गुरुवार, 24 मई 2018

मई 2018 से जुलाई 2018

इस अंक के रचनाकार

आलेख
तनवीर का रंग संसार : महावीर अग्रवाल
सुन्‍दरलाल व्दिजराज नाम हवै एक : अश्विनी केशरवानी
छत्‍तीसगढ़ी हाना भांजरा : सुक्ष्‍म भेद : संजीव तिवारी
लील न जाये निशाचरी अवसान : डॉ. दीपक आचार्य

कहानी
दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी
खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल
खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान
गोरखधंधा : हरीश कुमार अमित

छत्‍तीसगढ़ी कहानी
गुरुददा : ललित दास मानिकपुरी

लघुकथा
राहत कार्य : सुनील कुमार वर्मा
लोकतंत्र : चंद्रेश कुमार
आत्‍मग्‍लानि : दीपक पाण्‍डेय
हम नहीं सुधरेंगे : अम्‍बरीष श्रीवास्‍तव
रिश्‍ते का भेडि़या : प्रतिभा शुक्‍ला

गीत / ग़ज़ल / कविता
गौरैया के हक में :  दीपक आचार्य
मुठि़ठयां : दीप्ति शर्मा

व्‍यंग्‍य
फलना जगह के डी.एम. : कुंदन कुमार
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ? रवीन्‍द्र प्रभात

बुधवार, 23 मई 2018

तनवीर का रंग संसार

महावीर अग्रवाल

नाटक हमारे ‘स्व’ का विस्तार है, जो हमे समूचे समाज से जोड़ता है। नाटक के दूसरे कलारूपो की तुलना मे अधिक समाजिक माना जाता है। और फिर हबीब तनवीर के नाटको की तो बात ही अलग है। नाटक चाहे संस्कृत (‘मृच्छकटिकम’, मुद्राराक्षस, उत्तररामचरितम, मालविकाग्निमित्रम, वेणीसंहार) के हों या हिन्दी मे असगर वजाहत का ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई ही नई’ या फिर शेक्सपियर के ‘मिड समर नाइटस ड्रीम’ का अनुवाद कामदेव का अपना, बसंत ऋतु का सपना हो या फिर आदिवासियों की आंतरिक पीड़ा को रेखांकित करता हुआ ‘हिरमा की अमर कहानी’ या फिर ‘चरनदास चोर’ जैसा अपार लोकप्रियता प्राप्त करने वाला नाटक, उनके सभी नाटकों में आधुनिक संवेदना दर्शकों को छूती चली जाती है।
        लोक कलाकारों के साथ साथ लोक गीतो का भरपूर प्रयोग के बाद भी उनके नाटक पूरी तरह आधुनिक माने जाते है। ‘बहादुर कलारिन’, ‘लोरिक चंदा’और पोंगवा पण्डित का रंग विधान बताता है कि, रंगकर्म किस तरह दायित्व बोध से जुडा हुआ है। इनमें समकालीन यथार्थ की प्रतिध्वनी के साथ भविष्य की अनुगूंज साफ सूनी जा सकती है। आइए देखिए- अनोखे रंगशिल्पी व रंगचिंतक हबीब तनवीर की अंतर्द्ष्टि से सम्पन्न नाटकों पर हमारे मनीषियों ने किस तरह विचार व्यक्त किए हैं-

        रघुवीर सहाय ने लिखा है, ‘मेरा ख्याल है कि सबसे बडा काम परम्परा को तोड़ने का एक तरीका ईजाद करना था जो कि सिर्फ तोडता न हो, साथ साथ बनाता भी हो और जो चीज बनाता हो वह परम्परा मे शामिल हो जाती है, उससे अलग जा न सकती हो, हालाँकि बदल देती हो। संस्कृत नाटक के साथ उअनके प्रयोग एक शुरूआत थे। छत्तीसगढी लोक नाट्य के साथ उनके प्रयोग उसी सुरूआत का नतीजा हओ। मगर ऐसा नतीजा है जो संस्कृत नाटक के दायरे से निकलकर एक बडे दायरे मे दाखिल हो गया है”|रंग ऋषि ब.व. कारंत ने कहा है, “भारतीय रंगजगत मे हबीब तनवीर अकेले ऐसे रंगनिर्देशक हैं जो 75 पार करने के बाद भी स्टेज पर शानदार अभिनय करते हैं। अपने नाटको की स्क्रिप्ट लिखते है। कलाकारों के साथ नाचते है और मधुर कंठ से गाते हैं। उनकी खनकती आवाज का जादू अभी तक बरकरार है।“
आलोचक नामवर सिंह इंटरव्यू मे कहते है, “हबीब के नाटकों मे लोक की स्थानीयता का बहुत विराट स्वरूप है, लेकिन उनके नाटक-लोक नाटक नहीं है, वैज्ञानिक सोच के साथ परिमार्जित आधुनिक नाटक है।“
        वरिष्ठ रंगकर्मी व नटरंग के संम्पादक नेमिचन्द्र जैन ने लिखा है,”हबीब तनवीर ने ‘मिट्टी की गाड़ी’ की अपनी प्रस्तुति(1958) को ‘नयी नौटंकी’ कहा और उसमें बहुत सी लोक संगीत की धुनें भरी, एक विशेष प्रकार से रीतिबद्ध गतियों का प्रयोग किया, प्रारंभ मे सूत्रधार को ओवरकोट और पाइप लेकर मंच पर प्रस्तुत किया(यह भूमिका स्वंय हबीब ने की थी)। इस प्रकार मृच्छकटिक की कहानी पर आधारित एक नया रंगारंग दिलचस्प तमाशा तो हो सका, पर संस्कृत नाटक का उसमें कहीं पता नहीं था- न चरित्रों की परिकल्पना और उनके मंचीय रूपायन में, न उनकी गतियों और व्यवहारों में, न नाटक के सांस्कृतिक परिवेश में और न उनकी विशिष्ट सौंदर्य दृष्टि में—दूसरी बार छत्तीसगढी बोली में वहां के अभिनेताओं के साथ’ मिट्टी की गाड़ी की नयी प्रस्तुति मे पहली बार के पदर्शन के कई अटपटे प्रयोग नहीं थे और वह अधिक सहज तथा कलात्मक लगती थी।“
        पारम्परिक रंगमंच के अध्येता डा. सुरेश अवस्थी ने लिखा है, “रंगमंच का यह नया मुहावरा हिन्दी के भारतेन्दुयुगीन रंगमंचीय दृष्टि और संवेदना से जुड़ता है, और उसका नवीनीकरण करते समकालीनता प्रदान करता है। मोटे तौर पर, हिन्दी में इस नये मुहावरे की शुरूआत 1954 मे हबीब तनवीर द्वारा आगरे के लोकप्रिय कवि नजीर की कविताओं और जीवन पर लिखित और निर्देशित ‘आगरा बाजार’ और 1958 मे ‘मृच्छकटिक’ के अनुवाद ‘मिट्टी की गाडी’ से होती है।“
        वरिष्ठ रंग समीक्षक सत्येन्द्र कुमार तनेजा’, वागर्थ(सम्पादक: प्रभाकर श्रोतिय) के अनुसार,”हबीब तनवीर की रंगक्षमता की वास्तविक पहचान नाटक और उसकी अंतर्वस्तु के अनुरूप लोक रंग तत्वों के सार्थक लाभ उठाने और नए आयाम खोजने में देखी जा सकती है। ‘आगरा बाजार’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, चरनदास चोर’, ‘मुद्राराक्षस’ अपने कथ्य और शिल्प के स्तर पर कितने भिन्न और अलग प्रकार के हैं परंतु इन सबको जिस रंगदृष्टि से सम्भाला और प्रस्तु किया गया है, वह उनकी कुशलता है। उसमें निरंतर मंजाव आता गया। प्रासंगिक तेवर देते हुए उन्होंने भारतीय रंगकर्म की नई संभावनाएँ खोली हैं।“
        रंग समीक्षक के.बी. सुब्बण्णा ने लिखा है- ” हमारे निर्देशकों ,मे सबसे अनन्य और असाधारण हैं हबीब तनवीर। उनके समान बुद्धि और अंतरंग के बीच समंवय को साधने वाले दूसरा कोई नहीं। यही कारण है कि उनके ‘आगरा बाजार’ और ‘चरनदास चोर’ जैसे प्रयोग आज राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ रंगकृतियों के रूप में प्रतिष्ठित हैं।“
        आलोचक कमला प्रसाद लिखते है, “उनके सभी नाटकों में राजनीति है, राजनीति का पक्ष है। वर्गदृष्टि है, शोषित-पीडित जनता का पक्ष है। धर्मनिरपेक्ष चरित्र है, शोढकों पर हमला है। अपने समूचे निहितार्थ में हबीब साहन के नाटक राजनैतिक रंगमंच का निर्माण करते हैं।“
        संस्कृताचार्य कमलेशदत्त त्रिपाठी के अनुसार. “मृच्छकटिक के रूपांतर को 1958 में लोक रंग-शैली के मुहावरे मे ढालकर की गई उनकी प्रस्तुति संस्कृत नाटक और पारम्परिक रंग शैली के सामंजस्य का नया प्रयोग था। बाद मे भी यह प्रयोग संस्कृत नाटक के पुनराविष्कार का एक अत्यंत सार्थक समकालीन प्रयास रहा है।“
        प्रसिद्ध समीक्षक इरवींग् वारडल ने लिखा है,” लोक नृत्य और गीतों से सजे नाटक ‘चरनदास चोर मे संस्कृत परम्परा और ब्रेख्त का अदभुत समवय है।“
विश्व प्रसिद्ध निर्देशक पीटर ब्रुक लिखते है, “हबीब तनवीर एक ऐसे शहरी अभिजात्य नाटककार हैं जो लोक कलाकारों के साथ नाटक करते आए हैं, लेकिन बिना उनकी संवेदना को संकुचित करते हुए। बिना उन्हें एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हुए।“
        छत्तीसगढी लोक कला मर्मज्ञ एवं नाट्य निर्देशक रामहृदय तिवारी ने लिखा है “आर्बुज़ोफ़ की प्रतिकात्मक, ब्रेख्तिरियन अति यथार्थवाद और नाचा की लयात्मक सादगी- इन तीनों के संश्लिष्ठ फार्मूले से जन्मा एक नया नाट्य व्याकरण, हबीब तनवीर की नाट्य प्रस्तुतियों के चुम्बकीय आकर्षण का रहस्य है। अध्ययनशील, युगीन नब्ज़ और चीजों पर बारीक नजर रखने वाले तनवीर जी ने छत्तीसगढ के चुनिंदा कलाकारों, गीत, नृत्य, बोली और कला विधाओं कच्चे माल की तरह अपनाया। अपनी विलक्षण प्रतिभा से उन सबका बेहतरीन इस्तेमाल किया। वक्त ने भी उनका साथ दिया। और अपनी सुविचारित व्यूहरचना से नाट्य अंतरिक्ष में स्थापित हो गये। इन सबके बावजूद यह आश्चर्यजनक है कि खुद उनके गृहांचल छत्तीसगढ में उन्हें व्यापक और सहज स्वीकृति नहीं मिल पायी।
        कवि आलोचक संस्कृतकर्मी अशोक बाजपेई ने लिखा है, “एदिनबरा 1982 के समारोह में जब हबीब तनवीर को प्रथम पुरस्कार मिला था, तब बहुत से लोग चौंके थे। यह पुरस्कार उस आधुनिकता को नही मिला था जोअलका जी ने स्थापित की थी। यह पुरस्कार उस संयमित आधुनिकता को नही मिला था जो शंभु मित्र ने विकसित की थी। यह पुरस्कार उस कच्ची, उबड़ खाबड़ आधुनिकता को मिला था जो हबीब तानवीर ने किसी हद तक विन्यस्त की थी और किसी हद तक विकसित की थी।“
       ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रर्वतक व रंग समीक्षक देवेन्द्रराज अंकुर के अनुसार”भारतीय रंगमंच मे ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व रंगमंच में ऐसे किसी रंग निर्देशक का मिसाल मिलना मुश्किल है, जिसने लगातार एक दिशा में, एक ही तरह का, एक ही नाट्य दल के साथ और अंतत: एक रंगकर्म किया हो और अब भी उतना ही सक्रिय है। वह निर्देशक है हबीब तनवीर।“कथ्य की सघनता:

