गुरुवार, 28 नवंबर 2019

नवम्बर 2019 से जनवरी 2020

इस अंक में

शोध लेख
भील जनजाति की लोक -सांस्कृतिक चेतना :  संध्या पांडेय
प्रतिरोध की संस्कृति : नुक्कड़ नाटक और महिलाएँ : सुप्रिया पाठक


आलेख
विष्णु के चौथे अवतार : भगवान नृसिंह :  पृथ्वीसिंह बैनीपाल बिश्नोई
गरबा V/ S सांझी टेसू और झांझी ...: मंजू वशिष्ठ
श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंगः
भरतजी ही श्रीराम का प्रतिबिम्ब है : डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता
सुभाषी बनो, सुभाषी बनो : युद्धवीर टण्डन


कहानी
रात रानी का खिला हुआ चेहरा : रतन चंद  ‘रत्नेश’
अरुण गमन : विनय कुमार शुक्ल
वहां तो बिजली ही नहीं है : डॉ . विकास कुमार


व्यंग्य
इक जंगला बने : अशोक व्यास


लघुकथा
लघुकथाएं:सिराज फ़ारुकी
पसंद : नज़्म सुभाष
चन्द्रेश छतलानी के लघुकथाएँ
सुमन सौरभ के लघुकथाएँ


गीत / ग़ज़ल/ नवगीत / कविता
मैं आपका आभारी हूं ...  ( नवगीत ) : सृष्टि शर्मा
सविता वर्मा 
 केशव शरण की रचनाएं
मंजू राठी ( चार लाइनें )
करें मनुहार क्या कहिए ( ग़ज़ल ) : रागिनी स्वर्णकार (शर्मा)
कब तक सहूंगी प्रताड़ना ( कविता ) : सौरभ कुमार ठाकुर
सावित्री काला ( नवगीत )
हाशिये पर खडे लोग ( कविता ) सरोज यादव’ सरु’
हर एक जगह ...( गज़ल ) : जितेन्द्र सुकुमार ‘‘साहिर’’
वो जो आँखों से ...( गज़ल )  : डॉ. वीरेन्द्र पुष्पक
अब आसमाँ में चाँद ( गज़ल )  : हरिकांत त्रिपाठी
छोटी - छोटी कठिनाइयों से ( गज़ल ) : अलका गौड़
वो जो आँखों से .. : डॉ. वीरेन्द्र पुष्पक
रसखान
मोर दिल्ली गँवागे जी ( नवगीत ) : सुशील यादव
आओ कविता लिखें ( कविता ) : ज्ञानेन्द्र मोहन ज्ञान
अंकुर सहाय अंकुर के दोहे
ये महफिल हमारे ... ( कविता ) : सुमति श्रीवास्तव
वो जब से ... ( गज़ल ) : अमित ’ अहद’
रवीन्द्र कुमार की रचनाएँ
कोई तो रास्ता निकल जायेगा (  नवगीत ) : कृष्ण भारतीय
नफरतों की क्यों ( गजल )  : हरदीप बिरदी
यहां किस्सा है ( दो गजलें ) : अनिल ’ मानव’
बिट्टू उदास है ( कविता ) : दीपेश दुबे
अलका जैन  ’सरर’ की चार गज़लें  

बुधवार, 27 नवंबर 2019

भील जनजाति की लोक -सांस्कृतिक चेतना

संध्या पांडेय


     भारत अनेक जातियों - जनजातियों, धर्म पंथों तथा संस्कृति संप्रदायों का भंडार है। जाति व्यवस्था भारतीय सामाजिक व्यवस्था का प्राण - तत्व है। हमारी भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जनजातियों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जनजाति, जिन्हें हम आदिवासी, अनुसूचित जनजाति एवं भूमिजन के नाम से जानते हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों में निवास करती हैं। नगर से दूर वन्य प्रदेशों और बीहड़ जंगलों में प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने वाली इन आदिम जातियों की लोक - संस्कृति में धरती की सोंधी खुशबू प्राकृतिक वातावरण में पल्लवित और पुष्पित होती है। वास्तव में ये आदिवासी वन - पुत्र हैं। गिलिन और गिलिन ने अपनी रचना ’ कल्चरल एंथ्रोपोलॉजी’ में जनजाति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि - स्थानीय जनजातीय समूहों का ऐसा समवाय जनजाति कहा जाता है जो एक सामान्य क्षेत्र में निवास करता है। एक सामान्य भाषा का प्रयोग करता है तथा जिसकी सामान्य संस्कृति है। 1 प्रारंभ से ही ये आदिवासी प्रकृति के निकट रहे थे। ये प्रकृति प्रेमी होते हैं तथा आज के वैज्ञानिक युग में भी प्राकृतिक जीवन जीना पसंद करते हैं।
     वर्तमान में भारत में जनजातीय समूहों की कुल संख्या 700 से अधिक है। जिनमें प्रमुखतः कोल, भील, संथाल, मुंडा, उराँव आदि हैं। जिसमें भील एक बड़ी जनजीति के रूप में उभरी है। भील मध्य प्रदेश की दूसरी बड़ी जनजाति है। ये लोग भिलाला तथा भील गरासिया भी कहलाते हैं। मध्य प्रदेश में ये मुख्यतः खरगोन, धार, झबुआ और रतलाम जिलों में निवास करते हैं। इन जिलों के अतिरिक्त पूर्व निमाड़ (खंडवा) जिले में भी वे पर्याप्त संख्या में रह रहे हैं। मालवा और निमाड़ अंचल के विभिन्न नगरों में निर्माण कार्य में संलग्न मजदूरों के रूप में भीलों को बड़ी संख्या में देखा जा सकता है। भील शब्द की उत्पत्ति के संबंध में यह माना जाता है कि इस शब्द की उत्पत्ति मूलतः उच्चारण संबंधी भेद के कारण संस्कृत के मूल शब्द ’ भिद’ से हुई है। भिद का भावार्थ है बंधना, भेदना, वेधना (लक्ष्य को वेधना) आदि। 2 ऐसा माना जाता है कि ऋषि वाल्मीकि स्वयं भील थे तथा उनका मूल नाम वालिया था। इसी प्रकार महाभारत में धनुर्विद्या में प्रवीण प्रसिद्ध एकलव्य भी भील जनजाति थे। जिन्होंने गुरु दक्षिणा में अपना अँगूठा काटकर दे दिया था। भील स्वयं को प्रकृति - पुत्र कहते हैं। भील साहसी और पराक्रमी होते हैं तथा वे जीवट के पक्के व आत्माभिमानी होते हैं। वनों से उनका भावनात्मक जुड़ाव है। भील जनजाति की अपनी अलग वेशभूषा, रहन - सहन, खान - पान, भाषा तथा जीवन शैली है। इनकी अपनी पृथक संस्कृति है जो लोक से बहुत ही गहराई से जुड़ी हुई है।
     विश्व की सभी जातियों एवं संप्रदायों में तीज - त्यौहार मनाने का प्रचलन अनादिकाल से चला आ रहा है, जिनसे उनकी लोक संस्कृति के दर्शन होते हैं। भील जनजाति हर्षोल्लास से अपने त्यौहार मनाती है। उनका सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार होली है। होली के दूसरे दिन मनाया जाने वाला इनका पर्व ’ गल’ कहलाता है। यह मनौतियों का त्यौहार है। अभावग्रस्त भील समुदाय इस पर्व में विविध मनौतियों को माँगता है और यदि मनोकामना पूरी हुई तो वह गल के खंभे पर झूलकर तीन,पाँच या सात परिक्रमा करता है। इसी प्रकार होली के पश्चात एकादशी को ’ गढ़’ नामक पर्व का आयोजन किया जाता है। भील चूँकि वीरतापूर्वक कार्यों में अधिक रुचि लेते हैं। ऐसे में ’ गढ़’ पर्व में भील युवकों के शौर्य प्रदर्शन और मनोरंजन का एक आयोजन होता है। यही उनकी सांस्कृतिक धरोहर है, जो उनके लोक में व्याप्त है। भीलों का एक और प्रमुख त्यौहार है . ’ दिवासा’। इसे जून माह में मनाया जाता है। इस दिन सामूहिक रूप से भील विभिन्न देवी - देवताओं की पूजा करते हैं, बलि देते हैं और मद्य का तर्पण करते हैं। कुछ त्यौहारों को इन्होंने हिंदू समाज से लिया है। जिन्हें ये अपनी सामाजिक मान्यताओं के अनुसार मनाते हैं। जैसे - दशहरा, दीपावली, रामनवमी आदि। ऐसा लगता है कि भीलों के समस्त त्यौहार इनके आत्मविश्वास, श्रद्धा और मन की उमंगों की देन है। यही उनकी सांस्कृतिक धरोहर है। जो उनके लोक में व्याप्त है।
     चूँकि भीलों के जीवनयापन का प्रमुख स्रोत कृषि है। पर्याप्त कृषि भूमि के स्वामी भील यथासंभव खाद्यान्न स्वयं उपजाते हैं तथा उन्हीं से अपना तथा अपने परिवार का भरण - पोषण करते हैं। भीलों का भोजन बहुत ही सादा एवं प्राकृतिक होता है। प्रत्येक भोज्य पदार्थों को ये उबालकर या भूनकर खाते हैं। भील प्रायः मक्का, ज्वार, बाजरे की रोटी खाते हैं। इनमें से मक्का को ये प्राथमिकता देते हैं। कोदो, कुटकी इनका विशिष्ट भोजन है। यह अनाज कम पानी में, कंकड़ - पत्थर युक्त भूमि पर भी कम समय में पैदा होता है। भील जनजाति मांस के शौकीन होने के कारण उसकी आंशिक और आकस्मिक आपूर्ति के लिए मुर्गियाँ पालते हैं। इसके अतिरिक्त वे वनों से प्राप्त कंद, मूल, फल आदि को भी अपने भोजन में सम्मिलित करते हैं।
     भील जनजातियों में शराब का व्यसन अत्यधिक है। भीलों का कोई भी पर्व, विवाह, जन्म - मृत्यु आदि आयोजन बिना शराब के पूरे नहीं होते हैं। विवाह में तो शराब अनिवार्य है। बीमारी पर देवी - देवताओं को तर्पण करने के लिए जादू - टोने के प्रभाव से मुक्ति हेतु आत्माओं की संतुष्टि के लिए देव - बड़वा (देवो की सामूहिक पूजा)के अवसर पर शराब का प्रयोग किया जाता है। शराब के अतिरिक्त नशे के लिए भील ताड़ी भी पीते हैं। भील धूम्रपान के भी शौकीन होते हैं। भील जनजीवन में धूम्रपान का महत्वपूर्ण स्थान है। अतिथि को बीड़ी पिलाना इनके समाज में आतिथ्य का सूचक है।
     भील जनजाति की वेशभूषा अत्यंत साधारण है। इनमें दिखावा नाम - मात्र का भी नहीं होता। भील पुरुषों की दैनंदिन वेशभूषा मात्र एक लँगोटी है तथा सिर पर फेंटा बाँधने का प्रचलन भी है। निर्धन भील वस्तुतः फेंटा न बाँध कर एक मीटर लंबा और एक फुट चौड़ा कपड़े का टुकड़ा लेकर सिर पर लपेट लेते हैं। उनकी इस वेशभूषा का प्रत्यक्ष संबंध आर्थिक स्थिति तथा बाह्य संपर्क से है। भील पुरुषों की अपेक्षा भील महिलाएँ वस्त्रों के प्रति सजग होती हैं। भील महिलाओं की वेशभूषा में सामान्यतः लुगड़ा, ओढ़नी, चोली तथा लँहगा सम्मिलित होता है। भील जनजाति सामान्यतः विपन्नता के कारण वस्त्रों पर अधिक व्यय नहीं कर पाते, किंतु साज - सज्जा में ये वनों से प्राप्त होने वाले फूलों - पत्तियों को श्रृंगार साधन बनाते हैं। विशेष अवसरों पर ये चाँदी के आभूषणों को धारण करते हैं।
     भील जनजाति की लोक संस्कृति में चित्रांकन की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। भील स्त्री - पुरुष शरीर को अलंकृत करने के लिए आभूषणों के अतिरिक्त गुदना का भी प्रयोग करते हैं। नारियाँ अपने हाथों से लेकर पैरों तक गुदना गुदवाती हैं। गुदना कतिपय जनजातियों में जातीय प्रतीक भी होता है। उदाहरण स्वरूप - भील महिलाओं के द्वारा आँखों के सिरों पर दो आड़ी लकीरें गुदवाना भील होने का प्रतीक है। इतना ही नहीं यदि किसी स्त्री के शरीर पर गुदना न गुदा हो तो उस स्त्री के हाथ का पानी तक पीना वर्जित होता है। वास्तव में गुदना गुदवाने की प्रेरणा आदिवासियों को आदिमानवों द्वारा उत्कीर्ण गुहा - चित्रों से मिली है। अतः आदिवासी समाज में माथे से लेकर पैर की उँगलियों तक अनेक प्रकार का चित्रांकन गुदना के अंतर्गत किया जाता रहा है, किंतु आज इस समाज की लोक परंपरा समाप्ति की कगार पर आ खड़ी हुई है।
     प्रकृति लोक - संगीत की जननी है। प्रकृति के साथ अंतर्किया करते हुए ही मानव ने कंठ और वाद्य संगीत का विकास किया है। जिसमें भील जनजाति का विशेष महत्व है। ढोल या मांदल और बाँसुरी की धुन पर भील इतना मधुर गाते हैं कि मन मुग्ध हो उठता है। भीलों के वाद्य यंत्रों में थाली भी शामिल है। नगाड़े का छोटा प्रारूप भी वे गले में लटकाकर हाट मेलों में गाते - बजाते हुए देखे जाते हैं। अतः भील जनजाति के सांस्कृतिक धरोहरों में गीत - संगीत सर्वोपरि है। इसके गायन द्वारा शाब्दिक चित्रण बड़े सहज भाव से व्यक्त होते हैं। प्राचीनकाल से ही गीत - संगीत भील जनजीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। चाहे वह माँगलिक कार्य हो या उत्सव, देवी - देवताओं को मनाने के लिए कोई पूजा हो या किसी संस्कार, मेले या दैनिक कार्य करने का समय। वह अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति गीतों के रूप में करते हैं। जैसे - भील जनजाति में होली के अवसर पर भगोरिया हाट नामक उत्सव के समय गाया जाने वाला यह गीत उनकी मनोदशा का चित्रण करता है। वास्तव में भगोरिया हाट उत्सव विवाह योग्य जोड़े को मिलाने का कार्य करता है। निम्नांकित पंक्तियाँ इसी भावना को व्यक्त करती हैं-
आरसी भालिने, सुरमो लोगाविने,
लाडी हेरने चाल्यो रे भाया।
हाथ माँ तेर्वायो गुलाल लीने,
घराली काजे लगाड़ा रे भाया। 3
     इस गीत का आशय है कि ’ बालों को काढ़ कर’(कंघी कर) सुरमा रचकर, लाडी (वधू)लाने जा रहा है रे भाई। त्यौहार के अवसर पर घरवाली लाडी (वधू) को गुलाल लगाना है रे भाई।
     परिणय के परिप्रेक्ष्य में भगोरिया हाट भील आदिवासी संस्कृति की विशिष्टता है। आदिवासी बहुल मध्य प्रदेश में भीलों के अतिरिक्त अन्य किसी भी जनजाति में साप्ताहिक हाट - बाजार का वैवाहिक महत्व नहीं है।
लोक संस्कृति को जीवंत बनाने वाले भीलों में विवाह संस्कार का विशेष महत्व है। भीलों में विवाह से संबंधित दो प्रथाएँ उल्लेखनीय हैं - प्रथम तो वधू मूल्य की प्रथा है। वधू मूल्य वह राशि एवं वस्तुएँ हैं जो कि वर पक्ष के द्वारा वधू के अभिभावकों को दी जाती है। इस रूप में यह शेष समाज में प्रचलित दहेज प्रथा से विपरीत है। द्वितीय - सेवा - विवाह के रूप में घर जँवाई प्रथा है। भील जनजाति में विधवाओं व परित्यक्ताओं को पुनर्विवाह की अनुमति प्राप्त है।
     वास्तव में भील मध्य प्रदेश ही नहीं वरन भारत की एक बड़ी जनजाति है, जिनकी अपनी पृथक संस्कृति है। उस संस्कृति को साक्षात भोगते हुए, उसमें जीते हुए, पारस्परिक नियंत्रण के माध्यम से अपनी संस्कृति को वे संरक्षित रखता है तथा पीढ़ी दर पीढ़ी उसका सफलतापूर्वक संचार करता है। वस्तुतः यही वे तत्व हैं जिनके कारण भील जनजाति अपनी सांस्कृतिक धरोहर को अनेकानेक संघातों के बावजूद अक्षुण्ण रखे हुए है। किंतु खेद की बात है कि गत कुछ सालों में इन आदिवासियों के वैभव व विक्रम को जल, जंगल, जमीन के धर्म को, राग और रंगों को, रूप और रास को न जाने किसकी नजर लग गई है। फिर भी यह महान जाति बड़ी प्रसन्न, उदार और अलमस्त सहृदय रही है। उनके तन पर गोदनों की सुंदरता, पक्षी, जानवर व पेड़ों में देव आस्था, पर्वों व मेलों का लोक रंग, उनके कंठों में गीत का अमृत और पैरों में नृत्य का सम्मोहन रचा हुआ है।
     भील जनजाति लोक समाज का एक अहम् हिस्सा है। इनकी अपनी कुछ मान्यताएँ, रीति - रिवाज, बोली, परंपरा तथा जीवन - शैली है जिनके द्वारा इनकी संस्कृति निर्मित होती है। चूँकि भील जनजाति में शिक्षा का स्तर न्यूनतम है तथा बाह्य जीवन से संपर्क भी सीमित है। इसीलिए उनके सृजन में नवीनता तथा परिवर्तन अधिक दिखाई नहीं पड़ता है। वह सिर्फ अपनी जमीन, अपने साधनों, अपना मस्तिष्क और अपनी परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इनके पास अपनी लोककथा,गल्प,गीतों,मिथ, किंवदंतियों, मुहावरों व कहावतों का विषद भंडार है। जिससे इनकी लोक परंपरा सदैव अग्रगामी रही है। ऐसे में आज आवश्यकता इस बात की है कि इनकी संस्कृति को जीवंत बनाया जाए तथा इनकी संस्कृति को संरक्षित रखा जाए। जिससे वर्तमान संचार क्रांति के युग में तथा भविष्य में भी इनके अनुभवों, इनकी संस्कृतियों से लाभांवित हुआ जा सके। साथ ही इन प्रकृति पुत्रों के पारंपरिक विश्वासों, रीति - रिवाजों को संरक्षण भी मिल सके।
संदर्भ ग्रंथ
1. भारतीय जनजातियाँः संरचना एवं विकासः हरिश्चंद्र उप्रेती, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, तृतीय संस्करण 2007 पृ.1
2. भील जनजीवन और संस्कृति : डॉ. अशोक डी. पाटिल, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, प्रथम संस्करण 1998 पृ. 5
3. वही, पृ. 58


