मंगलवार, 14 मई 2019

मई 2019 से जुलाई 2019

आलेख
भारतीय कथा परम्परा / राधावल्लभ त्रिपाठी
कफ़न / रोहिणी अग्रवाल

कहानी
गुण्डाः जयशंकर प्रसाद
अधिकार वंचित : ज्ञानदेव मुकेश
सफर : सोमेश शेखर चन्द्र 

लघुकथाएं
मतदान : डॉ. मृदुला शुक्ला
संकल्प : डॉ. मृदुला शुक्ला /
मजबूरी : सीमा जैन

कविता/ गीत/ गजल
मुझसे लिपट कर रोई :
गीत
हरे भरे वन उपवन (गीत) :
सुदामा दुबे
दो मेघ मिले, बोले  - डोले (गीत)
गोपाल सिंह नेपाली
शराब की ख्वाहिश (गजल)
निरंजन

छत्तीसगढ़ी कहानी
गोमती : भोलाराम सिन्हा गुरुजी

नाटक (एकांकी)
दीप जलेगा : मिलिंद तिखे

पुस्तक समीक्षा
नायाब हिन्दी ग़ज़लों का संग्रह - हिंदकी
 समीक्षक शकील अखतर

भारतीय कथा परम्परा

राधावल्लभ  त्रिपाठी

भारतवर्ष कथा की जन्मभूमि है। यह कहानी का आदि देश है। मनुष्य ने जिस क्षण इस देश की धरती पर पहली बार पाँव रखा होगा, कदाचित् उसी समय से कहानी का भी प्रचलन हमारे यहाँ हुआ होगा। ऋग्वेद विश्व - साहित्य का प्राचीनतम ग्रन्थ है। जिसकी रचना ईसा से कुछ हजार वर्ष पहले हो चुकी थी। ऋ ग्वेद में अनेक स्थलों पर तत्कालीन समाज में कहानी या किस्सागोई की लोकप्रियता और एक प्रचलित विधा होने के प्रमाण मिलते हैं। इन्द्र उस समय का एक महानायक था। इन्द्र को लेकर ही ऋ ग्वैदिक समाज में अनेक मिथक या किंवदन्तियाँ गढ़ी जा चुकी थीं। कहानी इन मिथकों और कथाओं में अन्तर्गर्भित थी। इन्द्र की चरितगाथा अपने आप में एक औपन्यासिक विस्तार को समेटे हुए कहानी का ढाँचा सामने रखती है। इस दृष्टि से ऋ ग्वेद 1 - 32 का यह अंश पठनीय है। मैं इन्द्र के पराक्रमों का वर्णन करता हूँ, जिन्हें उस वज्रधारी ने सबसे पहले किया है। उसने अहि नामक असुर को मारा जल की धारा को प्रवाहित किया और पर्वत पर नदियों के लिए रास्ता खोला। इन्द्र ने उस अहि को मार गिराया, जो पर्वत पर रहता था। त्वष्टा ने इन्द्र के लिए वज्र बनाया था। इन्द्र ने जैसे ही नदियों का रास्ता खोला, रँभाती हुई गायों की तरह जल नीचे की ओर बह चला। उसने अपने बल को प्रखर करने के लिए सोमपान किया और वज्र से अहि पर प्रहार किया। इन्द्र ने मायावियों की माया का विरोध किया। उसने सूर्य, उषा और आकाश को अनावृत किया। इसके पश्चात् इन्द्र का कोई शत्रु न रहा। इन्द्र ने वृत्र के अंगों को ऐसे काट डाला। जैसे पेड़ की डालियाँ काटी जाती हैं। वृत्र धरती पर गिर पड़ा। मद्यपान करके वृत्र वीर इन्द्र से लड़ने चला था। इन्द्र सोमपायी है। उसने अनेक शत्रुओं का दमन किया है। वृत्र इन्द्र के प्रहारों को कैसे सह सकता था। वह बुरी तरह से हारा। पर हाथ और पाँव कट जाने पर भी उसने इन्द्र से लड़ाई जारी रखी। इन्द्र ने उसकी पीठ पर वज्र से प्रहार किया। साधारण बैल भला साँड के मुकाबले में ठहर सकता है? वृत्र के टुकड़े - टुकड़े हो गये। तब जल का प्रवाह लोगों की प्यास बुझाने के लिए वृत्र के ऊपर से बह उठा। वृत्र ने जल की धारा को जबरदस्ती रोक रखा था। अब वही जल उसे रौंदता हुआ बह रहा था। इन्द्र ने वृत्र की शक्तिहीन माता पर भी प्रहार किया। माता ऊपर थी, वृत्र नीचे पड़ा था। वृत्र की माता ऐसे पड़ी थी, जैसे गाय अपने बछड़े के साथ पड़ी हो। वृत्र का मृत शरीर उस जल - धारा में पड़ा था, जो रुकना नहीं जानती। विश्राम नहीं करती। इसी दास के बस में होकर तो जल अभी तक रुका हुआ था। अहि उसका रक्षक था। जैसे पणि गायों को रोक लेते हैं, वैसे ही उसने जल की धाराओं को रोक रखा था। इन्द्र ने वृत्र को मारकर जल का द्वार खोल दिया। जब वृत्र ने इन्द्र के वज्र पर प्रहार किया, तो इन्द्र घोड़े की पूँछ के समान फुर्तीला बन गया और उसके प्रहार का निवारण कर सका। जिस अवसर पर इन्द्र और वृत्र का युद्ध हुआ, वृत्र के द्वारा प्रयुक्त विद्युत और गर्जन, कोहरा और वज्र सब बेकार हुए। इन्द्र को सदा के लिए विजय मिली। हे इन्द्र, वृत्र को मारने के पश्चात् तुम्हें उसका कौन सा सहायक दिख गया जिसके डर से तुम निन्यानबे योजन भागते चले गये? और बाज की तरह आकाश में उड़ गये। निश्चय ही इन्द्र विषयक यह सूक्त भारतीय आख्यान - परम्परा की पीठिका प्रस्तुत करता है। आख्यान या भारतीय कहानी का यह एक रूप है, जो पुराकथा के मिथकीय और प्रतीकात्मक पर्यावरण में भी जीवन के स्पन्दन से युक्त है। इन्द्र की चरित - गाथा में कल्पनाशीलता, कथा का रहस्य और रोमांच, किस्सागोई की भंगिमा और मानवीय सम्बन्धों की परिकल्पना मिलती है। उपज के तत्त्व द्वारा कहानी को आकर्षक और रोमांचक भी बनाया गया है। उपर्युक्त उद्धरण का ही अन्तिम वाक्य इसका सुन्दर नमूना है। इन्द्र के विषय में ही ऋग्वेद के एक और सूक्त 4 - 18 में बताया गया है कि इन्द्र की अपने पिता त्वष्टा के साथ नहीं पटती थी। पिता पुत्र को समाप्त कर देना चाहता था। इन्द्र सोम को पाकर वैभवशाली होना चाहता था। उसकी माता ने उसे सोम दे दिया। माता का चुराकर दिया सोम इन्द्र पा गया, तब पिता और पुत्र में झगड़ा हुआ और अन्त में इन्द्र ने पिता को मार ही डाला। उसने त्वष्टा को पर्वत से धकेलकर सदा के लिए मृत्यु की गोद में सुला दिया। इस प्रकार की पुराकथाओं में मिथक के साथ - साथ इतिहास भी मिला हुआ है। वे पौराणिक आख्यानों के साथ - साथ ऐतिहासिक कथाओं की भी परम्परा का सूत्रपात्र करती हैं। उस समय के पराक्रमी या यशस्वी राजाओं को लेकर आख्यानों या कथाओं की रचना का जो उपक्रम वैदिक काल में हुआ, उसने भारतीय कहानी और प्रबन्ध - साहित्य की उर्वर भूमि तैयार की। पुरूरवा और उर्वशी की प्रणयकथा उस समय की ऐसी ही लोकप्रिय कहानियों में से रही होगी, जिसमें ऐतिहासिकता का पुट भी है, मिथकशास्त्र भी जुड़ा हुआ है और लोककथा का आधार भी है। ऋ ग्वेद में एक सूक्त में पुरूरवा और उर्वशी का संवाद निबद्ध है, पर यह संवाद जिस प्रसंग में हो रहा है, उसकी पूर्वकथा पर वहाँ प्रकाश नहीं डाला गया है। यह कथा शतपथ ब्राह्मण में बतायी गयी है। ऋ ग्वेद के उक्त संवादसूक्त और शतपथ ब्राह्मण में उसकी कथा - इन दोनों को मिलाकर वैदिक काल की इस लोकप्रिय कथा का पूरा स्वरूप सामने आ जाता है, जो भारतीय कथा साहित्य की प्राचीनतम धरोहर है। इसलिए इस संकलन में ऋ ग्वेद और शतपथ ब्राह्मण से अनूदित पुरूरवा और उर्वशी की कथा को सबसे पहले रखा गया है। पुराकथा के अतिरिक्त सामाजिक सन्दर्भों से जुड़ी ऐसी छोटी - छोटी कहानियों का भी बहुत पुराने जमाने से ही हमारे यहाँ चलन रहा होगा, जिनमें मिथकों के महिमामण्डित अलौकिक विश्व के स्थान पर रोजमर्रा का जीवन है, हमारे घर - द्वार की कथा है या हमारे बीच के किसी व्यक्ति की आप - बीती है। बतरस और गोष्ठी के पर्यावरण में आपबीती से बढ़कर रुचिकर वस्तु और क्या हो सकती है? पर आपबीती कहने की यह परम्परा अपने प्रकृत रूप में तो वाचिक परम्परा में ही फूल -फल सकती थी, साहित्यिक परम्परा में भी इसकी आकर्षक परिणतियाँ धूर्ताख्यान या दशकुमारचरित जैसी कथाकृतियों में हम पाते हैं। पर आपबीती को कथा के रूप में कहने की यह परम्परा कितनी पुरानी है। इसका साक्ष्य भी हमें ऋ ग्वेद से ही मिलता है। ऋ ग्वेद का कितव - सूक्त 10 - 34 एक जुआरी की आपबीती ही तो है। जुआरी अपनी जिन्दगी का हाल बताते हुए कहता है - मेरी पत्नी पहले मुझे डाँटती नहीं थी। मेरे ऊपर रिसाती भी नहीं थी वह। वह मुझ पर और मेरे मित्रों पर दयालु थी। मैंने पासों के चक्कर में अपनी उस साध्वी पत्नी को घर से निकाल बाहर किया। अब तो मेरी सास मुझसे घृणा करती है। मेरी स्त्री अब मुझसे अलग रहती है। दुखियारे का सचमुच कोई सगा नहीं होता। मेरी स्थिति बूढ़े घोड़े की तरह है, जिसे कोई घास नहीं डालता। बार - बार सोचता हूँ कि अब नहीं खेलूँगा जुआ और जुआरियों की संगत छोड़ दूँगा। पर जब भूरे रंग के पासे जुआ घर में फिकने लगते हैं, तो मैं अपने आपको रोक नहीं पाता, उनकी आवाज सुनते ही चल देता हूँ, जैसे कोई नायिका प्रिय से मिलने चल देती हो। इस प्रकार ऋ ग्वेद के काल से आख्यान या कथा की जो परम्परा हमारे देश में प्रारम्भ हुई, उसमें पौराणिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक पक्षों को बराबर स्थान मिला। इसलिए अथर्ववेद में इतिहास, पुराण, गाथा और नाराशंसी - इन चार लोकप्रिय विधाओं का उल्लेख किया गया है। इनमें से इतिहास का सम्बन्ध अतीत से, पुराण का मिथक या अलौकिक वृत्त से तथा गाथा और नाराशंसी का सम्बन्ध समकालीन मनुष्य - जीवन से है। वैदिक संहिताओं ऋ ग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के पश्चात् आख्यान और इतिहास - पुराण की परम्परा का विस्तार लगभग 1000 ई.पू्. तक ब्राह्मण - ग्रन्थों के द्वारा होता रहा। शाबरभाष्य में ब्राह्मण - ग्रन्थों की दस विधियाँ बतायी गयी हैं, जिनमें उनके वर्ण्य - विषयों का समावेश हो जाता है, हेतु निर्वचन, निन्दा प्रशंसा, संशय, विधि, परक्रिया, पुराकल्प, व्यवधारण - कल्पना तथा अपमान। इनमें से निन्दा और प्रशंसा दोनों के लिए अर्थवाद की प्रविधि का उपयोग किया जाता है और अर्थवाद का सम्बन्ध इतिहास,आख्यान और पुराणों से जुड़ता है। इस प्रकार ब्राह्मण - ग्रन्थों में यज्ञों की विधियाँ बताने के प्रसंग में अर्थवाद की दृष्टि से इतिहास, पुराण या आख्यानों की कहानियाँ प्रस्तुत की गयी हैं, जिनसे कथा कहने की प्राचीन शैली का पहली बार परिचय मिलता है। शतपथ ब्राह्मण में पुरूरवा और उर्वशी की कथा इसी प्रकार आयी है। इसी तरह मैत्रायणी संहिता में रात्रि और पर्वतों के पंखों को लेकर दो सुन्दर कहानियाँ मिलती हैं। इसमें रात्रि की सृष्टि की कथा इस प्रकार बतायी गयी है - यम की मृत्यु हो गयी थी। देवता प्रयास कर रहे थे कि यमी उसे भूल जाय। जब कभी यमी से पूछा जाता, वह यही बताती कि यम आज ही मरा है। देवताओं ने कहा कि इस तरह तो वह यम को कभी भी न भूल पाएगी। तो हम लोग रात्रि की सृष्टि करें। तब देवताओं ने रात्रि बनायी। रात्रि के बाद जो दिन आया, वह अगला दिन कहलाया। और यमी यम को भूल गयी। इसलिए लोग कहा करते हैं कि रात और दिन के क्रम से मनुष्य अपना दुःख भूल जाता है। सृष्टि के बारे में भी अनेक कथाएँ ब्राह्मण - ग्रन्थों में मिलती हैं। इन कथाओं में मनुष्य जाति की जीवन और जगत् के विषय में प्राचीनतम परिकल्पनाएँ सामने आती हैं। दूसरे देशों में प्रचलित सृष्टि और प्रलय के विषय की पुरानी कथाओं से इनकी रोचक तुलना हो सकती है। इस संकलन में शतपथ ब्राह्मण से ली गयी प्रलय की कथा इसी प्रकार की कथा है। निश्चय ही हमारे देश में कहानी की जो प्राचीन परम्परा पनपी, उसने अन्य देशों की भी यात्रा की। सिन्दबाद और ईसप की कथाओं का मूल भारतवर्ष माना जाता है, और पंचतन्त्र की विश्वयात्रा तो विदित ही है। वैदिक साहित्य के समानान्तर आख्यान या प्राचीन कथाओं का जो लोकप्रिय साहित्य विकसित हो रहा था, उसकी परिणति रामायण, महाभारत तथा पुराणों के रूप में ईसा से पहले की कुछ सदियों में होने लगी। पाणिनि 500 ई. पू. ने आख्यान और आख्यायिका का इतिहास और पुराण के साथ उल्लेख किया है। पतंजलि दूसरी सदी ई. पू. ने वासवदत्ता, समनोत्तरा और भैमरथी - इन तीन आख्यायिकाओें का नाम - निर्देश किया है। उस युग में ये तीन आख्यायिकाएँ लिखी गयी थीं पर अब ये प्राप्त नहीं होतीं। आख्यान, उपाख्यान, आख्यायिका आदि उस समय की लोकप्रिय कथाओं के रूप थे, जिन्हें सूत, मागध, चारण या कुशी - लव लोगों के सामने गा - गाकर या कह कर प्रस्तुत करते थे। आगे चलकर जब इन कथारूपों का परिष्कृत साहित्य की विधाओं में उपयोग किया गया, तो संस्कृत साहित्य में कथा और आख्यायिका इन दो कथा विधाओं का विकास हुआ। बाद में आख्यान, उपाख्यान आदि का लक्षण भी कुछ काव्यशास्त्र के आचार्यों ने निर्धारित करने का प्रयास किया। भोज के अनुसार आख्यान, उपाख्यान का भी अभिनय, पाठ और गायन के साथ प्रस्तुत किया हुआ रूप है और इसकी प्रस्तुति किसी ग्रन्थ से इसे पढ़ - पढ़कर की जाती है। भोज ने उपाख्यान का लक्षण बताते हुए कहा है कि किसी प्रबन्ध सम्पूर्ण ग्रन्थ के भीतर किसी को उपदेश देने के लिए दृष्टान्त के रूप में कही गयी कथा उपाख्यान है, नल - दमयन्ती की कथा, सावित्री - सत्यवान् की कथा - इस प्रकार की कथाएँ इसके उदाहरण हैं। महाभारत भारतीय उपाख्यान परम्परा का एक महाकोश है। वाचिक परम्परा में प्रचलित सहस्रों कहानियाँ इसमें समाविष्ट कर ली गयी हैं। इनमें से नलोपाख्यान, साविर्त्युपाख्यान, शकुन्तलोपाख्यान आदि ऐसी कथाएँ हैं,जो अत्यन्त प्राचीन काल से हमारे समाज में बहुत लोकप्रिय रही हैं। इन उपाख्यानों को अनेक पुराणों तथा संस्कृत के बहुत प्रबन्ध - काव्यों में बार - बार प्रस्तुत किया गया है, पर जिस आदिम रस - गन्ध और विशद रूप के साथ ये महाभारत में आये हैं, वह भारतीय कथासाहित्य की अमूल्य निधि है। अतएव भारतीय कथा की परम्परा के इस प्रतिनिधि चयन में महाभारत से ऐसे उपाख्यानों का संकलन उचित ही है। प्राचीन काल से ही भारतीय - कथा परम्परा असंख्य धाराओं में प्रवाहित होती रही है, और उसके सारे प्रवाह महाभारत के महासागर में भी समा नहीं सके। प्राचीन महापुरुषों या महानायकों को लेकर कहानियाँ कहने की जो परम्परा वैदिक काल में शुरू हुई थी, वह कथा चक्रों के रूप में बाद में और विपुल आयाम धारण करती रही। ईसा पूर्व की सदियों में उदयन, विक्रमादित्य, सातवाहन और शूद्रक ऐसे राजा हुए जिन्हें लेकर कथाओं की कई श्रृंखलाएँ हमारे यहाँ प्रचलित हो गयीं। इनमें कुछ राजाओं की कथाएँ बाद में कुछ महाकवियों ने भी अपने महाकाव्यों या नाटकों के लिए लीं। महाभारत के पश्चात् भारतीय - कथा परम्परा की महास्रोतस्विनी बृहत्कथा के रूप में प्रवाहित हुई। बृहत्कथा में कहानी ने अपना सहज रूप पाया, वह जन - जन के मन में रमी, समाज में कही - सुनी जाने वाली कथाओं से जुड़कर आगे बढ़ी। रामायण और महाभारत के पश्चात् बृहत्कथा कदाचित् भारतीय साहित्य को सर्वाधिक प्रभावित और अनुप्राणित करने वाला ग्रन्थ है। इसके लेखक गुणाढ्य अपने आप में एक किंवदन्ती बन गये और उनकी कृति को रामायण और महाभारत के बाद संस्कृत साहित्य में एक उपजीव्य ग्रन्थ के रूप में सबसे अधिक आदर भी मिला। स्वयं गुणाढ्य को हमारी साहित्यिक परम्परा व्यास और वाल्मीकि के बराबर पूज्य भी मानती आयी है। कहानियों का यह विराट् संकलन गुणाढ्य ने पैशाची प्राकृत में लगभग पहली शताब्दी ईसवी पूर्व में तैयार किया था, जो बाद में लुप्त हो गया। बृहत्कथा की लोकप्रियता का पता इस बात से चलता है कि संस्कृत में इसके अनेक रूपान्तर तैयार किये जाते रहे, और प्राकृत की कदाचित् यही ऐसी कृति है, जिसका संस्कृत में कई रचनाकारों ने अलग - अलग अनुवाद या रूपान्तर प्राचीन काल में किया। बृहत्कथा के कम से कम चार पुराने रूपान्तरों का पता चलता है - क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी, सोमदेव का कथासरित्सागर, बुधस्वामी का बृहत्कथाश्लोकसंग्रह तथा वामनभट्ट की बृहत्कथामंजरी। इनके अतिरिक्त प्राकृत में ही संघदासगणि ने वसुदेवहिण्डी नाम से बृहत्कथा का एक नया रूपान्तर भी तैयार किया। इन रूपान्तरों में बुधस्वामी का बृहत्कथाश्लोकसंग्रह काफी पुराना लगभग पाँचवीं सदी ईसवी माना जाता है और संघदासगणि का रूपान्तर उसके कुछ समय बाद का। क्षेमेन्द्र और सोमदेव दोनों कश्मीर के हैं तथा लगभग समकालीन हैं। दोनों का समय ग्यारहवीं - बारहवीं सदी के आसपास है। बुधस्वामी का रूपान्तर बृहत्कथा के नेपाली संस्करण पर आधारित कहा गया है तथा वामनभट्ट का उसके दक्षिणी संस्करण पर, जबकि क्षेमेन्द्र और सोमदेव के सामने बृहत्कथा का कश्मीर में प्रचलित स्वरूप रहा होगा। ऐसा लगता है कि ईसा के बाद की सदियों में रामायण और महाभारत या पुराणों के ही समान बृहत्कथा के भी देश के अलग - अलग भागों में अलग - अलग प्रारूप चल पड़े थे। सभी रूपान्तरों में बृहत्कथा की मूल कथा योजना एक समान है, पर अवान्तर कथाओं तथा कथाओं के विन्यास की दृष्टि से काफी फर्क है। बृहत्कथा का हमारी साहित्यिक परम्परा में कितना महत्त्व था, यह गुणाढ्य तथा उनकी रचना के विषय में संस्कृत के अनेक गणमान्य कवियों द्वारा प्रकट किये गये उद्गारों से विदित होता है। उद्योतन सूरि ने 779 ई. में रचित अपनी कुवलयमाला के आरम्भ में बृहत्कथा की प्रशंसा करते हुए कहा है - बृहत्कथा क्या है, साक्षात् सरस्वती है। गुणाढ्य स्वयं ब्रह्म हैं। यह कथा ग्रन्थ समस्त कलाओं की खान है। कविजन इसे पढ़कर रचनाकर्म में प्रशिक्षित होते हैं। सातवीं सदी के संस्कृत के महान् गद्यकार महाकवि बाण ने बृहत्कथा की तुलना शिवलीला से की है। ग्यारहवीं सदी के कवि धनपाल ने अपनी तिलकमंजरी में बृहत्कथा की उपमा उस समुद्र से दी है, जिसकी एक - एक बूँद से कितनी ही कथाएँ उपजती हैं। बृहत्कथा का अध्ययन करना तथा उसका रूपान्तर तैयार करना प्राचीन काल में गौरव की बात समझी जाती थी। कोल्लार क्षेत्र के गुम्मारेड्डीपुर से प्राप्त एक ताम्रपत्र में छठी सदी के पूर्वार्ध के एक शासक राजा दुर्विनीत के सम्बन्ध में बताया गया है कि उस राजा ने एक व्याकरण, किरातार्जुनीय - महाकाव्य के पन्द्रह सर्गों की टीका तथा बृहत्कथा का संस्कृत में एक रूपान्तर तैयार किया था। बृहत्कथा की ख्याति भारतवर्ष के बाहर या बृहत्तर भारत में भी फैली हुई थी। काम्बोज के राजा यशोवर्मन् के शिलालेखों में तीन बार गुणाढ्य का उल्लेख किया गया है। क्षेमेन्द्र तथा सोमदेव ने अपने रूपान्तरों में बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के विषय में कुछ जानकारी दी है। इसके अनुसार गुणाढ्य का जन्म गोदावरी के किनान प्रतिष्ठान नगर में हुआ था। उस समय प्रतिष्ठान नगर सातवाहन सम्राट् हाल की राजधानी थी, जिनका समय पहली सदी ई. माना जाता है। बृहत्कथा की उत्पत्ति या रचना को लेकर अपने आप में एक रोचक मिथकीय कथा प्राचीनकाल से ही चल पड़ी, जिसका विवरण इसके रूपान्तरकारों ने दिया है। कथासरित्सागर के लेखक सोमदेव के अनुसार यह कथा इस प्रकार है - एक बार भगवान् शिव पार्वती को कथाएँ सुनाने बैठे और उन्होंने विद्याधर, चक्रवर्तियों की सात आश्चर्यजनक कथाएँ पार्वती को सुनायीं। यद्यपि ये कथाएँ उन्होंने नितान्त एकान्त में ही पार्वती के आगे कही थीं, पर चोरी से उनके एक अनुचर पुष्पदन्त ने छिपकर उन्हें सुन लिया। उसने अपनी जया को वे कहानियाँ सुनायीं। जया ने वे कहानियाँ अपनी सखियों के आगे कह दीं। तब होते - होते कहानियों की चर्चा पार्वती जी के आगे भी आ गयी, और जब पता चला कि पुष्पदन्त ने छिपकर वे कहानियाँ सुनी हैं, तो पार्वती ने कुपित होकर पुष्पदन्त को मृत्युलोक में जन्म लेने का शाप दे दिया। पुष्पदन्त के भाई माल्यवान् ने उसकी ओर से क्षमा माँगी। पर पार्वती इतनी कुपित थीं कि उन्होंने पुष्पदन्त की ओर से क्षमायाचना करने वाले