नाट्क में चितन और विचार की ताकत बहुत बड़ी होती है। निरंतर कौतुहल की सृष्टि करते हुए हबीब तनवीर के नाटकों की विषय वस्तु इतनी पुख्ता होती है कि दर्शक शुरू से ही कथा में बंध जाता है। कहा गया है, “वेदाध्यात्मोपपन्नं तु शव्दच्छन्दस्समंवितम, लोक सिद्धं भवेत्सिद्ध नाट्यं लोकात्मकं तथा।“ अर्थात, ‘नाट्क चाहे वेद या अध्यात्म से उत्पन्न हो, व्ह कितने ही सुंदर शब्दों और छन्दों में रचा गया हो, वह तभी सफल माना जाता है जब लोक उसे स्वीकार करता है क्योंकि नाटक लोकपरक होता है।‘ उनका कथ्य आधुनिकता और जीवनबोध से जुड़ा हुआ होता है, यही कारण है कि अथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि से प्रयोगधर्मी होने के बाद भी उनके नाटकों मे कहानी बहुत ही सहज ढंग से विकसित होती चली जाती है। लोकगाथा ‘लोरिक चंदा’ को नवीन प्रयोग से अंतर्गत ‘सोन सागर’ के नाम से प्रस्तुत करते हैं। इसमें वस्तु तत्व पूरी तरह कथा श्रोतों से जुडा हुआ है और नायिका ‘चंदा’ के माध्यम से स्त्री चेतना द्वारा परम्परा को नया अर्थ देने का सार्थक प्रयास हबीब तनवीर करते हैं। कुछ नाट्कों को छोड दिया जाय तो उनके अधिकांश नाटकों की यह विशिष्टता रही है कि हर बार एक नया नाटक, एक नए रंग भाषा के साथ नया रंग शिल्प लेकर आया है। गांव की गलियों से ज्यादा महानगरों के प्रबुद्ध दर्शकों के साथ खांती रंग समीक्षक तक को उनके नाटक बांधकर रखते हैं, इसका एक कारण यह भी है कि उनके नाटकों में समग्र जीवन का सत्य दिखाई पडता है। “यही हमारे आज का सत्य भी है। ससुर की उपस्थिति में बहू बोल नहीं पाहीए। पति की उपस्थिति में पत्नी शब्दों को ढूंढ नहीं पाती। हमारा समाज विलक्षण अवरोधों से जूझने वाला समाज है। यहाँ सब कुछ पहले तय होता है। कहां बोलना चाहिए-कहां चुप रहना चाहिए—पहले किसे बोलना चाहिए—रसोईघर मे कौन बोलेगा, बाहर कौन बोलेगा—यह सब तय है और कोई भी नाट्य लेखक टोन के इस सूक्षम भेद को पकड नहीं पाता।“ लेकिन हबीब तनवीर इन स्थितियों के रेसे-रेशे को जानते हैं। उनके नाट्कों में संवाद छोटे छोटे और मारक होते है’। अक्सर उनके कलाकार प्रत्युत्पन्नम्ति द्वारा तत्काल संवाद बोलकर एक नई और अनोखी बात पैदा कर लेते हैं। हास्य व्यंग्य से ओत प्रोत नाट्क ‘गाँव के नाँव ससुराल मोर नाँव दमाद’ मे भी श्रेष्ठ मानव मूल्य भीतर ही भीतर विकसित होते है। 1954 में ‘आगरा बाजार’ से लेकर ‘मिट्टी की गाडी’ 1958, ‘चरनदास चोर’ 1975 एवं 2002 के ‘जहरीली हवा’ सहित 2006 के ‘विसर्जन’ तक सभी नाटकों मे लोक कल्याण की अनुगूंज सुनी जा सकती है।
समाजिक सारोकार:
        हबीब तनवीर के नाटकों में एक प्रकार की बेचैनी, प्रश्नाकुलता के साथ किसी न किसी रूप मे मौजूद रहती है। ‘बहादुर कलारिन’ नाटक मे वैयक्तिक अनुभूति और समाजिक मान्यताओं के बीच का द्वंद (मां और पुत्र्) – मां ने समझौताविहीन संघर्ष किया और बेटे को कुआँ मे ढकेलकर मौत के आगोश में हमेशा हमेशा के लिए सुला दिया। इस नाटक में बहादुर कलारिन का जानदार अभिनय फिदा बाई ने किया था। “फिदा बाई को विश्व स्तक की एक महान अभिनेत्री मानता हूं। जितनी भूमिकाएँ उन्होने ‘नया थियेटर’ के नाट्कों में निभाई हैं, उनमें खासतौर से मुझे दो बेहद पसंद है। मेरी राय मे ‘बहादुर कलारिन’ और साजापुर की शांति बाई’ में उनकी कला शिखर पर पहुंच गई थी।“ ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘चारूदत और गणिका बंसतसेना की रोमांटिक प्रेमकहानी ही नहीं है, उसके साथ अत्यचारी राजा पालक के बिरूद्ध शर्विलय राजनीतिक चेतना का शंखनाद करते हैं। वे कहते भी हैं, अपनी ज़मीन से जुडाव, अपनी मिट्टी की खुशबू, इसकी हाजिर जवाबी के प्रभावकारी इज़हार के साथ साथ इसके वजनदार लेकिन सीधे सीधे फार्म ने मुझे बेहद प्रभावित किया और यह मेरा मॉडल बना। नाट्क ‘हिरमा की अमर कहानी’ आदिवासियों पर होने वाले अत्यचार की गाथा के साथ साथ आदिवासी समाज को जागृत करने का एक प्रयास है। आदिवासियों की कठिनाइयों और उनके विकास का प्रश्न का पूरे तथ्यों के साथ सामने रखा गया है। समाज और शासन दोनों के लिए सीधा संदेश है या उससे भी अधिक चुनौती सामने आती है। ‘जिन लाहौर नहीं देख्या, वो जन्मई ही नई’ में अनेक छोटे छोटे दृष्यों को एक दूसरे से जोडकर उनमें एक नया अर्थ भरा और नाटक को गति दी। जैसे क्लर्कों को दफ्तर से उठाकर पहलवान के चेलों के साथ घर के अंदर लाया गया। आखिरी में भी मौलवी साहब और दादी के मरने की ‘टाइमिग’ में तब्दीली की गई। एक हिन्दु और एक मुसलमान का जनाजा एक साथ उठा और उसी के साथ दंगे का दृश्य भी दिखाया गया। इसके बाद ‘जिन लाहौर नी देख्या’ हो या फिर ‘वेणीसंहार’ नाटककार समकालीन राजनैतिक, समाजिक परिवेश पर बेखौफ टिप्पणी करते हुए विसंगतियों को उदघाटित करते हैं। हबीब तनवीर ने बातचीत मे मुझसे कई बार कहा कि ‘चरनदास चोर’ यह भी बताता है कि बडे बडे चोर हैं, बडे बडे पगडीधारी। अपनी तिजोरियों का ताला खोल कर देखो, तो उनको चोरी का माल मिलेगा और चरनदास जो है सबको बांटता है, गरीबों की परवाह करता है। चरनदास दरअसल चोर नहीं है उसके अलावा बहुत सारे चोर समाज में मौजूद है। यह जो कंट्राडिक्शन है, यह मैंने ब्रेख्त से सीखा है। उसके अलावा बहुत सारे चोर सअमाज में मौजूद है। यह जो कंट्राडिक्शन है, यह मैंने ब्रेख्त से सीखा है। उनके सभी नाटकों के भीतर समाजिक दृष्टि का विस्तार साफ सुनाई पड़ता है। उनके सभी नाटकों के भीतर समाजिक दृष्टि का विस्तार साफ सुनाई पड़्ता है। मनुष्य विरोधी ताकतों के विरूद्ध नाटक करने में उनका समूचा जीवन बीता है। “इप्टा कम्युनिष्ट पार्टी का सांस्कृतिक प्रकोष्ठ था। स्वतंत्र रूप से रंगमंच और नाटकों के संबंध में कोई रति नीति नहीं थी।“ इसके बाद भी हबीब तनवीर के पास एक जनपक्षधर दृष्टि थी और आज भी है, समझ और सोच पूरी तरह पकी हुई है। ‘पोंगवा पंण्डित’ का मंचन देख संघ परिवार और कट्टरपंथी तबके के लोगों ने नाटक के बीच में पत्थर फेंकें थे लेकिन दिल दहला देने वाली स्थितियों में भी हबीब तनवीर अपना नाटक जारी रखते हैं। समाज के सवालो से टकराते उनके नाटक व्यक्ति की चेतना को झकझोरकर हंगामा मचा देते हैं।
भाषा का नया मुहावरा:
        सहज विवेक से देखें तो भाषा हमेशा बदलती रहती है। हमें भाषा और शिल्प का प्रयोग करते समय कट्टरता की प्रवृत्ति छोड्नी चाहिए, भाषा के विकास के लिए यह आवश्यक है।स्वर और लय की अंविति पर ध्यान नहीं दिया गया तो सम्प्रेषणीयता सहज नहीं रह पाती। भाषा की मूल शक्ति कमजोर हो जायेगी और अच्छे संवादों और दृश्यों का भी दर्शकों पर असर नहीं हो पाता।विचार व भाव मे तादाम्य तभी हो सकता है जब शब्द के अनुरूप ही स्वर निकलता रहे। हबीब तनवीर शब्दों के सही उच्चारण पर पूरा ध्यान रखते हैं। भाषा की स्वाभाविकता और जीवंतता उनके नाटको की बहुत बड़ी ताकत हैं। परम्परा और आधुनिकता के समंवय करने की दृष्टि से भी वे बेजोड है। “मेरी दृष्टि में किसी भी नाटक की उत्कृष्टता की कसौटी इस बात से में है कि वह अभिनय के लिए कितनी चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। इस बात का एक तात्पर्य यह भी है कि उस भाषा में जटिल अभिनय की कितनी सम्भावनाएँ है क्योंकि इकहता अभिनय हमें उतनी नाट्यनुभूति नहीं दे पाता जो जटिल अभिनय से सम्भव होती है। “ अभिनय की चुनौती और भाषा की बारीकी दोनों ही दृष्टि से हबीब तनवीर के नाटक ‘आगरा बाजार’ ने पांच दशक पहले 1954 में ही धूम मचा दी थी। सच तो यह है कि ‘आगरा बाजार’ की पारदर्शी भाषा ने रंगजगत को एक नई भंगिमा और नया तेवर दिया। उनके अधिकांश नाटकों की भाषा दैनिक बोलचाल की भाषा होने के साथ ही पात्र के बेहद अनुकूल होती है। उनके नाटक की भाषा मे लोक भाषा का समावेश होता है। इसके बाद भी कथ्य के अनुरूप होने के कारण वह पूरी तरह समझ मे आती है। हास्य और व्यंग्य से सराबोर रहकर भी कथ्य को आगे बढाती हुई भाषा मुहावरेदाए और खुबसूरत तो होती ही है। “ रंगमंच अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जहाँ संवाद गीत होता है और गीत संवाद----- धुन वह वाहन है जिस पर विचार सवार होता है, दर्शक तक पहुचने के लिए, उसके मन में समाने के लिए।“ इस दृष्टि से भी वे दर्शकों सी संवेदना का पूरा ध्यान रखते हैं। ‘आगरा बाजार’ एवं ‘चरनदास चोर’ के गीत जिस तरह संवाद का काम करते है वह अपने आप में अनोखी अनुभूति है। यही कारण है कि हबीब तनवीर के नाटक, दूसरे नाटको से अलग आधुनिक नाटक बन जाते हैं। “ब्रेख्त ने रंगमंच की पुरानी परम्परा को तोडते हुए हमारे समय की आर्थिक समाजिक स्थितियों के सम्बन्ध मे नये प्रयोग किये। उसने त्रासादी को कामेडी और कामेडी को त्रासादी बनाया, जहां अरस्तु का प्रेक्षक जार-जार आंसू बहाता था, वहाँ ब्रेख्त ने उसे हंसाया, जिस जगह पर वह विद्रुप व घृणा से भर उठता था वहां ब्रेख्त ने उसे गंभीर होकर सोचने के लिए मजबूर किया। सबसे बढकर ब्रेख्त ने अपने रंगमंच पर पार्थक्य प्रभाव के द्वारा प्रेक्षक की आलोचना बुद्धि और विवेक के स्वातंत्रय को प्रतिष्ठित किया।“ ‘हिरमा की अमर कहानी’ के मर्मस्पर्शी संवादों की व्यंजना हमें बताती हैं कि यथार्थ को पकडने मे ही नहीं उसका अतिक्रमण करने के कारण भी उनके नाटक लोकप्रिय होते हैं और सार्थक माने जाते हैं। मानवीय रिश्तों की उष्मा की दृष्टि से वे लोक की आधुनिक जिजीविषा के प्रतीक है।
गीत संगीत:
         गीत और संगीत हबीब तनवीर के नाट्कों की आत्मा है। गीत और संगीत दोनो का स्वतंत्र अस्तित्व होने के बाद भी दोनो एक दूसरे के पूरक होते हुए अधिक प्रभावपूर्ण होटल हैं। धरती से जुड़े संगीत और आधुनिक भावबोध से एक नई शैली विकसित करने वाले हबीब जी लोक जीवन के द्रष्टा की नही सृष्टा भी हैं। हबीब तनवीर अपने नाटको मे गीतों का अधिक प्रयोग करते हैं, फिर भी वह नाट्कों को बोझिल नहीं होने देते वरन कथ्य के विकास में गीतों की स्वभाविक गति चकित करती है। लोक धुनों पर आधारित उनके गीतों मे बसंत के झोंके जैसी ताजगी का अहसास-उनके नाट्क का संगीत हमेशा साथ साथ चलता है, न कभी नाट्क पर हावी होने की कोशिश और न कभी नाटक से अलग। रंग संगीत का प्रयोग अपने नाट्कों मे जब भी वे करते हैं तो उनमे अजब सी ताजगी और नाटकीयता होती है। वे कहते हैं, संगीत ऐसा हो जो नाट्क के भीतर छुपे हुए अर्थ को भी खोलते हुए आगे बढाए। उनके गायक कलाकारो की दिल छू लेने वाली आवाज से नाटक की एक एक परत खुलती जाती है। सच तो यह है कि उनके नाटको मे गीत और नृत्य कभी बाधक नही होटल वरन नाटक को अधिक पारदर्शी बनाते रहते हैं। “हबीब साहब रंगसंसार से जुड़े हमारे बीच सबसे दीर्घकालीन रंगकर्मी है। चालीस के दशक मे शुरू हुआ उनका रंगकर्म बिना खंडित हुए रंगसंगीत के साथ लगातार चल रहा है। हबीब जी ने परम्परा को साधने और उसे आधुनिक बनाने का काम किया है। ब्रेख्त की थ्योरी का साक्षात प्रमाण हबीब जी के नाट्कों में मिलता है। उनके रंग संगीत में परिवर्तन की इच्छा है। सच तो यह है कि संगीत की सहायता से एक के बाद दूसरे दृश्य में इस तरह गुथे जाते हैं कि नाटक की कथा आगे बढती है। कथानक चलता रहता है, आगे बढ़ता जाता है। मुद्रा राक्षस, मिट्टी की गाडी जैसे संस्कृत नाटकों के साथ हिरमा की अमर कहानी, गाँव का नाम ससुराल मोर नाँव दमाद और चरनदास चोर जैसे नाटकों तक की पृष्टभूमि में संगीत की महता कभी कम नहीं होती। लय, ताल और स्वर का अदभुत समंवय हजारों दर्शकों को देश काल की सीम से परे नाटक के कथालोक में ले जाता है। “देशी संगीत के विकास की पृष्ठभूमि लोकसंगीत है।---- आधुनिक प्रचलित गुर्जरी, सोरठ, सौराष्ट्र टंक, गांधरी, भोपाल मुल्तानी, बंग भैरव, कन्नड़ आदि राग अपने नाम आख्याभेद के अनुसार भी तत्त जनपदों और लोक संगीत का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि हमारा जनतंत्र राज्य शासन, लोक संगीत के सभी अंगो के विकास की यथेष्ठ चेष्टा करे तो भारतीय संस्कृति के विकास का एक ऐसी अनुशीलन प्रधान इतिहास निर्मित हो जाए जिससे समस्त मानव जाति को प्रेरणा और लोकोत्तर आन्नद प्राप्त हो सकेगा।“ लोक मानस का उल्लास मिश्री की तरह और उसकी व्यथा नमक की तरह घुलकर नाटक मे गायन, वादन और नर्तन रूपी त्रिवेणी के साथ बहता है। संगीत का यही तत्व हमारी जातीय स्मृति है। दर्शक तन्मय होकर नाटक देखते हैं। हबीब तनवीर के नाट्कों की चमत्कारिक लोकप्रियता को देखकर इब्राहिम अल्का की का कथन याद आता है, ‘सारी कलाएँ अंतत: उस कला के लिए है जिसका नाम जीवन है।‘ कहना न होगा कि लोक संगीत और सुगम संगीत को नाटक की आंतरिक शक्ति के रूप में स्थापित करने वालों में वे अग्रणी है। इसके साथ ही यह भी बहुत बड़ा सच है कि गीतों और धुनों में पुरनावृति का बोध कई बार होता है। कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है मानो लोक चित की अपार सर्जनात्मकता नाटक पर हावी होने लगती हैं। इसके बाद भी छत्तीसगढी गीत चुलमाटी और तेलमाटी की धुनों की कोमल लोक बद्धता दर्शकों को उल्लास और आनन्द से भर देती है। ददरिया एक और रस की वर्षा करता है तो सुआ गीत की लय नारी जाति की वेदना की वाहक बनती है। विशिष्टता की अनुभूति का यह वातावरण दर्शकों के बीच स्वत: निर्मित होता जाता है। यह रस में डूबने का अनुभव है। गीत संगीत और संवाद के मेल से भीतर ही भीतर विचार का एक रूपक बनता है और पूरे नाटक में अदभुत कसावट आ जाती है।
निर्देशकीय कौशल:
‘जन रंजन सज्जन प्रिय एहा’ (श्रेष्ठ रचना वही है जो जनसमान्य का रंजन करे और सज्जनों को प्रिय हो।) संत तुलसी की इन पक्तियों को हबीब तनवीर के नाटकों में सच होते हुए देखा जा सकता है। लोक नाट्य परम्परा के तत्वों का सार्थक और संतुलित प्रयोग उनके निर्देशन मे साफ दिखाई देता है। 1973 के रायपूर मे आयोजित वर्कशाप के बाद भिलाई, रायपूर, भोपाल, दिल्ली, दुर्ग और खैरागढ के अने नाट्य शिविरों को मैने देखा है, कठिन से कठिन स्थिति में भी हबीब जी धीरज नहीं खोते, यह उनके निर्देशन की सबसे बडी विशेषता है। सबसे पहले अपने कलाकारों को नाटक की थीम समझाते हैं। नाट्यलेख पढा जाता है, उसपर बहस होती है। कहानी के आधार पर नाटक अनेक दृश्यों मे विभक्त किए जाते है और प्रत्येक दृश्य का महत्व और उसमे किस कलाकार की भूमिका कितनी अहम है? इस बात को बहुत बारीकी के साथ रेखांकित करते हुए रिहर्सल प्रारंभ करते है। हबीब तनवीर के संकेतो को उनके कलाकार बहुत अच्छे से समझते हैं और फिर इम्प्रोवाइजेशन का कमाल शुरू हो जाता है। निर्देशन की सहजता के कारण ही उनके कलाकार आत्मविश्वास से भरे पूरे रहते है। अभिनेता स्वत:स्फूर्त और स्वभाविक अभिनय करते हुए आगे बढते रहते है। परदे के पीछे की जिम्मेदारी निभाने वालों के काम में भी वे बहुत कम हस्तक्षेप करतें हैं।अभिनय के साथ साथ मंचीय गतिविधि, दृश्य बंध, वस्त्र सज्जा, रूप विन्यास और सूरीले संगीत के बल पर नाटक तैयार किए जातें हैं। ‘गाँव के नाँव ससुराल मोर नाँव दमाद’, ‘मिट्टी की गाड़ी’ , ‘आगरा बाजार’ और ‘चरनदास चोर’ में लोकतत्वों से भरपूर एक नई शैली अपने मोहक रंगों से दर्शकों को अभिभूत करती है। कसी हुई निर्देशकीय दृष्टि से बहुत कम चूक होती है। कुष्ठ उन्मूलन पर दुर्ग मे तैयार किया गया नाटक ‘सुनबहरी’ एक बहुत कमजोर नाटक था। ‘जहरीली हवा’ भी कोई बेहतर प्रभाव छोडने में सफल नहीं हो पाया है, जबकि अंगराग, वेशभूषा, ध्वनि, प्रकाश और संगीत का चरमोत्कर्ष भी उनकी अधिकांश प्रस्तुतियों को प्राणवान बनाता है। महाभारत की कल्पनाशीलता और सांकेतिकता का एक नया नाट्यरूप है, ‘वेणी संहार’, जिसमें पूनाराम निषाद की पंडवानी का अनोखा प्रयोग है। महाभारत के अनेक प्रसंग केवल खबर या गीत के माध्यम से सामने आते है--
--मानस तन बौराना—
युद्ध भूमि में उतर पड़े, दो झन, दोनों सरदारा जो जीता भी वो भी हारा, जो हारा सो हारा
जीत हार के अंतर का है भेद कठिन समझना—मानस तन बौराना। यह प्रयोग उन्होंने 80 वर्ष की उम्र में किया, लेकिन इस नाटक को ‘मिट्टी की गाडी’ जैसी व्यापक स्वीकृति नहीं मिली। अधिकांश दर्शकों को निराशा हुई। हबीब जी ने बताया था, ‘आगरा बाजार’ की प्रस्तुति जिस मैदान मे होती थी वहाँ बकरी चराने वाले निकलते थे। एक बार सभी चरवाहों को बकरी के साथ ‘आगरा बाजार’ नाटक मे उन्होने सम्मलित कर लिया था। लोक जीवन में ऐसे नाटकों के प्रभाव को व्यक्त करते हुए लिखा गया है, “परम्पराशील नाट्यों का दर्शक, दर्शक मात्र नहीं होता, वह तो उस उत्सवपूर्ण वातावतण का अंग बन जाता है, जो नट, गायक और वादक अपने कला कौशल से उत्पन्न कर लेते हैं। वह झूमता ही नहीं, बोल भी पडता है, विभोर ही नहीं होता, कभी कभी नट भी बन जाता है। ‘बहादुर कलारिन्’ का बेटा जब जवान होता है तब 126 शादियाँ करने के बाद समझता है कि वह अपनी माँ पर मोहित है। 126 शादियाँ स्टेज पर दिखाना कठिन था पर निर्देशक ने अपनी कल्पनाशक्ति के बल पर, दो-ढाई मिनट के एक गीत मे खूबसूरती के साथ दिखा दिया। “सच्ची संस्कृति को दुनियाँ के हर कोने से प्रेरणा मिलती है, लेकिन वह अपनी ही जगह मे उठती है और उसकी जड़े सारी जनता मे समाई रहती है।“ ‘हिरमा की अमर कहानी’ नाटक लगभग 20 वर्ष पहले मैंने देखा था। आदिवासी जीवन के गीत नृत्य के साथ साथ सांस्कृतिक जीवन की झांकी से ओत प्रोत ध्वनि और प्रकाश के अद्भुत प्रयोग तो उसमे थे ही, विधान सभा में- कुर्सियों को दोनों हाथों से उल्टा किए हुए- विरोध प्रकट करते हुए विधायकों का वह दृश्य आज की राजनीति पर सटीक टिप्पणी है।“ परम्परा हमारे भीतर जीवित है---किंतु परम्परा ऐसी वस्तु नहीं है जिसे लगा देने मात्र से नाटक अच्छा हो जायेगा। परम्परा एक अनुभव है। परम्परा का बोध जरूरी तो है लेकिन परम्परा में जब युगीन दृष्टि और संवेदना का नया रूप मिलता है तब इस नई दृष्टि में सार्थकता होती है। गहराई और व्यापक्ता होती है। हबीब के नाट्कों की लम्बी यात्रा देखकर उसका विश्लेषण करते हुए ये पंक्तियाँ बहुत सही प्रतीत होती हैं, “इस पर तुम जानना चाहो तो यह कहानी बीज जितनी पूरानी और फल जितने नयी है। समुन्द्र जितनी पूरानी और बादल जितने नई है। डूबते सूरज जितनी पूरानी और उगते सूरज जितने नई है।“ हबीब तनवीर दिल्ली और भोपाल जैसे महानगरों मे रहते हुए भी अपनी जड़ों से जुडे हुए है। पाश्चात्य रंग परम्परा के गंभीर अध्येता होने के बाद भी उनकी प्रस्तुतियों में लोक जीवन से सीधा साक्षात्कार होता है। नित नई और अनोखी अर्थछवियों का सृजन करते हुए अपनी अपील में वे पूर्णत: आधुनिक हैं।
मंचीय शिल्प:

        हबीब तनवीर को नाट्कों के मंचन के लिए किसी भी तरह के ताम झाम की आवश्यक्ता नहीं पड़्ती। सेट वगैरह की झंझट बहुत कम रखते हैं। अधिकांश नाट्क एकदम सादे मंच पर सहजतापूर्वक मंचित किए जा सकते हैं। खुले मंच पर रूपविधान की चमक देखते बनती है। मंच सज्जा समान्यत: कभी होती भी है तो केवल प्रतीकात्मक। प्रतीक इतने सहज होते है कि परिवेश का यथार्थ स्वयं ही बोल उठता है। अपने अनुभव संसार के बल पर वे प्रत्येक नाट्क और उसके प्रत्येक पात्र पर वे अथक परिश्रम करते रहे हैं। यही कारण है कि उनकी हर प्रस्तुति , हर बार नई और ताजी लगती रही है। अब कलाकार शायद पहले की तरह उतनी जमकर रिहर्सल नहीं करते हैं। अत: इक्कीस्वीं सदी में तैयार किये गए नये नाट्कों (वेणी संहार और जहरीली हवा) को छोड़ दिया जाए तो उनके अधिकांश नाटकों की यह विशेष्टता रही है कि हर बार एक नया नाटक, एक नई रंग भाषा के साथ नया रंग शिल्प आया है। लोक मंच और पारम्परिक मंच तो उनके नाट्कों में है लेकिन इसके साथ साथ पारसी रंगमंच और संस्कृत संगमंच की झलक भी उनके नाटकों मे दिखलाई पडती है। भरत के नाट्य शास्त्र से ब्रेख्त तक की समंवयमूलक गहरी अंतर्दृष्टि के बल पर उन्होंने भारतीय रंग जगत को लागातार समृद्ध किया है।“ इस सदी मे दो लोग मुझे दुनिया में ऐसे लगते हैं जिनकी रचनाधर्मिता से एक अद्भुत सत्य प्रगट होता है। एक हैं हबीब तनवीर और दूसरे हैं विश्व के ख्याति प्राप्त कवि पाब्लो नेरूदा। हबीब तनवीर ने यह साबित किया कि जो गहरे रूप से स्थानिक है वही सार्वमौमिक भी है। “
         पाँच दशकों की रंग यात्रा में उनके नाट्कों के कैनवास का कोई एक रंग नहीं है, वह इन्द्रधनुषी और बहुआयमी है। प्रवृतियों का विवेचन करते हुए विचार करें तो नाट्कों के इस यात्रा मे भारतीय रंगमंच का पूरा इतिहास दर्ज है। असगर वजाहत के नाटक ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई ही नई’ और राहुल वर्मा के नाटक ‘जहरीली हवा’ सहित अपवादस्वरूप कुछ नाटकों को छोडकर हबीब तनवीर ने अधिकांश नाटक स्वयं लिखे है या फिर उनका अनुवाद अथवा रूपांतरण किया है। लोक कथाओं पर आधारित तैयार किए गये नाटकों के साथ ही शेक्सपियर के नाटक से लेकर संस्कृत नाटकों तक जितने भी नाटक हबीब तनवीर ने खेले उनमें नृत्य, गीत और संगीत अपने ढंग से जोडकर उनको अधिक अर्थवान और सम्प्रेषणीय बनाया। उनके साथ चलनेवाले रंगयात्रियों में कुछ ठहर गए, कुछ थम गये लेकिन हबीब जी अभी भी नाटक कर रहे हैं। यह सुख, यह अनुभूति अपने आप में रोमांचक है। 1954 के ‘आगरा बाजार’ से 2006 के ‘विसर्जन’ तक की बहुअयामी रंगयात्रा का दर्शक होना भी एक अभूतपूर्व नाट्यानुभव है। नाटक की कथा के भीतर छुपी अंतर्कथा के मर्म तक धीमी गति से पहुंचने की उनकी कोशीश इतनी मार्मिक होती है कि शब्दों मे व्यक्त नहीं की जा सकती। नाटक मे गति और लयात्मकता के साथ एक अद्भुत कसावट आ जाती है। सभी दृष्यों का संयोजन स्वतंत्रता पूर्वक करते हुए वे दर्शकों को नाटक की मनोभूमि से जोड़ लेते है। मानवीय संवेदनाओं से भीगा हुआ दर्शक धीरे-धीरे नाटक की गहराई मे उतरता चला जाता है। तमाम अलंकरणों और विशेषणों से विभूषित विश्व विख्यात हबीब तनवीर के साथ एक मार्मिक सच्चाई यह भी जुडी है कि उन्होने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से नाट्क के कालजयी आख्यानों में जिस ‘लोक’ को बार बार प्रतिष्ठित किया है उस लोक की ‘ज़मीन’ से वे कभी भी दूर नहीं हुए।साहित्‍य शिल्‍पी से साभार

सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै एक

- प्रो. अश्विनी केशरवानी

         महानदी के तटवर्ती ग्राम्यांचलों में केवल राजा, जमींदार या किसान ही नहीं बल्कि समाज सुधारक, पथ प्रदर्शक, अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने में अग्रणी नेता और साहित्यकार भी थे। छत्तीसगढ़ अपने इन सपूतों का ऋणी है जिनके बलिदान से हमारा देश आजाद हुआ। उन्हीं में से एक थे पंडित सुन्दरलाल शर्मा। उनके कार्यो के कारण उन्हें ‘‘छत्तीसगढ़ केसरी‘‘ और ‘‘छत्तीसगढ़ का गांधी‘‘ कहा जाता है। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार भी थे। अपनी साहित्यिक प्रतिभा से जहां जन जन के प्रिय बने वहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और अछूतोद्धार में प्रमुख भूमिका निभाकर छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय भावना से जोड़ने का सद्प्रयास किया है। छत्तीसगढ़ के वनांचलों में पंडित सुंदरलाल शर्मा ने ही महात्मा गांधी को पहुंचाने का सद्कार्य किया था। उनके कार्यो को देखकर गांधी जी अत्यंत प्रसन्न हुए और एक आम सभा में कहने लगे:-‘‘मैंने सुना था कि छत्तीसगढ़ एक पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। लेकिन यहां आने पर पता चला कि यह गलत है। यहां तो मुझसे भी अधिक विचारवान और दूरदर्शी लोग रहते हैं। उदाहरण के लिए पंडित सुन्दरलाल शर्मा को ही लीजिए जो मरे साथ बैठे हुए हैं, उन्होंने मुझसे बहुत पहले ही हरिजन उद्धार का सद्कार्य शुरू कर दिया है इस नाते वे मेरे ‘‘गुरू‘‘ हैं। ब्राह्यण कुलोत्पन्न, समाज सेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार पंडित सुन्दरलाल शर्मा ‘‘छत्तीसगढ़ी काव्य के भारतेन्दु‘‘ थे। उनके बारे में पंडित शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ गौरव में लिखते हैं:-
  बुधवर रामदयालु, स्वभाषा गौरव केतन।
  ठाकुर छेदीलाल विपुल विद्यादि निकेतन।
  द्विजवर सुन्दरलाल मातृभाषा तम पूषण।
  बाबु प्यारेलाल देश छत्तीसगढ़ भूषण।
  लक्ष्मण, गोविंद, रघुनाथ युग महाराष्ट्र नर कुल तिलक।
  नृप चतुर चक्रधर लख जिन्हें हिन्दी उठती है किलक।।
छत्तीसगढ़ी दानलीला के अंत में वे अपने बारे में लिखते हैं:-
सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै एक,
भाई ! सुनौ तहां कविताई बैठि करथे।   
         ऐसे महापुरूष का जन्म छत्तीसगढ़ के तीर्थ राजिम के निकट चमसुर गांव में परासर गोत्रीय यजुर्वेदीय ब्राह्यण पंडित जयलाल तिवारी के घर पौष अमावस्या संवत् 1881 को हुआ था। उनका परिवार सुसंस्कृत, समृद्ध और प्रगतिशील था। वे कांकेर रियासत के कानूनी सलाहकार थे। माता देवमती सती साध्वी और स्नेह की प्रतिमूर्ति थी। कांकेर के राजा पंडित जयलाल तिवारी के कार्यो से प्रसन्न होकर उन्हें 18 गांव की मालगृजारी दिये थे। उनके तीन पुश्तैनी गांव चमसुर, घोंट और चचोद राजिम के निकट स्थित हैं। पंडित सुन्दरलाल शर्मा की शिक्षा दीक्षा गांव के ही स्कूल में ही हुई। मिडिल स्कूल तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे घर में ही उच्च शिक्षा ग्रहण किये। उन्होंने अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, मराठी, बंगला, उड़िया और संस्कृत भाषा का गहन अध्ययन किया। उनके घर लोकमान्य तिलक द्वारा संपादित ‘‘ मराठा केसरी ‘‘ पत्रिका आती थी। वे उनका नियमित पठन करते थे। 18 वर्ष की आयु में वे काव्य लेखन में परांगत हो गये। सन् 1898 में उनकी कविताएं ‘‘रसिक मित्र‘‘ में प्रकाशित होने लगी थी। महानदी का पवित्र वातावरण उनके व्यक्तित्व में निखार ले आया। एक जगह वे लिखते हैं:-‘‘राजिम में कहीं संगीत, कहीं सितार वादन होते ही रहता है...शंभू साव की साधु भक्ति, पंडित मुरलीप्रसाद की विद्वतापूर्ण वेदान्त प्रवचन, कामताभगत की निश्छल भरी भक्ति बड़ी प्रेरणास्प्रद होती थी..।‘‘ इस प्रकार किशोरवय और भूषण कवि पंडित विश्वनाथ दुबे का साथ उन्हें काव्य में उन्हें प्रवीण बना दिया। यहां दुबे जी ने एक कवि समाज की स्थापना की थी जिनके संस्थापक महामंत्री और सक्रिय सदस्य पंडित सुन्दरलाल शर्मा थे। यही संस्था आगे चलकर जन जागरण करके बहुत लोकप्रिय हुआ। पंडित जी ने साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया है। फलस्वरूप उनके खंडकाव्य, उपन्यास, नाटक आदि की रचना हुई। उनकी कृतियों में छत्तीसगढ़ी दानलीला, राजिम प्रेमपियुष, काव्यामृवाषिणी, करूणा पचीसी, एडवर्ड राज्याभिषेक, विक्टोरिया वियोग (सभी काव्य), कंस वध (खंडकाव्य), सीता परिणय, पार्वती परिणय, प्रहलाद चरित्र, ध्रुव आख्यान, विक्रम शशिकला (सभी नाटक), श्रीकृष्ण जन्म आख्यान, सच्चा सरदार (उपन्यास), श्रीराजिमस्त्रोत्रम महात्म्य, स्फुट पद्य संग्रह, स्वीकृति भजन संग्रह, रघुराज भजन संग्रह, प्रलाप पदावली, ब्राह्यण गीतावली और छत्तीसगढ़ी रामायण (अप्रकाशित) आदि प्रमुख है।
        श्री सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रवर्तक थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ी काव्य में रचना करके ग्रामीण बोली की भाषा के रूप में प्रचलित किया। घमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल ने छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखकर इसे पुष्ट किया। पंडित जी की छत्तीसगढ़ी दानलीला बहुत चर्चित हुई। रायबहादुर हीरालाल लिखते हैं:-‘‘जौने हर बनाईस हे, तौने हर नाम कमाईस हे।‘‘ माधवराव सप्रे उसकी प्रशंसा करते हुए लिखते हैं:-‘‘मुझे विश्वास है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला के द्वारा मेरे छत्तीसगढ़िया भाईयों का कुछ सुधार होगा ? मेरी आशा और भी दृढ़ हो जाती है जब मैं देखता हूँ कि छत्तीसगढ़िया भाईयों में आपकी इस पुस्तक का कैसा लोकोत्तर आदर है..।‘‘ श्री भुवनलाल मिश्र ने तो पंडित सुन्दरलाल शर्मा को ‘‘छत्तीसगढ़ी भाषा का जयदेव‘‘ निरूपित किया है। छत्तीसगढ़ी दानलीला में छत्तीसगढ़ के जन जीवन की झांकी देखने को मिलती है:-
  कोनो है झालर धरे, कोनो है घड़ियाल।
  उत्तधुर्रा ठोंकैं, रन झांझर के चाल।।
  पहिरे पटुका ला हैं कोनो। कोनो जांघिया चोलना दोनो।।
  कोनो नौगोटा झमकाये। पूछेली ला है ओरमाये।।
  कोनो टूरा पहिरे साजू। सुन्दर आईबंद है बाजू।।
  जतर खतर फुंदना ओरमाये। लकठा लकठा म लटकाये।।
  ठांव ठांव म गूंथै कौड़ी। धरे हाथ म ठेंगा लौड़ी।।
  पीछू मा खुमरी ला बांधे। पर देखाय ढाल अस खांदे।।
  ओढ़े कमरा पंडरा करिहा। झारा टूरा एक जवहरिया।।
  हो हो करके छेक लेइन तब। ग्वालिन संख डराइ गइन सब।।
  हत्तुम्हार जौहर हो जातिस। देवी दाई तुम्हला खातिस।।
  ठौका चमके हम सब्बो झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन।।
  झझकत देखिन सबो सखा झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन।।
  चिटिक डेरावौ झन भौजी मन। कोनो चोर पेंडरा नोहन।।
  हरि के साझ जगात मड़ावौ। सिट सिट कर घर तनी जावौ।।
        शर्मा जी ने ‘‘दुलरवा‘‘ नामक एक छत्तीसगढ़ी पत्रिका का संपादन किया था। उनकी ‘‘छत्तीसगढ़ी रामायण‘‘ अप्रकाशित रही। उनके साहित्यिक मित्रों में पं. माखनलाल चतुर्वेदी, जगन्नाथ प्रसाद भानु, माधवराव सप्रे, लक्ष्मीधर बाजपेयी, नवनीत पत्रिका के संपादक ग. न. गद्रे स्वामी, सत्यदेव परिब्राधक आदि प्रमुख थे। उनके नाटक राजिम के अलावा छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों में मंचित किये गये थे। सन् 1911 और 1916 के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में वे सम्मिलित हुए। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार के साथ साथ चित्रकार, मूर्तिकार और रंगमंच के कलाकार थे।
         उनके जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आजादी के महासमर में सक्रिय भागीदारी थी। श्री भुवनलाल मिश्र ने इसका अच्छा चित्रण अपने लेख में किया है-‘‘कौन जानता था, कौन सोच सकता था कि छत्तीसगढ़ी दानलीला का रसिक और सुकुमार कवि हृदय में क्रांति की चिंगारी भी सुलग रही थी। कौन सोच सकता था कि ‘‘विक्टोरिया वियोग‘‘ का कवि उसके उत्तराधिकारियों के खिलाफ दिल में बगावत की आग समेटकर बैठा हुआ है। जब छत्तीसगढ़ का सम्पन्न वर्ग अंग्रेजी हुकुमत की वंदना करने में लीन था, जब देशी रियासतें अंग्रेजी हुकुमत की कृपाकांक्षी थी, जब आम आदमी अंग्रेजों के खिलाफ बात करने का साहस नहीं कर पाता था तब पंडित सुंदरलाल शर्मा ने पूरे छत्तीसगढ़ का दौरा करके जन जीवन में राजनीतिक चेतना जागृत की और अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ आजादी का शंखनाद किया..।‘‘
        सन् 1905 में जब बंग भंग के कारण देश व्यापी आंदोलन हुआ तब पंडित जी राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा की। उन्होंने छत्तीसगढ़ में जनसभाओं और भाषणों के द्वारा राजनीतिक जागरण किया। वे कांग्रेस के सूरत, कलकत्ता, बम्बई, जयपुर और काकीनाड़ा अधिवेशन में भाग लिये थे। इस महासमर में उनके प्रारंभिक सहयोगियों में श्री नारायणराव मेघावाले, श्री नत्थूलाल जगताप, श्री भवानीप्रसाद मिश्र, माधवराव सप्रे, श्री अब्दुल रऊफ, श्री हामिद अली, श्री वामनराव लाखे, यति यतनलाल जी, श्री खूबचंद बघेल, श्री अंजोरदास, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे कर्मठ लोगों का साथ मिला। उन्होंने सन् 1906 में ‘‘सन्मित्र मंडल‘‘ की स्थापना की थी। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार में सक्रिय भूमिका अदा की और जगह जगह स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें खोलीं। उन्होंने यहां अनेक सत्याग्रह किये और जेल यात्रा के दौरान अनेक यातनाएं झेली। उनके सत्याग्रहों में कंडेल सत्याग्रह अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। यह सत्याग्रह पूरे देश में असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी। इस बीच वे महात्मा गांधी को छŸाीसगढ़ आमंत्रित किये थे। उन्होंने यहां की आमसभा में उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की और हरिजनोद्धार के लिए उन्हें अपना ‘‘गुरू‘‘ स्वीकार किया था।
        पंडित जी वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे छत्तीसगढ़ के एक सच्चे सपूत थे। समाज सुधार, स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सन् 1935 में अपने सहयोगियों के प्रयास से धमतरी में एक ‘‘अनाथालय‘‘ और रायपुर में ‘‘सतनामी आश्रम‘‘ की स्थापना की थी। राजिम में वे ‘‘बह्यचर्य आश्रम‘‘ पहले ही स्थापित कर चुके थे। ऐसे युगदृष्टा ने अपने अंतिम क्षणों में राजिम में महानदी के पावन तट पर एक पर्ण कुटीर में निवास करते हुए 28 दिसंबर सन् 1940 को स्वर्गारोहण किया और समूचे छत्तीसगढ़ वासियों को विलखता छोड़ गये। डॉ. खूबचंद बघेल अपने एक लेख में लिखा है-‘‘छत्तीसगढ़ के तीन लाल-घासी, सुंदर और प्यारेलाल‘‘ वे तीनों को सत्यं, शिवं और सुन्दरं की प्रतिमूर्ति मानते थे। ऐसे युगदृष्टा के स्वर्गारोहण से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को अपूरणीय क्षति हुई जिसकी भरपायी संभव नहीं है। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।    
राघव, डागा कालोनी,
चांपा-495671 (छ.ग.)