हिंदी विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, 
बनारस (उत्तर प्रदेश )
मो. 9454066675, ई मेलः sandhyapdy599@gmail.com

विष्णु के चौथे अवतार : भगवान नृसिंह

पृथ्वीसिंह बैनीपाल बिश्नोई

     भगवान विष्णु ने समय - समय पर पाप का नाश कर पुनः धर्म की स्थापना की । समय - समय पर अवतार और रूप धारण कर इस धरा पर आए। श्री हरि विष्णु अवतार गुरु - जम्भेश्वर भगवान ने अपनी कालजयी अमरवाणी के सबद संख्या 94 में अवतारो का वर्णन करते हुए चौथे अवतार के बारे में कहते हैं ’ नृसिंह रुप धर हिरणाकुश मारयो,प्रह्लादो रहियो शरण हमारी। अर्थात सतयुग में हिरण्याकशिपू के अत्याचारों से जन - जीवन में हाहाकार मच गया था। गुरुजी कहते है जन - मानस की पुकार सुन कर विष्णु अर्थात मैंने नृसिंहावतार धारण करके दैत्यराज हिरण्याकशिपू का वध किया और निझ भक्तराज प्रह्लाद की रक्षा की। यही प्रयोजन था इस धरा पर नृसिंह अवतार लेकर आने का। 
      इस लेख के भीतर मेरी एक काव्य रचना के माध्यम से उनकी कथा और महिमा का गुणगान -
नृसिंह होय हिरणाकुश मारी, प्रह्लादो रहियो शरण हमारी।
विश्व के स्वामी प्रभु को मान, सबके दाता नृसिंह भगवान।
भक्त मित्रता होती पक्की है, भक्ति स्वार्थ रहित सच्ची है।।
प्राकट्य नृसिंह भगवान का, मार्ग है भक्य कल्याण का।।
रहे संग ईश हमसे दूर नहीं, सर्व समर्थ है मजबूर नहीं।।
ईश्वर नृसिंह शक्ति - पराक्रम के, वे सदा रहे संस्थापक धर्म के।।
           हिरण्याक्ष के वध के बाद हिरण्यकशिपू का गुस्सा भड़क कर सातवें आसमान चढ़ चुका था। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में उसका डर और उसका ईश्वर के प्रति विरोध दिखाता यह अंश -
जब हिरण्याक्ष था वध हुआ, हिरण्यकशिपू था कु्रद्ध हुआ।।
वह मन में दुखी हुआ भारी, हुआ विरोधी ईश ललकारी।।
उसमें ईश्वर के प्रति घृणा थी, अजय बनने बहु कामना थी।।
कठोर बहुत उसने तप किया, ब्रह्मा से था उसने वर लिया।।
देव मानव पशु से न मरे वर था, उसे किसी का भी नहीं डर था।।
हिरणाकुश शासन कठोर था, देव - दानव उस आगे कमजोर था।
राज में उसका ही अभिनन्दन था, करे उसका ही चरण - वंदन था।।
ईश पूजे मिलता दण्ड कठोर था, उस आगे हर कोई कमजोर था।।
सब लोक थे उसके ही साये में, लोकपाल सभी तब घबराये थे।।
बढ़ता गया दैत्य का अत्याचार, ऋषि - मुनि सब हो गये लाचार।।
     जब हिरण्यकशिपू का अत्याचार अधिक बढ़ने लगा और विष्णु के भक्तों द्वारा भगवान की पूजा के बाद भगवान विष्णु द्वारा भक्तों को हिरणाकुश वध के वचन को बतलाता यह अंश
भक्त विष्णु - विष्णु थे जपने लगे, देवता भी ईश स्तुति करने लगे।।
विष्णु तब स्तुति से हुये प्रसन्न, देवों - भक्तों से पूछा था प्रश्न।।
हिरणाकुश वध का दिया वचन, भक्तन ह्रदय खिला था चमन।।
     हिरणाकुश के घर भक्तराज प्रह्लाद के जन्म और उसकी विष्णु भक्ति को दर्शाता काव्य का यह अंश-
हिरणाकुश के पुत्र प्रह्लाद हुये, भक्त सारे फिर से आबाद हुये।।
प्रह्लाद विष्णु को करै प्रणाम, जपता नित्य विष्णु का नाम।।
भक्त प्रह्लाद करै ईश ध्यान, समझते हिरणाकुश ये अपमान।।
असुर बालकों को देते उपदेश, संलग्न भक्ति में रहते हमेश।।
     भक्त प्रह्लाद की भक्ति से गुस्सा और भयभीत हुए दैत्य हिरणाकुश द्वारा प्रह्लाद को डराना - धमकाना और चेतवानी देता यह काव्यांश-
हिरणाकुश को गुस्सा आया, निज बाल बहुभांत समझाया।।
भक्त प्रह्लाद दरबार बुलाया, तरह - तरह से उसको डराया।।
प्रह्लादजी भक्ति पर अड़े रहे, जोड़ हाथ विनम्र वे खड़े रहे।।
कहे डाँट तू उदण्ड हुआ है, तुम्हे दें दण्ड जरूरी हुआ है।।
कैसे आज्ञा मेरी भंग करदी, कैसे शुरू विष्णु रटन करदी।।
     हिरणाकुश द्वारा प्रह्लाद को चेतावनी देने पर प्रह्लाद द्वारा विष्णु का महत्व बतलाना और पिताजी को सही मार्ग पर आने को समझाना -
बड़े शान्त तब बोले प्रह्लाद, कण - कण में विष्णु आबाद।।
छोटे - बड़े सब नित रटते ईश, सब में बसै विष्णु जगदीश।।
विष्णुजी सबका रचावनहार, विष्णुजी सबका पालनहार।।
करै रक्षा और सबका संहार, वही जगत का है राखनहार।।
छोड़ो पिताजी ये असुरभाव, वे सबसे रखते पूरा लगाव।।
छोड़ वैर अब उदार बनिये, उस ईश्वर की भक्ति करिये।।
     भक्त शिरोमणी प्रह्लाद के मुखारविन्द  विष्णु का महिमा गान सुन कर गुस्से में भरे हिरणाकुश द्वारा प्रह्लाद को ललकारना और विष्णु का प्रमाण मांगना -
सुनी बात प्रह्लाद भक्त की, लाल क्रोध में हिरणाकुश जी।।
बोले प्रह्लाद से दैत्य ललकार, निज जीवन पर करो विचार।।
सोच समझ तू मैं ही तेरा ईश, मैं देखूं कहाँ है तेरा जगदीश।।
      भगवान विष्णु की महिमा को आगे बतलाते हुए प्रह्लाद भक्त के द्वारा  विष्णु की उपस्थिति कहां - कहां है और उन्हें सर्वोपरी विद्यमान बताये जाने पर दैत्य हिरणाकुश द्वारा खम्बे पर वार -
हाथ जोड़ प्रह्लाद कहे विनम्र, तो में - मो में एवं विराजै खम्भ।।
हिरणाकुश क्या विराजै खम्भे, दिखे न मुझे क्या हम हैं अन्धे।।
कह कूद गये सिंहासन से नीचे, तलवार हाथ आँख खोले - मीचे।।
बड़े जोर से खम्भे पर मारा है, तमतमाये ईश को ललकारा है।।
      हिरणाकुश द्वारा खम्बे पर वार के बाद भगवान विष्णु द्वारा नृसिंहावतार लेकर हिरण्यकशिपू का वध करते हैं और अपने निजी भक्त शिरोमणी प्रह्लाद को शरण प्रदान करना -
खम्भ फाड़ हरि असुर संहारा, नृसिंहावतार हिरणाकुश मारा ।।
आधा मानव तन - आधा शेर का, किया काम तमाम नहीं देर का।।
लीलाधारी आये ले नृसिंहावतार, भक्त खुश था दिया दुष्ट संहार।।
प्रह्लाद भक्त रक्षक शरणाधार है, ’ पृथ्वी’ जप विष्णु से बेड़ा पार है।।


313,सेक्टर 14, हिसार (हरियाणा) 125001
मोबाईल : 9518139200, 9467694029
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गरबा V/S सांझी टेसू और झांझी ...