माल्यवान् को भी वही शाप दे डाला। पुष्पदन्त की पत्नी जया, पार्वती की परिचारिका थी। उसका दुःख देखकर बाद में पार्वती को करुणा आयी। तब उन्होंने अपने शाप का परिहार करते हुए कहा कि जब पुष्पदन्त मृर्त्ययोनि में विन्ध्याचल पर्वत पर काणभूति से मिलेगा और उसे वे ही कथाएँ सुना देगा, जो उसने चोरी से सुनी हैं, तो उसके शाप की मुक्ति हो जाएगी, तथा मृर्त्ययोनि में वह अपना वास्तविक परिचय भूलेगा नहीं। इसी प्रकार माल्यवान् भी काणभूति से इन कथाओं को सुनेगा और इनका लोक में प्रचार करेगा, तब फिर वह शिवलोक में लौट आएगा। पार्वती के शाप के अनुसार पुष्पदन्त ने कौशाम्बी नगरी में वररुचि कात्यायन के रूप में अवतार लिया और वह महान वैयाकरण तथा नन्दवंश के अन्तिम राजा योगनन्द का मन्त्री बना। जीवन के उत्तरार्ध में विरागी होकर वह विन्ध्याचल की विन्ध्यवासिनी देवी की यात्रा में पहुँचा, जहाँ उसकी भेंट काणभूति से हुई। उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति हो आयी और उसने काणभूति को वे सातों बृहत्कथाएँ सुनायीं। वह शापमुक्त होकर शिवलोक आ गया। उसके भाई माल्यवान् ने प्रतिष्ठानपुरी में गुणाढ्य के रूप में जन्म लिया था। वह वहाँ के राजा सातवाहन का मन्त्री बना। उसके दो शिष्य हुए - गुणदेव और नन्दिदेव। इन दोनों को लेकर वह काणभूति के पास आया और काणभूति से सातों बृहत्कथाएँ प्राप्त कर उसने उनको एक - एक को एक - एक लाख श्लोकों में अपने रक्त से लिखा। फिर अपने शिष्यों के आग्रह पर उसने वे बृहत्कथाएँ राजा सातवाहन के पास भेजीं, जिससे उस महाग्रन्थ को समुचित आदर और सुरक्षा मिल सके। पर राजा को वे कथाएँ पसन्द न आयीं, क्योंकि वे प्राकृत भाषा पैशाची प्राकृत में लिखी गयी थीं। इससे गुणाढ्य को बड़ा आघात लगा। जब राजा के द्वारा अनादृत पोथी उसके सामने आयी तो उसने उसका एक - एक पृष्ठ पढ़ते - पढ़ते आग में जलाना शुरू किया। जंगल के सारे पक्षी एकत्र होकर उसके द्वारा पढ़ी जाती उन कहानियों को मुग्ध होकर सुनते रहे। उसके कारण राजा सातवाहन को पक्षियों का अच्छा मांस मिलना बन्द हो गया और जब उसने इसका कारण पता लगवाया, तो उसे अपने द्वारा बृहत्कथाओं के किये गये अनादर पर पश्चात्ताप हुआ। पर तब तक गुणाढ्य अपनी बृहत्कथा के छह खण्ड जला चुके थे। सातवाहन ने पहुँचकर उन्हें शेष अंश जलाने से रोका। इस प्रकार बृहत्कथा का एक लाख श्लोकों का केवल सातवाँ खण्ड ही बच सका। वास्तव में बृहत्कथा भारतीय कथा साहित्य की एक अमूल्य निधि रही है। अपने मूल में अप्राप्य होकर भी अनेक रूपान्तरों के माध्यम से परवर्ती काल में भी वह उतनी ही लोकप्रिय बनी रही। इन रूपान्तरों में सोमदेव का कथासरित्सागर कथानक की प्रस्तुति की दृष्टि से तथा वर्णन शैली, विदग्धता और कविप्रतिभा के योग के कारण सबसे अधिक सुपाठ्य और रोचक है। अतः इस संकलन में बृहत्कथा परम्परा की कथाओं के परिचय के लिए कथासरित्सागर से ही चार कथाएँ चुनी गयी हैं। बृहत्कथा में भारतीय कहानी का एक विशेष स्वरूप परिलक्षित होता है, जिसमें एक किस्से के भीतर से दूसरा तथा दूसरे के भीतर से तीसरा निकलता जाता है,और इस प्रकार कहानियों की श्रृंखला बन जाती है। पंचतन्त्र तथा संस्कृत के अन्य कथा ग्रन्थों में भी कहानी की इस विशिष्ट शैली का प्रयोग हुआ है, जिसमें एक कहानी का कोई पात्र दूसरे पात्र को कोई और कहानी प्रसंगवश सुनाने लगता है या कोई पात्र अपनी आपबीती बताते हुए एक अलग कथा संसार रच लेता है। बृहत्कथा की परम्परा में परवर्ती युग में विपुल कथा साहित्य लिखा जाता रहा। वैतालपंचविंशति, शुकसप्तति, सिंहासनद्वात्रिंशिका, पंचतन्त्र, हितोपदेश आदि ऐसी कथा रचनाएँ हैं, जिनके संस्कृत में ही कई - कई संस्करण प्राचीन काल से ही प्रचलित रहे हैं और लोकथाओं तथा लोकसाहित्य की परम्परा से भी ये रचनाएँ गहराई से जुड़ी रही हैं। वैतालपंचविंशति वैतालपचीसी के रूप में, शुकसप्तति किस्सा तोता -मैना के रूप में तथा सिंहासनद्वात्रिंशिका सिंहासनबत्तीसी के रूप में लोक भाषाओं में रूपान्तरित होकर घर - घर में पढ़ी, कही, सुनी जाती रही हैं। यद्यपि वैतालपंचविंशति की पच्चीस कथाएँ बृहत्कथा के क्षेमेन्द्र तथा सोमदेव द्वारा प्रस्तुत रूपान्तरों में भी शामिल हैं, पर वैतालपंचविंशति मूल बृहत्कथा से स्वतन्त्र एक पृथक् कथाचक्र के रूप में विकसित हुई होगी- ऐसा अनुमान किया जाता है। वैतालपंचविंशति के संस्कृत में कम से कम चार संस्करणों का पता चलता है। इनमें शिवदास के द्वारा रचित वैतालपंचविंशति सर्वाधिक उल्लेखनीय है, जिसमें गद्य के साथ - साथ बीच - बीच में पद्य का भी प्रयोग किया गया है। इसका समय पन्द्रहवीं सदी के आसपास है। दूसरी वैतालपंचविंशति किसी अज्ञात लेखक के द्वारा गद्य में तैयार की गयी। तीसरा अपेक्षाकृत संक्षिप्त प्रारूप वल्लभदेव ने तैयार किया। इसके अतिरिक्त वैतालपंचविंशति का एक चौथा प्रारूप जम्भलदत्त के द्वारा रचा गया है। शुकसप्तति में एक तोते के द्वारा सौदागर की पत्नी प्रभावती को सुनाई गयी सत्तर कथाएँ हैं। इसके भी दो प्राचीन संस्करणों का पता चलता है - एक अलंकृत संस्करण है, दूसरा सरल। पहला संस्करण बारहवीं सदी के आसपास का माना गया है। कहानी के क्षेत्र में पंचतन्त्र भारतीय साहित्य की सबसे बड़ी देन कही जा सकती है। पाँचवीं सदी से दुनिया की कई भाषाओं में इसके अनुवाद किये जाने की परम्परा अकारण ही नहीं चल पड़ी थी। पश्चिमी विद्वानों ने भी कहानी की परम्परा में पंचतन्त्र के योगदान के महत्त्व को स्वीकार किया है। दुनिया की किसी जाति के पास कदाचित् इतना सम्पन्न कथा साहित्य नहीं है, जितना भारतीयों के पास, और अन्य देशों में भी जितना पुराना कहानी साहित्य है, वह भारतीय कहानी की देन कहा जा सकता है। विण्टरनित्स के इस कथन में कहानी की भारतीय परम्परा की जिस गुरुता और विशालता का संकेत है, उसके केन्द्र में पंचतन्त्र रहा है। अधिकांशतः पंचतन्त्र का कलेवर पशुकथाओं के तानेबाने में बुना हुआ है, यद्यपि उसमें अनेक कहानियाँ ऐसी भी हैं, जो सीधे मनुष्य जगत् से सम्बद्ध हैं। पशुकथाओं की परम्परा वैदिक आख्यानों से प्रारम्भ होकर महाभारत, पुराणों और जातक - कथाओं में चली आ रही थी और पंचतन्त्र में संकलित कथाओं में से भी बहुत - सी उसके पहले से प्रचलित रही हैं पर पंचतन्त्र के रचयिता ने इन कहानियों को समेटते हुए ऐसी कुछ रूपबन्ध और कथ्य की अन्विति पैदा की कि कहानी की अपनी पहचान उभरकर सामने आयी। कहानी की एक लम्बी विरासत के रहते काव्यशास्त्र के आचार्यों के द्वारा कहानी से मिलती - जुलती विधाओं का परिगणन और उनके लक्षणों का व्यवस्थापन स्वाभाविक ही था। उपाख्यान, आख्यान, निदर्शना, प्रवह्लिका, मन्थुल्ली, मणिकुल्या, परिकथा, खण्ड - कथा, बृहत्कथा - इस तरह की अनेक विधाएँ आनन्दवर्धन आदि संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने परिगणित कीं और भोज जैसे आचार्यों ने उनके विस्तार से सोदाहरण लक्षण भी प्रस्तुत किये। यदि आधुनिक कहानी का एक व्यापक लक्षण किया जाय, तो इन विधाओं के अधिकांश के लक्षण उसमें उपलक्षण बनकर समा सकते हैं। पंचतन्त्र को इन आचार्यों ने निदर्शना नामक कथाविधा के अन्तर्गत रखा है, क्योंकि इसमें मनुष्यजगत् के किसी सत्य के निदर्शन के लिए पशुकथाओं या पशु - प्रतीकों का उपयोग किया गया है। निदर्शन की यह विशिष्ट पद्धति पंचतन्त्र को आधुनिक कहानी के निकट भी लाती है और उससे कुछ आगे भी ले जाती है। पंचतन्त्र ने अपने से पहले की पशुकथाओं की परम्परा का संचय तो किया है, उसने उनमें एक नयी बात भी पैदा की। पंचतन्त्र की कहानियों में मनुष्यजगत् जितनी विविधता के साथ चित्रित है, वह कहानियों को समकालीन बनाती है और आधुनिक भी। मानवीय व्यापार का पशुजगत् पर आरोप यहाँ एक विशिष्ट योजना और अभिप्राय के तहत किया गया है। इस योजना में मनुष्य और पशु एक - दूसरे के आमने - सामने आ खड़े होते हैं। पंचतन्त्र की इस योजना से कहानी का प्रतिमान भी उभरकर सामने आता है। कहानी के माध्यम से पंचतन्त्र मनुष्य की दुर्बलता, अक्षमता और मूर्खता को भी, तथा उसकी सामर्थ्य और कर्तृत्व को भी बहुत पैने व्यंग्य और उतनी ही गहरी संवेदनशीलता के साथ व्यक्त कर सका है। पशुप्रतीकों के कहानी में इस्तेमाल या पशुकथा की यह परम्परा जातक कथाओं, ईसप की नीतिकथाओं आदि से कुछ अलग है। यद्यपि ईसप और सिन्दबाद की कथाएँ भी अपने मूल रूप में हमारी कथापरम्परा में थीं, और यहीं से बाहर गयीं - ऐसा शोधकर्ताओं का कहना है। पंचतन्त्र की कथाएँ कथा परम्परा को विस्तार देती हैं - यहाँ पशुओं के द्वारा अन्योक्तिपरक शैली में मानवीय भाव ही व्यंजित नहीं किये गये। विशिष्ट मनुष्य स्वभावों और मानवीय जगत् के कार्य - व्यापारों का उन पर आरोप करते हुए पशु और मनुष्य को प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में एक - दूसरे के आमने - सामने लाकर खड़ा किया गया है। इसलिए पंचतन्त्र की इस विशिष्ट शैली में पशुओं के द्वारा मानवीय जगत् से साक्षात्कार ही नहीं, पशु की मनुष्यता और मनुष्य की पशुता को भी हम एक दूसरे के द्वन्द्व में देख पाते हैं। अधिकांश कथाओं में हम पशुपात्रों में व्यक्तित्व का दोहरापन देखते हैं। पंचतन्त्र की सभी कहानियों में केन्द्रीय विचार सूत्र रूप में पहले से उपस्थापित कर दिया गया है। उस सूत्र का दृष्टान्त कहानी है। यह शैली बोधकथाओं या नीतिकथाओं की है, और इसी कारण हमारे आचार्यों ने पंचतन्त्र को निदर्शना की विधा में परिगणित किया है। किन्तु पंचतन्त्र कथा के इस सूत्र या केन्द्रीय विचार को दो पात्रों की बहस का हिस्सा बनाते हुए कहानी की जीवनदृष्टि और कहानी का शिल्प दोनों को समरस कर देता है। इस सामरस्य में कहानी का पर्यवसान होता है। कथाशिल्प और कथादृष्टि का गुँथाव वैतालपंचविंशति की कुछ कहानियों में अधिक मँजे हुए रूप में मिलता है। इसकी कहानियों में अपनायी गयी कथाप्रक्रिया भी पंचतन्त्र की कहानियों से अधिक आकर्षक है। कहानी के समाप्त होते ही एक जटिल गुत्थी आ उपस्थित होती है। इस गुत्थी को खोलने में पूरी कथा का केन्द्रीय विचार खुलता है। पंचतन्त्र की कहानियों की तरह यहाँ केन्द्रीय विचार को सूत्रबद्ध करके पहले से नहीं कह दिया जाता। इस कारण कहानी की गुत्थी के समाधान की आकस्मिकता और विस्मयावहता का आस्वाद कुछ और ही होता है। साथ ही वैताल की कुछ कहानियाँ मनुष्य के अस्तित्व की अर्थवत्ता की पहचान और मनुष्य की गरिमा की स्थापना में कुछ और आगे तक भी जाती हैं, जिन्दगी से उनमें लगाव कई जगह अधिक गहरा लगता है। 2 वैदिक काल में रची गयी कथाओं से लगाकर महाभारत या बृहत्कथा तक की भारतीय कथा परम्परा में कहानी की मुँहजबानी बयान की शैली के दर्शन होते हैं। ब्राह्मणग्रन्थों में गद्य में लिखे गये आख्यानों में भी वाचिक शैली की खूबी हम पाते हैं, जहाँ व्यक्तिवाचक संज्ञाओं के स्थान पर सर्वनामों - इसका, उसका, यह, वह आदि का प्रयोग अधिक होता है। ऐसे गद्य रूपों को देखकर लगता है कि जिस प्रकार वेदमन्त्रों के विपुल भण्डार को कुछ हजार वर्षों की अवधि में पीढ़ी - दर - पीढ़ी कण्ठस्थ करते हुए हमारे पूर्वजों ने जस का तस बचाकर रखा, उसी तरह कहानी के गद्य को भी बिना पाठान्तर के जस का तस बचाया गया। बाद में जब अलंकृत शैली के साहित्यिक गद्य में कथाएँ लिखी जाने लगीं, तो कहानी की वाचिक शैली की यह विशेषता उनमें न रही। वहाँ कथा के सहज प्रवाह को काव्यात्मकता और शैली के श्रृंगार ने ढँक लिया। वैदिक परम्परा के कहानी के इस वाचिक रूप के दर्शन हमें बौद्धों के साहित्य में भी होते हैं। इस दृष्टि से बौद्ध अवदान साहित्य, जो अधिकांशतः गद्य में है, बहुत महत्त्वपूर्ण है। एक - एक अवदान आकार में बहुत विशाल है तथा कथाओं के बड़े भण्डार को समेटे हुए है। अशोकावदान, जिससे दो कथाएँ यहाँ ली गयी हैं, दिव्यावदान का एक अंश है। अशोकावदान की प्रत्येक कथा अपने आप में एक महाकाव्यात्मक और औपन्यासिक विस्तार समाहित किये हुए है। शार्दूलकर्णावदान में इसी प्रकार की एक सम्पूर्ण कथा है। शार्दूलकर्णावदान का चीनी भाषा में 148 ई. के आसपास अनुवाद किया गया। लोकप्रिय कथाओं की उपर्युक्त परम्परा को बौद्ध तथा जैन लेखकों ने उपदेशात्मक या धार्मिक रूप देकर प्रस्तुत किया है। दोनों धर्मों से जुड़े रचनाकारों ने कथासाहित्य को अपार समृद्धि दी। धार्मिक उद्देश्य से प्रेरित होते हुए भी ऐसे कथासाहित्य में अन्तरंग मानवीय अनुभूतियाँ तथा कहानी का कौतुक कम नहीं है। कुछ बौद्ध और जैन कथाओं में सामाजिक वास्तविकताओं के साक्षात्कार के साथ तीखा व्यंग्य भी मिलता है। इस दृष्टि से जैन लेखक हरिभद्र सूरि का धूर्ताख्यान एक उल्लेखनीय रचना है। हरिभद्र सूरि का कृतित्व 788 ई. से 820 ई. के बीच माना जाता है। वे विद्याधरकुल के आचार्य जिनदत्त के शिष्य थे। उनका जन्म चित्तौड़ में हुआ। जैन दर्शन के महान आचार्य और ग्रन्थकार के रूप में उनकी ख्याति है। कुवलयमाला कहा के लेखक उद्योतन उनके शिष्य थे। आरम्भ में ये ब्राह्मण थे, बाद में जैन धर्म के अनुयायी हुए। इनके लिखे 26 ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है, जिनमें से 20 प्रकाशित हुए हैं। कल्याण विजय के अनुसार हरिभद्र ने 88 ग्रन्थों का प्रणयन किया था। हरिभद्र ने संस्कृत तथा प्राकृत दोनों भाषाओं में समान अधिकार के साथ विपुल साहित्य की रचना की, तथा दार्शनिक ग्रन्थ भी लिखे और काव्यकृतियाँ भी। प्राकृत में धूर्ताख्यान के अतिरिक्त इनकी समराइच्चकहा समरादित्यकथा उल्लेखनीय है। सतियों या साध्वियों के चरित को लेकर जैन परम्परा में कई कथाचक्र प्रवर्तित हुए। नर्मदा सुन्दरी, मदनरेखा, विलासवती आदि श्रेष्ठ महिलाओं को अनेक कथाकाव्यों का विषय बनाया गया। इनमें नर्मदा सुन्दरी की कथा अत्यन्त मार्मिक है और यह लोकप्रिय भी बहुत हुई। इस पर कई जैन कथाकारों ने अपनी लेखनी चलायी। प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं में नर्मदा सुन्दरी कथा पर जो रचनाएँ लिखी गयीं, उनमें उल्लेखनीय ये हैं -  1. देवचन्द्रसूरिकृत प्राकृत तथा नम्मयासुन्दरी, 2. जिनप्रभसूरि की नम्मयासुन्दरी सन्धि, 3. महेन्द्रसूरि की नम्मयासुन्दरी - कथा - प्राकृत में तथा 4. मेरुसुन्दर की नर्मदा सुन्दरी कथा प्राचीन गुजराती गद्य में। इनमें महेन्द्रसूरि की कथा गद्य और पद्य मिलाकर लिखी गयी है, यह अत्यन्त विस्तृत और विशद है। कथानक का सम्पूर्ण औपन्यासिक विस्तार की सम्भावनाएँ इसमें प्रतिफलित हैं। यह कथा विक्रम संवत् 1187 - 1130 ई. में रची गयी थी। देवचन्द्रसूरि की नम्मयासुन्दरी कथा कुछ संक्षिप्त है, पर यह भी बड़ी सरस है और मूल कथा का पूरा आस्वाद देती है। देवचन्द्रसूरि आचार्य हेमचन्द्र के गुरु थे। हेमचन्द्र जैनधर्म तथा दर्शन और साहित्यशास्त्र के प्रख्यात आचार्य हैं, जिनका समय 1088 ई. से 1172 ई. है। इस दृष्टि से देवचन्द्रसूरि का समय भी ग्यारहवीं सदी है। वस्तुतः जैन परम्परा में कथासाहित्य का अत्यन्त विशाल भण्डार है। कथा कोषप्रकरण तथा कहारयणकोश इस परम्परा के महत्त्वपूर्ण परवर्ती कथासंग्रह हैं, जिनसे एक - एक कहानी यहाँ ली गयी है। उत्तमकुमारचरित या पापबुद्धिधर्मबुद्धिकथा जैसी जैन कथा रचनाएँ उपदेश - प्रधान हैं, जबकि जिनकीर्ति जैसे लेखकों की रची हुई चम्पक श्रेष्ठ कथानक या पाल - गोपाल - कथानक जैसी कथाएँ चमत्कारपूर्ण फन्तासी कथाएँ हैं। भारतीय कहानी के विकास में जैन प्रबन्धकाव्यों का भी उल्लेख्य योगदान रहा है। इन प्रबन्धकाव्यों की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है तथा इनमें जैन सन्तों या जैन धर्म के अनुयायी राजाओं से जुड़ी हुई कथाओं को प्रमुखता दी गयी है। इस प्रकार के प्रबन्ध - काव्यों में मेरुतुंगाचार्य का प्रबन्धचिन्तामणि रचनाकाल 1306 ई. तथा राजशेखर सूरि का प्रबन्धकोश रचनाकाल 1348 ई. बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक राजा या सन्त के चरित्र से जुड़ी हुई छोटी - छोटी कथाओं के समुच्चय को यहाँ एक प्रबन्ध कहा गया है। मेरुतुंग की कृति में विक्रमादित्य और सातवाहन चालुक्यराज, धारानगरी के परमार राजा मुण्ड और भोज आदि राजाओं के प्रबन्ध हैं। राजशेखर सूरि की कथाकृति में कुल चौबीस प्रबन्ध हैं। इनमें सात प्रबन्ध विभिन्न राजाओं को लेकर, दस प्रबन्ध विभिन्न धार्मिक सन्तों या आचार्यों को लेकर तथा कुछ प्रबन्ध कवियों को लेकर हैं। जैन साहित्य के अन्तर्गत कथाओं का एक अन्य उल्लेख्य संग्रह कथामहोदधि है, जिसमें 126 कथाएँ हैं। 3 कथा परम्परा का एक रोचक कथा संग्रह भरटकद्वात्रिंशिका है। यह पुस्तक अभी तक भारत में अप्राप्य थी, प्रस्तुत लेखक ने चार वर्ष पूर्व इसका एक संस्करण हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया है। भरटकद्वात्रिंशिका की कथाएँ कहानी कहने की वाचिक शैली में निबद्ध हैं। इसकी प्राचीन पोथियों में बताया गया है कि इन कथाओं को श्री सोमसुन्दर के शिष्य श्री साधुराज से सुनकर उन्हीं के किसी शिष्य ने लिखा। हर्तेल नामक जर्मन विद्वान ने, जिन्होंने इस पुस्तक का पहला संस्करण 1922 ई. में जर्मनी से छपवाया था, भरटकद्वात्रिंशिका का रचनाकाल चौदहवीं सदी माना है। सम्भवतः यह पुस्तक इसके भी पहले की रचना है। भरटकद्वात्रिंशिका में बत्तीस कहानियाँ हैं। भरटक शिवभक्त साधुओं का एक प्राचीन सम्प्रदाय है। ये साधु अक्खड़ और जड़बुद्धि होने के कारण समाज में उपहास के पात्र भी बनते थे। भरटकद्वात्रिंशिका में इन्हीं भरटकों की मूर्खता के 32 किस्से हैं। मूर्खों की कहानियों की संस्कृत में यह अकेली अपने ढंग की किताब है। संस्कृत - कथा परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण आयाम चौदहवीं सदी के मैथिल और संस्कृत भाषाओं के सुप्रसिद्ध रचनाकार महाकवि विद्यापति ने अपनी पुरुष - परीक्षा में प्रस्तुत किया है। पुरुष परीक्षा में इकतालीस लोकप्रिय कहानियाँ हैं। इन कहानियों का स्वर लोककथाओं के अधिक निकट है, पर विद्यापति की कल्पनाशीलता, विनोदबुद्धि और निजी कथाशैली की छाप इस संग्रह की सारी कहानियों पर स्पष्ट है। इसके साथ ही विद्यापति की कहानियाँ विविधता और मानव - स्वभाव की विचित्रता के चित्रण की दृष्टि से बड़ी सम्पन्न हैं। कुल मिलाकर देखें, भारतीय कथा परम्परा के सम्पन्न और विराट फलक को लेकर पात्रों और चरित्रों की विविधता तथा विचित्रता, कथा संविधान, कथाप्रस्तुति की हमारी अपनी विशिष्ट शैली तथा दुर्लभ ऐतिहासिक तथा सामाजिक विषयवस्तु के कारण महत्त्वपूर्ण हैं ही, वे अपनी प्रतीकात्मकता, भारतीय जीवनदृष्टि और मूल्यबोध को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करने के कारण भी आज के पाठक के लिए एक जरूरी सामग्री प्रस्तुत करती हैं।

