गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

फरवरी 2018 से अप्रैल 2018

आलेख
छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ, लोकगीतों में लोक आकांक्षा - परंपरा की अभिव्यक्ति  - कुबेर
डॉ. पीसी लाल यादव के कविता म पीरित अउ पीरा के आरो  - यशपाल जंघेल
शोध आलेख
नरेश मेहता के उपन्यासÓ यह पथ बन्धु थाÓ में लोक सांस्कृतिक परिदृश्य के विविध रुप - शोधार्थी आशाराम साहू
Ó जमुनीÓ कहानी संग्रह में लोक जीवन और लोक संस्कृति - शोधार्थी जीतलाल
लोक गीतों में झलकती संस्कृति का प्रतीक होली - आत्माराम यादव Ó पीवÓ
  कहानी
संतगीरी - सनत कुमार जैन
अनुत्तरित - राकेश भ्रमर 
छत्तीसगढ़ी कहानी
फिरंतीन -शिवशंकर शुक्ल 
व्यंग्य
कवि, कहानी कब लिखता है - हरिशंकर परसाई   
अंग्रेजी लाल की हिन्दी - वीरेन्द्र Ó सरलÓ 
कविता/ गीत/ गजल
धरती के बेटा - पाठक परदेशी  (छत्तीसगढ़ी गीत),
धन - धन से मोर किसान - द्वारिका प्रसाद Ó विप्रÓ  (छत्तीसगढ़ी गीत)
लघुकथा
अंधी का बेटा
लघु व्यंग्य
अगले जनम मोहे कुतिया कीजो
बोध कथा
लोमड़ी की तरह नहीं, शेर की तरह बनो 

