठकर उन्हें स्थान दिया।
वर्मा जी ने किरन से कहा - बेटा, इन्टर्व्यू तो हो चुका। अब सभी का मुँह मीठा नहीं कराओगी ?''
किरन मिठाई का पूरा डिब्बा उठा लाई।
        मिठाई खाते हुए पत्रकारों ने किरन को एक बार फिर बधाई दी साथ ही माता - पिता के साथ तस्वीर भी खींची। जाते - जाते एक पत्रकार ने वर्मा जी से निवेदन के अंदाज में कहा - कभी मैं आपको भी कष्ट दूंगा वर्माजी, आपका जीवन संघर्ष जानने की भी उत्कंठा है।''
उत्तर में वर्मा जी केवल मुस्करा दिये।
         समय पंखा लगाकर उड़ जाता है और यादों के रुप में अपने निशान छोड़ जाता है। नेपाली पहरेदार की सीटी और उसकी लाठी पटकने का स्वर कानों में पड़ा, तो निगाहें दीवाल घड़ी की ओर घूम गई। रात के बारह बज चुके थे किन्तु नींद नहीं थी धनुष की आँखों में। दुलारी और किरन थककर सो चुके थे। इतमिनान गहरी नींद में सोयी किरन बिटिया का सुंदर और सौम्य चेहरा देखकर धनुष को दुलारी का यौवन याद हो आया। टकटकी लगाये वह छत की ओर निहारने लगा। विगत एक -  एक कर सारी घटनाएँ याद आने लगी और स्मृतियों की फिसलपट्टी से फिसलते हुए वह जा पहुँचा बचपन की दहलीज पर ....।
         लगभग २५ वर्ष पहले की बात होगी, जब समोदा गाँव में स्थित श्यामजी भाई के सब्जी - बगीचे में काम कर रहे किसान मजदूर पुनीतराम वर्मा एवं उनकी पत्नी जगौती बाई का  तड़ित बिजली गिरने से देहान्त हो गया था। उस दम्पति का इकलौता पुत्र धनुष तब कक्षा ग्यारहवीं का विद्यार्थी था। मेहनत - मजदूरी कर के जीवन यापन करने वाले उसके माता - पिता उसे पढ़ा - लिखा कर आगे बढ़ाना चाहते थे। धनुष एक होनहार विद्यार्थी के रुप में जाना जाता था। छुटपन से ही पोलियोग्रस्त होने के कारण उसे विगलांग सहायता कोष से एक ट्रायसिकल भी प्राप्त हो गई थी। यही ट्रायसिकल धनुष की कल्पनाओं में मानों पंख लगा देती थी, किन्तु माता - पिता के असमय देहान्त से वह भीतर ही भीतर टूट सा गया था। आगे की पढ़ाई जारी रख पाना अब उसके लिये सम्भव न था।
          गाँव - गाँव घूमकर महिलाओं को रंग - बिरंगी चूडिय़ाँ पहनाने वाली वृद्ध तुरकिन दाई रुखसाना बी का नाती कादर, आज गाँव आया हुआ था। पड़ोस में रहने वाले धनुष को उदास बैठे देख उससे रहा न गया। बोला - अगर वेल्डिंग का काम सीखेगा तो चल मेरे साथ।''
कहते है न, कि डूबते को तिनके का सहारा ?
          मरता क्या न करता .... धनुष चल पड़ा कादर के साथ शहर की ओर ...।
दुर्ग के कब्रस्तान के पास एक छोटे से टपरे में कादर की वेल्डिंग - वर्कशॉप थी। इसी में काम सीखने लगा धनुष। कब्रस्तान से लगी मिलपारा की लम्बी गली के अंतिम छोर की नज़ूली ज़मीन पर कामगारों ने अपने छोटे - बड़े कुंदरे बना रखे थे, इन्हीं में एक कुंदरा कादर मिस्त्री का भी था। जिसमें वह अपनी बीबी के साथ रहता था। बाजू में ही था एक  बड़ा सा झोपड़ा जो खासा चौड़ा और गहरा था अत: भदरी की पतली आड़ उठाकर उसमें एक अतिरिक्त खण्ड बना दिया गया था। भरी जवानी में अपने पति खो चुकी परेमिन बाई अपनी बेटी दुलारी के साथ इसी झोपड़ें में अपनी जिन्दगी गुजार रही थी। सुबह होते ही फलों का टोकरा सिर पर उठाए, वह निकल पड़ती शहर की कॉलोनियों की ओर। दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी दुलारी, तब खाना पकाकर स्घ्कूल  चली जाती। बस्ती के सारे लोग भी अपने - अपने काम में चले जाते। चहल - पहल सन्नाटे में बदल जाती।
धनुष के रहने के लिए कादर ने परेमिन बाई से जब उसका अतिरिक्त कमरा किराये पर माँगा, तो पूछ ही लिया परेमिन ने - का नांव हे बाबू ?''
- धनुष वर्मा .. ।'' कादर ने बताया।
          परेमिन बाई देशमुख को धनुष की दशा पर तो दया आ ही रही थी, नाम सुनकर मया भी  उमड़ आई। उसने सहर्ष हाँ कह दी।
           हर सुबह मुहल्ले भर में शोर सा उठने लगता।  मुर्गों की बाँग  और बकरे - बकरियों की मिमियाहट के साथ स्त्री - पुरुषों का समवेत स्वर मानों एक कोलाहल में तब्दील हो जाता। लोग प्लास्टिक की पानी बोतलें और डिब्बे ले - लेकर दिशा - मैदान के लिये सुलभ की ओर दौडऩे लगते। महिलायें बाल्टियाँ, बर्तन और कपड़ों के साथ सार्वजनिक नल के आस पास एकत्र हो जातीं। हिन्दू - मुसलमानों सहित अनेक भिन्न - भिन्न जातियों की इस संयुक्त बस्ती की एक मिली - जुली संस्कृति थी। जातिगत भेदभाव तो जैसे था ही नहीं। वैसे भी मजदूरों की तो बस एक  ही जाति होती है, श्रमिक जाति।
           समय गुजरते धनुष ने गैस वेल्डिंग के साथ - साथ इलेक्ट्रोवेल्डिंग में भी दक्षता प्राप्त कर ली थी। स्कूटर और मोटरसाइकलों आदि के कलपुर्जों की वेल्डिंग के अतिरिक्त, अब वह खिड़कियों की ग्रिल्स और छोटे बड़े गेट भी बनाने लगा था। बचपन से पोलियो ग्रस्त अपने बाएँ पैर को उसने लाचारी नहीं, चुनौती मान लिया था। भरपूर दमखम के साथ वह अपने हुनर में महारत हासिल करता चला जा रहा था। कादर की वर्कशॉप अब वही सम्हालता। काम का दबाव इतना था कि कभी - कभी तो रात के ९- १० बज जाते।
          कादर आज अपनी बीबी के साथ बकरीद का त्यौहार मनाने समोदा गया हुआ था। वर्कशॉप इन त्यौहारों पर अक्सर बंद रहा करती सो उस दिन भी थी। परेमिन बाई फल बेचने जा चुकी थी और छुट्टी होने के कारण दुलारी भी स्कूल नहीं गई थी। खाना पकाते - पकाते धनुष की एक आहट पाने के लिये न जाने क्यों वह उत्सुक हुई जा रही थी। वह बगल के कुरिया में झाँक आई, सहसा नल की तरफ से धनुष को नहाकर लौटते देखा तो मुँह से निकल ही पड़ा - चाय पियोगे ?''
          गीले कपड़े सुखाते हुए धनुष ने आश्चर्य से पूछा - सिर्फ चाय ? अरे,कल रात से कुछ नहीं खाया। पेट में उथल - पुथल मची है। खाली चाय क्या होगा ?''
          दुलारी को उसकी यह बेतकल्लुफी अच्छी लगी। बोली - भात चुरने में अभी देर लगेगी। बाहर से कुछ ला देती हूं।''
          धनुष ने उसे पचास रुपये पकड़ा दिये। पास की दुकान से दुलारी मिक्सचर का पैकेट, ब्रेड और बिस्केट्स ले आई। थाली में रखकर धनुष के आगे खिसका दिया और चाय चढ़ाने के लिये गंजी माँजने लगी।
          साल भर बीत चुका था यहाँ रहते, लेकिन इतने दिनों में पहली बार धनुष, परेमिन बाई की अनुपस्थिति में आज उसके घर पर दुलारी के साथ बैठा था। बिस्कुट का पैकेट खोलकर वह शुरु तो ही हो गया। उसने देखा कि चाय चढ़ाने, चाय की गंजी उतारते, चाय को छानकर कप में डालते और कप को धनुष की ओर बढ़ाते समय दुलारी ने सिर्फ दाहिने हाथ ही उपयोग किया। बाएँ हाथ का पंजा उसने ओढऩी से ढँक रखा था। धनुष का ध्यान आज से पहले कभी इस ओर नहीं गया। अभी वह सोच ही रहा था कि उसकी जिज्ञासा दुलारी ने शांत कर दी। बोली - मेरा बायाँ हाथ पोलियो वाला है। कलाई तक तो ठीक है पर उँगलियाँ काम नहीं करतीं।''
          फिर मुस्कुरा कर बात पूरी की - लेकिन मैं एक हाथ से सारा काम कर लेती हूं।''
- तुम क्यों नहीं ले रही ? लो, तुम भी लो ...। धनुष ने खाने का आग्रह किया।''
- नहीं, मैं चाय भर पियुंगी। आप खाओ ... रात को क्यों नहीं खाए ?''
- कादर भाई के यहाँ मटन जो बना था ...।''
- तो .....।''.
- अँहँ मैं नहीं खाता। हम लोग शाकाहारी है।''
- हम लोग भी''
          कुछ देर चुप्पी रही। केवल चाय की चुस्कियॉ  रह - रह कर सन्नाटे को तोड़तीं।
बात का अगला सिरा दुलारी ने ही पकड़ा - मेरे बाबू ( पिता ) ड्रायवर थे। उनके बीतने के बाद हम बिल्कुल अकेले पड़ गए थे। बगल वाली शांति काकी  पहले से फल बेचने का काम कर रही थी। उसी ने माँ को समझाया - सिखाया। उन्हीं के साथ माँ भी यही धंधा करने लगी। तब मैं छोटी थी, पर अब मुझे अच्छा नहीं लगता। माँ बेचारी दिन - दिन भर अकेली खटती रही है ...।'' बोलते - बोलते उदास हो उठी दुलारी। विषाद की रेखाओं ने उसके सुन्दर चेहरे पर व्याकुलता अंकित कर दी।
उस दिन के बाद धनुष और दुलारी के बीच, मानो एक नई दर्द का रिश्ता कायम हो गया। दोनों में निरन्तर संवाद होने लगा। परेमिन बाई के समक्ष भी और उसकी अनुपस्थिति में भी। दुलारी की माँ को जब पता चला कि  धनुष शाकाहारी है, तो उसने उसे विन्रमता पूर्वक अपने ही घर पर खाने के लिए राजी कर लिया। परेमिन बाई के परिवार के साथ निकटता में, कादर भाई को भी धनुष का हित नजर आया।
         चाय - नास्ता और भोजन आदि के एवज में धनुष पर्याप्त धन राशि परेमिन बाई को दे दिया करता। अधिक दौड़धूप न करनी पड़े इसलिये परेमिन अब जिला कचहरी के सामने फलों का ठेला लगाने लगी थी। यह ठेला उसे धनुष ने ही खरीद कर दिया था।
         एक दिन अखबार में नि:शक्तजनों के लिए स्वरोजगार हेतु ऋण उपलब्ध होने की योजना के विषय में पढ़कर धनुष ने भी प्रयास आरंभ कर दिया। प्रमाण पत्रों के साथ बैंक में आवेदन देने की प्रक्रिया  सहित दौड़ धूप तो बहुत करनी पड़ी किन्तु ऋण स्वीकृत हो गया। नगर पालिक निगम की ओर से उसे एक गुमटी भी आबंटित हो गई। गुमटी के आस - पास के स्थान पर बॉस गड़ाकर ताल पत्री की छाँव में उसने दो सहायको के साथ नई वर्कशॉप आरम्भ की। इस नये प्रयास में गैस वेल्डिंग का काम तो चल निकला किन्तु विद्युत कनेक्शन न होने के कारण इलेक्ट्रोवेल्डिंग का मशीन बन्द पड़ा था।
          परेमिन बाई धनुष को पुत्र की तरह चाहने लगी थी। उसे पता चला तो बोली - आदर्श नगर के एक साहब बिजली विभाग में है। उसकी बाई मुझसे रोज फल खरीदती थी। उससे मेरी अच्छी पहचान है। साहब भी बड़े दयालु हैं। मैं उनसे बात करके देखती हूं।''
         कहते हैं कि प्रेम और परिचय से बड़ी - बड़ी समस्याओं का भी हल निकल आता है। परेमिन ने साहब के सामने बात रखी और हफ्ते भर में ही मीटर भी लग गया। जीवन में जब अच्छा समय आता है तो कॉंटे भी महकने लगते हैं।
         उत्सवधर्मी नई खबरें इस बस्ती की महिलाओं के बीच रुचिकर चर्चा का विषय होती। परेमिन को भी जब पता चला कि नगर निगम, विकलांग जोड़ों का सामूहिक विवाह आयोजित करने जा रही है तो रात की बियारी के बाद उसने धनुष से पूछ ही लिया - बाबू, तुमको मेरी दुलारी कैसी लगती है।''
           धनुष जिस बात को कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था वह इस तरह सहज हो जाएगी ऐसा तो उसने सोचा ही नहीं था। धनुष ने संयत स्वर में उत्तर दिया - काकी , सवाल यह नहीं है कि दुलारी मुझे कैसी लगती है। खास बात तो यह है कि मैं उसे कैसा लगता हूं ?''
दरवाजे के पास खड़ी दुलारी ने लजाकर मुस्कुराते हुए अपना सिर झुका लिया और दुपट्टे से अपना चेहरा छुपाकर भाग गई।
         फिर कैसे वह सामूहिक विवाह सम्पन्न हुआ .... कितने उपहार मिले, कब वे लोग उस झोपड़ी से निकलकर किराये के इस नये मकान में रहने चले आए ... कैसे उसने बड़ी वर्कशॉप डाली ... किस तरह किरन सी बेटी आ गई और कैसे उन्होंने उसे के.जी. वन की कक्षा में दाखिला दिलाया ... कितने बड़े आर्डर मिलते चले गए ... एक लम्बी कहानी ही तो है, लेकिन सब याद है उसे।
        शादी के बाद भी धनुष ने दुलारी से स्कूल  नहीं छुड़वाई थी। वह तो चाहता था कि उसकी शिक्षा जारी रहे पर उन्हीं दिनों दुलारी माँ बन गई। अपनी सारी ऊर्जा उसने घर सम्हालने और किरन की परवरिश में लगा दी। उसे अच्छी तरह याद है दुलारी ने एक दिन भावुक होकर उससे कहा था - हम आप भले ही आगे नहीं पढ़ सके, किन्तु अपनी किरन को हम खुब पढ़ाएंगे।''
           दूसरी संतान न धनुष ने चाही न दुलारी ने। समय की गाज अगर असमय उन पर न गिरी होती तो आज वे भी पढ़े - लिखे होते ... किन्तु किरन ने ? किरन ने तो उनके सारे अरमान पूरे कर दिये। क्या पूछेंगे, उससे पत्रकार ... और क्या बता पाएगा वह इतना सब ? काश वह लेखक होता तो अपनी आप बीती खुद ही लिख देता। पता नहीं क्या समय हुआ होगा ? रात काफी बीत चुकी है .... नींद अब आँखों को घेरती चली जा रही है ... पलकें भी बन्द हो रही है ....।
पता 
एम - 516, पद्यनाभपुर, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

फॉंस ( पुरस्‍कृत कहानी )

