बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

फरवरी 2019 से अप्रैल 2019

इस अंक के रचनाकार

आलेख
इक्‍कीसवीं सदी की चनौतियां और हिन्‍दी - हेमलता महेश्‍वर

कहानी
मेकेनिक - रवि भारव्‍दाज
आइंदा अगस्‍त में आजादी नहीं लेगे - कुबेर
जंक्‍शन -  गजानन माधव मुक्तिबाेध
रूतबे की दीवार - रमेश शर्मा
बादल छंट गए - अलका प्रमोद
आखिरी पत्‍ता - अनुवादक दिलीप लोकरे

गीत - गजल - कविता
जिस्‍म देता है - कुंवर उदय(गजल )
जिंदगी एक सूखी - अनिता त्रिपाठी ( गीत ) 
चलो गांव की ओर - सुशील भोले ( नवगीत )
तिनका तिनका - सुशील यादव ( नवगीत )

व्‍यंग्‍य
अपनी - अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

इक्‍कीसवीं सदी की चुनौतियां और हिन्‍दी

हेमलता महेश्‍वर

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपनी भावनाओं और विचारों को किसी दूसरे के समक्ष अभिव्यक्त करते हैं और दूसरे की भावनाओं और विचारों को समझते हैं। इससे अलग भाषा की कोई और परिभाषा हो ही नहीं सकती। भाषा का संबंध मनुष्य और समाज से है। भाषा कोई व्यक्तिगत या विशेष समूहगत सम्पत्ति नहीं बल्कि वह एक सामाजिक निधि है। इसलिए सामाजिक सरोकारों से परे कोई भाषा हो ही नहीं सकती।
किसी भी देश में राष्ट्र भाषा का सम्मान उस भाषा को ही प्राप्त होता है जो देश विशेष में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। निश्चित तौर पर भारत देश का एक बहुत बड़ा जनमानस हिन्दी भाषा से परिचित है। इसलिए यह प्रस्तावित किया गया कि भारत में राष्ट्रभाषा का अधिकारी होने का सम्मान हिन्दी भाषा को प्रदान दिया जाए। जैसे ही किसी को कोई भी अधिकार प्रदान किया जाता हैं, कर्तव्य स्वयं ही निर्दिष्ट हो जाते हैं। और कर्त्तव्य पुनः अधिकारों का सृजन करते हैं। अतः इन दोनों का एक दूसरे से पूरक संबंध है। अधिकार कर्त्तव्यों के बगैर अधूरे होते है और कर्त्तव्य अधिकार के बगैर। इसे एक छोटे से उदाहरण के साथ समझना उचित होगा। जैसे ही किसी भी दम्पत्ति को माता - पिता बनने का अधिकार प्राप्त होता है वैसे ही उस दम्पत्ति के कर्त्तव्य भी स्वयं ही निर्दिष्ट हो जाते हैं। उस नए बच्चे के प्रति माता तथा पिता दोनों के अपने - अपने उत्तरदायित्व होते हैं जिन्हें वे किसी के कहने पर नहीं, स्वयं की शर्तों पर पूरी नैतिकता के साथ वहन करते हैं। जैसे संस्कार वे रोपते हैं, बच्चा उसकी प्रतिक्रिया वैसे ही देता है।
बिल्कुल इसी तरह यही समीकरण ज्ञान के क्षेत्र पर भी लागू होता है। किसी भी भाषा के राष्ट्रभाषा के रूप में चिन्हित होते ही उसके दायित्वों में वृद्धि हो जाती है। अब यह भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रह जाती बल्कि वह समूचे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व विश्व के समक्ष करती है। कभी भी भाषा का संबंध केवल साहित्य से नहीं होता। साहित्य तो भाषा का एक पक्ष मात्रा है। साहित्य समाज के समक्ष नई - नई चुनौतियों को लेकर खड़ा होता है, समाज को मानवता के दृष्टिकोण से चिंतन मनन करने को बाध्य करता है।
जबकि भाषा का कार्य क्षेत्र बहुत विशाल होता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा को सदैव चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जीवन को संचालित करने के लिए अनुभव और ज्ञान के संतुलन की आवश्यकता होती है। और अनुभव तथा ज्ञान नामक ये दोनों ही पक्ष अपने विकास के लिए भाषा की अतुलनीय समृद्धि की माँग करते हैं।
हिन्दी की लोकप्रियता आज कितनी बढ़ गई है, इसका आकलन इस तथ्य से ही किया जा सकता है कि दक्षिण भारत जो कभी इसका विरोधी था, वहाँ आज लगभग प्रत्येक विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग आरंभ हो चुके हैं। इतना ही नहीं तेलगु, तमिल, कन्नड़ व मलयाली साहित्य का बड़ी तेजी से हिन्दी में अनुवाद हो रहा है। दक्षिण भाषी हिन्दी अध्यापक बहुत बड़ी संख्या में इन विश्वविद्यालयों में कार्य कर रहे हैं। इतना ही नहीें अभी हाल ही में अमेरिका जैसे देश ने भी एशियाई देशों की राष्ट्रभाषा सीखने हेतु अपने अकादमिक जगत को निर्देशित किया है, जिसमें हिन्दी को प्रमुख स्थान दिया है।
जहाँ तक साहित्यिक पक्ष का प्रश्न है निःसंदेह हिन्दी भाषा की रचनात्मक क्षमता अपनी पूरी उर्जा के साथ यहाँ प्रकट होती है। अधिसंख्य लोग यह संदेह प्रकट करते हैं कि अब पाठक वर्ग बहुत कम रह गया है तो प्रश्न यह भी है कि हिन्दी की कितनी पत्रिकाएँ लगातार प्रकाशित हो रही हैं। एक बड़ी संख्या में घरेलू, मनोरंजनपरक पत्रिकाएँ हमारे समक्ष हैं और कितनी साहित्यिक पत्रिकाएँ, फिर भी लगातार ही कुछ नई पत्रिकाएँ जन्म लेती जा रही हैं। अभी वर्तमान वर्ष से ही आरंभ होने वाली पत्रिकाएँ हैं शब्द योग, लोकायत, शिखर, सृजन पथ, पाठ आदि। छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर जैसे छोटे शहर से भी पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है।
हिन्दी की पत्रिकाएँ न केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों से बल्कि कुछ विदेशी प्रयास भी इस दिशा में लगातार हो रहे हैं। दुबई में रहने वाले कृष्ण कुमार के प्रयास से अमेरिका और भारत दोनों के संयुक्त तत्वावधान में अन्यथा जैसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन चंडीगढ़ से हो रहा है। इसके अतिरिक्त स्पैन नामक हिन्दी भाषी पत्रिका का प्रकाशन अमेरिका कर रहा है, जो साहित्यिक के अतिरिक्त सामाजिक पक्षों पर भी चिंतन प्रस्तुत कर रही है। विज्ञान के क्षेत्र में भी विज्ञान प्रसार जैसी पत्रिका का यह प्रयास सार्थक है कि यह पत्रिका एक साथ हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में प्रकाशित होती है। चाहे यह प्रयास बहुत छोटे स्तर का ही क्यों न हो, प्रयास सराहनीय है।
इसके अतिरिक्त हिन्दी की वेब पत्रिकाएँ भी आरंभ हो चुकी हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ की वेब पत्रिका हिन्दी जगत् में अपना स्थान बना चुकी है। ज्ञात हुआ है कि इस दिशा में बीबीसी रेडियो प्रसारण अब एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने हेतु प्रयासरत् है। हिन्दी जगत् के भावी परिदृश्य को सकारात्मक भाव - बोध से भरता है।
विष्णु नागर हिन्दी पाठक वर्ग की समस्या पर विचार करते हुए लिखते हैं  - मैं हिन्दी का एक छोटा - मोटा लेखक हूं, और इस विकटतम स्थिति के गहरे अहसास के बाद भी लिखता रहता हूं। क्यों लिखता हूं मैं और मेरे साथी बावजूद इसके हम हिन्दी में लिखने वाले कम तो नहीं हो रहे हैं, बल्कि बढ़ रहे हैं। कल तक गिनी चुनी महिला लेखिका थीं, आज कई हैं और उनकी अपनी अलग पहचान है। ये लेखिका स्त्री होने के नाते किसी तरह की कोई रियायत नहीं चाहती और न ही उन्हें यह दी जा रही है। लेकिन लेखन को स्त्रीत्व की नई संवेदनाओं से पूरी कर रही हैं।
कहने मतलब यह कि जब इतने सारे स्तरों पर साहित्यिक जगत् हिन्दी की स्थापना हेतु प्रयास कर रहा है तो फिर क्या कारण हैं कि हिन्दी को उसका निर्धारित स्थान प्राप्त करने में इतना अधिक समय लग रहा है। इसका उत्तर देने के पहले मैगसेसे पुरस्कार से पुरस्कृत जल संरक्षण आंदोलन के प्रमुख राजेन्द्र सिंह के एक अनुभव पर बात करना प्रासंगिक होगा।
राजस्थान की सूखी बंजर जमीन पर जब राजेन्द्र जी के प्रयासों से हरियाली छाने लगी तो उनकी तकनीकों की उपादेयता सभी को नजर आने लगी। जल संरक्षण के सूत्रधार श्री राजेन्द्र सिंह ने जल संरक्षण को विकसित करने के लिए किसी किताब का अध्ययन नहीं किया था। गाँव के ही तथाकथित निपट गँवार, फूहड़ किसान ने उन्हें जल संरक्षण की पारम्परिक तकनीक बताते हुए उन्हें इस ओर प्रेरित किया और परिणाम यह कि आज 5 - 5 वर्ष बारिश नहीं होने के बावजूद राजस्थान जैसी मरुभूमि - जहाँ जल संरक्षण किया गया है, की हरियाली बकरार है। परिणाम यह कि जिनेवा में उन्हें आमंत्रित किया गया अपने लेख को लेकर, अपनी तकनीकी को लेकर। श्री राजेन्द्र सिंह ने कहा मैं सिद्धान्त नहीें गढ़ता, व्यवहार की बात करता हूं इसलिए लिखना नहीं आता। जिनेवा ने कहा - भाषण दे दें। राजेन्द्र सिंह ने कहा - नहीं, भाषण देना भी नहीं आता। खड़ा हो जाता हंू और जो भी सूझता है, कह जाता हंू। और फिर आपको परेशानी भी होगी। मुझे अंग्रेजी भी नहीं आती। हिन्दी बोलता हूं, जिनेवा ने सारे हथियार डाल दिये, कहा - आप आ जाईये बस! हम सारी व्यवस्था कर लेंगे।
मतलब यह कि हिन्दी में इस मौलिक ज्ञान को प्राप्त करने के लिए विश्व ने सिर झुकाया। अकादमिक तौर पर हिन्दी के अध्येता न होते हुए भी श्री राजेन्द्र सिंह ने हिन्दी को ज्ञान के फलक पर जो स्थान दिलाया वह प्रशंसनीय है, अनुकरणीय है।
हिन्दी इस तरह यदि मौलिक ज्ञान से जुड़ती है, जो सहज है, तो वह विकास के उदात्त स्वरूप को प्राप्त कर सकती है।
यदि परम्परा में बसे ज्ञान का पक्ष अद्यन्त उद्घाटित नहीं हुआ है तो लोक साहित्य को परखने का नजरिया परिवर्तित कर अपनी भाषा को उदात्त और सर्वव्यापी बनाया जा सकता है। लोक संस्कृति, लोक गीत, कथा, गाथा, पहेली को यदि बतौर मनोरंजन और संस्कृति अध्ययन न करते हुए ज्ञान के रूप में अध्ययन करें तो जाने कितने रोगों की दवाए सामाजिक मूल्य उद्घाटित हो जायेंगे। और भारतीय समाज में पहले चिकित्सक को कविराज कहा ही जाता था। जो चीजें संग्रहणीय हैं, उठा ली जायें बाकी छोड़ दी जायें। पर हम घाल - मेल अधिक करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी भारत के दक्षिणी भाग से संवाददाता के रूप में सूचना प्रदान करने वाले दक्षिण भारतीय हिन्दी बोलते ही दिखाई देते हैं। हिन्दी भाषा ने व्यवसायिकता के आधार पर जो सम्मानित दशा प्राप्त की है, उसे अभी और आगे जाने की आवश्यकता है।
ज्ञान को भाषा से जोड़ना जहाँ भाषाहीनता से बचने का महत्वपूर्ण हल है वहीं ज्ञान से जुड़ते ही हमारा परिचय नयी शब्दावली से होता है। अंग्रेजी भाषा आधुनिक ज्ञान की प्रबल संवाहक है इसलिए ज्ञानात्मक क्षेत्रा में उसका विस्तार है।
बावजूद इसके अंग्रेजी भाषा लगभग 250 नये शब्द प्रतिवर्ष अपने शब्दकोष में जोड़ती है। समय के विकास के साथ - साथ भाषा के अपने प्रतिमान और पारिभाषिक शब्दावलियाँ पुरानी और बोथरी होती चली जाती है। नये शब्दों का जुड़ाव यानी नये ज्ञान से परिचय यानी संवेदना में विस्तार। प्रत्येक समय की अपनी माँग होती है। इस माँग के अनुसार भाषा का चोला होता है। सूचना तकनीकि के मकड़जाल में अपने अस्तित्व की रक्षा अपने ज्ञान के माध्यम से हो सकती है। सूचना तकनीकि को अपनी शब्दावलियाँ लेने को बाध्य करने वाली भाषा भाषाहीनता की स्थिति मे नहीं हो सकती।
ज्ञान मनुष्य के समक्ष नयी चुनौतियाँ पैदा करता हैं। नयी चुनौतियाँ नयी परेशानियाँ, नया भाव,संसार, नया भाव - संसार - नयी संवेदना। अब इस संवेदना के विस्तार के लिए नया भाषा संसार भी चाहिये अर्थात् नयी शब्दावलियाँ भी। नयी शब्दावली भाषा के स्वरूप को परिवर्तित करती है। प्राकृत से आज की हिन्दी तक का विकास इसके सामाजिक सरोकारों को दर्शाता है किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात् जब से हिन्दी को संरक्षित किया गया है, इस अर्द्धशती में हिन्दी से नया ज्ञान दूर हुआ है।
राष्ट्रभाषा महासंघ के मुंबई में सन् 1999 को राष्ट्रीय सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि हिन्दी न केवल संस्कृत से बल्कि लोक भाषाओं से भी प्रमुखतः अपनी शब्दावली समृद्ध करेगी।
हमें हिन्दी भाषा को केवल साहित्य के साथ नहीं बल्कि ज्ञान के साथ अनिवार्यतः जोड़ना होगा तभी हिन्दी को अपेक्षित सम्मानित स्थान प्रदान किया जा सकेगा। चिकित्सा का क्षेत्र हो या अभियांत्रिकी का, निजी व्यवसाय का क्षेत्र हो या सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी संस्थानों का, कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का हमें सारे क्षेत्रों की माँग के अनुसार हिन्दी भाषा को समृद्ध करने का अवसर नहीं चुकना चाहिए। हिन्दी दिवस 14 सितम्बर को हम यह संकल्प लेते हैं कि हम भारत सम्पूर्ण विकास के लिए आवश्यक समस्त क्षेत्रों के अनुसार हिन्दी भाषा को समृद्ध करने का प्रयास करें।
यह हमारी सच्ची राष्ट्रभक्ति होगी।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019