अनुत्तरित


- राकेश भ्रमर

आज फिर उसके पोते ने पूछ लिया था - बाबा, मेरे पिता कहां हैं? गिरधारी ने चौंककर अपने दस साल के पोते को देखा। उसकी मासूम आँखों में एक चमक थी,जो यह जानने के लिए उत्सुक थी कि उसका पिता कौन है ? वह कैसा दिखता है? क्या उसके जैसा ? और वह उसके साथ क्यों नहीं रहता है?
गिरधारी के पास अपने पोते के प्रश्न का उत्तर था, परंतु वह दे नहीं सकता था। देना भी नहीं चाहता था। आज शायद तीसरी या चौथी बार यह प्रश्न उसके पोते ने उससे किया था। हर बार वह इस प्रश्न को टाल जाता था, परंतु अब लग रहा था, बहुत दिनों तक वह इस प्रश्न को टाल नहीं सकता था। पोता बड़ा ही नहीं, समझदार भी होने लगा था। रिश्तों को पहचानने लगा था। उसे अपने प्रश्न का उत्तर चाहिये था।
बहू ने बताया था कि अजय दिन में कई बार उससे भी अपने पिता के बारे में पूछता रहता था। बहू के पास बहाने कम पड़ गए थे। अपने अबोध और मासूम बच्चे के सवालों से वह परेशान हो जाती थी। उसके दु:खी मन को उसके बेटे के सवाल और ज़्यादा दु:खी कर देते थे। वह खीझ जाती थी,परंतु अपने मन को कन्ट्रोल कर लेती कि गुस्से में कहीं कमजोर पड़कर बेटे के सामने सच न उगल दें।
गिरधारी ने अजय के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - बेटे, अभी तुम बहुत छोटे हो। जब बड़े और समझदार हो जाओगे तो सब कुछ बता दूँगा।
- आप मुझे बहका रहे हैं। अब मैं दस साल का हो चुका हूँ। मेरे सभी दोस्तों के पापा हैं। वह उनके साथ रहते हैं। मेरे पापा हमारे साथ क्यों नहीं रहते। न तो मम्मी कुछ बताती हैं, न आप। कोई न कोई गलत बात जरूर है, जो आप दोनों मुझसे छिपा रहे हो। वह जोर देकर कहता।
- नहीं बेटा, कोई गलत बात नहीं है। गिरधारी ने बात को खत्म करना चाहा परंतु अजय ने पैर को पटकते हुए कहा - आप चाहे न बताओ, परंतु मुझे पता चल चुका है कि मेरे पापा ने दूसरी मम्मी कर ली है।
गिरधारी का दिल धक् से रह गया। जो बात वह अजय से छिपाना चाहता था, उसे किसी ने उससे कह दी थी। किसी पड़ोसी ने ही बताया होगा ? मोहल्ले में सबको पता था। अब वह क्या करे ? कैसे अजय की जिज्ञासा को शांत करे। कुछ सोचकर उसने कहा - बेटा यह सच नहीं है। तुम्हारे पापा शहर कमाने गए थे। परंतु फिर अचानक पता नहीं कहां चले गये। उनका पता नहीं चल रहा है। मैंने बहुत खोजा परंतु पता नहीं चला।
- आप झूठ बोल रहे हैं ? अजय ने हाथ - पैर झटकते हुए कहा।
- न बेटा! तू गुस्सा मत कर! छोटा है, इसीलिए तुझसे सच्चाई नहीं बताई। कुछ दिन धीरज रख। फिर तुझसे सारी बात बता दूँगा।
उसने किसी तरह अजय की जिज्ञासा को शांत किया और उसको खेलने के लिए बाहर भेज दिया। फिर घर के बाहर पड़ी चारपाई पर लेट गया। पुरानी यादों के जख्म उभर आए थे।
गिरधारी की पत्नी की असमय मृत्यु कॉलरा से हो गयी। उसकी एक बड़ी बेटी और छोटा बेटा था। सोलह और तेरह वर्ष के। वह कोई चालीस साल का था तब। बेटी आठवीं पास करके घर बैठी थी और बेटा सातवीं का इम्तहान देकर आठवीं कक्षा में गया था।
पत्नी की मौत के बाद गिरधारी की बुद्धि जैसे कहीं गुम हो गयी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि घर को कैसे संभाले। बेटी और बेटा इतने परिपक्व नहीं हुए थे कि घर की या खुद की जिम्मेदारियों का स्वयं निर्वहन कर सकें।
ऐसी कठिन परिस्थितियों में न केवल नाते - रिश्तेदार, बल्कि गाँव वाले भी उसे यही सलाह देने में लगे थे कि उसे किसी विधवा या परित्यक्ता से विवाह कर लेना चाहिए। बिना गृहणी के घर बिगड़ जाता है। लोग उसे समझाते परंतु जैसे वह कुछ समझ ही नहीं रहा था।
गिरधारी चाहे कुछ निर्णय लेने में असमर्थ था परंतु इतनी समझ उसमें थी कि दूसरे ब्याह से घर में अक्सर मुसीबतें ज़्यादा आती हैं, खुशियां कम। विमाता पहले पति के बच्चों को असली मां का प्यार नहीं दे पाती और बच्चे भी दूसरी मां को अपनी मां मानने को जल्दी तैयार नहीं होते। इसलिए लोगों के समझाने के बाद भी वह अपने मन को दूसरी शादी के लिए तैयार नहीं कर पाया।