सनत कुमार जैन 

     एक कमरे का घर है. एक कमरा कहने से यह न समझा जाय कि ढलाई किया हुआ सीमेन्टेड होगा या फिर जी. आई. शीट से ढंका हुआ होगा. ऐसी रचना की कल्पना के लिए वास्तव में हमें वहाँ तक जाना ही होगा, जहाँ गंदगी के साथ-साथ इंसान भी रह रहे हैं. जगह-जगह सुअरों का गंदगी खाना यों ही नजर आ जाता है. बस्ती में पहुँच कर वहाँ की गलियों को देखने से अपनी कालोनी का मार्ग भी राष्ट्रीय राजमार्ग-सा लगने लगता है. एक आदमी के चलने लायक मुड़ती-घुमती, आड़ी-टेढ़ी गलियों में जहाँ तन कर चलना खुद का ही सर जानबूझकर फोडना है. लगभग सटी सी झोपडियों में ज्यादातर एक या दो ही कमरे हैं. बाथरूम का दरवाजा ही नही है. कौन देखा? किसने देखा? देखता है तो देखता रहे. सर्वत्र राम तेरी गंगा मैली का दृश्य शूटींगमान होता रहता है.
- सो जाओं न. दो घन्टे हो गये करवटें बदल-बदल कर. न खुद सोते हो न मुझे सोने देते हो.'' सादें की तल्ख आवाज उसकी तकलीफ को बता रही थी. नींद की उचटन मन में चलती चिन्ता का सूचक थी और चिड़चिड़ाहट कल की अवश्य संभावी परेशानी का सूचक थी, गरीब को अच्छी नींद आती है यह कहावत किसने कहीे, भगवान जाने? सादें जाने कबसे नहीं सोई है, पता नहीं. अब तो नींद की चिन्ता में नींद ही नहीं आती है.
     दुर्जो जरा भी नाराज नहीं हुआ सादें के गुस्से पर, बल्कि उसे तो उस पर दया आ गई. स्वयं की कमजोरी पर कसमसाहट महसूस हुई. उसे लगा मानो गैस का कोई टुकडा दिल को जाने वाली नस में अटक गया हो और वहाँ तक खून का कतरा पहुँच नहीं पा रहा हो. कसमसाहट बढ़ते ही दुर्जो उठकर बैठ गया. एक हाथ से छाती को दबाकर दूसरे से माथे की पसीने को पोंछा. फिर भी उस गैस के टुकडे पर सवार मिश्रा का दिखाई देना बंद नहीं हुआ. चिन्तामणी मिश्रा, जिसे छू ले उसे चिन्ता धर ले. शान से मूछें ऐंठता आगे-आगे और उसके पीछे दुर्जो की जान से प्यारा रिक्शा अपने आप ही खिंचा चला जा रहा था. यही दृश्य हथौड़ी की मार, मार रहा था. यह दृश्य देखना भारी पीड़ादायक था उसके लिए. परन्तु रह-रहकर एक यही दृश्य दिख रहा था. पसीना चू रहा था माथे से मौसम गर्म था न कि सर्द था, पर उसकी यह अवस्था मौसम की भी समझ से बाहर की थी. दुर्जो किसी तरह घिसटता सा मटके के नजदीक पहुंच गिलास से पानी पिया. पानी की कुछ बूँदें चेहरे और छाती पर गिरने से सिहरन सी उठी, मौत की ठण्डक का एहसास कराती हुई.
- क्या हुआ गुदमा के पापा बहुत परेशान लगते हो?'' शायद सादें को अब अपनी परेशानी छोटी महसूस होने लगी थी इसीलिए प्यार से चिपककर दुर्जो से वह पूछ बैठी. जूठे बर्तनों को मांजने से पैदा हुई बास सादें के शरीर में समाई हुई थी. इसके बावजूद दुर्जो उसके तन से उठती यौवन और प्रेम की मदमस्त गंध को खोज ही लेता. सादें भी तो पसीने की तहों में दबी दुर्जो के जवानी की गंध को सूंघ लेती थी. पर आज उन दोनों के बीच सिर्फ चिन्ता में जलती दिमाग की नसों की गंध ही फैली हुई थी.
- हूँ ''. दुर्जो का सक्षिप्त जवाब ही बता रहा था कि चिन्ता की जकड़नें कितने प्रबल और कितने गहरे हैं. लाख कोशिशों के बावजूद दुर्जो चिन्ता की इन जकड़नों से बाहर नहीं आ पा रहा था.
- हूँ क्या ? चिन्ता कर-करके जान दे दोगे क्या? जान से महंगा कुछ नहीं होता है.'' सादें और जोर से चिपकती हुई बोली.
     कैसे समझाए दुर्जो, रिक्शे के बिना इस कठोर शहर की कठिनता. उसकी जवानी की कुल जमा पूंजी एक यही रिक्शा ही तो है जो उसकी शान है. उसकी ईमानदारी और सज्जनता का तमगा है. उसकी बस्ती में उसके अलावा किसी का खुद का रिक्शा न था. अब कैसे वह लोगों से नजरें मिलायेगा और उन्हें कैसे समझायेगा; दारू न पीने के फायदे और शराफत से जीने का सुकून। सज्जनता और शरफत उसके लिए रिक्शे से ज्यादा बड़ी थी. पर आज वह भी बात खत्म हो गई थी. बचा था तो सिर्फ रिक्शा और रिक्शा के न रहने पर रोटी की जद्दोजहद की चिंता, और चिन्ताओं का सार, सिर्फ और सिर्फ  रिक्शा.
- क्यों ज्यादा सोच रहे हो गुदमा के पापा. जब इस शहर में आये थे तो क्या लेकर आये थे? रिक्शा था कि मैं थी? सब तो यहीं से पाया है. फिर काहे को चिन्ता में घुल रहे हो. कुछ न होगा तो हमें बेच देना.'' सादें ने सादगी से कहा. इस सादगी से कहा कि दुर्जो उस वक्त अपनी चिन्ताओं से बाहर आकर, कुछ ही पलों के लिए सही, सादें के शरीर में स्वर्ग की गलियाँ खोजने लगा.
- काहे दुर्जो भईया! का हुआ. कुछ व्यवस्था हुई कि नहीं?'' मिश्रा सुबह सबेरे घर के द्वार पर खडा था. कुत्ते की आँखों की तरह झपट पड़ने को तैयार उनकी आँखों ने अपने गोल-गोल कोटरों में घूमते हुए पलंाश में ही दुर्जो का निरीक्षण कर लिया और फिर पास ही रिक्शे को पा कर चमक उठीं. -कर रहा हूँ कोशिश मिश्रा जी! जल्दी ही आऊँगा आपके पास। चिन्ता क्यों करते हो?'' चेहरे पर पानी छिंटकते हुए और अपनी सूजी हुई आँखों को छिपाने का प्रयास करते हुए दुर्जो ने कहा।
- 20 रूपया रोज का नुकसान हो रहा है भैय्या, फिर भी चिन्ता नहीं है, चिन्ता है तो सिर्फ  तुम्हारी।'' कहकर मिश्रा झोपड़ी के अंदर झाँकने लगा। झोपड़ी के अंदर थी झोपड़ी की इज्जत। कुटिलता नजर आ ही जाती है, पर वाह री मजबूरी। इन्सान की यही मजबूरियाँ कुटिल को यह झूठा विश्वास दिला देती है कि कुटिलता ही भारी होती है।
- चलिए दिखाता हूँ रिक्शा, पास से देख लीजिए।'' दिल पर भारी पत्थर रखकर, दुर्जो ने कहा ताकि मिश्रा की कुटिल निगाहों को पत्नि से रिक्शे की ओर भटकाया जा सके. सच, मजबूरी का व्यवहारिक उदाहरण दवा की तरह कड़वी होती है जिसे पीना मजबूरी होता है, पर उस दवा से तो बीमारी ठीक होने का ईनाम मिलता है।
- एक महीना चार दिन हो गया है यानी 700 रूपयों का नुकसान. फिर भी मैं अब तक कुछ नहीं कह रहा हूँ, समझ रहे हो न दुर्जो भईया क्योंकि तुम हमारे भैय्या के साथ के हो।'' जरा पास आकर धीरे से कहा - पर अब दो-चार दिनों से ज्यादा न रूकेंगे।''
- खून भर नहीं पीये हो, मार तो दिया ही है?'' फुॅफंकारती सादें आगे आ गई।
- किस बात का तगादा है सुबह-शाम? न समय देखते हो न ही जगह? पैसों की पड़ी है। हम कैसे तुम्हारे देनदार है? काहे को हम पैसा दें? खाया न पिया फोकट के देनदार हो गये। '' वास्तव में अगर नागिन आती तो वह भी सादें के इस तेवर से शरमाकर भाग जाती.
मिश्राजी शायद इसी आशंका के लिए ही दुर्जो के कान के पास आकर बोले थे। मामला बिगड़ न जाए इसलिए चुपचाप गरीब को भड़ास निकालने दिया।
- पैसा हमने लिया था क्या जो हमसे मांगने आते हो? जिसनेे लिया था जाओ उसी के पास। सीमन से मांगो, बेचारा मर गया तुम्हारा खूनी पैसा लेकर। बुखार में मर गया। भला कोई मरता है बुखार से? मना किया था हजार बार गुदमा के पापा ने, पर नहीं मानी बुधई, हो गई न रांड! मनहूस का पैसा लिया, बरबाद हो गई! हमें क्या मालूम बुखार से मरेगा सीमन?''
      दुर्जो सर झुकाये खड़ा था। आज उसके शरीर में अजीब सी ठण्डक महसूस हो रही थी। शायद गैस का वह टुकड़ा अब खून में विलिन हो गया था। सादें आज पति की आवाज बनकर बोल रही थी। उसे मालूम था, आज चुप रहने से वह भी बुधई की तरह रांड की जमात में शामिल हो जायेगी। खा जायेगी मिश्रा की नजर उसे भी।
     महाजन के मनहूस होने का सिलसिला सदियों बाद भी बंद नहीं हुआ है। लूले,लंगडे और पागलों की गृहस्थी समेटे चलता ही जा रहा है कुनबा। शायद इन्हें स्वयं के नजदीक पाकर दया मर गई है या फिर पैसों से इनकी निरोगता नहीं खरीद पाने की कुंठा ही दूसरों पर अत्याचार को उकसाती है, खुशी देती है, आत्मिक शांति देती है.
     मिश्रा कान में मुर्गी का पंख घुमाता चुप खड़ा था। जानता था, उसका जवाब उसी का नुकसान करायेगा। जमाना बदल गया है। गरीबों की बोलती बंद नहीं करनी है बल्कि बोलने से निकली भड़ास पैसों की अदायगी की रसीद होती है। दबाने का जमाना गुजर चुका है। अब सभी को अभिव्यक्ति का अधिकार है।
- हमने जमानत ले ली, हमने पैसा थोड़े ही लिया है!'' भीड़ को समझाती और अपने पक्ष में जवाब की अपेक्षा रखती बोलती ही जा रही थी सादें पर भीड़ भी तो दबी थी किसी दूसरे मिश्रा, गुप्ता, जैन, महाजनों की वजनी तोदों में, कैसे आवाज निकालती.
- बुखार में लोग मरते होते तो कोई जमानत क्यों लेता? मर गया सीमन। उससे उसका कफन छीन न पाया तो हमें ही जीते जी कफन पहनाना चाहता है। रिक्शा छीनना चाहता है। बंदूक रख लो और ज्यादा कमाई होगी। तुम चिन्ता मत करो गुदमा के पापा, डरने की जरूरत नहीं है.'' हाँफती - हाँफती गुदमा चुप हो गई, सांस लेने को। तभी भीड़ से बुधई बाहर निकली.
- सब बनना पर बेईमान नही सादें। भगवान सबको देख रहा है। अत्याचारी कभी न बचा है, न बचेगा।'' समझाती हुई उसने सादें के कंधे पर हाथ रखा।
- चुप रह रांड! तेरे ही कारण हो रहा है ये सब! तू ही तो आई थी न गुदमा के पापा के पास, जमानत की मिन्नत करने के लिए। मर्द की जात है न, फिसल गया, अधेड़, भुगत रहा जोंक का दंश।'' एक ही नजर में मिश्रा और बुधई को बरछी मारती बोली सादें - तू तो बरबाद हो गई अब मुझेे भी रांड बनाना चाहती है? रिक्शा ले जायेगा ये मिश्रा, तो क्या भीख, मांगेगे हम ?''
शायद दुनिया की सच्चाई है कि लोग अपने दुख को पाटना चाहते हैं, इसलिए दूसरों के लिए गढ्ढा खोदते हैं।
- रोज-रोज मरने से अच्छा है ले जाओं रिक्शा. रिक्शा ही चाहिए न तुम्हें? पर एक ही शर्त है। तुम खुद ही चलाकर ले जाना ये रिक्शा। किसी और से चलवाकर नहीं!'' सादें से पहले दुर्जो बोला, विजय और तसल्ली के भाव थे चेहरे पर।
     कहने में देर लगी पर ले जाने में नहीं। मोटर साइकल वहीं खड़ी कर ताला लगाया और रिक्शे पर सवार हो, चलाता हुआ चल पड़ा मिश्रा। पल भर में ही वह नजरों से ओझल हो चुका था।
न तो महाजन बदला न ही गरीब, पर कहते है दुनिया बदल गई. दुर्जो खुश था। सदियों बाद बंद जबान तो खुली, सुनहरा भविष्य कभी तो आयेगा.
पता- सन्मति इलेक्ट्रिकल्स
सन्मति गली, दुर्गा चौक के पास
जगदलपुर, जिला- बस्तर छ.ग.
पिनकोड- 494001
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रोपवे ( पुरस्‍कृत कहानी )

मनोज कुमार शुक्‍ल ' मनोज ' 

