इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

सोमवार, 24 जून 2013

जिम्‍मेदारी


  • भावसिंह हिरवानी 


उस दिन अचानक बैंक में हरीश मा.सा. से मुलाकात हो गई। बैंक के कर्मचारी किसी जरूरी काम से उलझ गए थे जिसकी वजह से मा.सा. को प्रतीक्षा करते बहुत देर हो गई थी। मेरे अभिवादन के बाद उन्होंने बड़ी तल्खी से कहा - अज्जु जानते हो। इन दोनों लड़कों को मैंने विद्यालय में पढ़ाया है। आज ये अफसर बनकर कुर्सी पर बैठे हैं और आज मैं इनकी मेहरबानी की बाट जोहता बहुत देर से खड़ा हूं। इनकी कृतध्नता तो देखो, मेरा सम्मान करना तो दूर, किस तरह मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ?
मैंने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा - सच कहते हैं मा.सा.। पता नहीं आज की पीढ़ी को क्या हो गया है ? अब उज्जैन महाविद्यालय की घटना को ही देख लीजिए न। छात्रों ने अपने ही प्राध्यापक को पीट - पीट कर मार डाला और वजह भी क्या थी - उन्होंने छात्र संघ का चुनाव स्थगित कर दिया था, बस।
- यही तो मैं कह रहा हूं। एक जमाना था जब गुरू को सारे देवताओं से श्रेष्ठï पद की प्रतिष्ठïा मिली हुई थी। लेकिन आज हमारी क्या स्थिति है, आप स्वयं अपनी आंखों से देख रहे हैं।
मैंने एक दीर्घ सांस लेकर कहा - लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है मा. सा.। जरा सोचिए, अपने बच्चों को विद्यालय क्यों भेजते हैं। इसीलिए न कि वे वहां से एक सभ्य, सुशिक्षित इंसान और योग्य नागरिक बनकर निकलेंगे और देश तथा समाज की सेवा करेंगे। लेकिन यह कैसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं आप लोग, जो आपका ही सम्मान नहीं करती। बच्चे को अच्छे संस्कार देने की जिम्मेदारी तो आप गुरूजनों की है न ?
मेरी बातें सुनकर हरीश मा. सा. एक क्षण के लिए निरूत्तर हो गए। तभी कैशियर अपनी सीट पर आकर बैठ गया और बोला - मा. सा. आईये। कम्प्यूटर की खराबी के कारण आप लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़ा।
हरीश मा. सा. झट से काउन्टर की ओर लपके, लेकिन उनका चेहरा अब भी खीझ से भरा हुआ था।
  • पता - कबीर प्रिंटिंग प्रेस, गुरूर, जिला - दुर्ग ( छग )

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