वह खुद अपने बच्चों के लिए मां बन गया। सुबह - शाम खाना बनाना, दिन में खेतों में काम करना, घर - बाजार करना, आदि। अपने बच्चों को खुशियां और सुख देने के लिए वह मशीन बन गया। पत्नी की मृत्यु के बाद उसके मुख पर हंसी के चिह्न लगभग गायब हो गये थे परंतु अपने बच्चों का पालन करके उसे असीम खुशी होती थी। अब वह उनके साथ ऐसे हंसता - बोलता था जैसे उसके घर में कभी किसी की मृत्यु नहीं हुई थी। बेटी भी इतनी बड़ी हो चुकी थी कि उसने जल्द ही चूल्हा - चौका संभाल लिया।
बेटी अठारह की हुई तो उसे उसकी शादी की चिंता हुई। गाँव के रिवाज के अनुसार वह शादी के लायक हो चुकी थी परंतु उसकी शादी के बाद घर में फिर से संकट के बादल उमड़ने वाले थे। बेटा दसवीं कक्षा में पढ़ रहा था। उसकी शादी करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।
- बेटी पराया धन होती है। उसे जितनी जल्दी उसके घर भेज दिया जाय, उतना ही अच्छा होता है। जैसी पुरातन कहावत पर अमल करते हुए गिरधारी ने अपनी बेटी को ससुराल रवाना कर दिया। घर में केवल दो पुरुष प्राणी रह गये - वह और उसका बेटा। उसके कुछ हितैषी दोस्तों और रिश्तेदारों ने उसे फिर से नेक सलाह दी कि किसी संतानहीन विधवा औरत को घर बिठा ले। परंतु उसके दिल ने इस सलाह को गवारा नहीं किया। बेटा अब इतना छोटा नहीं रहा था। अपनी जिम्मेदारी संभाल रहा था। रही बात चूल्हे - चौके की तो गिरधारी खुद ही कर लेता था। पहले भी करता था, अब भी करता था।
बेटे ने इण्टरमीडिएट किया तो रिश्तेदार दौड़ - दौड़ कर अपनी बेटियों के रिश्ते लेकर आने लगे। कई तरफ  से दबाव भी पड़ा। भई, घर को बिना औरत के नहीं छोड़ा जाता, बर्बाद हो जाता है।
गिरधारी सोच में पड़ गया। लड़का अभी अठारह का ही हुआ था। लोग कहते थे कि लड़के की शादी की जायज उम्र 21 वर्ष होती है, परंतु इस देश में कायदे - कानून का पालन शायद ही कभी कोई करता है। एक रिश्तेदार कुछ ज्यादा ही दबाव डाल रहा था। सीधे स्वभाव का गिरधारी भी झुक गया। बिना आगा पीछा सोचे उसने संजीव की शादी रिश्तेदार की बेटी से कर दी। संजीव ने भी तब कोई आपत्ति नहीं की थी। शादी की, पत्नी के साथ कुछ दिन भी बिताये। जिसका नतीजा यह अजय था। इसी बीच उसने डिग्री कॉलेज में आगे की पढ़ाई के लिए एडमीशन ले लिया था।
बेटे ने बी.ए. कर लिया। तब तक सब ठीक था। वह घर आता था, बीवी से बात करता था। एक साल बाद उसके बेटा हुआ था। उसे भी प्यार करता था। परंतु जैसे ही उसकी नौकरी लगी और वह आगरा गया, तभी से पता नहीं कैसे उसका मन बदल गया। किसी को पता भी नहीं चला। नौकरी के एकाध - साल तक उसने घर की खोज - खबर ली। कुछ पैसे भी भेजे, परंतु उसके बाद पूरी तरह से सम्बंध विच्छेद कर लिया, जैसे वह दुनिया में अनाथ था और उसके न तो बाप था न बेटा और बीवी।
घर में खाने - पीने की किल्लत नहीं थी। गिरधारी एक मंझोले कद का किसान था। खेती अच्छी होती थी, पर इस सबका क्या फायदा ? जब घर में एक जवान औरत बैठी हो और उसका पति उसे छोड़कर दूसरे शहर में जा बसा हो। बेटे का भी ख्याल न रखता हो।
प्रभा कुछ कहती तो न थी परंतु रात में चुपके - चुपके रोती थी। गिरधारी बहू का दर्द समझता था, परंतु वह उसका दर्द दूर नहीं कर सकता था। बेटे को कितनी चि_ियां लिखीं परंतु किसी का कोई जवाब नहीं आया। ऑफिस का फोन नंबर पता करके फोन करवाये, परंतु वह कभी फोन लाइन पर नहीं आया। कोई न कोई बहाना बनाकर टाल गया। गिरधारी समझ गया, कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है। ऐसे कोई बेटा अपने परिवार से विमुख नहीं होता। उसने ऑफिस के लोगों पूछा। परंतु कोई कुछ सही ढंग से जानकारी नहीं दे पाया। क्या पता बेटे ने ऑफिस के लोगों को कोई पट्टी पढ़ा रखी हो।
अजय बड़ा हो रहा था। अभी तक उसने बाप के बारे में कुछ नहीं पूछा था, परंतु वह सदा अबोध नहीं बना रहेगा। एक न एक दिन बड़ा और समझदार होगा। तब क्या अपने बाप के बारे में नहीं पूछेगा। वह और प्रभा तब उसे क्या जवाब देंगे ?
बहू को एक शंका थी। उसने ससुर से कहा - लगता है, उन्होंने दूसरा ब्याह कर लिया है।
- तुम कैसे कह सकती हो? गिरधारी का मन नहीं माना।