मेकेनिक

रवि भारव्‍दाज

तड़ाक ... तड़ाक ... दो झापड़ बड़े मिस्त्री ने जगत की गाल पर लगाये। अबे यहाँ रास्ते में गाड़ी खड़ी करके लगा कारबोरेटर खोलने पैनल वहाँ दीवार के साथ रख ... बड़े मिस्त्री ने जगत से कहा।
जगत ने न तो अपनी गाल सहलायी, न उसकी आँखों से कोई पानी गिरा। ठीक वैसे ही करने लगा जैसा उस्ताद ने कहा था। जगत पिछले 10 - 12 दिन से इस दुकान पर आया था। जगत का सौभाग्य यह था कि जिस सज्जन ने उसे इस दुकान पर लगवाया था वह उनकी बड़ी अनुकम्पा थी। यह दुकान इलाके का सबसे बड़ा वर्कशाप था। यहाँ से काम करके जाने वाले कई मिस्त्री अब दूसरी जगह पर अपने - अपने वर्कशाप बनाकर काम रहे थे अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे । यह वर्कशाप सब्बरवाल साहब की है। उम्र होगी यही कोई 65 - 70 के करीब। काम धाम तो करते नहीं थे बस काउन्टर पर बैठे रहते थे बाकी के मेकेनिक लोग काम किया करते थे। पैसे का लेन - देन सब्बरवाल साहब ही किया करते थे। मेकेनिक लोगों को जिस सामान की आवश्यकता होती वह सब्बरवाल साहब से मांग लेता। उन्हें न इस बात की चिन्ता थी कौन मेकेनिक काम छोड़कर चला गया। कौन नया आया है। यह सब काम बड़े मिस्त्री साहब किया करते थे। जिन सज्जन ने जगत को इस वर्कशाप पर लगाया था वह बड़े मिस्त्री साहब का जानकार था उन्हीं की कृपा से उन्होंने जगत को इस वर्कशाप में काम सीखने के लिये लगा दिया। शुरू में तो कुछ नहीं मिलने वाला था, और जो मिलने वाला था वह उसे आज बड़े मिस्त्री ने दे ही दिया था...।
उपरोक्त के परिप्रेक्ष्य में जगत के बारे में बताना जरूरी है। जगत कोई 15 - 16 साल का लड़का था। दुबला पतला, आवाज भी उसी की कद काठी के अनुरूप ही थी। वर्कशाप से करीब 3-4 कि .मी. पर उसका घर था। घर में मां थी, एक बड़ी बहन थी उसकी उम्र यही कोई 20 - 21 साल की। दिखने में अप्रतिम सुन्दरता की मूर्ति, मधुर स्वभाव, इसलिये पिताजी ने उसका नाम रख दिया था मधु, कद काठी ठीक थी न तो अधिक मोटी थी न बिल्कुल पतली। इग्नु से बी.ए. किया था अब एम.ए. का इम्तहान भी इग्नू से ही करने की इच्छा थी। पिता अभय दास नगर निगम में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे, न कभी उन्होंने अपने स्थाई होने की बात किसी से कही न किसी ने करने की सोची। हां, अपनी मितव्ययता के चलते उन्होंने एक दो कमरे का मकान, एक रसोई, एक स्नानघर एक शौचालय तथा आगे छोटा सा सहन उन्होंने बनवा दिया था।
कहते हैं कि बुरे दिन एक साथ नहीं आते वह अपनी पूरी फौज लेकर आते है, कुछ ऐसा ही अभय दास के साथ भी हुआ एक दिन कार्यालय से लौटते हुये उन्हें बड़े जोर से सीने में दर्द हुआ, जब तक कोई उन्हें घर पहुँचाता तब तक उनकी सांसों ने आना जाना बन्द कर दिया। क्या कह सकते हैं हार्ट फेल या उनका वक्त आ गया था। जगत की मां आरती यही कोई 50 - 55 साल की स्त्री, मधुर स्वभाव, दुबली पतली,धार्मिक प्रवृति की महिला। घर के कामों में कुशल शायद यही सब गुण उसने अपने बच्चों को दे दिये थे। आरती पर पहाड़ टूट पडा उस समय जगत 8 कक्षा में पढ़ता था, पढ़ने में कोई बहुत चतुर तो नहीं था लेकिन फेल भी कभी नहीं होता था। गणित और अँग्रेजी उसके प्रिय विषय थे लेकिन भूगोल और इतिहास में उसका मन नहीं लगता था बस किसी तरह से पास हो जाता था। अभय दास के देहान्त के बाद आरती अकेली पड़ गयी वो तो शुक्र था कि रहने को छत थी नहीं तो कहां लेकर जाती जवान बिटियां और जवान होते बेटे को ...। ले देकर कोई 25 - 30 हजार रू. अभय दास के कार्यालय से उसे प्राप्त हुए फैमिली पेंशन की जगह 1200 रू. माहवार। किसी तरह आटा चांवल तो आ जाता था लेकिन बिटिया की शादी की चिन्ता ने आरती को समय से पहले ही बूढ़ा कर दिया।
बेटे की आगे पढ़ाई भी तो करानी थी। अभय दास के मरने के बाद जगत को ही सारे क्रिया कर्म करने थे तेरहीं के दिन पगड़ी भी उसी के सिर पर बंधी थी। और इन आठ दस दिनों में मानों जगत ने दुनिया देख ली थी, अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो गया था जगत को। दूर के नाते रिश्तेदारों में भी कोई ऐसा नहीं था जो आगे बढ़कर इन बच्चों को सहारा दे पाता। जब सभी लोग चले गये तो मानो जगत ने एक भीष्म प्रतिज्ञा की ... उसने मां से कहा - मां मैं अब आगे पढ़ाई नहीं करूंगा। कोई छोटी मोटी नौकरी कर लूंगा। अब घर की जिम्मेदारी मैं लूंगा। मां ने अश्रु पूर्ण आंखों से बेटे को देखा, लेकिन वह कर भी क्या सकती थी। उसे तो मधु की चिन्ता सताये जा रही थी। आय का कोई तो ठिकाना हो। अनिच्छा से मानो मां ने मौन स्वीकृति दे दी। जगत ने कई दरवाजे खटखटाये लेकिन काम न मिलना था न मिला।
जगत सबेरे घर से निकल जाता कई जगह धक्के खाता, सड़क के नल से पानी पीता और फिर चल पड़ता अपने परिवार के लिये रोजगार खोजने। काम खोजते - खोजते जगत अब खुद निराश हो चुका था। लेकिन जैसे हर अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष आता है ऐसे ही एक पहचान के मिल गये ... शायद जगत के पिता के जानकार थे। उन्हें जगत भी जानता था। दुआ सलाम के बाद उन्होनें सलाह दी - बेटे ऐसा करो मैं तुम्हें कोई काम सीखने के लिये किसी दुकान पर लगवा देता हूं। काम सीखने के बाद अपना काम कर लेना आजकल नौकरी रखी कहां है... और अपने सदप्रयासों से उन सज्जन ने जगत को सब्बरवाल साहब के वर्कशाप में काम दिलवा दिया।
जगत को अपना मूल नाम बहुत पसन्द था, अगर कोई जग्गी या जग्गू कह देता तो निराश हो जाता, लड़ना भिढ़ना तो बेचारा जानता नहीं था,अलबत्ता उससे बात करनी बन्द कर देता और कभी कभी साहस कर के कह देता मेरा नाम जगत दास है। मुझे मेरे नाम से बुलाया करो। वर्कशाप में बड़े मिस्त्री की बहुत चलती थी। वह भी जगत को जग्गी कहकर बुलाते थे, लेकिन न जाने क्यों जगत ने उन्हें कभी नहीं कहा कि मेरा नाम जगत हैं हाँ, साथ के मैकेनिकों से अवश्य एक दो बार कहा। लेकिन नक्कार खाने में तूती की आवाज कभी सुनाई नहीं देती उसकी आवाज भी उसके कण्ठ में ही डूबकर रह गयी। लेकिन किसी से बहस करते या लड़ते झगड़ते कभी किसी ने जगत को नहीं देखा।
चूंकि जगत नया - नया आया था, सबसे छोटा था अतः सुबह साढ़े आठ तक आकर सब्बरवाल साहब के घर से चाबी लेकर दुकान खोलना उसकी जिम्मेदारी हो गई थी। सब्बरवाल साहब दुकान के पिछले हिस्से में ही रहते थे। अच्छा खासा मकान था आगे ठीक होने के लिये आई गाड़ियों को खड़ा करने के लिये पर्याप्त स्थान था। रात में गाड़ियां वहीं खड़ी होती थी। जगत सुबह आकर वर्कशाप में झाडू लगाता, सारे औजार मेज पर और स्टेण्ड पर लगाता, धोने वाले पानी के टैंक को भरता, कुर्सी वगैरह ठीक करता, हवा भरने के चैम्बर को चलाता। और भी सारे काम वह बड़े मिस्त्री के आने से पहले ही कर लेता। बड़े मिस्त्री ने देखा कि लड़का मेहनती है तो अक्सर वह उसे अपने साथ लगा लेते। गल्ती करने पर कहते ... जग्गी आदमी बन जा, काम क्या मेरी उम्र में सीखेगा। धीरे - धीरे जगत को कारबोरेटर साफ  करना, चैम्बर खोलना, 5 - 6,  8 - 10, 10 - 12 की चाबी पहचानना। पहिये खोलना, पंक्चर लगाना आ गया। काम करते - करते अब जगत को एक माह हो गया था। बड़े मिस्त्री उसके स्वभाव तथा काम की लगन से बड़े खुश थे। अब उनकी जुबान पर जग्गी का नाम ही रहता, बाकी के मेकेनिक गौण हो चुके थे। अब बड़े मिस्त्री साहब उसे जग्गी बेटा बुलाने लगे थे, सब्बरवाल साहब को न जाने क्यों यह लड़का शुरू से ही पसन्द आ गया था। जगत अब सब्बरवाल साहब के भी छोटे - मोटे काम करने लगा।
अक्सर शाम को जब सभी मेकेनिक चले जाते तो सब्बरवाल साहब और बड़े मिस्त्री अपनी थकान मिटाने बैठ जाते। उस समय जगत से कहा जाता कि - जा बेटा एक अद्घा तो लेकर आ। हां, थोड़ी सी नमकीन भी ले आना। जगत बिना किसी हील हुज्जत के सारे काम कर देता लेकिन वह सारे काम कर सकता था लेकिन शराब की दुकान पर जाने में उसके पैर कांप जाते। रोज सोचता आज बड़े मिस्त्री को मना कर दूंगा लेकिन वक्त आने पर उसकी बोलती बन्द हो जाती। लेकिन आज जगत ने बड़े विनम्र स्वर में बड़े मिस्त्री से कहा - सर, आप मुझ से यह मत मंगवाया करो। बड़े मिस्त्री ने आज पहली बार अपने खिलाफ आवाज सुनी थी, सब्बरवाल साहब भी चौक गये बोले - क्यों भाई जग्गी इसे लाने में क्या तकलीफ  है? जगत ने अपने दबे स्वर में कहा - सर, अगर कोई मुझे उस दुकान पर देख लेगा तो फिर बहन की शादी में बड़ी मुश्किल हो जायेगी, मुझे मां की और दीदी की बड़ी चिन्ता है। बड़े मिस्त्री ने कहा - बेटा जग्गी, तुम अपनी मां बहन का इतना ध्यान रखते हो। चलो अब से तुम्हें नहीं भेजेंगे। सब्बरवाल साहब भी बड़ी हैरत से उसकी ओर देख रहे थे।
- जा बेटा तू घर चला जा, दुकान हम बढ़ा देंगे ... बड़े मिस्त्री ने बडे प्यार से कहा।
- नहीं सर, मेरे होते हुये तो यह काम मैं ही करूंगा। जब आप लोग चले जायेंगे तो दुकान मैं बढ़ा दूंगा। जगत ने कहा।
काम करते हुये अब जगत को करीब एक माह हो गया था। वेतन मिलने की बात ही तय नहीं हुयी थी, लेकिन उस रोज के बाद से सब्बरवाल साहब ने बड़े मिस्त्री से बात की और उसकी तन्खा तय हुयी 700 रू.। आज जब सभी मेकेनिक अपना - अपना वेतन ले रहे थे तो जगत उन्हें बड़ी हसरत भरी निगाह से देख रहा था सभी अपनी अपनी तन्खा लेकर चले गये। सब्बरवाल साहब ने जगत को बुलाया और कहा - बेटा बड़े मिस्त्री तेरे काम से बड़े खुश हैं। आज तुझे एक महीना हो गया। ले तेरी तन्खा। उन्होंने उसके हाथ पर 700 रू. रख दिये। जगत की आंखों में पानी आ गया उसने तुरन्त सब्बरवाल साहब के पैर छू दिये और फिर सारे पैसे लेकर बड़े मिस्त्री के पास गया बोला - सर आप बहुत बड़े दिल के आदमी है ... यह कहकर जो रूलाई वह अब तक रोक हुये था जोर से रो पड़ा और सारे पैसे बड़े मिस्त्री के पैर में रख दिये और उनके पैर पकड़ लिये। बड़े मिस्त्री की आंखें भी छलछला आयी बोले - बेटा, ये तेरी मेहनत के पैसे हैं। अपनी मां को देना, और खूब लगन से काम करना मेरे बाद इस वर्कशाप का हैड मिस्त्री तुझे ही बनना है।
जगत बोला - सर, आप जहां भी जायेगें मैं आपके साथ रहूंगा कोई बेटा अपने बाप को छोड़कर जाता है या बाप बेटे को छोड़कर जाता है।
बड़े मिस्त्री ने प्यार से कहा - अबे,भाग यहां से ... और उस बजाज सुपर में देख क्या प्राबल्म है।
जगत को अब सात माह हो गये थे। बड़े मिस्त्री ने और सब्बरवाल साहब ने उसे कह रखा था कि दस रुपये तक के पैसे जो गाड़ी वह ठीक करेगा उसके होगें बाकी का हिसाब सब्बरवाल साहब ही करेंगे।
जगत की मेहनत ईमानदारी और काम की प्रवीणता को देखते हुये अब लोग दूर दूर से सब्बरवाल साहब के पास आने लगे थे कई बार तो ग्राहक को वापस करना पड़ता था। उसका वेतन भी बढ़कर 2500 रू. हो गया था जिन्दगी आराम से कट रही थी।
जगत अब छोटे मोटे काम अपने घर पर भी कर दिया करता था। लेकिन अपने काम पर वह सही समय पर चला जाता था।
एक दिन दूर के किसी रिश्तेदार ने मधु के लिये एक रिश्ता भेजा, उन्हें लड़की पसन्द आ गई उन्होंने गोद भराई की रस्म कर दी बड़े मिस्त्री और सब्बरवाल साहब भी उस दिन जगत के घर आये थे। मां का मृदुल स्वभाव देखकर, बेटी की सौम्यता देखकर दोनों बड़े खुश हुये और चलते - चलते जगत की तारीफ  करना भी नहीं भूले।
सब्बरवाल साहब की पत्नी अमरजीत कोई 55 - 60 की उम्र की होगी। सब्बरवाल साहब के कोई सन्तान नहीं थी। दोनो बुढढे - बुढ़िया ही रहते थे। अमरजीत भी एक ममतामयी स्त्री थी। उनका सभी मेकेनिक से बच्चों जैसा व्यवहार होता था। जगत से कुछ विशेष लगाव था उनका।
एक दिन जगत काम पर नहीं आया ... थोड़ी देर तक इन्तजार हुआ फिर एक मेकेनिक को उसके घर भेजा गया। पता चला उसे तेज बुखार है। जगत के बिना आज कुछ अधूरा सा लगा रहा था। सभी को लेकिन काम तो करना ही था। शाम को बड़े मिस्त्री भी उसके घर गये, देखा जगत को इतना तेज बुखार था कि वह बोल भी नहीं पा रहा था, न पहचान ही पा रहा था। उन्होंने उसे डा. को दिखाने के लिये कहा लेकिन उस समय तक दुकानें बन्द हो गयी थी। लिहाजा यह कह कर बड़े मिस्त्री चले गये - कल सुबह मैं इसे बड़े डा. को दिखाकर काम पर जाऊंगा।
अगले दिन जब बड़े मिस्त्री जगत के घर पर गये तो उन्हें कोई बाहर नहीं मिला न मधु, न मां। उन्होंने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा खुला था अन्दर मधु और मां बैठी थी। पूछा - जगत की तबीयत कैसी है, मधु चीखकर रो पड़ी ...? क्या हुआ बेटी, कुछ बतायेगी भी ... बड़े मिस्त्री ने कहा।
- जगत हमें छोड़कर चला गया ... मां बेटी दोनों रोने लगी। बड़े मिस्त्री को तो ऐसा लगा कि अब चक्कर खाकर गिर पड़ेंगे।
फिर वही हुआ कफन काठी, आग लकड़ी, श्मशान यात्रा ...जगत की कहानी खत्म हो चुकी थी।
बड़े मिस्त्री का अब काम में मन नहीं लगता था। कई बार जग्गी बेटा कहते कहते रूक जाते और फिर सब कुछ भूलकर काम में लग जाते। सब्बरवाल ने भी अब काउन्टर पर बैठना बन्द कर दिया था बहुत कम आते थे। अब बड़े मिस्त्री ही पैसों का लेन - देन किया करते थे। मानों जगत के बाद सब खत्म हो चुका था।
दिन गुजरते गये ... एक दिन मधु सब्बरवाल साहब के वर्कशाप आयी, साथ में मां थी। बड़े मिस्त्री की नजर उस पर पड़ी - अरे मधु बेटा ... मां भी है, बोल बच्ची क्या काम है? बड़े मिस्त्री ने मधु से कहा
- मां को आप से बात करनी है।
सब्बरवाल साहब ने भी देखा, बोले - तुम लोग अन्दर चलो, हम अभी आते है।
दोनों सब्बरवाल साहब के घर में चली गयी।
बड़े मिस्त्री और सब्बरवाल साहब थोड़ी देर बाद आये। अमरजीत ने उन सबके सामने पानी रखा, पानी पीने के बाद मधु गिलास उठाकर किचन में रखने चली गयी।
आरती ने कहा - भैया, जगत तो हमें छोड़ कर चला गया... अब मधु की शादी जिस घर में हुयी थी वह कल बात करने आ रहे हैं। जाने आगे रिश्ता रखेंगे या कोई मांग रखेंगे आप लोग ही कोई रास्ता दिखाओ।
- कल तो इतवार है, वर्कशाप बन्द रहेगा। हम लोग मिल बैठकर बात करेंगें। आप कोई चिन्ता न करें। सब्बरवाल साहब ने कहा।
- मैं भी चलूंगी औरतों से मैं बात कर लूंगी। अमरजीत ने कहा।
इतवार के दिन लड़के वाले आ गये। इस पक्ष से बड़े मिस्त्री, सब्बरवाल साहब,अमरजीत और मां थे। मधु तो प्रश्नगत प्रकरण में थी ही।
उधर से लड़के के पिता, ताऊ, चाचा एक और रिस्तेदार तथा पांच सात स्ति्रयां थी।
सब्बरवाल ने ही पूछा - तो क्?या विचार है आप लोगों का?
- सोचते हैं जो होना था, वह तो हो गया। अब आगे के काम तो निपटाने ही है। ऐसा करते हैं ... लड़के के ताऊ ने कहा।
- आप लोग यह मत समझ लेना कि जगत के बाद इनकी दुनिया खत्म हो गयी। आप लोगों को जितनी मांग करनी है करें ... शहर के सबसे बड़े होटल में बारात का स्वागत होगा। जितने चाहे बाराती ले आयें। मधु की आवश्यकता की जितनी भी चीज है सब देंगे। इक्यावन हजार टीके में देंगे। इसके अलावा कुछ और चाहिये तो वो भी मिलेगा। लेकिन मधु की शादी हो कर रहेगी। यह इस पंजाबी पुत्तर का जवाब है।
वातावरण में खामोशी छा गयी ... लड़के के पिता ने कहा - भाई साहब, हम इसी सम्बन्ध में बात करने आये हैं। हमारा ऐसा विचार है कि मन्दिर में शादी कर देते हैं। हम पांच लोग आयेंगे। अब दुनियादारी तो निभानी ही है। जगत होता तो शायद कुछ मांग भी लेते लेकिन हम चाहते हैं कि शादी के बाद मधु की मां भी हमारे साथ ही रहे। उनकी देखभाल भी हो जायेगी। यह मकान किराये पर चढ़ा देते हैं, किराया मधु की मां लेती रहेगी। बस हमारी तो इतनी सी प्रार्थना है।
- यह सब नहीं होगा, मधु की मां अपनी जेठानी के घर रहेगी। आज से इसका मायका सब्बरवाल साहब का घर होगा ... आप किसी तरह की चिन्ता न करें। अमरजीत ने कहा।
मां की आंखों में आँसू थे ... खुशी के या गम के ... मधु भी रो रही थी। भाई को याद करके या इन देवदूतों को देखकर।

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

आइंदा अगस्त में आजादी नहीं लेंगे


कुबेर

सरकार ने मंत्रियों और अधिकारियों की आपात बैठक बुलाई है। समस्या आम है। मामूली है। पर भौंक-भौंककर लोगों ने नींद हराम किया हुआ है। बड़ी मजबूरी है। नींद के लिए भौंकनेवालों का भौंकना बंद करना जरूरी है। समस्या है - ’अस्पतालों में बच्चे थोक के भाव मर रहे हैं।’
मंत्री ने बैठक शुरू करते हुए प्रमुख सचिव से मामले का डिटेल पूछा। 
सचिव ने कहा - ’’सर! सरकारी अस्पताल में कुछ बच्चे मर गये हैं।’’
’’कब?’’
’’इसी महीने में।’’
’’मतलब?’’
’’अगस्त महीने में, सर।’’
’’कितने?’’
’’यही, कोई तीन-चार दर्जन।’’
’’तीन-चार दर्जन? बच्चों के माँ-बाप के कुछ डिटेल हैं?’’ 
’’गरीब थे।’’
’’गरीब थे?’’
’’हाँ सर, ये तो मरते ही रहते हैं। कोई बड़ी बात नहीं थी। लोगों ने बात का बतंगड़ बना रखा है।’’
’’हम भी जानते हैं। पर आप अपनी भाषा ठीक कीजिए। वरना फिर बतंगड़ बन जायेगा। समझा करो यार। मजबूरी है। अमीर-गरीब में फर्क नहीं कर सकते हम।’’ अधिकारी के जवाब से मंत्री महोदय कुछ विचलित से लगे। स्थिर होने के बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने फिर कहा - ’’बच्चों का इलाज निजी अस्पतालों में क्यों नहीं कराया गया?’’ 
’’सर! उनके माँ-बाप गरीब थे।’’
’’ठीक है। पर बच्चे राष्ट्र की संपत्ति होते हैं। राष्ट्रीय संपत्ति की हिफाजत जरूरी है। अब से देशभर में किसी भी बच्चे का इलाज सरकारी अस्पतालों में नहीं होगा। डिलीवरी भी नहीं होगी। डिलीवरी और बच्चों का इलाज निजी अस्पतालों में ही होना चाहिए। आदेश जारी कीजिए।’’
’’सर! गरीब माँ-बाप इसे अफोर्ड नहीं कर सकेंगेे।’’
’’तो सरकारी खजाने से अफोर्ड कीजिए न। राष्ट्र की संपत्ति की सुरक्षा राजकोष से हो, इसमें आपत्ति क्या है?’’
’’यस सर।’’
’’और सुनिए। निजी अस्पतालवालों से इसके लिए डील तय कर लीजिए। अच्छे से। समझ गये न?’’
 ’’यस सर, हो जायेगा।’’
’’और सुनिए। क्या पिछली सरकारों के समय बच्चे नहीं मरते थे?’’
’’सर! मरते थे।’’
’’कब-कब मरे, किस-किस महीने में मरे। कुछ डिटेल है आपके पास।’’
’’यस सर। सब अगस्त के महीने में ही मरे हैं।’’
’’तो ये बात है। मतलब, ’अगस्त में तो बच्चे मरते ही है।’ ...... यार ये कैसा घांच-पांच है। बच्चे मरते हैं तो अगस्त में। बाढ़ आती है तो अगस्त में। बाढ़ में लोग मरते हैं तो अगस्त में। पुल, सड़कें और पटरियाँ बह जाती हैं तो अगस्त में। फसले बरबाद होती हैं तो अगस्त में। और हाँ, देश भी तो अगस्त में ही आजाद हुआ था न?’’ 
’’यस सर।’’ 
’’मतलब, इन सबका अगस्त के साथ जरूर कुछ न कुछ कनेक्शन है।’’ 
’’डेफिनिट सर।’’ 
’’तो ढूँढिए न कनेक्शन। देख क्या रहे हैं।’’  
’’सर, मिल गया। कनेक्शन मिल गया।’’
’’खाक मिल गया। हवाई बातों से काम नहीं बनेगा। इस अगस्त कनेक्शन का पता लगाना जरूरी है। जांच कमीशन बिठाइए। और तुरंत रिपोर्ट पेश कीजिए।’’