     अगस्त माह । कभी तेज बारिश होती तो कभी थम जाती । हम वर्षा की इस ऑंख मिचौली से काफी परेशान थे। जबलपुर से मेरा छोटा भाई अखिलेश सपत्नीक अपनी तीन साल की नन्हीं बच्ची सोनल के साथ आया हुआ था। मेरे तीन बच्चों में एक बड़ा मनीष ,सपना और  गौरव  को तो मानो सोनल एक गुड़िया के रूप में खेलने को मिल गई थी। सभी उसकी प्यारी मीठी तोतली बाते सुनकर खुशियॉं लूटने में मगन थे। छोटे भाई अखिलेश का अपना व्यवसाय था। पत्नी के साथ निकलने का कम ही मौका मिलता था  इसलिये उसे अपने धंधा से अवकाश बहुत कम मिलता था । बड़ी मुश्‍िकल से तीन दिन के लिये आ पाया था। उसका एक दिन रायपुर में रिश्‍तेदारों से मिलने जुलने में गुजर गया। दूसरे ही दिन मेरी पत्नी पल्लवी और अखिलेश की पत्नी सुनंदा ने डोंगरगढ़ चलने का प्रस्ताव रखा। देवी दर्शन के साथ-साथ मनोहारी प्राकृतिक छटा का दृष्यावलोकन। अधिकांश ने अपनी सहमति प्रगट कर दी ।
     इस प्रस्ताव पर मुझे छोड़ कर सभी एक मतेन थे । मेरी देवी देवताओं पर पूर्ण आस्था तो थी । पर बाप रे ...डोंगरगढ़  की चढ़ाई ...सपाट  सीधी -ऊॅंची ... नहीं भाई ... भगवान ही बचाए। सुनते ही मेरे हाथ पॉंव कॉंपने लगे। पैरों की पिंडलियों में असहनीय दर्द उठने लगता - हाथ पॉंव फूलने लगते, चॅूंकि मैं अपनी पल्लवी के साथ मैहर एवं डोंगरगढ़ की सीढ़ियॉं चढ़ चुका था। मुझ जैसे नाजुक बैंक में काम करने वाले सुख भोगी इंसान के लिये तो मिरजापुर की मॉं विंध्यवासिनी के दर्शन ही बड़े भले लगते हैं। मैं छुट्टी न मिलने के बहाने बनाकर अपनी जान बचाते फिर रहा था। तभी भोली - भाली नन्ही मासूम सोनल जो मुझे काफी देर से घूर - घूर कर देखे जा रही थी , तुतलाहट भरे मासूम अंदाज में अपने नन्हें हाथों को  मटका कर बोली - '' अले... क्या ताऊ जी ... सीली तढ़ने से डलते हैं । मेले साथ मेली ऊॅंगली पकल तड़ना ताऊ जी !... मैं साली की साली ... सीली तड़ा दूंगी ...। '' यह सुनकर सभी खिलखिलाकर हॅंस पड़े। सबकी नजरें मेरी ओर लगी थीं । मैं नि:सहाय सा असमंजस में पड़ गया था । तभी मेरी बेटी सपना ने कान में कहा - '' पापाजी ! आप चिंता क्यों करते हैं ? आजकल वहॉं रोपवे चलते हैं । सर्र से ऊपर, सर्र से नीचे । पिछले बार में मामा जी के साथ गयी थी। कोई तकलीफ नहीं हुई।'' यह सुनते ही मुझमें एक साहस का संचार हुआ और एक शक्ति सी आ गई। अपने सभी बहाने के हथियार डाल कर , सहर्ष चलने की सहमति दे दी ।
     अब हम सभी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में जुट गए। सुबह पॉंच बजे की ट्रेन पकड़ने के लिये चार बजे उठना । नहा धोकर घर से निकलना। स्टेशन तक रिक्‍शे का जुगाड़ करना। रास्ते के लिये नाश्‍ता व खाने की व्यवस्था आदि अनेकों प्रश्‍न एक साथ उठ खड़े हुये। सभी की अलग अलग ड्यूटी लगा दी गई । कब रात्रि के दस बज गये , पता ही नहीं चला। किचिन से आ रही बर्तनों व हॅंसी ठहाकों के बीच दीवार घड़ी ने संगीत मय टन...टन... की ध्वनि से सबको आकर्षित कर चौंका दिया। रात्रि के बारह बज गये थे। समय बड़ी तेजी से भाग रहा था। मैं सभी को सुबह चार बजे उठने की सलाह देकर स्वयं शयन कक्ष में सोने को चला गया ।
     टेबल घड़ी ने अपने वायदे के मुताबिक सुबह के चार बजे ही अपनी कर्कश अलार्म बजा दी । नींद में डूबे हुए लोग बिस्तर से उठने को मजबूर हो गये। सभी अपनी अधखुली ऑंखों से यंत्रवत नित्य क्रिया कलापों में जुट गए थे । घर के बच्चों को बिस्तर से उठा - उठाकर बैठाने की बार - बार प्रक्रिया ने झुंझलाहट शोर शराबे और तनावों की ध्वनि तरंगों को और तेज कर दिया था। रिक्‍शे की तलाश से लेकर स्टेशन के प्लेटफार्म तक पहुंचते - पहुंचते जैसे सब कुछ शांत हो गया था । चूंकि सुबह डोंगरगढ़ जाने वाली वह गाड़ी तीन घंटे लेट चल रही थी । इतनी मेहनत मशक्कत की पर सब बेकार लगने लगा था, पर कर भी क्या सकते थे। अगर हम लोग लेट हो जाते तो गाड़ी थोड़े ही हमारे लिये रूक सकती थी । यह एक सत्य था ।
     प्लेटफार्म में इतना लम्बा समय काटना अक्सर लोगों के लिए बड़ा मुश्‍िकल कार्य होता है। हम सभी अपने अतीत को वर्तमान में खड़ा करके कभी उसका पुनरावलोकन करके , तो कभी किसी का छिद्रान्वेशण करके समय काटने में लग गये। रात्रि की तैयारी से लेकर सुबह की भागम - भाग तक एक दूसरे के क्रिया - कलापों का लेखा - जोखा बनाने में किसी लेखाप्रवर समिति की भांति जुट गए थे। बीच - बीच में सोनल अपनी उपेक्षा पर अपनी तोतली बातों से सबका ध्यान आकर्षित कर हंसाने व गुदगुदाने का कार्य करती रही। प्लेटफार्म पर आती ट्रेन की सीटी ने जैसे सभी की बातों में ब्रेक लगा दी हो । सभी पूर्वर्निधारित अपने - अपने हाथों में सामानों को थामे ट्रेन के अंदर घुसने में व्यस्त हो गये ।
     ट्रेन अंतत: एक लम्बी सीटी बजाकर रवाना हुयी । उसके संग वह प्लेटफार्म  पीछे छूटने लगा । खड़े रिश्‍तेदार अपने चिरपरिचितो को हाथ हिला हिला कर बिदा कर रहे थे। दौड़ते - भागते , गॉंव - शहर, खेत - खलिहान, सड़के-पगडंडियॉं, खम्बे- पहाड़, झाड़- झाड़ियॉं, नदी- नाले। हम सभी खिड़की से देखते जा रहे थे। महिलाओं का तो अपना एक संसार अलग होता है। सुनंदा और पल्लवी दोनो अपनी घरेलू बातों में मग्न थीं। चलती रेल की खिड़की से झांकती सोनल की बाल सुलभ जिज्ञासा जागती और -''ताऊ  जी.... ताऊ जी ....ये  थब क्यों भाग लहे  हैं ?''
मैंने कहा -ये सब हमारी सोनल के साथ - साथ जाने को दौड़ रहे हैं ।''
''ताऊ  जी.... ताऊ जी ....वो क्या कल लहे हैं ?''
मैंने कहा -वो खेतों में काम कर रहे हैं ।''
''ताम क्यों कलते हैं,ताऊ  जी...?''
मैंने कहा -उससे फसल पैदा होती है। जिसे हम सभी खाते हैं और अपने पेट की भूख मिटाते हैं।
      जैसे अनेक प्रश्‍न किए जा रही थी। हमारे उत्तरों से उसके प्रश्‍नों का समाधान होता था या नहीं। मैं नहीं जानता किन्तु वह उत्तर के बाद ''अच्छा'' कहकर मुझे संतुष्‍िट का बोध अवश्‍य कराती जाती थी ।
     तभी ट्रेन में एक खिलौने वाला अपने मुॅंह को फुलाकर पुंगी से शोर मचाता प्रकट हुआ और सोनल के सामने ही खड़ा होकर जोर - जोर से बजाने लगा। जिसमें उसको सफलता मिली । सोनल अपने पापा के पीछे पड़ गयी।
'' पापा... पापा...हमको भी पुंगी ले दो ना ...।''
      अखिलेश ने कहा - नहीं.. तू मेरे सामने हरदम शोर मचाएगी और सबको परेशान करेगी।''
'' थत् पापा..., हम सोल नहीं मताएॅंगे ..., तब आप थो दाएॅंगे ...तब बदॉंएॅंगे ...। ले दो न पापा ... ले दो न पापा ... ले दो न  ताई जी ...।''
     उसकी इस बात पर हम सभी हॅंस पड़े। आखिर पुंगी उसको लेके देनी ही पड़ी। सोनल के साथ बात करते -  करते कब समय गुजर गया , मालूम ही नहीं पड़ा। गाड़ी डोंगरगढ़ प्लेटफार्म पर खड़ी थी । सामने ऊॅंचे पहाड़ पर मंदिर दिख रहा था। देवी माता के आस्था और विश्‍वास का केन्द्र बिन्दु ,यह बम्बलेश्‍वरी देवी का मंदिर है - लोगों ने बताया - यहॉं दर्शन को लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएॅं लेकर आते हैं, पहाड़ की चोटी पर चढ़कर अनुपम प्राकृतिक छटा को निहारते और मन ही मन आल्हादित होते हैं ।
     ऐसे स्थानों पर निरंतर बढ़ती भीड़ स्थानीय लोगों के जीविका का साधन भी बन जाती है ।निराश्रित अपंग बूढ़े बढ़े भिक्षा मॉंग कर कुछ जुटाने में लग जाते हैं । होटल, दुकानों के साथ - साथ व्यवसाय के नए - नए रूप उभर कर सामने आने लगते हैं । यही सोचते हुए हम सभी दुकानों और होटलों की लम्बी कतारों को पार करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि बड़ी - बड़ी बूदों के साथ वर्षा ने मार्ग रोकना चाहा। भीजने से घबराकर पास की एक दुकान में घुस गये ।
     दुकानदार इतने सारे ग्राहकों को देखकर बड़ा खुश हो गया । मानों ''बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा हो ।'' वर्षा को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था । वह तुरंत लम्बी बैंच की ओर इशारा करके सभी को बैठने का आग्रह करने लगा । और ''क्या लाऊॅं  भाई साहिब ...?'' कह कर सामने खड़ा हो गया ।
     चाय का आर्डर मिलते ही वह फिर तुरंत ही लाल तूस के कपड़ों में बंधे प्रसाद, फूल- माला  को खरीदने का आग्रह करने लगा। उसकी व्यवसायिक चतुराई और हम लोगों की परेशानी दोनों ने मिलकर आपसी सामंजस्य स्थापित कर लिया था। बीस मिनिट गुजर गए थे ।बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही थी ।
     सामने रोपवे के प्रवेष द्वार टंगा एक बोर्ड मुझको मुॅंह चिढ़ाता नजर आ रहा था। सभी दर्शनार्थियों से तकनीकी खराबी के कारण खेद सहित क्षमा याचना की मांग रहा था। घर के सभी लोगों की निगाहें मेरे चेहरे पर लगीं हुयीं थी मानो वह बोर्ड मेरे लिये ही बना था। उस समय सबकी नजरों में मैं एक बेचारा सहानुभूति का पात्र बन गया था। किन्तु मैं भी चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा लगाए बड़े निर्विकार भाव से वर्षा को देखे जाने का नाटक कर रहा था।क्योकि जब सिर ऊखल में दिया हो तो मुसर से क्या डरना।
'' ऐसी विपरीत विपत्ति को झेलने काश... घर से छाता लाए होते, तो हम लोग भी वर्षा के आनंद के साथ-साथ  देवी दर्शनों का लाभ उठाते।'' मेरी पत्नी पल्लवी ने कहा ।
     दुकानदार तो जैसे यही वाक्य सुनने को आतुर था, बोला -'' बाबू जी , यहॉं छाता मिल सकता है। किराया मात्र दस रुपया। जमानत के पचास रुपया। लाऊॅं....?''
     अखिलेष ने परेशानी का सहज हल मिल जाने पर खुशी प्रकट की । बोला - '' लाईए, पर दो से क्या बनेगा , तीन मिलते तो ...।''
     दुकानदार ने उसके कथन की वास्तविकता समझी। छाता लगाए सामने बैठी भिखारिन के पास गया। कुछ धीरे से बात कर उसका  छाता ले आया ।
 '' अब तीन छातों में सब भीजनें से बच जायेंगे।'' सुनंदा बोल उठी ।
     मैंने देखा उस वृद्धा का चेहरा खिल उठा था। हाथ का कटोरा अपने थैला में रखकर दुकानदार की बनायी छाया में आकर बैठ गयी थी। उसकी ऑंखों में एक नया आत्मविश्‍वास झलक रहा था। उसे बड़ी खुशी हुई।
     छाते को तान कर हम सभी एक फर्लांग बढ़े ही थे कि एकाएक खुला आकाश हम पर ठहाका मार कर हॅंसता नजर आया। छातों को बंद कर इस बोझ से मुक्ति की छटपटाहट का भाव मेरे छोटे बेटे गौरव ने भांप लिया था। वह किसी मैराथन धावकों की भांति विशल बजने के इंतजार में तैयार था। इसके लिए मेरी पत्नी पल्लवी ने भूमिका बांधते हुए कहा - '' अब इन छातों को भी ढोना पड़ेगा और ऊपर से किराया भी लगेगा । गौरव प्लीज ...।''
     आदेश पाते ही गौरव दौड़ पड़ा। मेरी कल्पना में उसी क्षण उस वृद्धा भिखारिन का खिला चेहरा उदास सा दिखाई देने लगा। तभी गौरव ने आकर चतुर व्यवसायिक दुकानदार का संदेश एक सांस में सुना दिया कि '' मम्मी किराया तो लगेगा , जब लौटोगे तो किराया काट कर पैसे वापस मिल जाएॅंगे ।''
     सुन कर मुझे मन ही मन अच्छा लगा। आकाश की इस मसखरी पर हम सभी हॅंसते खिलखिलाते चढ़ाई चढ़ने, सीढ़ियों के पास पहुॅंच गए।
     तुरंत सोनल ने आकर अपने नन्हे हाथ मेरे सामने कर उॅंगली बढ़ा दी और बोली ''ताऊ जी डलना नईं मेली उॅंगली अत्थे से पकल के चलना...।'' मानों उसे अपना दिया वचन स्मरण था। उसकी बातों पर हम सभी हॅंस पड़े।
     अभी हमारे कदम मंदिर की पहली सीढ़ी पर पड़े ही थे कि - बाबू जी ...के सम्बोधन ने वहीं रोक दिया । पीछे पलट कर देखा तो एक वृद्ध था। छोटे - बच्चों को गोद में लेकर आने - जाने की यात्रा का सहायक श्रमजीवी। इनकी भी एक जमात है - उसी का यह भी एक सदस्य था। वृद्ध ने हाथ जोड़कर दीनता भरी आवाज में याचना की - '' बाबू जी ... हम सिर्फ बीस रुपए लेंगें ... इस बच्ची के ...ना, नहीं करना बाबू जी ... दो दिनो से कोई मजदूरी नहीं बनी ... इसे लेकर चढ़ेंगे तो आप थक जाएॅंगे ... देवी मॉं आप सबका भला करे। आज रोपवे बंद है, सो आशा बंधी है, बाबू जी ...''
     मैंने सुनंदा - सोनल के भाव जाने । सुनंदा प्रभावित थी सो सहमत दिखी - किन्तु सोनल ने अपनी मॉं का ऑंचल छोड़ पीछे छिपकर विरोध का स्पष्‍ट संकेत दे दिया -'' नईं ...सीली  मैं  (चढ़ूगी ) तढ़ूगी ...तढ़ूगीं ...तढ़ूगी...।''
     मेरे सामने दुविधा थी । एक तरफ सोंनल का बालहठ तो दूसरी ओर यह श्रमजीवी बेबस वृद्ध ।
''आ जा रानी बिटिया... बाबाजी की बात मान ले ... तू जानती नहीं ... थक जाएगी। जा... बाबा जी की गोद में जा...।'' सुनंदा ने पुचकारते हुए कहा।
     पर सोनल ने बाबा की  गोदी में जाने की बजाय पलभर में पॉंच- छ: सीढ़ियॉं चढ़कर अपनी शक्ति की विश्‍वसनीयता प्रकट कर दी। सुनंदा को भी अपना रुख बदलना पड़ा - '' बाबा जी छोड़िए, यह बहुत हठी है , बात नही मानेगी।''
     मैंने वृद्ध की ओर देखा । याचना की निष्‍फलता देख उसे दुख हुआ। पॉंच का नोट उसकी ओर बढ़ा दिए पर उसकी सजल ऑंखों एवं कांपते हाथों ने उसे ग्रहण करने में असहमति दे दी ।
- '' नहीं बाबू जी ... बिना मेहनत नहीं ... उस देवी मॉं की शायद यही मर्जी है...आप लोग जाइए ...आप सभी का कल्याण हो ...।''
     कुछ सीढ़ी चढ़ी सोनल ने वृद्ध के निकलते ऑंसू देखे तो तुरंत नीचे उतर आई। उनके करीब आकर बोली - ''मत लो बाबा जी ... तुम तो मेरे दादा जी से हो ना ... वे भी ज्यादा नईं तलते ...थक जाते हैं। तुम भी थक जाओगे बाबा जी ... है ना, ताऊ जी  ...है ना मम्मी... है ना पापा....।''
     बाबा जी के रूप में हमारे वृद्ध पिता की तस्वीर ऑंखों के सामने झूल गयी। मेरे लिये यह भावुकता की चरम सीमा थी। जेब से बीस रुपए निकाले । जबरन उसे थमा दिए , बोला -'' ना नहीं करना बाबा जी ... दिल टूट जायेगा ... हमको अपना बेटा समझ कर ही इसे रख लीजिए ....इसके आगे अव़़रुद्ध कंठ ने दोनों को कुछ कहने न दिया।
     बाबा ने सोनल को अपनी गोद में उठा सीनें से लगा लिया। ऐसी आत्मीयता पाकर वह भावव्हिल हो सोनल के सिर पर लगातार हाथ फेरे जा रहा था। उसे साक्षात् देवी समझ अपने दोनों हाथ जोड़ दिये थे।
      इन आत्मीय मधुर स्मृतियों के संग हम सभी के कदम मॉं के मंदिर के दर्शन के लिये आगे बढ़े जा रहे थे। पीछे पलट कर देखा वह '' बाबा '' हमारी मंगलमय यात्रा के लिये नीचे खड़े हाथ हिलाये जा रहे थे और हम मंदिर के लिये आगे बढ़े जा रहे थे।

पता - 
58, आशीष दीप, उत्‍तर मिलौनीगंज, 
जबलपुर ( म.प्र.) 
मोबाईल : 94258 - 62550

फूलो ( पुरस्‍कृत कहानी )