- जब वह कॉलेज पढ़ने गए थे, तभी से कहने लगे थे - पता नहीं मैंने तुमसे शादी करने के लिए कैसे हाँ कह दी। बापू को भी जल्दी पड़ी थी। पढ़ - लिखकर नौकरी करता, तब मैं पढ़ी - लिखी सुंदर लड़की से शादी करता। मेरे साथ ऐसी सुंदर लड़कियां पढ़ती हैं कि तुम उनके सामने पानी भरती नजर आओगी। कभी कहते - तुम्हारे जैसी अनपढ़ - गंवार बीवी के साथ कैसे जिन्दगी गुजरेगी ? मेरा बस चले तो छोड़कर दूसरी शादी कर लूँ। इसीलिए मुझे लगता है, नौकरी मिलने के बाद उन्होंने झूठ बोलकर दूसरी शादी कर ली होगी, वरना घर क्यों न आते। हमारा ख्याल क्यों न करते।
गिरधारी को कुछ न सूझा। हताश भाव से बोला - बताओ बहू, मैं क्या करूँ?
- क्यों न एक बार आगरा जाकर पता करके आओ।
- उसका पता कहां है ?
- ऑफिस का नाम तो मालूम है। वहां से सब पता चल जाएगा।
गिरधारी को बहू की बात जंच गयी। दूसरे दिन ही गिरधारी आगरा के लिए रवाना हो गया। पहले बस से लखनऊ आया। रेलवे स्टेशन पर गया तो पता चला आगरा की गाड़ी रात को है। वह प्लेटफार्म पर इंतजार करता रहा।
दूसरे दिन सुबह - सवेरे ही वह आगरा पहुंच गया था। शहर आने का उसका यह पहला अनुभव था। स्टेशन पर ही पूछकर उसने हाथ - मुंह धो लिया था, फिर पूछता - पूछता वह इनकम टैक्स दफ्तर पहुंचा। संजीव वहीं पर क्लर्क था।
दफ्तर बंद था। वह गेट के पास बैठ गया। नौ बजे के लगभग एक चपरासी आया तो उसने उसी से पूछा - भैया, संजीव बाबू यहीं काम करते है?
- हां, आप कौन हैं ?
गिरधारी को संकोच हुआ, फिर मन को कड़ा करके सच बात बोल दी - मैं उसका बाप हूँ।
चपरासी चौंका। घूरकर गिरधारी की तरफ  देखा। पूछा - क्या कहा ? आप उनके बाप हैं ? ऐसा कैसे हो सकता है। ऑफिस में सबको पता है कि संजीव बाबू के माँ - बाप नहीं हैं। किसी रिश्तेदार ने उनको पाल - पोसकर बड़ा किया और पढ़ाया - लिखाया। तभी तो उनकी शादी में उनकी तरफ  का कोई रिश्तेदार नहीं आया था। सच बताओ, आप कौन हो?
- शादी ...! गिरधारी चौंका - क्या संजीव ने शादी कर ली?
- हां, पिछले साल ही तो हुई है, हमारे ऑफिस के बड़े बाबू की बेटी के साथ ... हाँ, आपने बताया नहीं, आप कौन हैं।
गिरधारी क्या बताता, वह कौन था ? उसकी आत्मा मर चुकी थी। बस शरीर में जान थी। अब संजीव से मिलने का क्या औचित्य था? उसने तो जीते - जी अपने बाप को मार दिया था। जब उसके लिए सगा बाप कोई नहीं था तो बीवी और बेटा को क्यों मानता ? अब तो उसने दूसरी शादी भी कर ली थी। बाप, बेटे और पत्नी के लिए अगर उसके मन में कोई प्यार, स्नेह और ममता होती तो दूसरी शादी ही क्यों करता? दफ्तर के लोगों से झूठ क्यों बोलता।
संजीव से मिलकर क्या करेगा अब ? मिलने से बात बढ़ेगी। लड़ाई - झगड़ा होगा। बात थाने और कोर्ट कचहरी तक जाएगी? मुकदमा चलेगा। क्या पता संजीव की नौकरी ही न चली जाए। वह स्वयं दु:ख उठा सकता था, परंतु बेटे को मुसीबत में नहीं डाल सकता था। रही बात प्रभा और अजय की तो वह उनको अपनी बहू और बेटे की तरह पालेगा। उसे भी तो अपने बुढ़ापे का सहारा चाहिए।
वह बाहर जाने के लिए मुड़ा, तो चपरासी ने फिर पूछा - कहां जा रहे हो बाबा! क्या संजीव बाबू से मिलकर नहीं जाओगे?
- मैं बाद में आ जाऊंगा! उसने बिना मुड़े हुए कहा।
- उनको क्या बता दूँ ?
- बता देना कि उसका वही रिश्तेदार आया था, जिसने उसे पाल - पोसकर बड़ा किया। पढ़ा - लिखाया और इस लायक बनाया कि वह अपनी मर्जी से अपना घर - परिवार बसा सके।
उसने यह नहीं देखा कि चपरासी के मुख पर क्या प्रतिक्रिया थी।
घर लौटकर उसने सारी बात प्रभा को बताई तो वह न रोई न गायी। बस इतना ही कहा - मुझे यही शक था।
- अब तुम क्या करोगी?
- कुछ नहीं बापू, मेरा एक बेटा है, इसे ही पाल - पोसकर बड़ा करूंगी।
गिरधारी ने उसका मन टटोलने के लिए पूछा - बहू तुम जवान हो। बड़ी लंबी उम्र पड़ी है। आगे कैसे करोगी?
- बापू, आप उसकी चिंता न करें। अगर आप मुझे जगह देंगे, तो यहीं पड़ी रहूंगी। आपकी सेवा करूंगी।
- बहू, कैसी बातें करती हो। तुम मेरी बहू हो। मैं तुम्हें क्यों घर से निकालूंगा। बेटा नालायक है तो इसमें बहू - पोते का क्या दोष? उनकी जिन्दगी मैं क्यों बर्बाद करूंगा? मैं तो इसलिए पूछ रहा था कि बिना पति के तुम कैसे गुजारा करोगी। अगर तुम दूसरा ब्याह करना चाहो तो मैं रोड़ा नहीं बनूंगा।