अगस्त कनेक्शन की जड़ों को ढूँढने के लिए तत्काल ’रूट रिसर्च आयोग’ का गठन किया गया। आयोग में देश हित में सोचनेवाले महान राष्ट्रवादियों, विचारकों और चिंतकों को शामिल किया गया। समस्या की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने पूर्ण सहयोगात्मक भाव से दिन-रात एक करके काम किया। दिन-दिनभर पसीना बहाया। रात-रातभर यौगिक साधनाएँ की। देखते-देखते आबंटन का सफाया हो गया। फिर आबंटन मिला। फिर सफाया हो गया। आबंटन मिलते रहे और सफाया होते रहे। आयोग आबंटन से तृप्त होने का प्रयास करता रहा। पर जन्मों की अतृप्त आत्माओं को तृप्ति कैसे  मिलती? डकारों की बौछारे शुरू हो गई। पर तृप्ति मिलती नहीं थी। डकार की आवाजें बाहरवाले न सुन लें इसके लिए विशेष सायलेंसर लगाये गये थे। सायलेंसर की भी बर्दास्त की सीमा होती है। यह सीमा भी जाती रही। बड़ी मजबूरी में आयोग ने सिफारिशें पेश की। सिफारिशों में कहा गया था - 
- देश और अगस्त महीने की कुंडली का मिलान करके देखा गया। हर जगह काल बैठा मिला। अकाल और अकस्मात घटनेवाली घटनाओं के मूल में ये काल ही हैं। काल दोष निवारण हेतु घटना स्थलों पर अविलंब सतत् सालभर तक चलनेवाले धार्मिक अनुष्ठानों को शुरू किया जाना उचित होगा। 
- अगस्त महीने का ’अ’ बड़ा ही अशुभ, अमंलकारी और अनिष्टकारी है। यह असत्य, अहंकार, अकाल और आसुरी शक्तियों का प्रतीक है। देश के समस्त कैलेण्डरों से इस महीने को विलोपित कर देना चाहिए। परंतु ऐसा करना एक क्रांतिकारी कदम होगा। क्रांतिकारी कदम उठाना इस देश की परंपरा में नहीं है। इससेे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। अतः व्यावहारिक रास्ता अपनाते हुए अगस्त के ’अ’ को ’स’ से विस्थापित कर इस महीने का नाम ’संघस्त’ कर दिया जाना उचित होगा। ’स’ सत्य, शुभ, सुमंगल और शक्ति का प्रतीक है। यह संगठन और संघ शक्ति का भी प्रतीक है।
- देश को अगस्त में ही आजादी मिली थी। आजादी के बाद से ही देश तरह-तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है। अनैतिक और भ्रष्ट प्रवृत्तियाँ लोगों की मानसिकता में समाई हुई हैं। इन सबके मूल में भी यही, अगस्त का महीना है। इससे सीख ग्रहण करते हुए ’आइंदा अगस्त महीने में आजादी नहीं लेंगे’ ऐसा संकल्प पारित करना चाहिए।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

जंक्शन

गजानन माधव मुक्तिबोध
(मुक्तिबोध अन्वेषक कवि हैं। उनकी कहानियों में भी उनकी कविताओं के विस्तार का अनुभव किया जा सकता है। अंतर केवल इतना है कि कविताओं में उनके मानस पर सर्वहारा उपस्थित है तो कहानियों में मध्यवर्ग। उन्होंने कहानियाँ कम लिखी है परंतु यह कम ही अधिकतम पर भारी है। मुक्तिबोध की यात्रा वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न, अंधेरे से त्रस्त, चिंतक की यात्रा है; और अंधेरे की यात्रा का साहस वही कर सकता है जिसका अंतर दिव्य प्रकाश से दीप्त हो। अंधेरा उन्हें हर क्षण परेशान करता होगा, त्रस्त और भयभीत करता होगा। वे उम्रभर अपने अंतर के प्रकाश से बाहर के अंधेरे को उजाले में बदलने के नुस्खे के अन्वेषण में लगे रहे। अपने अन्वेषण में वे सफल रहे। वे हमें अंधेरे पर विजय प्राप्त करने का नुस्खा दे गये हैं। इस नुस्खे को समझना और इसका उपयोग करना हम पर निर्भर है। इसका उपयोग हम कैसे करें, यह हमें सोचना है। अब अंधेरा उनसे परेशान, त्रस्त और भयभीत है। 

अपने विनिबंध ’कालजयी मुक्तिबोध’ में प्रमोद वर्मा ने लिखा है - ’’मुक्तिबोध ने सचमुच अपने लिखे अनुसार जीवन में आचरण किया। अंधेरे में रहकर पूरी जिंदगी काट दी। फटीचरों से इतना प्यार किया कि कि खुद फटीचर बन गये।’’
’जंक्शन’ कहानी उनके लिखे अनुसार आचरण का अकाट्य प्रमाण है। ’भारतीय साहित्य के निर्माता मुक्तिबोध’ में नन्दकिशोर नवल ने लिखा है - ’’स्थिति उनकी ऐसी थी कि ओवरकोट जैसी चीज उन्हें कभी नसीब नहीं हुई और एक बार जाड़ों में उन्हें एक साहित्यिक समारोह में जबलपुर जाना हुआ, तो वे अपने मित्र और कालेज के उपप्राचार्य मेघनाथ कन्नौजे का ओवरकोट उनसे उधार मांगकर ले गये। इस घटना का भी जिक्र प्रसंगवश उनकी ’जंक्शन’ नामक कहानी में आया है।’’
जहिर है, इस कहानी के तानेबाने का संबंध जिस रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म से है, उसका संबंध राजनांदगाँव से ही है।

रेलवे स्टेशन, लंबा और सूना! कड़ाके की सर्दी! मैं ओवरकोट पहने हुए इत्मीनान से सिगरेट पीता हुआ घूम रहा हूँ।
मुझे इस स्टे‍शन पर अभी पाँच घंटे रुकना है। गाड़ी रात के साढ़े बारह बजे आएगी।
रुकना, रुकना, रुकना! रुकते-रुकते चलना! अजीब मनहूसियत है!
प्लेाटफॉर्म के पास से गुजरनेवाली लोहे की पटरियाँ सूनी हैं। शंटिंग भी नहीं है। पटरियों के उस पार, थोड़ी ही दूरी पर रेलवे का अहाता है, अहाता के उस पार सड़क है! शाम को छह बजे ही सड़क पर और उससे लगे हुए नए मकानों में बिजलियाँ झिलमिलाने लगी हैं!
उदास और मटमैली शाम! एक बार टी-स्टॉल पर चाय पी आया हूँ। फिर कहाँ जाऊँ! शहर में जा कर भोजन कर आऊँ? लेकिन यहाँ सामान कौन देखेगा। आस-पास बैठे हुए मुसाफिर फटी चादरों और धोतियों को ओढ़े हुए, सिमटे-सिमटे, ठिठुरे-ठिठुरे चुपचाप बैठे हैं। इनके भरोसे सामान कैसे लगाया जाए! कोई भी उसमें से कुछ उठा कर चंपत हो सकता है।
टी-स्टॉ।ल की तरफ नजर डालता हूँ। इक्कें-दुक्के मुसाफिर घुटने छाती से चिपकाए बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं। गरम ओवरकोट पहन कर चलनेवाला सिर्फ मैं हूँ, मैं।
अगर कोई भी मुझे उस वक्त देखता तो पाता कि मैं कितने इत्मीुनान और आत्म-विश्वास के साथ कदम बढ़ा रहा हूँ। इतनी शान मुझे पहले कभी महसूस नहीं हुई थी। यह बात अलग है कि गरम ओवरकोट उधार लिया हुआ है। राजनाँदगाँव से जबलपुर जाते समय एक मित्र ने कृपापूर्वक उसे प्रदान किया था। इसमें संदेह नहीं कि समाज में अगर अच्छे आदमी न रहें, तो वह एक क्षण न चले।
सिगरेट पीते हुए मैं मुसाफिरखाने की तरफ देखता हूँ। वहाँ आदमी नहीं, आदमीनुमा गंदा सामान इधर-उधर बिखेर दिया गया है। उनकी तुलना में सचमुच मैं कितना शानदार हूँ।
अनजाने ही मैं अकड़ कर चलने लगता हूँ; और किसी को ताव बताने की, किसी पर रौब झाड़ने की तबीयत होती हैं इन सब टूटे हुए अक्षर (प्रेस टाइप) - जैसे लोगों के बीच गुजर कर अपने को काफी ऊँचा और प्रभावशाली समझने लगता हूँ। सच कहता हूँ, इस समय मेरे पास पैसे भी हैं। अगर कोई भिखारी इस समय आता तो मैं अवश्ये ही उसे कुछ प्रदान करता। लेकिन भिखारी बेवकूफ थोड़े ही था, जो वहाँ आए; वहाँ तो सभी लगभग भिखारी थे।
सोचा कि ट्रंक खोल कर सामान निकाल कर कुछ जरूरी चिट्ठियाँ लिख डालूँ। मैंने एक सम्माननीय नेता को इसी प्रकार समय सदुपयोग करते हुए देखा था। अभी उजाला काफी था। दो-चार चिट्ठियाँ रगड़ी जा सकती थीं। ट्रंक के पास मैं गया भी। उसे खोल भी दिया। लेकिन कलम उठाने के बजाय, मैंने पीतल का एक डिब्बा उठा लिया। ढक्कान खोल कर मैंने उसमें से एक 'गाकर लड्डू' निकाला और मुँह में भर लिया। बहुत स्वाबदिष्ट था वह। उसमें गुड़ और डालडा घी मिला हुआ था। इसी बीच मुझे घर के बच्चों की याद आई। और मैंने दूसरा लड्डू मुँह में डालने की प्रवृत्ति पर पाबंदी लगा दी।
तभी मुझे गांधीजी की याद आई। क्या सिखाया उन्हों ने? पर दु:ख कातरता। इंद्रिय-संयम। यह मैं क्या कर रहा हूँ। यद्यपि लड्डू मेरे ही लिए दिए गए हैं और मैं पूर्णतया उन्हें खाने का नैतिक अधिकार भी रखता हूँ। लेकिन क्या। यह सच नहीं है कि बच्चों को सिर्फ आधा-आधा ही दिया गया है। फिर मैं तो एक खा चुका हूँ।
पानी पीने के लिए निकालता हूँ। मुसाफिर वैसे ही ठिठुरे-ठिठुरे, सिमटे-सिमटे बैठे हैं। उनके पास गरम कोट तो क्या‍, साधारण कपड़े भी नहीं हैं। उनमें से कुछ बीड़ी पी रहे हैं। किसी के पास गरम कोट नहीं है, सिवा मेरे। मैं अकड़ता हुआ स्टॉल पर पानी की तलाश में जाता हूँ।
मैं पूर्ण आत्मं-संतोष का आनंद-लाभ करता हुआ वापस लौटता हूँ कि अब इस कार्यक्रम के बाद कौन-सा महान कार्य करूँ।
दूर से देखता हूँ कि सामान सुरक्षित है। शाम डूब रही है। अँधेरा छा गया है। अभी कम से कम चार घंटे यहीं पड़े रहना है। एक पोर्टर से बात करते हुए कुछ समय और गुजार देता हूँ।
और फिर होल्डाल निकाल कर बिस्तर बिछा देता हूँ। सुंदर, गुलाबी अलवान और खुशनुमा कंबल निकल पड़ता है। मैं अपने को वाकई भला आदमी समझने लगता हूँ। यद्यपि यह सच है कि दोनों चीजों में से एक भी मेरी अपनी नहीं है।
ओवरकोट समेत मैं बिस्तर पर ढेर हो जाता हूँ। टूटी हुई चप्पलें बिस्तंर के नीचे सिर के पास इस तरह जमा कर देता हूँ कि मानो वह धन हो। धन तो वह हई है। कोई उसे मार ले तो! तब पता चलेगा!
गुलाबी अलवान ओढ़ कर पड़ रहता हूँ। अभी तक स्टेशन पर कपड़ों के मामले में मुझे चुनौती देनेवाला कोई नहीं आया (शायद यह इलाका बहुत गरीब हैं)। कहीं भी, एक भी खुशहाल, सुंदर, परिपुष्ट आकृति नहीं दिखाई दी।
कैसा मनहूस प्लेटफॉर्म है?
मेरे बिस्तर के पास एक सीमेंट की बेंच है। वहाँ गठरियाँ रखी हुई हैं। सोचता हूँ, उस पर अपना ट्रंक क्यों न रख दूँ। गठरियाँ नीचे भी डल सकती हैं। ट्रंक उनसे उम्दा चीज है; उसे साफ-सुथरी बेंच पर होना चाहिए।
लेकिन उठने की हिम्मत नहीं होती। कड़ाके का जाड़ा है। अलवान के बाहर मुँह निकालने की तबीयत नहीं हो रही हैं। लेकिन नींद भी तो आँखों से दूर है।
विचित्र समस्या है। खुद ही अकेले में, अपने को अकेले ही शानदार समझते रहो। इसमें क्या धरा है। शान का संबंध अपने से ज्यादा दूसरों से है। यह अब मालूम हुआ। लेकिन किस मुश्किल में।
उसी बीच एकाएक न मालूम कहाँ से चार फीट का एक गोरा चिट्ठा लड़का सामने आ जाता है। वह टेरोलिन का कुरता पहने हुए है। खाकी चड्ढी है। चेहरा लगभग गोल है। गोरे चेहरे पर भौंओं की धुँधली लकीर दिखाई देती है। या उनका रंग भी गोरा है।
वह‍ सामने खड़े-ही-खड़े एक चमड़े के छोटे-से बैग की ओर इशारा करते हुए कहता है, 'सा'ब, जरा ध्यासन रखिएगा। मैं अभी आया।' एकाएक इस तरह किसी का आ कर कुछ कहना मुझे अच्छा लगा! उसकी आवाज कमजोर है। लेकिन उस आवाज में भले घर की झलक है। उसके साफ-सुथरे कपड़ों से भी यही बात झलकती है।
मैं 'हाँ' कह ही रहा था कि उसके पहले लड़का चला गया। मैं उसके बारे में सोचता रहा, न जाने क्या ।
आधे घंटे बाद वह फिर आया। और चुपचाप चमड़े के बैग के पास जा कर बैठ गया। सर्दी के मारे उसने अपनी हथेलियाँ खाकी चड्ढी की जेब में डाल रखी थीं। मैंने गुलाबी अलवान के नीचे से मुँह उठा कर उसे देखा।