कफन

रोहिणी अग्रवाल 

’ कफ़न’ प्रेमचंद की ही नहीं, समूचे हिंदी साहित्य की सर्वाधिक चर्चित कहानी है। 1936 में रचित यह कहानी हिंदी साहित्य की ऐसी पहली रचना है जो अपने केंद्रीय पात्रों को न औदात्य प्रदान करती है, न अतिरिक्त संवेदना। निःसंदेह यह कहानी लेखकीय तटस्थता का उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ लेखकीय हस्तक्षेप और पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए पात्रों को उनकी स्वाभाविक किंतु संश्लिष्ट रंग - रेखाओं में रचा गया है। दरअसल यही वह बिंदु भी है जहाँ इस कहानी का विरोध भी हुआ है और इसे दलितविरोधी रचना कह कर खारिज करने का प्रयास भी किया गया है।
गुलज़ार निर्देशित कफ़न का एक दृश्य
’ कफ़न’ प्रथमदृष्ट्या घीसू - माधव, पिता - पुत्र, की संवेदनहीनता और भावनात्मक क्रूरता की कहानी कही जा सकती है। जाड़ों की रात की घनघोर निस्तब्धता में अकेले अपने झोंपड़े में प्रसव वेदना से छटपटाती बुधिया के समानांतर उसके घर के दोनों पुरुष सदस्य - पति एवं ससुर उसके कष्ट से बेपरवाह आग में आलू भून कर खा रहे हैं। कहानी के प्रारंभ में ही इस हृदयविदारक दृश्य की नियोजना कर प्रेमचंद मानो पाठक से संवेदनशील ढंग से विचार - क्षेत्र में उतरने की मांग करते हैं। उन्हें अपेक्षा है कि पाठक उनकी अन्य कहानियों की तरह यहां भावना और कर्तव्यपरायणता के बीच आदर्श और यथार्थ की मुठभेड़¸ के जरिए चरित्र चित्रण के पारंपरिक फार्मूले की उम्मीद न करें, बल्कि एक ऐसी क्रूर सच्चाई के साक्षात्कार के लिए प्रस्तुत रहें जो भावना, कर्तव्य और तर्क की हर धार काट कर अपने इर्द - गिर्द निबिड़तम अंधकार की ही सृष्टि करती है। ऊपरी तौर पर कहानी अति संक्षिप्त है। बुधिया की दर्दनाक मौत के बाद घीसू - माधव द्वारा कफन के लिए अनुनय - विनय से जमा किए गए पांच रुपयों को शराब और पूड़ी - कचैड़ी में उड़ा देने की। लेकिन भीतरी तहों में संश्लिष्ट से संश्लिष्टतर होती चलती यह कहानी पात्रों के मनोविज्ञान - अध्ययन से आगे समाज - व्यवस्था के विश्लेषण का आधार बन जाती है।
प्रेमचंद की विशेषता है कि उन्होंने घटनाओं के अभाव को सुदृढ़ चरित्र चित्रण से भरने की सफल कोशिश की है। आलस्य, निकम्मापन, कामचोरी और झूठ का पुलिंदा हैं घीसू - माधव जो वस्तुतः दो अलग पात्र हैं ही नहीं, एक ही भाव अथवा स्थिति का विस्तार हैं। काम करने से ज्यादा आराम की फिक्र या इस - उस खेत से दांव लगने पर आलू - मटर - ईख चुरा कर खाने की लत ने उनकी काया के साथ - साथ उनकी आकाश - वृत्ति को भी पाला - पोसा है। उनमें न आत्मसम्मान का भाव बचा है न संबंध को समझने और निभाने की सदाशयता। पेट उनके लिए दुनिया का सबसे बड़ा सच है, लेकिन जो लोग उनके पेट का गड्डा भरने में सहायक हैं। उनके प्रति इनके मन में कृतज्ञता या दायित्व का कोई बोध नहीं। कहानीकार नहीं बताते कि घीसू की पत्नी कब और कैसे मरी, लेकिन भरपूर श्रमपूर्वक गृहस्थी की गाड़ी खींचने वाली बुधिया प्रसवावस्था में जिस तरह एड़ियां रगड़ - रगड़ कर मरी है, उससे स्पष्ट है कि पिता - पुत्र अपने से इतर अन्य किसी के प्राणों और भावनाओं को लेकर चिंतित नहीं। ’बेगैरत’ कह कर लेखक ने ठीक ही अपना आक्रोश उन पर उंडेला है। एक - दूसरे से ज्यादा हिस्सा खाने की लालसा में गर्म - गर्म आलुओं को जीभ पर रखते और फिर जल्दी - जल्दी निगलने के प्रयास में आंखों से आंसू छलकाते इन पिता - पुत्र का जो दृश्य प्रेमचंद ने शब्दों के माध्यम से उकेरा है, वह किसी कुशल चित्रकार की तूलिका से निकली कालजयी कृति से कम नहीं।
अंतर इतना है कि वे इसे वहीं जड़वत् नहीं करते, बल्कि पात्र के भीतर तक उतरते हुए उसमें प्राण - प्रतिष्ठा भी कर जाते हैं। दो उदाहरण दृष्टव्य हैं। एक, बुधिया की कराहों के बीच आलू खाते हुए हठात् माधव थम गया है। इस सवाल ने उसे बेचैन कर दिया है कि यदि कोई बाल - बच्चा हुआ तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल,कुछ भी तो नहीं है घर में ...। यह पिता बनने के नवबोध के साथ विकसित हुई दायित्व भावना है, और पत्नी एवं अजन्मे बालक के साथ अनाम ममत्व के अंकुरण का बिंदु भी। साथ ही बच्चे की परवरिश की चिंता और अपनी संसाधनहीनता स्थिति के अंतर्विरोध ने उसे थर्रा दिया है। इस भयावह यथार्थ ने उसे यह ज्ञान भी दिया है कि सीमित संसाधनों का ज्यादा हिस्सों में बंटवारा उनकी पेट की ज्वाला को कभी शांत नहीं कर पाएगा।
दूसरा उदाहरण है, आलू खाने के इसी परिदृश्य के भीतर घीसू का बीस बरस पहले ठाकुर की बारात में दावत उड़ाने का प्रसंग। प्रेमचंद ने रस ले - ले कर इस दावत में उड़ाए जाने वाले भोज्य पदार्थों का वर्णन किया है। असली घी की पूड़ियां, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, चटनी, दही, मिठाई, पान - इलायची, मानो यही रस घीसू के जीवन की एकमात्र उपलब्धि हो। यहां हठात् एक ही चित्र में पर्यवसित होते पिता - पुत्र को लेखक दो फांकों में विभाजित कर देते हैं। अब तक हाँ में हाँ मिलाने की तरह एक ही दिशा में बढ़ता दोनों का एकालाप प्रश्नोत्तर बन कर एक - दूसरे के सामने आ खड़ा होता है, जिसमें संवाद से ज्यादा अपने - अपने स्तर पर तृप्ति और अतृप्ति, उपलब्धि और तृष्णा की भावना बलवती है। घीसू की स्मृति में खाए गए पकवानों का स्वाद और सुगंध के साथ - साथ तृप्ति का अलौकिक भाव है। माधव की लार टपकाती जिज्ञासा में सुअवसर जुड़ने पर इन सारे पकवानों को पिता से दूना खा जाने की तृष्णा।
’ तुमने बीस पूरियां खाईं होंगी’
’बीस से ज्यादा खाईं थीं’
’ मैं पचास खा जाता’
बातों से पेट भरने वाले घीसू - माधव को इस दृश्य में अंकित कर प्रेमचंद दो प्रयोजन सिद्ध करते हैं। एक इस मनोवैज्ञानिक तथ्य की ओर संकेत कि भूख अहर्निश जलने वाली ऐसी विकराल भट्ठी है जो अन्न के अभाव में मनुष्य की संवेदनाओं के साथ - साथ उसकी मनुष्यता को भी लील जाती है। भूखा व्यक्ति भूखा रह जाने के कारणों का विश्लेषण नहीं करता, कर पाता तो संभवताः भूखा भी न रहता। लेकिन भूख के हाथों धीरे - धीरे ऐसे नरपशु में तब्दील होने लगता है जिसके लिए ’ मैं’ं  समूची सृष्टि का पर्याय बन जाता है। उम्र अधिक होने के कारण घीसू ने भूख की विकरालता को माधव की अपेक्षा अधिक झेला है, इसलिए माधव की अपेक्षा वह अधिक ढीठ, निर्लज्ज और निर्द्वन्द्व  हुआ है। वही अभिनय कर - करके कफन के लिए रुपए बटोरता है और संशयी माधव को हर स्थिति में शांत और अविचल रहने की मंत्रणा देता है। माधव के सामने भावना के दुर्बल क्षणों में कल की चिंता और पाप - पुण्य का संस्कार सवाल बन कर आ खड़ा होता है, लेकिन इन सब से निर्लिप्त घीसू ’ क्षण’ से परे किसी भी वस्तु - सत्य को देख ही नहीं पाता। अनुभव ने उसे बताया है कि जन्म और मृत्यु जैसी भौतिक - सामाजिक अनिवार्यताएं अपने आप विधि - विधान से संपन्न हो जाती हैं, इसलिए वह सिर्फ अपनी भूख पर केंद्रित है जिसे लेकर समाज को कोई सरोकार नहीं।
दूसरा, भूख को मनुष्य की बुनियादी जरूरत साबित कर प्रेमचंद इस दृश्य की तार्किक परिणति के रूप में कहानी के दूसरे महत्वपूर्ण दृश्य की नियोजना संभव कर पाते हैं। दावत की स्मृति ने घीसू - माधव की स्वाद - ग्रंथियों और अंतड़ियों की बिलबिलाहट को ही तीव्रतर नहीं किया है, बल्कि ऐसे किसी भी अवसर का जुगाड़ करने का कुटिल बोध भी विकसित किया है, क्योंकि वे जानते हैं बीस साल में जमाना बदल गया है। ’अब कोई क्या खिलाएगा’  ¸ ¸ अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी - ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर - बटोर कर कहां रखोगे? इसलिए पांच रूपए जैसी ’बड़ी’ रकम के बावजूद बाजार भर में कफन के लिए सूती - रेशमी किसी भी तरह का कपड़ा न जंचना, और किसी अज्ञात प्रेरणा के परिणामस्वरूप सांझ ढलते न ढलते मदिरालय के सामने आ खड़ा होना अस्वाभाविक नहीं। पांच रुपयों के रूप में मेहरबान हुए इस ’अनपेक्षित सौभाग्य’ को वे कैसे छिटक कर चिता की आग में जलने दें? उल्लेखनीय है कि नर - पशु सरीखा चित्रित करने के बावजूद प्रेमचंद उन्हें निरा जानवर नहीं बनाते। उनके भीतर धड़कता ’ मनुष्य’ उन्हें अपनी करनी पर अपराध - बोध दे रहा है। इसलिए वे एक - दूसरे को नहीं,अपने आप को दिलासा देकर दोषमुक्त कर लेना चाहते हैं कि ’कफन’ लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता ... तथा बड़े आदमियों के पास धन हैं, फूकें। हमारे पास फूंकने को क्या है? इसी प्रयास की अगली कड़ी के रूप में ईश्वर से बुधिया को बैकुंठवासी करने का अनुरोध भी है क्योंकि उन्होंने बेशक अपनी जिंदगी में कोई पुण्य न किया हो, बुधिया ने मर कर भी उन्हें भरपेट भोजन करने की तृप्ति दी है - भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आर्शीवाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला, वह उम्र भर न मिला था...।
चुरा कर लाए गए गर्मागर्म आलू भकोसने का दृश्य जहाँ घीसू - माधव की सामाजिक स्थिति स्पष्ट करता है, वहीं मदिरालय में झूम - झूम कर मौज मनाने का दृश्य सामाजिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप आकार लेने वाली अंतःवृत्तियों को उजागर करता है। लेखक ने दोनों को कामचोर बनाया है लेकिन कफनचोर की संज्ञा देते उन्हें संकोच होता है,इसलिए वे घीसू - माधव के साथ मिल कर जर्जर धार्मिक रूढ़ियों को कोसते हैं कि ’जिसे जीते - जी तन ढांकने को चीथड़ा भी न मिले उसे मरने पर नया कफन क्यों चाहिए’ और फिर उनकी दबी भलमनसाहत को उजागर करने की चेष्टा भी करते हैं कि ’यही पांच रुपये पहले मिलते तो कुछ दवा - दारु करा लेते’ ...।
प्रेमचंद की ताकत यह है कि कथा में कहीं उपस्थित न होते हुए भी वे पाठक के हृदय में इन दोनों अभागों के प्रति सहानुभूति पैदा करते हैं। भारतीय सामंती समाज की मनोरचना से परिचित पाठक जानता है कि संपन्न वर्ग जिस अधिकार से हाशिग्रस्त अस्मिताओं का शोषण करता है,उतने ही कृपा भाव से खैरात के रूप में कुछ सिक्के उनकी ओर उछाल देता है। यह कृपा दयार्द्र होकर उनकी स्थिति सुधारने की चेतना का परिणाम नहीं, बल्कि अपनी ’प्रजा’ को उतना भर देने की सुनियोजित युक्ति है जिससे वे दुस्साध्य श्रम करने के लिए जिंदा रह सकें, व्यक्तिगत तौर पर अपनी जिंदगी का सुख न भोग पाएं, इसलिए पाठक भी घीसू - माधव की तरह अंतस से निकली गहरी इच्छा की व्यर्थता समझता है, क्योंकि जानता है जीवित बुधिया के इलाज के लिए कोई भी धनकुबेर अपनी दानवीरता का प्रदर्शन नहीं करता। सांझ के धुंधलके में जब पिता - पुत्र के पैर मदिरालय की ओर खिंचे चलते हैं, तब वह सतही तौर पर भले ही उनकी गैरजिम्मेदारी पर क्षुब्ध होता हो, भली भांति जानता है कि वे दोनों इस समय भीतर ही भीतर आक्रोश की आग में  कैसे झुलस रहे हैं। जिस व्यवस्था ने अपने हितों को चाक चैबंद रखने के लिए उनसे उनकी सारी बुनियादी जरूरतें छीनी हैं, उसी व्यवस्था से पांच रुपए पाकर वे अपने को उसके नियमों में क्यों बांधे? इसलिए आश्चर्य नहीं कि घीसू - माधव उस रकम पर न केवल ’शाही दावत’ उड़ाते हैं, बल्कि बची हुई पूड़ियों की पत्तल उठा कर भिखारी को दान में भी देते है। पूड़ियों ने उनकी भूख मिटाई है और दान देने की क्रिया ने उनके दमित स्वाभिमान को सहलाया है। लेखक कथा में प्रविष्ट होकर देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव करते। घीसू - माधव की इस गद्गद् अवस्था का चित्रण करने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। उल्लेखनीय है कि यहां ’देने’ की क्रिया में अहंकार की टंकार नहीं है, बल्कि दूसरे की भूख मिटा कर उसे तृप्ति देने की मानसिक तृप्ति और शांति है, इसलिए घीसू - माधव बुधिया को नहीं, बल्कि प्रेमचंद घीसू - माधव को अभयदान दे रहे हैं कि हां बेटा, बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते - मरते हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह बैकुंठ में न जाएगी तो क्या ये मोटे - मोटे लोग जाएंगे जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ते हैं ...।
’कफन’ कहानी व्यवस्था की सांस्कृतिक छलनाओं को उधेड़ने में भी कोर - कसर नहीं छोड़ती। कहानी मानो सवाल उठाती है कि किसानों की दुर्बलता,भाग्यवाद और पुनर्जन्म में विश्वास, का लाभ उठा कर जिस प्रकार शोषक वर्ग उन्हें लूटता आया है, उसी प्रकार वर्चस्ववादियों के सांस्कृतिक आभिजात्य और पाखंड का लाभ उठा कर यदि हाशिए की ये अनंतिम अस्मिताएं अपनी उदरपूर्ति कर रही हैं तो सिर्फ उन्हें ही अमानुषिक और क्रूर कह कर गरियाने का क्या औचित्य है? परलोक में कफनहीन बुधिया की दुर्गति की आशंका के संदर्भ में प्रेमचंद जिस टोन में संवादों की नियोजना करते हैं, वहां कफन मिलने का विश्वास ही घीसू - माधव की तथाकथित उच्छृंखलता का कारण बनता है, लेकिन ’ कफ़न’ कहानी जो सतह पर है, उसे देखने से इंकार करती है और सिक्के के दूसरे पहलू सरीखे अनुपस्थित सच को सामने लाती है -’ तू कैसे जानता है कि उसे कफन न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूं? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा’ घीसू का यह विश्वास दरअसल संपन्न वर्ग के धार्मिक पाखंड का ही निदर्शन करता है जिसके लिए तीर्थस्थानों पर धर्मशालाएं, मंदिर आदि बनवाने की तरह मृतकों के दाह - संस्कार की व्यवस्था करना पुण्य लूटने की आसान कवायद है। कहानी मानो इस तथ्य की ओर संकेत करना चाहती है कि धर्माचार मृत्यु को न्यूनतम सम्मान देकर ही संपन्न नहीं हो जाता, बल्कि इसका वास्तविक लक्ष्य मौत की ओर रेंगते जीवन को संवार कर पुनः जीने के उल्लास और उत्साह से अभिषिक्त कर देना है। आज जिस तेजी से गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, उससे ’ कफन’ कहानी एक गंभीर चेतावनी के रूप में समाज के सामने आती है।
स्पष्ट है कि घटनाओं की विरलता के बावजूद अंतिम दृश्य तक आते - आते कहानी इकहरी व सीधी नहीं रहती। यह एक परिवार की त्रासदी नहीं, हमारी समाज - व्यवस्था के आंतरिक खोखलेपन की कहानी बन जाती है। घीसू - माधव के प्रथम परिचय में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल करने के कारण ’ कफन’ कहानी दलित समाज की भयावह जीवन परिस्थितियों की आख्यायिका लग सकती है, लेकिन असल में इसे प्रेमचंद - साहित्य में चित्रित किसान की निरंतर क्षरणशील सामाजिक स्थिति के समानांतर देखा जाना चाहिए। हिंदू समाज की शुद्धतावादी सांस्कृतिक संरचना ’ठाकुर का कुआँ’ कहानी में ’जंगी’ और ’सद्गति’् कहानी में ’दुखी’ जैसे पात्रों की जिंदगी में एक अलग तरह की विभीषिका रचती है, लेकिन इनसे अलग ’कफन’ कहानी में घीसू - माधव की काहिली और तज्जन्य अभावग्रस्तता सामाजिक - आर्थिक व्यवस्था के शोषण की उस दुर्भेद्य कड़ी की ओर संकेत करती है जो ’सवा सेर गेंहूं’ कहानी के शंकर की तरह पहले किसान को ऋणग्रस्तता की चपेट में लेकर मजदूर बनाती है, फिर कई पीढ़ियों तक उसकी संतति को बंधुआ मजदूर बना कर उनसे जीने का अधिकार छीन लेती है। प्रेमचंद ने प्रत्यक्षतया घीसू - माधव को पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली ऐसी किसी ऋणग्रस्तता और बंधुआगिरी के चक्कर में फंसा नहीं दिखाया है, लेकिन इस संभावना से भी इंकार नहीं किया है कि उनका यह कदम ’कामचोरी’ अमानुषिक व्यवस्था के सामने घुटने न टेकने का आत्मघाती निर्णय ही है। वे लिखते हैं - जिस समाज में रात - दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना चाहते थे। कहीं ज्यादा संपन्न थे। यहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान था और किसानों के विचारशून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम से कम उसे किसानों की सी जी तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते ... इस प्रकार जैसे ही शंकर के सामाजिक - आर्थिक उत्पीड़न की अगली कड़ी के रूप में घीसू को देखने का बोध पनपता है, वह अपनी तमाम अजगरी - वृत्ति और संवेदनहीनता के बावजूद पाठकीय घृण का पात्र नहीं रहता, बल्कि एक सुलगता सवाल बन जाता है कि मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीन कर संभ्रांत बनी रहने वाली इस आदमखोर व्यवस्था के संवर्धन में कहीं हमारी अपनी भूमिका तो नहीं?
’ कफन’ कहानी प्रेमचंद की कहानी - कला का उत्कृष्ट नमूना होते हुए भी कुछ सवाल मन में उठाती है, विशेषकर कहानी की बुनियादी घटना को लेकर कि क्या सच में कोई व्यक्ति इतना संवेदनहीन हो सकता है कि घर की गाड़ी खींचने वाली स्त्री अथवा किसी भी प्राणी की दर्दनाक मौत को यूं निर्विकार देखता रहे। दूसरे, भारतीय परिवारों और समाज की जैसी संरचना है, उसमें सामुदायिक भावना की प्रबलता है। परिवार में स्ति्रयाँ न हों तो अड़ोस - पड़ोस की स्ति्रयाँ हारी - बीमारी या प्रसूति में बिना बुलाए ही मदद को आ जाती हैं। ऐसे में बुधिया का अकेले तड़प - तड़प कर दम तोड़ना नितांत अविश्वसनीय लगता है,चूंकि कहानी दलित वर्ग की एक जाति विशेष को संबोधित है, इसलिए दलित चिंतक इन दोनों सवालों को आरोपों की तरह लेते हैं और कहानी की वैधता को प्रश्नांकित करते हुए इसे समाज में द्वेष फैलाने की एक युक्ति मानते हैं। तमाम अभिधार्थों से विरत होकर यदि कहानी की अनुगूंजों को ध्यानपूर्वक सुना जाए तो कहानी जाति, गोत्र और धर्म की हदबंदियों से मुक्त होकर समाज के हर उस आखिरी प्राणी की कहानी बन जाती है जिसकी मनुष्यता का आखेट सुनियोजित षड्यंत्रों के तहत बहुत सोच विचार कर पीढ़ियों के किया जाता रहा है। अपनी आंतरिक संरचना में यह एक लाश को कफन मुहैया कराने की कहानी भर नहीं है, बल्कि इस कटु सत्य की ओर हमारी बेपरवाही का संकेत करती है कि हमारी समाज - व्यवस्था मर कर सड़ांध फैला रही है और अपनी खामख्यालियों में जीते हुए हम न उसकी मौत के वस्तु सत्य को स्वीकार कर पा रहे हैं न उसके अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर रहे हैं और न ही उसके स्थान पर किसी बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं।
इस प्रकार यह कहानी अपनी परिधि का विस्तार करते हुए किसी एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं, व्यवस्था की मौत का हैबतनाक अफसाना बन जाती है।

मजबूरी

सीमा जैन 

मंदिर में बहुत भव्य आयोजन हो रहा था। नये मंदिर का निर्माण हुआ था। सब ने दिल खोलकर दान दिया था। सच पूछो तो मुझे समझ नहीं आता पहले ही इतने मंदिर हैं। उनके रखरखाव ठीक से होते नहीं और नये मंदिरों का निर्माण करना क्यों आवश्यक है। खैर मम्मी जी ने एक लाख दान दिए थे और उनका मान - सम्मान हो रहा था स्टेज पर। उनकी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए हमें भोपाल से गाजियाबाद बुलाया गया था। बच्चों की परीक्षा अगले हफ्ते से हैं। एक - एक पैसे को बहुत ध्यान से खर्च करने वाले, हम पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है इस यात्रा से, इसका उन्हें कोई अंदाजा नहीं। कहीं ना कहीं मुझे लगता है यह सब भक्ति वश नहीं किया गया बल्कि इस सम्मान की इच्छा से किया गया है। कल तक तो बिस्तर पर पड़ी थी और आज नई साड़ी में स्टेज पर खड़ी कितनी प्रसन्न हो रही हैं। शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मैं शादी के बाद पंद्रह साल मम्मी जी, पिताजी के साथ गाजियाबाद रह चुकी हूं। तब रमेश जी की पोस्टिंग यहीं थी, बहुत कम तनख्वाह मिलती है इनको इसलिए उस समय घर खर्चा मम्मी जी पिताजी चलाते थे। दोनों की नौकरी अच्छी थी। मैं नौकरी करना चाहती थी लेकिन मम्मी जी ने साफ  इंकार कर दिया - नहीं बहू ,घर का काम तुम संभालो, कमाने के लिए हम बहुत हैं।
इसका मुझे बहुत खामियाजा चुकाना पड़ा। घर के सारे काम धीरे - धीरे मेरे ऊपर लाद दिए, जो भी काम वाली लगा रखी थी सब निकाल दी। क्या जरूरत है कहकर। इस बीच दो बच्चों को भी जन्म दिया। बस पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर मम्मी जी ने अपना कर्तव्य निभा दिया। उनकी धौंस और ताने सब सहने पड़ते, मजबूरी ऐसी थी। मजबूरी से बड़ा दुश्मन इंसान का कोई नहीं होता।
पंद्रह साल बाद रमेश जी का तबादला भोपाल हो गया। मम्मी जी चाहती थी, मैं बच्चों के साथ उनके पास गाजियाबाद में ही रहूं। पहली बार जिंदगी में मैं उनकी बात नहीं मान सकीं। रमेश जी की तबीयत ठीक नहीं रहती थी, उन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं होता। बहुत कलेश किया मम्मी जी ने। लेकिन पति के लिए पहली बार चट्टान के समान खड़ा होना पड़ा। उनके ही अभिभावकों के सामने। बहुत गुस्सा हुई, एक साल तक बात नहीं की मम्मी जी ने। फिर भोपाल आईं हमारे घर कुछ दिन रहने। घर देखते ही मुंह बना कर बोली - क्या बेकार से घर में रह रहे हो। महाराजाओं की तरह रख रखा था, लेकिन कुछ लोग को अमीरी रास नहीं आती। अच्छा यह बताओ यहां घूमने के क्या स्थान है।
सरकारी आवास था बहुत निम्न स्तर का था। लेकिन हम शुक्रगुजार थे। सिर पर छत तो थी। धीरे - धीरे सामान भी इक्ट्ठा कर रहे थे। बच्चों की पढ़ाई का भी पूरा खर्चा था।
यहां पानी और साबुन से पता नहीं किस से एलर्जी हो गई हाथों में मेरे। डॉक्टर ने कहा- कम से कम पानी में हाथ डालो। दोनों बच्चे बड़े हो रहे हैं, समझदार भी हैं। काम बांट लिये। अपने - अपने कपड़े और खाने के बर्तन वे स्वयं धोने लगे। ऐसे ही पतिदेव भी जितने कामों में हाथ बटा सकते थे, मदद करते। कपड़े धोने की मशीन भी सोच रहे थे, खरीद लेंगे। अब मम्मी जी ने इस स्थिति पर भी बवाल मचा दिया। उन्होंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया - पांच दिन के लिए क्या आई हूं , एक दिन का सुख नसीब नहीं बेटे के पास। कभी जिंदगी में कपड़े नहीं धोए, स्वयं यहां कपड़े और बर्तन भी धोओं।
मैंने प्रेम से कहा - नहीं मम्मी जी, पांच दिन की बात है। आप परेशान मत हो। मैं आपके और पिताजी के कपड़े और बर्तन धो दिया करूंगी। वे मुंह बनाकर बोली- मशीन क्यों नहीं ले लेते हो।
मैंने कहा - बस थोड़ी स्थिति संभल जाए फिर देखते हैं।
बाद में पिताजी की कमरे से फुसफुसाने की आवाज आ रही थी- दिला देते हैं मशीन, बेकार बच्चे परेशान हो रहे हैं। यहां आए हैं तो कुछ देकर भी तो जाना चाहिए हमें। मम्मी जी गुस्से में बोली - तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है, बहुत अकड़ दिखा कर आए थे। हो सकता है अकल ठिकाने आ जाए, तो वापस आ जाएंगे। और बहू की आदत मत खराब करो। एक बार कुछ देकर जाएंगे। हर बार उम्मीद लगा कर बैठी रहेगी।
मशीन तो खैर हमने उधार पर तीन महीने बाद ले ली और मैंने एक छोटी सी नौकरी भी कर ली। धन्ना सेठ तो नहीं हो गए लेकिन घर खर्चे में कुछ आराम मिल गया। मम्मी जी का आदेश आया था तुरंत टिकट करा कर गाजियाबाद आओ। इतना बड़ा सम्मान मिल रहा है। परिवार के सब सदस्यों का होना आवश्यक है। सम्मानित होकर मम्मी जी मेरे पास आकर बैठ गई और बड़े शान से बोली - देखा समाज में कितनी इज्जत मिल रही है हमको? हमने निश्चय किया है अब अपने ऊपर खर्च करेंगे। अपने शौक पूरे करेंगे। आखिर तुम लोगों पर लुटा कर हमें मिलना क्या है। हमारे मरने के बाद तो तुमको सब मिल ही जाएगा।
समझ नहीं आता इस औरत का मान मैं अपने दिल से कैसे करूं? मैंने अपना चेहरा अपने बच्चों की तरह मोड़ लिया। वे हंस हंस कर अपने हमउम्र बच्चों के साथ बतिया रहे थे।