- बापू, न तो मैं विधवा हुई हूँ, न मेरे पति ने मुझे तलाक दिया है। बस मुझे छोड़कर अलग घर बसा लिया है। मैं अभी भी इस घर की बहू हूँ।
- बहू, तुम समझदार हो, जैसा उचित समझो, करो।
तब से लगभग आठ - नौ साल बीत गए हैं। संजीव ने कभी अपने बाप बेटे और पत्नी की खबर नहीं ली। गिरधारी ने इसकी परवाह नहीं की। बहू और पोते के साथ जीवन - यापन करता रहा। परंतु अब अजय बड़ा हो गया था। वह अपने बाप के बारे में सवाल करने लगा था।
गिरधारी मानसिक रूप से परेशान था। अजय के सवालों का जवाब उसे एक न एक दिन देना ही होगा। वह स्कूल में पढ़ रहा है। कल को कॉलेज जाएगा। जगह - जगह उससे पिता का नाम पूछा जाएगा। कागजातों, फार्मों में लिखवाया जायेगा, तब क्या उसके मन में यह सवाल नहीं उठेगा कि उसका पिता अगर जिन्दा है, तो कहां है ? कब तक वह मन के सवालों को मन के अंदर ही दबाकर रखेगा।
अजय अभी तक बाहर से खेलकर नहीं आया था।
गिरधारी ने तय किया, इस सवाल का उत्तर अभी खोजना होगा, वरना दिन ब दिन यह कैन्सर की तरह बढ़ता ही रहेगा। फिर इसका जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।
उसने बहू से बातचीत की - बहू, अब तो पानी सर से ऊपर होने लगा है। अजय की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है। वह रोज - रोज पिता के बारे में पूछता है। मेरी समझ में नहीं आ रहा है, उसे क्या जवाब दूँ।
- बापू, मैं भी उसके सवालों से बहुत परेशान हो गयी हूँ। दिन तो किसी तरह कट जाता है, परंतु रात में जब तक नींद नहीं आती। खोद - खोदकर पिता के बारे में पूछता रहता है। कहां तक बहाने बनाऊँ ?
- मेरी भी समझ में नहीं आता, उसको कैसे चुप कराऊँ। गाँव के लोग भी उसके कान में तरह - तरह की बातें भरते रहते हैं। सच्चाई को छुपाना हमारे लिए मुश्किल है।
- तो फिर क्या करें ?
- यहीं तो मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है। गिरधारी ने हाथ मलते हुए कहा।
बहू ने कहा - क्यों न हम उसे सच्चाई बता दें?
- बता दें, तब क्या वह अपने बाप से मिलने की जिद्द नहीं करेगा।
- हाँ, वह तो करेगा।
- तो फिर ...।
- बापू, मेरी मानो तो अब कहानी को खत्म ही कर दो। उसे ले - जाकर एक बार उसके बाप से मिला दो। उसकी समझ में बात आ जाएगी।
- परंतु क्या वह अपने बेटे से मिलेगा?
- नहीं मिलेगा तो और अच्छी बात है। अजय को असलियत का पता तो चल जाएगा। बहू ने दृढ़ स्वर में कहा।
- तुम भी साथ चलोगी।
- नहीं, मैं उनका मुंह नहीं देखना चाहती। प्रभा के स्वर में तल्खी के साथ नफरत भी थी। गिरधाारी उसके मन की दशा समझ सकता था। बिना किसी गल्ती के कोई मर्द अगर अपनी पत्नी को बेसहारा छोड़ दे, तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी। यह केवल वही औरत समझ सकती थी। गिरधारी ख़ुद अपने बेटे से नहीं मिलना चाहता था परंतु मजबूरी थी। पोते के लिए उसे अपने बेटे से मिलने के लिए जाना ही पड़ेगा।
गिरधारी ने जब पोते को बताया कि कल वह दोनों उसके पिता से मिलने जा रहे हैं तो अजय की खुशी का ठिकाना न रहा। वह खुशी के अतिरेक में किलकारी मारकर उछलने - कूदने लगा। गिरधारी उसकी खुशी देखकर पहले तो हल्के से मुस्कराया, फिर उदास हो गया। प्रभा घूँघट की ओट में अपने आँसू पोंछने लगी। अजय की यह खुशी क्या सदा ऐसी ही रहेगी, या गरीब की खुशी की तरह जल्द ही तिरोहित हो जाएगी।
अजय ने पूछा - पापा कहाँ रहते हैं ?
- आगरा में! गिरधाारी ने उसे सब कुछ बता देना उचित समझा।
- वह हमसे मिलने क्यों नहीं आते ?
- वह पापा से ही पूछ लेना। हम लोग कल उनसे मिलने चलेंगे।
रात भर उसे नींद न आई। माँ से बार - बार पूछता रहा - मम्मी, पापा क्या हम सबसे नाराज हैं, जो हमसे मिलने नहीं आते। हम लोग उनके साथ क्यों नहीं रहते ? आप क्या कभी आगरा गयी हैं ? आदि -आदि। अजय के सवालों का अंत नहीं था और प्रभा दु:ख के सागर में डूब - उतरा रही थी। वह आने वाले दिनों के बारे में सोच रही थी। क्या उसका पति अजय को अपना बेटा मानेगा? उसे प्यार देगा? उसे सन्देह था। अजय का पापा से मिलन कहीं दु:खद संयोग में न बदल जाय।