भले ही वह टेरीलीन का बुश्शर्ट पहने हो, वह खूब ठिठुर रहा था। बुश्शर्ट के नीचे एक अंडरवीयर था। बस! उसके पास ओढ़ने-बिछाने के भी कपड़े नहीं थे।
कुछ कुतूहल और कुछ चिंता से मैंने पूछा, 'तुम ओढ़ने के कपड़े ले कर क्यों नहीं आए। कितना जाड़ा है। ऐसे कैसे निकल आए।'
उसने जो उत्तर दिया उसका आशय यह था कि यहाँ से करीब पचास मील दूर शहर बालाघाट में एक बारात उतरी थी। उसमें वह, उसके घरवाले और दूसरे रिश्तेदार भी थे। एक रिश्तेदार वहाँ से आज ही नागपुर चल दिया, लेकिन अपना चमड़े का बैग भूल गया। चूँकि वहाँवालों को मालूम था कि गाड़ी नागपुरवाली उस स्टेरशन से बहुत देर से छूटती है, इसलिए उन्होंने इस लड़के के साथ यह बैग भेज दिया।
लेकिन अब यह‍ लड़का कह रहा है कि रिश्तेेदार कहीं दिखाईं नहीं दे रहे हैं। वह दो बार प्लेेटफॉर्म के चक्कर काट आया है। शायद वे संबंधी महोदय बस से नागपुर रवाना हो गए। और अब चमड़े का बैग सँभाले हुए यह लड़का सर्दी में ठिठुरता हुआ यहाँ बैठा है। वह भी मेरी साढ़े बारह बजेवाली गाड़ी से बालाघाट पहुँच जाएगा। यह गाड़ी वहाँ रात के डेढ़ बजे पहुँचती है।
कड़ाके का जाड़ा और रात के डेढ़। मैंने कल्पना की कि इसकी माँ फूहड़ है, या वह उसकी सौतेली माँ है। आखिर उसने क्याे सोच कर अपने लड़के को इस भयानक सर्दी में, बिना किसी खास इंतजाम के एक जिम्मेदारी दे कर रवाना कर दिया।
मैंने फिर लड़के की तरफ देखा। वह मारे सर्दी के बुरी तरह ठिठुर रहा था। और मैं अपने अलवान और कंबल का गरम सुख प्राप्त करते हुए आनंद अनुभव कर रहा था।
मैं बिस्तर से उठ पड़ा। ट्रंक खोला। उसमें से डबलरोटी के दो टुकड़े निकाले। फिर सोचा, एक लड्डू भी निकाल लूँ। किंतु यह विचार आया की लड़का टेरीलीन का बुश्शर्ट पहने है। फिर लड्डू गुड़ के हैं। वह उसका अनादर कर सकता है।
उसके हाथ में डबलरोटी के दो टुकड़े और चायवाले से लिया हुआ एक चाय का कप देते हुए कहा, 'तुमने अभी तक कुछ नहीं खाया है। लो, इसे लो।'
'नहीं-नहीं, मैंने अभी भजिये खाए हैं।' और लड़के के नन्हे हाथों ने तुरंत ही लपक कर उसे ले लिया। उसको खाते-पीते देख कर मेरी आत्‍मा तृप्त हो रही थी।
मैंने पूछा, 'बालाघाट से कब चले थे?'
'तीन बजे।'
'तीन बजे से तुमने कुछ नहीं खाया?'
'नहीं तो, दो आने के भजिये खाए थे। चाय पी थी।'
मेरा ध्यान फिर उसके माता-पिता की ओर गया और मैं मन-ही-मन उन्हें गाली देने लगा।
मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैंने लड़के से कहा, 'आओ, बिस्तर पर चले आओ। साढ़े दस बजे उठा दूँगा।'
लड़के ने तुरंत ही चमड़े के अपने कीमती जूते के बंद खोले, मोजे निकाले। सिरहाने रख दिया। और बिस्तेर के भीतर पड़ गया।
मैं ट्रंक के पास बैठा हुआ था। लड़का मेरे बिस्तरे पर। मैं खुद जाड़े में। वह गरमी महसूस करता हुआ।
किंतु मेरा ध्यान उस लड़के की तरफ था। कितना भोला विश्वास है उसके चेहरे पर।
और मैं सोचने लगा कि मनुष्यता इसी भोले विश्वास पर चलती है। और इस भोले विश्वास के वातावरण में ही कपट और छल करने वाले पनपने हैं।
मेरे बदन पर ओवरकोट था, लेकिन अब वह कोई गरमी नहीं दे रहा था।
मैं फिर से टी-स्टॉल पर गया। फिर एक कप चाय पी और मनुष्य के भाग्य् के बारे में सोचने लगा। मान लीजिए, इस लड़के के पिता ने दूसरी शादी कर ली है। इस लड़के की माँ मर गई है, और जो है, वह सौतेली है। अगर अभी से वह लड़के की इतनी उपेक्षा करती है तो हो चुकी अच्छी तालीम। क्या पता, इस लड़के का भाग्य क्या हो!
लड़के ने मेरी दी हुई हर चीच लपक कर ली थी। मुझ पर खूब गहरा विश्वास कर लिया था। क्या यह इसका सबूत नहीं है कि लड़के के दिल में कहीं कोई जगह है जो कुछ माँगती है, कुछ चाहती है। ईश्वर करे, उसका भविष्य अच्छाे बने।
इन्हीे खयालों में डूबता-उतराता मैं अपने बच्चों को देखने लगा जो घर में दरवाजे बंद करके भी तेज सर्दी महसूस कर रहे होंगे। उनके पास रजाई भी नहीं है। तरह-तरह के कपड़े जोड़-जाड़ कर जाड़ा निकालते हैं। इस समय, घर सूना होगा और वे मेरी याद करते बैठे होंगे। बच्चे! बच्चे और उनकी वह माँ, जो सिर्फ भात खा कर मोटी हुई जा रही है, लेकिन चेहरा पर पीलापन है।
मैंने बच्चों को सिखा दिया है कि बेटे कभी इच्छा मय दृष्टि से दुनिया को मत देखना। वह मामूली इच्छा भी पूरी नहीं कर सकती। और चाहे जो करो, मौका पड़ने पर झूठ बोल सकते हो, लेकिन यह मत भूलना कि तुम्हारे गरीब माँ-बाप थे। तुम्हारी जन्मभूमि जमीन और धूर और पत्थर से बनी यह भारत की धरती ही नहीं है। वह है - गरीबी। तुम कटे-पिटे दागदार चेहरेवालों की संतान हो। उनसे द्रोह मत करो। अपने इन लोगों को मत त्यागना। प्रगतिवाद तो मैंने अपने घर से ही शुरू कर दिया था। मेरे बड़े बच्चे को यह कविता रटा दी थी -
जिंदगी की कोख में जन्मा
नया इस्पात
दिल के खून में रँग कर!
तुम्हारे शब्द मेरे शब्द
मानव-देह धारण कर
अरे चक्क-र लगा घर-घर, सभी से कह रहे हैं
... सामना करना मुसीबत का,
बहुत तनकर
खुद को हाथ में रखकर।
उपेक्षित काल - पीड़ित सत्यश-गो के यूथ
उदासी से भरे गंभीर
मटमैले गऊ चेहरे।
उन्हीं को देख कर जीना
कि करुणा करनी की माँ है।
बाकी सब कुहासा है, धुआँ-सा है।
लेकिन, यह थोड़े ही है कि लड़का मेरी बात मान ही जाएगा। मनुष्य में कैसे परिवर्तन होते हैं। संभव है, वह थानेदार बन जाए और डंडे चलाए। कौन जानता है।
मैं अपनी ही कविता का मजा लेता हुआ और भीतर झूमता हुआ वापस लौटता हूँ। उस वक्त सर्दी मुझे कम महसूस होने लगती है। बिस्तर के पास जाकर खड़ा हो जाता हूँ। और गुलाबी अलवान और नरम कंबल के नीचे सोए हुए उस बालक की शांति निद्रित मुद्रा को मग्न अवस्था में देखने लगता हूँ। और मेरे हृदय में प्रसन्न ज्योति जलने लगती है।
कि इसी बीच मुझे बैठ जाने की तबीयत होती है। पासवाली सीमेंट की बेंच पर जरा टिक जाता हूँ। और बाईं ओर रेलवे अहाते के पार देखने लगता हूँ।
बाईं ओर बेंच पर रखी गठरियों के पास बैठे हुए एक-दूसरी आकृति की ओर ध्यान जाता है।
हरी धारीवाला एक सफेद शर्ट पहने वह बालक है, जो घुटनों को छाती से चिपकाए बैठा है। बाँहों से उसने अपने घुटनों को छाती से जकड़ लिया है, और ऊपरवाली बीच की पोली जगह में उसने अपना मुँह फँसा लिया है। मुझे उसका मुँह नहीं दी‍खता, सिर्फ उसका सिर और बाल दिखते हैं। वह न मालूम कब से वैसा बैठा है। और ठिठुरा-ठिठुरा (गठरियों के बीच) वह खुद गठरी बनकर लुप्त -सा हो गया है।
अगर मैं अपने लड़के को आज रात को सफर कराता तो शायद वह भी इसी तरह बैठता। क्यों बैठता! मैं तो उसका इंतजाम करके भेजता, किसी भी तरह, क्योंकि मेरे कनेक्शंस (संबंध) अच्छे हैं। इस बेचारे गरीब देहाती के लड़के के संबंध क्या हो सकते हैं।
मैं उस लड़के को पुन: एकाग्रचित से देखने लगता हूँ। उसका मुँह अभी तक घुटनों के बीच फँसा है। अपने अस्तित्व का नगण्य और शून्य बना कर वह किसी नि:संग अंधकार में वि‍लीन होना चाह रहा है।
मैं उसके पास जा कर खड़ा हो जाता हूँ, ताकि उसकी हलचल, अगर है, तो दिखाई दे। लेकिन नहीं, उसने तो अपने और मेरे बीच एक फासला मुख्य कर लिया है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि मैं उसे उठा सकता हूँ, मैं उसे कुछ-न-कुछ दे सकता हूँ। मैं उसे भी डबलरोटी का एक टुकड़ा और एक कप चाय देकर उसके भीतर गरमी पैदा कर सकता हूँ।
मैं उसके पास खड़ा हूँ। और एक क्षण में नवीन कार्य-श्रृंखला गतिमान कर सकता हूँ। काम तो यांत्रिक रूप से चलते हैं। एक के बाद एक ।
लेकिन मैं वहाँ से हट जाता हूँ। फिर बेंच के किनारे पर बैठ जाता हूँ और फिर प्लेतटफॉर्म की सूनी बत्तियों को देखने लगता हूँ। मेरा मन एकाएक स्तब्ध हो जाता है।
मेरे बिस्तर पर सोनेवाला बालक ठीक समय पर अपने-आप ही जाग उठा। तुरंत मोजे पहने, चमड़े का कीमती जूता पहना, बंद बाँधे। अपने टेरीलीन के बुश्शर्ट को ठीक किया। नेकर की जेब में से कंघी निकाल कर बालों को सँवारा।
और बिस्तर से बाहर आ कर खड़ा हो गया, चुस्त और मुस्तैद। और फिर अपनी उसी कमजोर पतली आवाज में कहा, 'टिकिट-घर खुल गया होगा।'
मैंने पूछा, 'टिकिट के लिए पैसे हैं, या दूँ?'
'नहीं, नहीं, वह सब मेरे पास हैं।' यह उसने इस तरह कहा जैसे वह अपनी देखभाल अच्छी तरह कर सकता हो।
वह चला गया। मुझे लगा कि टेरीलीन के बुश्शर्टवाले इस बालक को दूसरों की सहायता का अच्छा अनुभव है। और वह स्वयं एक सीमा तक छल और निश्छलता का विवेक कर सकता है।
मेरा बिस्तर खाली हो गया और अब मैं चाहूँ तो बेंच के दूसरे छोर पर घुटनों में मुँह ढाँपे इस दूसरे बालक को आराम की सुविधा दे सकता हूँ।
और मैं अपने मन मे नि:संग अंधकार में कहता जाता हूँ, 'उठो, उठो, उस बालक को बिस्तर दो।'
लेकिन मैं जड़ हो गया हूँ। और मेरे अँधेरे के भीतर एक नाराज और सख्त आवाज सुनाई देती है, 'मेरा बिस्तर क्या इसलिए है कि वह सार्वजनिक संपत्ति बने। शी:। ऐसे न मालूम कितने ही बालक हैं जो सड़कों पर घूमते रहते हैं।'
मैं बेंच के किनारे पर से उठ पड़ता हूँ और टी-स्टॉहल पर जाकर एक कप चाय पीता हूँ। सर्दी मेरे बदन में कुछ कम होती है। और फिर मैं अपने सामान की तरफ रवाना होता हूँ।
सीमेंट की ठंडी बेंच के किनारे पर घुटनों में मुँह ढाँपे हुए उस बालक की आकृति मुझे दूर ही से दिखाई देती है। क्याे वह सर्दी में ठिठुर कर मर तो नहीं गया।
लेकिन पास पहुँचकर भी मैं उसे हिलाता-‍डुलाता नहीं, उसे जगाने की कोशिश नहीं करता, न उसके चारों ओर, चुपचाप, अलवान डालने की कोशिश करता। सोचता हूँ करना चाहिए; लेकिन नहीं करता।
आश्चर्य है कि मैं भीतर से इतना जड़ हो गया हूँ, कौन-सी वह भीतरी पकड़ है जो मुझे वैसा करने से रोकती है।
मैं टिकिट खरीदने गए टेरीलीनवाले लड़के की राह देखता हूँ। वह अब तक क्यों नहीं आया?
कि एकाएक यह ख्याल पूरे जोर के साथ कौंध उठता है - अगर मैं ठंड से सिकुड़ते इस लड़के को बिस्तर दूँ तो मेरी (दूसरों की ली हुई ही क्यों न सही) यह कीमती अलवान और यह नरम कंबल, और यह दूधिया चादर खराब हो जाएगी। मैली हो जाएगी। क्योंकि जैसा कि साफ दिखाई देता है यह लड़का अच्छे खासे साफ-सुथरे बढ़िया कपड़े पहने हुए थोड़े है। मुद्दा यह है। हाँ मुद्दा यह है कि वह दूसरे ओर निचले किस्म के, निचले तबके के लोगों की पैदावार है।
मैं अपने भीतर ही नंगा हो जाता हूँ। और अपने नंगेपन को ढाँपने की कोशिश भी नहीं करता।
उस वक्त घड़ी ठीक बारह बजा रही थी और गाड़ी आने में अभी आधा घंटा की देर थी।