गोमती

भोलाराम सिन्हा गुरुजी

सोनसाय अपन गांव के बड़का किसान आय। एखर कन सब्बो खार म खेत अउ बोर रिहिस । बड़ घमंडी, घुस्सेलहा,कपटी रिहिस। नान नान बात म नानहे किसान मन बर भड़क जाय। भड़के त ओखर आँखी लाल लाल हो जाय, कर्रा - कर्रा मेछा ल अइड़त रेंगय। नौकर चाकर, बड़े- बड़े घर राहय। गॉव म कोनो किसान सोनसाय ल पूछे बिना काम नई कर सकय। कर्जा बोड़ी म गांव के नानहे किसान मन बोजावत रिहिस। समारू बड़ मेहनत करइयां गुणी नानहे किसान आय। ओखर खेत ह सोनसाय के खेत कना हावय। सोनसाय ह समारू ले बड़ जलय काबर कि ओह किसानी काम ल सुघ्घर करय। एको एको बछर एकात पानी टोर दे, त सोनसाय के भाग जाग जाय।
यहू बछर एक पानी टोर दे हे। मेछा अइठत पान खावत सोंचत हावय - अब नानहे किसान मन मोर कन ले पानी मागही।
समारू मुधरहा ले उठ जाय संगे संग ओखर बेटी गोमती तको उठय।
समारू अपन बेटी ल किहिस - बेटी गोमती झटकुन चाय बनादे, चाय पी के सोनसाय कना जाहू।
गोमती चाय बना के अपन ददा ल दिस।
- एक पानी पलोय ल लागही का ददा। गोमती किहिस।
- हव बेटी, सोनसाय कना जाथौं पानी मांगे बर।
टीबी म गाना देखत सोनसाय ह चाय पियत झुमत अपनो गात हवे।
- सोनसाय घर म हावस का जी। समारू चिल्लाइस।
- मोला कोन चिल्लावत हावय रे जा तो देख, सोनसाय अपन नौकर ल किहिस।
- समारू हरे मालिक। नौकर बताइस।
- ओला बैठक खोली म बैठार रे। सोनसाय किहिस
समारू बैठक खोली म गुणत रहय, कि यहू बछर एक पानी टोर दे हे,ये बछर मोला सोनसाय पानी दिही की नई दिही,के पानी लागही मोला।
- का सोचत हस समारू, काबर आहस तेला झटकुन बता,मोर कन अड़बड़  बुता काम हावय। सोनसाय किहिस।
पानी मांगे बर आ हो जी,खेत म एक पानी पलोय ल लागही,तेहां एक पानी पलो देबे त मोर धान ह सोला आना हो जही। समारू किहिस।
सोनसाय मेछरावत किहिस  - पानी पलोय बर  पलोहू फेर एकड़ पाछू चार हजार रूपया लुहू।
- अरे ददा रे, समारू किहिस, मन म।
- गांव म ठेका ले के पलोय के किमत चार हजार चलत हावय ओखर हिसाब से एक पानी के पइसा जादा ले जादा चार, पाँच सौ रुपया होही जी सोनसाय।
- त तोला पानी नई पलोना हे। सोनसाय किहिस।
मरइया का नई करय,आंसू डबडबाय समारू राजी हो जथे।
गोमती पढ़ई लिखई म होसियार राहय। हर बछर अपन कक्षा म पहली नम्बर ले पास होवय।
समारू अपन बेटी गोमती ल पानी पलोय के दाम ल बताइस त गोमती दंग रहीगे। उही दिन ले प्रण करथे कि मेह ये गांव म नहर लाय के उदिम करहूं।
गोमती बी. ए. म पूरा कालेज म पहली आहस। गांव भर म गोमती के सोर होगे।
गोमती अब दुख ल धर के नहर लाय के उदिम म लग जथे। बार बार कलेक्टर कन आवेदन देवय, फेर आवदेन के सुनवाई नई होय। नेतागिरी करके सोनसाय आवेदन ल दबवा दे।
गोमती तभो ले हिम्मत नई हारिस। केहे गेहे न कि घुरवा के दिन तको बहुरथे। नवा कलेक्टर मैडम आइस, वोहर इमानदार रिहिस,सासन के योजना ल पूरा करे के उदिम करय ओखर ले नेतागिरी कोसो दूर भागे।
गोमती के आवेदन ल देखिस अउ नहर बनाय बर सरवे करे के अधिकारी मन ल आदेस दिस।
सोनसाय नेतागिरी करे के उदिम करिस फेर नवा कलेक्टर कर काम नई आइस।
सोनसाय अब गांव के छोटे छोटे किसान मन ल भड़काय के चालू कर दिस कि तोर खेत हर नहर नाली म निकल जही त तेहर कामे खेती बाड़ी करबे जी।
सोनसाय कोती अड़बड़ अकन छोटे किसान मन खड़ाहोगे अपन कोती खड़ा होत देख के मेछा ल अइठन लागिस।
संजू कथे - हमर गांव म नहर नई चाहि। नहर बनाही त हमर गांव के कतको खेत, नाली म निकल जाही। बिहान दिन गोमती बुगरु, बबा के चौरा म सब्बो किसान मन ल बलाइस अउ समझाइस कि जेन कोती सरवे होय हावय ओ कोती सबले जादा खेत तो सोनसाय के हावय। इहां नहर झन बने कहि के तुमन ल भड़कात हावय। तुमन बने सोचो हर बछर एक, पानी टोरथे ताहन सोनसाय एकड़ पाछू चार हजार रुपया लेथे।
शासन ह हमर जमीन के मुआवजा तको दिही।
का पूरा जीवन ल गरीबी में बिताना हे।
संजू किहिस मेहर अपन खेत म नहर नाली दे बर राजी हाबौ।
संजू के संगे संग सब्बो किसान राजी हो जथे।
सब्बो किसान के गोठ ल सुन के गोमती कांध मलकाय लागिस।
थोड़िक दिन म नहर बनगे गांव म खुसहाली छागे। सोनसाय के अकड़ टूटगे।
समारू किहिस गोमती असन बेटी एहर गांव म जनम धरे।

भोला राम सिन्हा गुरुजी
ग्राम डाभा एपो0 करेली छोटी
मगरलोड जिला धमतरी

संकल्प

डॉ. मृदुला शुक्ला


 अपने मन में विचारों की उधेड़बुन में लगी हुई मैं रास्ते पर चलती चली जा रही थी। अचानक मुझे हलका सा कुछ शोर सुनाई दिया, जिससे मेरा ध्यान भंग हो गया। मैंने घूम कर चारों तरफ  देखा, तो मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मैं शान्त मन से धीरे - धीरे आगे बढ़ने लगी। अभी थोड़ी दूर ही पहुँची थी कि फिर से मुझे जोर - जोर की आवाजें सुनाई दीं। ऐसा लगा कि जैसे कोई ऊँचे स्वर में करुण क्रन्दन करता हुआ अपने प्राणों की रक्षा की गुहार लगा रहा हो कि रुक जाओ मुझे मत मारो, मुझे मत काटो, मुझे प्राणदान दे दो, कोई तो मुझे बचाओ, मुझ पर दया करो,मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है, पर उस करुण पुकार को कोई सुनने वाला, महसूस करने वाला नहीं था।
अचानक मैंने गनेसी बाबा को उधर से ही आते हुए देखा, जिधर से आवाज़ें आ रहीं थीं। वहीं पास के गाँव में काफी पुराने समय से गणेश शंकर जी रहते हैं, उनकी काफी जमीन - जायदाद और सम्पत्ति है, उनको सभी लोग आदर और प्यार से गनेसी बाबा कहकर पुकारते हैं। मैंने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए उनसे पूछा - गनेसी बाबा ये आवाजें कैसी आ रही हैं? बाबा कुछ नहीं बोले चुप ही रहे, पर उनके चेहरे पर मौज़ूद दर्द, चिन्ता, परेशानी सब कुछ चीख - चीख कर बयां किये जा रही थी। मैंने पुनः पूछा - गनेसी बाबा क्या हुआ आप कुछ बोलते क्यों नहीं, परेशान क्यों हैं?
मेरे बार - बार पूछने पर गनेसी बाबा ने कहा - क्या बताएँ बिटिया हमारे गाँव वाले वो रामदीन की बगिया क्या थी, उसके अच्छे पैसे लग गए तो उस रामदीन ने बगिया बेच दी। कहता था उन पैसों से शहर जाकर फैक्ट्री लगाएगा, अच्छा कारोबार चलेगा,तो खूब पैसा कमा लेगा, बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए विदेश भेजेगा। इसलिए उस बगिया के पेड़ कटवा रहे हैं वो लोग। इतना कहते - कहते गनेसी बाबा रुआँसे हो आये और अपने घर की तरफ  चलने लगे, मैंने उन्हें फिर से रोककर कहा - बाबा आप सब गाँव वालों ने मिलकर रामदीन को ऐसा करने से रोका क्यों नहीं? समझाया क्यों नहीं? पेड़ों ने कभी किसी को क्या नुकसान पहुँचाया है भला? वो तो हमेशा दूसरों का हित ही करते हैं। पेड़ तो सभी के लिए सब कुछ निस्वार्थ भाव से प्रसन्नतापूर्वक लुटाते रहते हैं - छाया, लकड़ी,पत्ते, फूल, फल,ऑक्सीजन सब कुछ वो भी बिना किसी भेदभाव के।
पेड़ों में भी प्राण हैं, दर्द है, अश्क हैं, इंसान इतना निर्दयी, भावना - शून्य क्यों है? इतना खुदग़र्ज़ इतना स्वार्थी क्यों है? जो पेड़ इंसान को जीवन देते हैं, सुख - साधन - सम्पन्न बनाते हैं, वो भी बिना किसी स्वार्थ के और इंसान उन्हीं पेड़ों को इतनी निर्ममता से, इतनी कठोरता से उनकी हत्या करता जा रहा है, वो भी सिर्फ  चन्द सिक्कों के लिए, अपनी बड़ी - बड़ी आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए। वह एक बार भी नहीं सोचता कि पेड़ उजाड़ कर हम स्वयं अपने जीवन के अन्त का आह्वान करते चले जा रहे हैं।
तभी गनेसी बाबा मुझे बीच में ही रोकते हुए बोले - बिटिया परेशान न हो । इस धरती पर फिर से हम सब मिलकर पेड़ लगाएँगे। मैं उनको एकटक आश्चर्य से निहारती रह गई।
मुझे पता ही नहीं चला कि मुझमें इतना जोश कब आ गया, इतना तैश कब आ गया कुछ पता ही नहीं।
अब तक गनेसी बाबा की आँखों से आँसू ढुलक कर झुर्री पड़े गालों को गीला कर चुके थे। निर्मल हुई आँखों में आशा की एक नई किरण जगमगाने लगी थी, उनकी आवाज में दृढ़ता और विश्वास की झलक मुझे आश्वस्त कर रही थी। मुझे अत्यन्त आश्चर्य के साथ- साथ अद्भुत आनन्द की भी अनुभूति हुई। जब 70 वर्ष के गनेसी बाबा आशा, इच्छाशक्ति, प्रयास, दृढ़ता और विश्वास से ओतप्रोत हैं तो हम युवा लोग निराशाओं, समस्याओं के भँवर से बाहर क्यों नहीं निकल सकते ?
ऐसा सोचकर मैंने भी पूर्ण दृढ़ता, विश्वास से यह संकल्प लिया कि हम सब मिलकर अधिक से अधिक पेड़ - पौधे लगाकर अपनी धरती माँ का हरे - भरे वस्त्रों से श्रृंगार करते रहेंगे। धरती माँ को कभी भी निर्वस्त्र नहीं होने देंगे, यही हम सभी का संकल्प है।

मतदान

डॉ. मृदुला शुक्ला


 सोकर उठते ही सबेरे - सबेरे पारुल अपनी छोटी बहिन प्रिया को लगातार थप्पड़ पर थप्पड़ मारती चली जा रही थी और जोर-  जोर से डांट रही थी कि पहली बार वोट डालने की मेरी बारी आई तो तूने मेरी आलमारी से मेरा आधार कार्ड ही निकाल कर फाड़ डाला। तेरी उम्र तो अभी 18 वर्ष हुई नहीं, इसलिए तू तो मतदान कर नहीं सकती तो मैं भी मतदान न करूँ। यही सोचकर तूने मेरा आधार कार्ड फाड़ दिया।
प्रिया रोती हुई बार - बार कहे जा रही थी - दीदी सुनो तो, मैंने तुम्हारी आलमारी छुई तक नहीं और न ही तुम्हारा आधार कार्ड निकाला और न ही उसे फाड़ा है। भला मैं उसे क्यों फाडूंगी ? दीदी प्लीज, मेरी बात पर यकीन करो।
तेज - तेज आवाजों को सुनकर माँ सरिता हड़बड़ाकर पारुल के कमरे में आई। जब उन दोनों को आपस में लड़ते हुए देखा, तब वह हैरान रह गई, क्योंकि पारुल और प्रिया, दोनों बहनों में अथाह प्यार था। एक - दूसरे पर जान देती थीं, पर आज ये सब क्या हो गया।
जो पारुल अपनी छोटी बहिन प्रिया के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए हरदम तैयार रहती थी, उसी पारुल ने प्रिया को थप्पड़ मारे ! और इतना ही नहीं, आधार कार्ड फाड़ने का आरोप भी लगा दिया।
सोचते - सोचते माँ सरिता ने आगे बढ़कर बड़ी मुश्किल से पारुल को शान्त करके पारुल और प्रिया को अपनी बाहों में भर लिया।
फिर माँ ने बताया कि किसी ने भी किसी का आधार कार्ड नहीं फाड़ा है। सभी के आधार कार्ड मेरे पास बॉक्स में रक्खे हैं और बॉक्स के ताले की चाबी भी मेरे पास है।
पारुल बेटा, तुमने सपने में प्रिया को आधार कार्ड फाड़ते देखा होगा। जिसे तुम हकीकत समझ कर झगड़ा करने लगीं और अगर हकीकत में भी फट गया होता, तब भी आधार कार्ड नया बन जाता। फिलहाल तुम अपने वोटर कार्ड  से वोट डाल देतीं। कोई भी एक पहचान पत्र से मतदान किया जा सकता है।
बेटा, सपना और हकीकत में काफी फर्क होता है। वैसे भी किसी समस्या का हल लड़ाई - झगड़ा नहीं होता। सोच - समझ और प्यार से जटिल से जटिल समस्या सुलझाई जा सकती है।
पारुल को अब अपनी गलती और नासमझी का एहसास हो चुका था। वो अपने अन्दर ग्लानि का अनुभव कर रही थी। प्रिया को अपने गले से लगाकर पारुल फूट  - फूटकर रोने लगी।
तभी प्रिया बोल उठी - क्या दीदी, जल्दी तैयार हो चलकर। अपना कीमती वोट डालने नहीं चलना है क्या? अगर देर हो गई तो कड़क धूप में लम्बी कतार में खड़े होकर अपनी बारी आने का इंतजार करना पड़ेगा।
पारुल, प्रिया और माँ सरिता तीनों तेजी से खिलखिलाकर हँसती हुई मतदान करने के लिए मतदान केंद्र पर जाने की तैयारी करने लगीं।