मुठि़ठयां

दीप्ति शर्मा

बंद मुठ़ठी के बीचों - बीच
एकत्र किये स्मृतियों के चिन्ह
कितने सुन्दर जान पड़ रहे हैं
रात के चादर की स्याह
रंग में डूबा हर एक अक्षर
उन स्मृतियों का
निकल रहा है मुठ़ठी की ढीली पकड़ से
मैं मुठ़ठीयों को बंद करती
खुले बालों के साथ
उन स्मृतियों को समेट रही हूँ
वहीं दूर से आती फीकी चाँदनी
धीरे - धीरे तेज होकर
स्मृतियों को देदीप्यमान कर
आज्ञा दे रही हैं
खुले वातावरण में विचरों
मुठ़ठीयों  की कैद से बाहर
और ऐलान कर दो
तुम दीप्ति हो, प्रकाशमय हो
बस यूँ ही धीरे - धीरे
मेरी मुठ़ठीयां खुल गयीं
और आजाद हो गयीं स्मृतियाँ
सदा के लिये ...।

मंगलवार, 22 मई 2018

फलना जगह के डी.एम

 कुंदन कुमार
         “फलना जगह के डी.एम पैदल ऑफिस जाएगे। देश के गिरते रूपये को बचाने के लिए और ईंधन की खपत को कम करने के लिए महाशय ने ये कदम उठाया है। श्रीमान के भीतर ज्ञान की बत्ती तब जली जब उन्होंने एक अखबार के विशेषांक को पढ़ा।“ नेता जी ने इस ख़बर को ऊँचे सुर में पढ़ कर अपने राजनीतिक गुरु मिश्रा जी को सुनाया। उनका मकसद खबर को सुनाना नहीं था, उनका मकसद था खबर में किए गए शब्दों के हेर-फेर को और खुद के दव्आरा डी.एम के ऊपर किए गये कटाक्ष को सुनाना। पेपर को बगल की मेज पर रखते हुए नेता जी ने मिश्रा जी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखा, ठीक उसी तरह जैसे किसी छोटे बच्चे ने अपने शिक्षक को ए. बी. सी. डी सुनाने के क्रम में सी फॉर कैट के स्थान पर सी फॉर कॉउ सुना दिया हो और जेड पर रूकने के बाद शिक्षक को उम्मीद से देखने लगा हो। ऐसी रेव्युलेशनरी क्रिएटिविटी के बाद बच्चे को शाबासी की तलब रहती है। नेता जी को भी इसकी तलब थी। नेता जी ठहरे आठवीं फेल और मिश्रा जी थे बी.ए पास, नेता जी के लिए उनकी शाबासी के मिलने का मतलब बी.ए की डिग्री मिलना। लेकिन जब मिश्रा जी ने नेता जी के इस क्रिएटिविटी पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की तो नेता जी का चेहरा थोड़ा लटक गया लेकिन वे ठहरे नेता, सिर्फ पेशे से ही नहीं जात से भी, हार कैसे मान लेते ? लिहाजा दुबारा कोशिश की-“देखते हैं मिश्रा जी ई अफसर को..... इनको लगता है ई अकेले डॉलर के सामने रुपया के शेर बना देंगें और इनके अकेले के पैदल ऑफिस जाने के भारत ईंधन के मामले में आत्मनिर्भर देश बन जाएगा। अरे... अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। ई सब कुछ नहीं सिर्फ शोबाजी है...पब्लिसिटी स्टंट है”।
       इस बार नेता जी ने उस खबर का विश्लेषण कर दिया था और हिन्दी के मुहावरे को भी सही जगह फिट कर दिया था। आम तौर पर नेता जी हिन्दी के मुहावरो के साथ इस तरह का उचित व्यवहार नहीं कर पाते थे। मन ही मन नेता जी ने कहा कि इस बार तो मैं पक्के तौर शाबासी का हकदार हूँ।
       नेता जी के भीतर शाबासी की भूख की एक वजह और भी थी। चार दिन पहले नेता जी जब अपने चमचों के साथ राजनीति से जुड़े किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। मिश्रा जी ने यह कहकर भरी सभा में चुप करा दिया था कि पैसे देकर पार्टी टिकट पर चुनाव जीत जाने से कोई राजनीतिज्ञ नहीं हो जाता।
       बहरहाल, नेता जी को शाबासी तो नहीं मिली उल्टे उनकी कोशिशों से मिश्रा जी चिढ़ जरूर गए। नेता जी पर थोड़ा झल्लाते हुए कहा “आपको इतना समझ में आता है कि ये सब पब्लिसिटी स्टंट है लेकिन ये नहीं बुझाता कि इस चुनाव में आपको भी इसका जरूरत पड़ेगा। ”
       “हमको क्यों जरूरत पड़ेगा ? भाई, हम पार्टी के कद्दावार नेता हैं। हमारी पहचान किसी पब्लिसिटी की मोहताज नहीं है। ”
        “इस बार लहर पार्टी के विरूध्द है। हाई कमान अबकी आप पर रिस्क नहीं लेगी। दिल्ली में आपका पत्ता साफ करने के बारे मे सोचा जा रहा हैं, ई पैदल काम पर जाने वाला पैंतरा आप भी आजमाइये। इससे आप एक तीर से दू जगह निशाना साध सकते है”।
“ऊ कइसे ?”
“डीजल-पेट्रोल का दाम और महँगाई इस पार्टी के राज-काज में बेलगाम हो कर बढ़ा है। अगर आप गाड़ी छोड़ कर पैदल दौरा और उदघाट्न स्थल पर जाना शुरू कर दें तो मिडिया आपको हाथो-हाथ लेगी और खबर ये बनेगा की जनता के दर्द को समझते हुए आपने पार्टी की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।”
“खुद बोलते हैं टिकट मिलने की उम्मीद नहीं है और खुद सिखा रहे हैं पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए...... मतलब हम अपना कब्र खुद खोदे ?”
“ईसिलिए कहते हैं कि जब राजनीति नहीं बुझाए तो बिलावजह दिमाग नहीं घिसा करते। अरे हाईकमान टिकट दे या ना दे इतनी पब्लिसिटी के बाद विपक्ष की ओर से आपके टिकट का गॉरन्टी हम लेते हैं। बस ई वाला स्टंटबाजी के अलावा तीन-चार करतब और करना होगा।”
मिश्रा जी की बात सुनकर नेता जी के होठों पर एक कुटील मस्कान आ गई। वे इनके इसी राजनीतिक दूरदर्शिता के कायल थे। इसके लिए मिश्रा जी शाबासी के हकदार थे।

हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?

() रवीन्द्र प्रभात
         '' हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था , शौक़ से डूबें जिसे भी डूबना है '' दुष्यंत ने आपातकाल के दौरान ये पंक्तियाँ कही थी , तब शायद उन्हें भी यह एहसास नहीं रहा होगा कि आनेवाले समय में बिना किसी दबाब के लोग स्वर्ग या फिर नरक लोक की यात्रा करेंगे ।
        वैसे जब काफी संख्या में लोग मरेंगे , तो नरक हाऊसफुल होना लाजमी है, ऐसे में यमराज की ये मजबूरी होगी कि सभी के लिए नरक में जगह की व्यवस्था होने तक स्वर्ग में ही रखा जाये । तो चलिए स्वर्ग में चलने की तैयारी करते हैं । संभव है कि पक्ष और प्रतिपक्ष हमारी मूर्खता पर हँसेंगे, मुस्कुरायेंगे, ठहाका लगायेंगे और हम बिना यमराज की प्रतीक्षा किये खुद अपनी मृत्यु का टिकट कराएँगे ।
        जी हाँ , हमने मरने की पूरी तैयारी कर ली है, शायद आप भी कर रहे होंगे, आपके रिश्तेदार भी, यानी कि पूरा समाज ! अन्य किसी मुद्दे पर हम एक हों या ना हों मगर वसुधैव कुटुम्बकम की बात पर एक हो सकते हैं, माध्यम होगा न चाहते हुये भी मरने के लिए एक साथ तैयार होना ।
       तो तैयार हो जाएँ मरने के लिए , मगर एक बार में नहीं , किश्तों में । आप तैयार हैं तो ठीक, नहीं तैयार हैं तो ठीक, मरना तो है हीं, क्योंकि पक्ष- प्रतिपक्ष तो अमूर्त है, वह आपको क्या मारेगी, आपको मारने की व्यवस्था में आपके अपने हीं जुटे हुये हैं।
        यह मौत दीर्घकालिक है, अल्पकालिक नहीं । चावल में कंकर की मिलावट , लाल मिर्च में ईंट - गारे का चूरन, दूध में यूरिया, खोया में सिंथेटिक सामग्रियाँ , सब्जियों में विषैले रसायन की मिलावट । और तो और देशी घी में चर्वी, मानव खोपडी, हड्डियों की मिलावट क्या आपकी किश्तों में खुदकुशी के लिए काफी नहीं ?
भाई साहब, क्या मुल्ला क्या पंडित इस मिलावट ने सबको मांसाहारी बना दिया । अब अपने देश में कोई शाकाहारी नहीं, यानी कि मिलावट खोरो ने समाजवाद ला दिया हमारे देश में, जो काम सरकार चौंसठ वर्षों में नहीं कर पाई वह व्यापारियों ने चुटकी बजाकर कर दिया, जय बोलो बईमान की ।
भाई साहब, अगर आप जीवट वाले निकले और मिलावट ने आपका कुछ भी नही बिगारा तो नकली दवाएं आपको मार डालेगी । यानी कि मरना है, मगर तय आपको करना है कि आप कैसे मरना चाहते हैं एकवार में या किश्तों में?
भूखो मरना चाहते हैं या या फिर विषाक्त और मिलावटी खाद्य खाकर?
बीमारी से मरना चाहते हैं या नकली दवाओं से ?
          आतंकवादियों के हाथों मरना चाहते हैं या अपनी हीं देशभक्त जनसेवक पुलिस कि लाठियों, गोलियों से ?
इस मुगालते में मत रहिए कि पुलिस आपकी दोस्त है। नकली इनकाऊंटर कर दिए जायेंगे, टी आर पी बढाने के लिए मीडियाकर्मी कुछ ऐसे शव्द जाल बूनेंगे कि मरने के बाद भी आपकी आत्मा को शांति न मिले ।
         अब आप कहेंगे कि यार एक नेता ने रबडी में चारा मिलाया, खाया कुछ हुआ, नही ना ? एक नेतईन ने साडी में बांधकर इलेक्ट्रोनिक सामानों को गले के नीचे उतारा, कुछ हुआ नही ना ? एक ने पूरे प्रदेश की राशन को डकार गया कुछ हुआ नही ना ? एक ने कई लाख वर्ग किलो मीटर धरती मईया को चट कर गया कुछ हुआ नही ना ? और तो और अलकतरा यानी तारकोल पीने वाले एक नेता जी आज भी वैसे ही मुस्करा रहे हैं जैसे सुहागरात में मुस्कुराये थे। भैया जब उन्हें कुछ नही हुआ तो छोटे - मोटे गोरखधंधे से हमारा क्या होगा? कुछ नही होगा यार टेंसन - वेंसन नही लेने का । चलने दो जैसे चल रही है दुनिया ।
        भाई कैसे चलने दें, अब तो यह भी नही कह सकते की अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता। क्योंकि मिलावट खोरो ने कुछ भी ऐसा संकेत नही छोड़ रखा है जिससे पहचान की जा सके की कौन असली है और कौन नकली ? जिन लोगों से ये आशा की जाती थी की वे अच्छे होंगे, उनके भी कारनामे आजकल कभी ऑपरेशन तहलका में, ऑपरेशन दुर्योधन में, ऑपरेशन चक्रव्यूह में , आदि- आदि में उजागर होते रहते हैं । अब तो देशभक्त और गद्दार में कोई अंतर ही नही रहा। हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजाम - गुलिश्ता क्या होगा ?

छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद

संजीव तिवारी
        छत्तीसगढ़ी मुहावरे, कहावतें एवं लोकोक्तियों पर कुछ महत्वपूर्ण किताबें प्रकाशित हैं। इन किताबों में मुहावरे,कहावतें और लोकोक्तियां संग्रहित हैं। मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियां समानार्थी से प्रतीत होते हैं, बहुधा इसे एक मान लिया जाता है। विद्वान इनके बीच अंतर को स्‍वीकार करते हैं, इसमें जो महीन अंतर है, उसे इस पर चर्चा करने के पूर्व ही समझना आवश्यक है। इस उद्देश्‍य से हम यहां पूर्व प्रकाशित किताबों में इस संबंध में उल्लिखित बातों को अपनी भाषा में विश्‍लेषित करने का प्रयत्‍न करते हैं ताकि इसके बीच के साम्‍य एवं विभेद को समझा जा सके।  
        छत्तीसगढ़ी मुहावरों पर अट्ठारहवीं सदी के अंतिम दशक में लिखी गई हीरालाल काव्‍योपाध्‍याय की ‘छत्‍तीसगढ़ी बोली का व्‍याकरण’ में जो लोकोक्तियां संग्रहित हैं उन्‍हें कहावतें कहा गया है। सन् 1969 में प्रकाशित डॉ.दयाशंकर शुक्‍ल शोध ग्रंथ ‘छत्‍तीसगढ़ी लोक साहित्‍य का अध्‍ययन’ में शुक्‍ल जी नें कहावतों को लोकोक्ति का एक अंग कहा है एवं लगभग 357 कहावतों का संग्रह प्रकाशित किया है। सन् 1976 में डॉ. चंद्रबली मिश्रा के द्वारा प्रस्‍तुत शोध ग्रंथ ‘छत्‍तीसगढ़ी मुहावरों और कहावतों का सांस्‍कृतिक अनुशीलन’ में कुछ शंका का धुंध छटा है। हालांकि यहां भी स्‍पष्‍ट रूप से इन्‍हें विभाजित नहीं किया गया है किन्‍तु फिर भी पूरे शोध ग्रंथ के अध्‍ययन से बात कुछ समझ में आती है। डॉ.अनसूया अग्रवाल के शोध ग्रंथ सन् 1990, ‘छत्‍तीसगढ़ी लोकोक्तियों का समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन’ में इसके बीच के अंतर को स्‍पष्‍ट तरीके से अलग नहीं किया गया है बल्कि दोनों को लोकोक्ति के रूप में ही प्रस्‍तुत किया गया है। सन् 2008 में प्रकाशित चंद्रकुमार चंद्राकर की किताब ‘छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा कोश’ में इन्‍हें संयुक्‍त रूप से मुहावरा ही कहा गया है।
         सबसे महत्वपूर्ण शोध ग्रंथ 'छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन' सन् 1979 में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रंथ में 940 लोकोक्तियों का संग्रह और शोध, स्मृतिशेष डॉ. मन्नूलाल यदु ने प्रस्तुत किया है। यदु जी ने लोकोक्ति को समझाते हुए लिखा है कि लोक की उक्तियां इस प्रकार होती हैं कि एक गवंई पंच,  बैरिस्टर को तर्क से हतप्रभ कर दे। वे आगे लिखते हैं कि लोकोक्तियां प्राय: संक्षिप्त, सारगर्भित और सप्रमाण होती हैं। लोकोक्ति का शब्द विच्छेद लोक की उक्ति है। इसे अर्थ की पूर्णता के लिए अतिरिक्त शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती अर्थात लोकोक्तियां स्वयं में पूर्ण होती हैं। वे इसे बेहतर तरीके से समझाते हुए एक जगह लिखते हैं कि 'लोकोक्ति का एक-एक शब्द नपा-तुला होता है। वह बहुमूल्य रत्नों द्वारा पिरोया ऐसा अद्भुत हार है जिसका एक रत्न टूटा या बदला, कि हार की चमक धूमिल पड़ी।' उन्होंने ग्रंथ के परिभाषा खंड में इस पर विस्तृत विश्लेषण करते हुए लोकोक्ति को कहावत कहा है और उसे मौखिक लोक साहित्य माना है। उन्होंने विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर इसके छः तत्व निरूपित किए हैं। 1. बंधा हुआ लोक प्रचलित कथन 2. अनुभव की बात संक्षेप में 3. अलंकृत भाषा 4.सूत्रात्मक शैली 5. जीवन की आलोचना 6. लोक की उक्ति।
         डॉ. मन्नूलाल यदु जी नें ही अपने शोध ग्रंथ में आगे लोकोक्ति और मुहावरे के बीच अंतर को भाई-बहन का अंतर बताते हुए उदाहरण सहित स्पष्ट किया है। पाठकों को इसे समझना आवश्यक है इसलिए हम इसे संक्षिप्त रूप में समझाने का प्रयास करते हैं-
1. व्याकरण कलेवर में वाक्य गठन की दृष्टि से लोकोक्ति पूर्ण वाक्य हैं वही मुहावरे खंड वाक्य। उदाहरण देखिए लोकोक्ति देखिए 'थैली के चोट ल बनिया जाने' (धन की थैली का चोट  धनिक ही जानेगा), 'लोभी चमरा ल बाघ धरय'(चमड़े की लालच में बाघ द्वारा मारे गए ढोर का चमड़ा उतारने वाले को बाघ खाता है), 'सावन म आँखी फुटिस, हरियर के हरियर'। मुहावरा 'करलई मातब' (बड़ा दुःख) -सियान के मरे ले घर म करलई मात गए। 'छाती के पीपर' (घर का जबर शत्रु जो छाती को विदीर्ण कर दे) - का बतावव रे छाती के पीपर जाम गए।
2. अर्थ की दृष्टि से लोकोक्तियां पूर्ण हैं वही मुहावरे किसी शब्द के साथ पूर्ण होते हैं। (अर्थ की दृष्टि से लोकोक्तियां स्वालंबी होती हैं जबकि मुहावरे परमुखापेक्षी होती हैं।) उदाहरण लोकोक्ति 'हाथ के अलाली म मुंह म मेंछा जाय' (मूछ को दिशा नहीं दोगे तो बाल मुँह के अंदर जाएंगे ही,अति आलस्य), 'पांडे के पोथी-पतरा, पंड़इन के मुअखरा' (पंडिताइन का ज्ञान पंडित से ज्यादा), 'कउँवा के रटे ले ढोर नइ मरय' (लालची के रटते रहने से अपेक्षित वस्तु नहीं मिलता), 'औंघात रहिस जठना पागे' (जिन खोजा तिन पाइयां)। कहावत 'धुंगिया देखब' (मौत देखना) - रोगहा तोर धुंगिया देखे ले मोर जीव जुड़ाही।
3. शब्द संख्या की दृष्टि से लोकोक्तियां ज्यादा शब्दों की होती हैं जबकि मुहावरों में शब्द कम होते हैं।
4. शब्द परिवर्तन की दृष्टि से लोकोक्तियों में शब्द परिवर्तित नहीं होते बल्कि वह जैसा है वैसा ही प्रयोग होता है। जबकि मुहावरे अन्य शब्दों के साथ प्रयुक्त होते हैं। उदाहरण लोकोक्ति 'चलनी म गाय दुहय, करम ल दोस देवय' (भाग्यवादी लोगों के विरुद्ध), 'हपटे बन के पथरा, फोरे घर के सील', 'दुब्बर ल दु असाढ़'। 'कान काटना', 'बीड़ा उठाना', 'बाना उचाना'।
5. लोकोक्ति का प्रयोग सामान्यतया खंडन-मंडन या उपदेश के लिए होता है। जबकि मुहावरे का प्रयोग अर्थ में चमत्कार और वैशिष्ट लाने के लिए होता है। मुहावरे के प्रयोग से सामान्य कथन में प्रभाव आता है और वह सशक्त एवं प्रभावशाली हो जाता है। यथा 'तेजी से भागा',  'सिर पर पैर रख कर भागा'। उदाहरण लोकोक्ति'डोंगा के अगाड़ी अउ गाड़ी के पिछाड़ी', 'कुकूर भूँके हजार, हाथी चले बाजार', 'दूसर ल सिखोना दय, अपन बइठ रवनिया लय', 'कुकूर के पूछी जब रही त टेडगा के टेडगा', 'कन्हार जोते, कुल बिहाये'
6. लोकोक्ति एक प्रकार का अलंकार है। जबकि मुहावरा लक्षणा और व्यंजना युक्त शब्द समुच्चय है। मुहावरा सभी अलंकारों में हो सकता है।
7. लोकोक्तियाँ पद्यात्मक, लयात्मक, छंद युक्त युक्त होते हैं। जबकि मुहावरे गद्यात्मक होते हैं।
अब हमारे विमर्श का विषय 'हाना' किसे कहते हैं, यह प्रश्न सामने आता है। इसके लिए हम एक दूसरे महत्वपूर्ण ग्रंथ 'छत्तीसगढ़ी व्याकरण' पर अपना ध्यान केंद्रित करते है, जिसे मंगत रविंद्र जी ने लिखा है। इसमें 482कहावतों का संकलन है। मंगत रविंद्र जी ने हाना और भांजरा दोनों के बीच अंतर को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उन्होंने मुहावरे के लिए 'हाना' शब्द का इस्तेमाल किया है। जबकि कहावतों के लिए 'भांजरा'और 'जोगवा' शब्द का इस्तेमाल किया है। उन्होंने'भांजरा' को बांटना और 'जोगवा' को योग करना या मिलाना बताया है। यानी जो छत्तीसगढ़ की कहावतें हैं वे'भांजरा'  और 'जोगवा' हैं। आगे वे 'हाना' और 'भांजरा'दोनों को लोकोक्ति कहते हैं क्योंकि दोनों लोक की उक्ति है। उन्होंने अपने अनुसार छत्तीसगढ़ी में इसे विश्लेषित करते हुए लिखा हैं कि, हाना-भांजरा अर्थात लोकोक्ति,लोकवाणी से लोक जीवन में रचा बसा है। लोक और लोकोक्तियां संपृत हैं। इन्होंने भांजरा यानी कहावतों को गीता जैसा और हाना यानी मुहावरों को अंधेरी रात में पूर्णिमा का चांद निरूपित करते हुए लिखा है कि, 'भांजरा' में छंद की झलक भी होती है,  'हाना' में भविष्य के लिए आगाह की झलक।
        हमारा यह विमर्श 'हाना' यानी मुहावरे पर केंद्रित है। ऐसे लोक प्रचलित शब्द युग्म पर जो अपने अंदर विलक्षण अर्थ छुपाए हो, जो लक्षणा और व्यंजना शक्ति से सुनने वाले पर प्रभाव जमाये। उपर दिए गए अंतर के अनुसार ‘भांजरा’ यानी कहावतों पर चर्चा कर ली जाए तो इन दोनों के बीच के अंतर को भली भांति समझा जा सकेगा। डॉ. चंद्रबली मिश्रा नें अपने शोध ग्रंथ में कुछ छत्‍तीसगढ़ी मुहावरों और कहावतों का उल्‍लेख किया है जो समानार्थी हैं। वे इस प्रकार हैं –छत्‍तीसगढ़ी में एक मुहावरा है ‘मन मसकई’ अर्थात मन ही मन अकारण क्रोध करना। इससे मिलता जुलता एक कहावत है ‘हपटे बन के पथरा, फोरे घर के सील’ अर्थात अन्‍य कारण से अन्‍य पर क्रोध उतारना। ज्‍यादा बोलने या अपना ही झाड़ते रहने पर छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा है ‘पवारा ढि़लई’, इसी पर विस्‍तारवादी कहावत है ‘बईठन दे त पीसन दे’ जो हिन्‍दी के अंगुली पकड़ कर गर्दन पकड़ना का समानार्थी है। लालच को प्रदर्शित करने के लिए मुहावरा है ‘लार टपकई’ और ‘जीभ लपलपई’, इसी से मिलता जुलता एक कहावत है ‘बांध लीस झोरी, त का बाम्‍हन का कोरी’ हालांकि यह यात्रा में बाहर निकलने पर भोजन करने के संबंध में है किन्‍तु यह लालच के लिए भी प्रयुक्‍त होता है। निर्लज्‍जता को प्रदर्शित करने के लिए मुहावरा है ‘मुड़ उघरई’, इससे संबंधित कहावत है ‘रंडी के कुला म रूख जागे, कहै भला छंइहा होही’ वेश्‍या कब किसका भला करती है, किसे छांव देती है। आदत से संबंधित मुहावरा है ‘आदत ले लाचार होवई’, इसी से संबंधित कहावत है ‘जात सुभाव छूटे नहीं, टांग उठा के मूते’ और ‘रानी के बानी अउ चेरिया के सुभाव नई छूटे’एवं ‘बेंदरा जब गिरही डारा चघ के’।
         अव्‍यक्‍त मजबूरी के लिए मुहावरा है ‘मन के बात मने म रहई’, इसी से संबंधित कहावत है ‘चोर के डउकी रो न सकय’। बेइमानी पर मुहावरा है ‘नमक हरामी करई’ और‘दोगलई करई’, इस पर कहावत है ‘जेन पतरी म खाए उही म छेदा करय’। संदिग्‍ध आचरण से संबंधित मुहावरा है ‘पेट म दांत होवई’, इससे संबंधित कहावत है ‘उप्‍पर म राम राम भितरी म कसई’। यह मुह में राम बगल में छूरी का समानार्थी है। जो मिल ना पाये उसकी आलोचना करने संबंधी हिन्‍दी के समान ही छत्‍तीसगढ़ी में भी मुहावरा है ‘अंगूर खट्टा होवई’, इससे संबंधित कहावत है‘जरय वो सोन जेमा कान टूटय’ अर्थात मुझे वह सोन की बाली नहीं चाहिए उससे कान टूठ जाता है।
        अत्‍याचार करने के संबंध में मुहावरा है ‘आगी मुतई’,इससे संबंधित कहावतों में ‘डहर म हागे अउ आंखी गुरेड़े’, ‘आगी खाही ते अंगहरा हागही’, ‘पानी म हगही त ऊलबे करही’। अनुवांशिकता से संबंधित मुहावरा है ‘बांस के जरी, बांसेच होही’ और ‘तिली ले तेल निकलई’, इससे संबंधित कहावतें हैं ‘गाय गुन बछरू, पिता गुन घोड़ा,बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा’, ‘जेन बांस के बांस बंसुरी उही बांस के चरिहा टुकनी’, ‘जइसे दाई वइसे चिरा, जइसे ककरी वइसे खीरा’।
       आशा है उपरोक्‍त विवेचन से हाना एवं भांजरा के बीच का भेद स्‍पष्‍ट हुआ होगा।
दुर्ग ( छ.ग.)

राहत कार्य


सुनील कुमार वर्मा
       रोटी के निवाले के लिए राहत कार्य हुआण्न सही तरीके से कार्य किया गया और न ही सही राहत मजदूरी मिली जाँच अधिकारी ने इसे गंभीरता से लिया और बोला - राहत कार्य कल से बंद करवाना है। बदले मे रोटियों के चंद टुकड़े बंटवाना है। मजदूरों को बात लग गई। बोले - बिना मेहनत के रोटी नहीं खाएंगे,और इस तरह से मेहनत का उदय हुआ।

लील न जाए निशाचरी अवसान

- डॉ0 दीपक आचार्य

दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya          नई सुबह अब आने ही वाली है। जिस सुबह का इंतजार सभी को रहता है उस सुबह के आगमन का वक्त करीब आता जा रहा है।
       हमारे वर्ष का नया सवेरा भले ही प्रकृति के साथ प्रभाती गाता हुआ शुरू होता हो लेकिन दुनिया के बहुत से लोगों के लिए पाश्चात्यी सवेरा आने का समय हो चुका है।
यों भी अपने यहां संकल्पों के लिए हर साल कई बार कोई न कोई नव वर्ष आता ही रहता है। लेकिन इन सभी में पश्चिम के साथ, जमाने के साथ चलने वाले लोगों के लिए इस नव वर्ष का महत्व है जिसका अक्सर हर इंसान इंतजार करता है जो कि समझदार हो चुका है।
        बहुत सारे लोग संकल्प लेते और निभाते भी हैं, खूब सारे दो-चार दिन तक ही ठीक-ठाक रह पाते हैं फिर वही ढाक के पात। हमारी पूरी जिन्दगी में कितने सारे वर्ष आए और चले गए, हम वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं, उम्र गुजार कर।
        समय बार-बार चक्र पूरा करता जा रहा है, और हम अपनी आयु के बहुमूल्य क्षणों का क्षरण करते हुए वहीं के वहीं अटके हुए हैं। हर साल हम यही करते हैंं। दिसम्बर के अंतिम दिनों मेें अपने आधे-अधूरे कामों को पूरा करने की सोचते हैं, आने वाले दिनों के लिए संभावनाओं को तलाश कर विचारों के ताने-बाने बुनते हैं और फिर फुस्स हो जाते हैं।
        पुराने ढर्रे पर चल निकलते हैं।  इस लिहाज से इन दिनों चल रहा यह समय हम सभी के लिए संक्रमण का महाकाल कहा जा सकता है जहां हम अपने आपमें बदलाव लाने के तमाम रास्तों की ओर तकिया रहे हैं। अपने भविष्य के सपनों को बुन रहे हैं, संकल्पों की फेहरिश्त बनाने में लगे हुए हैं और इससे भी अव्वल बात यह है कि हम पुराने वर्ष से विदा लेने से पहले कुछ प्रायश्चित एवं पश्चाताप भी करने का मानस बना चुके हैं।
       हम सभी की जिन्दगी में अच्छा-बुरा वक्त सभी का आता है लेकिन स्थिर कभी नहीं रहता।  समय, परिस्थितियां और पात्र वही होते हैं फिर भी हमारी मनोवृत्ति में बदलाव अक्सर आया करता है।
        कई बार मन के वहम और दुःखों को अतिरंजित कर देखने की हमारी परंपरागत आदत के शिकार होकर हम सामान्य विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों तक को भारी मान बैठते हैं, कई बार अच्छी परिस्थितियों में ही संतोष कर लिया कर उन्हें स्थायी भाव देने की कोशिश में नूतन परिवर्तनों से दूरी बनाए रखने की आदत पाल लिया करते हैं और बहुत सी बार हमें यह सूझ ही नहीं पड़ती कि क्या करना चाहिए, क्या हो रहा है, और क्यों हो रहा है।
        इस स्थिति को हमारे जीवन के लिए शून्य काल कहा जा सकता है। वर्ष का यह अवसान काल सभी के लिए संक्रमण काल का द्योतक है। यह पखवाड़े-सप्ताह भर का समय जोश में होश खो देने के लिए सभी संभावनाओं को खुला रखे हुए है।
        बहुत से लोग जी भर कर जोश में होश गंवा बैठते हैं और फिर आने वाले कई वर्षों तक पछताने को विवश होना पड़ता है। अंधकार से जुड़े हुए तमाम पवोर्ं के साथ ऎसा ही होता है। इन पर्वो का आनंद न दैवीय होता है न दिव्य। बल्कि यह संक्रमण काल अंधकार के साये में बदलाव का प्रतीक काल है जिसमें निशाचरी माया का प्रभाव साफ-साफ झलकता है।
        और जहाँ निशाचरी परंपराओं की काली छाया होगी वहां आसुरी भावों का साम्राज्य अधिक होगा। यही कारण है कि हमारे लिए यह संक्रमण काल बहुत ज्यादा सतर्क और सुरक्षित होकर जीने का है जहाँ पग-पग पर इंसान का क्षरण करने के सभी साधन और अवसर बिना किसी मेहनत के सर्वसुलभ हैं और अवसर भी ऎसा कि इसके नाते पर सब कुछ जायज है, कुछ भी कर डालो।
         वैसे भी अंधानुचरों के लिए कोई मर्यादा नहीं होती, जैसा वे करते जाते हैं, हम बिना कुछ सोचे समझें उनके पीछे हो लेते हैं।  ये दिन कोई सहज नहीं हैं। इनमें संभलने और धीर-गंभीर होकर रहने की जरूरत है। ऎसा नहीं हो पाया तो हमारे दिमाग और शरीर को बहलाने और बहकाने के तमाम इंतजाम यहां उपलब्ध है।
दिमाग कभी भी खराब हो सकता है, शरीर कभी भी फिसल सकता है, कहीं भी फिसल सकता है। और ऎसा भी फिसल सकता है कि दोबारा उठ ही न पाए या नीम बेहोशी खुले तो खुद को आईसीयू में पाएं। हमारी युवा पीढ़ी के लिए यह संक्रमण काल कुछ बिगाड़ा न कर पाए।
        इसके लिए सभी को सतर्क, सुरक्षित एवं मर्यादित जश्न मनाने में जुटना होगा। अन्यथा इस बार समय कुछ ज्यादा ही खराब चल रहा है।  निशाचरी संक्रमण काल के तमाम खतरों के प्रति सचेत रहना हम सभी का फर्ज है।