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

रूतबे की दीवार

रमेश शर्मा

अंग्रेजवा आज रिटायर्ड हो रहा है। नौकरी में जब तक रहा तब तक तो अपने को वायसरॉय से कम नहीं समझा इसने! खूब सताया सबको! आज के बाद क्या ... क्या करेगा। अपनी बीबी को तो सता नहीं पाएगा। सिर कूट देगी इसका। कोई नहीं मिलेगा सताने को तो इसे नींद नहीं आएगी। रातों में, फिर गाना गाता रहेगा ... मुझे नींद न आए, नींद न आए, मुझे चैन न आए ... तरह - तरह की बातें और ही - ही, हा -हा के हंसने की आवाजें शौचालय के भीतर से आ रही थीं। शौचालय हाल के ठीक पीछे था जहां विदाई समारोह का आयोजन चल रहा था। हाल में पीछे की तरफ बैठे कुछ लोग खुसूर - फुसूर करने लगे तो उनमें से बहुतों को समझने में देर नहीं लगी कि मंगलू चपरासी आज फिर शौचालय में बैठकर साहब के सम्मान में कसीदे पढ़ रहा है। उसे बार - बार शौचालय जाने की आदत थी। साहब के चेम्बर का काल बेल बजने पर भी वह वहां से जल्दी उठने का नाम नहीं लेता था। एक बार डायरेक्टर साहब ने उसे गुस्से में माँ - बहन की गाली देकर निलम्बित कर दिया था। बड़ी मुश्किल से यूनियन बाजी के बाद उसकी बहाली हो सकी थी। तब से मंगलू आए दिन शौचालय में बैठकर साहब को गाली देने लगता था। एक बार इसी चक्कर में उसे पुलिस पकड़कर भी ले गई थी, और उसे थाने में दिन भर बैठा दिया गया था। उसके बाद साहब के प्रति उसके मन में विद्रोह और बढ़ गया था।
- काय करही निलम्बित तो करे सकही एकर डारे साले हर,क्या कर लेगा,निलम्बित ही तो कर सकेगा, तो कर ले साले? बात - बात में मंगलू को कई बार ऐसा कहते हुए लोग सुनते।
वैसे मंगलू था बड़ा मजेदार। उसकी दिलेरी के किस्से भी कम मजेदार नहीं थे।
- आज मेरे बचपन के दोस्त रामखिलावन के घर नतनीन पैदा हुई है। मैं भी दादा बन गया! कहते - कहते ठीक एक तारीख को अपनी तनख्वाह में से दो हजार रूपये की मिठाई मंगलू ने ऑफिस में बंटवा दिया था! उसके भीतर कुछ बातें घर कर गईं थीं, इसलिए साहब के पास जाने से वह हमेशा परहेज करता। कहीं कोई मनहूसियत भरी बात वे न कर दें इसलिए उनके पास मिठाई लेकर वह आज भी नहीं गया! मिठाई की भरी प्लेट रामकली के हाथों उसने भिजवा दी,साहब ने पहले तो गटागट सब पेट में डाल लिया फिर पूछने लगे - अरे ये मिठाई किस खुशी में रामकली ...। पूछते - पूछते उनके चेहरे पर जो शरारती मुस्कान उभरी कि उसके अर्थ रामकली भलीभांति जान गई! ढलती उम्र में भी उनकी आदत जस की तस बनी हुई थी! कमसीन और सुंदर देहयष्टि वाली रामकली ने ठेठ छत्तीसगढ़ी में उन्हें कह दिया - मैं का जानव साहब, मंगलू हर भिजवाय हे त लाय हव। मैं क्या जानूँ साहब, मंगलू भिजवाया है तो मैं लाई हूँ! अपने गोल - गोल वृत्ताकार कूल्हों को मटकाती हुई जब रामकली वापस मुड़ी तो उनकी छेड़ती नजरें उसके कूल्हों से टकराकर भीतर ही भीतर उन्हें घायल कर गईं! रामकली थी कि उनकी पकड़ में आती ही नहीं थी, वरना वे तो कब से उसकी ताक में लगे थे। मंगलू के पास जाकर उसने बड़ी ढिढाई से कहा - बड़ रसिया हे डोकरा, बड़ा रसिया है डोकरा! सब्बो दांत मन झड़त जात हे फेर मोला देखत - देखत जवान होय के भरम पाले हवे। ( दांत सब झड़ने लगे पर मुझे देख देख कर जवान होने का भ्रम पाल रखा है ) रामकली की बातें सुन मंगलू ही - ही कर पहले तो जोर -जोर से हँसा फिर नतनीन के आने की खुशी का विस्तार कर रामकली को पूरे दो सौ रूपये का नोट देते हुए कहने लगा - जाओ,आज तुम भी अपनी पसंद का खाओ - पीओ!
- मोर बाप असन सुघर लागथस कका तैंहर। रामकली की बात सुन इस बार मंगलू हँसा नहीं बल्कि थोड़ी गम्भीर मुद्रा में रामकली के सर पर हाथ रखकर एक बाप की तरह आशीर्वाद देते हुए कहने लगा - एकर से बच के रइबे बेटी, नई तो तोरो जिनगी,अंग्रेज हर बिगाड़ दिही।
मंगलू की बातें रामकली खूब समझती थी। माला का किस्सा भी कईयों के मुंह से सुन चुकी थी रामकली। उसके इस ऑफिस में नियुक्ति के पहले की घटना थी वह। माला अब यहाँ नहीं है, पर उसके किस्से इस ऑफिस के जर्रे - जर्रे में टंगे हुए लगते हैं। ऑफिस में क्लर्क थी माला। इस बात की खूब चर्चा थी कि वह बिनब्याही माँ बनने वाली थी। धीरे - धीरे परिस्थितियाँ इस कदर होने लगीं थीं कि उसका ऑफिस आना असंभव हो गया। दबी जुबान में लोग कहने लगे थे कि माला, डायरेक्टर साहेब के बच्चे की माँ बनने वाली है।
- क्या साहेब! ये मैं क्या सुन रहा हूँ, आपके बारे में! माला मेडम के बारे में कुछ तो सोचिए! बेचारी, अब तो कहीं की नहीं रही! आपने तो कहीं का नहीं छोड़ा उसे! आठ महीने बाद बेचारी की शादी होने वाली थी और अब यह बच्चा ...! मंगलू ने सब कुछ खरी - खरी कह दी थी साहेब को। इस बात का असर ठीक उल्टा हुआ। माला अब उन्हें गले की फांस की तरह लगने लगी।
- यह माला भी अब परेशानी का कारण बनते जा रही! अब तो किसी न किसी तरह इसे यहाँ से हटाना ही पड़ेगा! साहेब के दिमाग में शातिराना बातें आने लगीं।
जिस माला से प्यार भरी बातें करते वे थकते नहीं थे, वही अब उनकी दुश्मन हो चली थी। माला इन दिनों छुट्टी पर थी। भविष्य की दुहाई देते हुए उन्होंने उसे किसी तरह बहलाया - फुसलाया। फिर एक दिन एक निजी नर्सिंग होम में मोटी रकम अदा कर गुप्त रूप से उसका एमटीपी करवा दिया। उनके लिए बच्चे का रोना अब खत्म हो गया था फिर भी उन्हें लगा कि इसके बावजूद माला उनके लिए सरदर्दी का कारण बन सकती है। वे अब किसी तरह माला को इस ऑफिस से हटाना चाहते थे। एक दिन वे पुरानी फाइलें ढूँढने लगे। फाइलें तो उनकी कमीशनखोरी जैसे काले कारनामों के जीवंत दस्तावेज थे। ये गड़बड़ियाँ मातहतों पर दबाव पूर्वक वे खुद करवाते थे। इन फाइलों पर कलम तो पहले बाबुओं की ही चलती थी और सारी मलाई साहेब के हिस्से आता था। फंसे तो बाबू ही फंसे। इन्हीं फाइलों में से एक फाइल को उन्होंने खोज निकाला था, जिस पर नोटशीट में माला के दस्तखत थे। तीन लाख रुपयों की गड़बड़ी थी इस फाइल में, जो उन्होंने खुद करवाई थी। आज इसी फाइल को आधार बनाकर माला पर कड़ी कार्यवाही हेतु उन्होंने मंत्रालय को लिख दिया था। माला तुरंत निलम्बित कर दी गई। वह रोज आकर उनसे विनती करती। अपने संबंधों की दुहाई देती। पर उन्हें तो उसे यहां से किसी तरह हटाना ही था। निलम्बन ही एक जरिया था उसे हटाने का। माला अब यहाँ से चली गई पर उसे लेकर ऑफिस में कुछ दिनों तक बातें होती रहीं।
दो साल बाद विभागीय जांच खत्म होने के उपरान्त माला की किसी दूसरे शहर में बहाली की खबर भी एक दिन आई थी। उस दिन फिर माला इस ऑफिस में लोगों की जुबान पर जिंदा हो उठी थी। शौचालय में बैठ कर मंगलू ने साहेब के ऊपर उस दिन भी कसीदे पढ़े थे और अचानक लोग आज उसे भी याद कर बैठे थे।
हाल में विदाई समारोह अपनी समाप्ति की ओर था। औपचारिक समाप्ति उपरान्त ऑफिस से निकलते - निकलते एक सोच साहब के दिलों - दिमाग में अचानक आक्रमण करने लगी,तो मुझे सरकार की ओर से आज रिटायर्ड कर दिया गया! रिटायर्ड शब्द ने एक उथल - पुथल मचा दी उनके मन में! उनके दिमाग ने एक अर्थ खोज लिया- रिटायर्ड याने फिर से थका हुआ, कभी सोचा ही न था उन्होंने इस तरह। सोचना शब्द उनके जीवन की डिक्शनरी में दरअसल था ही नहीं!
आज ऑफिस की गाड़ी उन्हें अंतिम बार उनके घर तक छोड़ने जा रही थी! ड्राईवर भी वही शिवमंगल जो वर्षों से उन्हें घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक लाता ले जाता रहा था। उनके रिटायर्ड हो जाने से उसे कोई फर्क पड़ा हो ऐसा तो कतई उसके हाव - भाव से उन्हें लग नहीं रहा था। उसे भी उन्होंने कहाँ छोड़ा था। कभी कि कोई आत्मीयता उसे उनकी तरफ  खींचती! अब जब अचानक सोचने की यह बीमारी आज उनके ऊपर आक्रमण करने लगी तो उन्हें याद आया कि शिवमंगल के पार्ट फाइनल की रकम के लिए भी उन्होंने उसे कितना तड़पाया था! उसकी बेटी की शादी को बस 45 दिन बचे थे और वह बेचारा उन्हें अपना बॉस समझ पार्ट फाइनल की रकम निकल जाने के लिए सहायता करने की गुहार कई बार लगा चुका था! वे बस इतना भर कहते - अरे, जॉइंट डायरेक्टर साहब को इस सम्बन्ध में मैं कई बार कह चुका हूँ, वे ध्यान ही नहीं दे रहे हैं ! उन्होंने दरअसल हर बार उससे झूठ ही बोला। वे चाहते तो तुरंत ये काम हो जाता पर वे चाहते नहीं थे! बिना पैसे के कभी उन्होंने किसी का काम कब किया था कि वे शिवमंगल का करते! समय जब केवल 15 दिन रह गया और ये साहब उसे तब भी यही जवाब देते रहे तो शिवमंगल को थोड़ा गुस्सा आ गया। एक दिन गुस्सा और खिसियाने का भाव लेकर वह जॉइंट डायरेक्टर के ऑफिस में खुद पहुँच गया। जॉइंट डायरेक्टर उसे चेहरे से पहचानते तो थे, उनके ड्राईवर के छुट्टी में जाने पर एक दो बार उनकी गाड़ी की ड्राईवरी भी उसने कर रखी थी।
- साहब मैं क्या करूं बताइये? मेरी बेटी की शादी 15 दिन बाद है और मेरा पार्ट फाइनल का पैसा अभी तक नहीं निकला! बोलते - बोलते वह रूआंसा हो उठा। बड़े  साहब जो दिन -दिन भर फाइलों में डूब कर बर्फ  हुए जा रहे थे, उसका मजबूरी से सना हुआ चेहरा देख उनकी स्थिति भी पिघलती हुई बर्फ जैसी होने लगी। सारे फाइल को उन्होंने एक तरफ  इस तरह सरका दिया जैसे आज वे इन्हें छुएंगे ही नहीं। काटो तो खून नहीं, जैसे उनसे कोई अपराध हो गया हो। चाहते तो फोर्थ क्लास एम्प्लोयी को डांट कर भगा सकते थे पर उनकी भद्रता ने ऐसा करने से उन्हें रोके रखा।
- अरे! किसी ने बताया नहीं इसके बारे में न ही तुम्हारी फाइल पहुंची अब तक मेरे पास? एक गहरा अफसोस उनके चेहरे को भिगो गया!
वे भले आदमी थे, इसलिए शिवमंगल का काम जल्द हो गया पर वह समझ गया कि सारा खेल अपने ही डायरेक्टर साहब का था। उन्होंने ही उसकी फाइल रोक रखी थी और हमेशा झूठ बोलते रहे! रोज का साथ था, फिर भी उसने, उनसे इस सम्बन्ध में कभी कोई शिकायत नहीं की। उनसे बोलने का कोई फायदा भी न था क्योंकि इतने सालों में अब वह पूरी तरह जान गया था कि वे ऐसे अहंकारी और खुदगर्ज आदमी हैं जिसे दूसरों के सुख - दुःख से कोई लेना - देना ही नहीं है।
एक बार शिवमंगल साहब के चक्कर में मार खाते - खाते भी बचा था। हुआ यह था कि ये जनाब शाम को ऑफिस से लौटते वक्त आए दिन विनोदिनी झा के घर घंटों रूक जाते। घर के अन्दर घुसते तो फिर निकलने का नाम ही न लेते। विनोदिनी झा उन्हीं की स्टेनो थी। यही कोई चालीस - बयालीस की उम्र की। खूबसूरत महिला। सुडौल और उजली देह। गठी हुई देहयष्टि। जनाब तो उस पर लट्टू थे ही। उन दोनों के किस्से कहानियाँ ऑफिस में कईयों की जुबान से वह सुन चुका था। मंगलू ने तो साहब को एक बार विनोदिनी प्रसंग में ही औरतखोर तक कह दिया था। उस दिन से साहब को वह फूटी आँख नहीं सुहाता था। विनोदिनी फ्लेट में अपने पति के साथ रहती थी। उसका पति शहर में ही प्राइवेट नौकरी पर था और रात दस के बाद ही घर लौटता था। आज भी जनाब दो घंटे बाद जब विनोदिनी के घर के दरवाजे को अड़ाते हुई सीढ़ी से वापिस उतर रहे थे कि अचानक विनोदिनी झा के पति से उनका आमना - सामना हो गया। वह आज अचानक समय से दो घंटे पहले आ धमका था। बहुत दिनों से वह इस ताक में था कि उसे रंगे हाथ पकड़ सके। विनोदिनी के पति से शायद उनकी पहले भी कभी कहा सुनी हुई होगी तभी तो वे जनाब से उलझ पड़े थे ..तुम मेरे घर क्या करने गए थे। मैंने पहले भी तुमसे कहा है कि मेरे घर कभी मत आया करो! कहते - कहते उन्होंने साहब को नीचे धकिया दिया था। जब जनाब को कुछ नहीं सूझा तो उनसे कह दिया कि मेरे ड्राईवर शिवमंगल ने विनोदिनी को लिफ्ट दिया है, मैं तो तैयार ही नहीं था आने को, जब आया तो विनोदिनी नहीं मानी, चाय पर उसने जबरदस्ती बुला लिया। कहते - कहते उन्होंने जबरदस्ती वहीं से जोर की आवाज दी - क्यों भाई शिवमंगल, सही कह रहा हूँ न मैं ? सुनकर विनोदिनी का पति ड्राईवर की ओर लपका था। इस बीच उन्हें मौका लग गया, और वे कार के भीतर जा बैठे। शिवमंगल ने उस दिन जाना कि यह आदमी बहुत झूठा और मक्कार भी है। किसी तरह मुश्किल से गाड़ी स्टार्ट कर दोनों वहां से रफू चक्कर हुए थे। जनाब के साथ शिवमंगल भी उस दिन मार खाते - खाते बच गया था। पड़ती तो उस दिन दोनों को खूब पड़ती।
- भाग गया शाला। नहीं तो आज खूब सड़काया होता। सब आशिक मिजाजी निकाल देता। जब देखो मेरी पत्नी पर बुरी नजर रखता है । विनोदिनी के पति की उग्र आवाज कुछ देर तक कार का पीछा करती रही जिसे सुन शिवमंगल उस दिन सहम गया था।
- आप तो अच्छा फंसा देते हैं साहब! आशिक मिजाजी का शौक आप फरमाएं और मार किसी और को खानी पड़े! आते - आते शिवमंगल ने उस दिन उन्हें खूब - खरी खोटी सूना दी थी।
- हद है यार! ड्राईवर सामने हो और साहब को मार खानी पड़े, ये कहाँ का न्याय है बताओ भला! वे अचानक गुस्से में आ गये थे। उनके इस अजीब तर्क को सुन शिवमंगल दंग रह गया था।
- हद है,मार खाने में भी वर्ग भेद! इस आदमी से तो बात करना ही बकवास है! वह मन ही मन कुढ़ते हुए उस दिन चुप रह गया था।
समारोह खत्म हो चुका था। ड्राईवर शिवमंगल गाड़ी ले आया! वे विदाई समारोह में पहनाये गए माला गिनने में लगे थे। एक बैग में उन्हें इस तरह ठूंस रहे थे जैसे इन मालाओं को देख - देख कर ही उनके बाकी दिन कटेंगे। वे मनुष्यता की कसौटी पर कभी प्रेक्टिकल नहीं हो सके थे। उन्हें पता ही नहीं था कि उनके आने वाले दिनों की तरह माला में गुंथे हुए फूल भी कल मुरझा उठेंगे।
ऑफिस के लगभग सारे लोग अपने - अपने घरों को जाने लगे थे! किसी के मन में यह इच्छा नहीं हो रही थी कि जाते - जाते औपचारिक रूप से ही सही, अपने रिटायर्ड बॉस के जाते तक वे रूक जाएं! जब साहब के रूदबे का सूर्य उठान पर था तो उसकी पीड़ा देने वाली तपिस लोगों को रह - रह कर जलाती रही थी इसलिए डूबते सूर्य को जाते - जाते प्रणाम कर लेने की इच्छा किसी में नहीं बची थी।
ड्राईवर ने आम दिनों की तरह कार का दरवाजा खोल दिया! वे बैठ गये। अब कार सड़क पर दौड़ने लगी थी। उनका सरकारी बंगला, ऑफिस से लगभग सात किलोमीटर दूर था!
घर जाते हुए वे फिर सोच में डूबने लगे थे! तरह - तरह की बातें उनके दिलोंदिमाग में आने - जाने लगीं थीं!
जब लोग उनके यहाँ फरियाद लेकर आते और कहते कि साहब कभी हमारे बारे में भी सोचिए ... आपको सरकार ने असीमित अधिकार दे रखे हैं माय बाप! हम कोई बड़ी समस्या लेकर भी नहीं आए हैं, बस छोटी - छोटी समस्याएं हैं हमारी, आप अगर मन से थोड़ा सोचेंगे तो हमारी आधी समस्याएं वैसे ही दूर हो जाएंगी!
उनकी बातें सुन वे मन ही मन कुढ़ते, चिढ़कर वे उनके सामने ही उन्हें मूर्ख कहकर गाली - गलौज पर भी उतर आते! ऐसा कोई फरियादी नहीं था जो कभी खुश होकर उनके दरवाजे से लौटा हो!
- हूँह ...! सोचूँगा इस तरह इनके लिए फिर तो हो गया सब काम! सोचते - सोचते मन के किसी कोने में इनके लिए अगर कहीं कोई सहानुभूति उत्पन्न हो गई फिर वह सख्ती इनके साथ कैसे बरत पाउँगा जिसे अब तक बरतता आ रहा हूँ, सख्ती और रूतबा ही तो अलग करती है मुझे इनसे। अगर वही नहीं बचेगी तो वजूद फिर क्या रहेगा मेरा? कमाऊँगा कैसे? कमाने के हथियार तो यही हैं। सख्ती दिखाओ, डराओ तो लोगों से पैसे निकलते हैं। कमाऊँगा नहीं तो मुंह फाड़े मंत्रियों तक क्या पहुचाऊंगा? अपने बच्चों के लिए क्या रख पाऊँगा? उनके दिलों दिमाग में नकारात्मक बातें इसी तरह घर करती रहीं थीं। सोचने समझने को वे अपने लिए हमेशा खतरा मानते रहे थे।
एक बार उन्होंने अपनी पत्नी से मजाक करते हुए कहा भी था कि ज्यादा सोचने समझने से आदमी के भले और ईमानदार हो जाने का खतरा बढ़ जाता है! उसे इस रास्ते पर चलकर अपने लिए इतिहास में कोई जगह नहीं बनानी है, और इस नौकरी में लगने से पहले बाबूजी ने कहा भी था कि कुछ मत सोचो! बस अच्छे से तैयारी में लग जाओ। बहुत रुतबा है,सुविधाएं हैं, और बहुत पैसा है इस अफसरी में! तब से उसका उद्देश्य सोचना नहीं बल्कि इस अफसरी को पाना ही रह गया!
घर लौटते हुए आज अचानक उन्हें लगा कि उनके हाथों से वह सब कुछ छूटने लगा है ... सरकारी कार, सरकारी बंगला, रुतबा और चोर दरवाजे से जेब में आने वाला बहुत सारा रूपया!
कार अभी बंगले तक पहुँचने को ही थी कि अचानक उन्हें सोच - सोच कर पसीना आने लगा, गला सूखने लगा! अफसरी का रूतबा खो जाने की मार उन पर बहुत भारी पड़ने लगी थी।
- शिवमंगल गाड़ी रोको ... गाड़ी रोको!
- बस पांच मिनट की ही तो बात है साहब, घर तो आने वाला है! आज इतने वर्षों बाद शिवमंगल ने एक तरह से उनकी बातों की अवहेलना की थी!
- अरे गाड़ी रोको नालायक! कहते - कहते वे अपनी सीट पर लुढ़कने से लगे!
तब तक कार को घर के गेट पर लाकर शिवमंगल टिका चुका था! उसने अचानक कार रोकी और क्या हुआ? क्या हुआ?  कहकर उन्हें फिर पकड़कर संभालने लगा!
- क्या हुआ ? क्या हुआ? कहते - कहते उनकी पत्नी भी सुनकर बाहर आ गई।
- इनकी तबियत ठीक नहीं, जल्द किसी डॉक्टर को दिखा दीजिए!
- मैं भी साथ आती हूँ। उन्हें अभी मत उतारो। इसी कार में पास के डॉक्टर के यहाँ चलते हैं। उनकी पत्नी ने शिवमंगल को लगभग आदेशात्मक लहजे में कहा! तब तक वे भी किसी तरह कराहते हुए उठकर अपनी सीट पर बैठ गये थे!
उनकी पत्नी की बातें सुन एकबारगी शिवमंगल के मन में यह खयाल आया कि चलो आज भर के लिए ऐसा कर दूँ पर उनके साथ काम करने वाले सहकर्मियों के साथ - साथ उसे भी उनके अमानवीय रूतबे के बोझ तले दबने का जो एहसास अब तक होता आया था, उस बोझ से मुक्त होने का एक पहला और अंतिम मौका आज उसके हाथ लगा था! ऐसा करे कि न करे एक उहापोह के बीच कुछ देर वह फंसा रहा फिर उस बोझ को एक झटके में उसने उठाकर फेंकते हुए जवाब दिया - नहीं मेडम! साहब अब रिटायर्ड हो चुके हैं! इस सरकारी गाड़ी के उपयोग की पात्रता अब उन्हें नहीं रही! लौटने में देर होगी तो मुझे ऑफिस में जवाब भी देना पड़ेगा! कोई ओला या ऊबर का केब मंगा लीजिए, न हो तो मैं मंगा देता हूँ!
- चुपकर बदतमीज! उनकी पत्नी का यह जवाब उसके लिए अप्रत्याशित नहीं था! वह कई बार बेवजह उसे डांट चुकी थी,आज वजह बड़ी थी, पर इस डांटने में एक अजीब तरह की हताशा थी। वे कार की सीट पर बैठे - बैठे उन दोनों की बातें सुनते रहे!
ड्राईवर के इस जवाब ने उनके रुतबे की हरी - भरी जमीन को अचानक किसी बंजर जमीन में बदल दिया था! कार से उतरकर जब सरकारी बंगले के लोहे के विशालकाय गेट को उन्होंने छुआ तो उन्हें एक परायेपन का एहसास हुआ। इसी बीच घर के बागीचे में काम कर रहे माली ने अचानक उन्हें आवाज दी - इस बंगले को भी अब खाली करना पड़ेगा साहेब! यह सुनकर गाड़ी बेक कर रहे शिवमंगल को थोड़ी हँसी आ गयी। माली की बातें सुनकर और ड्राईवर की हँसी देख रिटायर्ड साहब को ऐसा लगा जैसे उनके रूतबे की दीवार भरभरा कर अचानक ढह गई हो!

92 श्रीकुंज,बीज निगम के सामने,
बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़ ) 496001