गिरधारी अगले दिन ही अजय को लेकर आगरा के लिए निकल पड़ा। इस बार उसे ज़्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ी। बस और ट्रेन के सफर की उसे जानकारी थी। अंतर बस इतना था ही अब की बार आठ - नौ साल बाद जा रहा था। इतने वर्षों में मनुष्य के अंदर बहुत परिवर्तन आ जाते हैं। प्रकृति में बदलाव आ जाता है। वह स्वयं बूढ़ा हो चुका था।
पूरे रास्ते अजय बड़े - बड़े मकानों और पीछे भागते पेड़ों के बारे में तरह - तरह के सवाल करता रहा। गिरधारी यथासंभव उनके जवाब देता रहा। रात में ट्रेन में भी वह बहुत थोड़ा ही सोया। उसे अपने पिता से मिलने की बहुत जिज्ञासा और उत्सुकता थी।
सुबह स्टेशन पर ही फारिग हो लिए थे। इतिहास स्वयं को दोहरा रहा था। गिरधारी को अपनी पहली आगरा यात्रा की यादें कचोट रही थीं। पिछली बार वह बेटे से बिना मिले लौट आया था। इस बार ऐसा नहीं कर सकता था। उसे संजीव से मिलना ही पड़ेगा। अजय को जो उससे मिलाना था।
इस बार भी वह दफ्तर बहुत जल्दी पहुंच गया था। वह दोनों सड़क पर टहलते रहे। जब चपरासी आया, तब भी गिरधारी ने उसे नहीं टोंका। बस बाहर से आकर गेट के अंदर लॉन में बैठ गया था। चपरासी अंदर चला गया था।
साढ़े नौ बजे के लगभग कर्मचारी और अधिकारी आने लगे थे। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य व्यक्ति भी अपने काम से गेट के अंदर प्रवेश कर रहे थे। गिरधारी एक - एक व्यक्ति को गौर से देख रहा था। वह चाहता था, संजीव से बाहर ही मुलाकात हो जाये। दफ्तर के लोगों के बीच में संजीव शायद उसे पहचानने से ही इंकार कर दे और उसके ऊपर चीखने - चिल्लाने लगे। वह कोई हंगामा खड़ा नहीं करना चाहता था।
दस बजे के लगभग एक मोटरसाइकिल गेट के अंदर आई। उस पर बैठा व्यक्ति उसे जाना - पहचाना लगा। उसने गौर से देखा। वह संजीव ही था। थोड़ा मोटा हो गया था। अपने जीवन से सुखी लग रहा था। बिल्डिंग के एक तरफ संजीव अपनी मोटर साइकिल खड़ा कर रहा था। तभी गिरधारी अजय का हाथ पकड़े उसके पीछे पहुंचा और धीमें स्वर में पुकारा - संजीव बेटा!
संजीव चौंका, पलटा और गिरधारी को देखकर उसके चेहरे पर ऐसे भाव आए, जैसे उसने भूत देख लिया हो। उसके मुँह से तत्काल कोई आवाज नहीं निकली। मुँह खुला रह गया। गिरधारी को देखने के बाद उसने उसके साथ खड़े अजय को देखा और एकबारगी लगा जैसे वह अपने बेटे को पहचान गया था, परंतु फिर तत्क्षण उसके चेहरे के भाव बदल गए। आश्चर्य की जगह उसके चेहरे पर विरक्ति और घृणा के भाव उपज आए। वह तल्खी से बोला - यहां क्या करने आए हैं? क्या कोई तमाशा। उसने अपने बाप के पांव तक नहीं छुए।
- तमाशा? गिरधारी ने भी उतनी ही तल्खी के साथ कहा - वह भी भरा हुआ बैठा था - मैं तमाशा खड़ा करने आया हूँ। बेटा, मैं तुम्हारा बाप हूँ। तुम्हें पाल - पोसकर बड़ा करने और पढ़ाने - लिखाने में मैंने जो कष्ट उठाये हैं, वह तुम क्या महसूस करोगे। मैं तुम्हें कोई कष्ट देने नहीं आया हूँ। यहीं करना होता तो कब का अदालत में जाकर तुम्हें दूसरी शादी के जुर्म में जेल भिजवा देता। नौकरी से हाथ धोते वह अलग से ... इसका कोई अहसास तुम्हें नहीं है। उल्टे मुझे ही दोष दे रहे हो। अरे बेटा, मैं तो कभी यहां नहीं आता लेकिन मजबूरी में आना पड़ा। यह तुम्हारा बेटा है। उसने अजय की तरफ देखकर कहा। - यह बड़ा होकर तुम्हारे बारे में सवाल करने लगा तो मजबूरन इसे तुम्हारे पास लेकर आना पड़ा। मुझे तो तुम्हें बेटा कहने में भी शर्म आती है। कहते - कहते वह हांफने लगा था, जैसे मीलों दौड़कर आया हो।
गिरधारी का लंबा -चौड़ा व्याख्यान सुनकर संजीव की रूह कांप गयी। उसके चेहरे पर भय और खौफ  के चिह्न स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे। उसने भयभीत निगाहों से अपने इर्द - गिर्द देखा। शुक्र था कि कोई उन्हें नहीं देख रहा था। संजीव ने हड़बड़ाकर कहा - आओ, बाहर चाय की दुकान पर बात करते हैं। और वह बिना देखे कि वह दोनों पीछे आ रहे हैं या नहीं। गेट से बाहर निकल गया। गिरधारी भी अजय का हाथ पकड़े - पकड़े बाहर की तरफ  चल पड़ा।