मंजू वशिष्ठ


     आज बस अचानक मुझे दीदी से बात करते हुए अपने पिताजी द्वारा सिखाया गया एक चालीस साल पुराना गीत टेसू खेलते समय गाया जाने वाला याद आ गया। बच्चों ने भी पूछा और कहा,तो मैंने लिखने का मानस बना लिया। आजकल बच्चे इन चीजों से वंचित हैं, क्योंकि ना तो इतना समय होता है। ना ही घर वाले भी बच्चों को ऐसी चीजों को खेलने में रुचि दिखाते हैं। सभी का चमक दमक वाले मंहगे खेलों के प्रति ही लगाव देखने में आता है। ये एक विडम्बना ही है, कि हम ही उन्हें अपनी संस्कृति से दूर कर रहे हैं। इन पुराने संस्कृति के खेलों में आपसी सौहार्द व दैनिक सामाजिक समझ भी पैदा होती है। आइए! इन त्यौहारों के सादगी पूर्ण आयोजन, लोकगीतों और मनाने के तरीकों पर एक निगाह डालते हैं।
1
टेसू रे टेसू।
घंटार बजइयो।
नौ नगरी, दस गाम (गांव) बसइयो।
बस गए तीतर, बस गए मोर।
सड़ी डुकरिया, लै गए चोर।
चोरन के घर खेती।
खाय डुकरिया मौटी।
मौटी है जी मौटी है।
सब छोरन की ताई है
टेसू की लुगाई है।
     इन चार पंक्तियों को इस तरह भी गाया जाता है।
मौटी है के गई दिल्ली।
दिल्ली ते लाई द्वै बिल्ली।
एक बिल्ली कानी।
सब बच्चन (बच्चों)की नानी।
2
आगरे कूं जांगे, चार कौड़ी लांगे।
कौड़ी अच्छी भई तो, गांम में घुमांगें।
गांम अच्छो भयो तो, चक्की लगवांगे।
चक्की अच्छी भई तो,आटौ पिसवांगे।
आटौ अच्छो भयो तो, पूरी... पूआ बनवांगे।
     टेसू खेलने की परंपरा लगभग समाप्त सी हो गई है। इसलिए इसके गीत भी कम ही लोगों को पता हैं। टेसू जो कि मनुष्य की आकृति का तीन बांस की खप्पच्चियों द्वारा तैयार एक स्ट्रक्चर होता है। बीच में दीपक रखने की जगह होती है, को लेकर लड़के घर घर घूमते हैं और पैसे भी मांगते हैं। टेसू का खेल दशहरा से शुरू होकर शरदपूर्णिमा तक चलता है। ऐसे ही गीतों को गाते हुए लड़कों की टोली घूमती फिरती थी। लड़कियां झांझी लेकर चलती थीं। झांझी में एक मटकी में कई सारे छेद कर डिजाइन बनाते हैं, तथा उसमें दीपक जलाकर छोटी बच्चियां घर - घर खेलने, मांगने जाती हैं। रात के अंधेरे में छन कर आती रोशनी बहुत भली लगती है। बड़ा ही मनोरम दृश्य बनता है। कुछ चीजें बस आप महसूस कर सकते हैं। शब्द कम पड़ जाते हैं। लड़के टेसू लेकर व लड़कियां झांझी लेकर चलती हैं एवं नृत्य करती हैं।
नौ नवराते देविन के,
सोलह कनागत पितरन के,
मैं आई तेरे पूजन द्वार, 
पूज पुजंतर कहा फल होई,
भैया भतीजे संपत होई।।
सोलह तिथि भर पूजै याकौं 
अचल सुहाग कंत मन भावे।।
     अर्थात सांझी पूजन से अचल सुहाग, पति प्रेम तथा भाई भतीजा के यहां संपत (समृद्ध)होने का सुख मिलता है।
     शरद ऋतु और त्यौहार। उत्तर भारत में मनाया जाने वाले त्यौहार सांझी, टेसू, झांझी जो अब लुप्तप्राय से हैं। जहां गरबे को देश के कई प्रान्तों में स्वीकार कर (व्यवसायीककरण)शानोशौकत व धूमधाम से मनाया जाता है वहीं सांझी, टेसू,झांझी को गाँवों में अभी भी छोटे तबके के लोग ही इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। अश्विन मास में पितृपक्ष में बृज का लोकोत्सव सांझी कुंवारी कन्याओं द्वारा मनाया जाता है। वे अपने घरों की दीवार पर गोबर, फूल, पत्ती,आटा, हल्दी, कौड़ी, पन्नियों या इसी तरह की प्राकृतिक चीजों से प्रति संध्या को सुंदर आकृति बनाती हैं और रोजाना भोग भी लगाती हैं। यह बृज की विशिष्ट कला है। कहते हैं श्रीकृष्ण ने राधा को प्रसन्न करने के लिए शरदकाल में सांयकाल एक सुंदर कलाकृति बनाई थी जो संध्या समय निर्मित होने के कारण सांझी या चन्दा तरैया नाम से प्रसिद्ध है। कोई इसे देवी, दुर्गा, लक्ष्मी, पार्वती आदिशक्ति का अवतार भी मानते हैं। तो कोई बृज की देवी मानते हैं। प्रत्येक तिथि के हिसाब से इसको बनाया जाता है। इसमें फूल, बीजना (पंखा) गमला, आठकली का चौक, चिड़िया, सतिया आदि आकृतियां बनाई जाती हैं। कन्यायें सुंदर वर, सौभाग्य, सुखी जीवन की कामना से प्रतिदिन शाम को सांझी का पूजन आरती करती हैं। बृज के हर घर में मनाया जाता था। इसका उल्लेख कई ग्रन्थों में भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि राधाकृष्ण उनकी सांझी निहारने अवश्य आयेंगे। सांझी का भी एक गीत....
1
मेरी सांझी भोग लैए भोग लै
और की सांझी, लोई लै, लोई लै
मेरी सांझी पलका लोटै,
और की सांझी, घूरौ लोटै
मेरी सांझी, पान खाय
और की सांझी, कुत्ता कौ कान खाय
2
झांझी कै औरे धौरे दो मोती मो, पाये जी।
पाए पपाये मैंने सास ऐ दिखाए जी।
सास हमारी ने धर पत्थर पे फोरे जी।
फूटे फुटाए मैंने मां ऐ दिखाए जी।
माय हमारी ने गंगा जमना बहाए जी।
     हो सकता है शायद इसमें गलती भी हो, क्योंकि इसे मैं अपनी चालीस साल पुरानी यादों के सहारे लिख रही हूं।
     इन तीनों ही खेलों की समाप्ति शरद पूर्णिमा के दिन कोट (एक आकृति)का निर्माण कर पंजीरी आदि का भोग लगाकर, टेसू झांझी का विवाह संपन्न कर  विसर्जन कर दिया जाता है। इसकी मान्यताएं, लोककथाएं तो बहुत हैं। मैंने तो बस एक संक्षिप्त जानकारी साझा करने की कोशिश की है।

मंगल भवन, ब्लॉक, फ्लैट नंबर 201बी
बाल मंदिर स्कूल के पास,माला रोड 
कोटा जंक्शन राजस्थान
मो.ः 09462826524
manu.vashistha61@gmail.com

कुछ लाइनें : केशव श्‍रण

केशव शरण 

मैं कितनी हसरतों से भर गया था,
किसी जलसे में उनके घर गया था।
असर है आज भी छाया उसी का,
जो जल्वा चेतना को हर गया था।
किसी ने फूल रौंदे थे हमारे,
तो कोई चूर दरपन कर गया था।

चार पंक्ति : सविता वर्मा ' ग़ज़ल '

सविता वर्मा ' ग़ज़ल ' 

फाओ का हमारी सिला ये ही मिला,
मिला जो भी हमको बेवफा ही मिला।
नहीं कोई शिकवा न शिकायत किसी से,
नही हमको किसी से कोई भी गिला

यह सच है कि.......

सावित्री काला '' सवि ''

यह भी सच है जिनके घर मोम के होते है, वहां दिए नहीं जलते।
घोसला एक ही बार तो बनता है, बार -  बार दिल भी नहीं मिलते।।
हम नहीं जानते कि,  जिंदगी अब कैसी गुजर पायेगी,
जो आज मिले हैं जिंदगी में, वे क्या कल तक साथ दे पाएंगे।
सब जानते हैं कि कागज के, फूलों में खुशुबू नहीं होती,
धुप में तो कांच के, टुकडे भी चमकते दिखाई देते हैं।।
किसी को जबरदस्ती, अपना बनाया नहीं जाता है।
प्यार तो वह तासीर है, कोई खुद ही खिंचा आता है।।
यही सोच कर बहुत से लोग, जिंदगी का दावं खेल गए।
वे तो न मिल सके, जिंदगी के हसीन लम्हे भी बीत गए।।
यह भी सच है अपने ही, उजाड़ते हैं दिलों की बस्तियां।
डुबो देते हैं वे हमेशा, आशिकों कि प्यार भरी किश्तियाँ।।
ज़माने वाले तो आज भी, देंगे हमारे मिलन पर ताना।
यही तो ज़माने की फिदरत है, जो बदल नहीं सकती बाना।।
तुमने कहा हमारे मिलन से, तो भूचाल आ जायेगा।
जब जिंदगी में इतने, भूचाल झेले हैं एक और सही।। 

हाशिये पर खड़े लोग

सरोज यादव ' सरु ' 

हाशिये पर खड़े लोग,
हमेशा होते हैं गेंद की तरह गोल।
उनमें नहीं होती, कोई चपटी सतह,
जिसके पास हो उन्हें स्थिर कर पाने का हुनर।
वे खाली पेट धंसी आंख और सूखे चेहरे के साथ,
देखते हैं कुछ दिन के आहार की बंदोबस्ती गाड़ी।
और भर लेते हैं अपने फेफड़ों में,
अगले कई वर्षों तक जी लेने लायक प्राणवायु।
और फिर लुढ़क जाती है गेंद,
बेहतरीन ताजातरीन विकल्प की ओर।
चले जाते हैं आश्वस्त होकर हवा में तैरते लोग,
गेंद को थोड़ी और गोलाई देकर।
सरोज यादव ' सरु ' 

मंजू राठी - चार पंक्ति

किस्मत खुद की लिखने को,
अगर हम से खुदा कहता।
हम भी मन की कर लेते,
वह भी चैन से रहता

रसखान : चार पंक्ति

रसखान

फागुन लाग्यौ सखि जब तें, तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यौ है ।
नारि नवेली बचै नहीं एक, विसेष इहैं सबै प्रेम अँच्यौ है ॥

साँझ - सकारे कही रसखान सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है ।
को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है ॥