  • कुबेर
फगनू के घर में शादी का मंडप सजा हुआ है। कल बेटी की बरात आने वाली है।
फगनू उस खानदान का वारिस है जिन्हें विरासत में मिला करती हैं सिर्फ और सिर्फ गरीबी, असमानता, अशिक्षा और अपमान। इनके शिक्षा, समानता, संपत्ति, सम्मान आदि सारे अधिकार छीन लिये गये हैं, सदियों पहले, छल से या बल से। जिस दुनिया में उसने आँखें खोली हैं, वह उसका नहीं है, यहाँ उसका कुछ भी नहीं है, सब कुछ मालिको का है। मालिको के उसके हम उम्र बच्चे जिस उम्र में पालने के नीचे पाँव भी नहीं धरते हैं, फगनू मालिको की चाकरी करता था।
मालिका का चेहरा उसे फूटी आँख भी नहीं सुहाता है। अँखफुट्टा और हरामी खानदान के इस वारिस ने गाँव में किस बहू-बेटी की आबरू बचाई होगी ? किस मर्द के सम्मान को न कुचला होगा ? किस किसान की जमीन को न हड़पा होगा ?
      फगनू  सोचता है - वाह रे किस्मत, हमारी माँ-बहनों की इज्जत लूटने वालों की ही हमें चाकरी करनी पड़ती है, बंदगी करनी पड़ती है। अरे पथरा के  भगवान, गरीब को तूने क्यों इतना लाचार बनाया होगा ? फिर सोचता है, भगवान को दोष देना बेकार है। न भगवान का दोष है, और न ही किस्मत का, अपनी ही कमजोरी है, अपनी ही कायरता है। सब कुछ जानते हुए भी सहते हैं हम। क्यों सहते हैं हम ? इज्जत बेचकर जीना भी कोई जीना है ?
      गाँव में और बहुत सारे फगनू हैं, क्या सभी ऐसा ही सोचते होंगे ? सब मिलकर इसका विरोध नहीं कर सकते क्या ? कोई आखिर कब तक सहे ?  फगनू सोचता है - और लोग सहें तो सहें, वह नहीं सहेगा।''
     फगनू ने मन ही मन निश्चय किया - इस गाँव में नहीं रहेगा अब वह। बिहाव भी नहीं करेगा, पहले इज्जत और सम्मान की बात सोचना होगा।
     सोचना सरल है, करना कठिन। जहाज का पंछी आखिर जहाज में ही लौटकर आता है।
बाप का चेहरा उसे याद नहीं है। ले देकर नाबालिग बड़ी बहन का बिहाव निबटाकर माँ भी चल बसी। फगनू अब अकेला है, उसकी न तो अपनी कोई दुनिया है, और न ही दुनिया में उसका कोई अपना है। दुनिया तो बस मालिको की है।
     मालिक बड़े शिकारी होते हैं,छल-प्रपंच में माहिर, बिलकुल बेरहम और शातिर। उसके पास बड़े मजबूत जाल होते हैं, सरग-नरक , धरम - करम, पाप-पुण्य और दीन-ईमान के रूप में। कैसे कोई इससे बचे ? लाख चालाकी करके भी गरीब आखिर इसमें फंद ही जाता है। कहा गया है -  '' पुरूष बली नहि होत है, समय होत बलवान।''
     गाँव की आबादी वाली जमीन में मालिक ने फगनू के लिये दो कमरों का एक कच्चा मकान बनवा दिया है। बसुंदरा को घर मिल गया, और क्या होना ? सजातीय कन्या से फगनू का बिहाव भी करा दिया। फगनू  को घरवाली मिल गई और मालिक को एक और बनिहार।
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    एक दिन फगनू बाप भी बन गया। जचकी कराने वाली दाइयों ने फगनू से कहा - ’’अहा! कतिक सुंदर अकन नोनी आय हे रे ,फगनू बेटा, फकफक ले पंडऱी हे, न दाई ल फबत हे, न ददा ल, फूल सरीख हे, आ देख ले।’’
     बाप बिलवा, महतारी बिलई, बच्ची फकफक ले पंडऱी, और क्या देखेगा फगनू ? उठकर चला गया। दाइयों ने सोचा होगा - टूरी होने के कारण फगनू  को खुशी नहीं हुई होगी।
बच्ची बिलकुल फूल सरीखी है, नाम रख दिया गया फूलो।
इसी फूलो की कल बरात आने वाली है।
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    दो खोली का घर, शादी का मंड़वा सड़के के एक  किनारे को घेर कर सजाया गया है। जात-गोतियार और गाँव-पार वालों ने पता नहीं कहाँ- कहाँ से बाँस-बल्लियों का जुगाड़ कर के बिहाव का मड़वा बनाया है। बौराए आम और चिरईजाम की हरी टहनियों से मड़वा को सजाया है। बैसाख की भरी दोपहरी में भी मड़वा के नीचे कितनी ठंडक है ? इसी को तो कहते हैं, हरियर मड़वा।
     मड़वा के बाजू में ही चूल बनाया गया है, बड़े-बड़े तीन चूल्हों में खाना पक रहा है। भात का अंधना सनसना रहा है। बड़ी सी कड़ाही में आलू-भटे की सब्जी खदबद-खदबद डबक रहा है। साग के मसालों की खुशबू से सारा घर महक रहा है। आज जाति-बिरादरी वालों का पंगत जो है।
आज ही तेलमाटी-चुलमाटी का नेग होना है। तेल चढ़ाने का नेग भी आज ही होना है। तेल उतारने का काम बरात आने से पहले निबटा लिया जायेगा।  बरात कल आने वाली है। माँ-बाप की दुलारी बेटी फूलो कल पराई हो जायेगी, मेहमान बन जायेगी।
     सज्ञान बेटी कब तक महतारी-बाप के कोरा में समायेगी ? माँ-बाप का कोरा एक न एक दिन छोटा पड़ ही जाता है। दो साल पहले से ही फूलो के लिये सगा आ रहे थे। सरकारी नियम-कानून नहीं होते तो फगनू अब तक नाना बन चुका होता। फिर बेटी का बिहाव करना कोई सरल काम है क्या ? हाल कमाना, हाल खाना। लाख उदिम किया गया, बेटी की शादी के लिये चार पैसे जुड़ जाय,पर गरीब यदि बचायेगा तो खायेगा क्या ?
     घर में शादी का मड़वा सजा हुआ है और फगनू  की अंटी में आज कोरी भर भी रूपया नहीं है।
     बहन-भाँटो का फगनू को बड़ा सहारा है। सारी जिम्मेदारी इन्हीं दोनों ने उठा रखी है। ढेड़हिन-ढेड़हा भी यही दोनों हैं, फूफू - फूफा के रहते भला कोई दूसरा ढेड़हिन-ढेड़हा कैसे हो सकता है ? बहन-भाँटो बिलकुल बनिहार नहीं हैं, पुरखों का छोड़ा हुआ दो एकड़ की  खेती है, साल भर खाने लायक अनाज तो हो ही जाता है, फिर रोजी मजूरी तो करना ही है। फूफू  ने भतीजी की शादी के लिये काफी तैयारियाँ की हुई है। भाई की माली हालत तो जानती ही है वह। झोला भर कर सुकसा भाजी,काठा भर लाखड़ी का दाल, पैली भर उड़द की दाल और पाँच काठा चाँउर लेकर आई है। बाकी सगे-संबंधियों ने भी इच्छा अनुसार मदद किया है फगनू की। पारा-मुहल्ला वालों ने भी मदद की है, आखिर गाँव में एक की बेटी सबकी बेटी जो होती है। गरीब की मदद गरीब नहीं करे तो और कौन करेगा। फगनू को बड़ा हल्‍का  लग रहा है।
     मुहल्ले के कुछ लड़कों ने बजनहा पार्टी बनाया हैं, अभी-अभी  बाजा खरीदे हैं और बजाना सीख रहे हैं। कल ही की बात है, लड़के लोग खुद आकर कहने लगे - ’’ जादा नइ लेन कका · , पाँच सौ एक दे देबे। फूलों के बिहाव म बजा देबों।’’
     फगनू ने हाथ जोड़ लिया। कहा - ’’काबर ठटठा मड़ाथो बेटा हो, इहाँ नून लेय बर पइसा नइ हे, तुँहर बर कहाँ ले लाहू ? ’’
     बजनहा लड़के  कहने लगे - ’’हमर रहत ले तंय फिकर झन कर कका, गाँव-घर के बात ए, बस एक ठन नरिहर बाजा के मान करे बर अउ एक ठन चोंगी हमर मन के मान करे बर दे देबे, सब निपट जाही।’’
     इसी तरह से सबने फगनू की मदद की। सबकी मदद पाकर ही उसने इतना बड़ा यज्ञ रचाया है।
     भगवान की भी इच्छा रही होगी, तभी तो मनमाफिक सजन मिला है। होने वाला दामाद तो सोलह आना है ही, समधी भी बड़ा समझदार है। रिश्ता एक  ही बार में तय हो गया।
पंदरही पीछे की बात है, सांझ का समय था। कुछ देर पहले ही फगनू मजदूरी पर से लौटा था। समारू कका आ धमका। दूर से ही आवाज लगाया - ’’अरे ! फगनू , हाबस का जी ? ’’
समारू कका की आवाज बखूबी पहचानता है फगनू, पर इस समय उसके आने पर वह अकचका गया। खाट की ओर ऊँगली से इशारा करते हुए कहा - ’’आ कका, बइठ। कते डहर ले आवत हस, कुछू बुता हे का ? ’’
     समारू के पास बैठने का समय नहीं था। बिना किसी भूमिका के शुरू हो गया - ’’बइठना तो हे बेटा, फेर ये बता, तंय एसो बेटी ल हारबे का ? सज्ञान तो होइच् गे हे, अब तो अठारहा साल घला पूर गे होही। भोलापुर के सगा आय हें, कहितेस ते लातेंव।’’
     फगनू का आशंकित मन शांत हुआ। हृदय की धड़कनें संयत हुई, कहा - ’’ठंउका केहेस कका, पराया धन बेटी; एक न एक दिन तो हारनच् हे। तंय तो सियान आवस, सबके कारज ल सिधोथस, कइसनों कर के मोरो थिरबहा लगा देतेस बाप, तोर पाँव परत हँव।’’
    समारू कका फगनू को अच्छी तरह जानता है। बिरादरी का मुखिया है वह। सज्ञान बेटी के बाप पर क्या गुजरता है, इसे भी वह अच्छी तरह जानता है। ढाढस बंधाते हुए कहा - ’’होइहैं वही जो राम रचि राखा। सब काम ह बनथे बइहा, तंय चाय-पानी के तियारी कर, फूलो ल घला साव-चेती कर दे। मंय सगा ल लावत हँव।’’
    समारू कका  अच्छी तरह जानता है - चाय-पानी की तैयारी में वक्त लगेगा। बेटी को भी तैयार होने में वक्त लगेगा। इसीलिये सगा को कुछ देर अपने घर बिलमाये रखा। तैयारी के लिये पर्याप्त समय देकर ही वह मेहमानों को लेकर फगनू के घर पहुँचा। इस बीच समय कैसे बीता, फगनू को पता ही न चला। उसे समारू कका की जल्दबाजी पर गुस्सा आया, सोचा - कितनी जल्दी पड़ी है कका को, तैयारी तो कर लेने दिया होता ? पर मन को काबू में करते हुए उसने मेहमानों का खुशी-खुशी स्वागत किया।
    हाथ-पैर धोने के लिये पानी दिया गया। आदर के साथ खाट पर बिठाया गया। चाय-पानी और चोंगी-माखुर के लिये पूछा गया।
    वे दो थे। फगनू ने अंदाजा लगाया - साथ का लड़का ही होने वाला दामाद होगा। बुजुर्ग चाहे उसका बाप हो या कोई और। मौका देखकर फगनू ने ही बात आगे बढ़ाई। मेहमानों को लक्ष्य करते हुये उसने समारू कका से पूछा - ’’सगा मन ह कोन गाँव के कका ?’’
जवाब देने में बुजुर्ग मेहमान ही आगे हो गया, कहा - ’हमन भोलापुर रहिथन सगा, मोर नाँव किरीत हे।’’ अपने बेटे की ओर  इशारा करके कहा - ’’ये बाबू ह मोर बेटा ए, राधे नाँव हे। सुने रेहेन, तुँहर घर बेटी हे, तब इही बेटा के बदला बेटी माँगे बर आय हंव।’’
    फगनू अनपढ़ है तो क्या हुआ, बात के एक-एक आखर का मतलब निकाल लेता है, बोलने वाले की हैसियत को तौल लेता है। मेहमान की बात सुनकर समझ गया, सगा नेक है। वरना लड़की मांगने आने वालों की बात ही मत पूछो। कहेंगे, ’गाय-बछरू खोजे बर तो आय हन जी।’ इस तरह की बातें सुनकर फगनू का, एड़ी का रिस माथा में चढ़ जाता है। बेटी को पशु समझकर ऐसी बात करते हैं क्या ये लोग ? इस तरह के दूषित भाव यदि पहले से ही इनके मन में है तो पराए घर की बेटी का क्या मान रख सकेगा  येे ? कितना दुलार दे सकेगे ये लोग ? पर यह सगा ऐसा नहीं है। कहता है, बेटा के बदला बेटी मांगने आए हैं। कितना सुंदर भाव है सगा के मन में। लड़का भी सुंदर और तंदरूस्त दिख रहा है। ठुकराने लायक नहीं हैं यह रिश्ता। फगनू  ने मन ही मन बेटी को हार दिया। रह गई बात लड़की और लड़के की इच्छा की,घर गोसानिन के राय की। यह जानना भी तो जरूरी है।
    सबने हामी भरी और रिश्ता तय हो गया।
    लड़के के बाप ने कहा - ’’ जनम भर बर सजन जुड़े बर जावत हन जी सगा, हमर परिस्थिति के बारे म तो पूछबे नइ करेस, फेर बताना हमर फरज बनथे। हम तो बनिहार आवन भइ, बेटी ह आज बिहा के जाही अउ काली वोला बनी म जाय बर पड़ही, मन होही ते काली घर देखे बर आ जाहू।’’
     फगनू भी बात करने में कम नहीं है। बात के बदला बात अउ भात के बदला भात, कहा - ’’बनिहार के घर म काला देखे बर जाबो जी सगा, हमूँ बनिहार, तहूँ बनिहार। चुमा लेय बर कोन दिन आहू , तउन ल बताव।’’
     इसी तरह से बात बनी और कल फूलों की बारात आने वाली है। आज फूलो की तेल चढ़ाई का रस्म पूरा किया जायेगा। एक - एक  करके नेंग निबटाये जा रहे हैं।
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    शाम का वक्त है। घर में सभी ओर गहमा-गहमी का माहौल है। कोई नाच रहा है तो कोई गा रहा है। फगनू  चिंता में डूबा हुआ कुछ सोंच रहा है। ठीक ही तो कहती है फूलो की माँ - ’’बेटी ल बिदा करबे त एक ठन लुगरा-पोलखा घला नइ देबे ? एक ठन संदूक ल घला नइ लेबे ? नाक - कान म कुछू नइ पहिराबे ? सोना-चाँदी ल हम बनिहार आदमी का ले सकबो, बजरहूच् ल ले दे। लइका ह काली ले रटन धरे हे।’’
     पर क्या करे फगनू ? अंटी में तो पैसा है नहीं। कल से जुगाड़ में लगा हुआ है। किस- किस के पास हाथ नहीं फैलाया होगा ? सेठ लोग कहते हैं - ’’रहन के लिये कुछ लाए हो ? ’’
रहन में रखने के लिए क्या है उसके पास ? वह मेहनती है, ईमानदार है, सच्चा है सद्चरित्र है। पंडे-पुजारी और ज्ञानी-ध्यानी लोग मनुष्य के अंदर जितनी अच्छी-अच्छी बातों की अनिवार्यता बताते हैं। वह सब हैं फगनू के पास। और यदि इन ज्ञानी-ध्यानियों की बातों का विश्वास किया जाय तो ईश्वर भी फगनू के ही पास है, क्योंकि भगवान सबसे अधिक गरीबों के ही निकट तो रहता है। इस दुनिया में फगनू के समान गरीब दूसरा कोई और होगा क्या ? पर ये सब बेकार की चीजें हैं, इसके बदले में फगनू को पैसा नहीं मिल सकता। मंदिर का भगवान भले ही लाखों-करोड़ों का होता है, पर जो भगवान उसके निकट है, दुनिया में उसका कोई मोल नहीं है। उसे रहन में रखने के लिये कोई तैयार नहीं है। इससे फूलो की बिदाई के लिये सामान नहीं खरीदा जा सकता। फूलो के लिये कपड़े और गहने नहीं मिल सकते हैं इसके बदले में।
     पंडे-पुजारी और ज्ञानी-ध्यानी लोग मनुष्य के अंदर जितनी अच्छी-अच्छी बातों की अनिवार्यता बताते हैं। मालिके के पास उनमें से कुछ भी नहीं है। भगवान भी उसके निकट नहीं रहता होगा, फिर भी उसके पास सब कुछ है। पैसा जो है उसके पास। वह कुछ भी खरीद सकता है।
     फगनू  ने जीवन में पहली बार अपनी दरिद्रता को , दरिद्रता की पीड़ा को, दरिद्रता की क्रूरता  को उनके समस्त अवयवों के साथ,  अपने रोम-रोम के जरिये, दिल की गहराइयों के जरिये,अब तक  उपयोग में न लाये गए दिमाग के कोरेपन के जरिये, मन के अनंत विस्तार के जरिये, और आत्मा की अतल गहराइयों के जरिये महसूस किया।
      थक -हार कर, आत्मा को मार कर, न चाहते हुए भी वह मालिके के पास गया था। उनकी बातें सुनकर फगनू का खून खौल उठा था। जी में आया, साले निर्लज्ज और नीच के शरीर की बोटियाँ नोचकर कुत्तों और कौओं को खिला देेना चाहिये। कहता है - ’’तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी का मैं क्या करूँगा रे फगनू । मैं तो एक हाथ से देता हूँ और दूसरे हाथ से लेता हूँ। जिसके लिये तुझे पैसा चाहिये, जा उसी को भेज दे, सब इंतिजाम हो जायेगा, जा।’’
     फूलो की माँ को उसने अपनी बेबसी बता दिया है और सख्त ताकीद भी कर दिया है कि अब किसी के सामने हाथ फैलाने की कोई जरूरत नहीं है। लड़की कल तक जो पहनते आई है, उसी में बिदा कर देना है। लड़की को दुख ज्यादा होगा, थोड़ा सा और रो लेगी, माँ-बाप को बद्दुआ दे लेगी। रही बात दुनिया की, उसकी तो आदत है हँसने की, करोड़ों रूपये खर्च करने वालों पर भी हँसती है वह। वह तो हँसेगी ही।
     फूलो को तेल चढ़ाने का वक्त आ गया है। ढेड़हिन-सुवासिन सब हड़बड़ाए हुए हैं। सब फूलो और उसकी माँ पर झुँझलाए हुए हैं। फूफूू  कह रही है - ’’अइ ! बड़ बिचित्र हे भई, फूलो के दाई ह, नेंग-जोग ल त होवन देतिस, बजार ह भागे जावत रिहिस ? नोनी ल धर के बजार चल दिस।’’
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     आज फूलो की बारात आने वाली है। फगनू  बेसुध होकर नाच रहा है। मंद- महुवा का कभी बास न लेने वाला फगनू आज सुबह से ही लटलटा कर पिया हुआ है। फूलो का मासूम और सुंदर चेहरा रह-रह कर उसकी नजरों में झूम रहा है। चाँद-सा सुंदर चेहरा है, नाक में नथनी झूम रहा है, कान में झुमका और पैरों में पैरपट्टी पहनी हुई है। सरग की परी से भी सुंदर लग रही है फूलो।
फूलो के लिये खरीदा गया बड़ा सा वह संदूक भी उसकी नजरों से जाता नहीं है, जो नये कपड़ों, क्रीम-पावडरों और साबुन-शेम्पुओं से अटा पड़ा है।
     अब सबको बारात की ही प्रतीक्षा है। सब खुश हैं। सबको अचरज भी हो रहा हैं, सुबह से फगनू के मंद पी-पी कर नाचने पर। कोई कह रहा है - ’’बेटी ल बिदा करे म कतका दुख होथे तेला बापेच् ह जानथे, का होइस, आज थोकुन पी ले हे बिचारा ह ते ? ’’
जितने मुँह, उतनी बातें।
      फगनू अब नाच नहीं रहा है, नाचते-नाचते वह लुड़क गया है। कौन क्या कर रहा है, कौन क्या बोल रहा है, उसे कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। उसके कानों में तो मालिक की बातें पिघले शीशे की तरह ढल रही हैं - ’’ तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी का मैं क्या करूँगा रे फगनू । मैं तो एक हाथ से देता हूँ और दूसरे हाथ से लेता हूँ। जिसके लिये तुझे पैसा चाहिये, जा उसी को भेज दे, सब इंतिजाम हो जायेगा, जा।’’
      फगनू  सोच रहा है, जीवन में पहली बार सोच रहा है - ताकत जरूरी है। शरीर की भी और मन की भी। बिना ताकत सब बेकार है। ताकत नहीं है इसीलिये तो उसके पास कुछ नहीं है।
और उसकी नजरों में वह कुल्हाड़ी उतर आया जिसकी धार को उसने दो दिन पहले ही चमकाया था। वह सोच रहा था - आज तक कितने निरीह और निष्पाप पेड़ की जड़ों को काटा है मैंने इससे। क्या इससे अपनी जहालत और दरित्रता की जड़ों को नहीं काट सकता था ?
पता -
व्याख्याता,
शास. उच्च. माध्य. शाला कन्हारपुरी,
 राजनांदगांव 