शुक्रवार, 18 मई 2018

गप्‍पी लाल का किस्‍सा

        अज्जू के साथ अजब मुसीबत थी। जाने क्या बात थी कि वह झूठ बोले बगैर रह ही नहीं पाता था। दोस्तों के बीच डींगें मारने का मौका मिलता, तब तो उसकी कल्पना के पंख लग जाते और मन छलाँगें लगाने लगता। ऐसी - ऐसी बातें कहता कि सुनने वाले पहले तो हैरान होने का नाटक करते, फिर उसके झूठ की कलई खोल ऐसा तंग करते कि बेचारे से भागते ही बनता।
बेचारा अज्जू ऐसे क्षणों में अपनी इस इजीब सी आदत को लेकर मन ही मन रोया करता था। सोचता था - बहुत हुआ। अब आगे से ऐसी उल्टी - सीधी गप्पें नहीं हाँका करूँगा। पर वह लाचार था। जाने क्या बात थी,जहां चार दोस्त इक_े हों, वहाँ ऐसी बातें कहे बगैर उसे चैन ही न पड़ता था। इन बातों का कोई सिर - पैर तो होता नहीं। इसलिए फौरन पकड़ में आ जातीं और अज्जू की खूब लानत - मलानत होती।
धीरे - धीरे तो हालत यह हो गई कि अज्जू ज्यों ही गप्प हाँकने के लिए मुँह खोलता, उसके दोस्त ही .. ही ..ही करके हँसना शुरू कर देते। उसकी आधी बात मुँह की मुँह में ही रह जाती। और मारे शर्म के उसका चेहरा लाल हो जाता।
एक दिन ऐसे ही दोस्तों ने अज्जू का बुरी तरह मजाक उड़ाया। वह छुट्टी के बाद स्कूल के पास वाले मुरली बाबा के बगीचे में जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। रह - रहकर उसे रोना आ रहा था। सोच रहा था - क्या करूँ, क्या न करूँ ? क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि मुझे रोज - रोज की इस बेइज्जती से छुटकारा मिल जाए! हो सकता है,जरूर हो सकता है! उसे एक महीन सी आवाज सुनाई दी।
- कौन ? अज्जू हैरान होकर इधर - उधर देखने लगा। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। क्या सचमुच अभी - अभी कोई बोला था या फिर ....?
- इधर - उधर क्या देख रहे हो अज्जू ? मैं कह रही हूँ न, कि तुम्हें रोज - रोज की इस मुसीबत से छुटकारा मिल सकता है, जरूर मिल सकता है!
अज्जू को लगा, यह आवाज तो जरूर इस पीपल के पेड़ के ऊपर से आ रही है। उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो एक सुंदर सी रंग - बिरंगी चिड़िया को अपनी ओर देखते पाया।
अज्जू को लगा, हो न हो, यह चिड़िया ही अभी - अभी उससे बोल रही थी। लेकिन भला यह आदमी की - सी आवाज में कैसे बोल लेगी ? अज्जू अभी यही सोच ही रहा था कि देखा, पंख लहराती हुई, वही सुंदर, रंग - बिरंगी चिड़िया उड़कर उसके सामने आ बैठी। वह लाल - हरे रंग की प्यारी सी चिड़िया थी। उसकी गरदन नीली थी और सिर पर पीले रंग की सुंदर कलगी थी।
- अरे, अभी - अभी क्या तुम्हीं बोल रहीं थीं ? अज्जू ने हैरानी से चिड़िया को देखते हुए पूछा।
- हाँ! उसे लगा कि अरे, यह चिड़िया तो हँसती भी है। हाँ कहते - कहते जरूर धीमे - धीमे हँस रही थी।
लेकिन अज्जू तो अपनी ही मुश्किलों से घिरा था बोला - बताओ नन्ही, अच्छी चिड़िया। बताओ, भला तुम कैसे मुझे मेरी मुश्किलों से छुटकारा दिला सकती हो ?
- बस, ऐसे कि जब तुम कुछ ज्यादा ही गप्पें हाँकने लगोगे, तो मैं चीं - चीं, चीं - चीं करके तुम्हें सावधान कर दूँगी। मेरी आवाज बस तुम्हीं को सुनाई पड़ेगी,किसी और को नहीं! तुम झट समझ जाना और गप्पें हाँकना बंद कर देना। चिड़िया बोली।
- अरे! यह आइडिया तो अच्छा है। अज्जू उछल पड़ा और जोर - जोर से तालियाँ बजाते हुए बोला - धन्यवाद, नन्हीं चिड़िया धन्यवाद!
बस, खुश होकर अज्जू ने अपना बस्ता उठाया और चिड़िया को टा टा करके घर चल दिया। उसे लगा, उसके सिर पर से चिंताओं की भारी गठरी उतर गई है।
अगले दिन अज्जू स्कूल पहुँचा, तो खुश - खुश सा था। अभी क्लाश शुरू होने में काफी देर थी। इसलिए बच्चे टोली बनाकर आपस में बातें कर रहे थे। दीपू कह रहा था - कल शाम मैं अपने अंकल के यहाँ दावत में गया था। वहाँ कई तरह की चाट थी रसगुल्ले थे, आइसक्रीम भी थी। खूब मजा आया!
-ठीक है, दावत अच्छी होगी। पर मेरे नाना ने एक बार मेरे जन्मदिन पर जो दावत दी थी, उसका भला कौन मुकाबला करेगा ? आहा! ऐसी दावत थी, ऐसी कि कोई सोच भी नहीं सकता!
अज्जू कह रहा था तो चिड़िया ने बीच - बीच में दो - एक बार चीं - चीं करके इतना शोर मचा दिया कि बेचारा अज्जू परेशान। अपनी गलती सुधारता हुआ बोला - नहीं, दस हजार तो नहीं थे। मैं शायद कुछ ज्यादा कह गया। हाँ, हजार लोग तो जरूर थे। नहीं, हजार नहीं, बस सौ - डेढ़ सौ! हाँ सौ - डेढ़ सौ तो जरूर होंगे।
- तो इसमें क्या खास बात ? दीपू बोला।
- खास बात! खास बात पूछते हो, तो सबसे खास बात तो उसमें यह थी कि छत्तीस तरह की सब्जियाँ थीं, सूखी भी, रसेदार भी। और छत्तीस तरह की चाट। ओह, न जाने क्या - क्या चीजें थीं! मुझे तो नाम भी याद नहीं आ रहे।
अज्जू ने अपना वाक्य पूरा किया ही था कि चिड़िया ने इस बुरी तरह से चीं - चीं, चीं - चीं का शोर मचा दिया कि अज्जू को लगा, अपनी गलती को सुधारना ही पड़ेगा, वरना चिड़िया की चीं - चीं रुकेगी नहीं और उसका दिमाग खराब हो जाएगा।
अज्जू कुछ सोचकर गंभीर होकर बोला - दोस्तों, लगता है, मैं कुछ गलत बोल गया। छत्तीस तरह की सब्जियाँ नहीं थीं और छत्तीस तरह की चाट भी नहीं थी। असल में सब्जियाँ, चाट, आइसक्रीम और मिठाइयाँ, ये सारी चीजें मिलाकर छत्तीस थीं। अब मुझे याद आया। हाँ, ठीक - ठीक याद आ गया!
सुनकर दोस्त हैरान होकर अज्जू की ओर देख रहे थे। सोच रहे थे, आज इसे हुआ क्या है ? खुद ही अपनी बात कहता है, खुद ही काटता है। शायद इसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं है या परेशान सा है। इसलिए अज्जू का मजाक उड़ाना छोड़कर वे चुप हो गए। फिर भी दो - एक दोस्त तो खुदर - खुदर हँस ही रहे थे। और आँखें नचा - नचाकर अज्जू का मजाक उड़ा रहे थे।
उस दिन आधी छुट्टी के समय अज्जू फिर दौड़कर मुरली बाबा की बगिया में गया और उसी पीपल के नीचे आकर बैठ गया। वह बहुत उदास था। फौरन कल वाली दोस्त चिड़िया फुदककर उसके पास आ गई। बोली - क्या बात है अज्जू, तुम तो आज भी उदास हो।
- हाँ, क्या करूँ ? मेरी मुश्किलें तो कम होंने में ही नहीं आ रहीं। कहते - कहते अज्जू रो पड़ा। और फिर उसने सुबकते हुए चिड़िया को आज की पूरी बात सुना दी।
चिड़िया बोली - मेरी चीं - चीं तो बस तुम्हें सावधान करने के लिए है। लेकिन तुम खुद भी कोशिश करो न!
बात अज्जू की समझ में आ गई। चिड़िया को धन्यवाद देकर फिर वह झटपट अपनी क्लास में आ गया।
उस दिन स्कूल से छुट्टी होने पर सारे बच्चे हँसते, बात करते हुए घर जा रहे थे। उन्हीं के बीच अज्जू भी था। दोस्त जब बातें कर रहे थे, तो बीच - बीच में अज्जू का मन होता, वह भी दो - चार गप्पें लगा दे और अपनी धाक जमा दे। लेकिन तभी उसे चीं - चीं चिड़िया की बात याद आई और उसने अपने मन को बड़ी मुश्किल से काबू में किया।
ऐसे ही दो - तीन दिन निकल गए। बार - बार अज्जू का मन डींगें हाँकने का होता, लेकिन हर बार चीं - चीं चिड़िया की सलाह उसे याद आ जाती और वह गप्पें हाँकने की बजाए, सीधे - सादे ढंग से अपनी बात कहने लगता।
अज्जू के दोस्त बड़ी हैरानी से देख रहे थे। अज्जू बदल कैसे रहा है ? एक दिन गोपाल ने कहा - जरूर किसी ने इसे अच्छी सीख दी है। लेकिन देखता हूँ, यह बाहर - बाहर से ही बदला है या भीतर से भी!
- वह तुम कैसे पता करोगे। दोस्तों ने पूछा।
- बस, देखते रहो! गोपाल बोला।
उसी दिन छुट्टी होने के बाद सब बच्चे बातें करते हुए घर जा रहे थे। तभी गोपाल ने अज्जू को बुलाकर कहा - अरे सुनो अज्जू, कल तो बड़ा मजेदार किस्सा हुआ। मेरे पापा शिकार खेलने गए थे। एक हिरन मारकर लाए। जानते हो, कितना बड़ा था ... बहुत बड़ा था, बहुत बड़ा! कहते - कहते गोपाल ने अपने दोनों हाथ फैला दिए।
- अरे, कितना बड़ा होगा ? ज्यादा से ज्यादा पाँच - छह फुट। लेकिन तुम्हें यह नहीं पता कि मेरे दादा जी कितने बड़े शिकारी थे! दूर - दूर तक उनका नाम था। और आदमी तो क्या, जंगल के जानवर भी उनका नाम सुनकर थर - थर काँपते!
अज्जू जब यह बोल रहा था, तो चिड़िया ने दो - तीन बार चीं - चीं करके उसे चेताया। पर अज्जू कहाँ मानने वाला था! बहुत दिनों बाद मौका मिला था, इसलिए वह पूरी तरह अपना सिक्का जमा देना चाहता था।

गौरैया के हक में


गांव के चौपाल में चहकती गौरैया
मीठे-मीठे गीत सुनाती गौरैया
गुड़िया को धीरे से रिझाती गौरैया
याद आज आती है
हरे-भरे पेड़ों पर फुदकती गौरैया
घर के मुंडेर पर थिरकती गौरैया
स्मृति में बस जाती है।
घर के चौखट पर नन्हीं सी गुड़िया
पास में फुदकती प्यारी सी चिड़िया
लुका-छिपी का यह खेल
क्रम-दर-क्रम बढ़ना
यादों के झरोखे से
एक मधुर संगीत सुनाती है।
धीरे-धीरे यादें अब अवशेष रह गईं
लुका-छिपी का खेल स्मृति-शेष रह गया
न रहा गांव, न रहा मुंडेर
गौरैया कहानी के बीच रह गई।
गुड़िया अब बड़ी होकर सयानी हुई
उसके एक मुनिया रानी हुई
जिसे उसने गौरैया की कहानी सुनाई
मुनिया मुस्कुराई फिर चिल्लाई
मां गौरैया तो दिखाओ
कहानी की वास्तविकता तो समझाओ
मुनिया के प्रश्नों पर गुड़िया झुंझलाई
दिल का दर्द आंखों में छलक आया
मुनिया को मोबाइल टावर दिखाया
फिर उसको धीरे से समझाया
इसमें बैठा है एक भयानक दरिंदा
जिसने छीना हमसे एक प्यारा परिंदा
गौरैया का दुश्मन हमने बनाया
उसे छाती-पेट से लगाया।
उसने छीना है हमारी प्यारी गौरैया
रह गई स्मृतियों में न्यारी गौरैया
गौरैया को यदि बचाना है
तो दरिंदे को मिटाना है
नहीं तो कहानियों में रह जाएगी गौरैया
मुनिया के प्रश्नों का उत्तर ना दे पाएगी दुनिया।।