बादल छंट गए

अलका प्रमोद
 
उस पत्र पर उकेरे चिरपरिचित अक्षर देख कर अतीत के धुँधलके से विस्मृत हुए चित्र उभरकर सामने आ गए जिन्होंने कनु को क्षण भर के लिए निस्पंद कर दिया। इस लिखावट को वह कैसे भूल सकती है, इसी लिखावट को लिखने वाले ने उसकी जीवन पत्री के चंद पन्ने ऐसे लिखे जिन्हें स्मरण करने मात्र से उसके मुंह का स्वाद कसैला हो जाता है। आज उसी के द्वारा लिखा पत्र पता नहीं किस झंझावात की पूर्व सूचना है। यद्यपि पत्र सारा के नाम था और युवा बेटी के निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप के वह नितान्त विरुद्ध थी पर इस पत्र को लेकर उत्पन्न उत्सुकता, व्याकुलता और चिन्ता ने उसके सिद्धातों को परे ढकेल कर पत्र पढ़ने को विवश कर दिया। कनु ने कांपते हाथों से पत्र खोला। वह पत्र क्या, एक झंझावात का संदेश ही था, जिसने उसके मन के वातायन को झटके से खोल कर सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया था।
पत्र असीम का था जिन्होंने आज से सोलह वर्षों बाद अपनी वयस्क हो चुकी पुत्री सारा को उसके वास्तविक जनक से परिचित कराया था और इतने वर्षों का प्यार एक साथ उड़ेल दिया था तथा उसे अपने पास बुलाने का आग्रह किया था।
क्षण भर को उसकी सोचने समझने की शक्ति निचुड़ गई थी और वह विचलित हो गई। उसका किसी कार्य में मन नहीं लग रहा था मन में बस एक ही प्रश्न सिर उठा रहा था कि यदि सारा सच में असीम के पास चली गई तो उसका विछोह तो वह सह लेगी पर पुनीत से कैसे दृष्टि मिलाएगी, उसके सामने तो कनु का सिर सदा के लिए झुक जाएगा।
इसी उधेड़बुन में उलझी वह अनिच्छा से खाना बनाती रही। तभी पुनीत आ गए। उसका सफेद चेहरा देख कर घबरा कर बोले - क्या हुआ कनु? फिर कनु के अश्रुपूरित नेत्र देख कर बोले - सारा तो ठीक है न? उसका सारा के लिए इस प्रकार चिन्तित होना देख कर कनु के हृदय में हूक सी उठी। उसने बिना कुछ कहे पत्र पुनीत की ओर बढ़ा दिया। पत्र पढ़ कर पुनीत भी कुछ देर स्तब्ध हो कर विमूढ़ से बैठे रह गए। कनु ने सुझाव दिया कि क्यों न वह फाड़ कर फेंक दे। पत्र सारा को दे ही नहीं यह सुन कर पुनीत गंभीर स्वर में बोले - यह तो पलायन हुआ। रेत में सिर छिपा लेने से तूफान टल नहीं जाता फिर आज नहीं तो कल असीम सारा तक अपना संदेश पहुँचा ही देंगे। तब सारा क्या सोचेगी हमारे बारे में? कनु ने अधीर हो कर कहा - फिर क्या करें ? असीम ने दृढ़ स्वर में कहा - कनु सत्य यही है कि असीम सारा के पिता है, उनको मिलने से रोकने का अधिकार हमें नहीं है। उचित तो यही है कि इसका निर्णय सारा पर छोड़ दें।
द्वार पर घंटी बजी, कनु चौंकी, आज यह ध्वनि इतनी कर्णभेदी क्यों लगी जबकि प्रतिदिन इसी ध्वनि का माधुर्य उसे उल्लासित कर देता था और वह आगन्तुक बेटी के स्वागत में यों दौड़ती थी मानो बेटी कुछ घंटों नहीं, कई घंटों के बाद लौटी हो। आज उसके पैर भारी हो रहे थे तभी द्वार पर पुनः घंटी बजी। उसने द्वार खोला तो सारा बोली - ओहो ममा, कितनी देर में दरवाजा खोला। फिर उसका मुरझाया हुआ चेहरा देख कर बोली - मम्मा, एनी थिंग रांग? कुछ गड़बड़ है? कनु ने स्वयं को व्यवस्थित करते हुए कहा।
- कुछ नहीं, हाथ मुँह धो लो, मैं खाना लगाती हूँ।
प्रतिदिन खाने की मेज पर जब तीनों बैठते तो उत्सव का सा वातावरण होता था पर आज खाने की मेज पर असामान्य रूप से शान्ति थी, जो किसी तूफान के आने का संकेत दे रही थी। प्रत्यक्ष में तो कनु खाना खा रही थी पर उसके मन में अनेक प्रश्न सिर उठा रहे थे, क्या सारा मुझे छोड़ कर जा सकती है। क्या पुनीत का प्यार वह भूल जाएगी? फिर उसका मन विरोध करता-  नहीं ऐसा नहीं हो सकता। पर दूसरे ही क्षण आकांक्षा पुनः सिर उठाती। इसमें असीम का रक्त भी तो बह रहा है फिर खून तो जल से गाढ़ा होता ही है। क्या पता वह असीम की बातों से आकर्षित हो जाए। फिर असीम ने उसे नर्सिंग होम खुलवाने का वादा भी तो किया है। अपने में ही उलझी कनु सारा के मुख मंडल पर अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने का असफल प्रयास कर रही थी। सारा ने असामान्य वातावरण देख कर कहा - मम्मा कहाँ हो तुम! कब से पहली रोटी लिए बैठी हो, पापा आप भी चुप बैठे हैं। कोई मुझे कुछ बताता क्यों नहीं!
कनु ने वह पत्र ला कर सारा को दे दिया। पुनीत इस अवांछित स्थिति से बचने के लिए अपने कमरे में चले गए। कनु उस छात्रा के समान, जिसका प्रश्न पत्र बिगड़ गया हो, धड़कते हृदय से परिणाम जानने की प्रतीक्षा करने लगी।
सारा ने पत्र पढ़ा और लापरवाही से एक कोने में फेंक कर अस्पताल की ओर चल दी, जैसे वह पत्र साधारण सा कोई समाचार देने वाला पत्र हो। उसने इस विषय में कनु से चर्चा की आवश्यकता भी नहीं समझी। कनु खीज गई, यहाँ प्राण निकल रहे हैं और इसे अस्पताल जाने की पड़ी है। पर अपनी ओर से कुछ पूछने का साहस वह नहीं कर पाई और सारा चली गई।
कनु का पुनीत का सामना करने का साहस नहीं था। न जाने क्यों वह स्वयं को उसका अपराधी अनुभव कर रही थी अतः बाहर के कमरे में जा कर लेट गई। उसका मन अतीत के सागर में गोते लगाने लगा।
असीम ने उसके रूप और लावण्य पर मोहित हो कर उसका वरण किया था। वह बात दूसरी है कि विवाह के बाद दोनों को अनुभव हुआ कि वह दोनों झरने की उन दो धाराओं के समान हैं जो विपरीत ढलानों पर गिरती हैं और उनके मध्य इतनी विशाल चट्टान है जिसे काट कर दोनों धाराओं को समाहित करना असंभव नहीं तो दुष्कर अवश्य है। कनु जितनी सरल और स्वाभाविक थी, असीम उतना ही व्यवहारिक और महत्वाकांक्षी। वह सदा आडम्बरों और दिखावे के बाह्य आवरण में छिपे रहने में विश्वास करता था। उसे कनु की सहजता और सरलता मूर्खता लगती। वह ऊपर चढ़ने हेतु अवैधानिक सीढ़ियों के प्रयोग में भी नहीं हिचकता था तो कनु के लिए सिद्धान्त ही उसकी पूंजी थे।
असीम कभी निकली हीरों के हार को असली हार के रूप में प्रस्तुत करता और सरला कनु उसका मूल्य और दुकान बता कर अनचाहे ही उसका पोल खोल बैठती तो कभी उसके मित्रों के समक्ष बिना प्रसाधन के ही आ जाती। कनु को कभी समझ नहीं आया कि अपनी आर्थिक स्थिति अधिक बताने में कौन से सुख निहित है और क्या मनुष्य ईश्वर से भी बड़ा चितेरा है जो उसके द्वारा प्रदत्त सौंदर्य में अपना हस्तक्षेप करें। इन्हीं छोटी - छोटी बातों में उनमें प्रायः वाक्युद्ध हो जाता।
नन्हीं सारा के जन्म ने उसके मध्य युद्ध के और भी कारण सहज उपलब्ध करा दिए थे। उसके पालन पोषण और संस्कारों को ले कर उनके मध्य अच्छा खासा मतभेद रहता था। असीम सारा को अंग्रेजी सिखाता। वह बताता कि हैन्की में नोजी पोंछ लो और अंकल आंटी बोलो। तो कनु हिन्दी में चाचा चाची कहना सिखाती। उसे अंकल आंटी में बनावटी पन की अनुभूति होती और चाचा चाची जैसे संबोधनों में आत्मीयता छलकती लगती। उसका तर्क था कि पहले बच्चे में मातृभाषा को ज्ञान तो हो,समय के साथ अंग्रेजी तो सीख ही जाएगी।
असीम बिगड़ जाता - तुम पढ़ी लिखी गँवार हो, उच्च वर्ग में जाने लायक नहीं हो। यह कनु को अपना अपमान लगता। ऐसा नहीं कि उसे अँग्रेजी आती नहीं पर वह अपनी भाषा बोलने में सहजता और आत्मीयता का अनुभव करती। सज सँवर कर पार्टियों में जाना और अपने आभूषणों और कपड़ों का प्रदर्शन करना उसे हास्यास्पद और अरुचिकर लगता।
एक बार असीम कनु और सारा को ले कर अपने उच्च अधिकारी के घर गए। वहाँ सारा को लघुशंका की आवश्यकता हुई तो कनु ने बॉस की पत्नी से पूछ लिया - भाभी जी टॉयलेट कहाँ है? सारा को सू - सू कराना है। यह सुन कर असीम अपमान से लाल भभूका हो उठा। उसे ऐसा लग रहा था जैसे भरी भीड़ में उसे चोर सिद्ध कर दिया गया हो पर बास के घर पर मात्र कनु पर आँखें तरेर कर रह गया। बॉस के घर से निकलते ही वह कनु पर बुरी तरह बरस पड़ा और क्रोधावेश में दंडस्वरूप नन्हीं सारा के कोमल कपोलों पर भी अपनी पाँचों उंगलियाँ छाप दीं। वह मासूम तो यह भी नहीं समझ पाई कि यदि उसे सू - सू जाना था तो उसमें उसका क्या अपराध था। बात सामान्य सी थी पर घर का वातावरण कई दिनों तक असामान्य रहा। इसी प्रकार की नित्य प्रति की छोटी - छोटी बातों से उनके संबंधों की डोर का तनाव चरम सीमा तक पहुँच चुका था। अब तो बस एक छोटा सा आघात ही उसे तोड़ने के लिए सक्षम था। अन्ततः वह घड़ी आ ही गई।
एक दिन कनु ने परिवार में एक और नए आगन्तुक के आने की सूचना दी। असीम के भौतिक साधनों को जुटाने की वृहद योजना में एक और प्राणी की परिवार में बढ़ने की सामर्थ्य न थी अतः उस अनचाहे गर्भ को असीम की उन्नति के मार्ग का व्यवधान बनने का दंड भुगतना पड़ा। कनु अनिच्छ से गर्भ समापन करवा कर शिथिल मन से लौटी ही थी कि उसे पापा के न रहने का दुखद समाचार मिला। एक पापा ही थे जिनसे वह मानसिक रूप से सबसे निकट थी। मम्मी तो पहले ही नहीं थीं अतः पापा के न रहने की सूचना पाकर वह पूर्ण रूप से बिखर गई पर कालचक्र के प्रहारों को सहना तो हमारी विवशता है। कनु और असीम उसी दिन कनु के मायके गए। असीम तो लौट आए पर कनु तीन दिन क्रियाकर्म सम्पन्न होने के बाद लौटी। उस समय असीम कार्यालय गए थे। दोपहर में जब वह आए तो कनु का चेष्टा से रोका गया दुख का बाँध ढह गया और वह उसके कंधे लग कर रो पड़ी। इस समय उसे एक आत्मीय सांत्वना की आवश्यकता थी पर उसकी भावना को किनारे रख कर असीम अव्यवस्थित घर और अस्त - व्यस्त सारा को देख कर क्रोधावेश में चिल्ला पड़ा - क्या गंवारों की तरह रो रही हो। तुम्हें पता है कि सारा बिना चप्पल के बिखरे बालों में बाहर खेल रही है। कालोनी के लोगों ने देखा होगा तो हम लोगों को कितना फूहड़ा समझा होगा। फिर बोले - आज मिस्टर शर्मा शाम को आएँगे। उनके सामने अपना रोना चेहरा ले कर मत आ जाना। कनु विस्फरित नेत्रों से असीम को देखने लगी। आज वह सोचने को विवश हो गई कि वह ही मूर्ख है जो इस भावना शून्य व्यक्ति में भावनात्मक सम्बल ढूँढ़ रही थी। वह स्वयं से प्रश्न करने लगी कि क्यों वह सब सह रही है जबकि वह स्वयं ही सक्षम है कि अपना और सारा का आर्थिक भार उठा सके। जिस समाज में असीम रहते हैं उससे वह तारतम्य बैठा नहीं सकती। भावनात्मक पोषण की आशा अब पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी थी। सम्पूर्ण दिन और रात के विचार के बाद उसने स्वाभिमान से जीने का निर्णय ले लिया। असीम इस अप्रत्याशित निर्णय पर चौंके अवश्य पर उन्हें पूर्ण विश्वास था कि कनु सारा के साथ अकेले जीवन पथ पर नहीं चल पाएगी और लौट ही आएगी अतः उन्होंने उसे रोकने का विशेष प्रयास नहीं किया।
असीम का अहम् झुक गया। कनु ने एक बार पैर बाहर निकाले तो मुड़ कर नहीं देखा। उसे एक कालेज में प्रवक्ता की नौकरी मिल गई। जीवन पथ सहज न था पर उसका आत्मसम्मान सुरक्षित था। उसे दिन रात प्रताड़ित नहीं किया जाता था। सारा भी इस शान्त वातावरण में अपेक्षाकृत प्रसन्न थी। असीम से विच्छेद हो गया। असीम ने फिर कभी इन दोनों के विषय में जानने का प्रयास नहीं किया। उसे भय था कि कहीं सारा के दायित्व वहन करने में उसकी भागीदारी न ठहरा दी जाए।
शनैः - शनैः जीवन के अंधेरे कम होते गए और एक दिन उसके जीवन में अंधकार का स्थान प्रकाश पुंज ने ले लिया। पुनीत उसी कालेज में प्रवक्ता थे। धीर - गंभीर, संवेदनशील और संयमित। कनु को हर पग पर उन्होंने निस्वार्थ सहयोग दिया। जितना अनु ने चाहा उससे लेश मात्र भी आगे नहीं बढ़े। कनु की सादगी संस्कार और क्षमताओं के प्रशंसक पुनीत की प्रेरणा से असीम प्रदत्त व्यंग्यों से खोया आत्मविश्वास पुनः लौट आया। पुनीत ने ही उसे अनुभव कराया कि उसका स्वर कितना मधुर है जिससे प्रेरित होकर उसने संगीत सीखना प्रारम्भ किया। आज उसे अनेक कार्यक्रमों में निमंत्रित किया जाता है।
पुनीत जब भी घर आते तो सारा से इतने घुल मिल जाते कि वह उन्हें सरलता से न जाने देती। अब तो स्थिति यह थी कि यदि चार दिन भी पुनीत न आते तो कुछ सूना सा लगता। वह कनु और सारा की आवश्यकता बनते जा रहे थे और एक दिन उन्होंने स्थायी रूप से कनु और सारा का दायित्व उठा लिया। पुनीत ने जिस प्रकार सहजता से सारा के पिता के कर्तव्यों का भार अपने कंधों पर वहन कर लिया। वह देखने वाले को संशय भी न होने देता कि पुनीत सारा के जनक नहीं हैं। यदि सारा बीमार पड़ती तो कनु को भले झपकी आ जाए पर पुनीत की रात आँखों में कटती। सारा, पुनीत के बिना नहीं रह पाती। जब भी कोई मतभेद होता पिता - पुत्री एक हो जाते। कहने को तो कनु रूठ जाती कि तुम दोनों एक हो कर मुझे अलग कर देते हो, पर यह रूठना तो झूठा आवरण था। सत्य तो यह था कि कनु का रोम - रोम पुनीत का उपकृत था, जिसने एक उजड़े हुए उपवन को अपने प्यार की उर्वरा से इतना पोषित किया कि वह पहले से भी अधिक पल्लवित हो उठा।
आज अचानक वह माली जिसने कभी उपवन की ओर दृष्टि उठाकर भी न देखा था, उस पर अपना अधिकार चाहता था। आज असीम ने कितनी निर्लज्जता से लिखा था -
सारा!
तुम्हारा असली पिता तो मैं ही हूँ। तुम मेरा खून हो और वयस्क हो। तुम अपनी मम्मी और उसके पति को छोड़ कर आ जाओ। मैं तुम्हारा साथ दूँगा। तुम्हें शानदार नर्सिंग होम खुलवाऊँगा। मैं शाम को आऊँगा तैयार रहना।
तुम्हारा अपना
पापा
इन पंक्तियों ने पुनः कनु के हृदय में असीम के प्रति इतने दिनों की सुप्त घृणा को जागृत कर दिया था। वह भली भाँति समझ रही थी कि बाह्य आडंबर में विश्वास करने वाले असीम को अपनी पुत्री से प्यार मात्र इसीलिए उमड़ा था कि वह आज एक योग्य डाक्टर बन गई है और वह अपने तथाकथित उच्च समाज में सिर उठा कर गर्व से उसका परिचय करा सकता है।
अतीत के सागर से किनारे तो वह तब लगी जब पुनः द्वार की घंटी बजी। उसने घड़ी देखी, संध्या के पाँच बज चुके थे। अवश्य सारा लौट गई होगी,उसने सोचा। सारा आई तो सीधे अपने कमरे में चली गई। जब कुछ देर सारा बाहर नहीं आई तो उसका निर्णय जानने हेतु वह उसके कमरे की ओर गई। उसने देखा कि सारा अपनी अलमारी से अपने बाल्यकाल के पुराने खिलौने निकाल कर एक बैग में रख रही थी। कनु के पैरों के तले धरती खिसक गई, तो क्या सारा अभी तक असीम के साथ बिताए क्षणों की स्मृति सँजोए थी? अब उसका विश्वास डगमगा गया। वह समझ गई कि सारा को उसके खून की पुकार आकर्षित कर रही है। वह दबे पाँव लौट कर बैठक के पास वाले कमरे में बैठ गई। आज वह स्वयं को पूर्णतः पराजित अनुभव कर रही थी। तभी किसी के आने की आहट हुई। वह समझ गई कि असीम आ गए हैं। वह यूँ ही बैठी रही। उसे क्या सरोकार, जिससे मिलने और लेने आए हैं वही उनका स्वागत करे। उसने सुना सारा कह रही थी - आइए मिऽअसीम!
- बेटी मैं तेरा पापा हूँ। असीम ने चौंकते हुए कहा, पर उनकी बात बीच में ही काटते हुए सारा बोली - मुझे पता है, मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ। अभी तक तो मुझको आपसे यही शिकायत थी कि आप मुझसे कभी मिलने नहीं आए। पर मन के एक कोने में आप सदा स्थापित थे जिसका सबूत है। मेरे द्वारा संभाल कर रखे गए आपके लाए खिलौने, पर आज इस पत्र ने मेरे सम्पूर्ण भ्रमों से आवरण हटा दिया। इसके पूर्व आपको कभी अपनी बेटी की याद नहीं आई। आपने कभी नहीं सोचा कि मुझे क्या चाहिए? मेरे हर सुख - दुख का जिसने ध्यान रखा, पग - पग पर संरक्षण दिया, वही मेरे असली पापा हैं। उन्हें मैं छोड़ दूँगी ऐसा आपने सोचा भी कैसे? काश आपने यह अधिकार पहले दिखाया होता। आज मैं आपको आपके दिए सारे खिलौने लौटा रही हूँ। आज आप मेरे मन के उस कोने से भी निष्कासित हो गए। अब मेरे ये पापा ही मेरे पापा हैं, जिनका प्यार मेरी सफलता से नहीं, मुझसे हैं। कनु ने किसी के चुपचाप थके पैरों से लौटने की पदचाप सुनी। वह दौड़ कर पुनीत के कमरे में यह शुभ समाचार देने गई। पर शायद उन्होंने भी सम्पूर्ण वार्तालाप सुन लिया था, क्योंकि उनका संतोष और प्रसन्नता उसके चेहरे पर प्रतिबिम्बित हो रहा था। अब काले बादल छँट गए थे और धूप के उजास में सब कुछ धुला - धुला और स्पष्ट लग रहा था।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