मंगलवार, 26 नवंबर 2019

प्रतिरोध की संस्कृति : नुक्कड़ नाटक और महिलाएँ

सुप्रिया पाठक

असल में नुक्कड़ नाटक का जन्म व उभार पूरी दुनिया में,समाज में जनवादी - आंदोलनों के साथ एक राजनीतिक जरूरत के तहत हुआ है। यदि विश्व में नुक्कड़ नाटक के जन्म पर नजर डालें तो पता चलेगा कि रूस में समाजवादी स्थापना के बाद सांस्कृतिक - आंदोलन के लिए रंगमंच के प्रयोग के दौरान और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजीवाद और फासीवाद के विरुद्ध सेना को तैयार करने के लिए इसका प्रयोग किया गया। चीन में क्रांति के लिए किसानों को तैयार करने के लिए तीसरे दशक में इसका जन्म हुआ, तो स्पेन में गृहयुद्ध के दौरान, वियतनाम में जापानी, फ्रांसीसी और अमेरिकी हमलावरों के विरुद्ध युद्ध के दौरान, क्यूबा में क्रांति के तुरंत बाद और पूरे लैटिन अमेरिका व अफ्रीका में राष्ट्रीय मुक्ति - संग्राम के दौरान और अमेरिका में यह खेत मजदूरों और नीग्रो के बीच संघर्ष और संगठन के साधन के रूप में लोकप्रिय हुआ।
( प्रज्ञा, नुक्कड़ नाटक, रचना और प्रस्तुति, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय )
     भारत में यद्यपि रामलीला व रासलीला आदि की लोक - प्रस्तुतियों में नाटक के इस रूप के पैदा होने की संभावना मौजूद थी, परंपरागत तौर पर इस तरह के प्रहसन या तो राजाओं की खिल्ली उड़ाकर उनके प्रति अपने रोष को जताने का माध्यम थे या फिर धार्मिक भूख को शांत करने का जरिया। इन दो तत्वों की अधिकता के कारण यह एक मनोरंजन प्रधान विधा ही बनकर रही, इसमें कोई विशेष गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ। इसलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अँग्रेजी शासन की पोल खोलने की सोची तो उनको यह सशक्त माध्यम तो नजर आया, पर वे इसकी सीमा को नहीं लाँघ सके। उनके नाटकों के कथ्य बेशक अँग्रेजी शासन की नीतियों के बारे में जनता को आगाह करते थे, लेकिन उनमें हास्य की अधिकता होने के कारण वे मनोरंजन करने तक ही सीमित रहे और अँग्रेजी शासन की असलियत बताने और उसके विरुद्ध आंदोलनकारी चेतना निर्माण करने में आंशिक रूप से ही सफल हुए। राजनीतिक स्पष्टता और जनता के प्रति नाटककार की प्रतिबद्धता के कारण नुक्कड़ नाटक की जिस तरह की पहचान बनी उस दृष्टि से भारतेंदु के नाटकों को नुक्कड़ नाटकों की श्रेणी में तो बेशक नहीं रखा जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि जब कलाकारों ने अपना सामाजिक दायित्व निभाने के लिए नुक्कड़ नाटक को चुना तो उनकी नाटक के इस परंपरागत रूप ने बहुत मदद कीए बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने इस रूप की मनोरंजन - प्रधानता को दूर करके इसका राजनीतिक संस्कार किया। जनता तक पहुँच को देखते हुए कभी सरकारों ने अपने प्रचार के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहा तो कभी प्रतिक्रियावादी ताकतों ने, लेकिन नुक्कड़ नाटक के प्रारूप में ही कुछ बात है कि वे अपने मकसद के लिए इसका प्रयोग नहीं कर सके।
     मध्यवर्ग की मानसिकता से ग्रस्त विद्वानों ने लंबे समय तक नुक्कड़ नाटक को विधा के तौर पर स्वीकार नहीं किया। नुक्कड़ नाटक में शुरू से ही बड़े कलाकारों की समृद्ध परंपरा होते हुए भी इसके कलाकारों को असल में तो कलाकार का दर्जा ही नहीं मिला और यदि कलाकार माना भी तो दूसरे दर्जे का। उसकी जनपक्षधरता को तो सराहा गया, लेकिन इसके कला - पक्ष की घोर उपेक्षा की गई। बावजूद इसके नुक्कड़ नाटक के कलाकारों ने अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता के ऐतिहासिक दायित्व को निभाते हुए अविस्मरणीय पहचान बनाई। स्वतंत्रता के बाद भारत के शासक वर्ग ने विकास का पूँजीवादी रास्ता अपनाया जो जनता की आकांक्षाएँ पूरी नहीं कर पाया। महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ विकराल रूप धारण करती गईं और असमान विकास के चलते अलगाववाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद जैसी समस्याओं ने जनता की एकता को तार - तार करना शुरू किया। इस स्थिति को देखते हुए जनता के संघर्षशील व जुझारू तबकों ने विरोध करना शुरू किया। किसानों, मजदूरों, स्ति्रयों, विद्यार्थियों के छोटे - छोटे आंदोलनों को नुक्कड़.नाटक ने अभिव्यक्ति दी।
     नुक्कड़ नाटक की राजनीतिक प्रखरता एवं प्रतिबद्धता की वजह से इस पर राजनीतिक प्रोपगंडा का नाटक होने के आरोप हमेशा लगते रहे हैं, वैसे तो प्रत्येक युग में राजनीति, समाज के केंद्र में रही है और जनजीवन को नियंत्रित व संचालित करने वाली शक्ति रही है। लेकिन वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति समाज की चर्चा का केंद्रीय सवाल है। कोई जागरूक रचनाकार और नागरिक राजनीति से अछूता नहीं रह सकता। मानव समाज के सामने प्रस्तुत अधिकांश समस्याएँ राजनीति की देन हैं और निःसंदेह उनका समाधान भी राजनीति में ही है। कालजयी रचनाएँ वही बन सकी हैं जिनमें तत्कालीन राजनीति के मुख्य सवालों व संघर्ष को उजागर करने की क्षमता थी। विमर्श के केंद्र में सर्वाधिक रहने वाले महाकाव्य रामायण और महाभारत से यदि राजनीति निकाल दी जाए तो इनमें शायद ही कुछ मनुष्य के काम का बचे। भारत के स्वतंत्रता - आंदोलन के दौरान वही रचनाएँ लोकप्रिय हुई जिन्होंने तत्कालीन राजनीति को अपना विषय बनाया।
     भारतीय समाज में वर्चस्वशाली वर्गों की विचारधाराएं, पितृसत्ता और वर्ण - व्यवस्था के माध्यम से लोगों के विचार व व्यवहार को नियंत्रित करती है। समाज की लगभग दो - तिहाई आबादी के शोषण को यह विचारधारा वैध ठहरा देती है। स्ति्रयों और दलितों को बराबरी का दर्जा मिले बगैर जनवादी व न्यायपूर्ण समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती। नुक्कड़ नाटकों ने स्त्री के आर्थिक व दैहिक शोषण तथा विकास के उचित अवसरों से वंचित करने के चित्र दर्शाए हैं और समाज के विकास में स्ति्रयों के योगदान को प्रस्तुत किया है। समाज में शासक वर्गों द्वारा फैलाई जा रही मिथ्या - चेतना को दूर करने व संघर्ष चेतना को प्रखर करने में नुक्कड़ नाटक की भूमिका महत्वपूर्ण है। जनता के जनवादी संघर्षों के स्वरों ने जहाँ नुक्कड़ नाटक के विकास में योगदान दिया है वहीं नुक्कड़ नाटक ने भी जनवाद के पक्ष में उठे स्वरों को अभिव्यक्ति प्रदान करके व इन्हें सूत्रबद्ध करके इन्हें मजबूती प्रदान की।
     द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्मित नवीन राजनीतिक स्थिति में एक नई सांस्कृतिक पहचान के निर्माण हेतु एक राष्ट्रवादी परियोजना के तौर पर साम्यवादी दल की सांस्कृतिक इकाई के रूप में ’ इप्टा’ का गठन किया गया था। ’ इप्टा’ की पहली कोशिश थी एक नए तरह के थिएटर का निर्माण करने की, जो मुख्यधारा के थिएटर की अपेक्षा अधिक यथार्थपरक हो। युद्धकालीन परिस्थितियाँ, ’ ब्लैकआउट’ देश के विभिन्न भागों में अकाल, आर्थिक बाधाएँ और सर्वव्यापी आतंक, इन सबने इस नई थिएटरीय विधा को अत्यंत प्रासंगिक और सटीक बना दिया। ’ इप्टा’ ने अपनी प्रथम थिएटर परियोजना’ नवान्ना’ में दो अभिनेत्रियों ’ तृप्ति मित्रा’ ’ शोभा सेन’ को शामिल और प्रशिक्षित कर रंगमंच पर उतारा। इन्हें अलग किस्म की अभिनेत्रियों के रूप में प्रचारित किया गया। ये दो अग्रणी अभिनेत्रियाँ बाद में दो प्रमुख थिएटर - समूह की सह आयोजक बन गईं, जो ’ इप्टा’ के बाद की अवस्था में एक दूसरे में विलीन हो गए। बंगाल के प्रगतिशील स्वैच्छिक कलाकार आंदोलन की अगुआ बनी इन दोनों ने आगे चलकर दो निर्देशकों से विवाह कर लिया। तृप्ति मित्रा ने शंभु मित्रा के साथ विवाह किया और शोभा सेन ने अपने पूर्व पति को तलाक देकर उत्पल दत्त से 1961 में विवाह किया। वे थिएटर की दुनिया की मुख्य अभिनेत्री बन गईं। ऐसी स्थिति में, जब हमेशा अभिनेत्रियों की कमी बनी रहती थी, उनकी सुनिश्चित निष्ठा ने निर्देशकों के हित में अच्छा काम किया।
      अभिनेत्री - कथा का यह नया दौर संभवतः स्वयं अभिनेताओं की कथा के भीतर अपना स्थान बनाने के लिहाज से काम कर रहा था। यह नई पीढ़ी, जो थिएटर की स्थिति को उभार रही थी शिक्षा, श्रेणी और सामाजिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से व्यावसायिक अभिनेताओं से काफी भिन्न थी। एक नए ऐतिहासिक थिएटर आंदोलन के रुप में इप्टा एक महत्वपूर्ण साधन था। इस संबंध में अभिनेताओं ने नामकरण की पद्धति के रूप में ’ सांस्कृतिक कार्यकर्ता’ को अपनाया, लेकिन अभिनेत्रियों ने बड़ी मुश्किल से इसे अपनाया।’ अभिनेत्री’   नाम आम तौर पर प्रचलित रहा।
     द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में वीमेंस इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन की तुलना में अधिक राजनीतिक संगठन ’ नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन’ का गठन हुआ। तब तक एम.ए.आर.एस का विलय एन.एफ.आई.डब्ल्यू. में हो गया था। 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध के साथ ही महिला - गतिविधियाँ भी अन्य पार्टी नेताओं के साथ भूमिगत हो गईं। वीमेंस इंटरनेशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन ’ डब्ल्यू आई डी एफ’ के 1945 में संपन्न तृतीय कांग्रेस में रेणु चक्रवर्ती, सुशीला गुप्ता और विद्या मुंशी की सक्रिय भूमिका के कारण एम.एफ.आई.डब्ल्यू को पुनर्जीवित कर दिया गया। विभाजन और कम्युनिट पार्टी के भीतर असहमति के कारण 1960 के दशक में भारत - चीन युद्ध एवं सरकार की नीतियों के प्रति भय से संबंधित एन.एस.आई.डब्ल्यू. मार्क्स से अलग हो गया, जिसको भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी, पंकज आचार्य,ज्योति चक्रवर्ती,माधुरी दासगुप्ता और कनक मुखर्जी ने पुनर्जीवित किया।
      महिलाओं के आंदोलन और उनकी सांस्कृतिक सक्रियता के परिप्रेक्ष्य में एन.एफ.आई.डब्ल्यू. अथवा एम.ए.आर.एस. ने कभी भी सांस्कृतिक आंदोलन में भाग नहीं लिया। इन्होनें कामकाजी वर्ग की महिलाओं को प्राथमिकता दी तथा उनमें स्वास्थ्य, स्वच्छता जैसे विषयों पर जागरुकता पैदा की। विधा मुंशी ने एन.एफ.आई.डब्ल्यू का इतिहास लिखते हुए उन व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का जिक्र किया है, जिनका प्रचार आंरभिक वर्षों में लैंगिक जागरुकता के लिए किया गया।
     महिलाओं के लिए खास तौर पर संचालित सांस्कृतिक कार्यक्रमों यथा,पंजाब में गिद्धा, गुजरात में ’ गरबास’ अथवा महाराष्ट्र में ’ लावनी’ का उपयोग व्यापक रूप से सांस्कृतिक संबंध विकसित करने हेतु किया जाता था। उदाहरणार्थ, पंजाब में यह रिवाज था कि गाँव की सारी महिलाएँ उस घर के सामने जमा हो जाती थीं, जहाँ कोई पुत्र पैदा हुआ करता था और उस अवसर पर आनंद मनाने के लिए ’ गिद्धा’ नृत्य का आयोजन किया जाता था। लोक स्त्री सभा के सदस्यों ने ठीक वैसे ही पुत्रियों के जन्म के अवसर पर इसका आयोजन कर इस परंपरा को बदल दिया। उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित ’ नौटंकी’ गुजरात में ’ भवई’ बंगाल में ’ जात्रा’ अथवा महाराष्ट्र में ’ पावड़ा’ का आयोजन भी सामाजिक मुद्दों को प्रचारित करने के उद्देश्य से किया जाता था।
महिला आंदोलन की क्रियात्मक रणनीति - नुक्कड़ नाटक
     दीनबंधु मित्रा के ’ नील दर्पण’  से लेकर हरिश्चंद्र के ’ दुर्लभ बंधु’ जैसे तमाम नाटक जो इप्टा द्वारा मंचित किए गए, उन सबने औपनिवेशिक काल के दौरान होने वाले स्ति्रयों के शोषण तथा स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सहभागिता को एक साथ प्रस्तुत किया। हालाँकि ये सभी कथानक राष्ट्रवाद के ईद - गिर्द ही बुने जा रहे थे। नाटककार स्ति्रयों के प्रति होने वाली हिंसा को समुदाय अथवा राष्ट्र की प्रतिष्ठा के प्रति हो रही हिंसा के साथ जोड़ कर देख रहे थे। दूसरे, उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं की छवि को उस बलिदानी रूप में प्रस्तुत किया। जिसमें राष्ट्र की रक्षा के लिए वे अपने प्राण भी न्यौछावर करने को तैयार थी। अर्थात स्त्री की बदलती हुई भूमिका को भी पितृसत्तात्मक राष्ट्रवादी विमर्श में समाहित करने का प्रयास किया जा रहा था।
      इस दृष्टि से प.राधेश्याम कथावाचक द्वारा लिखित नाटक ’ परिवर्तन’ उल्लेखनीय है। 1926 में लिखित यह नाटक अपने नाम के अनुरूप ही परिवर्तनकारी था। इस नाटक को सबसे पहले न्यू अल्फ्रेड नाटक कंपनी ऑफ बंबई द्वारा एशिया महाद्वीप के कई हिस्सों में मंचित किया गया। यही वह दौर भी था जब स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की सहभागिता राजनीतिक एजेंडे के तहत चरम पर थी। इस नाटक का कथानक त्रिकोण पर आधारित था जो समाज सुधार तथा देश भक्ति के प्रश्न में निहित जटिलताओं पर प्रकाश डालता था। नाटक की तीन प्रमुख पात्र लक्ष्मी ’ एक समर्पित एवं समर्पित एवं सुघड़ गृहिगी’ चंदा ’ एक वेश्या’ तथा माया ’ एक अंग्रेजी’ महिला जिसने परंपरागत मूल्यों को खारिज कर दिया था। तीनों महिलाएँ केंद्रीय भूमिका में थीं। इस नाटक में पुरुष पात्र के मन में नैतिक दुविधा को उठते हुए दिखाया गया था जिसे अपनी पत्नी और वेश्या में किसी एक का चुनाव करना था। अंततः वह एक नैतिक चुनाव के रूप में अपनी पत्नी को चुनता है। इस नाटक के जरिए राष्ट्र की परिधि के अंदर एक पत्नी, वेश्या तथा अँग्रेजी शिक्षा - दीक्षा प्राप्त महिला के लिए ’ स्थान’ को लेकर बहस पैदा करने की कोशिश की गई थी। अंततः यह नाटक चंदा के सुधार के साथ समाप्त होता था जहाँ वह अपना जीवन राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करने को तैयार होती है और अपनी कमाई हुई संपत्ति से एक महिला महाविद्यालय खोलने का निर्णय लेती है। नाटककार चंदा के इस कृत्य के लिए उसे देवी का स्थान देते हैं और उसे विभिन्न हिंदू धार्मिक नामों जैसे सावित्री, दमयंती, गार्गी तथा गांधारी से विभूषित करते हैं। वहीं माया को अपनी भूल का अहसास होता है और वह लक्ष्मी की तरह ही आदर्श गृहिणी बनने का निर्णय लेती है। अंततः यह नाटक भी अन्य नाटकों की तरह नैतिक शिक्षा के साथ खत्म होता है कि स्ति्रयों की छवि राष्ट्र हित में होनी चाहिए। इस तरह के नाटकों की हमारे पास भरमार है जो वर्चस्वशाली राष्ट्रवादी विमर्श को मजबूती प्रदान करने के लिहाज से लिखे गए थे और हिंदू स्त्री - पुरुष पर भिन्न - भिन्न तरीके से नैतिक दबाव बना रहे थे।
