- डां. बलदाउ निर्मलकर
छुटपुट ध्वनि, नीडाश्रित खगवृंद का ...।
विद्युत शिखा की, मंद - मंद रोशनी में
काली रेखाकृत दिखा कुछ ऐसे
जैसे खड़ा हो कोई मानवाकृत कुंद का ...।
निर्निमेष आँखों से, स्थिर पैर व्यग्र मन
देखता रहा मैं उसे,
फिर भी न हटा वह, प्राणी घना कुंज का ...।
भाव विव्हल भय वश,अस्थिर हो चला तन
हाथ उठा उस ओर, जिस ओर खड़ा था वह
हाथ उठा उसका भी, जिस ओर खड़ा था मैं
मन में विचार हुआ,
पकड़ो कहता है वह चाहा मैं भाग जाऊं,
पीछा न छोड़ा वह,भ्रम बढ़ता गया,
कदम बढ़ता गया,भय चढ़ता गया
मुझे मति मंद का ...।
अरे, वह भूत है, पिशाच है, दानव है
पीछा करता हुआ आया कोई मानव है
निराश्रित होकर मैं रुका कुछ क्षण को
सोचा था मारुं मैं उठा कंकड़ को
झुका मैं, झुका वह सुध न रहा मेरे तन की
हिल उठी मेरी काया भ्रम की ऐसी माया
जिसे मैं डर रहा था, वह तो थी मेरी छाया
सूनी गलियों ...।
- पता - मुकाम - पोष्ट - गनियारी, जिला - बिलासपुर (छ.ग.)
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