तारनहार

 धर्मेन्द्र निर्मल

     परेमीन गली म पछुवाएच हे। धनेस दउड़त आके अॅगना म हॅफरत खड़ा होगे। लइका के मिले लइका,सियान के मिले सियान। नरेस ह धनेस ल देख खुसी के मारे फूले नई समइस। चिल्लावत बताइस - दाइ! फुफु मन आगे। भगवनतीन कुरिया ले निकलके देखथे डेढ़सास परेमीन अउ भॉचा धनेस अॅगना म खड़े हे। भगवन्तिन लोटा भर पानी देके परेमीन संग जोहार भेंट करिस। धनेस के पाँव छूवत चउज करत हॉंसत कहिथे - '' अलवइन भाँचा फेर आगे दई।'' भगवन्तिन के गोठ ल सुन के जम्मो झन हाँस भरिन। पाँव छूते साठ भगवन्तिन तीर म खड़े अपन देरानी ल सुर धर के बताय लगिस - '' इहि भाचा हॅ पउर साल आये राहय। यहा बड़े पुक म मोर मंघार ल मार दिस दाई ! मैं मुड़ धर के बइठ गेव। तॅंवारा मारे कस होगे। भगवन्तिन के गोठ ल सुन के देरानी देवकी अउ धनेस के महतारी परेमीन एक दूसर के मुॅह ल देखके मिलखियावत हांसे लगिन। परेमीन मुसकियावत पूछथे - '' काय पुक बहुरिया काये किरकेट कहिथे तइसने खेलत रहिस हे।'' हाथ ल हलावत भगवन्तिन बताइस अउ धनेस ल बोकबाय देखे लगिस। धनेस लजावत मुच - मुच करत एक कोन्टा म खड़ा होगे। गाय- गरूवा मन खाए ल पचोएबर पगुरावत रइथे तइसे भगवन्तिन एक ठन गोठ ल कई घॅव एमेर .ओमेर पचार के पचोथे। देरानी जेठानी अउ गांव भर सब भगवन्तिन ल पचारन कहिथे। भगवन्तिन के मन म काकरो बर घिना - तिरसकार नई राहय। कुछु बात रहय बिगर लाग - लपेट के कहे, बोले के आदत हे भगवन्तिन के। भूले बिसरे कासी गोत तइसे कस नवा - जुन्नी सबो गोठ भगवन्तिन के मुॅहजबानी खाता म रहिथे।
    लइका मन अबोध होथे। पानी म जनम के घलो पुरईन पान ह पानीच ल अपन ऊपर नई लोटन दय तइसे लइका मन कोनो बात ल मन म नइ धरय। बडे - बडे मन पांव.परलगी, गोठ बात, हाल - चाल पूछइ म भुलागे त नरेस अउ धनेस दुनियादारी रित - रिवाज सब ल भुलाके अपन खेल - खेलवना, बॅाटी - भॅवरा,गिल्ली - डंडा रमगे। नफा - नुकसान,सुख- दुख, मान - सम्मान,उॅंच- नीच बडे मन देखथे।लइका मन ल का चाही पेट भर खाना ससन भर खेल।खेल .खेलवना, उछल - कूद,संग- संगवारी अतके इंकर सनसार ये। सिध महात्मा मन जग के सुख - दुख ले जइसे बेफिकर होथे तइसे कस लइका मन होथे, तेखरे सेती लइका मन ल भगवान माने गे हे।
    मंझनिया भगेला खेत ले घर लहुटिस। धनेस ल देखके गदगद होगे। भूख पियास अउ सरी जॉगर भर थकान ल कोन्टा के खूंटी म टांग के भगवन्तिन ल चिहुॅकत कहिथे -'' हमार तारनहार आगे, लान वो थारी- लोटा,पीढा- पानी ल, देवता के चरन पखारबो। धनेस घला एकरे अगोरा म मने मन ममा के बांट जोहत रहय। हर दफे अइसने होथे। ममा - भॅाचा दूनो ऐला नई बिसरय। ममा, भॅाचा ल तारनहार समझथे, त भॉचा ह ममा ल काम चलउ बैंक। काबर के ममा - मामी चरन पखार- पोंछ के चरनामरित लेथे तहेन भॅाचा ल दान-पुन घलो करथे। भगेला मनखे के पूजा ल भगवान पूजा मानथे। भॅाचे भर के बात नईहे, कोन्हो लइका होय भगेला बर भगवाने सरूप होथे। भगवान, जेला जात-पात, उंच- नींच के चिन्हारी नई रहय। ओइसने लइका मन होथे। भोला भंडारी। धुर्रा - माटी, छोटे- बड़े, जात- कुजात नई जानय। माने, असार जगत के सार ल भगेला भगत सोला आना समझ गेहेे।
    मंझनिया बेरा धनेस ह खेलते खेलत नरेस के बॉंटा रोटी ल झटक के खा दिस। नरेस बोम फार के रोय लगिस। भगेला नरेस ल भुलवार - पुचकार दिस- ले अउ बना लेबो बेटा! खावन दे, भाई हरे। अउ अपन छाती म अपन करेजा नरेस ल सपटा- थपटके ओकर जीव ल जुड़ोदिस।
   घंटा नई बीते पइस भगवन्तिन अचरज म मुंहफार के बोमियाइस- अई हाय! देखत हस,परलोकिया भॅाचा हॅं चुरत दूध ल ढार के पी डरिस। लइका के जात कइसे करबे।पीयन दे। भगेला कइथे। भगवन्तिन हाथ ल बीता भर हलावत सांस ल लमाइस- जम्मो ल पी डरे हे, कसेली हॅं ठाढ़ सुख्खा पर गे हे।दूध ल पी दिस त का गाय ह दूधे नइ देही कहिके भगेला हा भगवन्तिन के मॅुह ल तोप- ढांक दिस। भगवन्तिन सरी बात बर टिंगटिंगही त भगेला हा शांति बर ओकर ले डंकाभर आगु। तै डारा डारा त मैं पाना पाना। भगेला ल तीनो पीढी़ म कोन्हो गुसियावत न देखे हे न सुने हे। जनम के गरूवा आय।
    चार .छै दिन रही के धनेस मन महतारी बेटा गांव लहुट गय। भगेला भगवन्तिन भाव भजन भर के बिदा करिन। रतिहा भगवन्तिन पूछ बइठिस. कस जी ! भॉचा मन एकर पहिली कई घॅंव अइस .गइस पहिली दफे आज तुॅहर आंखी ले ऑंसू ढरकत देखे हॅंव। का बात ये। अइसन तो तुमन बेटी के बिदई म नई रोय हव। भगेला ससन भर सॉंस ल तीर के कहिथे -. तय नई जानस जकली, भाचा ह मोर बर सहिच म तारनहार हे। भगवन्तिन चेंधे बिना नइ रहे सकिस - कइसे। भगेला बताय लगिस।
    एक दिन भगेला अकेल्ला कुरिया म बइठे रहय। धनेस कहां ले आइस अउ पूछथे.कइसे गुमसुम .गुमसुम बइठे रहिथस ममा,गजब चिन्ता - फिकर करथस तइसे लागथे। भगेला कहिस - का करबे भांचा ! एक तो आधा उमर म बेटा पाएंव। हिम्मत करके पढाय - लिखाय के उदीम करथॅव त नरेस के पढ़इ - लिखइ म चिटिकन चेत नइहे। तैं नम्मी चढ़गे अउ ओला देख। धनेस कहिथे - नरेस काली संझा बतावत रहिस हे के तोर फिसिर - फिसिर ल देख के चिन्ता म नरेस नइ पढ़ सकत हे अउ ओकर फिकर म तैं चुरत- अउंटत हस। नरियर ह निछाय नइहे खुरहेरी के फिकर करत हव। चिन्ता ह चिता कोती तीरथे। तैं अपन इलाज पानी ल बने ढंगलगहा करवा,भविस के चिन्ता ल छोड। अपन तन ल घुरो .चुरो के धन बचइ लेबे ओला लइका बिगाड़ दिस त का काम के अउ कहॅू कुछू नई बना पायेस, लइका हॅ अपन समझदारी से भविस म कुछु बना लिस त तोर ए चिन्ता फिकर काएच काम के। पुत सपुत त का धन जोरय पुत कपुत का धन जोरय। भगेला ल घर बइठे संसार के गियान मिलगे। जिनगी के आखिरी पाहरो म भगवान, भगेला के आगू म साकछात खड़ा होके गीता सुना दिस। भगेला भांचा भगवान के दूनो पॉंव ल धर लिस - आज तैं मोला जीयत तार दिए ददा अउ भगेला के दूनो आंखी ले तरतर - तरतर गंगा - जमुना के धार फूटके ढरक गे। 
                                                 ग्राम व पोस्ट कुरूद
                                                   भिलाई (छत्‍तीसगढ़)

घरेलू.पति

राजा सिंह

    विशेष सोच रहा हैं। आने का सम्भावित समय निकल गया हैं।.........अब तो सात भी बज चुके हैं। शंका-कुशंका डेरा डालने लगी थीं।.........अणिमा अब तक निश्चय ही आ जाती हैं । फिर आज क्या हुआ ? अनहोनी की आशंका से वह ग्रस्त होता जा रहा है।......... एक नजर किटटू पर जाती है और फिर दूसरी नजर बेबी पर आकर ठहर जाती हैं।.......... अगले ही पल उसकी निगाह घड़ी की टिक-टिक पर स्थिर हो जाती और वहॉ से उसके कान टिक-टिक से इतर कुछ और सुनने को तत्पर होते हैं, शायद काल बेल की आवाज या दरवाजे की ठक-ठक।......ऐसा कुछ भी आभास नहीं होता है, निराश वापस कमरे पर आकर घूमने लगती है।........उसका मन किया उसे काल करी जाये, परन्तु ठिठक गया। अणिमा का रिसपांस ऐसे मामलों में काफी तल्ख होता है और उसकी काल करने कह भावना को ठेस लगेगी। उसकी काल अपना अर्थ खो देगी और परिवाद को जन्म देगी और उसकी चिंता परिहास बनकर रह जायेगी। आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा और वातावरण कलुषित हो जायेगा। इन्तजार करते है।
    इधर काफी दिनों से वह महसूस करता है कि अणिमा बात-बात पर झल्ला उठती है। उस पर उसकी जासूसी करने का आरोप मढ़ देती है, जब वह कुछ उससे पूॅंछ-तॉंछ करने लगता है। फिर भी उसे देर से आने का कारण पहले से बता देना चाहिए था। एक काल तो कर सकती थी। अब तो यह निश्चित हो गया है कि वह अपने आप कुछ नहीं बताती। उसे ही पूछॅंना पड़ता हैं। .......और उत्तर कटीलें प्राप्त होतें हैं। मगर आज वह पूॅंछ कर रहेगा, उसकी जिम्मेदारी बनती है।
    किट्टू स्कूल से आया था, उसे खिला-पिलाकर सुला दिया था। इस समय वह उठकर होमवर्क कर रहा है। उसने एक बार भी मम्मी के विषय में नहीं पूॅछा। वह समझदार हो गया है, मम्मी छै-साढ़े छै के बाद ही आयेगीं। विशेष ने उससे होमवर्क में हेल्प करने के बाबत पूॅंछा था, उसने कहा था जरूरत होगी तो बतायेगां। बेबी इस समय सो रही है। आज काफी तंग किया उसने । रो रही थी। शायद बेवजह या उसकी समझ से परे था उसका कारण। अणिमा को पता लग जाता था उसके रोने का कारण। खैर! थोड़ी देर बाद वह खुद चुप हो गई। उसने उसे दूध पिलाया। वह फिर सो गई, क्षुधा शान्त होने की वजह से या रोकर थकने की वजह से। उसने महसूस किया शायद उसे अपनी मम्मी की याद आ रही होगी। परन्तु वह तो था। अक्सर वही रहता है, कोई नई बात नहीं है। ........बच्चों का क्या किस बात पर मचल गये, क्या पता ? वह अभी तक अनुमान नहीं लगा पाता है।
    अणिमा और विशेष एक ही कोचिंग स्कूल में पढ़ाते थे। अणिमा अंग्रेजी और वह मैथ। एक दूसरे से अच्छी पहचान हुई, जो प्रेम पर पहुॅच गयी, जिसकी परिणिति शादी में हो गई । उन लोगों ने घर वालों के विरोध को दरकिनार कर दिया और अपनी अलग दुनिया बसा ली । दोनों खुश और संतुष्ट थे, अपनी पंसद को पाकर।
    उनकी जिन्दगी में परिवर्तन लेकर आया, केन्द्रीय विद्यालय संगठन की अध्यापकीय नियुक्ति का विज्ञापन । दोनों ने एक साथ जूनियर अध्यापक पद के लिए अप्लाई किया। जहॉं अणिमा जांब पाने में सफल रही, वही विशेष अपने एक्सीलेन्ट एकाडेमिक कैरियर न होने की वजह से असफल रहा। अणिमा को कानपुर सेन्ट्रल स्कूल, अर्मापुर में पोस्टिंग मिली। दोनों को अलग होना मंजूर नहीं था। दोनों ने मिल कर निर्णय किया कि गाजियाबाद से शिफ्ट कर के अब कानपुर रहा जायेगा और विशेष कानपुर के किसी प्राइवेट स्कूल या कोचिंग में जॉब कर लेगा। ऐसा ही हुआ।
    लाल बंगला के कोचिंग इन्स्टीट्यूट में उसे पढ़ाने का जॉंब मिल गया और फिर वहीं दो कमरे का एक पोर्शन रहने के लिए। केन्र्द्रीय विद्यालय अर्मापुर वहॉं से काफी दूर था। घर से अणिमा को वह बस स्टैंड, स्कूटर से छोड़कर आता और वहॉं से अणिमा बस द्वारा अर्मापुर स्टेट तक और स्कूल तक पैदल। स्कूल से पढ़ाकर लौट कर आते-आते साढ़े छै से सात बज जाते थे। घर का काम सहयोग भावना से चल रहा था और विशेष का प्रयास भी एक बेहतर नौकरी पाने की लालसा से जोर-शोर से चल रहा था, कि उनकी जिन्दगी में तीसरे का प्रवेश हो गया। किट्टू आ गया । उसके आते ही चिन्ताओं और उलझनों की आमद भी हो गई । जब तक अणिमा का प्रसव अवकाश चलता रहा स्थिति सामान्य रही। उसके बाद यक्ष प्रश्न सामने खड़ा हो गया, किट्टू की परिवरिश का। उस इलाकें में क्रैंच कोई नहीं था। अब दो में कोई एक ही नौंकरी कर सकता थां अणिमा की नौंकरी सरकारी और स्थायी थी और उसकी सैलरी भी विशेष से तीन गुना ज्यादा थीं । इसलिए विशेष को ही अपनी नौंकरी की तिलांजलि देनी पड़ीं। उसने सोचा जब तक बच्चा बड़ा नहीं हो जाता वह घर पर ही एक-दो-प्राइवेट ट्यूशन पढ़ा लिया करेगा और उसके बाद कोई रेगुलर जॉब पकड़ लेगा। इस बीच उसे एक अच्छी नौंकरी पाने के प्रयास को बल मिलेगा। क्योंकि अब उसके पास तैयारी के लिये अधिक समय मिल सकेगा।
    मगर सोचा होता कहॉ है घर में दो ट्यूशनें थी। किट्टू था। घर की सम्पूर्ण व्यवस्था थी। अणिमा का सहययोग कम से कमतर होता गया। अणिमा की नौंकरी से आयी अतिरिक्त व्यवस्था व्यवधान दूर करने की जिममेदारी थी। उसके लिए नोट्स बनाना, प्रोजेक्ट वर्क तैयार करना और घर लायी कापियां जांचने में सहयोग, तथा अणिमा समय से स्कूल पहंॅुच जाये यह भी सुंनिश्चित करना था। उसके अपने लिए समय नहीं था। परन्तु खलिस का एक रेशा भी उसके पास नहीं था, क्यों कि वह प्रेम और हर्ष में था।
    किट्टू बड़ा हुआ। नर्सरी में यही एडमीशन दिलवाया गया, क्योंकि केन्द्रीय विद्यालय में नर्सरी की कक्षायें सुबह लगती थी और अणिमा की क्लासेज 10 बजे से प्रारम्भ होती थी। इसलिए मॉ-बेटे स्कूल भी साथ नहीं जा सके। अब किटृटू को स्कूल भेजने और वापस लाने की जिममेदारी भी आ गईं घर के काम काज के लिए कामवाली रखी गई। वह अपने को फ्री नहीं कर पा रहा था किसी भी बाहरी जॉब के लिएं। किसी तरह कामवाली की सहायता से एडजस्ट हो रहा था। उसने पार्ट-टाइम जॉब करने की कोशिश की 7 बजे से 10 बजे रात में। परन्तु चल नहीं पा रहा था, लड़खड़ा रहा थां। इसी बीच बेबी आ गई। एक आया भी रखी गईं सब आया और कामवाली के भरोसे चलने लगा या घिसटने लगा या खींचा जाने लगा। उन दोंनों में कुछ नहीं बचा। रह गई तो खीज हताशा और अस्त व्यस्त होती जिंदगी में तनाव।
    विशेष सोच रहा था इस समय हम दोंनों नौंकरी करेंगे तो कैसे सुखमय रह पायेंगे? हमारे पीछे बच्चों को कितनी परेशानी होगी । आया व नौंकरों का कोई भरोसा नहीं कि वे कब आयेंगे, कब जायेंगे और समय पर आयेंगे भी या नहीं। फिर हम दोंनों की अनुपस्थिति में वे लोग किस तरह और किस ढंग से ट्रीट करेंगे, क्या पता ? हम अलग तनावग्रस्त रहेंगे और बच्चे अलग। बड़े होने तक वे सामान्य रह पायेंगे या नहीं। उसने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया, हम दोंनों में से किसी एक को ही नौंकरी करना चाहिए और दूसरा तब तक घर सम्हालेगा जब तक बच्चे बड़े न हो जायें। जाहिर था, विशेष को ही बैठना पड़ा। इसमें अजीब और असंगत जरूर लग रहा था, परन्तु अपने और अपने बच्चों के खातिर यह उचित ही लगा। आपाधापी भरी जिंदगी में उनका प्यार मर रहा था इसको बचाने के लिए उसे अपने पुरूष अहं को मारना पड़ा था।
    वह घरेलू पति था, परन्तु उसके अधिपत्य को कोई चुनौती नहीं थीं वह पूर्ववत घर का मालिक था और उसका डर तथा दबदबा कायम था। हर महीने की पहली तारीख को अणिमा की पूरी की पूरी सैलरी, उसके हाथ में होती थीं और वह उसे अपनी मन मर्जी से खर्च करता था। अणिमा भी अपना दैनिक खर्चा उससे मांग कर लेती थीं कहीं भी आने जाने पर उसका नियंत्रण था। स्कूल के अतिरिक्त अणिमा का उसके साथ ही आना-जाना सम्भव था। वह जो भी कुछ करता था वह सब अणिमा पर अहसान होता था, जो वह गाहे-बगाहे अहसास दिलाया करता था। कुल-मिलाकर उसका जलबा कायम था।
    अणिमा आई और सोफे पर निढाल होकर पसर गई। वह गुस्से और तनाव में था। उसे उसके ऊपर कोई सहानुभूति नहीं उभरी थी। .......वह देर से आने के कारण उस पर कुपित था। ..........कहीं मटक रही होगी? घर आने की जल्दी क्या है? घर में मरने के लिए पति तो बैठा ही है। ........उसकी सोच दूषित दिशा में चल रही थीं। बेबी रोयी। सोकर उठी थी। अणिमा तुरन्त हरकत में आई और भागकर बेबी को उठाया और पुचकार-सहला कर उसे चुप कराने में लग गयीं, अब वह वापस बेबी के साथ सोफे में धंस गयी। लगता है थकान गहरी हैं।
    विशेष ने अपनी डृयूटी कीं उसने नाश्ता और चाय लाकर उसके सामने टेबुल पर रख दिया और खुद किट्टू को पढ़ाने चल दिया। अब तक अणिमा भांप चुकी थी कि वह नाराज हैं और दिनों की तरह उसने हुलस कर स्वागत् नहीं किया था, न कुशल क्षेम पूछी थी। एक तरह से उसके आगमन को उपेक्षित किया था। उसने आने आप को रोमांसिकता में ढाला ''क्यों मुॅह क्यों फुला रखा है '' आवाज संयत, स्थिर और मुलायम थी। विशेष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने बेबी को वहीं सोफे पर बिठाया और लगभग दौड़ते हुये, उसे बांह से पकड़ा।
    ''नाराज हो?'' क्या हुआ ?  अबकी उसका स्वर मनौवल और मुस्कराहट युक्त था। वह पलटा और लगभग घूरते हुए बका।
    ''कहॉ मटक रही थीं? इतनी देर कैसे हुई? कुछ बताने की जरूरत है कि नहीं?'' प्रश्नों की बौछार और होती कि उसकी नजर उन आंखों पर टिक गई जहॉ निरीहता टपक रही थी। ........
    'अरे! डियर, बस का टायर फट गया था, उसको ठीक होने में समय लग गया। इस कारण देर हुई। इसमें नाराज होने वाली क्या बात थी?'
    ''बता नहीं सकती थीं? सोच सकती हो कि मेरी क्या हालत थी, जब तक तुम नहीं आई थीं।'' उसका स्वर मध्यम नहीं पड़ा था।
    ''मैंने कोशिश की थी, परन्तु नेटवर्क काम नहीे कर रहा था। आने पर आपने पूछा नहीं जिसकी उम्मीद मैं कर रही थी, अपने आप रोना आता नहीं।' कुछ देर वे वैसे ही खड़े रहे। एक दूसरे को तौलते हुए। अणिमा ने उसे लगभग खींचते हुए सोफे पर बैठाया और उसकी आंखों में प्यार डाल दिया। वह खिल पड़ा।
    अणिमा ने उसे सामान्य कर दिया था। परन्तु आंतरिक रूप से वह अशान्त हो गयी थी। उसे चिढ़ लगती थी, खीज उठती थी, उसके अकारण गुस्सा करने और नखरें दिखाने पर। परन्तु वह बेबस थीं। विशेष एक आवश्यकता बन गया था, उसकी उपेक्षा नहीं कर सकती थी।
    विशेष सहज भाव से घर की व्यवस्था में रम गया था, परन्तु अणिमा असहज हो गयी थीं। उसे कुछ ऐसा लगता था कि उसकी जिंदगी में कुछ अधूरापन हैं। उसे विशेष का घर में बैठना रास नहीं आ रहा था। हालांकि उसके घर में रहने से घर-परिवार सुव्यवस्थित रूप से चल रहा था उसे भी आराम था। उसे घर और बाहर दोनों मोर्चों पर नहीं खटना पड़ रहा था, जैसा कि अन्य कामकाजी महिलाओं को करना पड़ता हैं हालात संतोषजनक थे, शिकायतें नगण्य थीं, परन्तु वह प्रसन्न नहीं थी। कुछ खटक सा रहा था।.......उसने कभी नहीं चाहा था कि विशेष स्थायी रूप से घर बैठ जाये और घर वाली भूमिका अंगीकार कर ले। थोड़े समय के लिये तो ठीक था और अच्छा भी लगा कि उसका पति उसके लिए इतना सोचता है और करता है। .........किन्तु उसे मर्द पति की कामना थी उसे औरत पति नहीं चाहिए था। इस वजह से उसने उसे कई बार उकसाया और तनियांया भी, परन्तु विशेष में तो जंग लग चुकी थी। उसको कुछ भी असंगत और आपत्तिजनक नहीं लग रहा थां। इसमें उसका कहीं भी पुरूष अहं आड़े नहीं आ रहा था।
     प्रिंसिपल के घर पर उनके बच्चे की बर्थडे पार्टी थी। स्कूल का सारा स्टाफ था अपने परिवार सहित। परिचय के दौर में प्रिंसिपल साहब ने विशेष से पॅूछ लिया आप कौंन सी जॉब में हैं।
     मैं हाऊस जॉब में हॅू। विशेष ने बिना किसी संकोच के निरपेक्ष भाव से जबाब दिया। सब हंस उठे थे और वह झेंप गई थी।
    अरे! ये मजाक कर रहे हैं, साहब सहारा इंडिया में मैंनेजर हैं। उसने झूठ बोलकर बचाव किया और विशेष को ईशारों से रोका चुप रहने के लिए। किसी ने नोटिस नहीं किया। अणिमा कई बार पति की जॉब बदल चुकी थी।
    घर आकर विशेष ने उससे काफी झगड़ा किया अपनी जॉब को लेकर। वे दोनों रात भर लड़ते-झगड़ते रहे। वह उसके झूठ बोलने के कारण प्रताणित और अपमानित करता रहा और वह अपनी जग हंसाई रोकने की दलील देकर अपने झूंठ को उचित बताती रही। बहस जारी रही थी रात के अंतिम प्रहर तक।
    एक दिन उन दोनों की मुलाकात माल में वाइस प्रिंसिपल और उनके पति से हो गईं। उनसे गुफ्तगू के बीच में, वह ध्यान रखती रही कि पतिदेव के जॉब की चर्चा न छिड़ जाये। परन्तु घर द्वार की बात करते करते अचानक वाइस प्रिंसिपल साहिबा ने पॅूछ लिया आप टीचर्स क्वार्टर, क्यों नहीं एलाट करवां लेती? इतनी दूर से आप कालेज आती हैं पैसा समय और एनर्जी बेमतलब बरबाद करती हैं इतने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर कैसे मैनेज करती हैं? क्या प्रोबलेम है? कानपुर में तो आपका कोई निजी घर भी नहीं है। किराये में ही तो रहती हैं, यहॉ पर भी आप?
    असल में मेरे पति महोदय की सर्विस यहीं पास में है, इन्हें तकलीफ हो जायेगी। उसे कोई बहाना नहीं सूझा। विशेष अविश्वसनीय नजरों से उसे तक रहा था।
    'अरे ! अणिमा आप भी कमाल करती हो। लड़की होकर, तुम यहॉ से अर्मापुर आ सकती हो, ये पुरूष होकर अर्मापुर से यहॉ नहीं आ सकते। वाइस प्रिसिंपल साहिबा ने झिड़का था, जिसकी छींटें विशेष को गहरे अपमानित कर रही थी।
    मैडम, हम लोग जल्दी ही क्वाटर के लिए अप्लाई कर देंगे। वास्तव में हम लोगों को पता नहीं था के क्वाटर खाली हैं, विशेष ने उत्सुक्तता और तत्परता दिखाईं । उसे पता ही नहीं था कि टीचिंग स्टाफ के लिए कालेज परिसर में क्वाटर भी है न कभी अणिमा ने जिक्र किया था।
    उस दिन की मुलाकात ने उन दोनों के बीच बहस-मुहावसों, तर्क-वितर्क, रोष-गुस्सा और लड़ाइयों की अनवरत श्रंृखला को जन्म दे दिया था। विघालय के सरकारी क्वाटर में जाने से समय, धन, उर्जा की बचत थी और भी ढेर सारी सुविधायें थी, नहीं थी तो पति की नौंकरी के विषय में झूठ बोलने की सुविधा। अणिमा को वहॉ शिफट होने का ऐतराज सिर्फ इसी कारण से था, जबकि विशेष को जिम्मेदारियों से अत्याधिक छूट मिलने की सम्भावना और अणिमा पर स्कूल के समय भी निगरानी बेहतर ढंग से हो पायेगी इसकी सुविधा। इस कारण वह लालायित था। उसे अणिमा का विरोध बहुत ही नागवार और नाजायज लग रहा था। युद्ध कई दिनों तक जारी रहा था, वे भूखे-प्यासे लड़ते रहे। परन्तु, अन्तत: जीत विशेष की हुई और अणिमा को समर्पण करना पड़ा। क्योंकि विशेष ने घर छोड़ने की धमकी दे दी थी।
    ''सम्हालो, अपनी दुनियां, मैं तो चला। तुम्हें मेरे काम न करने पर ऐतराज है और अपमान लगता है। मेरा घर का काम करने पर लज्जा आती है। तो मैं नौंकरी करने जा रहा हूॅ वापस गाज़ियाबाद। पुराने कोचिंग कालेज में मुझे अब भी जॉब मिल जायेगी।'' विशेष के इस हथियार की काट उसके पास नहीं थी। कभी भी नहीं थी। पति के रूप में जो प्यार, संरक्षण और सुविधा उसे प्राप्त थी, उसके विछोह की कल्पना मात्र से ही वह कांप उठती थी।
    तय यह किया गया कि अगले शैक्षिक सत्र से विद्यालय के क्वाटर में शिफ्ट किया जायेगा । किट्टू का वर्ष भी बरबाद नहीं होगा और बेबी का भी नर्सरी में एडमीशन करा दिया जायेगा।......परन्तु विशेष का क्या करें? अणिमा उलझन, चिंता और परेशानी में निरन्तर थी। तनाव अपने चरम पर था । वह हताशा की गिरफ्त में थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि घर के काम-काज में रम गये, और देवता की तरह स्थापित हो गये विशेष को कौन सी नौकरी आभूषित करा दी जायें कि उनकी और अपनी प्रतिष्ठा धूल-धूसरित होने से बच जायें और उनके घर में रहने, बसे रहने को जस्टीफाई किया जा सकें।
    सर फटा जा रहा था। उसने दर्द की एक गोली निगली और पानी पीकर लेट गई । दर्द कम होने लगा तो उसने सोने की भरपूर कोशिश की परन्तु उसके पास नींद नहीं आ रही थी। अपना ध्यान हटाने को तत्पर वह 'वनिता' मैगज़ीन उठाकर उलट-पुलट कर देखने लगी। वह बेमन से देख रही थी, उसका पढ़़ने का कोई इरादा नहीं था। मुख्य पृष्ठ पलटते ही उसे लेखों, कहानियों और कविताओं की सूची थी और साथ में लेखकों के नाम। साधारणतया वह उस पृष्ठ को कभी नहीं देखती, परन्तु आज न जाने क्यों उसको उस पृष्ठ में दिलचस्पी हो रही थी।
    अचानक उसका मन उचाट हुआ और उसने मैगजीन परे कर दी और ऑंखें बन्द कर के लेट गई । बंद ऑंखों ने लेखकों की सूची उसके जेहन में डाल दी और फिर सहसा एक विचार कौंधा । वह विस्मित रह गई अपनी खोज पर। उसने विशेष के लिए एक ऐसा काम खोज लिया था, जो सम्मानीय प्रतिष्ठित और प्रसंशित होता है और जो घर बैठ कर किया सकता है। उसने विशेष को लेखक बनाने का संकल्प कर लिया था। उसका ध्यान अखबार में रोज प्रदर्शित विज्ञापन पर गया, जिसमें लिखा रहता था, 'घर बैठे आमदनी करें, लेखक बने.........वगैरह वगैरह.............सम्पर्क करें और पता-फोन नं. आदि.......आदि।' उसे यकीन था कि विशेष इस काम को कर लेगा और इन्कार नहीं करेगा।
    वह आशावान थी । सरदर्द गायब था। तनाव और हताशा गायब हो गई और वह बेफिक्र होकर नींद के आगोश में चली गई ।
                                                           द्वारा राजाराम सिंह
                                                         एम-1285 सेक्टर-आई
                                                       एल.डी.ए. कालोनी, कानपुर रोड,
                                                           लखनऊ-226012
                                               फोन-0522-2422326,मो0 9415200724