     यहाँ इस नाटक का जिक्र करने का मकसद दरअसल औपनिवेशिक शासन काल के दौरान रंगमंच की दुनिया में स्ति्रयों के प्रश्न को लेकर पनप रही दुविधा को व्यक्त करना था। राष्ट्रवादी पुरुष स्ति्रयों की भूमिका को परिभाषित करते हुए उससे आदर्श पत्नी और माँ होने की अपेक्षा कर रहा था। इसके साथ ही, आधुनिक एवं परंपरागत स्त्री के मध्य उनकी भूमिका को लेकर भी बहस जारी थी। राष्ट्रवादी पितृसत्ता ने ’ संभ्रांत स्त्री’ को जिस रूप में प्रस्तुत किया था उसमें वेश्या और अँग्रेजीदाँ स्त्री किसी भी लिहाज से फिट नहीं बैठती थी। जो स्त्री अपनी शिक्षा के बल पर आधुनिक हो रही थी, सुगृहिणी के रूप में उसकी विश्वसनीयता भी घर - गृहस्थी के प्रति उसके समर्पण भाव से तय होती थी। घर एक ऐसा स्थान था जो राष्ट्रवादी पितृसत्ता का आधार था जहाँ से राष्ट्र एवं स्ति्रयों के सवाल हल हो रहे थे।
      ’ संभ्रांतता’ के इस मापदंड का असर यह हुआ कि स्ति्रयों की आवाज एक बार फिर दबा दी गई और वे हाशिए पर धकेल दी गई। राष्ट्रवाद के पूरे विमर्श में स्ति्रयों की भूमिका एक सहयोगी की रह गई। उन्हें सिर्फ वही भूमिकाएँ निभानी थीं जो उन्हें प्रदान की गई थीं। ठीक यही स्थिति थिएटर की दुनिया में भी थी। साथ ही, राष्ट्रवाद की पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति एवं रंगमंच में विद्यमान स्ति्रयों के प्रति धारणाए वैचारिक तौर पर एक दूसरे को संबल प्रदान कर रहे थे। जो महिलाएँ रंगमंच में आ रही थीं आमतौर पर उन्हें वेश्या के रूप में देखा जाता था। यही कारण था कि अनेक नाटक कंपनियाँ अपने यहाँ महिला कलाकारों को नियुक्ति नहीं करती थीं। महिला कलाकारों और नर्तकियों के प्रति यह रवैया 1947 तक कायम रहा। विनोदिनी दासी बंगाल में 19 वीं सदी की एक मशहूर अभिनेत्री थी जिसने अपना सर्वस्व जीवन थिएटर को समर्पित कर दिया था, को भी समाज में सम्मान प्राप्त नहीं हो सका। इसके दो कारण थे। एक तो वह एक वेश्या की पुत्री थी, दूसरे उसने रंगमंच को अपना व्यवसाय बनाया था। इतना ही नहीं, राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान वामपंथी सांस्कृतिक इकाई के रूप में उभरी इप्टा जिसकी शुरुआत एक महिला ने की थी और अनगिनत महिलाएँ इसमें सक्रिय थीं उसका एजेंडा भी राष्ट्रीय हित था जिसका परिणाम यह हुआ कि घरेलू दुनिया में महिलाओं के मुद्दों को लगातार अनदेखा किया गया।
     यह रवैया 1970 में जाकर तब कम होना शुरू हुआ जब विभिन्न नारीवादी समूहों ने महिला मुद्दों के प्रति चेतना जागृति का कार्य शुरू किया और अपने संघर्षों को नुक्कड़ नाटकों के जरिए सड़क पर लेकर आईं। कुछ महत्वपूर्ण नारीवादी संगठनों जैसे जागोरी, स्त्री मुक्ति संगठन, गरीब, जोगरी संस्थान, थिएटर यूनियन तथा सहेली ने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि इस संबंध में अधिक लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं है परंतु व्यक्तिगत प्रयासों के कारण जो थोड़े बहुत साक्ष्य उपलब्ध हैं, उनसे यह पता चलता है कि किस प्रकार इन स्वायत्त संगठनों ने औरतों की कहानी और रोजमर्रे की उनकी तकलीफों को सार्वजनिक मुद्दे के तौर पर पेश किया।
      1947 के बाद स्त्री सशक्तीकरण तथा सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से महिला नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत हुई। स्वतंत्र भारत के अग्रणी नेताओं द्वारा सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाने का वायदा किया गया था। परंतु संवैधानिक रूप से स्त्री - पुरुष को समान नागरिक अधिकार एवं दर्जा दिए जाने के बावजूद नारीवादियों ने यह महसूस किया कि वे सभी वायदे कहीं पीछे छूट गए थे। खासतौर पर यह बात हिंदू कोड बिल के संदर्भ में महसूस की गई। 1955 में पास हुए इस बिल में महिलाओं को संपत्ति में कुछ अधिकार देने के वायदे किए गए तथा विवाह एवं तलाक संबंधी मामलों में स्त्री पुरुष को समान दर्जा देने का आश्वासन भी दिया गया। परंतु समानता के अधिकार के ये वायदे बहुत हद तक एकांगी थे जिसके कारण महिलाएँ लगातार सार्वजनिक एवं घरेलू जिंदगी में सामाजिक अन्याय की शिकार होती रहीं।
      1970 के दशक में सामाजिक हिंसा और महिलाओं के प्रति हो रहा शोषण’ दहेज हत्याओं’ के रूप में हमारे सामने आया। ये हत्याएँ वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष की माँगों को पूरा न कर पाने के कारण होती थीं। भारत में इस प्रकार के ’ पारिवारिक झगड़े’ लगभग सभी जातियों, वर्गों, धर्मों तथा समुदायों में सामान्य बात थी। वास्तविकता यह थी कि दहेज की शर्त पत्नी उत्पीड़न का पर्याय बन गई थी। महिला आंदोलन के लिए उस दौर में यह क्रूरता प्रमुख मुद्दा थी। कम्युनिस्टों तथा वामपंथी पार्टियों ने भी क्षोभ के साथ यह बात स्वीकारी कि यह कुरीति उनके अपने सदस्यों के बीच भी जारी है।
      पत्नी - उत्पीड़न का यह मुद्दा सारे देश के महिला आंदोलन का केंद्र - बिंदु बन गया। दहेज के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियान के अंतर्गत महिला कार्यकर्ताओं को पीड़ित महिलाओं से बार - बार होने वाली मुलाकांतों और उनकी व्यथा - कथा सुनकर यह बात समझ में आ रही थी कि इस देश में स्ति्रयों को अनेक संकटों का सामना करना पड़ रहा है। नारीवादी समूह स्वयं भी उनकी कोई सहायता कर पाने में खुद को लाचार महसूस कर रहे थे।
      समकालीन नारीवादी आंदोलन में दहेज के विरुद्ध प्रारंभिक विरोध हैदराबाद में सन् 1975 में प्रगतिशील महिला संगठन द्वारा दर्ज कराया गया। अनेक बार संगठन द्वारा आयोजित प्रदर्शनों में महिलाओं की संख्या सौ तक पहुँच गई फिर भी उनका विरोध प्रदर्शन पूर्णरूपेण आंदोलन की शक्ल नहीं ले पाया। लगभग दो वर्षों की खामोशी के बाद दहेज के विरुद्ध आंदोलन दिल्ली में शुरू हुआ। यह आंदोलन इस बार महिलाओं के दहेज - उत्पीड़न पर केंद्रित था। खासतौर से दहेज हत्या के विरुद्ध पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, मध्य - प्रदेश, पश्चिम - बंगाल सहित भारत के अनेक भागों में विरोध अभियान चल रहे थे परंतु दहेज संबंधी अपराधों के विरुद्ध विस्तृत आंदोलन दिल्ली में ही चल रहा था। इसका कारण यह था कि दिल्ली में दहेज के कारण होने वाली हत्याओं की संख्या सबसे अधिक थी।
     अब तक आग लगने से होने वाली मौतों को आत्महत्या के रूप में लिया जाता था और दहेज - उत्पीड़न को आत्महत्या का कारण बहुत कम माना जाता था। आमतौर पर पुलिस द्वारा भी ऐसे मामलों को ’ पारिवारिक और निजी’ कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता था। इसे राज्य की चिंता का विषय नहीं माना जाता था। बहरहाल, दशकों से चली आ रही इस उदासीनता का नारीवादियों ने विरोध किया तथा आग लगने से होने वाली मौतों को यह कहते हुए कि उनकी औपचारिक ’ आत्महत्याएँ’  आत्महत्याएँ नहीं, बल्कि हत्याएँ है। उसे दहेज उत्पीड़न से जोड़ना शुरू किया गया। कुछ मामलों में दहेज हत्या की शिकार महिलाएँ बयान देने के लिए काफी देर तक जीवित रहीं और उन्होंने अपने मृत्यु - पूर्व बयान में सास - ससुर द्वारा दहेज के लिए तंग किए जाने का उल्लेख भी किया परंतु पुलिस ने इतनी सुस्त और देर से कारवाई की कि हत्यारे साक्ष्य मिटाने में कामयाब हो गए और हत्या के मामले को आत्महत्या कह कर सारा मामला रफा -दफा कर दिया गया।
     बहरहाल, नारीवादियों ने इस स्थिति के विरुद्ध यह कहते हुए आवाज बुलंद की कि मृत्यु - पूर्व महिला द्वारा दिए गए बयान को साक्ष्य माना जाए और पुलिस के तौर तरीकों को चुस्त किया जाए तथा समाज हत्यारों का बहिष्कार करे। कुछ लोगों पर इसका असर भी हुआ। उन्होंने सहमति जताते हुए धरने में भी भाग लिया। स्त्री संघर्ष द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन इतना तीव्र था कि अभियुक्तों के घर पहुँचते - पहुँचते जुलूस तीन गुना बड़ा हो जाता। इस जुलूस में हत्यारों के पड़ोसी, अपने बच्चों के साथ शामिल होते, सफाई कर्मचारी, घरेलू नौकर तथा आसपास से गुजरने वाले लोग भी इसमें शामिल हो जाते। इस सफलता को देखते हुए नारीवादियों ने दहेज के मुद्दे को उठाने के लिए लोगों से संवाद का सीधा तरीका खोजने की जरूरत महसूस की। नए तरीके तलाशने के लिए हुई चर्चा के दौरान ’ नुक्कड़ नाटक’ का सुझाव उभरा। जिसके पश्चात दहेज हत्या पर आधारित पहला नुक्कड़ नाटक ’ ओम् स्वाहा’ खेला गया। नाटक की कहानी दो महिलाओं की दहेज हत्या पर आधारित थी। इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि सभी क्षेत्रों से समिति के पास नाटक के प्रदर्शन के अनुरोध आने लगे। लोगों ने नारी रक्षा समिति को पत्र लिखकर उनके क्षेत्रों में आने तथा ’ नुक्कड़ नाटक’ करने का अनुरोध किया। नाटक करने वाली अधिकतर महिलाएँ मध्यवर्गीय थी। उनकी ओर से पहली बार यह सक्रिय प्रयास किया गया।
      राजनीतिक रूप से अस्थिर इस वातावरण में कई प्रतिरोधी आंदोलन जैसे - छात्र आंदोलन, मजदूर हड़ताल, कृषक आंदोलन का जन्म हुआ था जिसके परिणामस्वरूप आनन - फानन में सरकार को इमरजेंसी ’ 1975 - 77’ की घोषणा करनी पड़ी। इसी क्रम में कई महिला संगठनों का भी गठन हुआ जैसे बंबई में फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ  वुमेन, विमोचना, स्त्री शक्ति संगठन, सहेली, जागोरी आदि। इन सभी संगठनों ने राज्य को इस बात के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी ठहराया कि वह महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा के प्रति जरा भी सजग नहीं है और सरकार से इस तरफ विशेष ध्यान देने की अपील की।
     1979 में दिल्ली में नारीवादियों के एक समूह ने पहली नारीवादी पत्रिका ’मानुषी’ की शुरुआत की जिसने बुलंद आवाज में दहेज जैसी कुप्रथा की विरोध करते हुए महिला आंदोलन को एक महत्वपूर्ण मंच उपलब्ध कराया। 1978 में दिल्ली में सुभद्रा बुटालिया ने दहेज को अपने प्रतिरोध का मुख्य विषय बनाया। अन्य सभी गतिविधियों के अतिरिक्त इन संगठनों ने नारे लिखे, दहेज पीड़ितों के घर के सामने धरना प्रदर्शन किया तथा पुलिस के दस्तावेजों की छानबीन शुरू की।
      नारीवादी कार्यकर्ताओं ने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से इन सामजिक कुप्रथाओं को सबके सामने उठाने का तरीका अपनाया। यह नाटक सिर्फ निर्देशात्मक ही नहीं थे, बल्कि मनोरंजक भी थे। उदाहरण के लिए कई महीनों तक लगातार दहेज हत्याओं के विरुद्ध धरना प्रदर्शन करते हुए, नारे लगाते हुए, पोस्टर लगाते हुए ’ स्त्री संघर्ष’ ने यह महसूस किया कि नुक्कड़ नाटक वास्तव में लोगों को संबोधित करने का सबसे सीधा और सरल तरीका था। अनुराधा कपूर, रति बार्थोलोम्यू तथा माया राव के प्रयासों से’ स्त्री संघर्ष’ ने थिएटर यूनियन नाम की इकाई का गठन किया जिसका उद्देश्य नाटकों के माध्यम से स्त्री अधिकारों के प्रति जनता में जागरूकता पैदा करना था।
      1980 में पहली बार थिएटर यूनियन द्वारा’ ओम् स्वाहा’ नामक नुक्कड़ खेला गया जिसे जनता ने इतना पसंद किया की बाद में कई स्थानों पर इसे खेला गया। पूरे नाटक का कथानक एवं संवाद जैसा कि अनुराधा कपूर बताती हैं-  पंजाबी लोकगीत और वहाँ की स्थानीय बोली में लिखे गए इन नाटकों ने आम लोगों के बीच ऐसा असर पैदा किया कि ज्यादा से ज्यादा लोग दहेज जैसी कुप्रथा के खिलाफ बोलने लगे और औरतों की वर्तमान दशा से मुक्ति के लिए कृतसंकल्प होने लगे। ’ ओम् स्वाहा’ जैसे नाटक ने जनता में यह संदेश फैलाने में सफलता हासिल कर ली थी कि घरों के बंद दरवाजों के भीतर अभी बहुत कुछ ऐसा है जिस पर बात किया जाना जरूरी है।
      अनुराधा कपूर इस प्रदर्शन की सफलता का जिक्र करती हुई बताती हैं कि नाटक का दर्शकों पर इतना जबरदस्त असर होता था कि नाटक खत्म होने के बाद औरतें झुंडों में हमारे पास आती थीं और पूछती थी कि ’ हमें किसी चीज की जरुरत तो नहीं’।