अजय की समझ में नहीं आ रहा था कि वहां क्या हो रहा था। वह तो सोच रहा था, उसका पापा उसे देखते ही गोद में उठा लेगा। उसकी चुम्मी लेगा। प्यार करेगा और वह उसकी गोद में चिपक जाएगा। फिर उतरेगा ही नहीं, परंतु वहां तो ऐसा कुछ नहीं हुआ था। उसका नन्हा दिल रुआंसा - सा हो गया था।
सड़क पर गुमटीनुमां चाय की कई दुकानें थीं। संजीव एक चाय की दुकान के बाहर पड़ी बेंच पर बैठ गया। गिरधारी से कहा - कुछ खाया - पीया कि नहीं। फिर उसने चायवाले को चाय और टोस्ट का ऑर्डर दिया।
गिरधारी खड़ा ही रहा। बोला - हम यहां खाने - पीने नहीं आए हैं, न कोई सवाल - जवाब करने कि तुमने अपने बाप - बीवी और बच्चे को क्यों त्याग दिया और क्यों दूसरा घर बसा लिया ? मैं तो बस इसलिए आया हूँ कि यह तुम्हारा बेटा है। इससे प्यार के दो शब्द बोल सको तो बोल दो। फिर हम चले जाएंगे और दुबारा नहीं आएंगे।
संजीव ने गिरधारी की बात पर ध्यान न देते हुए कहा - इसमें सारा दोष तुम्हारा है। या तो तुम मुझे कॉलेज तक पढ़ाते नहीं और अगर पढ़ाना था तो जल्दी शादी न करते। तुमको क्या पता, कॉलेज में मेरे साथ पढ़ने वाले सभी लड़के कुंवारे थे और मैं अकेला शादीशुदा। मुझे उनके बीच में कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी। और कॉलेज की लड़कियां, वो भी मेरा मजाक उड़ाती थीं। दूसरे लड़कों से दोस्ती करतीं, और मुझसे दूर भागतीं। मेरे मन में हीनभावना घर करती गयी।
- तो अपनी हीन भावना दूर करने के लिए तुमने दूसरी शादी कर ली।
- शायद यही कारण रहा हो। अब मैंने नई दुनिया बसा ली है। मेरा घर परिवार है, दो बच्चे हैं। मैं अपने बीवी - बच्चों के साथ सुखी हूँ।
- मैं भी तो तुम्हारा बाप हूँ। बिना बाप के कोई बेटा नहीं होता। यह भी तुम्हारा बेटा है जो तुम्हारी बांहों में झूलने के लिए मचलता है। तुम्हारे प्यार के दो बोल सुनने के लिए तरसता है। इसी जिद्द पर मैं इसे तुमसे मिलाने के लिए लाया था परंतु लगता है तुम पत्थर हो गए हो। और वह जो घर में बैठी है, वह तुम्हारी ब्याहता है। सारी उमर रहेगी। तुम भले ही सब कुछ तोड़ दो, परंतु खून का रिश्ता कभी नहीं टूटता है। तुमने कभी अपने मन की बात कही होती तो कोई अच्छा रास्ता भी निकल सकता था, परंतु नहीं लगता है, मेरे ही पालने - पोसने में कोई कमी रह गयी थी। अब हम चलते हैं परन्तु चलते - चलते तुमसे एक विनती है। यह तुम्हारा बेटा है। हमसे कितने भी नाराज हो, परंतु अजय के सिर पर एक बार हाथ तो फेर हो सकते हो।
संजीव ने एक बार अजय की तरफ  देखा। वह आँखों में चाहत की आशा लिए अपने बाप की तरफ  देख रहा था। संजीव ने अपना सिर नीचा कर लिया, परंतु अजय की तरफ  उसके हाथ नहीं उठे।
गिरधारी समझ गया। उसने कहा - चलो बेटा। और अजय का हाथ थामकर एक तरफ चल दिया। उसका हृदय चकनाचूर हो गया था। लड़के बिगड़ जाते हैं, मां - बाप से जुदा हो जाते हैं, परन्तु मां - बाप नालायक से नालायक बेटे को भी घर से नहीं निकालते। यहां तो संजीव ने एक अलग ही मिसाल कायम की थी।
गिरधारी के पैर मन - मन के हो रहे थे। इस सारे घटनाक्रम पर अजय एक बार भी नहीं बोला था। पता नहीं वह कितनी बात समझा था, कितनी नहीं। परंतु वह बिल्कुल खामोश था जैसे उसके दिल को बहुत बड़ा सदमा पहुँचा था।
चलते - चलते गिरधारी ने अजय के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा - बेटा, जब तुम बड़े हो जाओगे। तब अपने पापा से मिलने आना। तब वह तुमसे जरूर प्यार से मिलेंगे। अभी हम से नाराज हैं न! इसलिए तुमसे बात नहीं की।
अजय अचानक रुक गया। गिरधारी भी रुका। अजय ने चेहरा ऊपर उठाकर अपने बाबा की तरफ  देखा। अजय की आँखों न जाने कैसे भाव थे, जिन्हें गिरधारी ठीक से समझ नहीं पाया ... नफरत, क्रोध या वितृष्णा के ... परंतु अजय की बात उसे बहुत स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी .... बाबा, अब और कितना झूठ बोलोगे मुझसे। मेरा बाप मर चुका है।
गिरधारी सन्न् रह गया।