 

गुरुवार, 14 मई 2015

दो लघुकथाएं

दुर्योग
अशोक गुजराती
(ज्यां पॉल सार्त्र की कहानी 'दीवार' से अनुप्राणित)

   श्रमेश जी के घर में ओजस किराये से रहता था. ज़हीन था, जेएनयू में हिन्दी स्नातकोत्तर के द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा था. उसकी एक सहपाठिनी कालजयी अक्सर उसके कमरे पर आती रहती थी. श्रमेश जी को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. वे आधुनिकता में विश्वास रखते थे. नहीं कर पाये अपने जीवन में पर किसी और को यह करते देख उन्हें अतिरिक्त प्रसन्नता होती थी.
   कालजयी हरयाणा से थी. वहां तक उसके इस प्यार की आहट देर-सबेर पहुंच ही गयी. होते हैं इस तरह के लोग जो श्रमेश जी के विपरीत दो प्रेमियों के मिलन से डाह खाते रहते हैं. खाप पंचायत के कानों में इस वाक़ये ने तुरंत खलबली मचा दी. वे अज्ञानी बेचैन हो गये. कालजयी के माता-पिता को उन्होंने आड़े हाथों लिया. कालजयी के परिजन झुक गये कि उनके सम्मुख कोई और चारा न था.
   अंजाम यह हुआ कि कालजयी के पिता के साथ पंचायत के कतिपय सदस्यों ने श्रमेश जी के घर पर धावा बोल दिया. उनको आज ओजस जाते समय बता गया था, 'अंकल, आज रविवार है. हम दोनो ने दिल्ली हाट जाने का प्रोग्राम बनाया है. ख़रेदी-खाना वग़ैरह निपटाकर मैं कुछ देर से लौटूंगा...।''
   जब उनसे सरपंच ने पूछा - 'कहां है वो बहन... ओजस ? हमें मालूम है, वो जयी के संग है.''
- 'मुझे नहीं पता...'' उन्होंने अनभिज्ञता का सहारा लिया.
    सरपंच के बराबर खड़े खूंख़ार-से लगते युवक ने छुरा निकाल लिया. उनकी छाती पर उसे टिकाते हुए चिल्लाया- 'झूठ मत बोल... स्साले, वो दोनों कहीं रंग-रेलियां मना रये हैं... हमको पूरी जानकारी है... बता, कहां गये हैं वो...''
   दूसरा एक गुंडा-सा लगता अधेड़ तलवार लहराते सामने आया- 'बुड्ढे, तू जानता है सब कुछ, हमें ख़बर है... मादर... तूने नईं बताया तो तेरे पूरे परिवार को हम नर्क में भेज देंगे... चल जल्दी से मुंह खोल...''
   वे भयभीत थे किन्तु दृढ़. उन्होंने एक पल सोचा, फिर हाथ जोड़ते हुए बोल पड़े- 'वे दोनों इंडिया गेट गये हैं...'' वे ख़ुश थे कि समय पर उन्हें सही जवाब सूझ गया.
   सरपंच ने जाते - जाते धमकी दी- 'अगर तू सच नईं बोल रिया है तो समझ ले तेरा आख़िरी बखत आ गया है. तूने उनको मोबाइल भी लगाया तब भी मरेगा ही मरेगा...'' उसके पलटते ही सब उसके पीछे हो लिये.
   उन्होंने राहत की सांस ली. उन्हें एकाएक याद आया कि वे फ़ोन कर देंगे यदि, इन नामाक़ूलों को क्या तो पता चलेगा... सतर्क कर देने से ओजस-कालजयी कमसकम यहां नहीं लौटेंगे... लेकिन फ़ोन था कि लग ही नहीं रहा था. उन्होंने तय कर लिया कि अगर वे यहां आ भी गये, उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करनी ही है.
   वे आश्वस्त थे परन्तु विचलित भी हो गये थे. किसी तरह अपना रोज़मर्रा का काम करते रहे. बीच-बीच में ओजस को फ़ोन भी लगाते रहे. स्वीच-ऑफ़ ही मिलता रहा. वे चिन्तित होने लगे थे.
तभी उनके बेटे अयान का फ़ोन आया. उन्होंने उसे इस संकट के बारे में बताया तो वह हड़बड़ा गया- 'क्या!... आपने उन लोगों को इंडिया गेट भेज दिया ?... पापा, मुझे ओजस थोड़ी देर पहले मिला तो उसने अपने प्रोग्राम में हेर-फेर कर लिया था. वे दोनों इंडिया गेट जा रहे थे... ख़ैर ! आप फ़िक्र मत करना, मैं इंडिया गेट के पास ही हूं.''
   वे अवसन्न-से लाचार बैठे रह गये.
   घंटी बजी. उन्होंने अनलॉक किया. अयान ही था- 'पापा, ओजस-जयी को घेर कर उन हरामियों ने टुकड़े-टुकड़े कर डाला...'
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खटका
 
   शोभा ताई को आज लौटने में देर हो गयी थी. धारावी के अपने झोंपड़-पट्टी इलाक़े में ज्यों ही वह दाख़िल हुई, रोज़ से अलग सुनसान रास्ते देख चौंक गयी. और हां, यहां-वहां पुलिस भी खड़ी दीख रही थी. उसने पास के घर की खिड़की से झांक रही स्त्री से पूछ ही लिया, 'काय झालं बाई ?''
   उसने 'दंगा झाला...'' कहते हुए फ़ौरन खिड़की के पट भेड़ लिये.
   डरी - सहमी - सी शोभा ताई आगे बढ़ी. इधर - उधर बिखरे पुलिस वालों ने संभवत: उसके पहराव आदि के कारण उसे उसी मोहल्ले की जान रोका नहीं. तभी सामने से इन्स्पेक्टर और उसके संग चार - पांच बंदूकधारी आते नज़र आये. इन्स्पेक्टर चलते - चलते अचानक थम गया और झोंपड़ियों के पीछे से आ रही खट - खट - सी ध्वनि को सुनने का प्रयास करने लगा. शोभा ताई एक तरफ़ से होकर जाने लगी तो उसने ठहरने का संकेत करते हुए पूछा, 'यह जो मशीनें चलने की आवाज़ें आ रही हैं, क्या बनता है वहां ?''
   शोभा ताई कुछ हिचकी, फिर साहस कर बोली, 'अरे! आपको नहीं पता, वहां गोलियां बनाते हैं... हम भी ख़रीदते हैं उनसे.''
 'क्या ?'' इन्स्पेक्टर एकदम सीधा खड़ा हो गया और उसने अपने अधीनस्थों को तुरंत आदेश दिया - 'अपनी-अपनी बंदूकें सम्भालो और घुस पड़ो इस गली में.'' तत्पश्चात उसने शोभा ताई को हड़काया- 'चल, तू भी चल हमारे साथ!''
   वहां कारखाने का दरवाज़ा अन्दर से बन्द था. मशीनें चल रही थीं. इन्स्पेक्टर के कहने पर पुलिस वालों ने दरवाज़े को ज़ोरदार धक्का देकर भीतर प्रवेश किया. वहां पांच - छह मज़दूर अपने काम में व्यस्त थे. इन्स्पेक्टर ने देखा - कहीं रैपर का ढेर लगा था, कहीं चीनी की बोरियां खुली पड़ी थीं, कहीं एसेंस के टीन पड़े थे, कहीं...
   वह शोभा ताई की ओर पलटा - 'क्या कह रही थी तू... यहां गोलियां बनती हैं...''
   शोभा ताई सारा घालमेल समझ गयी थी, बोली- 'साब, खाने की खट्टी-मीठी गोलियां बनती हैं. मेरे बेटे की यहीं छोटी-सी दुकान है. हम इनसे ही ख़रीदते हैं- सस्ती पड़ती हैं.

बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली-110 095
मोबा -  09971744164.