     भारत में महिला थिएटर रूप में थिएटर यूनियन ने न सिर्फ दहेज हत्या जैसे मुद्दों को उठाया बल्कि सती - प्रथा और पुलिस हिरासत में होने वाले बलात्कारों को भी अपने प्रदर्शनों में मुद्दा बनाया। बलात्कार के मुद्दे को नाटक दफा 108 में उठाते हुए पुलिस हिरासत में महिलाओं के अधिकारों से दर्शकों को अवगत कराया जाता। समूह ने इस नाटक को कॉलेजों, पार्कों तथा उन झुग्गी बस्तियों में कई - कई बार दिखाया जहाँ की औरतों को पुलिस वेश्या होने के संदेह पर गिरफ्तार करती थी और जेल के अंदर महिलाएँ कई दिनों तक बलात्कार का शिकार होती थीं।
      दिल्ली में थिएटर यूनियन के अतिरिक्त भारत के अन्य शहरों और गाँवों में भी कई थिएटर कार्यशालाओं का आयोजन किया गया जिसमें जन नाट्य मंच जिसे माला हाशमी चला रही थीं, शमशुल इस्लाम की निशांत जिसमें हबीब तनवीर और बादल सरकार जैसे कार्यकर्ता शामिल थे। अह्वान जैसे संगठन सभी साथ मिलकर आवाज उठा रहे थे। इनमें से कई समूहों ने अपने नाटक खुद लिखे और खुद ही उनका निर्देशन किया। झुग्गी - बस्तियों, सड़कों, पब्लिक - पार्कों, फुटपाथों, विश्वविद्यालय - परिसरों में इन नाटकों को खेलते हुए आवश्यकतानुसार इसमें परिवर्तन और संशोधन भी किए जाते रहे।
     इन संगठनों के अतिरिक्त कई छोटे - मोटे संगठन भी थे जिन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया परंतु मुख्यधारा की मीडिया द्वारा उसका दस्तावेजीकरण नहीं किया जा सका। 1991 में हेमा रैंकर के निर्देशन में 15 किसान महिलाओं और दो पुरुषों के साथ किए गए नाटक ’ अबला स्त्री’ पर एक सामूहिक चर्चा आयोजित की गई और इसी के आधार पर एक और नाटक भी किया जिसका नाम था ’ सामाजिक बंधन’। स्त्री मुक्ति संगठनों ने’ मुलगी झाली आहे’ नामक नाटक किया, जिसे महाराष्ट्र के 2000 लोगों के बीच प्रदर्शित किया गया। ज्योति म्हापसंकर जो इस संगठन की निर्देशिका थी ने बताया हैं कि - मैंने इस नाटक को लिखा था। यह नाटक उन महिलाओं से प्रेरित था जो इतने शोषणकारी एवं दमनकारी परिस्थियों में अपना जीवन गुजारती हैं, इस नाटक को देखने के बाद कई लोग इस संगठन के सदस्य बने।
     इसके अतिरिक्त, शीला रानी द्वारा शुरू किए गए एक समूह ने दो महीने तक तमिलनाडु में नुक्कड़ नाटकों का आयोजन किया। यह आयोजन उस शिक्षा अभियान का हिस्सा था जो कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने के लिए चलाया जा रहा था। रंगमंच के अधिकांश कलाकार यह मान रहे थे कि महिलाओं द्वारा झेले जा रहे शोषण को व्यक्त करने का थिएटर एक आसान और प्रभावकारी माध्यम था। अपनी गतिशीलता के कारण लोगों के थिएटर पहुँचने की बजाए यह लोगों तक पहुँच रहा था। वे लोग जिनके पास बहुत कम समय होता था। जो धरने में भाग लेते थे। उनके घरों के सामने होने वाले इस प्रकार के नुक्कड़ नाटकों ने स्ति्रयों द्वारा किए जा रहे संघर्ष को और मजबूती प्रदान की। कई बार नाटक पीड़ित महिलाओं को भी यह अवसर उपलब्ध कराते थे कि वे अपने अनुभव लोगों से साझा करें। नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन में बहुत कम संसाधनों की आवश्यकता पड़ती थी। वे कम खर्चीले भी थे। छोटे बजट में किए जा सकते थे और कलाकारों को कोई मेहनताना भी नहीं देना पड़ता था।
      सहेली के साथ जुड़ी एक कार्यकर्ता का मानना है कि - वे सभी कार्यकर्ता जो सामाजिक मुद्दों पर नाटक किया करती थीं, उन्हें नुक्कड़ नाटक में यह संभावना दिखती थी कि वे अपने मुद्दों और प्रतिरोध को सड़क पर ला सकें। महिलाओं के अधिकारों के लिए अभियान चला सकें तथा मीडिया, राजनीति और सरकार की स्त्री संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों में हस्तक्षेप कर सकें।
      सहेली की इस कार्यकर्ता ने इस माध्यम के प्रभाव तथा महिलाओं के स्वास्थ्य, दहेज तथा अन्य मुद्दों पर बने नाटकों की रचना तथा प्रस्तुति पर भी विस्तारपूर्वक चर्चा की। महिलाओं के थिएटर की एक और ध्यान वाली बात यह थी कि वे अपनी घरेलू जिंदगी की तकलीफों और समस्याओं को जाहिर करने के लिए मशहूर नारों और लोक परंपराओं का सहारा लेती थी। खासतौर पर, नारों के जरिए वे नाटकों को बोझिल और उबाऊ बनाने की बजाए रोचक और मरोरंजक बनाती थीं। साथ ही इस क्रम में वे दर्शकों के साथ एक रिश्ता भी बनाती थीं। वे जताती थीं कि जिस तरह हमारे गीत तुम्हारे हैं, उसी तरह हमारे संघर्ष भी तुम्हारे हैं। कई थिएटर ग्रुप ऐसे भी थे जो अपना शीर्षक ही ऐसा चुनते जिसमें सामूहिकता का बोध हो। उनके नाम से ही दर्शकों को उनके एजेंडे के बारे में पता लग जाता था। वे सभी समस्याएँ जिनका सामना औरतें कर रही थीं उन्हें सिर्फ एक सामाजिक कारण के रूप में ही नहीं देखा गया बल्कि उन्हें जाहिर करने के लिए नाट्य प्रविधि का भी सहारा लिया गया। इन संगठनों ने इस कार्य के लिए बड़ी संख्या में महिलाओं को कलाकार, लेखिका तथा कहानी सुनाने वाली के रूप में शामिल किया। अपनी कहानी कहते हुई अभिनेत्रियाँ सिर्फ अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर ही केंद्रित नहीं थी, बल्कि वे उन तरीकों को भी उजागर करती थीं जिनके द्वारा सामाजिक मूल्यों एवं अपेक्षाओं की परिधि में उन्हें बाँधकर रखने का प्रयास करती थीं। नाटकों को रचने की प्रविधि में भी यह कोशिश की जाती थी कि उनकी आपबीती को साझा करने के क्रम में ही नाटक का कथानक भी तैयार हो सके और थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ उसे प्रस्तुत किया जा सके। इसका अर्थ यह था कि दर्शकों के बीच से ही सवाल पैदा हों और उन सवालों को स्त्री सशक्तिकरण के संदर्भ में समझने की कोशिश की जाए।
      कई महिलाओं को नुक्कड़ नाटकों में भाग लेने के कारण अपनी घरेलू पहचान के इतर एक सीमित भूमिका की बजाए एक नई स्वतंत्र सामाजिक पहचान बनाने का मौका भी मिल रहा था। नुक्कड़ नाटक की एक रिपोर्ट में एक महिला कलाकार के अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया गया कि यह महिला 10वीं पास थी जिसे आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई। एक बार जब महिला नाट्य समूह उसके गाँव अपनी प्रस्तुति देने गया तब वह इस समूह में शामिल हो गई। उसने थिएटर समूह को अपने सशक्तिकरण के रूप में देखा। उसकी आजादी तथा महिला मुद्दों के प्रति उसके योगदान ने गाँव के अन्य स्त्री पुरुषों को भी इस काम के लिए प्रेरित किया। कई महिला कलाकारों ने इसमें काम करते हुए ’ सामाजिक सम्मान’ का भी अनुभव किया।
इन्हीं महिलाओं में से कुछ अकादमिक जगत की भी महिलाएँ भी थीं जिनका जुड़ाव हमेशा महिला आंदोलनों के साथ बना रहा। अनुराधा कपूर, रति बार्थलोम्यू, माया कृष्ण राव, उषा गांगुली, त्रिपुरारी शर्मा तथा कीर्ति जैन जैसी स्ति्रयों ने नाटक को एक माध्यम के रूप में स्त्री - प्रतिरोध की सांकेतिक अभिव्यक्ति प्रदान की। यह सिर्फ तत्कालीन घटनाओं पर केंद्रित अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि समाज में गैर बराबरी और दोयम दर्जे से पैदा होने वाले दंश की अभिव्यक्ति भी थी। उनके द्वारा निर्देशित नाटकों, अभिनीत पात्रों तथा रचित कथानकों के कारण एक तरफ जहाँ महिला आंदोलनों को संबल मिला, वहीं दूसरी तरफ नाटक की दुनिया में अब वे मात्र पात्र न होकर अपनी मजबूत उपस्थिति भी दर्ज करा रही थीं। अब यह समूह स्थापित नाट्य परंपरा, नाट्य प्रविधि और संरचना में अपना सकारात्मक हस्तक्षेप दर्ज करा पाने की स्थिति में पहुँच चुका था। नाट्य जगत के बुद्धिजीवियों ने भले ही उनके कार्यों को पुरुषों के समकक्ष नहीं माना परंतु उनकी समझ और निर्देशकीय क्षमता को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते थे। कई बार इन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कार्यों को एक खास पुरुषवादी मनोवृत्ति के तहत ’ नारीवादी’  या महिला निर्देशिका, महिला अभिनेत्री कह कर उन्हें अलग पहचान देने की कोशिश भी की गई। अनुराधा कपूर, त्रिपुरारी शर्मा, माया राव जैसी स्ति्रयाँ है जो यह मानती है कि नाटक ’ स्व की जड़ता’ से मुक्ति का माध्यम है जिसे पुरुष या स्त्री के खाँचों में विभाजित नहीं किया जा सकता। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि नाटक के निर्देशन के दौरान एक स्त्री की दृष्टि वही नहीं हो सकती जो एक पुरुष की होती है। निस्संदेह महिलाएँ ज्यादा संवेदनशीलता एवं एक नवीन दृष्टि के साथ काम करती है, जिसके कारण प्रस्तुति में भी फर्क पड़ता है। किसी व्यक्ति की निर्देशकीय या अभिनय क्षमता का मूल्यांकन उसके स्त्री पुरुष होने के आधार पर किया जाना अनुचित है। दरअसल यह एक खास किस्म की पुरुषवादी मनोवृत्ति है जो महिलाओं को अलग पहचान देने के क्रम में भी उनके बराबरी के अधिकार का हनन करती है। साथ ही, वे यह भी मानती हैं कि अपनी रंगयात्रा में उन्होंने और उनकी जैसी लगभग सभी साथी कलाकारों ने अनगिनत बार पुरुषों के साथ काम करते हुए एक अहम भाव और संरक्षित किए जाने की स्थिति का सामना किया
      इन समस्त महिलाओं की जीवन एवं रंगयात्रा को जानने - समझने के क्रम में यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि रंगमंच की दुनिया में स्ति्रयों की बतौर निर्देशिका, अभिनेत्री, समीक्षक उपस्थिति पहले की अपेक्षा बढ़ी है। उन्होंने अपने कौशल और क्षमता से स्वयं को स्थापित किया है। इन महिलाओं के आने का सबसे व्यापक असर यह हुआ कि विश्व भर में वृहद स्तर पर चल रहे विभिन्न आंदोलनों एवं प्रतिरोध के अंदर स्त्री संघर्ष को एक अलग समझ के साथ अभिव्यक्त करने का अवसर मिला। इस क्रम में बी जयश्री की’मंथरा’ उषा गांगुली की ’ रुदाली’ अनुराधा कपूर की’ एंटीगनी प्रोजेक्ट ’ माया कृष्ण राव की’ ए डीप फ्राइड जैम’ त्रिपुरारी शर्मा की’ महाभारत से’ कीर्ति जैन की ’ और कितने टुकड़े’ अमाल अल्लाना की ’ सोनाटा’ जे शैलजा की ’ यात्री’् मीता वशिष्ठ की ’ नीति मानकीरण’ नीलम मानसिंह चौधरी की ’ किचन कथा’ तथा मलयश्री हाशमी की ’ वो बोल उठाा’ महत्वपूर्ण नाटक है। हालाँकि इनमें से अधिकतर निर्देशिकाएँ स्वयं को ’ महिला निर्देशिका’ कहलाना पसंद नहीं करती बावजूद इसके उनके नाटक स्त्री संवेदना एवं सरोकारों से जुड़े रहे हैं। कुछ महिलाएँ ऐसी हैं जो सहर्ष यह स्वीकार करती हैं कि वर्ततान सामाजिक परिदृश्य में यदि उनके द्वारा निर्देशित नाटक स्त्री संघर्ष एवं उसके प्रतिरोध को स्वर प्रदान करते हैं तो एक नारीवादी कार्यकर्ता के रूप में यह उनकी रणनीति का हिस्सा है। कीर्ति जैन तथा उषा गांगुली जैसी निर्देशिकाएँ यह मानती हैं कि - समाज में महिला निर्देशक अपना स्थान बनाने के लिए काफी काम कर चुकी हैं। कुछ लोगों को हमारे काम को मान्यता प्रदान करने में समस्या हो सकती है परंतु हमें इस समस्या का सामना करना है। हमारे नाटकों की विशिष्ट शब्दावली तथा सौंदर्यबोध को परंपरागत रंगकर्म के मापदंड पर आँका जा रहा है। महिला निर्देशक का लेबल लगने के कारण हमें जो अनुभव हुए उन्हीं के फलस्वरूप हमने उसका प्रतिकार किया। नारीवादी या महिला निर्देशक कहकर हमारी रचनात्मकता को नकारा जाता है और इस प्रकार के वर्गीकरण से हमें एक कमजोर श्रेणी में रखा जाता है ये वो लोग हैं जो आपकी सोच और सृजनात्मकता को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।
     अपनी रंगयात्रा के अनुभवों को साझा करने के क्रम में उन्होंने यह स्वीकार किया कि अभी भी रंगमंच की पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं के लिए वह स्थान निर्मित नहीं हो पाया है जिसकी वे हकदार हैं। नाट्य निर्देशन ऐसा क्षेत्र है जहाँ हमेशा से पुरुषों का वर्चस्व रहा है और इसलिए रंगमंच में संप्रेषण की जो भाषा बनी है उसका एक खास स्वरूप है। महिलाओं को अभी लंबा सफर तय करना है। इतने सारे बदलावों के बावजूद जो नहीं बदला है वह है समाज का महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण। आज भी उन्हें सम्मानजनक दर्जा प्राप्त नहीं है। अभिनय या रंगमंच की किसी भी विधा में सक्रिय महिलाओं को आज भी पितृसत्तात्मक मनोवृत्ति ’ संभ्रात स्त्री’ मानने को तैयार नहीं है। इन महिलाओं के सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत जीवन में कई विरोधाभासी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं।
      रंगमंच के इतिहास को तलाशना किसी भी क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता के इतिहास को जानने की तरह ही है। वस्तुतः यह प्रतिरोध और पुनर्सृजन का दस्तावेजीकरण है। जिसे संपन्न करने के दौरान कई रोचक कई बहसधर्मी एवं कई कड़वे तथ्यों से सामना हुआ। रंगमंच और महिलाओं के अंतर्सबंध को तलाशने के क्रम में यह आलेख अशंतः ही सफल हो पाया है। इसमें अभी आगे भी शोध कार्य किए जाने की प्रचुर संभावनाएँ विद्यमान हैं। हिंदी रंगमंच में विशेष तौर पर साहित्यिक हलकों के अतिरिक्त जो बहसें तत्कालीन पत्र - पत्रिकाओं में चलीं, उनका अलग से अध्ययन किया जाना शेष है, जिसके उपरांत हिंदी प्रदेशों में विद्यमान जेंडर पूर्वाग्रहों को रंगमंच की दृष्टि से जानने - समझने की संभावनाएँ पैदा होंगी। साथ ही जनवादी नाट्य समूहों और नारीवादी नाट्य समूहों द्वारा प्रस्तुत किए गए नाटकों का अध्ययन एवं विश्लेषण किए जाने की आवश्यकता है ताकि मुख्यधारा द्वारा व्याख्यायित स्त्री विषयक मुद्दों एवं नारीवादी समूहों द्वारा सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाने के क्रम में उसे स्ति्रयों की दृष्टि से देखे जाने की प्रविधि के बीच के फर्क को समझा जा सके।