गुण्डा

जयशंकर प्रसाद

 वह पचास वर्ष से ऊपर था। तब भी युवकों से अधिक बलिष्ठ और दृढ़ था। चमड़े पर झुर्रियाँ नहीं पड़ी थीं। वर्षा की झड़ी में, पूस की रातों की छाया में, कड़कती हुई जेठ की धुप में, नंगे शरीर घूमने में वह सुख मानता था। उसकी चढ़ी हुई मूंछ बिच्छू के डंक की तरह, देखनेवालों के आँखों में चुभती थीं। उसका सांवला रंग सांप की तरह चिकना और चमकीला था। उसकी नागपुरी धोती का लाल रेशमी किनारा दूर से ही ध्यान आकर्षित करताद्यकमर में बनारसी सेल्हे का फेंटा, जिसमें सीप की मूंठ का बिछुआ खुंसा रहता था। उसके घुंघराले बालों पर सुनहरे पल्ले के साफे का छोर उसकी चौड़ी पीठ पर फैला रहता। ऊंचे कंधे पर टिका हुआ चौड़ी धार का गंड़ासा, यह थी उसकी धज! पंजों के बल जब वह चलता, तो उसकी नसें चटाचट बोलती थीं। वह गुण्डा था। ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में वही काशी नहीं रह गई थी, जिसमे उपनिषद् के अजातशत्रु की परिषद में ब्रह्मविद्या सीखने के लिए विद्वान ब्रह्मचारी आते थे। गौतम बुद्ध और शंकराचार्य के वाद - विवाद, कई शताब्दियों से लगातार मंदिरों और मठों के ध्वंस और तपस्वियों के वध के कारण, प्रायः बंद हो गए थे। यहाँ तक कि पवित्रता और छुआछूत में कट्टर वैष्णव - धर्म भी उस विश्रृंखलता में नवागंतुक धर्मोन्माद में अपनी असफलता देख कर काशी में अघोर रूप धारण कर रहा था। उसी समय समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्र - बल के सामने झुकते देखकर काशी के विछिन्न और निराश नागरिक जीवन ने एक नवीन सम्प्रदाय की सृष्टि की। वीरता जिसका धर्म था, अपनी बात - बात पर मिटना, सिंह - वृत्ति जीविका ग्रहण करना, प्राण - भिक्षा मांगने वाले कायरों तथा चोट खाकर गिरे हुए प्रतिद्वंदी पर शस्त्र न उठाना, सताए निर्बलों को सहायता देना और प्रत्येक क्षण प्राणों को हथेली पर लिए घूमना, उसका बाना था। उन्हें लोग काशी में गुण्डा कहते थे। जीवन की किसी अलभ्य अभिलाषा से वंचित होकर जैसे प्रायः लोग विरक्त हो जाते हैं ठीक उसी तरह किसी मानसिक चोट से घायल होकर, एक प्रतिष्ठित जमींदार का पुत्र होने पर भी, नन्हकूसिंह गुण्डा हो गया था। दोनों हाथों से उसने अपनी संपत्ति लुटाई। नन्हकूसिंह ने बहुत सा रुपया खर्च करके जैसा स्वांग खेला था, उसे काशीवाले बहुत दिनों तक नहीं भूल सके। वसंत ऋतु में यह प्रहसनपूर्ण अभिनय खेलने के लिए उन दिनों प्रचुर धन, बल, निर्भीकता और उच्छश्रृंखलता की आवश्यकता होती थी। एक बार नन्हकूसिंह ने भी एक पैर में नूपुर, एक हाथ में तोड़ा, एक आंख में काजल, एक कान में हजारों के मोती तथा दुसरे कान में फटे हुए जूते का तल्ला लटकाकर, एक में जड़ाऊ मूठ की तलवार, दूसरा हाथ आभूषणों से लदी हुई अभिनय करनेवाली प्रेमिका के कंधे पर रखकर गया था- कही बैगनवाली मिले तो बुला देना? प्रायः बनारस के बाहर की हरियालियों में, अच्छे पानीवाले कुओं पर, गंगा की धारा में मचलती हुई डोंगी पर वह दिखलाई पड़ता था। कभी - कभी जुआखाने से निकलकर जब वह चौक में आ जाता, तो काशी की रंगीली वेश्याएं मुस्कुराकर उसका स्वागत करतीं और दृढ़ शरीर को सस्पृह देखतीं। वह तमोली की ही दुकान पर बैठकर उनके गीत सुनता, ऊपर कभी नहीं जाता था। जुए की जीत का रुपया मुट्ठियों में भर - भरकर, उनकी खिड़की में वह इस तरह उछालता कि कभी - कभी समाजी लोग अपना सर सहलाने लगते, तब वह ठठाकर हंस देता। जब कभी लोग कोठे के ऊपर चलने के लिए कहते, तो वह उदासी की साँस खींचकर चुप हो जाता। वह अभी वंशी के जुआखाने से निकला था। आज उसकी कौड़ी ने साथ न दिया। सोलह परियों के नृत्य में उसका मन न लगा। मन्नू तमोली की दुकान पर बैठे हुए उसने कहा - आज सायत अच्छी नहीं रही। मन्नू - क्यों मालिक! चिंता किस बात की है? हमलोग किस दिन के लिए हैं। सब आप ही का तो है। अरे बुद्धू ही रहे तुम! नन्हकूसिंह जिस दिन किसी से लेकर जुआ खेलने लगे उसी दिन समझना वह मर गए। तुम हटे नहीं कि मैं जुआ खेलने कब जाता हूँ। जब मेरे पास एक पैसा नहीं रहता, उसी दिन नाल पर पहुंचते ही जिधर बड़ी ढेरी रहती है, उसी को बदता हूँ और फिर वही दांव आता भी है। बाबा कीनाराम का यह वरदान है।
- तब आज क्यों मालिक।
- पहला दांव तो आया ही, फिर दो - चार हाथ बदने पर सब निकल गया। तब भी लो, यह पांच रुपये बचे हैं। एक रुपया तो पान के लिए रख लो और चार दे दो मलूकी कथक को। कह दो कि दुलारी से गाने के लिए कह दे। हाँ, वही एक गीत- लिमी विदेश रहे। नन्हकूसिंह की बात सुनते ही मलूकी, जो अभी गांजे की चिलम पर रखने के लिए अंगारा चूर कर रहा था, घबराकर उठ खड़ा हुआ। वह सीढ़ियों पर दौड़ता हुआ चढ़ गया। चिलम को देखता ही ऊपर चढ़ा, इसलिए उसे चोट भी लगी। पर नन्हकूसिंह की भृकुटी देखने की शक्ति उसमें कहाँ। उसे नन्हकूसिंह की वह मूर्ती न भूली थी, जब इसी पान की दुकान पर जुएखाने से जीता हुआ, रुपये से भरा तोड़ा लिए वह बैठा था। दूर से बोधीसिंह की बारात का बाजा बजता हुआ आ रहा था। नन्हकू ने पूछा - यह किसकी बारात है?
- ठाकुर बोधीसिंह के लड़के की। मन्नू के इतना कहते ही नन्हकू के होंठ फड़कने लगे। उसने कहा - मन्नू! यह नहीं हो सकता। आज इधर से बारात न जाएगी। बोधीसिंह हमसे निपटकर तब बारात इधर से ले जा सकेंगे। मन्नू ने कहा - तब मालिक, मैं क्या करूं? नन्हकू गंड़ासा कंधे पर से और ऊंचा करके मलूकी से बोला - मलुकिया देखता है, अभी जा ठाकुर से कह दे, कि बाबू नन्हकूसिंह आज यहीं लगाने के लिए खड़े हैं। समझकर आवें,  लड़के की बारात है। मलुकिया कांपता हुआ ठाकुर बोधीसिंह के पास गया। बोधीसिंह और नन्हकू में पांच वर्ष से सामना नहीं हुआ है। किसी दिन नाल पर कुछ बातों में कहा - सुनी होकर, बीच - बचाव हो गया था। फिर सामना नहीं हो सका। आज नन्हकू जान पर खेलकर अकेले खड़ा है। बोधीसिंह भी उस आन को समझते थे। उन्होंने मलूकी से कहा - जा बे, कह दे कि हमको क्या मालूम कि बाबूसाहब वहां खड़े हैं। जब वह हैं ही, तो दो समधी जाने का क्या काम है। बोधीसिंह लौट गए और मलूकी के कंधे पर तोड़ा लादकर बाजे के आगे के आगे नन्हकूसिंह बारात लेकर गए। ब्याह में जो कुछ लगाए खर्च किया। ब्याह कराकर तब, दूसरे दिन इसी दुकान तक आकर रुक गए। लड़के को और उसकी बारात को उसके घर भेज दिया। मलूकी को भी दस रुपया मिला था उस दिन, फिर नन्हकूसिंह की बात सुनकर बैठे रहना और यम को न्योता देना एक ही बात थी। उसने जाकर दुलारी से कहा - हम ठेका लगा रहे हैं, तुम गाओ, तब तक बल्लू सारंगीवाला पानी पीकर आता है।
- बाप रे, कोई आफत आई है क्या बाबू साहब? सलाम कहकर दुलारी ने खिड़की से मुस्कराकर झाँका था कि नन्हकूसिंह उसके सलाम का जवाब देकर, दूसरे एक आनेवाले को देखने लगे। हाथ में हरौती की पतली - सी छड़ी, आँखों में सुरमा, मुंह में पान, मेंहदी लगी हुई लाल दाढ़ी, जिसकी सफेद जड़ दिखलाई पड़ रही थी, कुव्वेदार टोपीय छकलिया अंगरखा और साथ में लैंसदार परतवाले दो सिपाही। कोई मौलवी साहब हैं। नन्हकू हंस पड़ा। नन्हकू की ओर बिना देखे ही मौलवी ने एक सिपाही से कहा - जाओ, दुलारी से कह दो कि आज रेजीडेंट साहब की कोठी पर मुजरा करना होगा, अभी चले, देखो तब तक हम जानअली से कुछ इत्र ले रहे हैं। सिपाही सीढ़ी चढ़ रहा था और मौलवी दूसरी ओर चले थे कि नन्हकू ने ललकार कर कहा - दुलारी! हम कब तक यहाँ बैठे रहें। क्या अभी सरंगिया नहीं आया? दुलारी ने कहा-वाह बाबूसाहब! आपही के लिए तो मैं यहाँ आ बैठी हूँ, सुनिए न। आप तो कभी ऊपर मौलवी जल उठा। उसने कड़ककर कहा- अभी वह सूअर की बच्ची उतरी नहीं, जाओ, कोतवाल के पास मेरा नाम लेकर कहो कि मौलवी अलाउद्दीन कुबरा ने बुलाया है। आकर उसकी मरम्मत करें। देखता हूँ तो जब से नवाबी गई, इन काफिरों की मस्ती बढ़ गई है। कुबरा मौलवी! बाप रे - तमोली अपनी दुकान सँभालने लगा। पास ही एक दुकान पर बैठकर ऊंघता हुआ बजाज चौंककर सर में चोट खा गया। इसी मौलवी ने तो महाराज चेतसिंह से साढ़े - तीन सेर चींटी के सर का तेल माँगा था। मौलवी अलाउद्दीन कुबरा! बाजार में हलचल मच गई। नन्हकूसिंह ने मन्नू से कहा - क्यों चुपचाप बैठोगे नहीं। दुलारी से कहा - वहीं से बाई जी! इधर - उधर हिलने का काम नहीं। तुम गाओ, हमने ऐसे घसियारे बहुत से देखे हैं। अभी कल रमल के पासे फेंककर अधेला - अधेला मांगता था। आज चला है रोब गांठने। अब कुबरा ने घूमकर उसकी ओर देखकर कहा - कौन है यह पाजी!
- तुम्हारे चाचा बाबू नन्हकूसिंह! के साथ ही पूरा बनारसी झापड़ पड़ा। कुबरा का सर घूम गया। लैस के परतले वाले सिपाही दूसरी ओर भाग चले और मौलवी साहब चौंधियाकर जानअली की दुकान पर लड़खड़ाते, गिरते - पड़ते किसी तरह पहुँच गए। जानअली ने मौलवी से कहा - मौलवी साहब! भला आप भी उस गुण्डे के मुंह लगने गए। यह तो कहिये उसने गंड़ासा नहीं तौल दिया। कुबरा के मुंह से बोली नहीं निकल रही थी। उधर दुलारी गा रही थी - विलमि रहे विदेस। गाना पूरा हुआ, कोई आया - गया नहीं। तब नन्हकूसिंह धीरे - धीरे टहलता हुआ, दूसरी ओर चला गया। थोड़ी देर में एक डोली रेशमी परदे से ढंकी हुई आई। साथ में एक चोबदार था। उसने दुलारी को राजमाता पन्ना की आज्ञा सुनाई। दुलारी चुपचाप डोली पर जा बैठी। डोली धुल और संध्याकाल के धुंए से भरी बनारस की तंग गलियों से होकर शिवालय घाट की ओर चली। श्रावण का अंतिम सोमवार था। राजमाता पन्ना शिवालय में बैठकर पूजा कर रही थीं। दुलारी बाहर बैठी कुछ अन्य गानेवालियों के साथ भजन गा रही थी। आरती हो जाने पर फूलों की अंजलि बिखेरकर पन्ना ने भक्तिभाव से देवता के चरणों में प्रणाम किया। फिर प्रसाद लेकर बाहर आते ही उन्होंने दुलारी को देखा। उसने खड़ी होकर हाथ जोड़ते हुए कहा - मैं पहले ही पहुँच जाती। क्या करूं, वह कुबरा मौलवी निगोड़ा आकर रेजीडेंट की कोठी पर ले जाने लगा। घंटों इसी झंझट में बीत गया, सरकार! कुबरा मौलवी! जहाँ सुनती हूँ उसी का नाम, सुना कि उसने यहाँ भी आकर कुछ। फिर न जाने क्या सोचकर बात बदलते हुए पन्ना ने कहा - हाँ, तब फिर क्या हुआ? तुम कैसे यहाँ आ सकी?
- बाबू नन्हकूसिंह उधर से आ गए। मैंने कहा - सरकार की पूजा पर मुझे भजन गाने को जाना है और यह जाने नहीं दे रहा है। उन्होंने मौलवी को ऐसा झापड़ लगाया कि उसकी हेकड़ी भूल गई, और तब जाकर मुझे किसी तरह यहाँ आने की छुट्टी मिली।
- कौन बाबू नन्हकूसिंह?
दुलारी ने सर नीचा करके कहा - अरे, क्या सरकार को नहीं मालूम! बाबू निरंजनसिंह के लड़के! उस दिन, जब मैं बहुत छोटी थी,आपकी बारी में झूला झूल रही थी। जब नवाब का हाथी बिगड़कर आ गया था। बाबू निरंजनसिंह के कुंवर ने ही तो उस दिन हमलोगों की रक्षा की थी। राजमाता का मुख उस प्राचीन घटना को स्मरण करके न जाने क्यों विवर्ण हो गया। फिर अपने को संभालकर उन्होंने पूछा - तो बाबू नन्हकूसिंह उधर कैसे आ गए। दुलारी ने मुस्कराकर सर नीचा कर लिया। दुलारी राजमाता पन्ना के पिता की जमींदारी में रहनेवाली वेश्या की लड़की थी। उसके साथ कितनी ही बार झूले - हिंडोले अपने बचपन में पन्ना झूल चुकी थी। वह बचपन से ही गाने में सुरीली थी। सुंदरी होने पर चंचल भी थी। पन्ना जब काशिराज की माता थी, तब दुलारी काशी की प्रसिद्ध गानेवाली थी। राजमहल में उसका गाना - बजाना हुआ ही करता। महाराज बलवंतसिंह के समय से ही संगीत पन्ना के जीवन का आवश्यक अंग था। हाँ, अब प्रेम - दुःख और दर्द भरी विरह - कल्पना के गीत की ओर अधिक रूचि न थी। अब सात्विक भावपूर्ण भजन होता था। राजमाता पन्ना का वैधव्य से दीप्त शांत मुखमंडल कुछ मलिन हो गया। बड़ी रानी का सापत्न्य ज्वाला बलवंतसिंह के मर जाने पर भी नहीं बुझी। अंतःपुर कलह का रंगमंच बना रहता, इसी से प्रायः पन्ना काशी के राजमंदिर में आकर पूजापाठ में अपना मन लगाती। रामनगर में उसको चैन नहीं मिलता। नई रानी होने के कारण बलवंतसिंह की प्रेयसी होने का गौरव तो उसे था ही, साथ में पुत्र उत्पन्न करने का सौभाग्य भी मिला, फिर भी असवर्णता का सामाजिक दोष उसके हृदय को व्यथित किया करता। उसे अपने ब्याह की आरंभिक चर्चा का स्मरण हो आया। छोटे से मंच पर बैठी। गंगा की उमड़ती हुई धारा को पन्ना अन्यमनस्क होकर देखने लगी। उस बात को, जो अतीत में एक बार, हाथ से अनजाने में खिसक जाने वाली वस्तु की तरह लुप्त हो गई हो, सोचने का कोई कारण नहीं। उससे कुछ बनता - बिगड़ता भी नहीं। परन्तु मानव स्वभाव हिसाब रखने की प्रथानुसार कभी - कभी कह बैठता है कि यदि वह बात हो गयी होती तो, ठीक उसी तरह पन्ना भी राजा बलवंतसिंह द्वारा बलपूर्वक रानी बनाई जाने के पहले की एक सम्भावना सोचने लगी थी। सो भी बाबू नन्हकूसिंह का नाम सुन लेने पर, गेंदा मुंह लगी दासी थी। वह पन्ना के साथ उसी दिन से है, जिस दिन से पन्ना बलवंतसिंह की प्रेयसी हुई। राज्य - भर का अनुसन्धान उसी के द्वारा मिला करता, और उसे न जाने कितनी जानकारी भी थी। उसने दुलारी का रंग उखाड़ने के लिए कुछ आवश्यक समझा। महारानी! नन्हकूसिंह अपनी सब जमींदारी स्वांग, भैंसों की लड़ाई, घुड़दौड़ और गाने - बजाने में उड़ाकर अब डाकू हो गया है। जितने खून होते हैं, सबमें उसी का हाथ रहता है। जितनी उसे रोककर दुलारी ने कहा - यह झूठ है, बाबूसाहब के ऐसा धर्मात्मा तो कोई है ही नहीं। कितनी विधवाएं उनकी दी हुई धोती से अपना तन ढंकती हैं। कितनी लड़कियों की ब्याह - शादी होती है। कितने सताए हुए लोगों की उनके द्वारा रक्षा होती है। रानी पन्ना के हृदय में एक तरलता उद्वेलित हुई। उन्होंने हंसकर कहा - दुलारी, वे तेरे यहाँ आते हैं न। इसी से तू उनकी बड़ाई ...।
- नहीं सरकार! शपथ खाकर कह सकती हूँ कि बाबू नन्हकूसिंह ने आज तक कभी मेरे कोठे पर पैर भी नहीं रखा। राजमाता न जाने क्यों इस अद्भुत व्यक्ति को समझने के लिए चंचल हो उठी थीं। तब भी उन्होंने दुलारी को आगे कुछ न कहने के लिए तीखी दृष्टि से देखा। वह चुप हो गई। पहले पहर की शहनाई बजने लगी। दुलारी छुट्टी मांगकर डोली पर बैठ गई। तब गेंदा ने कहा - सरकार! आजकल नगर की दशा बड़ी बुरी है। दिन दहाड़े लोग लूट लिए जाते हैं। सैंकड़ो जगह नाल पर जुए चलने के लिए टेढ़ी भौवें कारण बन जाती हैं।  उधर रेजीडेंट साहब से महाराजा की अनबन चल रही है। राजमाता चुप रहीं। दूसरे दिन राजा चेतसिंह के पास रेजीडेंट मार्कहेम की चिट्ठी आई। जिसमें नगर की दुर्व्यवस्था की कड़ी आलोचना थी। डाकुओं और गुंडों को पकड़ने के लिए उनपर कड़ा नियंत्रण रखने की सम्मति भी थी। कुबरा मौलवी वाली घटना का भी उल्लेख था। उधर हेस्टिंग्स के आने की भी सूचना थी। शिवालय घाट और रामनगर में हलचल मच गई।  कोतवाल हिम्मतसिंह, पागल की तरह, जिसके हाथ में लाठी लोहांगी, गंड़ासा, बिछुआ और करौली देखते, उसी को ही पकड़ने लगे। एक दिन नन्हकूसिंह सुम्भा के नाले के संगम पर ऊंचे - से टीले की हरियाली में अपने चुने हुए साथियों के साथ दूधिया छान रहे थे।  गंगा में उनकी पतली डोंगी बड़ की जटा से बंधी थी। कथकों का गाना हो रहा था। चार उलांकी इक्के कसे, कसाए खड़े थे। नन्हकूसिंह ने अकस्मात कहा - मलूकी! गाना जमता नहीं है। उलांकी पर बैठकर जाओ, दुलारी को बुला लाओ। मलूकी वहां मंजीरा बजा रहा था। दौड़कर इक्के पर जा बैठा। आज नन्हकूसिंह का मन उखड़ा था। बूटी कई बार छानने पर भी नशा नहीं। एक घण्टे में दुलारी सामने आ गयी। उसने मुस्कराकर कहा - क्या हुक्म है बाबूसाहब।
- दुलारी! आज गाना सुनने का मन कर रहा है।
- इस जंगल में क्यों? उसने सशंक हंसकर कुछ अभिप्राय से पूछा।
- तुम किसी तरह का खटका न करो - नन्हकूसिंह ने हंसकर कहा।
- यह तो मैं उस दिन महारानी से भी कह आई हूँ।
- क्या किससे, राजमाता पन्नादेवी से - फिर उस दिन गाना नहीं जमा। दुलारी ने आश्चर्य से देखा कि तानों में नन्हकू की ऑंखें तर हो जाती हैं। गाना - बजाना समाप्त हो गया था वर्षा की रात में झिल्लियों का स्वर उस झुरमुट में गूँज रहा था। मंदिर के समीप ही छोटे से कमरे में नन्हकूसिंह चिंता में निमग्न बैठा था। आँखों में नींद नहीं। और सबलोग तो सोने में लगे थे। दुलारी जाग रही थी। वह भी कुछ सोच रही थी। आज उसे अपने को रोकने के लिए कठिन प्रयत्न करना पड़ रहा था, किन्तु असफल हो कर वह उठी और नन्हकू के समीप धीरे - धीरे चली आई। कुछ आहट पाते ही दौड़कर नन्हकूसिंह ने पास ही पड़ी हुई तलवार उठा ली। तब तक हंसकर दुलारी ने कहा - बाबूसाहब, यह क्या स्ति्रयों पर भी तलवार चलायी जाती है? छोटे से दीपक के प्रकाश में वासना - भरी रमणी का मुख देखकर नन्हकू हंस पड़ा। उसने कहा - क्यों बाई जी! क्या इसी समय जाने की पड़ी है। मौलवी ने फिर बुलवाया है क्या? दुलारी नन्हकू के पास बैठ गई। नन्हकू ने कहा - क्या तुमको डर लग रहा है।
- नहीं, मैं कुछ पूछने आई हूँ?
- क्या ...?
- क्या ... यही कि कभी तुम्हारे हृदय में।
- उसे न पूछो दुलारी! हृदय को बेकार ही समझकर तो उसे हाथ में लिए फिर रहा हूं कोई कुछ कर देता-कुचलता - चीरता - उछालता! मर जाने के लिए सबकुछ तो करता हूँ पर मरने नहीं पाता।
- मरने के लिए भी कहीं खोजने जाना पड़ता है। आपको काशी का हाल क्या मालूम! न जाने घड़ी भर में क्या हो जाए। उलट - पलट होनेवाला है क्या? बनारस की गलियां जैसे काटने को दौड़ती हैं। कोई नई बात इधर हुई है क्या? कोई हेस्टिंग्स आया है। सुना है उसने शिवालयघाट पर तिलंगों की कंपनी का पहरा बैठा दिया है। राजा चेतसिंह और राजमाता पन्ना वहीँ हैं। कोई - कोई कहता है कि उनको पकड़कर कलकत्ता भेजने। क्या पन्ना का भी निवास भी वहीं है। नन्हकू अधीर हो उठा था।
- क्यों बाबूसाहब, आज रानी पन्ना का नाम सुनकर आपकी आँखों में आंसू क्यों आ गए? सहसा नन्हकू का मुख भयानक हो उठा। उसने कहा - चुप रहो, तुम उसको जानकर क्या करोगी? वह उठ खड़ा हुआ। उद्विग्न की तरह न जाने क्या खोजने लगा। फिर स्थिर होकर उसने कहा - दुलारी! जीवन में आज यह पहला ही दिन कि एकांत रात में एक स्त्री मेरे पलंग पर आकर बैठ गयी है। मैं चिरकुमार! अपनी एक प्रतिज्ञा का निर्वाह करने के लिए सैंकड़ों असत्य, अपराध करता फिर रहा हूँ। क्यों,तुम जानती हो। मैं स्ति्रयों का घोर विद्रोही हूँ और पन्ना! किन्तु उसका क्या अपराध!अत्याचारी बलवंतसिंह के कलेजे में बिछुआ मैं न उतार सका। किन्तु पन्ना! उसे पकड़कर गोरे कलकत्ते भेज देंगे! वहीं... नन्हकूसिंह उन्मत्त हो उठा था। दुलारी ने देखा - नन्हकू अंधकार में ही वटवृक्ष के नीचे पहुंचा और गंगा की उमड़ती हुई धारा में डोंगी खोल दी। उसी घने अंधकार में, दुलारी का हृदय कांप उठा। 16 अगस्त सन 1781 को काशी डांवाडोल हो रही थी। शिवालयघाट में राजा चेतसिंह लेफ्टिनेंट स्टाकर के पहरे में थे। नगर में आतंक था। दुकानें बंद थीं। घरों में बच्चे अपनी माँ से पूछते थे - माँ आज हलुए वाला नहीं आया। वह कहती- चुप बेटे!
सड़कें सूनी पड़ी थीं। तिलंगों की कंपनी के आगे - आगे कुबरा मौलवी कभी - कभी आता - जाता दिखाई पड़ता था। उस समय खुली हुई खिड़कियाँ बंद हो जाती थीं। भय और सन्नाटे का राज्य था। चौक में चिथरूसिंह की हवेली अपने भीतर काशी की वीरता को बंद किए कोतवाल का अभिनय कर रही थी। उसी समय किसी ने पुकारा - हिम्मतसिंह! खिड़की में से सिर निकालकर हिम्मतसिंह ने पूछा - कौन, बाबू नन्हकूसिंह! अच्छा, तुम अब तक बाहर ही हो। पागल! राजा कैद हो गए हैं। छोड़ दो इन सब बहादुरों को! हम एक बार इनको लेकर शिवालयघाट जाएँ। ठहरो - कहकर हिम्मतसिंह ने कुछ आज्ञा दी। सिपाही बाहर निकले। नन्हकू की तलवार चमक उठी। सिपाही भीतर भागे। नन्हकू ने कहा.- नमकहरामों चूडियाँ पहन लो। लोगों के देखते - देखते नन्हकूसिंह चला गया। कोतवाली के सामने फिर सन्नाटा हो गया। नन्हकू उन्मत्त था। उसके थोड़े से साथी उसकी आज्ञा पर जान देने के लिए तुले थे। वह नहीं जानता था कि राजा चेतसिंह का क्या राजनैतिक अपराध है। उसने कुछ सोचकर अपने थोड़े से साथियों को फाटक पर गड़बड़ मचाने के लिए भेज दिया। इधर अपनी डोंगी लेकर शिवालय की खिड़की के नीचे धारा काटते हुआ पहुंचा। किसी तरह निकले हुए पत्थर में रस्सी अटकाकर,उस चंचल डोंगी को उसने स्थिर किया और बन्दर की तरह उछल कर खिड़की के भीतर हो रहा उस समय वहां राजमाता पन्ना और राजा चेतसिंह से बाबू मनिहारसिंह कह रहे थे - आपके यहाँ रहने से हमलोग क्या करें। यह समझ नहीं आता। पूजापाठ समाप्त करके आप रामनगर चली गयी होतीं तो ... तेजस्विनी पन्ना ने कहा - अब मैं रामनगर कैसे चली जाऊं? मनिहारसिंह दुखी होकर बोले - कैसे बताऊँ। मेरे सिपाही तो बंदी हैं। इतने में फाटक पर कोलाहल मचा। राजपरिवार अपनी मंत्रणा में डूबा था कि नन्हकूसिंह का आना उन्हें मालूम हुआ। सामने का द्वार बंद था। नन्हकूसिंह ने एक बार गंगा की धारा को देखा। उसमें एक नाव घाट पर लगने के लिए लहरों से लड़ रही थी। वह प्रसन्न हो उठा। इसी की प्रतीक्षा में वह रुका था। उसने जैसे सबको सचेत करते हुए कहा - महारानी कहाँ हैं? सबने घूमकर देखा - एक अपरिचित वीर मूर्ति! शस्त्रों से लदा हुआ पूरा देव चेतसिंह ने पूछा - तुम कौन हो? राजपरिवार का एक बिना दाम का सेवक! पन्ना के मुंह से हलकी सी एक साँस निकलकर रह गयी। उसने पहचान लिया। इतने वर्षों बाद! वही नन्हकूसिंह, मनिहारसिंह ने पूछा - तुम क्या कर सकते हो?
-मैं मर सकता हूँ। पहले महारानी को डोंगी पर बिठाइए। नीचे दूसरी डोंगी पर अच्छे मल्लाह हैं। फिर बात कीजिए। मनिहारसिंह ने देखा, जनानी ड्योढ़ी का दारोगा एक डोंगी पर चार मल्लाहों के साथ खिड़की से नाव सटाकर प्रतीक्षा में है। उन्होंने पन्ना से कहा - चलिए, मैं साथ चलता हूँ। और चेतसिंह को देखकर पुत्रवत्सला ने संकेत से एक प्रश्न किया। उसका उत्तर किसी के पास न था। मनिहारसिंह ने कहा - तब मैं यहीं नन्हकू ने हंस कर कहा - मेरे मालिक आप नाव पर बैठें। जबतक राजा भी नाव पर न बैठ जाएँगे, तब तक सत्रह गोली खाकर भी नन्हकूसिंह जीवित रहने की प्रतिज्ञा करता है। पन्ना ने नन्हकू को देखा। एक क्षण के लिए चारों आँखें मिलीं। जिनमें जन्म - जन्म का विश्वास ज्योति की तरह जल रहा था। फाटक बलपूर्वक खोला जा रहा था। नन्हकू ने उन्मत्त हो कर कहा - मालिक जल्दी कीजिए। दूसरे क्षण पन्ना डोंगी पर थी और नन्हकूसिंह फाटक पर स्टाकर के साथ। चेतराम ने आकर चिट्ठी मनिहारसिंह के हाथ में दी। लेफ्टिनेंट ने कहा- आपके आदमी गड़बड़ मचा रहे हैं। अब मैं अपने सिपाहियों को गोली चलाने से नहीं रोक सकता। मेरे सिपाही यहाँ कहाँ है साहब। मनिहारसिंह ने हंसकर कहा। बाहर कोलाहल बढ़ने लगा। चेतराम ने कहा - पहले चेतसिंह को कैद कीजिए,कौन ऐसी हिम्मत करता है? कड़ककर कहते हुए बाबू मनिहारसिंह ने तलवार खींच ली। अभी बात पूरी न हो सकी थी कि कुबरा मौलवी वहां आ पहुंचा। यहाँ मौलवी की कलम नहीं चल सकती थी और न ये बाहर ही जा सकते थे। उन्होंने कहा - देखते क्या हो चेतराम! चेतराम ने राजा के ऊपर हाथ रखा ही था कि नन्हकू के सधे हुए हाथ ने उसकी भुजा उड़ा दी। स्टाकर आगे बढ़े, मौलवी साहब चिल्लाने लगे। नन्हकू ने देखते - देखते स्टाकर और उसके कई साथियों को धराशाई किया। फिर मौलवी साहब कैसे बचते! नन्हकूसिंह ने कहा -क्यों, उस दिन के झापड़ ने तुमको समझाया नहीं। पाजी!कहकर ऐसा साफजनेवा मारा कि कुबरा ढेर हो गया। कुछ ही क्षणों में यह भीषण घटना हो गई, जिसके लिए कोई प्रस्तुत न था। नन्हकूसिंह ने ललकारकर कहा -आप क्या देखते हैं। उतारिये डोंगी पर! उसके घावों से रक्त के फहारे छूट रहे थे। उधर फाटक से तिलंगे भीतर आने लगे थे। चेतसिंह ने खिड़की से उतरते हुए देखा कि बीसों तिलंगों की संगीनों में वह अविचल खड़ा होकर तलवार चला रहा है। नन्हकू के चट्टान सदृश शरीर से गैरिक की तरह रक्त की धारा बह रही है। गुण्डे का एक - एक अंग कटकर वहीं गिरने लगा। वह काशी का गुण्डा था!