आखिरी पत्‍ता

मूल लेखक - ओ हेनरी
रुपांतर कार -दिलीप लोकरे

’पात्र’
1 . सू उम्र 30 वर्ष
2 . जोंसी 26 वर्ष
3.  डॉक्टर उम्र 35 - 40 वर्ष
4 . बेहरमेन उम्र60 -65 वर्ष
टेढ़ी मेढ़ी गलियों के जाल से सजी गन्दी। तंग बस्ती के एक तीन मंजिले मकान की ऊपरी मंजिल का जर्जर घर। सामने से देखने पर दो कमरों में बटा दिखाई देता है। बाई ओंर के हिस्से में सू का पेंटिंग स्टूडियो व बाई और जोंसी का बेडरूम। पलंग के पीछे खिड़की। खिड़की से बाहर पुरानी मिल की दीवार और दीवार पर फैली एक बेल। सू अपने पेंटिंग सामान को जमाते - सम्हालते लगातार बड़बड़ा रही है। सू -कब तक? न जाने कब तक ऐसे ही मरना पड़ेगा? सपनों का शहर ...। भाड़ में जाये ऐसा सपना। क्या यही सब करने इस शहर में आई थी? मजबूरी न होती तो टेढ़ी - मेढ़ी गलियों वाले इस बदबूदार मोहल्ले के ऐसे घटिया मकान में कभी नहीं रहती मै। कहते है इस शहर में कला कि कद्र है ...। कलाकार कि किस्मत खुलती है यहाँ । खाक खुलती है ? आसपास के कमरों में रहने वाले इन मरियल बूढ़ों को देखकर तो नहीं लगता ... आधी उम्र हो गई ... आखें पथरा गई ... हाथ पांव तक कांपने लगे है। लेकिन अभी भी दम भर रहें है। केनवास पर ब्रश चलाते है तो लगता है पान पर कत्था लगा रहें हो। फिर भी दिल के अरमान खत्म नहीं हुए। बड़ा कलाकार बनेंगे। हूँ , बन गए ...। कहाँ - कहाँ से आ जाते है सस्ते किराये वाले इन मकानों में? मेरी मजबूरी नहीं होती न तो केरोसिन के स्टोव से उठने वाले धुंए से भरे इस मोहल्ले में झांकती भी नहीं कभी। कांसे का एक लोटा टीन कि कुछ तश्तरियां और एक स्टोव ... बस, बसा ली गृहस्थी न नहाने के लिए ठीक बाथरूम न लेट्रिन। चारो ओर फैली अजीब सी बदबू, और अब सारे शहर में फैली ये निमोनियां कि बीमारी ( खीज कर ) क्यों पड़ी हूँ मै यहाँ। भाड़ में जाये ये सपनों का शहर, यहाँ के लोग और सपने ( एक ठंडी साँस के साथ ) बस, जोंसी कुछ ठीक हो जाये ... मैं उससे कह दूँगी कि अब मैं यहाँ एक पल भी नहीं रुक सकती। ओह, जोंसी मेरी दोस्त ... बस यही एक सच्ची साथी मिली मुझे इस अजनबी शहर में।
( मंच के बीच में दोनों कमरों को बांटने वाली दीवार में बने दरवाजे से डॉक्टर का प्रवेश )
डॉक्टर - सुनो सू ...! मैंने अपनी सारी कोशिश कर ली है लेकिन तुम्हारी इस सहेली के बचने कि संभावना बिलकुल भी नहीं है। मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि निमोनियां जैसी बीमारी में इसका ये हाल कैसे हो गया? देखो सू मुझे लगता है कि इसकी जीने कि इच्छा शक्ति खत्म हो गई है। इसके दिमाग पर तो भूत सवार हो गया है कि अब वह अच्छी नहीं होगी। मैं अपनी सारी कोशिशे कर रहा हूँ लेकिन बीमार का ठीक होना भी उसकी अपनी इच्छा शक्ति पर ही निर्भर होता है। अब यदि कोई खुद बाहें फैलाए मौत का स्वागत करने को तैयार हो तो डॉक्टर भी क्या करेगा? अच्छा सू मुझे एक बात बताओ - क्या इसके दिल पर कोई बोझ है ?
सू - पता नहीं डॉक्टर। ऐसी कोई बात उसने मुझसे कभी नहीं कही। वह इस शहर में बड़ा कलाकार बनने का सपना लेकर आई है और अकसर कहती है कि एक दिन नेपल्स की खाड़ी की पेंटिंग बनाने कि बड़ी तमन्ना है।
डॉक्टर - पेंटिंग ? हूँ ,लेकिन मेरे पूछने का मतलब था कि क्या इसके जीवन में कुछ ऐसा है जिससे जीने कि इच्छा तीव्र हो, मसलन, जैसे कोई नौजवान? कोई प्रेमी
सू - नौजवान प्रेमी। छोड़ों भी डॉक्टर ऐसी तो कोई बात नहीं।
डॉक्टर - ओह, तो ये बात है। सारी गड़बड़ यही है। अब कोई मरीज खुद यदि अपनी अर्थी के साथ चलने वालो की संख्या गिनने लगे तो दवाई क्या खाक कम करेगी? खैर, तुम यदि इसके मन में कोई आकर्षण पैदा कर सको तो बात बने। ठीक है, मैं चलता हूँ। सारे शहर में निमोनिया के मरीज फैलें है मुझे उन्हें भी देखना है।
डॉक्टर जाता है। सू अपने आप में सुबकने लगती है। कुछ देर बाद अपने आप को स्थिर करने की कोशिश करती, पेंटिग का सामान समेट कर खुद को उत्साहित दिखाने के लिए सीटी बजाती हुई जोंसी के कमरे में जाती है। जोंसी अपने बिस्तर पर चादर ओढ़े, बिना हिले - डुले एक टक खिड़की की ओर देखते पड़ी है। सू को लगता है सोई है। वह सिटी बजाना बंद कर ईजल व केनवास लिए चित्र बनाना शुरू करती है। चित्र बनाते - बनाते उसे कोई धीमी आवाज सुनाई देती है, जैसे कोई कुछ दोहरा रहा हो। वह तेजी से जोंसी के बिस्तर के पास जाती है। जोंसी खिड़की की ओर एकटक देखती गिनती बोल रही है, लेकिन उलटी
जोंसी - बारह ( कुछ देर बाद ) ग्यारह (अचानक एक साथ) नौ,आठ,सात, सू उत्सुकता से खिड़की की और देखती है।
सू - क्या हुआ जोंसी? क्या है वहां ? ( खिड़की में जा कर देखती है )कुछ भी तो नहीं? ये पुरानी ईंटों की दीवार और उस पर फैली ये बेल। ये तो कब से है यहाँ ...।
जोंसी - ( धीमे और थके स्वर में ) छः। अब यह जल्दी जल्दी गिर रही है (हाफने का स्वर) तीन - तीन दिन पहले तक यहाँ करीब सौ - सौ से ज्यादा थी। वह देखो, एक - एक और गिरी ( खांसी व हाफना) अब बची, केवल पाँच।
सू - पाँच। पाँच क्या? (आश्चर्य से खिड़की को देखती है )क्या है वहां ? मुझे नहीं बताओगी?
जोंसी - पत्तियां। उस बेल की पत्तियां गिर - गिर रही है जिस वक्त आखिरी पत्ती गिरेगी ... मैं भी। डॉक्टर ने नहीं बताया तुम्हें। मुझे - मुझे तीन दिन से पता है ।
सू - ( तिरस्कार से लेकिन राहत के भाव से )ओफ्फो,! मैंने तुझ जैसी बेवकूफ लड़की नहीं देखी। अब, अब तेरे ठीक होने का इन पत्तियों से क्या सम्बन्ध ... वह बेल तुझे अच्छी लगती है इसलिए? गधी कही की अब अपनी ये बेवकूफी बंद कर। अभी थोड़ी देर पहले डॉक्टर ने मुझे बताया - तेरे ठीक होने के बारे में। हाँ क्या कहा था उन्होंने हाँ !!! संभावना रुपये में चौदह आना!!! अरे मेरी लाड़ों ... इससे ज्यादा जीवन की संभावना तो तब भी नहीं होती जब हम बस - ट्रेन या टेक्सी में बैठते है। हा - हा ( हंसती है ) अब थोड़ा शोरबा पीने की कोशिश कर और मुझे ये तस्वीर बनाने दे, ताकि इसे उस खडूस संपादक को बेच कर मैं तेरे लिए दवाईयाँ ला सकूं।
जोंसी - नहीं सू! अब तुझे, मेरे लिए शोरबा - शराब या दवाईयाँ लाने की कोई जरुरत नहीं है। वह ... वह देख एक और गिरी। अब सिर्फ चार रह गई। हाँ, अँधेरा होने से पहले आखिरी पत्ती को गिरता देख लूं ... बस फिर मैं भी चली जाउंगी।
सू - ओह जोंसी! दिल छोटा मत कर। देख, तुझे कसम खानी होगी कि जब तक मंै यहाँ काम करूँ तब तक तुम खिड़की से बाहर नहीं देखोगी। मुझे कल सुबह तक यह तस्वीर संपादक को देनी है ... यदि मुझे रोशनी की जरुरत नहीं होती तो मंै ये खिड़की ही बंद कर देती।
जोंसी - क्या तुम दुसरे कमरे में बैठ कर काम नहीं कर सकती।
- सू् - नहीं जोंसी। मुझे तुम्हारे पास ही रहना चाहिए। आलावा मैं तुम्हें उस मनहूस बेल को देखने देना नहीं चाहती। मेरे यहाँ होने से तुम्हारा ध्यान उस तरफ  नहीं जायेगा।
- जोंसी - कितनी देर। आं आखिर कब तक रोकोगी मुझे,खैर काम खत्म होते ही बता देना।
सू - मेरा काम जल्दी खत्म होने वाला नहीं है। जोंसी, तू उस खडूस को तो जानती ही है न। संपादक कम हलवाई ज्यादा लगता है। बातों को जलेबी की तरह गोल - गोल घुमाता हुआ जब ताने कसता है न, तो लगता है कि मेज पर पड़ा ग्लोब उठाकर उसके सर पर फोड़ दूं।
जोंसी - उसे गाली देने से क्या होगा।
सू - जमीर बेच कर, अखबार मालिक के सामने कुत्ते की तरह दुम हिलाने की कुंठा उसे कहीं तो निकालना ही है, तो हम जैसे गरजमंद महत्वाकांक्षी आसान लक्ष्य है। और फिर बड़ा चित्रकार बनने का तो हमने ही सोचा है न?
- सू - हाँ, सोचा तो था जोंसी, लेकिन बड़ा बनने के लिए इतने छोटे समझौते करना पड़ते है ये पता नहीं था। खैर, तू सोने की कोशिश कर। मैं नीचे से बेहरमेन को बुला लाती हूँ। खदान मजदूर का माडल उससे अच्छा कौन हो सकता है? अभी एक मिनिट में आई। मैं नहीं लौटूं तब तक हिलना मत।
- जोंसी - नहीं सू। उस बुड्ढ़े खडूस को यहाँ मत लाना। खुद को महान समझने वाला वो असफल कलाकार दिमाग खा जायेगा हमारा।
- सू - नहीं जोंसी, ऐसे मत बोल। बेचारा, चालीस सालों से यहाँ पड़ा संघर्ष कर रहा है। परेशानी में ज्यादा शराब पीकर बकवास जरूर करता है लेकिन उसकी बातों में भी सच्चाई है। सफलता की कीमत जीवन के रूप में तो नहीं चुकाई जा सकती? उम्र के इस दौर में और कुछ नहीं कर सकता इसलिए हम जैसे कलाकारों के लिए माडल बनकर कुछ पैसे कमा लेता है।
जोंसी - क्या खाक कमा लेता है? जब कुछ कर सकता था तब किया नहीं। हर आढ़ी - टेढ़ी पेंटिंग बना कर यही मानता रहा कि वही उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति है।
- सू - करेगा जोंसी, जरुर करेगा। इस बेरहम दुनिया में इन्सान तय नहीं कर सकता कि बाजार में उसकी कला की कीमत क्या है, बल्कि बाजार यहाँ तय करता है कि इन्सान किस भाव बिकेगा ...खैर, मैं अभी आती हूँ (जाती है )
जोंसी - जाओ सू,  मंै तो उस आखरी पत्ती को गिरते देखना चाहती हूँ। इंतजार की भी कोई हद होती है। पर मंै अब अपनी हर पकड़ ढीली छोड़ कर इन पत्तियों की तरह नीचे - नीचे चली जाना चाहती हूँ। नीचे गिरने का भी एक आनंद होता है, इसे मुझसे अच्छा कौन जान सकता है।
( बाहर के कमरे से बेहरमेंन के जोर जोर बोलने की आवाज। सू भी उसके साथ बड़बड़ा रही है) बेहरमेंन - क्या सू? अभी भी ऐसे बेवकूफ  इस दुनिया में है? एक सूखी बेल के गिरते पत्तों का जोंसी के जीने से क्या वास्ता? अँ और मंै तुम जैसे बेवकूफों के लिए माडल बनने के लिए तैयार हो गया, तो मुझसे बड़ा बेवकूफ शायद ही दूसरा हो, और तुम, तुमने उसके दिमाग में ये घुसने कैसे दिया? ओह बेचारी जोंसी,उसे तो अभी बहुत कुछ करना है।
- सू - वह बीमारी से बहुत कमजोर हो गई है। शायद बुखार से उसके दिमाग में ये अजीब कल्पना आ गई है कि आखरी पत्ती ...
- बेहरमेंन - तुम भी हो बेवकूफ लड़की, अरे ये घटिया जगह जोंसी जैसी अच्छी लड़की के मरने के लिए नहीं है। बस कुछ ही दिनों में मंै अपनी पेंटिंग पूरी कर लूँगा ... फिर देखना दुनिया उसे सर्वश्रेष्ठ काम न माने तो कहना। ( हलकी हंसी ) और तब इस बाजार से मैं वह सब कुछ वसूल करूँगा जो मैंने यहाँ गवाया है। फिर हम यहाँ से चले जायेंगे। तुम और जोंसी भी समझी।
- सू - हाँ ... हाँ समझ गई। लेकिन अब तुम जल्दी से मेरे माडल बन जाओ वरना वो खडूस संपादक ...।
- बेहरमेंन - हाँ तो चलो न ... मैं कहाँ कुछ कह रहा हूँ। (दोनो जोंसी के कमरे में आते है। जोंसी मुंह पर चादर ओढ़े सो रही है। दोनों उसे नजदीक से देख कर खिड़की तक जाते है। खिड़की पर पड़ा परदा हटा बाहर देखते हैं। फिर बिना एक शब्द बोले एक दुसरे की ओर देखते है। दोनों का चेहरा फक्क  है। सू चुपचाप बेहरमेन को हाथ पकड़ कर बाहर के कमरे में लाती है और उसका चित्र बनाना शुरू करती है )सू - सपने सुहाने होते हंै, यह सुनते आई थी, लेकिन वह खतरनाक होते है, यह यहाँ आ कर देखा। बड़े सपनों को देख छोटा लक्ष्य आसानी से पाया जा सकता हैं। मेरे पापा अकसर ऐसा कहा करते थे ...।
- बेहरमेन - हँा, सपनों की कोमलता हकीकत की पथरीली कठोर जमीन पर चूर - चूर हो जाती है ऐसा मेरा बाप कहता था, पर छोड़ों न सू, अपना काम जल्दी खत्म करो। मुझे मेरी महान रचना भी पूरी करनी है। मैं जल्दी जाना चाहता हूँ, यहाँ से ...।
( चलती बातचीत के बीच ही मंच पर फेड आउट। संगीत का स्वर। पुनः प्रकाश होने पर सू जोंसी के पलंग के पास बैठी है। खिड़की पर अभी भी पर्दा पड़ा है)
- जोंसी ( जड़ स्वर में) पर्दा हटा दे सू ... मैं देखना चाहती हूँ
( सू विवश होकर अनमने भाव से खिड़की तक जा कर पर्दा हटाती है फिर अचानक तेजी से पलटती है, उसका चेहरा खुशी से दमक रहा है) तुमने देखा जोंसी? देखा तुमने? जोंसी, यह आखिरी है। मैंने कल शाम सोचा था यह रात में जरूर गिर जाएगी। रात भर मैंने तूफान की आवाज भी सुनी। खैर, यह आज गिर जाएगी तभी मंै भी मर जाउंगी।
- सू ( दुखी मन से जोंसी के तकिए पर झुक कर)- ऐसा क्यों कहती हो जोंसी। मेरे बारे में सोचा है? क्या करुँगी तेरे बिना?
- जोंसी- तुम्हें अकेले होने का डर है, पर कभी सोचा है अकेला कौन होता है? लम्बी और रहस्यमई यात्रा पर जाने वाली आत्मा से ज्यादा अकेला देखा है कभी किसी को?
(मंच पर अँधेरा,मंच के पीछे बनी खिड़की पर प्रकाश होता है। खिड़की पर पड़ा पर्दा सरका हुआ है। तेज प्रकाश में बाहर दीवार पर फैली बेल का आखरी पत्ता अभी भी मौजूद है। जोंसी बिस्तर पर न होकर कमरे में चहलकदमी कर रही है। घर के बाहर वाले हिस्से में मद्धिम प्रकाश जहाँ सू स्टोव पर कुछ पका रही है। अचानक जोंसी सू को आवाज देती है, स्वर की कमजोरी दूर हो चुकी है)
- जोसी सू - सू, (अपना काम छोड़ कर सू जोंसी के कमरे में आती है) सू जोंसी ! ! ! ये मैं क्या देख रही हूँ? तुम बिस्तर से बाहर ? ओह् भगवान तेरा लाख - लाख शुक्र है। जोंसी मंै बता नहीं सकती कि मैं कितनी खुश हूँ ... तुम जीत गई .. हाँ, जीत गई तुम जोंसी(सू की बात काट कर) सू मैं बहुत खराब लड़की हूँ...। लेकिन इस खिड़की से देखो जरा। देखा उस पत्ती को? कुदरत की शक्ति ने उस आखरी पत्ती को वहीं रोक कर मुझे बता दिया कि मेरा समय खत्म नहीं हुआ अभी। और सू इस तरह मरना तो पाप है। मुझे अभी एक महान पेंटिंग को बनाना है। ला, मुझे थोड़ा शोरबा दे ...और हाँ, शीशा भी दे दे, और मेरे सिरहाने दो तकिये और लगा दे। ( स्वर उत्साह से भरा हुआ ) मंै बैठे - बैठे बाल ठीक कर लूं ( मंच पर अँधेरा। संगीत प्रभाव के बाद पुनः प्रकाश होने पर घर के दोनों भाग प्रकाश मान। भीतर के कमरे में जोंसी पलंग पर बैठी है। डॉक्टर उसकी नब्ज देख रहे है। पास ही सू भी खड़ी है) डॉक्टर - गुड ... वेरी गुड! कीप इट अप अब तुम जीत गई। तुम्हें बस अब ठीक देखभाल की जरुरत है। दवा अपना काम कर रही है। जल्दी ही तुम फिर पेंटिंग करोगी जोंसी... ठीक है, मंै चलता हूँ। मुझे नीचे की मंजिल पर एक दूसरे मरीज को भी देखना है ... क्या नाम है उसका, हाँ ... बेहरमेन। तुम तो उसे जानती हो न सू । इस निमोनिया ने भी शहर में सभी को परेशान कर रखा है फिर भी पता नहीं ... उस बूढ़े को भीगने की क्या सूझी? अब पड़ा है तेज बुखार में। इस उम्र में दवा भी कम ही असर करती है। खैर ... मुझे तो अपनी कोशिश करनी ही है ... चलता हूँ। (जाता है। मंच पर अँधेरा। पुनः प्रकाश होने पर जोंसी अपने पलंग पर बैठी कोई स्केच बनाते दिखाई देती है। सू का प्रवेश। खिड़की तक जा कर पत्ती को देखती है फिर जोंसी के पास आती है।
सू - जोंसी माई लव। तुम्हें फिर से स्केच करते देख, मुझे कितनी खुशी हो रही हैं। मंै बता नहीं सकती! लेकिन, लेकिन तुम्हें एक बात कहना है बहरमेंन...
जोंसी( बात काट कर )ओहो, क्यूं नाम लेती हो उस खूसट का? इतने दिनों बाद ठीक हुई हूँ। क्यों उसकी याद दिला रही हो? आते - जाते सीढ़ियों पर ज्ञान बांटता है। खुद तो कुछ कर नहीं पाया मुझे सिखाता है, पेंटिंग कैसे करना है। अपनी महत्वाकांक्षा दूसरे पर थोपने की आदत ही इन बूढों के तिरस्कार का कारण बनती है। महान पेंटिंग बनाना है? कब ? उम्र ही क्या बची है?
- सू (गंभीरता से )नहीं जोंसी ऐसा नहीं कहते। दरअसल, मुझे तुमसे एक बात कहनी है...। आज सुबह अस्पताल में मिस्टर बेहरमेन की मृत्यु हो गई। सिर्फ  दो दिन, बीमार रहे वह। परसों चौकीदार ने उन्हें अपने कमरे में दर्द से तड़पता पाया था। वह कह रहा था कि पूरी तरह से भीगे हुए थे बेहरमेन,यहाँ तक कि जूते - मोजे भी। शरीर बर्फसा ठंडा हो रहा था। उसे नहीं पता ऐसी तूफानी और बर्फीली रात में कहाँ भींग कर आये। कमरे में एक सीढ़ी ( निसेनी ) दो चार रंगों में डूबे ब्रश और फलक पर हरा पीला रंग बिखरा पड़ा था। मिस्टर बेहरमेन अपने जीवन की श्रेष्ठ कलाकृति बनाना चाहते थे। सू, जरा खिड़की के बाहर देख उस आखरी पत्ती को। क्या पिछले दो दिनों में तुझे कभी आश्चर्य नहीं हुआ कि  ये पत्ती इतने आंधी तूफान में भी हिलती क्यों नहीं ... मेरी प्यारी सखी। जिस रात वह आखरी पत्ती गिरी, बेहरमेन ने पूरी रात भीगते हुए इसका निर्माण किया, सारी रात भींगने से उन्हें निमोनिया हो गया लेकिन देख यही है उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति! (सन्नाटा सू अवाक सी बैठी है। धीरे - धीरे मंच पर अँधेरा लेकिन खिड़की के प्रकाश में बेल की पत्ती चमक रही है। फिर प्रकाश कम होते-होते मंच पर अँधेरा।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