डी.1, शमशेर संकुल, 
महात्मा गांधी अंर्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय गांधी हिल्स, 
वर्धा, (महाराष्ट्र )442005
फोन 07152 242920,आवासः09850200918

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंगः भरतजी ही श्रीराम का प्रतिबिम्ब है

डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

     भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित प्रायः सभी श्रीरामकथाओं में भरतजी, श्रीरामजी के प्रतिबिम्ब के रूप में परिलक्षित होते हैं। जो श्रीराम हैं, वही भरतजी हैं। इस तरह श्रीराम एवं भरतजी एक ही हैं। हम श्रीरामकथाओं में भिन्न नहीं कर सकते हैं यथा -
भरतहि जानि राम परिछाहीं।।
श्रीरामचरित मानस अयो.कां. 266 - 3
     मानस में वर्णित श्रीरामकथा में श्रीराम के एवं भरतजी के चरित्र की मार्मिक कथाएँ पत्थर को भी पिघलानेवाली हैं। श्रीराम के वनगमन हो जाने तथा महाराज दशरथजी के परलोक गमन के पश्चात् भरत और शत्रुघ्न के ननिहाल से लौटने के उपरान्त ही भरतजी के चरित्र की विशेषताओं की झलक मानस में यत्र - तत्र - सर्वत्र अपनी अमिट छाप छोड़ती चली जाती है। भरत श्रीराम को महल में न देखकर अत्यन्त ही दुःखी हो जाते हैं। माता कैकेयी भरत को प्रसन्न करने के लिये सारी कथा सुना देती हैं। तब भरत दुःखी होकर उससे कहते हैं 

बर माँगत मन भइ न पीरा। गरि न जीह मुंह परेउ न कीरा।।
श्रीरामचरितमानस अयो.कां. 162 -2
     - माँ, महाराज दशरथजी से दो वर माँगते हुए तुझे पीड़ा नहीं हुई। प्रथम वर में राज्य माँगते हुए तेरी जिह्वा गल क्यों नहीं गई तथा दूसरे वर में श्रीराम को वनवास माँगते हुए तेरे मुंह में कीड़े नहीं पड़ गये।
भरतजी ने मात्र इतना ही नहीं उससे भी अधिक माता कैकेयी को जो कुछ कहा वह श्रीरामचरित मानस में गूढ़ गम्भीर - चिन्तन - मनन करने का विषय है।
हंसबंसु दशरथु जनकु, राम लखन से भाइ।
जननी तूँ जननी भई, बिधि सन कछु न बसाइ।।
श्रीरामचरितमानस अयो.दो.161
     भरत जी माता कैकेयी से कहते हैं मुझे सूर्यवंश, दशरथजी जैसे पिता और श्रीराम - लक्ष्मण जैसे भाई मिले, किन्तु हे जननी। मुझे जन्म देने वाली माता तू हुई। क्या किया जाय विधाता के आगे किसी का कुछ भी वश नहीं चलता है।
     इस दोहे को वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में सर्ग 35 के सन्दर्भ में देखा जाए तो ऐसा भी संकेत एवं भावार्थ हो सकता है। भरत अपनी माता कैकेयी से कहते हैं कि हे माँ तू अपनी माता ’ नानी’ के समान हो गई तथा जैसी तेरी माता माता न होकर कुमाता थी, तू ऐसी ही हो गई। इस कुमाता के प्रसंग को वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के वनगमन के प्रसंग में मंत्री सुमंत्र एवं कैकेयी के बीच एक अन्तर्कथा के माध्यम से किया गया है-
आभिजात्यं हि ते मन्ये यथा मातुस्तथैव च।
न हि निम्बात् स्रवेत क्षौद्रं लोके निगदितं वचः।।
अयोध्याकाण्ड सर्ग 35 - 17
     श्रीराम के वनगमन के समय मंत्री सुमन्त्रजी कैकेयी से कहते हैं कि हे कैकेयी! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल ’ वंश’ के अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोक में जानने वाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु ’ शहद’ नहीं टपकता है। सुमन्त्रजी दशरथजी के मात्र मंत्री ही नहीं वरन् दशरथजी के मित्र सखा - सारथी एवं परिवार के सदस्य थे। जिन्हें राजा के महल में कहीं भी आने जाने का विशेषाधिकार था। इस तथ्य को यहाँ एक कथा प्रसंग द्वारा इस रामायण में स्पष्ट देखा जा सकता है। श्रीराम के वनगमन के पूर्व सुमन्त्रजी ने कैकेयी को इस दुष्कृत्य हेतु फटकार लगाई तथा उसकी माता के इस कथा के माध्यम से चरित्र का वर्णन किया है -
तव मातुरसद्ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्।
पितुस्ते वरद कश्चित् ददौ वरमनुत्तमम्।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35 - 18
     तुम्हारी माता के दुराग्रह की बात भी हम जानते हैं। उनके बारे में पहले जैसा कहा सुना गया है, वह बताया गया है। एक समय किसी साधु ने तुम्हारे पिता को एक श्रेष्ठ वर दिया था- 
सर्वभूतरुतं तस्मात् संजज्ञे वसुधाधिपः
तेन तिर्यग्गतानां च भूतानां विदितं वचः।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35 - 18
     उस वर के प्रभाव से कैकेय नरेश समस्त प्राणियों की बोली समझने लगे। तिर्यक योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनको समझ में आ जाती थी। एक समय की बात है कि -
पितुस्ते विदितो भावः सः तत्र बहुधाहसत्।।
वा.रा.अयो.सर्ग 35 - 19
     एक दिन कैकेय नरेश शैय्या पर लेटे थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज उनके कानों में पड़ी। उसकी बोली का अभिप्राय वे समझ गए, अतः वे कई बार हँसने लगे।
     उसी शय्या पर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझ बैठी कि राजा उसकी हँसी उड़ा रहे हैं। अतः क्रोधित होकर गले में मौत की फाँसी लगाने की इच्छा रखती हुई बोली - हे सौम्य! नरेश्वर! तुम्हारे हँसने का क्या कारण है? यह मैं जानना चाहती हूँ। तब राजा ने कहा देवी! यदि मैं हँसने का कारण तुम्हें बता दूँगा तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जाएगी। इस बात को सुनने के बाद तुम्हारी माता ने राजा से कहा कि तुम जीओ या मरो मुझे तो हँसने का कारण बताना ही होगा, ताकि भविष्य में तुम मेरी हँसी मजाक नहीं कर सकोगे।
     इतना सुनकर राजा उस वर देने वाले साधु के पास गए तथा पत्नी की सारी बात बताई। तब उस वर देने वाले साधु ने राजा से कहा कि महाराज! रानी मरे या घर ’ महल’ से निकल जाए तुम कदापि यह बात उसे न बताना। यह सुनकर राजा ने क्या किया था, वह इस प्रकार है :
स तच्छ्त्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः।
मातरं ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत्।।
वा.रा.अयो. सर्ग 35 - 26
     प्रसन्न चित्तवाले उस साधु का यह वचन सुनकर कैकेय नरेश ने तुम्हारी माता को तुरन्त घर से निकाल दिया और स्वयं कुबेर के समान विहार करने लगे।
     सुमन्त्रजी ने कैकेयी से कहा कि हे कैकेयी। तुम भी तुम्हारी माता के मार्ग पर चलकर महाराज दशरथजी से अनुचित दुराग्रह कर रही हो। यह लोकोक्ति आज भी प्रत्यक्ष मुझे सोलह आने सत्य लग रही है कि पुत्र पिता के समान होते हैं तथा पुत्री माता के समान होती है। कैकेयी इतना सब कुछ सुनने के पश्चात् भी टस से मस नहीं हुई।
     यह कथा प्रसंग कैकेयी तथा सुमन्त्र के मध्य हुआ था। संभवतः भरतजी को इस प्रसंग के बारे में किसी से जानकारी मिली होगी। अतः उन्होंने अपनी माता कैकेयी की तुलना उनकी नानी से कर के कहा कि ’ जननी तु जननी भई’ 
     भरतजी ने इस प्रसंग को यहाँ विराम न देकर माता को कलंक न लगे अतः इस चैपाई के अन्त में यह कह दिया कि  बिधि सन कछु न बसाई।। अर्थात् हे माता तुम क्या कर सकती हो विधि के विधान के समक्ष किसी का क्या वश चलता है? हे माता जो हो गया तो हो गया अब तुम कुछ भी नहीं कर सकती हो। इस बात से भरत में श्रीराम के समान क्षमाशीलता का समान गुण प्रकट होता है।
     भरतजी के चरित्र में श्रीराम के शील, संयम, दया, करुणा, क्षमा आदि सद्गुणों का भण्डार था। भरतजी के क्षमाशीलता का एक उदाहरण मानस में उस समय प्राप्त होता है जब शत्रुघ्नजी को ज्ञात होता है कि मन्थरा ने कैकेयी के कान भरकर श्रीराम को वनवास दिलाया तो उन्होंने मन्थरा की कूबड़ पर लात मार गिराया। वह मुँह के बल गिर पड़ी तथा मुँह से रक्त बहने लगा एवं शत्रुघ्नजी उसका झोंटा पकड़कर घसीटने लगे। उस समय भरतजी ने उसे क्षमा कर शत्रुघ्नजी के हाथों से छुड़ा दिया।
सुनि रिपुहन लखि नरव सिख खोटी। लगे घसीटन घरि घरि झोंटी।
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।
श्रीरामचरितमानस अयो. 161- 4
     दयानिधि भरतजी ने मंथरा को शत्रुघ्न जी से छुड़ा दिया और दोनों भाई तुरन्त माता कौशल्या जी के पास गए। भरतजी के चरित्र में क्षमाशीलता और दया कूट -कूट कर भरी थी।
भरतजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि श्रीरामजी भी उनका मन में सदा स्मरण करते हैं यथा -
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।
श्रीरामचरितमानस अयो. 217 - 2
     भरतजी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है जिन्हें श्रीराम स्वयं अपने मन में स्मरण करते हैं।
श्रीराम का भरतजी के प्रति कितना प्रेम था? यह यहाँ स्पष्ट हो जाता है.
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेहीं।।
श्रीरामच. अयो. 218 - 4
     सारा जगत श्रीराम को जपता है, वे श्रीरामजी जिनको जपते हैं। उन भरतजी के समान श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी कौन होगा।
     अंत में यह चौपाई भरतजी के चरित्र की प्रशंसा में जनकजी ने भी अपनी प्रियतमरानी सुनयनाजी को चित्रकूट में श्रीराम एवं भरतजी के भेंट के समय कही गई। उसमें भरतजी के चरित्र के बारे में इससे ज्यादा कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाना है।
अगम सबहि बरनत बरबरनीं। जिमि जलहीन मीन गयुधरनी।।
श्रीरामच.मा. अयो. 289 - 1
     हे श्रेष्ठ वर्णवाली ’ सुनयना’! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिए वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वी पर मछली का चलना। हे रानी। सुनो, भरतजी की अपरिमित महिमा को एकमात्र श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं। किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।
     कुछ प्रसंगों में भरतजी श्रीरामजी से बढ़कर तो नहीं पर श्रीराम के समकक्ष उनके पद चिन्हों का अनुकरण करते हुए प्रतीत होते हैं। उन्होंने अयोध्यापुरी का चकाचौंध भरा राजकीय वैभव का त्यागकर वानप्रस्थ सा जीवन यापन किया। श्रीरामजी तो अपने पिताजी दशरथ और माँ कैकयी की आज्ञा से चौदह वर्ष वन के लिए प्रस्थान करते हैं किन्तु भरत को तो राज्याभिषेक की आज्ञा माता कैकयी देती है फिर भी वे उसे अस्वीकार कर राजधानी अयोध्या से दूर नंदिग्राम में निवास कर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कुशलतापूर्वक कर राजकीय कार्यों का संचालन कर अपनी प्रजा को कष्ट नहीं होने देते हैं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता के वियोग में राजसी ठाटबाट को तिलांजलि दे दी थी। महाकवि तुलसीदासजी लिखते हैं -
तेहिं पुरबसत भरत बिनु रागा, चंचरीक जिमि चंपक बागा।
श्रीरामचरित मानस अयोध्या 324 / 4
     भरतजी अयोध्यापुरी के भोग विलास को त्याग कर सिर पर जटाजूट और मुनियों के समान वल्कल धारण कर भूमि को खोदकर उसके अंदर कुश की आसनी बिछाई तथा भोजन वल्कल, बर्तन, व्रत - नियम सभी ऋषियों के समान कठिन धर्म का आचरण करते हैं। उनके इस चरित्र से नंदिग्राम में भरत को ऐसा त्याग करते देख प्रकृति में भौंरा भी चंपा के बाग में चंपा के फूल को कामदेव के सिंहासन के समान समझकर कभी भी नहीं बैठता है।
     जब हनुमानजी संजीवनीवटी की खोज के लिए आकाश मार्ग से निकलते हैं और भरतजी उन्हें आक्रमण कर नीचे उतार देते हैं और जब वास्तविकता ज्ञात होती है तो वे अत्यधिक पश्चाताप करते हैं,और श्रीराम जब अयोध्या लौटते हैं तो वे उनसे आँख उठाकर चर्चा करने में सकुचाते हैं। महाकवि तुलसीदासजी कहते हैं -
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड दोहा 1(क) 3
     श्रीराम के वनवास के लौटने का एक दिन शेष रह गया तब भरतजी मन में सोचते हैं कि श्रीराम मेरी करनी पर ध्यान दें तो सौ करोड़ कल्पों तक भी उसका निस्तार अर्थात् छुटकारा नहीं हो सकता है। प्रभु तो सदा सेवक को अवगुण होने पर भी क्षमा कर देते हैं। यहाँ हमें भरतजी के स्वभाव का अपराध बोध परिलक्षित होता है। धन्य है भरतजी और उनका चरित्र आज की पीढ़ी के लिए एक अनुकरणीय विशेषता लिए हुए हैं। पारिवारिक वैमनस्य और विभाजन से यदि हमें बचना है तो भरत - चरित्र हमारा उचित मार्गदर्शन कर सकता है।
सन्दर्भ ग्रन्थ.
1. श्रीरामचरितमानस ( गोस्वामी तुलसीदासकृत )
2. श्रीमद्वाल्मीकी रामायण ( महर्षि वाल्मीकि )
3. श्रीरामकथा एवं श्रीहनुमानकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग
ले. नरेन्द्रकुमार मेहता ’ मानसश्री’


