इस अंक के रचनाकार

इस अंक के रचनाकार आलेख खेती-किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेलीः ओमप्रकाश साहू ' अंकुर ' यादें फ्लैट सं. डी 101, सुविधा एन्क्लेव : डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ' मृदुल' कहानी वह सहमी - सहमी सी : गीता दुबे अचिंत्य का हलुवा : राजेन्द्र प्रसाद काण्डपाल एक माँ की कहानी : हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन अनुवाद - भद्रसैन पुरी कोहरा : कमलेश्वर व्‍यंग्‍य जियो और जीने दो : श्यामल बिहारी महतो लधुकथा सीताराम गुप्ता की लघुकथाएं लघुकथाएं - महेश कुमार केशरी प्रेरणा : अशोक मिश्र लाचार आँखें : जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी तीन कपड़े : जी सिंग बाल कहानी गलती का एहसासः प्रिया देवांगन' प्रियू' गीत गजल कविता आपकी यह हौसला ...(कविता) : योगेश समदर्शी आप ही को मुबारक सफर चाँद का (गजल) धर्मेन्द्र तिजोरी वाले 'आजाद' कभी - कभी सोचता हूं (कविता) : डॉ. सजीत कुमार सावन लेकर आना गीत (गीत) : बलविंदर बालम गुरदासपुर नवीन माथुर की गज़लें दुनिया खारे पानी में डूब जायेगी (कविता) : महेश कुमार केशरी बाटुर - बुता किसानी/छत्तीसगढ़ी रचना सुहावत हे, सुहावत हे, सुहावत हे(छत्तीसगढ़ी गीत) राजकुमार मसखरे लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की रचनाएं उसका झूला टमाटर के भाव बढ़न दे (कविता) : राजकुमार मसखरे राजनीति बनाम व्यापार (कविता) : राजकुमार मसखरे हवा का झोंका (कविता) धनीराम डड़सेना धनी रिश्ते नातों में ...(गजल ) बलविंदर नाटक एक आदिम रात्रि की महक : फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी से एकांकी रूपान्तरणः सीताराम पटेल सीतेश .

रविवार, 24 मार्च 2013

अंतर, मोहभंग

अंतर
- स्वाति कपूर चड्डा  -
- अरे बेटी, पूरे दो महीने बाद आना हुआ तुम्हारा ..... कैसी है मेरी बेटी । माँ ने मायके आई हुई बेटी की कुशलक्षेम पूछते हुए कहा।''
- क्या बताऊ माँ, मैं तो अपनी ननद से बड़ी परेशान हूं। दो महीने भी पूरे नहीं गुजरते कि ननद रानी पति - बच्चो समेत मायके आ धमकती है। उनके बच्चो का सारा दिन धमा - चौकड़ी मचाना शुरू रहता है और ननद रानी आराम से अपनी माँ के साथ बतियाती बैठी रहती है .... इतने सारे लोगो का नाश्ता - खाना मुझे अकेले ही बनाना पड़ता है  और उसमे भी ढेरो फरमाइशे और नखरे ......ऊपर से ऑफिस में अलग छुट्टी लेनी पड़ जाती है .... अभी परसों ही मेरी ननद अपने ससुराल वापस गयी है ,तब मैंने चैन की साँस ली है और यहाँ आ पाई हूं।'' बेटी ने शिकायती अंदाज़ में जवाब दिया।
- कैसी है तेरी ननद ? क्या उसे जरा भी नहीं समझता कि तू एक नौकरी पेशा स्त्री है ,घर - गृहस्थी के सभी कामो के साथ साथ बाहर के काम भी करती है, फिर सास - ससुर की सेवा, दो छोटे बच्चों को संभालना, उन्हें पढाई करवाना। ये सब जिम्मेदारियां  तेरे ही  ऊपर है। ऐसे में उसे हर दो महीने में मुंह उठा के मायके नहीं चले आना चाहिए। और इतनी फरमाइशे नहीं करना चाहिए । खैर छोड़, ये सब बाते पहले बता कि शाम के नाश्ते और रात के खाने में क्या बनवा ले ?''  माँ ने बड़े प्यार से अपनी बेटी से कहा। फिर अपनी बहू को आवाज़ दी - बहू, दीदी के लिए अभी तक चाय - नाश्ता तैयार नहीं हुआ क्या ? दीदी पूरे दो महीने बाद आई है। ऐसा करो तुम ऑफिस से आज की छुट्टी ले लो.....।''
                                                                                                                           पता  नागपुर महराष्ट्र 