माई कोठी के धान

समीक्षक - हीरा लाल अग्रवाल

          डॉ. गोरेलाल चंदेल के अनुसार जीवन यदु की पुस्तिका '' माई कोठी के धान'' छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की परिचयात्मक  सांस्कृतिक यात्रा है,जबकि मेरी दृष्टि में यह छत्तीसगढ़ियों की लोक संस्कृति की परिचयात्मक सांस्कृतिक यात्रा है क्योंकि छत्तीसगढ़ में बस्तर  और सरगुजा जैसे  विशाल क्षेत्र समाहित हैं जिनकी अपनी अलहदा संस्कृति है। डॉ. जीवन यदु ने बार - बार लोक समाज शब्द युगल का प्रयोग किया है और इस लोक समाज के साथ दो और समाज का उल्लेख  किया है। वेदाधारित  समाज और आदिवासी  समाज। इसी को यदि सामाजिक विस्तार दिया जाय तो चौथा दलित समाज होता है। यदि उपर्युक्त विश्लेषण का सरलीकरण करें तो वेदाधारित समाज का अर्थ सवर्ण समाज और लोक समाज का अर्थ पिछड़ा वर्ग,आदिवासी समाज अर्थात अनुसूचित जनजाति एवं दलित समाज अर्थात अनुसूचित जाती। इस धर्मबहुल देश में विभिन्न धर्मावलम्बियों की अपनी संस्कृति तो है ही,विभिन्न सम्प्रदायों की अपनी - अपनी संस्कृतियाँ है। भाषा की भी अपनी संस्कृति होती है यथा मराठी  संस्कृति,तमिल संस्कृति। हिन्दू बहुल राष्ट्र के इस समाज में जातियों एवं उपजातियों का भी अम्बार है। जिनकी अपनी - अपनी संस्कृतियाँ विकसित हो गयी है। दर असल इन्हीं उपजातियों, जातियों, सम्प्रदायों, धर्मो में बँटा हुआ विशाल समाज जब किसी क्षेत्र विशेष में एकत्रित हो जाता है तो इनके आपसी संघर्षण के परिणाम स्वरुप एक क्षेत्रीय संस्कृति का धीरे - धीरे  उद्भव होता है। दर असल यह समन्वित समाज ही लोक है।  इसमें ग्रामीण समाज भी सम्मिलित है और शहरी समाज भी। आज के युग में आवागमन  का साधन इतना विकसित हो चुका है कि ग्रामो और शहरों के बीच की दूरी समाप्त हो चुकी है। टी व्ही ने रही - सही दूरी को और भी संकुचित कर दिया है। डॉ. जीवन यदु की अपनी दृष्टि जो भी हो, लोक संस्कृति सम्बन्धी उनके विभिन्न आलेखों को पढ़कर मुझे ऐसा लगता है, उनका लोक समाज क्षेत्र विशेष और वर्ग विशेष तक सीमित है। दर असल आज आवश्यकता संस्कृति के उस लोक पक्ष की पड़ताल भी है। उस पक्ष को उजागर करने की है, जो समाज में विभिन्न समूहों में किसी न किसी रूप में कमोबेश विद्यमान है। समय जिस गति से आगे बढ़ रहा है,  इस वैज्ञानिक युग में दुनिया जिस तेजी से सिकुड़ रही है एक - दुसरे के समीप आ रही है। उसी अनुपात में संस्कृति के स्वरुप में भी परिवर्तित होते चले जाना स्वाभाविक है। कुछ लोग सांस्कृतिक ह्रास की बात करते हैं लेकिन मेरी दृष्टि में संस्कृति हमेशा विकासोन्मुखी रही है, न कि हासोन्मुखी। संस्कृति सतत प्रवाहिनी नदी की तरह है, जो रोड़ों को पार करते आगे बढ़ती चली जाती है, उसका प्रवाह कभी थमता नहीं। आज वैश्विक संस्कृति की बात होने लगी है। विगत सौ वर्षो में ही नाचा का स्वरुप क्या से क्या हो गया। यह बदलते हुए परिवेश एवं तीव्र परिवर्तनशीलता का परिणाम है। आश्चर्य तो तब होता है जब कतिपय प्रगतिशाली विचारधारा के लोग भी सांस्कृतिक रूढ़ता के शिकार प्रतीत होते हैं। पिछले वर्षो छत्तीसगढ़ के एक लोकप्रिय लोकगीत - सास गारी देथे ननद मुंह लेथे का फिल्मांकन एक हिंदी फिल्म में हुआ। इसे नए सिरे से संगीतबद्ध किया। ऑस्कर एवार्ड प्राप्त ए. आर.रहमान ने  इसे मधुर धुन में तो सजाया ही एक ऐसे स्वर का भी इस गाने के लिए चयन किया जिससे नारी की कारुणिक व्यथा को पर्याप्त उभार भी दिया । ए. आर. रहमान द्वारा संगीतबद्ध लोकप्रिय गानो में से यह एक गाना है। इससे देश के विभिन्न क्षेत्रो के लोगों को छत्तीसगढ़ के लोकगीतों की समृद्धि का परिचय अवश्य ही मिला होगा । जबकि परम्परावादी बातचीत के दौरान इसका  उपहास उड़ने से बाज नहीं आते । लोकसंस्कृति का  इसे बाज़ारीकरण भी कहा जाता है। यदि व्यावसायिक सफलता में इस गीत का योगदान रहा हो तो वह एक अलग बात है।
     एक ओर छत्तीसगढ़ी में जहाँ मौलिक लेखन की प्रवृत्ति  का विकास हुआ है, जिसके अंतर्गत विभिन्न विधाओं द्वारा छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध  करने का प्रयास किया जा रहा है तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति से सम्बंधित परम्पराओं रीति - रिवाजों पारम्परिक वस्त्राभूषणों  का परिचयात्मक संकलन कर उसे सहेज कर रखा जा रहा है। क्योंकि समय की रफ़्तार एवं तेज़ी से बदलते परिवेश,संसाधनो में वृद्धि, शिक्षा के व्यापीकरण आदि के फलस्वरूप सब कुछ नया होते चला जा रहा  है। इस दृष्टि से डॉ. जीवन यदु का प्रयास भी निश्चित रूप से सराहनीय है। डॉ. गोरेलाल चंदेल ने डॉ. जीवन यदु की रचना में भावुकता न आने की बात कही है। वैसे भी प्रगतिशील रचनाकार वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त होते ही हैं,ऐतिहासिक चीज़ों का भी पर्याप्त ध्यान रखते हैं। डॉ. जीवन यदु ने डॉ. हनुमंत नायडू की एक पुस्तक से बलदेव प्रसाद मिश्र को उद्धृत किया है ''यह जाति कदाचित इसलिए इतनी समादृत हुई क्योंकि किसी समय सचमुच ही वह बहुदुरी के साथ इस अंचल में राज्य कर रही होगी ''  डॉ. मिश्र तुलसी कृत रामचरितमानस पर डी  लिट् करने वाले प्रथम साहित्यकार थे, किन्तु यह विचार मुझे विचार मात्र लगता है। यह उसी तरह की दूर की कौड़ी है, जिस प्रकार डॉ. मेघनाथ कन्नौजे ने खैरागढ़ विकासखण्ड अंतर्गत आने वाले ग्राम लछना में महाभारतकालीन लक्ष्यागृह का कयास लगा लिया था। डॉ. जीवन यदु पर्याप्त इतिहास बोध रखते हैं, अत: इस वाक्य को उनके द्वारा उद्धृत किया जाना आश्चर्यजनक लगता है ।डॉ. जीवन यदु की दृष्टि में छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति पर इस्लाम धर्म का भी प्रभाव है । इस सन्दर्भ में वे अकबर से सम्बंधित एक लोकरचना का बार - बार उल्लेख करते रहते हैं। मेरी दृष्टि में यह अपवाद ही है ।इसके विपरीत यहाँ की लोकसंस्कृति ने इस क्षेत्र में इस्लाम धर्मावलम्बियों को अवश्य प्रभावित किया है । डॉ. जीवन यदु ने एक उल्‍लेखनीय कार्य किया है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा सन 1997 में प्रकशित पुस्तक '' उत्तर मध्य क्षेत्र की लोकसंस्कृति '' जिसका लेखन श्री जयप्रकाश राय एवं डॉ योगेन्‍द्र प्रताप सिंह ने किया है .में छत्तीसगढ़ी लोकगीत एवं लोकनृत्यों से सम्बंधित भ्रमात्मक विचारों का खंडन करते हुए उन लोकगीतों, नृत्यों के प्रस्तुतिकरण से सम्बंधित विस्तृत एवं सटिक जानकारी दिया है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि विगत बीस वर्षों में अनेक पाठक - पाठिकाओं एवं शोधकर्ताओं ने इस पुस्तक का अध्ययन किया होगा या सन्दर्भ पुस्तक के रूप में इससे उद्धरण लिया होगा। क्या वे डॉ. जीवन यदु के इस पुस्तक को पढ़ पाएंगे। बेहतर यह होगा कि किसी उचित माध्यम द्वारा इस जिम्मेदार मंत्रालय के ध्यान में यह बात लाई जाय, ताकि इन भ्रमात्मक विचारों का इस पुस्तक से विलोपन किया जा सके या दूसरा यह हो सकता है कि डॉ. जीवन यदु की '' माई कोठी के धान'' की प्रतियां सम्बंधित लेखकों के पते पर भिजवा कर अपना भ्रम दूर करने के लिए कहें ताकि उन पुस्तकों के अन्य संस्करणों में एक परिशिष्ट जोड़कर उसका संसोधन प्रस्तुत किया जा सके ।
     डॉ. चंदेल ने अपनी पूर्वपीठिका में जीवन यदु के '' शब्दों की विकास यात्रा '' को समझने का उल्लेख किया है। भाषा एवं शब्द विज्ञानं का अपना एक अद्भुत, रहस्यमय संसार है। एक भाषा दूसरी भाषा से कब कोई शब्द चुरा लेती है और कब अन्य भाषा - सरोवर में अपना शब्द उड़ेल देती है,किसी को कानोकान खबर नहीं लगती। यह लोक का चमत्कार है। एक भाषा दूसरी भाषा से कभी शब्द ज्यों का त्यों ग्रहण करती है तो कभी उसका कायापलट कर देती है। कभी अर्थ को विस्तार देती है तो कभी अर्थ संकुचन कर देती है और कभी अर्थ को पूरी तरह परिवर्तित भी कर देती है। आप कह सकते हैं कि अर्थ का अनर्थ कर देती है व्‍याख्यान हिंदी  में एक भला सा सार्थक,शुद्ध, साहित्यिक शब्द है किन्तु जब छत्तीसगढ़ की कोई महिला आक्रोश में आकर किसी दूसरी महिला को कह रही होती है '' रोगही रांड हा मोला '' बखानत'' हवे  तो वह जाने - अनजाने वहां उस शब्द को व्यंग्यात्मक स्वरुप प्रदान कर देती है,  वहीँ दूसरी ओर इस शब्द को गाली का रूप दे देती है । डॉ. जीवन यदु ने '' बेर्रा '' शब्द का प्रयोग दर्शाया है किन्तु इस शब्द का उपयोग गाली के रूप में भी होता है, इसका उल्लेख उन्होंने नहीं किया है। मैं तत्सम एवं तत्भव शब्द में अंतर बताते हुए अक्सर अपने विद्यार्थियों  से पीयूष संस्कृत एवं उस छत्तीसगहरी शब्द का उल्लेख किया करता था। क्या यह लोक द्वारा किया शब्द का अद्भुत एवं अत्यंत सार्थक रूपांतरण नहीं है । आज भी मैं जब अपने पूर्वजों के ग्राम में अपने अनुजो से मिलने जाता हूँ तो अनेक पुराने ग्रामवासी मुझे '' बड़े गौंटिया '' कह कर सम्बोधित करते हैं। वास्तव में यह सम्बोधन अब वंशानुगत ही है।
     वैवाहिक संस्कार सम्बन्धी जहाँ तक बात है,ठिका बिहाव, मंझला बिहाव,बड़े बिहाव जैसे विभाजन तेजी से बदलते हुए परिवेश में अपनी सार्थकता खो चुके हैं। अब सब कुछ गड्डमड्ड होने लगा है। दो अलग - अलग गाँवों में वास करने वाले एक ही समाज के रीति - रिवाज में अंतर आ जाता है। यही कारण है कि अक्सर नेंग - दस्तूर के मामले में अलग - अलग गाँव से सम्बंधित वर - वधु  पक्ष में बहस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तब विवाह संस्कार का संचालन कर रहे वेदाधारित समाज के ब्राह्मण को भी स्थानीय लोकाचार के पक्ष में अपना निर्णय देना पड़ता है। डॉ. जीवन के कथनानुसार वेदाधारित समाज में कन्या पक्ष के लोग वर के घर जाकर विवाह सम्बन्धी बात करते हैं,किन्तु यह अर्धसत्य है। इस बात का प्रमाण यह आलेखक स्वयं है। उसे अपनी चार लड़कियों की शादी के लिए कभी भी वर ढूँढने जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। हर बार वर पक्ष के लोग ही संपर्क करने आये। तात्पर्य यह कि रूढ़ियाँ तेजी से टूट रही हैं। '' सटका '' शब्द के विश्लेषण में डॉ. जीवन यदु ने,  लगता है काफी बुद्धि खर्च कर दी है। उन्ही की बात को यदि मैं थोड़ा आगे बढ़ाऊं तो मेरी राय में सटका का एक अर्थ फंसा होता है।  इस दृष्टि से दो पक्षों को आपस में फंसा देने वाला सटका कहलाता हो तो  कोई आश्चर्य की बात नहीं। '' साठी धान'' वाले विस्तार से सहमत होना कठिन है। डॉ. जीवन यदु ने लगता है चुलमाटी से लेकर बिदाई तक के नेगाचारों का एक वीडियो  केसेट ही तैयार कर दिया है।  मेरे विचार में बारात परघौनी धुरभत्ता मड़वा छुवौनी, लाल भाजी,कुंवर कलेवा, टिकावन भाँवर के अतिरिक्त '' अंचरा पकड़ौनी '' भी एक नेग होता है। डॉ. यदु ने लोक रीति का भी एक विस्तार कर दिया है .ठेठ लोक रीति, सीधी सी बात है, विवाह संस्कार में '' जातौ - जातौ नवाचारा वाली बात ही लागू होती है। लाई -  लावा भी एक नेग हुआ  करता था जो अब अस्तित्वहीन है। चौथिया के सम्बन्ध में भी जानकारी दी जानी चाहिए थी। हाल ही में मैंने दो शब्द पढ़े, मांदी,टिकान।  टिकान टिकावन का ही रूप है और जबकि ''प्रसाद पाओ सबको बंदगी साहेब बंदगी'' की गूंज, मांदी याने सामूहिक भोज शुरू होने के ठीक पहले लड्डू,पापड़ आदि कलेवा पर आचमन के बाद से ही है सबेरा पृष्ठ  5 दिनांक 25 स्वाभाविक है कि यह कबीरपंथ से सम्बंधित है। डॉ. यदु ने छत्तीगढ़ के लोक  समाज पर खास तौर से कबीरपंथ और सतनाम पंथ के प्रभाव का उल्लेख किया है। समूचे छत्तीसगढ़ का तो नहीं कह सकता किन्तु एक विस्तृत क्षेत्र में राधा-स्वामी संप्रदाय के भवन जगह - जगह दिखाई देते हैं। इसमें कोई जाति या धर्म का बंधन नहीं है। सतनाम समाज के लोग भी भारी तादाद में इससे जुड़े हुए हैं।
     डॉ. जीवन यदु के कथनानुसार लोकजन का अर्थतंत्र गोधन के बिना अधूरा है। कमोबेश यह बात संम्पूर्ण भारत वर्ष के लिए भी लागू होती है। ऐसी स्थिति में यदि एक वृहद समुदाय गोवध पर पाबन्दी की बात करता है तो प्रगतिवादियों द्वारा इसका समर्थन क्यों नहीं किया जाना चाहिए। जहाँ तक होली त्यौहार का प्रश्न है हमारे देश में त्यौहार मनाये जाने के पीछे कोई न कोई समाज हित का उद्देश्य छिपा हुआ होता है। डॉ. जीवन यदु ने लिखा है कि एक दिवंगत अतृप्त यौवना की आत्मा को गालियों से तुष्टि मिलती है, यह कहाँ तक सत्य है, लेकिन यह बात मनोवैज्ञानिक यथार्थ के अत्यंत करीब अवश्य है कि गालियां देने से गाली देने वाले की कुंठा का शमन अवश्य होता है। वैसे होली के सम्बन्ध में और भी किवदंतियां है'' कमरछठ '' में '' पोता ''  मारने के पीछे भी कोई न कोई उद्देश्य  निहित होगा  किन्तु  इसका उल्लेख डॉ. जीवन यदु ने नहीं किया।
बतौर उपसंहार एक बात और कि डॉ. जीवन यदु किसी  विचारधारा या तथ्यहीनता का खंडन या विरोध करते हैं तो उनके तेवर में एक आक्रामकता सी आ जाती है,जो उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि किसी का भी लिखा हुआ अंतिम सत्य नहीं होता।

पता
फ़तेह मैदान के सामने, 
नया बस स्टैंड खैरागढ़, 
जिला -  राजनांदगांव  (छत्तीसगढ़ )