अपनी - अपनी बीमारी

हरिशंकर परसाई 

सरदारजी जबान से तंदूर को गर्म करते हैं। जबान से बर्तन में गोश्त चलाते हैं। पास बैठे आदमी से भी इतने जोर से बोलते हैं, जैसे किसी सभा में बिना माइक बोल रहे हों। होटल के बोर्ड पर लिखा है  - यहां चाय हर वक्त तैयार मिलती है। नासमझ आदमी चाय माँग बैठता है और सरदारजी कहते हैं - चाय ही बेचना होता तो उसे बोर्ड पर क्यूँ लिखता बाताओ! इधर नेक बच्चों के लिए कोई चाय नहीं है। समझदार चाय का मतलब समझते हैं और बैठते ही कहते हैं - एक चवन्नी! सरदारजी मुहल्ले के रखवाले हैं। इधर के हर आदमी का चरित्र वे जानते हैं। अजनबी को ताड़ लेते हैं। तंदूर में सलाख मारते हुए चिल्लाते हैं - वो दो बार ससुराल में रह आया है जी। जरा बच के। उसके घर में दो हैं जी। किसी के गले में डालना चाहता है। जरा बच के बाशाओ! दो जचकी उसके हो चुकी हैं। तीसरी के लिए बाप के नाम की तलाश जारी है। जरा बच के। उसकी खादी पर मत जाणाजी। गांधी को फुटकर बेचता है। जरा बच के। उस आदमी को मेरे साथ दो - तीन बार देखकर सरदारजी ने आगाह किया था - वह पुराना खिलाड़ी है। जरा बच के। जिसे पुराना खिलाड़ी कहा था - वह 35 - 40 के बीच का सीधा आदमी लगता था। हमेशा परेशान। हमेशा तनाव में। कई आधुनिक कवि उससे तनाव उधार माँगने आते होंगे। उसमें बचने लायक कोई बात मुझे नहीं लगती थी। एक दिन वह अचानक आ गया था। पहले से बिना बताए, बिना घंटी बजाए, बिना पुकारे, वह दरवाजा खोलकर घुसा और कुर्सी पर बैठ गया। बदतमीजी पर मुझे गुस्सा आया था। बाद में समझ गया कि इसने बदतमीजी का अधिकार इसलिए हासिल कर लिया है कि वह अपने काम से मेरे पास नहीं आता। देश के काम से आता है। जो देश का काम करता है, उसे थोड़ी बदतमीजी का हक है। देश - सेवा थोड़ी बदतमीजी के बिना शोभा नहीं देती। थोड़ी बेवकूफी भी मिली हो तो और चमक जाती है। वह उत्तेजित था। उसने अपना बस्ता टेबिल पर पटका और सीधे मेरी तरफ  घूरकर बोला - तुम कहते हो कि बिना विदेशी मदद के योजना चला लोगे। मगर पैसा कहाँ से लाओगे, है तुम्हारे पास देश में ही साधन जुटाने की कोई योजना? वह जवाब के लिए मुझे घूर रहा था और मैं इस हमले से उखड़ गया था। योजना की बात मैंने नहीं, अर्थ मंत्री ने कही थी। वह अर्थ मंत्री से नाराज था। डाँट मुझे पड़ रही थी। उत्तेजना में उसने तीन कुर्सियाँ बदलीं। बस्ते से पुलिंदा निकाला। बोला - जीभ उठाकर तालू से लगा देते हो। लो, आंतरिक साधन जुटाने की यह स्कीम। घंटा भर अपनी योजना समझाता रहा। कुछ हल्का हुआ। पुलिंदा बस्ते में रखा और चला गया। हफ्ते भर बाद वह फिर आया। वैसे ही तनाव में। भड़ से दरवाजा खोला। बस्ते को टेबिल पर पटका और अपने को कुर्सी पर। बोला - तुम कहते हो रोड ट्रांसपोर्ट के कारण रेलवे की आमदनी कम हो रही है। मगर कभी सोचा है, मोटर - ट्रक वाले माल भेजने वालों को कितने सुभीते देते हैं? लो यह स्कीम। इसके मुताबिक काम करो। उसने रेलवे की आमदनी बढ़ाने के तरीके मुझे समझाए। वह जब - तब आता। मुझे किसी विभाग का मंत्री समझकर डाँटता और फिर अपनी योजना समझाता। उसने मुझे शिक्षा मंत्री, कृषि मंत्री, विदेश मंत्री सब बनाया। उसे लगता था, वह सब ठीक कर सकता है, लेकिन विवश है। सत्ता उसके हाथ में है नहीं। उससे जो बनता है, करता है। योजना और सुझाव भेजता रहता है। देश के लिए इतना दुःखी आदमी मैंने दूसरा नहीं देखा। सड़क पर चलता तो दूर से ही दुःखी दिखता। पास पहुँचते ही कहता - रिज़र्व बैंक के गवर्नर का बयान पढ़ा सारी इकॉनमी को नष्ट कर रहे हैं ये लोग। आखिर यह किया हो रहा है जरा प्रधानमंत्री से कहो न! सरदारजी ने फिर आगाह किया - बहुत चिपकने लगा है। पुराना खिलाड़ी है। जरा बच के। मैंने कहा - मालूम होता है, उसका दिमाग खराब है। सरदारजी हँसे। बोले - दमाग? अजी दमाग तो हमारा,आपका खराब है जो दिन - भर काम करते हैं, तब खाते हैं। वह 10 सालों से बिना कुछ किए मजे में दिल्ली में रह रहा है। दमाग को उसका आला दर्जे का है। मैंने कहा - मगर वह दुःखी है। रात - दिन उसे देश की चिंता सताती रहती है। सरदारजी ने कहा - अजब मुल्क है ये। भगवान ने इसे सट्टा खेलते - खेलते बनाया होगा। इधर मुल्क की फिक्र में से भी रोटी निकलती है। फिर मैं आपसे पूछता हूँ - पिद्दी का कितना शोरबा बनता है? बताइए, कुछ अंदाज दीजिए। मुल्क की फिक्र करते - करते गांधी और नेहरू जैसे चले गए। अब यह पिद्दी क्या सुधार लेगा ? इस मुल्क को भगवान ने खास तौर से बनाया है। भगवान की बनाई चीज में इंसान सुधार क्यों करे? मुल्क सुधरेगा तो भगवान के हाथ से ही सुधरेगा। मगर इस इंसान से जरा बच के। पुराना खिलाड़ी है। मैंने कहा - पुराना खिलाड़ी होता तो ऐसी हालत में रहता? सरदारजी ने कहा - उसका सबब है। वह छोटे खेल खेलता है। छोटे दाँव लगाता है। मैंने उसे समझाया कि एक - दो बड़े दाँव लगा और माल समेटकर चैंन की बंसी बजा। मगर उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती। सरदारजी मुझे उससे बचने के लिए बार बार आगाह करते, पर खुद उसे कभी नाश्ता करा देते, कभी रोटियाँ दे देते, कभी रुपये दे देते। मैंने पूछा तो सरदारजी ने कहा - आखिर इंसान है। फिर उसके साथ बीवी भी है। उसने वह कमाल कर दिखाया है,जो दुनिया में किसी से नहीं हुआ। उसने बीवी को यह मनवा लिया कि वह देश की किस्मत पलटने के लिए पैदा हुआ है। वह कोई मामूली काम करके जिंदगी बरबाद नहीं कर सकता। उसका एक मिशन है। बीवी खुद भी भगवान से प्रार्थना करती है कि उसके घरवाले का मिशन पूरा हो जाए। वह दिन पर दिन ज़्यादा परेशान होता गया। जब - तब मुझे मिल जाता और किसी मंत्रालय की शिकायत करता। अचानक वह गायब हो गया। 8 - 10 दिन नहीं दिखा तो मैंने सरदारजी से पूछा। उन्होंने कहा - डिस्टर्ब मत करो। बड़े काम में लगा है। मैंने पूछा - कौन काम? सरदारजी ने कहा - उसकी तफसील में मत जाओ। बम बना रहा है। इन्कलाबी काम कर रहा है। एक दिन वह सरकार के सिर पर बम पटकने वाला है। मैंने कहा - सच, वह बम बना रहा है? सरदारजी ने कहा - हाँ जी, वह नया कांस्टीट्यूशन बना रहा है। उसे सरकार के सिर पर दे मारेगा। दुनिया पलट देगा, बाश्शाओ। एक दिन वह संविधान लेकर आ गया। और दुबला हो गया था। मगर चेहरा शांत था। फरिश्ते की तरह बोला - नथिंग विल चेंज अंडर दिस कांस्टीट्यूशन। संविधान बदलना ही पड़ेगा। इस देश को बुनियादी क्रांति चाहिए और बुनियादी क्रांति के लिए क्रांतिकारी संविधान चाहिए। मैंने नया संविधान बना लिया है। बस्ते से उसने पुलिंदा निकाला और मुझे संविधान समझाने लगा - यह प्रीएंबल है,यह फंडामेंटल राइट्स का खंड है। इस संविधान में एक बुनियादी क्रांति की बात है। देखो, मनुष्य ने अपने को राज्य के हाथों क्यों सौंपा था? इसलिए कि राज्य उसका पालन करे। राज्य का यह कर्तव्य है। मगर राज्य आदमी से काम करवाना चाहता है। यह गलत है। बिना काम किए आदमी का पालन होना चाहिए। मैं जो पिछले 10 सालों से कुछ नहीं कर रहा हूँ, सो मेरा प्रोटेस्ट है। मैं राज्य पर नैतिक दबाव डालकर उसका कर्तव्य कराना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ, लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं। आई डोंट माइंड। छोटे लोग हैं। मेरे मिशन को नहीं समझ सकते। मैंने कहा - कोई काम नहीं करेगा, तो उत्पादन नहीं होगा। तब राज्य पालन कैसे कर सकेगा? उसने समझाया - आप आदमी को नहीं जानते। वह मना करने पर भी काम करता है। यह उसकी मजबूरी है। मैन इज़ डूम्ड टू वर्क। अगर राज्य कह भी दे कि कोई काम मत करो, तुम्हारा पालन हम करेंगे, तब भी लोग काम माँगेंगे। साधारण आदमी ऐसा ही होता। इने - गिने मुझ - आप जैसे लोग होंगे, जो काम नहीं करेंगे। हमारा पालन उन घटिया बहुसंख्यकों के उत्पादन से होगा। वह अपने संविधान से बहुत संतुष्ट था। एक दिन वह फोटोग्राफ  लेकर आया। फोटो में वह संविधान प्रधानमंत्री को दे रहा है। बोला - मैंने संविधान प्रधानमंत्री को दे दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि जल्दी ही इसे लागू किया जाएगा। सरदारजी ने कहा - आजकल फोटो पर जिंदा है। प्रधानमंत्री से मिल आया है। उसकी बीवी घर भाग रही थी, सो थम गई। इस फोटो को अच्छे धंधे में लगाएँ तो अच्छी कमाई कर सकता है। मगर वह जिंदगी भर ष्रिटेलष् करता रहेगा। 2 - 3 महीने उसने इंतजार किया। संविधान लागू नहीं हुआ। वह अब फिर परेशान हो गया। कहता - यह सरकार झूठ पर जिंदा है। मुझे प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया था कि जल्दी ही वे मेरा संविधान लागू करेंगे पर अभी तक संसद को सूचना नहीं दी। अंधेर है। मगर मैं छोड़ूँगा नहीं। एक दिन सरदारजी ने बताया - पुराना खिलाड़ी संसद के सामने अनशन पर बैठ गया है। रामधुन लग रही है। बीवी गा रही है - सबको सन्मति दे भगवान। इसे सबकी क्या पड़ी है ? यही क्यों नहीं कहती कि मेरे घरवाले को सन्मति दे भगवान! तीसरे दिन उसे देखने गया। वह दरी पर बैठा था। उसका चेहरा सौम्य हो गया था। भूख से आदमी सौम्य हो जाता है। तमाशाइयों को वह बड़ी गंभीरता से समझा रहा था - देखो, इंसान आजाद पैदा होता है, मगर वह हर जगह जंजीरों से जकड़ा रहता है। मनुष्य ने अपने को राज्य को क्यों सौंपा? इसलिए नए कि राज्य उसका पालन करेगा। मगर राज्य की गैरजिम्मेदारी देखिए कि मुझ जैसे लोगों को राज्य ने लावारिस की तरह छोड़ रखा है। नथिंग विल चेंज अंडर दिस कान्स्टीट्यूशन, मेरा संविधान लागू करना ही होगा। लेकिन इसके पहले राज्य को फौरन मेरे पालन की व्यवस्था करनी होगी। यह मेरी मांगें हैं। सरदारजी ने उस दिन कहा - बिजली मँडरा रही है बाश्शाओ! देखो किसके सिर पर गिरती है। जरा बच के। सरकार की तरफ  से उसे धमकी दी जा रही थी। घर जाने के लिए किराये का लोभ भी दिया जा रहा था। मगर वह अपना संविधान लागू करवाने पर तुला था। सातवें दिन सुबह जब मैं बैठा अखबार पढ़ रहा था, वह अचानक अपनी बीवी के सहारे मेरे घर में घुस आया। पीछे कुली उसका सामान लिए थे। उसने मुझे मना करने का मौका ही नहीं दिया। वह अपने घर की तरह इत्मीनान से घुस आया था। मेरे सामने वह बैठ गया। आंखें धंस गई थीं। शरीर में हड्डियां रह गई थीं। मैं भौचक उसे देख रहा था। वह इस तरह मेरे घर में घुस आया था कि मुझसे कुछ कहते नहीं बन रहा था। मगर उसके चेहरे पर सहज भाव था। धीरे - धीरे बोला - प्रधानमंत्री ने आश्वासन दे दिया है। मैं कुछ नहीं बोल सका। वह बोला - कमजोरी बहुत आ गई है। कुछ ऐसा भाव था उसका जैसे मेरे लिए प्राण दे रहा हो। कमजोरी भी उसे मेरे लिए आई हो। उसने बीवी से कहा - उस कमरे में कुछ दिन रहने का जमा लो। मेरी बोलती बंद थी। उसने अचानक हमला कर दिया था। मुझे लगा, जैसे किसी ने पीछे से मेरी कनपटी पर ऐसा चाँटा जड़ दिया है कि मेरी आँखों में तितलियाँ उड़ने लगी हैं। उसने मना करने की हालत भी मेरी नहीं रहने दी। मैं मूढ़ की तरह बैठा था और वह बगल के कमरे में जम गया था। थोड़ी देर बाद वह आया। बोला - जरा एक - दो सेर अच्छी मुसम्मी मगा दो। कहकर वह चला गया। मैं सोचता रहा - इसने मुझे किस कदर अपाहिज बना दिया है। इस तरह मुसम्मी मंगाने के लिए कहता है, जैसे मैं इसका नौकर हूँ और इसने मुझे पैसे दे रखे हैं। मैंने मुसम्मी मँगा दी। वह मेरे नौकर को जब - तब पुकारता और हुक्म दे देता - शक्कर ले आओ! चाय ले आओ! उसने मुझे अपने ही घर में अजनबी बना दिया था। वह दिन में दो बार मुझे दर्शन देने निकलता। कहता - वीकनेस अभी काफी है। 10 - 15 दिन में निकलेगी। जरा दो - तीन रुपये देना। मैं रुपये दे देता। बाद में मुझे अपने पर खीझ आती। मैं किस कदर सत्वहीन हो गया हूँ। मैं मना क्यों नहीं कर देता? चौथे दिन सरदारजी ने कहा - घुस गया घर में बाश्शाओ। मैंने पहले कहा था -पुराना खिलाड़ी है, जरा बच के। 6 महीने से पहले नहीं निकलेगा। यही उसकी तरकीब है। जब वह किसी मकान से निकाला जाता है तो कोई इशू लेकर अनशन पर बैठ जाता और उसी गिरी हालत में किसी के घर में घुस जाता है। मैंने कहा - उसकी हालत जरा ठीक हो जाए तो मैं उसे निकाल बाहर करूंगा। सरदारजी ने कहा - नहीं निकाल सकते। वह पूरा वक्त लेगा। जब वह चलने - फिरने लायक हो गया तो सुबह - शाम खुले में वायु - सेवन के लिए जाने लगा। लौटकर मेरे पास दो घड़ी बैठ जाता। कहता - प्राइम मिनिस्टर अब जरा सीरियस हुए हैं। एक कमेटी जल्दी ही बैठने वाली है। एक दिन मैंने कहा - अब आप दूसरी जगह चले जाइए। मुझे बहुत तकलीफ  है। उसने कहा - हाँ - हाँ, प्रधानमंत्री का पी.ए. मकान का इंतजाम कर रहा है। होते ही चला जाऊंगा। मुझे खुद यहां बहुत तकलीफ  है। उसमें न जाने कहाँ का नैतिक बल आ गया था कि मेरे घर में रहकर, मेरा सामान खाकर, वह यह बताता था कि मुझ पर एहसान कर रहा है। कहता है - मुझे खुद यहां बहुत तकलीफ  है। सरदारजी पूछते हैं - निकला? मैं कहता हूँ - अभी नहीं। सरदारजी कहते हैं - नहीं निकलेगा। पुराना खिलाड़ी है। मैंने कहा - सरदारजी, आपके यहां इतनी जगह है। उसे यहीं कुछ दिन रख लीजिए। सरदारजी ने कहा - उसके साथ औरत है। अकेला होता तो कहता- पड़ा रह। मगर औरत! औरत के डर से तो पंजाब से भागकर आया और तुम इधर औरत ही यहां डालना चाहते हो। उसके रवैये में कोई फर्क नहीं पड़ा। सुबह स्नान पूजा के बाद वह नाश्ता करता। फिर पोर्टफोलियो लेकर निकल जाता। जाते - जाते मुझसे कहता - जरा संसदीय मामलों के मंत्री से मिल आऊँ। आखिर मैंने सख्ती करना शुरू किया। सुबह - शाम उसे डाँटता। उसका अपमान करता। उसके चेहरे पर शिकन नहीं आती। कभी वह कह देता - मैं अपमान का बुरा नहीं मानता। मुझे इसकी आदत पड़ चुकी है। फिर जिस महान् मिशन में मैं लगा हुआ हूँ, उसे देखते छोटे - छोटे अपमानों की अवहेलना ही करनी चाहिए। कभी जब वह देखता कि मेरा मूड बहुत खराब है तो वह बात करना टाल जाता। कागज पर लिख देता - आज मेरा मौन व्रत है। आखिर मैंने पुलिस की मदद लेने का तय किया। उसने कागज पर लिख दिया - आज मेरा मौन व्रत है। मैंने कहा - तुम मौन व्रत रखे रहो। कल पुलिस तुम्हारा सामान बाहर फेंक देगी। उसने मौन व्रत फौरन त्याग दिया और मुझे मनाता रहा। कहा - 3 - 4 दिनों में कहीं रहने का इंतजाम कर लूँगा। सुबह वह तैयार होकर निकला। मुझसे कहा - एक जगह रहने का इंतजाम कर रहा हूँ। जरा पाँच रुपये दीजिए। मैंने कहा - पाँच रुपये किसलिए? उसने कहा - जगह तय करने जाना है न। स्कूटर से जाऊँगा। मैंने कहा - बस में क्यों नहीं जाते? मैं रुपया नहीं दूँगा। उसने कहा - तो मैं नहीं जाता। यहीं रहा आऊंगा। मैंने पस्त होकर उसे पाँच रुपये दे दिए। शाम को वह लौटा और बोला - मैं दूसरी जगह जा रहा हूँ। आपको एक महीने में ही छोड़ दिया। किसी का घर मैंने 6 महीने से पहले नहीं छोड़ा। एक तरह से आपके ऊपर मेरा अहसान ही है। जरा 25 रुपये दीजिए। मैंने कहा - पच्चीस रुपये किसलिए। वह बोला - कुली को पैसे देने पड़ेंगे। फिर नई जगह जा रहा हूं। 2 - 4 दिनों का खाने का इंतजाम तो होना चाहिए। मैंने कहा - यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। मेरे पास रुपये नहीं हैं। उसने शांति से कहा - तो फिर आज नहीं जाता। जिस दिन आपके पास पच्चीस रुपये हो जाएंगे, उस दिन चला जाऊंगा। मैंने पच्चीस रुपये उसे फौरन दे दिए। उसने सामान बाहर निकलवाया। बीवी को बाहर निकाला। फिर मुझसे हाथ मिलाते हुए बोला - कुछ ख्याल मत कीजिए। नो इल विल! मैं जिस मिशन में लगा हूँ उसमें ऐसी स्थितियां आती ही रहती हैं। मैं बिलकुल फील नहीं करता। मैं बाहर निकला, तो सरदारजी चिल्लाए - चला गया? मैंने कहा - हां, चला गया। वे बोले - कितने में गया? मैंने कहा - पच्चीस रुपये में। सरदारजी ने कहा - सस्ते में चला गया। सौ रुपये से कम में नहीं जाता वह। पुराना खिलाड़ी अब भी कभी - कभी कहीं मिल जाता है। वैसा ही परेशान, वैसा ही तनाव। वह भूल गया कि कभी मैंने उसे जबरदस्ती घर से निकाला था। कहता है - प्रधानमंत्री की अक्ल पर क्या पाला पड़ गया? कहते हैं कि हम किसी भी स्थिति में रुपये को डिवैल्यू नहीं करेंगे। मैं कहता हूँ - डिवैल्यू नहीं करोगे तो दुनिया के बाजार से निकाल नहीं दिए जाओगे। जरा प्रधानमंत्री को समझाइए न! वह चिन्ता करता हुआ आगे बढ़ जाता है।