’ मानसश्री मानस शिरोमणि विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर’
सीनि. एमआईजी -103, व्यास नगर,
ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)पिनकोड. 456 010

करें मनुहार क्या कहिए


रागिनी 

नज़र खंजर अदा कातिल, कली कचनार क्या कहिए!
अजब सी शोखियाँ उस की,करे मनुहार क्या कहिए!!
सुहानी बात करती जब, लगे मोहक मुरलिया सी,
पगों में पायलें उसकी,करे झंकार क्या कहिए!
बहारें झूमती आती,चले जब बाग में दिलबर,
दिवानी चाँदनी होकर,करे दीदार क्या कहिए!
नशीले नैन ये उसके, लगे ज्यों मद भरे प्याले,
बला की खूब सूरत है,करे इज़हार क्या कहिए!
हवायें चूमने आती, गुलाबी गाल जब उसके,
अलक आ रोक लेती है,मिसाले यार क्या कहिए!
फिजाँ में रागिनी गूँजे,अधर जब जब खुलें उसके,
तसव्वुर मे ही कातिल के, हुए बलिहार क्या कहिये।

इंदौर

वो जो आँखों से ...


डॉ. वीरेन्द्र पुष्पक


वो जो आंखों से मेरी, दिल में उतर जाने के बाद।
अब न आएगा कभी वो, उम्र भर जाने  के बाद।।

जिसको सब कहते हैं आदत, वोतो उसकी है अदा।
अच्छा लगता है मुझे, कहकर मुकर जाने के बाद।।

राह   हम  तकते  रहे,  पलके   बिछाये  देर तक।
तूने मुड़ कर भी न देखा था, गुजर जाने के बाद।।

तेरी महफ़िल से जब उठ्ठे, तोये आया था ख्याल।
अब न आएंगे कभी हम, लौटकर जाने के बाद।।

जब तलक है जिंदगी, तुम आँख का पानी रहो।
कौन पूछेगा तुम्हें,पलको से गिर जाने के बाद।।

डूबने वाले को, तिनके का सहारा मिल गया।
अब सुकूँ है दिल को दरिया,पार कर जाने के बाद।।

दिल तो शीशा है जरा सी, चोट से टुकड़े हुआ।
ये सिमटता ही नहीं, अक्सर बिखर जाने के बाद।।

हर एक जगह

जितेन्द्र सुकुमार ‘‘साहिर’’

हर एक जगह एक सा मंजर नहीं होता
बाहर है जो अक्सर यहां अंदर नहीं होता

कातिल कई ऐसे भी तो होते हैं जहां में
हाथों में वो जिनके कोई खंजर नहीं होता

मजबूत अगर होते कहीं रिश्ते दिलों के
तो आज मकां मेरा यूं खंडहर नहीं होता

कीमत जो समझता यदि  शबनम की जरा भी
तो प्यासा कभी कोई समंदर नहीं होता

जो हार के भी जीते हैं देखे हैं सिकंदर
बस जीतने वाला ही सिकंदर नहीं होता


शायर
‘‘उदय अशियाना’’ 
चौबेबांधा ( राजिम) पोस्ट -बरोण्डा
जिला - गरियाबंद ( छत्तीसगढ़ ) 493885
दूरभाष नंबर 9009187981, 9827345298
tamnna098@gmail.com

अब आसमॉ में चॉद

हरिकांत त्रिपाठी 



अब आसमाँ में चाँद सितारे बदल रहे 
ढलने लगी है शाम नज़ारे बदल रहे।।

कभी धड़कनों में प्यार के पैग़ाम भरे थे 
मायूस शाम - ओ - सहर हमारे बदल रहे।।

देखे बिना जो रात दिन रहते थे बेकरार 
नज़रें बदल चुकी हैं इशारे बदल रहे।।

मस्ती बहार शोखियाँ अठखेलियाँ गईं 
रंग - ए-बहार-ए-आलम हमारे बदल रहे।।

कश्ती भँवर में है अभी साहिल भी दूर है 
तूफ़ान भी दरिया के किनारे बदल रहे।।

जब वक्त मेहरबान था , वे साथ में रहे 
हम हो गये तन्हा तो सहारे बदल रहे।।

कैसे कहें कि कान्त तो बदले नहीं अभी 
अन्दाज़ देखने के तुम्हारे बदल रहे।।

मोर दिल्ली गँवागे जी

सुशील यादव 

नइ डूबय कोनो बाढ़ में डोंगा
हाथ मदद के बाढ़े रहय
सुख - दुःख म सकलावे जम्मों
मया कुतुब कस ठाड़े रहय
अब उजरे दया चिन्हारी
ममता कतेक चिथागे जी
मोर दिल्ली कती गँवागे जी
...
जिहां सुंता के नार चढ़े
जउन उन्नति के द्वार गढ़े
जेखर दाब दुनिया माने
जेला ग्यान के सागर जाने
ओखरे भीतिया बेधागे जी
मोर दिल्ली कती गँवागे जी
...
ऐरे - गैर मन राज करिन
अपन कोठी धन - धान भरिन
अपने हित ल साधे खातिर
सिधवा - सिद्ध बखान डरिन
तइहा - बेरा झट लुकागे जी
मोर दिल्ली कती गँवागे जी
...
चोरी - चकारी नइ होवै दिल्ली
पाँव - पखारे धोवै दिली
स्वागत बर पलक बिछइय्या
मनखे - मनखे रहे चिन्हैय्या
अपने - अपन कस निछागे जी
मोर दिल्ली कती गँवागे जी
...
अपजस के गुणगान करत हे
पीतल - सोना जान बिकत हे
बिकट समस्या हे डेरा डारे
मनुजता कॉपे डर के मारे
मन के बात करैया जानो
मन के कपाट ओधागे जी
मोर दिल्ली कती गँवागे जी

अाओ कविता लिखें

ज्ञानेन्द्र मोहन ज्ञान

आओ कविता लिखें
कि कविता,
वाकिफ है हर सच्चाई से।
आओ कविता लिखें
कि कविता,
भिड़ जाती है तन्हाई से।
कविता पहुँची
जहाँ सूर्य या चाँद सितारे
पहुँच न पाए।
धरती, अम्बर,
पर्वत, सागर,
यह कविता सबको दुलराए।
आओ कविता लिखें
कि कविता,
समझे सबको गहराई से।
धनवानों की
भरी तिजोरी
मज़दूरों का ख़ून पसीना।
राजनीति का
नग्न नृत्य या
अफसरशाहों का घृत पीना।
आओ कविता लिखें
कि कविता,
पढ़ लेती सब चतुराई से।
नफ़रत की दीवारों पर है
वार किया करती
यह कविता।
पीड़ित शोषित असहायों से
प्यार किया करती
यह कविता।
आओ कविता लिखें
कि कविता,
देखा करती ऊँचाई से।

भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय, 
आयुध निर्माणी नालन्दा में वरिष्ठ अनुवाद अधिकारी
पता - ब्लॉक 316, आयुध नगर, 
राजगीर, नालन्दा ( बिहार ) 803121
मोबाइलः 7905698382
मेल : gyanendramohan5@gmail.com


सोमवार, 25 नवंबर 2019

कब तक सहूँगी

सौरभ कुमार ठाकुर 

कब तक सहूँगी प्रताड़ना,
कभी तो पूरी करो मेरी कामना ।
चीख -  चीखकर रो रही हूँ मैए
कभी तो मान लो मेरी कहना ।
मत करो तुम मेरी अवमानना,
नही तो बाद में  पछताना।
नारी शक्ती बन कर तैयार हूँ मै,
अभी कभी मत मुझसे टकराना ।
मत करो तुम किसी पर प्रताड़ना,
दहेज के लिए बहुओं को मत जलाना ।
नही तो नारी चंडी बन जाएगी ।
फिर मुश्किल हो जाएगा तुम्हारा जीना ।
अब नही करना तुम किसी से प्रताड़ना,
अब तो है पूरा जागरुक जमाना ।

बालकवि एवं लेखक
मुजफ्फरपुर, बिहार
सम्पर्क : . 8800416537

छोटी - छोटी कठिनाइयों से

अलका गौड़

छोटी-छोटी कठिनाइयो से
हर दिन टकराती हूॅं।
हर सुबह कुछ टूटा सा, बिखरा सा पाती हूॅं
जिददी हूं मै सब कुछ समेट लाती हूॅं।
कोई रूठे तो अच्छा नही लगता
इस लिए अपने ही अहं को तोड जाती हूॅं
जिददी हूं मै सब कुछ समेट लाती हूॅं।


घर से जो निकली तो नजरे हजार उठी
कुछ हासिल किया तो उंगलियां बार-बार उठी
पर बनके अन्जान आगे बढ जाती हूॅं।
जिददी हूं मै सब कुछ समेट लाती हूॅं।


माना कि सफर आसान नही
पाया अभी मैने अपना मकाम नही
पर बात अपनो की हो तो कुछ
पल ठहर जाती हूॅं।
जिददी हूं मै सब कुछ समेट लाती हूॅं।


मंजिल आसल तो नही ये जानती हूॅं मैं
तुफान तो बहुत है पर कारवॉं जारी है।
ये तो छोटी सी जंग थी
अब यु¸द्ध की तैयारी है।
इसी आस आगे बढ जाती हूॅं
जिददी हूं मै सब कुछ समेट लाती हूॅं।

M.+91 99990 44296
Flat no. 401, tower 10, 
panchsheel primrose , Hapur Road, ghaziabad