'' माई कोठी के धान '' लेखक की समीक्षा पर विनम्र प्रतिक्रिया

'' माई कोठी के धान '' लेखक की समीक्षा पर विनम्र प्रतिक्रिया
डॉ. जीवन यदु
     मैं पहले ही यह स्पष्ट कर दूँ कि समीक्षा पर यह विनम्र प्रतिक्रिया समीक्षा की समीक्षा नहीं है अपितु समीक्षक की कुछ स्थापनाओं और उनके द्वारा उठाये गए प्रश्नों के उत्तर मात्र हैं। जब कोई पुस्तक प्रकाशित होती है तो वह सम्बंधित विषय की न तो अंतिम पुस्तक होती है और न लेखक की ही अंतिम पुस्तक। किन्तु प्रकाशित पुस्तक पर सवाल उठाया जाना ही चाहिए और उस पर चर्चा भी होनी चाहिए ताकि नया ज्ञानोदय संभव हो सके। समीक्षक श्री हीरालाल अग्रवाल मेरे आदरणीय अग्रज हैं और खैरागढ़ के वरिष्ठ रचनाकार भी। उनकी समीक्षा पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मूल समस्या लोक की परिभाषा को लेकर है। अत: थोड़ी सी चर्चा लोक के इतिहास और उसकी परिभाषा पर करना ठीक होगा। यूँ तो लोक और वेद की चर्चा हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में भी हुई है किन्तु आज हम जिसे पारिभाषिक शब्दों में लोक कहते हैं उसकी शुरुआत विदेशी विद्वानों द्वारा लोक ज्ञानों के सग्रहण के बाद से हुई है। हमारे देश के अनेक लोक विज्ञों ने लोक ज्ञानों का संग्रहण प्रारम्भ किया। उनमे सबसे पहले पंडित रामनरेश त्रिपाठी का नाम लिया जाता है। विदेशी विद्वानों ने लोक ज्ञानों के संग्रहण से नए ज्ञानोदय की सम्भावना की थी।वही ज्ञान पिपासा भारतीय लोक विज्ञों में भी देखी गयी थी। पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने लोकगीतों का संग्रह प्रस्तुत किया और उसे ग्रामगीत कहा। ग्रामगीत के कारण ग्राम की संस्कृति को ग्राम संस्कृति मान लिया गया। उस समय के बहुत से विद्वानों ने इसे संस्कृति की अपूर्ण परिभाषा माना क्योंकि ग्राम से जुड़ा हुआ व्यवसाय कृषि है और कृषि भूमि का निरंतर पारिवारिक बंटवारा होता जा रहा था। इससे भूमि मालिक कृषि मजदूर में बदल रहे थे। वे कृषि मजदूर जीवकोपार्जन की तलाश में शहरों और नगरों में बसने लगे। औद्योगिक क्रांति से ग्रामीण मजदूर भी जिनका कि घरेलू उद्योग मशीनीकरण के कारण टूटता जा रहा था,वे सभी शहरों और नगरों की ओर उन्मुख हुए। वे सभी अपने साथ अपनी संस्कृति भी ले गए और वह संस्कृति शहर - नगर में भी फलने - फूलने लगी। अत: उनकी संस्कृति को ग्राम संस्कृति शब्द पूर्णता प्रदान नहीं कर रहा था। तब अनेक विद्वानों ने उस संस्कृति को प्राचीन परंपरा के अनुसार लोकेच् वेदेच् लोक संस्कृति कहा। अनेक परिभाषाओं से जो बात छनकर निकलती है उसे बहुत ही सार्थक शब्दों में डॉ. हजारी प्रसाद द्धिवेदी ने '' जनपद '' के प्रथम वर्ष के प्रथम अंक में लिखा है -'' लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है,बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं,ये लोग नगर में परिष्कृत रूचि संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रूचि संपन्न वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक होती हैं,उनको उत्पन्न करते हैं।'' इन बातों का अर्थ यही निकलता है कि लोक शहरों - नगरों तक फैला है और उनके ज्ञान का आधार जगत व्यवहार  है, कोई पोथी नहीं। दो संस्कृतियों के बीच यह पोथी शब्द ही एक मोटी रेखा खींचता है जिसे भक्तिकाल के कवियों ने और यदि और ऊपर जाएँ तो संस्कृत के ग्रंथकारों ने वेद कहा है। इस तरह वेदाधारित और लोकाधारित समाज पूर्वकाल से दृश्य में रहे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इन दोनों संस्कृतियों के बीच '' आदान - प्रदान '' का सम्बन्ध बनता रहा है और संस्कृति पुष्ट होती रही है मध्यकाल में दोनों संस्कृतियाँ काफी निकट आ गयी थी जो कि भक्तिकाल के कवियों के अध्ययन से पता चलता है। भक्तिकाल के कवियों ने दोनों को बराबर महत्व दिया है तुलसीदास ने '' लोकहु वेद नाआन उपाऊ '' कहा तो सूरदास ने लोक वेद श्रुति ग्रन्थ रहित सब कथा कहत विपरीत लिखा है।
     जिन लोगों  ने लोक को वेद के बरअक्स  खड़ा करने का षड़यंत्र रचा ऐसे ही लोगों ने लोक के परिभाषित होने के बाद वेदाधारी समाज को '' शिष्ट '' नाम दिया ताकि लोक को अशिष्ट समाज भी कहा जा सके। किन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी संस्कृति शिष्ट या अशिष्ट नहीं होती। इसीलिए मैंने शिष्ट कहे जाने वाले समाज को वेदाधारित समाज कहा है। यह वेदाधारित  शब्द मुझे एक लम्बी परंपरा से प्राप्त है। इसकी चर्चा मैं ऊपर कर चुका हूँ। पूर्व के रचनाकारों और चिंतकों ने दो प्रकार के समाज के लिए दो ही शब्द दिए हैं .लोक और वेद।
     आदरणीय हीरालाल अग्रवाल की स्थापना में पोथी या वेद अनुपस्थित है। उन्होंने जो स्थापना की है वह किसी भी क्षेत्र की संस्कृति की परिभाषा हो सकती है किन्तु लोक संस्कृति की नहीं। यद्यपि उन्होंने लोक समाज को निकट से समझने  का प्रयास अपने आलेख में किया  है तथापि यह कहना उचित होगा कि जातियों के सरकारी विभाजन में लोक समाज को नहीं समझा जा सकता,क्योंकि आज की स्थिति में पिछड़ा वर्ग में ऐसी जातियाँ भी शामिल हो रही हैं,जो इतिहास के पिछले कालखंडों में शासन करते हुए वेदाधारित समाज में शामिल हो चुकी थीं। मराठा जाति ने न केवल महाराष्ट्र अपितु छत्तीसगढ़ पर शासन किया था किन्तु वह आज सरकारी वर्ग विभाजन में पिछड़ा वर्ग में आ चुकी है। वोट की राजनीति में कोई भी जाति किसी भी वर्ग में शामिल की जा सकती है। समीक्षा में जो सबसे अच्छी बात दिखाई दी वह यह कि बदलते हुए समय में लोक को पुन: परिभाषित करने की तड़प। यहाँ यह बताना आवश्यक हो जाता है कि अनेक लोकचिंतक विद्वानों ने लोक को पुन: परिभाषित करने की बात उठाई है और यह आज के समय में आवश्यक भी है, किन्तु अभी बहुत कुछ बदल जाने के बाद भी नए लोक के सारे लक्षण उभर कर सामने नहीं आये हैं। इसलिए जो लोक की पूर्वप्रचलित परिभाषा है, उसे ही मान देना होगा।

     अग्रवालजी की दूसरी स्थापना है कि संस्कृति का ह्रास कभी नहीं होता। वह सदैव विकासोन्मुखी होती है और उन्होंने संस्कृति को सतत प्रवाहिनी नदी की उपमा दी है। इस पर मेरा कहना है कि संस्कृति में समय के अनुसार परिवर्तन आता ही है किन्तु यह देखा जाना आवश्यक होता है कि उस परिवर्तन की दिशा क्या है। क्योंकि परिवर्तन भी सदैव लोक हितकारी नहीं होता। यदि हम अग्रवालजी की स्थापना से नदी की उपमा को लें तो नदी भी अपनी बाढ़ से परिवर्तन लाती है। जैसे अपने किनारों को उपजाऊ मिटटी प्रदान कर देती है,इससे विकास की सम्भावना बढ़ जाती है किन्तु यदि वही नदी अपने किनारे के ग्रामों नगरों को बाढ़ की चपेट में लेकर समुद्र में फेंक आये तो क्या इसे भी विकासोन्मुखी कहा जायेगा। बिलकुल इसी तरह संस्कृति की गति भी होती है। क्या आज की भारतीय संस्कृति को विकासोन्मुखी संस्कृति कह सकते हैं जिसमे बलात्कार और गर्भपात सामान्य सी बात हो रही है। मेरे कहने का तात्‍पर्य यह है कि संस्कृति के ह्रास और विकास को समय के परिवर्तन की दिशा ही तय करती है। क्योंकि परिवर्तन भी हमेशा सकारात्मक नहीं होता।आदरणीय अग्रवालजी ने अनेक संस्कृतियों की बात की है किन्तु एक संस्कृति आधुनिक समय में सबसे ज्यादा चर्चा में है,वह है '' लोकप्रिय संस्कृति'' इस लोकप्रिय संस्कृति पर अनेक पत्रिकाओं में आजकल आलेख छपते ही रहते हैं। यह लोकप्रिय संस्कृति बाज़ारवाद की देन है! बाज़ार को जो चीज़ लाभकर लगती है, उसे वह बेचने के लिए लोकप्रिय बनाता चलता है,चाहे वह किसी संस्कृति का कोई हिस्सा हो या स्थूल पदार्थ। समीक्षक महोदय ने प्रगतिशील लोगों को लताड़ते हुए ए. आर.रहमान द्वारा संगीतबद्ध छत्तीसगढ़ी गीत '' सास गारी देथे, ननद मुह लेथे'' को  यह कहते हुए सराहा है कि इससे छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बाहर के लोग जानेंगे। ए.आर. रहमान से पहले इस गीत को हबीब तनवीर ने अपने नाटकों के माध्यम से देशभर में फैलाया था। तब क्या उससे छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को लोगों ने नहीं समझा था। स्वर्गीय हबीब तनवीर ने उसे प्रस्तुत करते हुए उसकी मौलिकता की हत्या नहीं की थी,किन्तु ए. आर.रहमान ने इस गीत को उसके मूल से ही काट दिया। बाज़ार किसी चीज़ को लोकप्रिय बनाने लिए पहले उसे उसके मूल से काट देता है। यह लोक संस्कृति के क्षेत्र में लोकप्रिय संस्कृति का आक्रमण ही है। पिछले दिनों घर में जब चूसने वाला आम आया तब मेरे पोते ने उस पर पाइप लगाकर पीने की बात की। उसने कहा उसे पाइप से पीने वाला आम चाहिए, चूसने वाला नहीं। उसका तात्पर्य फ्रूटी से था। अर्थात बाज़ार चीज़ों के स्वाद को उसके मूल से काटकर परोसना चाहता है, यह भी लोकप्रिय संस्कृति के प्रचार माध्यमों का प्रभाव है। आम का स्वाद यहाँ अपने मूल रूप से कट गया है। मेरे एक मित्र शाकिर अली- बैंक कर्मी कवर्धा एवं रचनाकार ने एक घटना बताई कि जब वह पंजाब यात्रा कर रहे थे तब एक गवैये ने पंजाबी धुन में गीत गया, जिसे सुनकर पंजाब की संस्कृति की गंध मिल गयी किन्तु आधुनिक गायक बाज़ार की माँग पर पंजाबी गीत लेकर टी. व्ही. और फिल्मों में आ रहे हैं तो उनमे पंजाब की सुगंध ही नहीं मिलती, कारण वही लोकप्रिय संस्कृति ही है।
     यादव जाति के सम्बन्ध में डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र के वाक्य को उद्धृत करने पर न जाने क्यों  अग्रवालजी को आश्चर्य होता है। डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र न केवल रामचरितमानस मर्मज्ञ थे अपितु वे पुरातत्व और इतिहास में भी दखल रखते थे,यह बात छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रन्थ अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक '' डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र '' से ज्ञात होती है, इसके अतिरिक्त भगवत शरण उपाध्यय लिखते हैं '' आभीर और गुर्जर काफी पहले भारत में प्रविष्ट हो गए थे संभवत: पहली सदी ईसा पूर्व के पहले '' पातंजलि और महाभारत में आभीरों का उल्लेख किया है,इन दोनों ने ही इनको शूद्रों की श्रेणी में रखा है। आभीरों को हजारी प्रसाद द्धिवेदी आधुनिक अहीरों के पूर्वज मानते हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में जो यादव जाति निवास करती है, वह कुछ वर्षों पहले अपनी जाति में अहीर ही लिखा करती थी। इसी शब्द से बाद में अहीरा और अहीरा से गहीरा शब्द की निष्पत्ति हुई इसे सभी विद्वान स्वीकार करते हैं। कुछ लोग इस जाति को '' राउत '' भी कहते हैं। यह राउत शब्द पूर्व में जातिसूचक शब्द नहीं था अपितु उपाधिसूचक शब्द ही था। उपाधिसूचक शब्द कब जातिसूचक शब्द में बदल गया यह कह पाना अभी कठिन है। यह घटना केवल यादव अहीरों के साथ घटित नहीं हुई है अपितु राजपूतों के साथ भी ऐसा ही हुआ है। विगत इतिहास के दौर में राजपूत शब्द सम्मानजनक उपाधि थी,जो अब जाति में रूपांतरित हो गयी है। आज अन्यान्य जातियों में पद और उपाधिसूचक शब्द मिलते है,उसका कारण यही है।आभीर यादवों का शासन महाराष्ट्र सौराष्ट्र में तो था ही वहां से टूटने पर कितनी जगहों पर बिखरे हैं यह भी इतिहास की खोज का विषय है। राउत का अर्थ राजा ही है। तुलसीदास जी ने रामचरिमानस में '' रउताही '' शब्द का प्रयोग किया है,याने सोलहवीं शताब्दी से पहले भी राउत शब्द प्रचलन में आ गया था। लोक की पौराणिकी के अंतर्गत लोकगाथाओं को रखा जाता है। पुराणों की रचना में लोकगाथाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यादव  राऊतों में जो लोकगाथाएँ पूर्व से प्रचलित हैं उनमें यादव राऊतों के शासक होने के प्रमाण मिलते हैं। यदि इन उदाहरणों के प्रकाश में मैंने डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र का उद्धरण दिया तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं होनी चाहिए। जातियों का इतिहास के दौर में उत्थान - पतन होता रहा है।

     मैंने अपनी पुस्तिका में लोक पर इस्लाम के प्रभाव को रेखांकित किया है। मैं यह मानता हूँ कि इस्लाम धर्मावलम्बियों पर इस क्षेत्र के लोक का प्रभाव पड़ा होगा किन्तु यह कहना कि इस्लाम धर्मावलम्बियों पर लोक का ही प्रभाव पड़ा और लोक पर इस्लाम का प्रभाव नहीं पड़ा,उचित नहीं होगा।क्योकि संस्कृति के क्षेत्र में कोई भी प्रभाव एकपक्षीय नहीं होता। प्रभाव का क्षेत्र द्विपक्षीय  होता है। इस बात को विद्वानजन मानेंगे ही। दोनों संस्कृतियाँ आपस में कुछ लेती और कुछ देती हैं। यही संस्कृतियों की प्रकृति और गति है।
     मैंने अपनी पुस्तिका में लिखा है कि वेदाधारित समाज में कन्या पक्ष के लोग वर के घर जाकर विवाह सम्बन्धी बात करते है,जिसे अग्रवाल जी ने अर्ध सत्य कहते हुए अपना उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस मामले में वे निश्चित ही सौभाग्यशाली हैं किन्तु क्या इस सौभाग्य का अवसर पूरे समाज को मिलता है। उनके साथ जो सुखद घटा,वह एक अपवाद है और अपवाद से कोई नियम नहीं बनता। आज इसी तरह का अपवाद लोक समाज में भी मिल जाता है।
     ''सटका'' शब्द कि उत्पत्ति और उसके विकास में कुछ शब्दों को रखकर एक सम्भावना ही व्यक्त की है और मैंने इसे भाषा वैज्ञानिकों के पाले में डाल दिया है। श्री अग्रवाल जी ने यह सही लिखा है कि जाति - जाति में कुछ नवाचार होते हैं, जैसे मैंने '' मड़वा सुतना '' नेगाचार का वर्णन नहीं किया है क्योंकि यह लोक की सभी जातियों में नहीं मिलता। मैंने उन्ही लोकाचारों को शब्दबद्ध  करने की कोशिश की है जो लगभग सभी जातियों में मिलते हैं।
     श्री अग्रवाल जी चाहते थे कि उस पुस्तिका में धर्म के अध्याय में राधा - स्वामी सम्प्रदाय का उल्लेख हो। राधा - स्वामी सम्प्रदाय पिछले दस - पन्द्रह वर्षों में ही प्रकाश में आया है,उस सम्प्रदाय का इस छत्तीसगढ़ में कोई पुराना इतिहास नहीं है,इसलिए मैंने उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझा।होली पर्व पर मैंने एक किवदंती का ज़िक्र किया है। वह वास्तव में एक '' मिथ '' है। लोक समाज में '' मिथ मेकिंग '' चलती ही रहती है। लोक विज्ञों ने
'' मिथ मेकिंग '' को भी लोक समाज का एक गुण माना है। इस '' मिथ मेकिंग '' के ज़रिये वे अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं। वैसे भी हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी '' मिथ मेकिंग ''के उदहारण मिलते हैं। इस पर विश्वास करने और न करने के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है। जैसे होली जलाये जाने के सम्बन्ध में प्रहलाद और होलिका का मिथक है,जो चाहे इस पर विश्वास करे या न करे।एक बात और, पूरे आलेख में दो बार प्रगतिशीलों को या तो मशवरा दिया गया है या उनके विरुद्ध विचार प्रगट किया गया है। आश्चर्य तो यह है कि उन्हें परंपरावादी भी कहा गया है दो विरोधी ध्रुवों को कमेव करने की चेष्टा क्यों यह लोक लेखांकन में असंबंधित सा और खलने वाला लगता है। समीक्षक के  प्रथम बार के विचारों का लोक संस्कृति और लोकप्रिय संस्कृति के अंतर को स्पष्ट करते हुए मैंने खंडन किया है। दूसरी बार वे लोकचिंतन करते हुए अचानक प्रगतिशीलों को राय देते हैं कि उन्हें गोवध का विरोध करना चाहिए। काश वे कहते कि भूमिअधिग्रहण बिल का विरोध करें तो अधिक सामयिक बात होती। यदि भूमि अधिग्रहण से कृषि संस्कृति ही विनष्ट हो गयी तो लोक का स्वरुप ही खंडित हो जायेगा। वैसे भी इसमें प्रगतिशीलों को लपेटने का औचित्य ही समझ से परे है। यह अतिरिक्त आक्रामकता क्यों। अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि यह पुस्तक विश्लेषणपरक पुस्तक नहीं है और इसकी पृष्ठ संख्या की भी सीमा है। अत: सभी स्थानों में मैंने विस्तार में जाकर विश्लेषण नहीं किया है। मैं श्री हीरालाल अग्रवाल जी को ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने पुस्तिका पर लेखनी चलायी और उसे चर्चा के योग्य बनाया। इसे मैं उनका आशीर्वाद मानता हूँ।

पता 
'' गीतिका'' 
दाउ चौरा,खैरागढ़ 
जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)