अधिकार वंचित

ज्ञानदेव मुकेश

 अवकाश - ग्रहण के दिन कोई उदास होता और तो कोई खालीपन महसूस करता है। मगर दयाल साहब आज बड़े खुश थे। कारण यह था कि उनके सामने एक ऐसी जिम्मेवारी थी जिसे पूरा करने के लिए हर पिता बड़ा उत्साहित रहता है और उसे वह पूरे इत्मीनान से करना चाहता है। वह थी, उनके एकलौते बेटे की शादी।
घर लौटते वक्त वह रास्ते भर यही सोचते जा रहे थे कि बेटे की शादी की बात कहां - कहां करनी है और इधर - उधर बिखरे पैसों को किस तरह इकट्ठा करना है। घर लौटते ही उन्होंने पत्नी से कहा - आज से बेटे की शादी के लिए पुरजोर कोशिश शुरू कर देनी है। आज मैं सरकारी गुलामी से आजाद हो गया हूं। अब मेरे पास समय ही समय है।
रात को डिनर लेने के बाद पति - पत्नी इत्मीनान हुए तो वे उन तस्वीरों को देखने और छांटने लगे,जो उनके बेटे के लिए आए थे। अखिलेश जी और विनय जी की बेटियों की तस्वीरें ज्यादा पसंद आईं। दयाल जी ने पत्नी से कहा - पहले इन्हीं के यहां बात बढ़ाते हैं। देखें, बात कहां बनती है। हम दहेज की कोई बात नहीं करेंगे। इनकी लड़कियां तो खुद साक्षात लक्ष्मी हैं।
पत्नी ने पूछा - शादी धूमधाम से करने का इरादा रखते हो। उसके लिए इतने पैसे कहां से लाओगे?
दयालजी ने कहा - इत्मीनान रखो जी, मैंने सब हिसाब लगा लिया है। मेरा जीपीएफ, पीपीएफ, ग्रैच्युटी, लीव इन्कैशमेन्ट, इन्श्योरेन्स सब मिलाकर चालीस लाख तो हो ही जाएंगे। बीस लाख में लड़का - लड़की के लिए गहने - कपड़े और बीस लाख में बाकी के इंतजाम बात तो आराम से हो जाएंगे।
पत्नी दयाल जी की बातों से आश्वस्त दिखीं। उस रात दोनों ने मीठी नींद का मजा लिया। सपने आते रहे कि वे दोनों अपने पुश्तैनी घर के बड़े फाटक के सामने नई - नवेली बहू का परिछावन कर रहे हैं। स्वप्न का सम्पूर्ण वातावरण रात भर सुगंधित और संगीतमय होता रहा।
सुबह होते ही दयाल ने अपने बेटे को फोन लगाया - बेटा, कैसे हो? हम लोग तुम्हारी शादी के काम में जुट गए हैं। अगले दो - चार महीने के अंदर ही करने की सोच रहे हैं। बेटा, तुम पहले से ही लम्बी छुट्टी के लिए बात करके रखना। हम अखिलेश जी और विनय जी के यहां बात बढ़ा रहे हैं। तुम्हें उनमें से एक लड़की जरूर पसंद आ जाएगी।
फोन पर कुछ पल की चुप्पी रही। फिर बेटा कुछ कहने लगा - पापा, यह सब क्या है? आपने मुझे इतनी मेहनत से पढ़ाया - लिखाया। मुझपर लाखों रुपए खर्च किए। मेरे लिए रात - दिन एक कर दिया। अब इस बुढ़ापे में इतनी जहमत उठाने की क्या जरूरत है? कहां - कहां लड़की देखते फिरेंगे और तैयारियों में कितनी मशक्कत करेंगे।
दयाल जी ने कहा - नहीं बेटा, अपने पिता को कम मत आंको। अभी भी इन बाजुओं में भरपूर ताकत है। तुम्हारी शादी के लिए पूरे पैसे भी हैं और ढेर सारा उत्साह भी। जरा देखो तो सही, मैं क्या कमाल करता हूं।
फोन पर फिर एक क्षण की चुप्पी। बेटा ने फिर चुप्पी तोड़ते हुए कहा - पापा, आप नाहक परेशान हो रहे हैं। आपके संजोए पैसे और आपकी बची ताकत आपके बुढ़ापे और मां के लिए जरूरी पूंजी हैं। उन्हें मुझपर क्यों जाया करेंगे? उन्हें अपने पास रखिए। मैं बताता हूं आपको अपनी शादी की योजना - हम वर्किंग लोग हैं। हमारे सर्किल में ऐसी कई अन्य वर्किंग लड़कियां आ जाती हैं, जिनके साथ काम करते हुए हमें अच्छी तरह से समझ में आ जाता है कि उनमें किसके साथ हमारा सही तालमेल बैठेगा और जीवन भर का साथ परफेक्ट रहेगा। आप जिसे ढूंढेंगे उसे समझने में ही काफी समय लग जाएगा। इसलिए पापा, लड़की तय करने का काम छोड़ ही दीजिए। मैं वादा करता हूं, आपको एक अच्छी बहू ही लाकर दूंगा। अब रही बात इंतजाम की। वो भी आप क्यों करेंगे घ् यहां कई इवेन्ट मैनेजमेन्ट वाले बैठे हुए हैं। पैसा फेंकोए तमाशा देखो। आप दोनों के आशीर्वाद से आपके बेटे के पास पैसों की भी कोई कमी नहीं है। सारा इंतजाम मैं खुद कर लूंगा। और घर पर शादी क्या होगी? आज जमाना है डेस्टीनेशन मैरेज का। मैं एक बेहद अच्छी जगह भी तय कर लूंगा। बस मुझे थोड़ा समय दीजिए। सब कुछ फर्स्ट क्लास होगा। बस, आप दोनों पूरा तैयार होकर आना, जमकर इनज्वाय करना और दिल खोलकर आशीर्वाद देना। अच्छा पापा, रखता हूं।
फोन कट गया। दयाल जी के हाथ से फोन गिरते - गिरते बचा। उनका स्वप्न भंग हो चुका था। उन्हें लगा, वे एक पिता से एक मेहमान भर बनकर रह गए थे, जो अन्य मेहमानों के साथ निमंत्रण मिलने पर दुल्हे - दुल्हन को सिर्फ  आशीर्वाद देने जाएंगे।


फ्लैट संख्या 301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
अल्पना मार्केट के पास,न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी
पटना.800013 ( बिहार)

सफर

सोमेश शेखर चन्द्र

बस रूकती,इसके पहले ही वह उससे कूद, रेलवे स्टेशन के टिकट घर की तरफ  लपक लिया था। उसकी ट्रेन के छूटने का समय हो चुका था इसलिए वह काफी जल्दी में था। टिकट घर के भीतर पहुँचकरए यह जानने के लिए किए किस खिड़की पर उसके स्टेशन का टिकट मिलेगा, जल्दी - जल्दी, खिड़कियों के ऊपर टंगे बोर्ड पढ़ा था। यहाँ सभी जगहों के टिकट मिलते हैं। वाली खिड़की पर नजर पड़ते ही उसकी आँखे चमक उठी थी और वह उसी तरफ  लपक लिया था।
टिकट घर की खिड़की के ऊपर टंगी घड़ी के मुताबिक, उसकी ट्रेन छूटने में, अब सिर्फ तीन मिनट ही बाकी रह गए थे और इतने कम समय में टिकट कटवाना और दौड़कर ट्रेन पकड़ना, उसे बड़ा नामुमकिन सा लग रहा था जिसके चलते वह घबराया हुआ था और जल्दी से जल्दी टिकट कटवाकर, ट्रेन छूटने के पहले, उसे पकड़ लेने की उतावली में था। वैसे उसकी इस उतावली की एक वजह और भी थी वह यह किए उसके घर की तरफ दिन भर में सिर्फ  यही एक ट्रेन जाती थी और इसके छूट जाने का मतलब था अगले चौबीस घंटे तक, बिना खाए पिए, खून जमा देने वाली ठंड में,स्टेशन पर ठिठुर - ठिठुर कर अपनी जान देना। हालांकि ठंड से बचने के लिए वह, सभी मुमकिन उपाय कर रखा था लेकिन जैसे जैसे शाम नजदीक आती जा रही थी। कोहरा और भी घना होता जा रहा था और इसी के साथ ठंड भी बढ़ती जा रही थी। अभी दिन के चार ही बजे थे और वह सिर से लेकर पांव तक जरूरत भरके गरम कपड़े भी पहन रखा था, बावजूद इसके उसे लगता था ठंड उसकी हड्डियों में घुसड़ती जा रही है। चिंता उसे इसी बात की हो रही थी कि जब दिन के चार बजे, ठंड के चलते उसकी यह हाल है तो, रात में यह कैसी होगी इसी को सोचकर, वह बुरी तरह परेशान था।
खिड़की पर पहुँचकर, बड़ी बेसब्री से वह अंदर की तरफ  झाँका था। यह देखकर कि बाबू अपनी सीट पर बैठा हुआ है। उसे बड़ी राहत मिली थी। बाबू जी एक टिकट खंजनपुर, अपने स्टेशन का नाम बता, टिकट के पैसे निकालने के लिए, हाथ अपनी पैंट की जेब में डाला था तो एक दम से धक्क रह गया था। पैसे, उसकी पैंट की जेब में थे ही नहीं। कहीं मेरी जेब पर किसी पाकिट मारने, अपने हाथ तो साफ नहीं कर दिए या इस हबड़ दबड़ में, मैं उन्हे रास्ते में ही तो नहीं गिरा आया। दरअसल जब वह बस में था, उसी समय, टिकट के पैसे गिनकर, कमीज की ऊपरी जेब में सहेज लिया था जिससे कि पैसा निकालने और गिनने में, वेवजह की देरी न हो। लेकिन यह बात, इस समय उसके दिमाग से पूरी तरह उतर चुकी थी। खिड़की के पीछे बैठे बाबू को, उसने अपने गंतव्य स्टेशन का नाम, पैसा देने के पेश्तर, इसलिए बता दिया था कि इस बीच, जितनी देर में वह अपनी जेब से पैसे निकालेगा,उतनी देर में, बाबू टिकट काटकर तैयार बैठा होगा। वह उसे पैसा पकड़ाएगा और उससे टिकट लेकर, गाड़ी पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेगा।
कमीज की जेब में पैसा महफूज पाकर, उसकी जान में जान आ गई थी। चिल्लर सहित, टिकट के जितने पैसे बनते थे पाकिट से निकालकर, अपनी मुठ्ठी में लिया था और पूरा हाथ, खिड़की में घुसेड़, टिकट बाबू के सामने कर दिया था। बाबू जी एक टिकट खंजनपुर।
उसके हाथ से टिकट के पैसे थाम, बाबू बड़ी सुस्ती से आगे की तरफ  झुक आया था और अपनी गर्दन, खिड़की के करीब तक खींच, उसे सूचित किया था गाड़ी अठारह घंटे लेट है।
अठारह घंटे ... लेट ...।
जी ई .....।
टिकट काट दूँ ऊँ ...।
गाड़ी के, अठारह घंटें लेट होने की बात सुनकर, वह एकदम से बेजान सा हो गया था। बाबू को टिकट काटने के लिए, हाँ कहे या नहीं, उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। थोड़ी देर तक बाबू, अपनी गर्दन आगे की तरफ खींच, उसके जबाब का इंतजार करता बैठा रहा था लेकिन जब उसे, उसकी तरफ  से कोई जबाब नहीं मिला था तो वह, झुंझलाकर टिकट का पैसा, वापस उसकी हथेली में ठूंस, उठ खड़ा हुआ था और टिकट घर की खिड़की दड़ाम से बंद करके, कमरे से बाहर निकल लिया था।
रामजनम से उसकी मुलाकात, अर्सा पहले, एक दिन ट्रेन में सफर के दौरान हुई थी। हुआ यह था कि उस दिन,रिजर्वेशन उसके पास था नहीं। ट्रेन के जिस जनरल डिब्बे में वह चढ़ा था उसमें इतनी भीड़ थी कि कहीं खड़ा होने तक की जगह नहीं थी। लोगों के साथ,काफी धक्का - मुक्की और गाली गलौज के बाद, उसे एक कोने में, थोड़ी सी जगह मिल गई थी और वह वहीं पर अपने पॉव टिकाकर खड़ा हो गया था। पहले तो वह सोचा था कि आगे चलकर, उसे कहीं न कहीं बैठने की जगह मिल जाएगी लेकिन जैसे जैसे ट्रेन बढ़ती गई थी, डिब्बे में और ज्यादा लोग ठुंसते चले गए थे इसलिए घंटो गुजर जाने के बाद भी, उसे बैठने की कोई जगह नहीं मिली थी और वह खड़े खड़े ही सफर करता रहा था। लेकिन घंटो गुजर जाने के बाद भी जब उसे बैठने की कोई जगह नहीं मिली थी तो उसका सिर चकराने लग गया था और टांगे खड़ा रहने से जबाब दे गई थी और वह जहां खड़ा था वहीं, लोगों की टांगों के बीच धम्म से बैठ गया था।
क्या हुआ मेरे भाई, लगता है तुम्हें गश आ गया है तुम तो एकदम पसीने - पसीने हो रहे हो। वह जहाँ बैठा था, रामजनम वहीं बगल की सीट पर बैठा हुआ था। उस समय उसकी जैसी हाल थी उसे देखकर उसे उस पर तरस आ गया था। उसे जमीन से उठाकर, वह, अपनी सीट पर बैठाया था। अपनी बैग से बोतल निकालकर, उसके पानी से, उसका मुंह धुलवाया था और अपनी रूमाल से, तब तक हवा करता रहा था जब तक वह पूरी तरह ठीक नहीं हो गया था। इस तरह रामजनम उसे अपनी सीट पर बैठाकर खुद खड़े - खड़े सफर करता रहा था। काफी देर के बाद, सीट पर बैठे एक सज्जन का स्टेशन आने पर वे, उतरने के पहले, अपनी सीट, उसे दे दिए थे इसके बाद उनकी आगे की यात्रा काफी आसान हो गई थी।
राम जनम उस दिन, अपने साथ, दारू की एक बोतल लिए हुए था। रात हुई थी तो वह स्टेशन के प्लेटफार्म से दो पैकेट खाना खरीद लाया था और दोनों उस दिन साथ - साथ खाना खाये थे और छक कर दारू पिए थे। हॅसी ठठ्ठे के साथ, दोनों मे ऐसी - ऐसी बातें हुई थी उस दिन, जैसे वे दोनो बचपन के लंगोटिया और हमराज हों। सफर खत्म होने के पहले दोनों एक दूसरे को, अपना - अपना पता दिये थे। राम जनम अपने घर का पता लिखने के साथ,उसकी डायरी में, स्टेशन से निकलकर, उसके घर कैसे पहुँचना है उस तक का एक नक्शा बना दिया था। मेरे घर की तरफ  तुम्हारी रिश्तेदारी है इसलिए तुम सिर्फ  मेरे दोस्त ही नहीं, रिश्तेदार भी हुये। भविष्य में, जब भी तुम अपनी रिश्तेदारी आओ, तो मेरे घर आना मत भूलना, मेरे दोस्त, सच कहता हूँ बड़ी मजा आएगी। बोलो आओगे ना।
- आऊँगा मेरे दोस्त, जरूर आऊँगा। बिछुड़ने के पहले दोनों इस तरह एक दूसरे से गले मिले थे जैसे दोनों का जन्मों का साथ रहा हो।
ऐसा नहीं था कि राम जनम उसकी याददाश्त से उतर चुका था। उसके साथ का उस दिन, का वह सफर, उसे अच्छी तरह याद था और जब कभी वह अपनी रिश्तेदारी जाने के लिए इस स्टेशन पर उतरा था या वापसी में ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पहुँचा था तो राम जनम उसे जरूर याद आया था। लेकिन उसकी याद, महज यादों तक ही सीमित रही थी। रामजनम के लिए उसके भीतर ऐसा कोई आकर्षण या खिंचाव कभी नहीं महसूस हुआ था कि वह उससे मिलने के लिए उसके घर तक खिंचा चला जाता। सफर के दौरान, कभी - कभी ऐसे हमसफर मिल जाते है जिनसे ऐसी घनिष्ठता हो जाती है कि लगता है कि उनसे अपना जन्मों का साथ हो। लेकिन सफर के दौरान की घनिष्ठता, श्मशान वैराग्य की तरह, सिर्फ  उस सफर तक या थोड़े समय बाद तक ही मौजूद रहती है। सफर खत्म होने के बाद, जब लोग अपने - अपने परिवेश में रम जाते है तो वह सफर, किसी सुखद सपने की तरह याद तो आता है लेकिन, उसकी बुनियाद पर, हम सफर के घर पहुँच कर उससे मिलने कि बात सोचना ही बेमानी सा लगता है। राम जनम को लेकर, इतने अर्से तक ठीक ऐसा ही कुछ, उसके साथ भी होता रहा था और वह राम जनम के यहाँ जाने की कभी सोचा तक नहीं था।
समूचे मुसाफिरखाने में, उसके सिवा दूसरा एक भी मुसाफिर नहीं था। स्टेशन का भी वह एक चक्कर लगा आया था लेकिन वहाँ भी उसे कोई मुसाफिर नहीं दिखा था और न ही कोई ऐसी जगह दिखी थी जहाँ वह सुकून से हाड़ कॅपाती इस ठंड में अपनी रात काटता। ऐसे में रामजनम के घर जाने के सिवा, उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
रामजनम का घर, स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं था, और उसने उसकी डायरी में जिस तरह, अपने घर पहुँचने का पूरा नक्शा बना रखा था, उससे वह उसके पते तक बड़ी आसानी से पहुँच भी लिया था। लेकिन उसके पते पर पहुँचने पर जो दृश्य उसकी आँखो के सामने पेश आया था, उसे देखकर वह विचलित हो उठा था। रामजनम ने उसे बताया था कि वह बैंक में बाबू है और उसका अपना खुद का बड़ा मकान है। लेकिन जिस जगह वह, अपने मकान होने की बात बताया था वहाँ दूर दूर तक मकान जैसा कुछ भी नहीं था। वहाँ थी तो, कोलियरी के काफी पुराने और जर्जर धौरों ( छोटे - छोटे घरों ) वाली एक बस्ती।
जिस जगह वह खड़ा था वहाँ से थोड़ी दूर पर, एक पुराना नीम का पेड़ था। जिसके चारों तरफ बड़ा चबूतरा बना हुआ था और उस चबूतरे पर मर्दो की दो गोल, गोलियां कर बैठी हुई थी और हर गोल के बीच, दो तीन दारू की बोतलें और एक बड़े पत्तल पर चिखना रखा हुआ था। सबके हाथ में काँच की छोटी गिलासें थी और वे बोतल से उड़ेल -  उड़ेल कर, चखने के साथ दारू पीने में जुटे हुए थे। चबूतरे से सँटकर कोयले का एक बड़ा ढेर जल रहा था। जिस तरह नीम के पेड़ के चबूतरे पर शाराबियों की दो गोल, दारू पीने में मशगूल थी उसी तरह, जलते कोयले की ढेर को घेरकर, दो और गोल दारू की बोतलों के साथ जमी बैठी थी। उनसे थोड़ा हटकर कम उम्र के बच्चे कंचे खेल रहे थे। नीम के चबूतरे से थोड़ा हटकर राख के तीन बड़े ढूहे थे। धौरों की तरफ  से एक नाली इधर को ही आई हुई थी और कूड़े कताउर और राख के ढूहों के चलते उसका आगे का रास्ता बंद हो चुका था, जिसके चलते धौंरो का सारा पानी, एक जगह जमा होकर, कीचड़ से बजबजाती,छोटी गड़ही सरीखी बन गई थीऔर उसमें सुअरो का एक झुंड लोट - पोट करने के साथ, आपस में लड़ भी रहे थे। जलते कोयले से अलकतरे की गंध का धुंआ, बजबजाते कीचड़ की सड़ांध और वैसे ही गंदे और दारू के नशे में चूर लोगों को देख उसका मन गिजगिजा उठा था।
राम जनम बैंक में बाबू हैं। वह इतनी गंदी जगह और इन सुवरों और शराबियों की बस्ती में रह कैसे सकता है? उसने मुझे यह भी बताया था कि उसका अपना खुद का एक बड़ा मकान है, लेकिन यहाँ, इन धौरों के अलावा, दूर - दूर तक कोई मकान भी कहीं नहीं दिख रहा है? कही मैं गलत जगह तो नहीं आ गया हूँ?
राम जनम के बारे में, लोगों से दरयाफ्त करके, पता करे या नहीं, वह अभी सोच ही रहा था कि इसी बीच शराबियों की गोल से एक आदमी उठकर उसके पास आया था और लड़खड़ाती जुबान में उससे पूछा था - आप किसे खोज रहे है बाबू ऊ ऊ।
- यहाँ कोई रामजनम नाम का आदमी रहता है।
- राम जनम, कौन रामजनम, दारू के नसे से झखियाया अपने दिमाग पर जोर लगाकर वह रामजनम के बारे में सोचा था।
- रामजनम जो बैक में बाबू है।
- बैक में बाबू ऊ हुँ । थोड़ी देर सोचने के बाद भी रामजनम, जब उसके ध्यान में नहीं आया था तो वह नीम के चबूतरे पर गोलिया कर बैठे लोगो से दरयाफ्त किया था - यहाँ बैक का बाबू  रामजनम कौन है रे भाई।
- अरे बाकल बाबू अपने रामजन्मा के बारे में पूछ रहा होगा। जवाब में चबूतरे पर बैठा एक आदमी उसे जोर से डांटा था।
- ओ ओ ऽ ऽ ऽ तभी तो हम कहे ...  जनम यहाँ कवन है रे भाई। इतनी देर में, जो आदमी चबूतरे से उसे डांटा था वह वहाँ से उठ कर उसके पास आ कर खड़ा हो गया था। हालाँकि वह भी काफी पिया हुआ था लेकिन पहले वाले की तरह न तो उसकी जुबान बेकाबू थी और न ही शरीर ही।
- रामजनम जो बैक में काम करता है आप उसी को खोज रहे है न बाबू।