गुरुवार, 17 मई 2018

गुरुददा

-ललित दास मानिकपुरी
 
        'दुलारी..., मैं नरियर ले के लानत हंव, तैं फूल-पान अउ आरती सजाके राख। अंगना-दुवारी म सुंदर चउंक पुर दे।"- मंगलू  अपन गोसइन ल कथे।
        'मैं सब कर डारे हावंव हो, फिकर झन करौ। बस काखरो करा ले सौ ठन रुपया लान दौ। गुरुददा ल घर ले जुच्छा भेजबो का?" - दुलारी किहिस।
बिचार करत मंगलू कथे-'बने कथस वो, पहली ले जानत रइतेन गुरुददा आही कहिके त सुसाइटी ले चांउर ल नइ बिसाय रइतेन। साढ़े तीन कोरी रुपया रिहिस हे। फेर चांउर नइ लेतेन त खातेन का? कोठी म तो धुर्रा उड़त हे।"
         'का जानन हो, अइसन दुकाल परही कहिके। ओतका पछीना ओगराएन, पैरा ल घलो नइ पाएन। गांव म तो सबो के इही हाल हे हो, काखर करा हाथ पसारहू? तेखर ले मोर बिछिया ल बेच देवव।"- दुलारी कहिस।
मंगलू कथे-'कइसे कथस वो, तोर देहें म ये बिछिया भर तो हे, यहू ल बेच देबे त तोर करा बांचहीच का?"
         'तन के गाहना का काम के हो, जब बखत परे म काम नइ अइस। गुरुददा के किरपा होही त अवइया बछर म हमरो खेत ह सोन ओगरही। तब बिछिया का, सांटी घलो पहिरा देबे।"- दुलारी किहिस।
         मंगलू ल दुलारी के गोठ भा गे, कथे-'तैं बने कथस वो, आज मउका मिले हे त दान-पुन कर लेथन। का धरे हे जिनगी के? ले हेर तोर बिछिया ल, मैं बेच के आवत हंव।"
         मंगलू दुलारी के बिछिया ल बेच आइस। सौ रुपया मिलिस तेला दुलारी अंचरा म गठिया के धरिस। दुनों के खुसी के ठिकाना नइ हे। रहि-रहिके अपन भाग ल सहरावत हें कि आज गुरुददा के दरसन पाबो, ओखर चरन के धुर्रा ल माथ म लगाबो। सुंदर खीर रांध के दुलारी मने-मन मुसकावत हे, ये सोंच के कि रोज जेखर फोटू ल भोग लगाथंव, वो गुरुददा ल सिरतोन म खीर खवाहूं।
         मंगलू मुहाटी म ठाढ़े देखत हे। झंडा लहरावत मोटर कार ल आवत देखिस त चहकगे। आगे... आगे... गुरुददा आगे, काहत दुलारी ल हांक पारिस। दुलारी घलो दउड़गे। दुनोंझन बीच गली  म हाथ जोरके खड़े होगें। हारन बजावत कार आघू म ठाहरिस। गुरु महराज अउ ओखर मंडली जइसे उतरिस, मंगलू अपन गुरुददा के चरन म घोलनगे। 'आवौ...आवौ... गुरुददा" काहत, परछी म लान के खटिया म बइठारिस। पिड़हा उपर फूलकांस के थारी मढ़ाके पांव पखारे बर दुनोझन बइठिन। गुरुददा अपन पांव ल थारी म मढ़इस, त ओखर सुंदर चिक्कन-चाक्कन पांव ल देखके दुनों के हिरदे गदगद होगे। ये तो साक्षात भगवान के पांव आय। ये सोंच के, 'धन्य होगेन प्रभू, हमन धन्य होगेन" काहत मंगलू अपन माथ ल गुरुददा के चरन म नवादिस। दुनों आंखी ले आंसू के धार फूट परिस। तरतर-तरतर बोहावत आंसू म गुरुददा के पांव भींजगे। दुलारी के आंखी घलो डबडबागे।
        तभे मंडलीवाला कथे-'जल्दी करौ भई, गुरुदेव ल गउंटिया घर घलो जाय बर हे।"
हड़बड़ाके दुनोंझन पांव पखारिन, आरती उतारिन, फूल-पान चढ़ाइन अउ नरियर के संग एक सौ एक रुपया भेंट करिन।
'मंगलू गुरुदेव ल का अतके दान करबे?"- मंडली वाला फेर किहिस।
'हमन गरीबहा तान साधू महराज, का दे सकथंन। जउन रिहिस हे तेला गुरुददा के चरन म अरपन करदेन।"- मंगलू अपन दसा ल बताइस। मंडली वाला फेर टंच मारिस-'अइसे म कइसे बनही मंगलू? गुरुदेव तंुहर घर घेरी-बेरी आही का?"
         मंगलू अउ दुलारी एक-दूसर ल देखिन। दुलारी ह अंगना म बंधाय गाय डाहर इसारा करिस। त मंगलू ह अपन गुरुददा ल फेर अरजी करिस -'मोर करा ए गाय भर हे गुरुददा, गाभिन हे, येला मैं आपमन ल देवत हंव।"
'अरे गाय ल गुरुदेव कार म बइठार के लेगही का? गाय ल देवत हस तेखर ले गाय के कीम्मत दे दे।"-मंडली वाला फेर गुर्रइस।
         मंगलू सोंच म परगे। दुलारी चांउर के चुम डी डाहर इसारा करिस। मंगलू समझगे, कथे-'बस ये चाउंर हे गुरुददा।"
        त गुरुददा मुसकावत कथे- 'ठीक हे मंगलू, मोला स्वीकार हे। फेर ये चांउर ल लेगे बर घलो जघा नइहे, येला बेचके तैं पइसा लान देबे। मैं चलत हंव, देरी होवत हे।"
         अतका कहिके गुरुददा खड़े होगे। मंगलू फेर हाथ जोरके बिनती करिस-'गुरुददा, दुलारी आपमन बर भोग बनाए हे, किरपा करके थोरिक पा लेतेव।"
       गुरुददा कुछु कतिस तेखर पहलीच मंडली वाला के मुंहू फेर चलगे -'गुरुदेव काखरो घर पानी घलो नइ पियय मंगलू, तुंहर घर खाही कइसे?
        अतका सुनिस त दुलारी हाथ म धरे खीर के कटोरी ल अपन अंचरा म ढांकलिस। गुरुददा मंडली के संग निकलगे। पाछू-पाछू मंगलू चांउर ल बेचे बर निकलगे। बेच के सिध्धा गंउटिया घर गिस। मुहाटी म ठाढ़े गउंटिया के दरोगा ह ओला उहिच करा रोक दिस। कथे-'अरे ठाहर, कहां जाथस? भीतरी म महराजमन गंउटिया संग भोजन करत हें। तहूं सूंघ ले हलुवा, पूड़ी इंहा ले ममहावत हे। अउ दरसन करे बर होही त पाछू आबे। खा के उठहीं त सबो झन बिसराम करहीं।"
'मैं तो गुरुददा ल दक्छिना देबर आए हंव दरोगा भइया।" - मंगलू ह बताइस।
'अरे त मोला दे दे ना, मैं दे देहूं। अउ कहूं भीतरी जाहूं कहिबे त मैं नइ जावन दंव। गंउटिया मोला गारी दीही।"- दरोगा किहिस।
        मंगलू ह पइसा ल दरोगा ल देके अपन घर लहुटगे। घर आके देखथे, दुलारी परछी म खड़े, कोठ म लगे फोटू ल निहारत राहय, आंखी डबडबाए राहय। मंगलू ह घलो वो फोटू ल देखिस, जेमा माता सवरीन ह भगवान राम ल सुंदर परेम से बोईर खवावत राहय।

दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़

कैलाश बनवासी

अजीब-सा स्वाद लगा था पानी का ।
कहावत है- कोस-कोस में बदले पानी, सात कोस में बानी, फिर मैं तो भूल ही चुका था, हम घर से कितना आगे आ चुके हैं । ...शायद हजार से भी ज्यादा । और यह हिसाबने का कोई तुक नहीं था, फिलहाल । मैं प्लेटफार्म के अपेक्षाकृत कुछ दूर के नलके में हाथ-मुँह धो रहा था, स्टेशन के टॉयलेट से निवृत्त होने के बाद । यह सुबह के साढ़े पाँच-छह के बीच का समय था, झीने और कोमल सफेद उजास का समय । मेरे ऊपर आकाश था, गहरा नीला, जिसमें कहीं-कहीं तारे टिमक रहे थे । और चाँद था, निस्तेज, किसी पुरानी किताब के पीले पड़ गए कागज-सा ।
        यह दिल्ली का आकाश था । निजामुद्दीन ।
        गौरी ने कुछ देर पहले जब मुझे जगाया था, मैं बहुत गहरी नींद में था । उठकर मैं भकुआया-सा कुछ देर देखता रहा था अपने ईद-गिर्द जहाँ कुछ लोग बेसुध सो रहे थे स्टेशन के लाउंज के फर्श पर, हमारी ही तरह । एक पल को तो समझ में मनहीं आया मैं कहाँ हूँ । जब समझ में आया तो अपनी घड़ी देखी, क्या समय हुआ है । सवा पाँच ही बजे थे । मुझे गौरी पर खीज हुई, क्यों उठा दिया इतनी जल्दी । गौरी की बहुत सी बातों पर मैं अक्सर खीज जाता हूँ, बहुत जल्दी । आदतन । मैं उस पर ऐसे खीजता हूँ मानों यह मेरा अधिकार हो ! और वह भी जैसे इसे स्वीकार कर चुकी है कि भाई जो करेगा, सही करेगा, क्योंकि मैं उसका एक जिम्मेदार भाई हूँ । एक गार्जियन । उससे उमर में दो बरस छोटा होने के बावजूद । ...और यह अभिभावकपन कब मेरे भीतर दाखिल हुआ और कब अपनी जड़ें जमा लिया, मुझे नहीं मालूम ।
       इस सुबह यहाँ मैं अकेला था । और बहुत शान्ति । सुबह की नम हवा में भीगी शान्ति । और एक साफ-सुथरापन । एक सूनापन । सब कुछ भला-भला-सा । प्लेटफार्म की जलती हुई बत्तियाँ भी इस समय आँखों को नहीं चुभ रही थीं । अभी वह गहमा-गहमी कहीं नहीं थी, न ही वैसी भाग-दौड़, जब कल रात आठ के आसपास यहाँ पहुँचे थे ।
       प्‍लेटफार्म के स्वीपर आ चुके थे । मार्निंग शिफ्ट के स्वीपर । लम्बे डण्डे वाली झाड़ू से बुहार रहे हैं ।  इन्हें देखकर रात की घटना की कड़वाहट मन में एक बार फिर तिर आई... ।
        हम स्टेशन के टिकटघर से कुछ हट के सो गए थे । असल में किसी होटल में रात रुकने की बात हम सोच ही नहीं सकते थे । यह हमारे लिए महँगा सौदा था । फिर एक रात की ही तो बात है । काट लेंगे कैसे भी ! कितने सारे लोग तो सोते हैं प्लेटफार्म पर । फिर हमारे साथ जनरल डिब्बे में आये बिरेभाट गाँव के छह लोग भी थे, वे भी यहीं सो रहे थे । इसलिए चिंता की कोई बात नहीं थी । पर रात में दो स्वीपरों ने हमें उठा दिया था, अपने झाड़ूवाले डण्डे से हमें कोंचते हुए, ``उठो-उठो, ये तुम्हारे सोने की जगह नहीं है ! बाहर जा के सोओ ! टिकट खिड़की के सामने सो गए हैं साले देहाती !''
        मुझे उनके चेहरे याद नहीं हैं, याद है उनकी आवाजें... जो असामान्य रूप से गहरी चिढ़ और नफरत से भरी थीं । अगर आवाज का रंग होता तो ये गहरे काले रंग की चमकदार आवाजें थीं, और जिन्हें अपने ऐसा होने का कोई अफसोस नहीं था, दूर-दूर तक । उनके लिए यह रोज की बात रही होगी, बहुत सामान्य । और गाँव से आए लोगों के लिए भी ये लगभग उतनी ही सामान्य बात थी । उन्हें हर साल ऐसे ही पलायन करना होता है कमाने-खाने के लिए । ऐसे अपमानों का उन्हें काफी अभ्यास है- सहने का भी और भूलने का भी । थोड़ा कुनमुनाकर हम वहाँ से उठ गए थे और कोने की एक खाली जगह में चले गए थे अपना बोरिया-बिस्तर लेकर । और फिर वहाँ सो भी गए थे, बावजूद इसके कि वहाँ ठंडी हवा सीधी आ रही थी, बावजूद इस भय के कि फिर कोई और आकर हमें यहाँ से खदेड़ देगा... । और हम यहाँ से भी उठकर किसी और जगह चले जाएँगे... ।
       प्लेटफार्म के नीचे पटरियाँ दूर तक चली गई हैं, भोर के सफेद उजास में चमकती हुइंर्, काले साँपों की मानिंद... । इस भली-भली-सी शान्त सुबह में तौलिए से अपने हाथ-मुँह पोंछता मैं वहाँ आ रहा हूँ जहाँ दीदी बैठी है, हमारे सामान के साथ । एक सूटकेस और दो सफारी बैग ।
        हम पहली बार घर से इतनी दूर आए हैं वह भी दिल्ली ! दीदी गौरी का इण्टरव्यू है फरीदाबाद में । हमें ट्रेन में मुसाफिरों से ही पता चला था कि फरीदाबाद जाने के लिए नई दिल्ली नहीं, बल्कि निजामुद्दीन उतरना पड़ेगा । इसलिए कल रात आठ बजे हम अपनी ट्रेन `छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस' के यहाँ रुकते ही उतर गए थे । हमारे साथ बिरेभाट गाँव वाले यात्री भी उतर गए थे जो दुर्ग से चढ़े थे । उन्हें नोएडा जाना है, जो शायद यहाँ से पास पड़ता है ।
        मैं पच्चीस बरस का हूँ, बी.एससी. तक पढ़ा । दो साल से सरकारी नौकरी में हूँ- वन विभाग में क्लर्क की नौकरी । इसके बावजूद बड़े शहर का डर खत्म नहीं हुआ था । वह बना हुआ था । यह गहरा था और बहुत चमकीला । पता नहीं कब से हमारे भीतर अपनी जड़ें जमाए हुए । एक अविश्वास... और ठग लिए जाने का भय... । ठगे जाने का भय अपने सचमुच के ठग लिए जाने से बहुत बड़ा था । हालाँकि अपने शिक्षित होने का एक दंभ मैं इस सफर में अपने साथ रखे था- किसी जरूरी और उपयोगी औजार की तरह, पर वह सचमुच कोई खास काम नहीं दे रहा था । मैं यहाँ भी उतना ही कमजोर था । बल्कि गौरी मुझसे ज्यादा सहज थी यहाँ । क्या यह मेरी अतिरिक्त सजगता थी, जो मुझे और नर्वस कर रही थी ? इसका आभास मुझे सारे रास्ते इन देहातियों को देखकर भी होता था जो मुझसे कहीं ज्यादा निश्चिन्त लगते थे, मेरी किताबी पढ़ाई को कमतर सिद्ध करते हुए । जबकि मैं उन्हें देहाती और गँवार ही मान रहा था, अपने से हर हाल में पिछड़ा, पर मैं गलत था; क्योंकि उनके पैंतीस-चालीस उम्र के चेहरों में कुछ था जो मेरे नौसिखिएपन पर भारी था । मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या था ? उनका अनुभव ? दु:ख और कष्टों से जूझने का लम्बा और लगातार अनुभव, जिसे कोई किताब नहीं, सिर्फ और सिर्फ जीवन सिखाता है ।
         कल रात खाने के लिए मैं स्टेशन के बाहर के एक ठेले से ब्रेड-आमलेट ले आया था । वे छह लोग गाँव से अपने साथ लाए एक मोटरे से अंगाकर रोटी निकालकर गुड़ के साथ खा रहे थे, बहुत तृप्त भाव से । उनके खाने में एक सुख था । साझा सुख । दो पुरुष, उनकी पत्नियाँ, उनकी अधेड़ माँ और छह-सात साल की उनकी एक बेटी का साझा सुख । मैं पा रहा था उनके इस साझे सुख को तोड़ पाना बहुत कठिन है ! ये अपना गाँव छोड़ आए हैं, यहाँ से कुछ कमाकर लौट जाने के लिए । और एक दिन यहाँ से लौटकर जाने का इनका विश्वास कितना सहज और गहरा है! और कितना मजबूत ! जैसे बरसों से इनके जीवन में यही होता आ रहा हो... ।
और मुझे देखो, इनसे आर्थिक रूप से अधिक सक्षम होने के बाद भी मेरे भीतर वैसा विश्वास नहीं !
          बरामदे के उस कोने में जब मैं पहुँचा, दीदी तैयार बैठी थी, मानों अभी ही उसका इण्टरव्यू लिया जाना हो ! वह हल्के आसमानी रंग की साड़ी पहने थी, जिस पर गहरे नीले रंग का कंट्नस्ट बार्डर था । चेहरे से सफर की थकान उतर चुकी थी, और नई जगह जाने का उत्साह दिखता था । मैंने पाया, आज गौरी अच्छी लग रही है, बावजूद अपने चेहरे पर हमेशा नजर आने वाले एक बचपने के ।
``अरे, तुम तैयार हो गई, इतनी जल्दी ?''
``तू भी तैयार हो जा जल्दी । हमको दस बजे तक वहाँ पहुँचना है ।'' गौरी मुझसे कहती है । छत्तीसगढ़ी में । हम छत्तीसगढ़ी में ही बात करते हैं, घर हो या बाहर ।
``मेरा क्या है, अभी हो जाता हूँ ।'' मेरा थोड़ा लापरवाह जवाब, जिसमें निहित है कि तुमको मेरे बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं, मुझको पता है कि कब क्या करना है ।
``टिकिट कटा लिया ?'' वह पूछती है ।
``नहीं । कटा लूँगा । अभी टिकिट-खिड़की कहाँ खुली है ?''
``जल्दी कटा लेना । यहाँ तो हर काम में बहुत भीड़ है ।''
``हाँ, कटा लूँगा ।'' मैं उसे आश्वस्त करना चाहता हूँ, क्योंकि देख रहा हूँ, उसका विश्वास, आत्म- विश्वास दोनों गड़बड़ा रहे हैं । ऐसा होने पर वह कुछ ज्यादा ही पूछने या सवाल करने लग जाती है । तब उसे यह बोध नहीं रहता कि कुछ सवाल अपने लिए भी होते हैं जिनके उत्तर जरा सा सोचने पर मिल जाते हैं । पर नहीं, वह फिर पूछेगी, क्योंकि पूछे बिना उसे चैन नहीं मिलता । सत्ताइस बरस की अबोधनुमा लड़की... मानो किसी कारण से चौदह-पन्द्रह की मानसिक दशा में ही अटक गई हो... ।
हमारे ग्रामीण सहयात्री अपना सामान समेट रहे हैं । सामान क्या, पूरी गृहस्थी ! उनके इतने सारे सामानों के कारण मेरे भीतर उनके प्रति एक चिढ़ बैठ गई है... कि ये कौन-सा तरीका है सफर करने का ? पूरा घर लादे लिए जा रहे हो ! दूसरों को कितनी दिक्कत होती है, इसकी बिल्कुल भी चिंता नहीं ! पूरे रास्ते मुझे यह खलता रहा है, और अपनी चिढ़ को मैंने प्रकट भी किया है । पर इससे कुछ होना-जाना नहीं । वे अपना मामला अपने हिसाब से तय करेंगे ।
       ... प्लास्टिक की खादवाली चार सफेद बोरियाँ, जिनमें दो में चावाल हैं, बाकी दो में उनकी गृहस्थी का सामान... गंज, कड़ाही, थालियाँ, लोटा, गिलास आदि से लेकर एक स्टोव और मिट्टी तेल की एक प्लास्टिक केन । दो पुराने टिन के बक्से हैं, जिन पर पेंट किए चटखीले फूल बदरंग होकर जंग खाए धूसर रंग में घुल-मिल गए हैं । एक बक्से में ताला लगा है जबकि दूसरे की कुंडी में तार का टुकड़ा बँधा है । इनमें शायद इनके कपड़े-लत्ते होंगे । यही है इनकी छोटी, बेपर्द गृहस्थी । मोबाइल गृहस्थी । जगह-जगह इनके साथ घूमती-भटकती गृहस्थी । कभी लखनऊ, कभी आगरा, कभी दिल्ली, कभी होशियारपुर... ।
        छत्तीसगढ़ के हर बड़े स्टेशन में इन्हें देखा जा सकता है, अपने ऐसे ही माल-असबाब के साथ, हर साल... । बाढ़ या अकाल के साल इनकी संख्या बहुत बढ़ जाती है... टिडि्डयों की मानिंद दिखने लगते हैं ये... । साल के छह महीने खेती कमाने के बाद ये निकल जाते हैं, जहाँ इन्हें काम मिल जाए... कुछ महीने मजदूरी के बाद रुपये कमाकर ये अपने गाँव लौट आएँगे, प्रवासी पक्षियों की तरह... ।
``तुम लोग नोएडा कैसे जाओगे ?'' मैं पूछता हूँ ।
``टेम्पो करके जाएँगे, बाबू ।'' साँवला अधेड़ मुस्कराकर कहता है । वह इस समय अपना कड़े रेशे वाला काला कम्बल तहा रहा है ।
``बड़ दूरिहा हे बेटा, इही पायके टेम्पो करत हन, नहीं त हम मन रेंगत चल देतेन !'' उसकी बुढ़िया माँ कह रही है हँस के । ...सच कह रही है वो, कि हम तो पैदल ही चले जाते । इनका वश चले तो सारा जहान ही पैदल घूम लें ! दूरी इनके लिए मायने नहीं रखती, पैसा मायने रखता है जो ये मुश्किल से हासिल कर पाते हैं । उनका सामान बँध गया । वे अब हमसे विदा ले रहे हैं ।
         वह बूढ़ी माँ और उनकी दोनों बहुएँ दीदी से बहुत घुल-मिल गए थे । खुद गौरी भी । वे कह रही हैं दीदी से, बहुत आत्मीयता से- ``जाथन बेटी ! दुरुग आबे त हमर गाँव आबे ! दया-मया धरे रहिबे !''
परिवार के पुरुष मुझसे यही कह रहे हैं, हँसकर । अपनी गँवई सरलता में ।
``हौ, तुहू मन आहू हमर घर दुरुग में ।'' दीदी भी उनसे हँसकर वैसी ही सरलता से कह रही है । इस बात को बिल्कुल भूले हुए कि अभी कुछ ही देर में ये दुनिया की बड़ी भीड़ में न जाने कहाँ खो जाएँगे... शायद हमेशा-हमेशा के लिए । फिर कभी नहीं मिलने के लिए, सिर्फ भूले-भटके कभी याद आ जाने के लिए ।
अब मुझे लगा, छत्तीसगढ़ हमसे बिछड़ रहा है... । छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से हमारे साथ आया एक गाँव,
उसकी सहज-सरल गँवई संस्कृति हमसे बिछड़ रही है... अपनी आत्मीयता से हमें विभोर किए हुए... ।
         मैंने दीदी को देखा, वह उन्हें तब तक देखती रही जब तक वे गेट के बाहर नहीं चले गए । उसकी मुस्कुराहट में एक उदासी और अजीब-सा खोया-खोयापन था । दिल्ली को वह बिल्कुल भूल चुकी थी इस समय ।
         एक पल के लिए मुझे सूझा कि उसे याद दिलाऊँ कि वह दिल्ली में है... पर लगा, दिल्ली की याद दिलाना अभी उसको आहत करना होगा, एक अन्याय होगा । ऐसे समय में दिल्ली को दूर रखना ही ठीक है । दिल्ली को हर समय अपने साथ रखना एक बड़ी बीमारी है... कई छोटी-बड़ी बीमारियों से मिलकर बनी एक बड़ी और खतरनाक बीमारी, जिसका ठीक होना मुश्किल होता है... ।
ये लड़की दिल्ली में रहेगी ?
          मैंने शायद सौवीं बार यह सोचा होगा... या शायद हजारवीं बार ! मैं बहुत अविश्वास से अपने सामने की सीट पर बैठी गौरी को देख रहा था, जो ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रही थी, और ऐसे खोई हुई देख रही थी जैसे उसे अभी देर तक सिर्फ यही करना हो ! सुबह साढ़े छह की `शटल' इस समय अपनी पूरी स्पीड में भाग रही थी । खिड़की के शीशे गिरे हुए थे, फिर भी ठंडी हवा नीचे से सेंध लगाकर घुसी आ रही थी । ट्रेन उसी दिशा की ओर जा रही थी जिधर से हम आए थे । एक पल के लिए मुझे लगा, हम लौट रहे हैं... ।
फरीदाबाद, ओल्ड । हम वहीं जा रहे थे ।
``दो टिकट फरीदाबाद !'' मैंने भरपूर आत्म-विश्वास का प्रदर्शन करते हुए टिकट काउण्टर पर बैठे क्लर्क से कहा था । लेकिन उस फ्रेंच-कट दाढ़ी वाले गोरे क्लर्क ने अपने चश्मे के भीतर से मुझे एक पल घूरकर पूछा था- ``फरीदाबाद ओल्ड कि न्यू ?'' मैं इस पर चकरा गया था । ओल्ड कि न्यू ? मुझे इसका कोई आइडिया नहीं था । हमें जाना है सेक्टर-१७ । अब यह ओल्ड है या न्यू, नहीं पता । मैंने दसियों बार गैरी के कॉल-लेटर में संस्था का एड्रेस पढ़ा था, उसमें कहीं ओल्ड या न्यू नहीं लिखा है, फिर ये क्या चक्कर है ? इधर क्लर्क के घूरने में मेरे प्रति चिढ़ बढ़ती जा रही थी, सो मैंने बिना सोचे कह दिया, ``ओल्ड ।'' क्लर्क ने टिकट बना दिए । इससे ज्यादा वह मेरी कोई सहायता करने का इच्छुक नहीं था । मुझे लगा, टिकट देने के बाद जैसे उसने मुक्ति की साँस ली है, मुझसे पीछा तो छूटा !
       ट्रेन में मुझे आश्चर्य था कि अपेक्षित भीड़ नहीं है । भीड़ क्या, पूरी सीटें लगभग खाली हैं । शायद इतनी सुबह के कारण । और बगैर भीड़ और धक्का-मुक्की के दिल्ली के ट्रेन की कल्पना करना मेरे लिए मुश्किल था । हमारे डिब्बे में मुश्किल से आठ-दस आदमी रहे होंगे । मेरे दाएँ कोने की सीट पर एक अधेड़ पुलिसवाला आराम से सो रहा था, अपना मोटा भूरा कोट पहने । शायद जी.आर.पी. का कर्मचारी हो, रात पाली ड्यूटी से घर लौटता हुआ । मुझे सोया हुआ पुलिसवाला एक जागे हुए पुलिसवाले से ज्यादा अच्छा लग रहा था । लगता था, अगर वह जाग गया तो उसके जागने के साथ ही उसका `पुलिस-मैन' भी जाग जाएगा, उसके सिरहाने पड़ी बेंत भी जाग जाएगी, समूचा थाना जाग जाएगा, और वह ऐसा शान्त और निर्विकार नहीं नजर आएगा । तुम्हारे सामने कोई पुलिसवाला सोया हो, तो तुम भी वही शान्ति महसूस कर सकते हो जो मैं महसूस कर रहा था ।
         हवा में जनवरी के अन्तिम सप्ताह की ठंडकता थी । बहुत । जब छू जाती तो हम सिहर उठते । दिल्ली की ठंड के बारे में हमने अभी तक केवल सुना था, अब महसूस कर रहे थे । फिर भी लगा, हम किस्मत वाले हैं जो शीतलहर नहीं चल रही है । हमारा बचाव अपने साधारण गर्म कपड़े में हो जा रहा है । दीदी ने कत्थई शॉल कस के लपेट रखा है, और मैं पूरी बाँह का स्वेटर पहने हूँ, हल्के आसमानी रंग का । यह हमने यहाँ आने के पहले ही खरीदा है- दिल्ली की ठंड से मुकाबले के लिए ।
         मेरा ध्यान हमारे यहाँ आने के मकसद पर आया । गौरी का इण्टरव्यू । सुबह के दस बजे का समय दिया है । दीदी का इण्टरव्यू-लेटर मेरे पैंट की जेब में पड़ा है । मटमैले भूरे रंग के लिफाफे के भीतर का वह कागज, जिसका उसे पिछले तीन महीने से इन्तजार था । यह एक प्रतिष्ठित स्वयं-सेवी संस्था का इण्टरव्यूलेटर है, जो अनाथ बच्चों के लिए काम करती है । मैं ट्रेन में इस समय दीदी के चेहरे पर अपने साक्षात्कार को लेकर थोड़ी चिंता या गंभीरता देखना चाहता था, जिसके लिए हम इतनी दूर आए हैं । पर यह नदारद ।
         गौरी खिड़की के बाहर के दृश्यों में ही इतना रमी थी मानों भूल गई हो, कहाँ आई है और किसलिए । मुझे यह देखकर पहले थोड़ी चिंता हुई, फिर गुस्सा आने लगा । मैंने उसका ध्यान हटाने के लिए पूछा, ``गौरी, तुम्हारी तैयारी है न पूरी ?''
``हाँ, कर ली हूँ,'' उसका संक्षिप्त जवाब ।
       अब मैं नया प्रश्न ढूँढ़ने लगा । और झल्लाया मन ही मन- बेवकूफ लड़की ! इसका कुछ नहीं हो सकता । वह अभी भी बाहर के दृश्यों को बच्चों की उत्सुकता से देख रही थी, और अब उसके चेहरे पर मौजूद यह भोलापन मुझे चुभने लगा था । ...तो हमारा इतनी दूर आना व्यर्थ हो जाएगा ? भूल गई कि उसे नौकरी की कितनी सख्त आवश्यकता है ? और खुद भी तो बाबू से लड़कर यहाँ आई है ! बाबू, जाने क्यों, नहीं चाहते थे कि दीदी इतनी दूर जाकर काम करे- ``अभी यहाँ एक स्कूल में पढ़ा तो रही है, फिर क्या जरूरत है दिल्ली जाने की !'' लेकिन बाबू भूल रहे थे कि एक छोटे से प्राइवेट स्कूल की अस्थायी और बहुत कम वेतन वाली नौकरी के भरोसे जीवन नहीं काटा जा सकता । गौरी और मैं दोनों ही समझ रहे थे कि यह अच्छा अवसर है, नियुक्ति शायद आगे चलकर स्थायी हो जाएगी । और मैं पा रहा था, यह काम गौरी के स्वभाव और योग्यता के हिसाब से भी ठीक है... ।
        अब मैं यहाँ की प्रतिस्पर्धा के बारे में सोच रहा था, जिसका कोई ठोस और निर्धारित रूप मेरे सामने नहीं था । मुझे पता है कि यह दिल्ली है । देश की राजधानी । देश भर के प्रतियोगी आए होंगे । उनसे मुकाबला । और हमेशा लगता कि दूसरे निश्चय ही हमसे ज्यादा अच्छे हैं- रंग-रूप में ही नहीं, शिक्षा- दीक्षा, परवरिश, ज्ञान और व्यवहार में भी, ...कि हममें ढेर सारी कमियाँ हैं... कि हम एक बहुत पिछड़े परिवार से हैं... आर्थिक और मानसिक दोनों स्तर पर । पता नहीं क्या और कैसे होगा!... गौरी इण्टरव्यू बोर्ड में बैठे अधिकारियों को प्रभावित कर सकेगी, सचमुच?
      मुझे इण्टरव्यू के लिए प्रतियोगी पत्र-पत्रिकाओं की ढेर सारी बातें याद आने लगीं जो वे इण्टरव्यू में सफलता के लिए बताते हैं, जिन्हें अपनी बेरोजगारी के दिनों में पब्लिक-लाइब्रेरी में बैठकर मैं पढ़ता रहता था । ये सफलता के कुछ नुस्खे बताते, आपका आत्म-विश्वास बढ़ाते । मसलन ये बताते कि इण्टरव्यू कक्षा में आपको कैसे प्रवेश करना है, कि आपके जूते खट-खट की आवाज करने वाले न हों, आपकी हेयर स्टाइल कैसी हो, आपके चेहरे पर बोर्ड-मेम्बर को नमस्कार करते वक्त कितने सेंटीमीटर की मुस्कान होनी चाहिए, कि आपके शर्ट और पैण्ट के रंग बहुत सौम्य होने चाहिए, कि आप उनके सामने सर झुकाकर या आँखें चुराकर बात ना करें, खुद को बहुत आत्म-विश्वास और स्पष्टता से प्रस्तुत करें, मेज पर अपनी उँगलियाँ न बजाएँ, आपके बातचीत का लहजा संतुलित, सहज और आत्मीय होना चाहिए एक गरिमामय ढंग से... । जिन सवालों के जवाब आपको नहीं आते हों, स्पष्ट बता कर क्षमा माँग लें, यह आपके गोल-मोल या अस्पष्ट जवाब की तुलना में ज्यादा प्रभावी होगा । और इण्टरव्यू समाप्त होने के बाद सभी महानुभावों का मुस्कराकर धन्यवाद देते हुए आपको बाहर निकलना है... ।
          लगभग ऐसी ही बातें होती थीं हर प्रतियोगी पत्र-पत्रिकाओं में । पढ़ते हुए मैं कल्पना में खुद को अत्यन्त मेधावी, शालीन और व्यवहार-कुशल उम्मीदवार के रूप में पाया करता था, और किसी काल्पनिक इण्टरव्यू में पाता कि बोर्ड के अधिकारी मेरी योग्यता से बहुत प्रसन्न हैं और मेरा चयन हो गया है... ।
        मेरा सपना तब टूटता था, जब म्युनिसिपल लाइब्रेरी का चपरासी मनबोधी लाइब्रेरी बन्द होने के आठ बजे के नियत समय के पहले ही ``चलो, टाइम हो गया'' कहते हुए पत्र-पत्रिकाओं को सहेजना शुरू कर देता और छत पर धीरे-धीरे घूमते बाबा आदम जमाने के पंखों का स्विच ऑफ कर देता । इस समय मनबोधी का चेहरा अजब ढंग से मनहूसी और कड़वाहट से भरा लगता था, और वक्र । मानों यहाँ आनेवाले लोग एकदम निठल्ले और फालतू हैं जो यहाँ अपना टाइम-पास करते बैठे हैं! और कड़के इतने कि कभी कोई एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछता !
...मैं नहीं जान पा रहा था, इस समय गौरी के मन में क्या चल रहा है । सोचा, उसे अपने पढ़े हुए को बताऊँ... । पर मेरे ज्ञान बघारने से वो कहीं और नर्वस न हो जाए? उसे घर में ऐसी बातें कहता ही रहता हूँ कि वह अपना आत्म-विश्वास बढ़ाए, खुद को ज्यादा मजबूत बनाए... । तब अभी ये सब कहने का क्या तुक? मैं सहसा मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि इसका भला हो जाए, हालाँकि भगवान जैसी किसी चीज पर मेरा विश्वास बिल्कुल नहीं है, इसके बावजूद यह हो रहा था, अपने-आप ।`शटल' बहुत तेजी से दौड़ रही है... ।धड़-धड़-धड़-धड़...धड़-धड़-धड़-धड़... ।
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