                     मोहभंग
- डां. बच्चन पाठक '' सलिल ''  -
तिवारी जी एक स्थानीय इस्पात कम्पनी से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। पैंतीस वर्षों की सेवा थी।
उन्हें भविष्य निधि ग्रेच्युटी आदि के सात लाख रुपये मिले थे।
उन्होंने अपनी पत्नी से कहा - गाँव चलेंगे। दो - दो भतीजे हैं। बार - बार कह रहे हैं कि चचाजी आइए। कोई कष्ट नहीं होगा। हमें सेवा का अवसर दें।''
उन्होंने अपने मित्र शर्माजी से कहा - यह घर बेचवा दीजिए। डेढ़ दो लाख भी मिलेंगे तो कोई हर्ज नहीं।''
शर्मा जी अनुभवी थे । बोले - गाँव में पहले स्थापित हो जाइए। फिर आइएगा। पंद्रह दिन भी रहियेगा तो ग्राहक मिल जायेंगे। ऐसे हडबड़ा कर मत बेचिए।''
तिवारी जी गाँव गए। दोनों भतीजे अलग - अलग रहते थे। दोनों ही अपने यहाँ उनको रखना चाहते थे।
शर्त ही थी कि तिवारी जी अपने और भतीजे के नाम पर जॉइंट एकाउंट खोलकर सारी राशि जमा कर दें।
दो तीन दिनों के बाद उनके द्वार पर तीन चार युवक आए। उनमे एक मुखिया का बेटा था, दूसरा एक स्थानीय पार्टी का नेता था। उनमे से एक बोला- बाबा,आप तो खूब कमाएं हैं। अब यहाँ चैन से रहिए।
तीन लाख रुपये हमें दे दें, कोई आपको कुछ नहीं कहेगा। अगर किसी ने कुछ कहा तो हम सबकी बंदूक उस पर तन जाएगी। यही आजकल यहाँ का नियम है। पास के घटौली गाँव के युवकों को कुछ नहीं दिया। एक दिन खेत में गोली से उड़ा दिए गए।
युवक चले गए। तिवारी जी ने यह बात अपने बाल सखा नन्द कुमार को सुनाई। नन्द कुमार ने कहा -बात सही है। ये गुंडे पढ़ लिख कर बेकारी के दिन गाँव में गुजारते हैं। बिना लाइसेंस की बन्दूक रखते हैं और धमका कर रंगदारी वसूल करते हैं। अपनी कमाई का एक भाग विधायक और पुलिस को भी देते हैं। इनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
रात भर तिवारी जी को नींद नहीं आई। वे सोचते थे कि गाँव में जाकर रोज पोखरे में स्नान करेंगे, शंकर जी की पूजा करेंगे,आम के समय आम खायेंगे। मक्का के समय  में मचान बांध कर टीन पीट कर जानवर भगायेंगे।
अपने द्वार पर रामायण पाठ कराएँगे। बचपन की स्मृतियो को फिर से ताज़ा करेंगे।
अब उनका मोह भंग हो चुका था । दुसरे दिन ट्रेन से वे वापस लौटे। यहाँ अपने मित्र को कह दिया- अब घर बेचने की जरुरत नहीं है। जन्म भूमि से कर्म भूमि का कम महत्व नहीं है। गाँव में अब मेरा कोई मित्र नहीं। कुछ मर गए कुछ अन्यत्र बस गए। अब मैं यहीं आप लोगों के साथ रहूँगा।
                     
                    पता जमशेदपुर फोन. 0657 2370892

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