- हाँ ... हाँ ... मै उसे ही खोज रहा हूँ।
-बाबू ऊ इस धौरे के पीछे जो धौरा है न, उसी लाइन में रामजन्मा का डेरा हैं इधिर से आप चले जाओं, उसके डेरे के सामने नीम का बड़ा पेड़ है।
- राम जनम ने मुझे बताया था कि वह बैंक में बाबू है।
- यह तो हम बता नहीं सकता बाबू, लेकिन वह बैंक में काम जरूर करता है।
- क्या तुम मुझे, उसके डेरे तक नहीं पहुँचा दोगे?
उसके आग्रह पर वह उसे बड़ा खुशी मन से रामजनम के डेरे पर पहुँचा आने के लिए राजी हो गया था।
रामजन्मा गे ए ऽ ऽ गे ए रामजन्मा आ ऽ ऽ। रामजनम के दरवाजे पर पहुँचकर वह उसे, जोर - जोर से आवाज लगाने के साथ, उसके किवाड़ का सांकल भी खटखटाया था। दो तीन आवाज के बाद, राम जनम घर का दरवाजा खोल, अपने दोनों हाथों से दरवाजे की दोनों तरफ  की कवही थाम, सवालिया नजरों से आंगतुक को ताकता खड़ा था।
- देख ई बाबू, तोहे खोजि रहलो छिए!
- कौन? उसके चेहरे पर गहरे से ताक रामजनम उसे पहचानने की कोशिश किया था लेकिन वह उसे नहीं पहचान सका था।
- मुझे नहीं पहचाने न मेरे दोस्त।
- नहीं। इनकार में अपना सिर हिला, रामजनम दरवाजे की कवही छोड़ उसके एकदम करीब आकर, उसे पहचानने की कोशिश किया था लेकिन फिर भी वह उसे नहीं पहचान सका था। सचमुच, मैं आपको नहीं पहचाना।
- काफी अर्सा पहले हम दोनों ट्रेन में मिले थे। तुमने मेरी डायरी में अपना पता लिखकर मुझे दिया था यह देखो, और वह अपनी जेब से छोटी डायरी निकाल, जिस पन्ने पर रामजनम अपने घर का पता लिखा था, उसे खोलकर उसके सामने कर दिया था।
- ओ ओ ऽ ऽ ऽ ओ ऽ ऽ तो आप हैं? डायरी में खुद के हाथ की लिखावट देख रामजनम को ट्रेन के सफर के दौरान, उसके साथ की मुलाकात, याद पड़ गई थी और वह उसे बड़ा धधाकर अपनी बाहों में भर लिया था। आओ, मेरे दोस्त, आओ, रामजनम के इस गरीब खाने में तुम्हारा स्वागत है। रामजनम उसे पाकर एकदम से निहाल हो उठा था। आओ मेरे दोस्त आओ। दरअसल तुमने अपना चेहरा पूरी तरह चद्दर से तोप रखा है न इसीलिए मैं तुम्हें नहीं पहचान सका।
गुफानुमा रामजनम के एक कमरे वाले धौरे में, छोटा सा एक आँगन था। आगे करीब पाँच बाई दस फुट का एक बरामदा था जिसे राम जनम अपनी रसोई की मसरफ  में लिया हुआ था। उसकी औरत उस समय, कोयले की अंगीठी पर रोटियाँ सेक रही थी। सुरंग नुमा उसकी कोठरी, पूरी तरह खुली हुई थी। भीतर उसके, ताखे पर एक ढिबरी जल रही थी। उसके पहुँचने के पहले, उसके चार बच्चे कोठरी में धमाचौकड़ी मचा रखे थे लेकिन उसे आया देख, सब अपनी धमाचौकड़ी बंद करके, किवाड़ की ओंट से उसे बड़े कुतूहल से निहारते खड़े थे। उसकी पत्नी उसे देख, जमीन से पल्लू उठाकर अपने सिर पर डाल ली थी।
उसे बैठाने के लिए रामजनम, कोठरी के भीतर से दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ निकाल बरामदे में डाल दिया था। कंधे से टंगा बैग नीचे उतार कर वह जमीन पर रखा था और कुर्सी पर बैठ रामजनम के समूचे घर का सरसरी नजरों से फिर से मुआयना किया था। रामजनम के घर में इन दो कुर्सियों के अलावे कोई खटिया या पलंग नहीं थी। हालांकि रामजनम के कपड़े गंदे नहीं थे और न ही वही वैसा गंदा था जितना गंदा उसका घर, घर के सामान, बच्चे और उसकी औरत थी। इतने गंदे माहौल में और एक कोठरी वाले इस घर में, वह अपने रहने की जगह तलाशने के साथ - साथ, वहाँ दस पन्द्रह घंटे कैसे गुजारेगा, इसके लिए खुद को तैयार करने लगा था।
रामजनम अपनी पत्नी को चाय बनाने को कहकर दूसरी कुर्सी उसके एकदम करीब खींचकर बैठ गया था और उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबाकर चहका था। दोस्त आज सुबह से ही रह रहकर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता था, लगता था आज मेरे घर जरूर मेरा कोई अजीज पहुँचने वाला है। और मेरी खुशनसीबी देखो कि तुम जैसा दोस्त मेरे घर पहुँचा गया।
दरअसल मेरे एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई थी। उसी की तेरहवीं में मैं पेटरवार आया हुआ था। वापस लौटने के लिए स्टेशन पहुँचा तो पता चला गाड़ी अठारह घंटे लेट है। मेरे पास प्रचुर समय था सोचा चलकर तुमसे मिल आते है।
रामजनम अपने बारे में जितना उसे बताया था उसकी बुनियाद पर वह उसे किसी सभ्य घर परिवार और अच्छी हैसियत का आदमी समझ रखा था। लेकिन वहाँ वैसा कुछ भी नहीं था। इतनी देर में जो कुछ वह देख चुका था, उससे उसे लगने लगा था कि वह, बहुत ही बुरी जगह और बुरे लोगों के बीच आ फंसा है कि रामजनम बहुत बड़ा झुठ्ठा और ठग है और उसे जितनी जल्दी हो, यहाँ से भाग निकलना चाहिए। इसलिए वह रामजनम से कुछ इस तरह बतियाया था जैसे वह उसके साथ चाय पानी करके तुरंत, यहाँ से निकल जाएगा।
- बहुत अच्छा किए मेरे दोस्त, मैं तुम्हें पाकर धन्य हुआ। हमारे पास अठारह घंटे का समय है। मौसम भी आज काफी अच्छा है दोनों मिलकर इसका खूब जश्न मनाएगें ठीक है न? रामजनम उसके कंधे दबा जोर से चहका था।
रामजनम की पत्नी कांच के दो गिलास में, लाल चाय उन्हें पकड़ा गई थी। चाय गरम थी इसलिए रामजनम अपना गिलास, जमीन पर रख अपनी कुर्सी खींच उसके काफी करीब सँट कर उससे शिकायत किया था - मुद्दत बाद तुम्हें मेरा ख्याल आया, मेरे दोस्त। कहाँ थे इतने दिनों तक।
- झुठ्ठा साला, देखो कैसे बन रहा है। इसकी बात से लगता है जैसे इतने दिनों तक यह मेरी ही राह निहारता बैठा हुआ था। लेकिन उसने उसे कोई जबाब नहीं दिया था।
- तुम्हें मेरा घर ढूँढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई मेरे दोस्त।
- नहीं ... नहीं कोई परेशानी नहीं हुई। बड़ी आजिजी से उसने उसे जबाब दिया था।
रामजनम अपनी चाय खत्म करके उससे थोड़ी मोहलत लेकर अपनी कोठरी में घुस गया था और थोड़ी देर बाद, जब वह कोठरी से बाहर निकला था तो उसकी हुलिया देख उसकी आँखे फैली की फैली रह गई थी। सिर पर क्रोसिए से बुनी गोलौवा टोपी, टेरीकाट के सफेद कुर्ते के ऊपर काली जैकेट, नीचे चेकदार लुंगी और आँख में मोटा सुरमा डाल वह खाटी मुसलमान का रूप धर रखा था।
- चलो मेरे दोस्त चलते हैं, रामजनम आगे बढ़कर, जमीन पर पड़ा उसका बैग उठाया था और अपने कंधे पर टांग, दरवाजे की तरफ  बढ़ गया था। विस्मय से कुछ देर, रामजनम की पीठ पर अपनी नजरे गड़ाए बैठा रहने के बाद, यह जानने के लिए कि वह उसे कहाँ ले जाना चाहता है, अंगीठी पर रोटियां सेंकती रामजनम की पत्नी की तरफ सवालिया नजरों से देखा था। लेकिन रामजनम की पत्नी, अपने काम में कुछ इस तरह मशगूल थी, जैसे उसे, उन दोनों में से, किसी से कोई मतलब ही न हो। हारकर वह वहाँ से उठा था और रामजनम के पीछे - पीछे चल पड़ा था।
रास्ते में एक कलाली ( शराब घर ) के पास पहुँचकर, रामजनम उसे थोड़ा रूकने के लिए कहकर, कलाली की तरफ  गया था और जब वहाँ से वह लौटा था तो उसके एक हाथ में देशी शराब की दो बोतलें और दूसरे में पालीथीन की थैली में बकरे का गोश्त था। अब मजा आयेगा मेरे दोस्त, चलो चलते हैं।
- लेकिन कहाँ, तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो राम जनम? जब से वह राम जनम के साथ उसके घर से निकला था यह सोचकर खुद को जव्त किए रखा था कि रामजनम चाहे कितना झुठ्ठा और फरेबी क्यों न हो, जिस आत्मीयता से उसके साथ पेश आ रहा था, वैसे में वह उसके साथ कुछ बुरा या उल्टा - पुल्टा तो नहीं ही करेगा। लेकिन जब वह उसे चलने को कहकर आगे फुटुस की घनी झाड़ियों के बीच से गुजरती पगडंडी की तरफ  बढ़ा था तो उसे उसके इरादों पर शक हो उठा था और वह उस पर एकदम से चीख पड़ा था।
उसकी चीख पर रामजनम रूक गया था और हैरान नजरों से थोड़ी देर उसके चेहरे का मुआयना करने के बाद, मुसकुराते हुए उससे कहा था - मैं तुम्हारी परेशानी समझ गया मेरे दोस्त, तुम राम जनम को बड़ा ही लुच्चा और शातिर दिमाग आदमी समझ रहे हो। सोच रहे हो कि राम जनम मुझे जरूर किसी गढ्ढे में ढकेलने के लिए लिए जा रहा है। लेकिन सच मानो मेरे दोस्त, जैसा तुम सोच रहे हो राम जनम वैसा आदमी नहीं है। फिर भी अगर तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं है तो अभी कोई देर नहीं हुई है, चलो मैं तुम्हें वापस स्टेशन छोड़ आता हूँ।
- रामजनम, तुमने मुझे बताया था कि तुम बैंक में बाबू हो और तुम्हारा अपना खुद का बड़ा मकान है। लेकिन हकीकत में न तो तुम्हारा अपना कोई मकान है और न ही तुम बैंक में बाबू ही हो। जैसी गंदी बस्ती और घटिया लोगों के बीच तुम रहते हो उसमें चोर उचक्कों और उठाईगीरों को छोड़ कोई भला आदमी तो नहीं ही रहता होगा। यही नहीं, जब मैं तुम्हारे घर पहुँचा था तो मैं तुम्हें एक रूप में देखा था और अब मैं तुम्हें एकदम अलग ही रूप में देख रहा हूँ। और ऊपर से तुम मुझे इतनी कुबेला में अपना घर छोड़कर फुटुस के जंगलों के बीच लिए जा रहे हो ऐसे में तुम्हीं बताओ कि तुम्हारी सब बातें, तुम्हारे प्रति, किसी के भी मन में अविश्वास और आतंक पैदा करने के लिए काफी नहीं है क्या?
- हैं, और पूरी तरह है मेरे दोस्त। लेकिन तुम मुझे एक बात बताओ कि अगर मैं उस दिन तुम्हें बता दिया होता कि मैं जाति का हाड़ी ( स्वीपर ) हूँ। हाड़ी बस्ती में रहता हूँ, और टट्टी मैला धोने का काम करता हूँ तो क्या उस दिन का हमारा ट्रेन का वह सफर, जितनी मौज मस्ती में कटा था, वह वैसा ही कटता? और आज जो तुम मेरे घर पहुँचकर, मुझे निहाल कर दिए हो। यदि तुम रामजनम की सारी असलियतों और हकीकतों से वाकिफ  होते तब भी उसके घर आते?
- रामजनम मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह कायल हूँ। सफर को खुशगवार बनाने के लिए। उस दिन की तुम्हारी झूठ, उस समय की एक बड़ी जरूरत थी लेकिन यह जो तुम बहुरूपियों की तरह अपना वेष बदलते चलते हो यह क्या है? रामजनम से यह सवाल पूछते समय उसकी आवाज काफी तल्ख हो उठी थी।
उसकी बात सुनकर रामजनम बड़े जोर का ठहाका लगाया था -  जानता हूँ मेरे दोस्त, कि तुम मेरे वेष बदलने को लेकर काफी परेशान हो। लेकिन सच मानों, मैं अपना वेश बदलता हूं तो किसी को ठगने और धोखा देने के लिए नहीं, बल्कि ऐसा करना मेरी मजबूरी के साथ साथ एक बड़ी जरूरत भी है।
- जरूरत ...।
- हाँ जरूरत, दरअसल हुआ यह था कि मैं एक मुसलमान औरत को बैठा लिया था। मुसलमानों ने कहा कि जब तक तुम मुसलमान नहीं बन जाते, तुम उस औरत को अपने पास नहीं रख सकते। मैंने कहा ठीक है मैं मुसलमान बन जाता हूँ और मैं कलमा पढ़कर मुसलमान बन गया। रामजनम यह बात जिस तरह बिना किसी लाग लपेट के और बेलौस कहा था उसे सुनकर उसे बड़े जोर का धक्का लगा था।
लेकिन तुम्हारे पास तो पहले से ही अपनी औरत और बच्चे थे, फिर तुम्हें ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई थी। कहीं तुम्हारा प्यार - व्यार वाला चक्कर तो नहीं था उससे।
- नहीं ... प्यार व्यार जैसा कोई चक्कर नहीं था उससे।
- तब ?
- हुआ यूँ था कि उस औरत का मर्द, कोलियरी में काम करता था। चाल गिरने से वह उसके नीचे दबकर मर गया। उसके एवज में उसकी औरत को मोटा मुआवजा और नौकरी मिली थी। औरत अभी पूरा पठ्ठी थी और उसे मर्द की जरूरत भी थी। उससे शादी करने से मुआवजे के उसके पैसे, मेरे हाथ में आने के साथ साथ एक कमासुत पठ्ठी मेरे कब्जे में आ गई थी बोलो मेरे लिए यह कोई घाटे का सौदा था क्या? अपनी इस चालाकी पर इतराता हुआ रामजनम, अपनी गर्दन ऐंठ, उससे पूछता - अपनी देह अकड़ा लिया था।
- और सिर्फ  इतने से फायदे के लिए तुम, अपना धर्म छोड़कर, दूसरा धर्म तक कबूल कर लिए रामजनम।
- लेकिन ऐसा करके मैंने कोई गुनाह कर दिया क्या... मेरे दोस्त?
रामजनम को उसने कोई जबाब नहीं दिया था। हैरान सा वह सिर्फ उसे हिकारत भरी नजरों से घूरता खड़ा रहा था।
फुटुस ( छोटे झाड़ीदार पौधे ) का जंगल पार कर रामजनम उसे जिस बस्ती में लेकर पहुँचा था उसमें अस्वेस्टस सीट से छाए एक एक कमरे के घरों वाली कई कतारें थीं। उन्हीं कतारों में से एक घर के पास पहुँचकर वह उसके दरवाजे की कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी दिया था - बेगम दरवाजा खोलो।
राम जनम के बेगम कहकर पुकारने से वह समझ गया था कि यहाँ उसकी दूसरी बीबी रहती है।
यह कालोनी भी रामजनम के पहले वाली कालोनी की तरह ही गंदी थी। जगह जगह राख के ढूहे, कूड़े कताउर के ढेर और नालियाँ, यहाँ भी वैसे ही बजबजा रही थी जैसा वह इसके पहले देखकर आया था।
थोड़े इंतजार के बाद दरवाजा खुला था तो रामजनम की बीबी के रूप में जो औरत उसकी आँखो के सामने प्रकट हुई थी, वह उसे, देखता ही रह गया था। कमसिन और बेहद खूबसूरत चेहरा, गुदाज और ठॅसी हुई देह, बड़ी बड़ी आँखें, उम्र उसकी मुश्किल से अठारह साल की रही होगी। सलवार कुर्ते में वह उसे, औरत नहीं, बल्कि कालेज में पढ़ती कोई लड़की लगी थी।
- बेगम इससे मिलो, यह है मेरा जिगरी दोस्त शिवा। बचपन में हम दोनों साथ - साथ खेले खाए हैं। आज यह बैंक में बहुत बड़ा साहेब है। लेकिन इसका बड़प्पन देखो कि इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी यह मुझे आज तक नहीं भूला। रामजनम एक ही सांस में अपनी बीबी के सामने उसकी झूठी तारीफ  में इतना लम्बा चौड़ा पुल बांध दिया था कि उसे उसका मंुह पकड़ लेने का मन हुआ था। लेकिन बोलने के लिए वह अपना मुंह खोलता, इसके पहले ही रामजनम अपनी बीबी का उससे परिचय करवाने लग गया था - और मेरे दोस्त आप हैं मेरी बेगम अजरा। आप लोगों जैसे ही रईस घर की बेटी है आप। इन्हें पाकर मेरा तो जीवन ही धन्य हो गया है। अपनी बीबी का परिचय करवाने के बाद रामजनम अपने हाथ में पकड़ी दारू की बोतल और मीट का थैला उसकी तरफ  बढ़ा दिया था। बेगम यह पकड़ो मीट और यह दारू की बोतल। आज, आप मेरे दोस्त की ऐसी खातिर करें कि यह बार - बार हमारे गरीब खाने पर दौड़ा चला आता रहे।
रामजनम के घर के बाहर जैसी भी गंदगी रही हो लेकिन भीतर उसका घर पूरी तरह रंगा पुता और साफ  था। उसके इस घर में भी वैसी ही छोटी सी एक कोठरी और बाहर वैसा ही छोटा खुला बरामदा था। यहाँ भी, बरामदे को उन लोगों ने अपनी रसोई के मसरफ  ले रखा था। बरामदे में अंगीठी में कोयला दहक रहा था और उसके पास एक मोढ़ा रखा हुआ था। उनके आने के पहले, रामजनम का इंतजार करती, उसकी बीबी, अंगीठी की आग तापती बैठी हुई थी। बाहर काफी ठंड थी लेकिन बरामदा, अंगीठी की दहकती आग से गरम था। आओ मेरे दोस्त, हम लोग चलकर भीतर बैठते है। रामजनम उसकी पीठ पर हाथ रख बड़े आग्रह से उसे अपनी कोठरी में ले आया था।
छोटी सी उसकी कोठरी, काफी साफ सुथरी और सजी हुई थी। उनके सोने के लिए एक पलंग थी जिसके बिस्तरे पर साफ  चद्दर बिछी हुई थी। रामजनम उसे विस्तरे पर बैठा, खुद उसकी बगल बैठ गया था।
थोड़ी देर में रामजनम की बीबी दो प्याली चाय एक ट्रे में रखकर कोठरी में पहुँचा आई थी। उनकी चाय खत्म होते होते वह गरम गरम आमलेट, भुने मूंगफली के दाने, गिलास और दारू की एक बोतल, उनके पास रख आई थी।
- मान गया मेरे दोस्त, तुम हो बड़े ऊँचे दर्जे के शिकारी। दारू की कुछ घूँट हलक के नीचे उतरने के बाद उसके भीतर की तमाम झिझक और संकोच गायब होकर, कई बातें, जो उसके भीतर हलचल मचा रखी थी, वे उभरकर ऊपर आ गई थी। बड़े ऊँचे दर्जे के शिकारी हो मेरे दोस्त, मुझे तुमसे बड़ी ईर्ष्या हो रही है। उसकी बात से रामजनम समझ गया था कि दारू की नशा उस पर चढ़ गई है और उसी के सुरूर में वह ऐसी बात, जिसे उसे यहाँ नहीं करनी चाहिए, करने लगा है।
- इस्सस ऽ ऽ राम जनम अपने होंठ पर हाथ रख बाहर बैठी अपनी बीबी की तरफ  इशारा करके उसे ऐसी बात यहाँ न करने के लिए मना कर दिया था।
- मेरे दोस्त, वह सब कुछ तो ठीक है लेकिन एक बात मैं तुमसे पूँछू, तुम्हे बुरा तो नहीं लगेगा? रामजनम के मना करने पर वह कुछ देर मूंगफली के दाने चबाता और दारू की घूँटें भरता चुप मारे बैठा रहने के बाद, एक बड़ा ही अहम सवाल, जो उसे राम जनम की दोनों गृहस्थियाँ देखने के बाद, बुरी तरह परेशान कर रखी थी, उसके विषय में वह उससे जानना चाहा था। पूँछू, तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा मेरे दोस्त?
- तुम मेरे दोस्त हो। तुम्हारी कोई भी बात मुझे बुरी नहीं लगेगी। बेझिझक होकर पूछो मेरे दोस्त। रामजनम, तुम्हें सब बतायेगा। इतनी देर में रामजनम पर भी दारू अपना असर कर चुकी थी और इसके चलते वह भी खुद पर अपना नियंत्रण खोने लग गया था।
- तुम कुछ समय पहले हिंदू थे मेरे दोस्त और अब तुम मुसलमान हो। हो न?
- एकदम हूँ मेरे दोस्त और पूरी तरह हूँ।
- इसका मतलब तुम एक ही समय में दो अलग - अलग तरह की और एक दूसरे के एकदम विपरीत जिंदगियाँ जीते हो। बोलो जीते हो ना?
- हाँ जीता हूँ।
- ऐसे में, एक बात जो मेरी समझ में नहीं आयी वह यह है कि तुम अपनी इन दोनों जिन्दगियों के साथ तालमेल कैसे बिठाते हो?
- सच कहूँ मेरे दोस्त, तो मुझे अपनी दोनों जिन्दगियों में तालमेल बिठाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ती। थोड़ी देर सोचने के बाद, रामजनम हॅसते हुए उसे जबाब दिया था।
- अच्छा, वह कैसे?
वह इस तरह कि जब मैं रामजनम होता हूं तो मन्दिर जाता हूँ पूजा पाठ करता हूँ, होली दशहरा और दीवाली ठीक वैसे ही मानता हूँ जैसा एक हिन्दू मनाता है और जब मैं रमजानी होता हूँ तो मस्जिद जाता हूँ नमाज पढ़ता हूँ, ईद, बकरीद मानता हूँ और वैसा ही मैं अपनी दोनों बीबियों के साथ भी निभाता हूँ।
- कमाल है ... आश्चर्य से उसकी आँखे थोड़ी देर तक फैली रही थी और फिर एक बड़ी गहरी शरारत, उसके चेहरे पर तैर आई थी। कर लेते होंगे मेरे दोस्त, जरूर कर लेते होंगे क्योंकि बनने की कला में तुम बड़े ऊँचे दर्जे के कलाकार जो ठहरें। उसकी यह कटूक्ति और उसके कहने का अंदाज काफी चुभने वाला था और वह रामजनम को चुभा भी था लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप राम जनम उसकी इस कटूक्ति को कोई तवज्जो नहीं दिया था और उसे हंसकर उड़ा दिया था।
इसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई थी। जिसकी भी गिलास की दारू खत्म होती, दूसरा बोतल से उड़ेलकर कर उसे भर देता और इस तरह दोनों दारू की चुस्कियाँ लेते बड़ी देर तक शराब पीते बैठे रहे थे।
मीट पककर तैयार हो गया था तो रामजनम की बीबी अंगीठी के पास चटाई डाल, दोनों को खाने पर बैठा, खुद रोटियाँ सेंकने बैठ गई थी और तवे से गरम गरम रोटियाँ उतारकर उनकी थालियों में परोस परोस कर उन्हें खिलाने लग गई थी। उसने गोश्त बड़ा लजीज बनाया हुआ था और वह और रामजनम दोनों उसे बड़े आग्रह और सत्कार से ज्यादा से ज्यादा खिला देने पर जुटे हुए थे। लेकिन रामजनम की अब तक की जिन कारगुजारियों से वह रूबरू हो चुका था, उसे लेकर उसकी तरफ  से उसका मन किसी बड़े षंड़यंत्र की आशंका से घिरा हुआ था। हालांकि दिखाने के लिए वह रामजनम से बड़ा हंस हंसकर बातें कर रहा था और खाने की तारीफ  कर करके बड़ा चटखारे ले लेकर खाना भी खा रहा था लेकिन उसकी चोर नजरें रामजनम और उसकी बीबी के चेहरों और हाव भाव से लेकर उसके घर के कोने - कोने में छुपे, संभावित खतरों की टोह लेने में जुटी हुई थी। इस आदमी से मेरी, महज कुछ घंटों की मुलाकात है और वह भी चलती ट्रेन के डिब्बे में। ऐसी मुलाकाते लोग याद रखने तक की जहमत नहीं करते। सफर खत्म हुआ और वे उसे भूल जाते हैं लेकिन यह शख्स मेरे साथ ऐसा गुड़ चिउँटा हो रहा है जैसे इसकी और मेरी जन्मों की दोस्ती रही हों। और इसकी बीबी, यह साली तो उससे भी ज्यादा छँटीं हुई लगती है। इस तरह हंस हंस कर मुझे खिला रही है, जैसे मैं इसका कोई पुराना यार होऊँ। इन दोनों के मन में जरूर कोई बड़ी खोट है नहीं तो भला, किसी अनजान और अपरिचित की कोई इतनी आवभगत कभी करता है क्या?
खाना पीना खत्म होते होते तक काफी रात बीत चुकी थी। रसोई का सारा काम समेट कर अपना हाथ सेंकने के लिए, रामजनम की बीबी अंगीठी के पास आकर बैठी थी तो राम जनम ने उससे कहा था - ऐसा है बेगम कि रात काफी हो चुकी है और ठंड भी आज बहुत ज्यादा है तुम ऐसा करो कि एक गोंदरी लाकर यहीं अंगीठी के पास डाल दो।
- खट ... खट ... खट...। घर के बाहरी दरवाजे की साँकल के बजने की आवाज थी यह। आवाज कान में पड़ते ही वह घबराकर विस्तरे पर बैठ गया था। रात के इस पहर में और बजाने वाले ने जिस दबे हाथ और आहिस्ती आवाज में साँकल खटखटाया था उसे सुन डर से उसका कलेजा मुंह को आने लग गया था।
खट्ट ... खट्ट ... खट्ट इस दफा सांकल के बजने की आवाज ज्यादा वजनी थी और बजाने वाले ने सांकल बजाने के साथ सांसो के जोर से रामजनम को आवाज भी दिया था। रामजन्मा गे ...। दरवाजे की खटर खटर और पुकारने वाले की आवाज पर रामजनम तो नहीं, लेकिन उसकी बीबी उठी थी और दबे पांव कोठरी से निकलकर बाहरी दरवाजे की सिटकिनी खोल देखी थी तो बाहर उसे शंकर और राम अवतार खड़े मिले थे।
- क्या हुआ, इतनी रात में? रामजनम की औरत, उन दोनों को अच्छी तरह जानती थी। दोनों रामजनम केधौरों की लाइन में रहते थे। वे ,उसके अच्छे दोस्त थे और दोनों कोलियरी में काम भी करते थे।
- रामजन्मा नहीं है क्या? राम औतार ने उससे पूछा था।
- हैं तो ... लेकिन बात क्या है? यह जान कर कि रामजनम घर में ही है, वे दोनों बिना और रूके या उसे कुछ बताए घर के अन्दर आ गए थे और अंगीठी की धधकती आंच में अपना हाथ सेकने लग गए थे।
रामजनम गहरी नींद में था। बीबी के काफी हिलाने, झकझोरने के बाद वह उठा था तो बीबी पर गुस्सा गया था। लेकिन राम औतार और शंकर पर नजर पड़ते ही उसका गुस्सा एकदम से ठंडा पड़ गया था। आज की रात उसे मुर्दा खोदने जाना था इसी के लिए वह उन दोनों को बुलाया हुआ था लेकिन यह बात उसके खुद के दिमाग से पूरी तरह उतर ही गई थी।
- चलना नहीं है क्या? राम औतार ने उससे पूछा था तो वह, झट उठकर खड़ा हो गया था। दिन में ही रामजनम व्यापारी से मुर्दे के लिए पाँच हजार रूपए की पेशगी थाम चुका था। सुबह होने के पहले, उसे कब्र से मुर्दा निकालकर, उसके हवाले कर देना था। शर्त के हिसाब से बाकी के दस हजार उसे, काम पूरा होने के बाद मिलने को था। धंधे की बात है यह और धंधे में पैसा उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि किसी को दी हुई बात पर कायम रहना और वादे के मुताबिक काम करके दे देना। व्यापारी को कल ही यहाँ से कूच भी कर जाना था इसलिए किसी भी हाल में, उसे यह काम आज ही निपटा देना था। अगर यह काम आज रात नहीं हो गया तो इससे न सिर्फ  उसकी बतकटी होगी बल्कि उसकी साख को भी बट्टा लगेगा। रामजनम की यही सबसे बड़ी खासियत है कि वह जितना किसी से वादा करता है उतना और ठीक वैसे ही उसे पूरा भी करता है। इसी के चलते मार्किट में उसकी अच्छी शाख है और उसकी इसी साख के चलते, उसे सब पूछते भी है वर्ना यह काम करने वाले तो यहाँ अनेकों घूम रहे हैं।
बिस्तरे पर अपना दम साधे बैठा वह, कोठरी के बाहर चलती खुसुर पुसुर पर अपने कान लगाए उन लोगों के भीतर क्या बात हो रही है उसे सुनने की कोशिश में जुटा हुआ था। लेकिन वे लोग इतने आहिस्ते और दबी जुबान मे बतिया रहे थे कि उन्हें सुन पाना मुश्किल था।
बिस्तरे पर बैठे - बैठे, इन सालो का आसान शिकार बनने से तो अच्छा कि इनसे भिड़कर अपनी जान बचाऊं सोचा था उसने। अगर इन लोगों ने मिलकर मुझे कोठरी के भीतर दबोच लिया या बाहर से सांकल चढ़ाकर कोठरी में कैद कर दिया तो गुहार लगाने पर भी कोई नहीं सुनेगा इसलिए यहाँ से भाग लेना ही अच्छा है। यही सोचकर वह बिस्तरे से उतरकर, जल्दी जल्दी अपने कपड़े पहना था और कोठरी के बाहर आकर खड़ा हो गया था।
उसे बाहर खड़ा देख, शंकर और राम औतार एकदम से सकड़ से गए थे। दोनों ने पहले तो एक दूसरे को सवालिया नजरों से देखा था फिर वे रामजनम की बीबी को देखने लग गए थे। रामजनम उस समय आंगन में एक किनारे खड़ा, गिलास के पानी से अपना मंुह धो रहा था। मुँह धोकर, जब वह पीछे मुड़ा था तो उसे बरामदे में खड़ा देख, वह भी क्षण भर के लिए असहज हो उठा था। लेकिन तुरंत ही, खुद पर काबू करके, बड़े आत्मविश्वास के साथ वह उसके पास आया था और उसके कंधे पर हाथ रख हल्की झिड़की पिलाते हुए उससे कहा था - तुम क्यों उठ गये मेरे दोस्त, जाकर आराम से सोओ। दरअसल हम लोगों को अभी और इसी समय एक बहुत ही जरूरी काम निपटाना है इसलिए हम लोग बाहर निकल रहे हैं। इसके बाद, उसकी अचानक की उपस्थिति से हैरान परेशान शंकर और राम औतार को उसने बताया था अरे,  घबराओ नहीं यह मेरा पुराना लंगोटिया है अपना बहुत ही गहरा दोस्त।
इतनी नियाई रात में और कड़ाके की इस ठंड में इन तीनों को ऐसा कौन सा जरूरी काम आन पड़ा है जो इन्हें, अभी और इसी वक्त बाहर जाने की जरूरत पड़ गई? रामजनम की तुरंत बाहर निकलने की बात सुन वह बुरी तरह घबरा उठा था और इतनी ठंड में भी उसे पसीने छूट गए थे। हीलते कांपते, वह राम जनम के पास आया था और बड़ा मिमियाते हुए उससे पूछा था - क्या मैं भी तुम्हारे साथ नहीं चल सकता राम जनम?
- अगर तुम चलना चाहो तो चल सकते हो मेरे दोस्त, लेकिन इतनी ठंड में तुम परेशान हो जाओगे।
राम अवतार अपने साथ, दो बोतल दारू की ले आया था। चारों बैठकर, बिना किसी चिखना के शराब की बोतल खाली किए थे और बाहर निकल पड़े थे। राम औतार के हाथ में एक फावड़ा और शंकर के हाथ में एक गैंता था। रामजनम छोटा सा सावेल, प्लास्टिक की बोरी, अपने एक हाथ में और दूसरे में छोटी टार्च ले रखा था। तीनों आगे आगे एक लाइन में चल रहे थे, सबसे पीछे वह था।
- हम लोग कहाँ और क्या करने जा रहें हैं? बस्ती से निकलकर चारों निचाट में पहुँचे थे तो उसने राम जनम से पूछा था। लेकिन रामजनम कुछ बताने की बजाय, इस्स की आवाज निकाल, उसे बोलने के लिए मना कर दिया था।
थोड़ी देर में चारों एक निहायत ही वीरान जगह में पहुँचे थे। रामजनम, राम औतार और शंकर को काम पर लगाकर, उसे अपने साथ लिया था और दोनो एक चबूतरनुमा जगह पर जाकर बैठ गए थे। जहाँ वे बैठे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर राम औतार और शंकर भुकुर भुकुर कुछ खोद रहे थे लेकिन क्या खोद रहे थे, अंधेरे में, उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिस चबूतरे पर वह बैठा था, हाथ से टटोलकर, जगह का अंदाजा लगाया था, तो उसे लगा कि वह किसी कबर पर बैठा हुआ है और कबर का ख्याल आते ही वह डरकर बगल बैठे रामजनम से एक दम से लिपट गया था। उसे लगा था कबर के भीतर गड़ा आदमी वहाँ से निकलकर अपना कंकालनुमा पंजा, उसकी गर्दन पर रख दिया है। वह बड़े जोर से चीख पड़ता, यदि रामजनम उसे, अपनी बांह में भरकर, जोर से भींच नहीं लिया होता।
- क्या हुआ मेरे दोस्त, तुम इतना डर क्यों गये? सांस के जोर से रामजनम डांटते हुए उससे पूछा था।
- हम लोग किसी की कबर पर बैठे हुए हैं क्या?
- हाँ यह कबर ही है।
- वे लोग क्या खोद रहे हैं?
- वे लोग, कबर खोद रहे हैं लेकिन इस समय हमें कुछ बोलना नहीं है हमारी जान काफी खतरे में हैं। रामजनम की हिदायत पर एकदम से चुप्पी साध लिया था उसने।
- काम हो गया बास। कबर खोदकर, उसका मुर्दा बाहर निकाल लेने के बाद राम औतार, उसके पास आकर, बड़ा फसफुसाते हुए उसे बताया था।
- इतनी जल्दी?
उसकी बात सुन, रामजनम के मन में गहरी शंका उठ खड़ी हुई थी। इतनी जल्दी इन दोनों ने कबर खोद कैसे लिया? इत्मीनान करने के लिए वह, कबर के पास जाकर टार्च की रोशनी में मुर्दे को देखा था तो उसे सारी गड़बड़ समझ में आ गई थी। दरअसल, दिन की रोशनी में, वे लोग जिस कबर को खोदना तय किये थे, नशे में धुत्त होने की वजह से दोनों उसे न खोदकर, बगल की एक ताजा तरीन कबर, जिसमें कल ही मुर्दा दफन किया गया था, उसे खोदकर, उसका मुर्दा बाहर निकाल लिये थे।
- यह क्या कर दिया तुम दोनो ने? साबुत और ताजा मुर्दा देख रामजनम बुरी तरह झल्ला उठा था।
- हाँ बास, यह तो बहुत बड़ा भूल हो गिया। दरअसल झोंक में कुछ पता ही नहीं चला। शंकर बड़ा गिड़गिड़ाते हुए राम जनम से अफसोस प्रकट किया था।
- अच्छा छोड़ उसे, चल इसे खोदते हैं।  कल उसे देने का वादा कर लिये हैं। नहीं मिलने पर वह गुस्सा करेगा। इसके बाद वे तीनों बगल की एक काफी पुरानी कबर खोदने में जुट गये थे।
साबुत मुर्दे को कबर के भीतर, वापस दफनाने में काफी वक्त लगता और ज्यादा देर तक वहाँ रूकने में काफी जोखिम भी था, इसलिए रामजनम, पुरानी कबर का कंकाल, बोरी में भरकर अपने कंधे पर लादा था और राम औतार और शंकर साबुत मुर्दे को अपने कंधों पर लाद चल पड़े थे। थोड़ी देर चलने के बाद चारों एक छोटी पुलिया के पास पहुंच कर रूक गए थे। रामजनम कुछ बोला नहीं था। इशारे से उन दोनों को आगे बढ़ने के लिए कहकर टार्च की रोशनी फेंक उनका रास्ता दिखाने लग गया था। पुलिया के नीचे से एक जोहड़ बहता था। ताजा मुर्दे को कंधे पर लादे लादे रामऔवतार और शंकर पुलिया के नीचे गये थे और मुर्दे को पानी में उतार, दो तीन बड़े पत्थरों से उसे दबाकर रामजनम के पास वापस आ गये थे।
- ठीक से दबा दिया है न?
- हाँ दबा दिया बास।
लेकिन रामजनम को उनकी बात का भरोसा नहीं हुआ था। वह खुद जोहड़ के पास जाकर टार्च की रोशनी में पानी में दबे मुर्दे को देखा था और मुर्दा ठीक से दबाकर रखा गया है इस बात का इत्मीनान हो लेने के बाद वापस आ गया था।
शंकर और राम औतार को वहीं से विदा करके रामजनम बोरी का कंकाल अपने कंधे पर लाद चल पड़ा था। थोड़ी देर चलने के बाद फुटुस का एक छोटा जंगल पड़ा था। जंगल पार करने के बाद, एक बंगला आया था। बंगला, बड़ी एकान्त और सुनसान जगह में था लेकिन वह काफी विशाल था और उसके चारों तरफ काफी लंबी और ऊँची बाउण्ड्री थी और बाउण्ड्री पर चारों तरफ  वैपर लाइटें दगदगा रही थीं।
जैसे ही वे दोनों बंगले के गेट पर पहुँचे थे भीतर से दो अल्सेसियन कुत्ते शेरों की तरह दहाड़ते गेट की तरफ  दौड़ पड़े थे। कुत्तों के गेट पर पहुँचने के थोड़ी ही देर बाद एक आदमी हाथ में राइफल लिये गेट पर आया था। वह खुद को सिर से लेकर पाँव तक मोटे ऊनी कम्बल से ढाप रखा था लेकिन चेहरा उसका खुला हुआ था। उसका चेहरा बाघ की तरह बड़ा था और उसी की तरह खूँखार भी था।
- यह कौन है ? राम जनम के साथ, दूसरे आदमी को खड़ा देख, गुर्राती आवाज में उसने उससे पूछा था।
- यह मेरा दोस्त है हुजूर। उसके पूछने पर रामजनम बुरी तरह सिकुड़ सा गया था। अपनी सफाई में करीब करीब हकलाते हुए उसने उसे बताया था, इस बेवकूफ  को मैं अपने साथ आने से मना किया था हुजूर, लेकिन यह नहीं माना।
- हऊ ऊम ऽ ऽ ऽ रामजनम को इस तरह की गलती दोबारा नहीं करने के लिए वह उस पर गुर्राकर रूपयों की एक गड्डी उसकी तरफ उछाल वापस लौट गया था। रूपयों की गड्डी हवा में फड़फड़ाती, रामजनम के ठीक सामने आकर गिरी थी। वह दौड़कर उसे जमीन से उठा लिया था और अपने माथे से लगा बिना गिने ही अपनी भीतरी जेब में डाल बोरी का कंकाल वहीं गेट पर छोड़ अपने घर आ गया था।
रामजनम के साथ वह जिस डरावनी और हैरत अंगेज दुनिया से गुजर कर वापस लौटा था, उसे लेकर उसका दिमाग उड़ सा गया था। घर पहुँचकर रामजनम तो पहले की तरह ही बरामदे के अपने बिस्तरे पर लेट गया था और थोड़ी ही देर में खर्राटे भरने लग गया था लेकिन वह बदहवास सा अपनी आँखे फाड़े चारों तरफ  ताकता बिस्तरे पर बैठा रहा था।
सुबह पता नहीं वह और कितनी देर सोया रहता, यदि राम जनम के दरवाजे के पिटने की आवाज से उसकी नींद टूट न गई होती। दर असल हुआ यह था कि रात में वे लोग जिस आदमी की ताजी लाश कबर से खोद लाए थे उसके घर वाले सुबह जब अगरबत्ती जलाने और फूल चढ़ने के लिए कबर पर पहुंचे थे तो यह देख कर हैरान रह गए थे कि उनकी कबर न सिर्फ खुदी हुई है बल्कि उसमें दफनाई लाश भी नदारद है। और जब लोगों ने देखा कि उस कबर से सटी, एक दूसरी काफी पुरानी कबर और भी खुदी हुई है और उसका भी कंकाल नदारत है तो उन्हें यह समझते देर नहीं लगी थी कि कोई आदमी रात में कबर खोद कर उसमें दफन उनके अजीज की लाश निकाल ले गया है।
कबर में दफन आदमी यदि जिंदा रहते कहीं भाग गया होता या नदी तालाब में कूद कर अपनी जान दे दिया होता तो शायद इस घटना से उसके घर वालों के दिल को उतना आघात नहीं पहुंचता, जितना आघात उन्हें कबर के खुदने और उसमें से उनके अजीज की लाश निकाल लिए जाने से पहुंचा था। उन्हें लगा था जैसे कि खोदने वाला, कबर खोदकर, उनके अजीज की लाश नहीं उठा ले गया है बल्कि, जिस अभेद्य और स्थाई दुर्ग में वे उसे पृथ्वी के रहने तक निश्चिंत और सुरक्षित रहने के लिए पहुंचा आए थे उसे ढहाकर उसने उसे दरबदर करके हमेशा - हमेशा के लिए भटकने के लिए छोड़ दिया है। अपने अजीज की दुर्गति का यह खयाल उन्हें बुरी तरह परेशान करके रख दिया था। इसे लेकर जहाँ एक तरफ लोग गहरे सदमे में थे वही दूसरी तरफ वे बुरी तरह उत्तेजित थे और उनमें गहरा रोष था।
घर के लोग कब्ररिस्तान से लौटकर इस खौफनाक घटना की जानकारी किसी को देते, इसके पहले ही यह खबर उड़कर उनकी बस्ती में पहुँच गई थी। और इसके बाद इस तरह की तमाम खबरों के मिलने पर जैसा होता है वैसा ही सब कुछ इस खबर के बस्ती में पहुंचने के बाद भी हुआ था। खबर सुनकर पहले तो लोगों को जैसे हजार वोल्ट के करेंट का झटका सा लगा था और जो जहाँ और जिस हाल में था एक दम से सुन्न रह गया था कुछ इस तरह जैसे उनकी शरीर की सारी चेतना ही खींच ली गई हो। अपनी इस हाल से किसी तरह उबर कर जब लोग अपनी चेतना में लौटे थे तो उनके सिर पर अजीब तरह का पागलपन सवार हो गया था और वे हा हा करते अपने घरों से निकल कर जिस घर के आदमी की लाश गायब हुई थी उसके घर की तरफ  दौड़ पड़े थे। और देखते ही देखते उस घर के दरवाजे पर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी। यह एक ऐसी भीड़ थी जो पहले से ही बुरी स्तब्ध, उत्तेजित और गुस्से से भरी हुई थी। लेकिन जब वहां मौजूद कुछ शातिर दिमाग लोग इस घटना को उनके अस्तित्व और अस्मिता का सवाल बताकर, उन्हें ललकारना शुरू कर दिए थे तो फिर भीड़ अपना आपा खो बैठी थी और अररते घहरते रेल रोकने, रोड़ जाम करने और बसे तोड़ने, जलाने के लिए बस्ती से निकल कर सड़कों पर आ गई थी।
धाड़ ... धाड़ ... धाड़, राम जनम के घर के दरवाजे के पिटने की आवाज थी यह। आवाज इतनी तेज और कर्कश थी कि गहरी नींद में होने पर भी उसे लगा था जैसे कोई उसके कान के पास नगाड़ा पीट रहा है। इसे सुनकर उसकी नींद टूट गई थी और वह हड़बड़ाकर बिस्तरे पर बैठ गया था।
- अरे कुछ सुना तैने? दरवाजा भड़भड़ाकर खुला था तो कोई दौड़कर भीतर आया था और घबराई आवाज में राम जनम से पूछा था।
- क्या हुआ तू इतना घबराया क्यों है?
चारो तरफ  बहुत बड़ा हंगामा मचा हुआ है। पुलिस जगह - जगह छापा मारी करके, लोगों की धर पकड़ कर रही है, कही वह इधिर ...। राम औतार था यह जो घबराया, राम जनम को यह बुरी खबर सुना रहा था।
- बे हू ऊ ऊ दा आ ऽ ऽ कही वह आ ऽ ऽ, बस इतनी सी बात के लिए तू सबेरे - सबेरे मेरी नींद हराम करने पहुंच गया। नींद में खलल पड़ने से राम जनम, राम औतार पर बुरी तरह झल्ला उठा था। पुलिस छापा मारती है तो मारने दे इसमें इतना घबराने का क्या है?
- लेकिन चारों तरफ मचे हंगामे और पुलिस की छापा मारी की खबर सुन इतनी ठंड में भी वह पसीने - पसीने हो उठा था। इसके बाद कोठरी में उसका रूका रहना मुश्किल हो गया था और वह वहाँ से भागकर बरामदे में आकर खड़ा हो गया था। राम जनम, राम औतार को जिस बुरी तरह डाँट रहा था उसे देख कर वह भौचक था। इन लोगों ने इतना बड़ा कांड कर दिया है और इसे लेकर, सारे शहर में हंगामा मचा हुआ है और पुलिस चारों तरफ  छापामारी करके लोगों की धर पकड़ कर रही है लेकिन इस शख्स को न तो अपने किए का कोई पश्चाताप है और न ही पुलिस या और किसी की जरा सी डर ही है।
राम जनम से डांट खाकर, राम औतार वहाँ से चला गया था तो वह बड़ा डरते डरते, राम जनम की बगल आकर बैठ गया था और उसका कंधा पकड़, बड़ी घिघियानी आवाज में उससे पूछा था - राम जनम मेरे दोस्त, मैं अपने घर सुरक्षित पहुंच जाऊँगा तो?
- तुम एकदम निश्चिंत रहो मेरे दोस्त, इसमें न तो तुम्हें कुछ होगा, न ही मुझे। और न ही किसी और को। तुम एकदम सकुशल और खुशी - खुशी, अपने घर पहुंचोगे। जब तक राम जनम है तुम्हें जरा सा भी डरने की जरूरत नहीं है.. अंय।
- लेकिन राम जनम तुम यह बात, इतने दावे के साथ कैसे कह रहे हो। कहीं तुम मुझे छल तो नहीं रहे हो? बड़ा अधीर हो वह मिमियाकर,राम जनम के सामने, अपना चेहरा रोप दिया था।
इतने दावे के साथ, ऐसा मंै इसलिए कह रहा हूं मेरे दोस्त कि अगर यह बात राम जनम की होती तो पुलिस मेरे घर कब की पहुंच चुकी होती। लेकिन जिन लोगों ने इसे करवाया है न वे बड़ी ऊंची पहुंच वाले आदमी है इसलिए पुलिस या और कोई हम लोगों पर हाथ कभी नहीं डालेगा। राम जनम जितने विश्वास और निडरता के साथ उसकी पीठ थपथपाकर उससे यह बात कहा था उससे उसे बड़ी आश्वस्ति और सुकून मिला था।
नित्यक्रिया से निपटने के बाद, हाथ मुंह धोकर, जब राम जनम और वह धधकती अंगीठी के पास मूढ़े डाल, चाय पीने बैठे थे तो एक बात जो उसे लगातार मथे डाल रही थी, उसे उसने राम जनम से पूछ लिया था - राम जनम तुम लोगो ने कबर से मुर्दा उखाड़ने के बाद उसे जोहड़ के पानी में क्यों दबा दिया था?
- दर असल वह मुर्दा ताजा था। व्यापारी को सिर्फ  कंकाल की जरूरत होती है इसलिए उसे सड़ने के लिए हम लोगों ने वहां दबा दिया है। जब वह पूरी तरह सड़ जाएगा तो उसे निकाल धोकर हम लोग साफ कर लेंगे और उसका कंकाल व्यापारी को सौंप देंगे।
- व्यापारी को ओ ऽ ऽ।
- हाँ ....।
- इसका मतलब तुम लोग यह काम व्यापार की तौर पर करते हो।
-हाँ ....।
लेकिन व्यापार के लिए तो काफी कंकाल की जरूरत होती होगी। तुम लोगों को इतना कंकाल भला मिलता कहाँ से हैं यही कबर खोद कर।
- नहीं यार, कंकालों की जितनी डिमांड है अगर हम लोग उसे कबरें खोद कर पूरी करने लगें तो सारी कबरें मुर्दों से खाली हो जाएगी। दर असल अस्पतालों और सड़कों से हमें बड़ी तादात में लावारिस मुर्दे मिल जाते हैं। हम लोग सड़ने के लिए उन्हें पानी में दबा देते है। जब वे पूरी तरह सड़ जाते है तो उन्हें निकिया धोकर साफ  कर लेते है। हाँ, कभी कभार कंकालों की मांग जब बहुत बढ़ जाती है और लावारिस मुर्दों से उसे पूरी करना मुश्किल हो जाता है तो उस सूरत में हम लोग कबरें खोदकर उसे पूरा करते है।
- लेकिन राम जनम, तुम इतना घटिया और नीच काम, भला करते ही क्यो हो?
राम जनम उसकी इस बात पर बड़े जोर से हँसा था और देर तक हँसता रहा था - इस काम को तुम घटिया और नीच कैसे कहते हो मेरे दोस्त?
- यह काम घटिया नहीं है राम जनम? जैसा बेहिचक होकर और जिस दृढ़ता के साथ रामजनम उससे यह बात कहा था उसे सुनकर उसे बड़ी हैरानी हुई थी।
- कतई नहीं ...। देखो मेरे दोस्त, मेरे खयाल से घटिया और नीच वह काम होता है जिससे किसी का नुकसान होता हो या किसी का कुछ बिगड़ता हो। मेरा अपना असूल है कि मंै अगर अपने हाथ से किसी का कुछ भला नहीं कर सका तो उसका बुरा तो कतई नहीं करूँगा। किसी का बुरा करना ही मैं घटिया काम समझता हूँ।
- लेकिन तुम्हारा यह काम भी तो बुरा ही है राम जनम, किसी मुर्दे को पानी में सड़ाना और फिर उसे निकिया धो कर उसका कंकाल बेचना ... छिः।
- इसमें ऐसा बुरा क्या है मेरे दोस्त, मुझे तो इसमें कोई बुराई नहीं दिखती। और अगर, यह बुरा है भी तो वह, सिर्फ  तुम्हारे मन के भीतर है। तुम्हीं बताओ, मेरे ऐसा करने से कहाँ किसी का कोई बुरा होता है। अरे मुर्दा तो मुर्दा, वह हर हाल में मुर्दा है। मुर्दे को गाड़ दो, जला दो उसे बाहर चील कौओं के खाने के लिए छोड़ दो या सड़ाकर उसका कंकाल बेच दो, इससे कहीं किसी का, कोई नुकसान हुआ क्या?
चाय के दो तीन घूँट, हलक के नीचे उतारने के बाद ही वह मुर्दे की बाबत, राम जनम से पूछ लिया था। इसके पहले वह यह सोचकर अपने मन को तसल्ली दे लिया था कि जाने दो साले को मुझे कौन इसके घर की बगल छान्ही डालना है या इसके साथ रिश्तेदारी जोड़ना है कि उसकी इन घिनौनी कततूतों की सोच - सोच कर, हलाकान होता रहूँ। वह तो मेरे सामने ऐसे हालत पैदा हो गए थे कि मुझे इसके घर आना पड़ गया नहीं तो ऐसे अधम के घर मैं आता कभी, जो करता है करे साला, मुझे इससे क्या लेना देना। अब तो बस नाश्ता करना है मिले तो दो कौर खाकर अपने घर का रास्ता पकड़ लेना है। लेकिन जब राम जनम उसे यह बताया था कि वह मुर्दों को सड़ाने और उन्हें निकिया धोकर उसके कंकाल बेचने जैसा अधम और घिनौना काम करता है तो इसे सुनकर उसके प्रति उसका मन घृणा से भर गया था और वह जल्दी से जल्दी उसके घर से निकल भागने के लिए उतावला हो उठा था।

आर मिश्र
2284 - 4 शास्त्री नगर,
सुलतानपुर
( उ . प्र.)  228001