अगले जनम मोहे कुतिया कीजो

- शिवराज गूजर

हे भगवान कौन से जन्मों के पापों की सजा दे रहा है मुझे ? यह गंदगी भी मेरी छाती पर ही छोड़नी थी। पूरा घर गंदगी से भर दिया इस बुढ़िया ने।
बीमार सास को गालियां देते हुए नाक बंद कर घर में घुसती मिसेज शर्मा नौकरानी पर चिल्लाई - कांताबाई! अरी कहां मर गई तू भी।
तभी बगल वाले कमरे से आई सास ने पीछे से कुर्ता खींचते हुए  पुकारा -बहू!
- हट बुढ़िया दूर रह, अभी फिर से नहाना पड़ेगा मुझे।
सास को धक्का देते हुए मिसेज शर्मा बोली, तभी नौकरानी पर नजर पड़ी। कांताबाई! यह तो दिन भर गंदगी करेगी,तू तो साफ  कर दिया कर।
अभी और कुछ कहती, उससे पहले ही कांताबाई बोली - लेकिन मालकिन आज तो मांजी ने कुछ भी गंदगी नहीं की। एक दो बार हाजत हुई भी थी तो मुझे बुला लिया था तो मैं टॉयलेट में करा लाई थी।
- तो फिर यह गंदगी ?
- अपने डॉगी को दस्त लग गए हैं।
- अरे बाप रे मेरा बेटू। क्या हो गया उसे।
मिसेज शर्मा चीखती सी बोली। तभी चूं चूं करता डॉगी उनके पास आ गया। मिसेज शर्मा उसे पुचकारते हुए उसके पास बैठने लगी तो कांताबाई बोली - मालकिन कपड़े गंदे हो जाएंगे।
- अरे हो जाने दे, कपड़े कोई डॉगी से बढ़कर है क्या? कहते हुए मिसेज शर्मा वहीं बैठ गई और डॉगी पर हाथ फेरने लगी। अब कमरे से गंदगी और बदबू गायब हो चुकी थी। दूर से यह सब देख रही साथ डॉगी की किस्मत से रश्क कर रही थी। शायद भगवान से दुआ मांग रही थी -अगले जनम मोहे कुतिया ही कीजो।

धन धन रे मोर किसान

द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र

धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

तीन हाथ के पटकू पहिरे, मूड़ म बांधे फरिया
ठंड गरम चउमास कटिस तोर, काया परगे करिया
अन्न कमाये बर नई चीन्हस, मंझन, सांझ, बिहान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

तरिया तिर तोर गांव बसे हे, बुड़ती बाजू बंजर
चारो खूंट मां खेत खार तोर, रहिथस ओखर अंदर
रहे गुजारा तोर पसू के खिरका अउ दइहान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

बड़े बिहनिया बासी खाथस, फेर उचाथस नांगर
ठाढ़ बेरा ले खेत जोतथस, मर मर टोरथस जांगर
तब रिगबिग ले अन्न उपजाथस, कहाँ ले करौं बखान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

तैं नई भिड़ते तो हमर बर कहाँ ले आतिस खाजी
सबे गुजर के जिनिस ला पाथन, तैं हस सबले राजी
अपन उपज ला हंस देथस, सबो ला एके समान।
धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान।
मैं तो तोला जांनेव तैं अस,भुंइया के भगवान।।

धरती के बेटा

पाठक परदेशी

तन बर अन्न देवइया, बेटा धरती के किसान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
सरदी, गरमी अऊ बरसा,
नई चिनहस दिन राती।
आठों पहर चिभिक काम म
हाथ गड़े दूनों माटी॥
मुंड म पागा, हाथ तुतारी, नांगर खांध पहिचान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
कतको आगू सुरूज उवे के,
पहुंच खेत म जाथस।
सुरूज बुड़े के कतको पाछू,
घर कुरिया म आथस॥
तोरे मेहनत के हीरा - मोती चमके खेत खलिहान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
जांगर टोर कमइयां तोर,
बर नइये कभू आराम कहूं।
लहलहावय पीके पछीना,
कोदो कुटकी, धान गहूं॥
डार तन, मन डार हे थोरको नइये अभिमान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥
हाथ म देथस हाथ तहीं,
जब कोनों सहकारी मांगय।
तोरे उदिम, लोगन मन म,
भाव सहकार के जागय॥
मुचमचा थे जिनगी, सोनहां होथे सांझ बिहान।
तोरे करम ले होथे, अपने देश के उत्थान॥

डाईट कबीरधाम

अंधी का बेटा

एक औरत थी, जो अंधी थी। जिसके कारण उसके बेटे को स्कूल में बच्चे चिढाते थे कि अंधी का बेटा आ गया। हर बात पर उसे ये शब्द सुनने को मिलता था कि अन्धी का बेटा। इसलिए वह अपनी माँ से चिड़ता था। उसे कही भी अपने साथ लेकर जाने में हिचकता था उसे नापसंद करता था।
उसकी माँ ने उसे पढ़ाया और उसे इस लायक बना दिया की वह अपने पैरो पर खड़ा हो सके। लेकिन जब वह बड़ा आदमी बन गया तो अपनी माँ को छोड़ अलग रहने लगा।
एक दिन एक बूढ़ी औरत उसके घर आई और गार्ड से बोली - मुझे तुम्हारे साहब से मिलना है। जब गार्ड ने अपने मालिक से बोल तो मालिक ने कहा कि बोल दो मैं अभी घर पर नही हूँ। गार्ड ने जब बुढ़िया से बोला कि वह अभी नही है ... तो वह वहां से चली गयी!!
थोड़ी देर बाद जब लड़का अपनी कार से ऑफिस के लिए जा रहा होता है तो देखता है कि सामने बहुत भीड़ लगी है और जानने के लिए कि वहां क्यों भीड़ लगी है वह वहां गया तो देखा उसकी माँ वहां मरी पड़ी थी।
उसने देखा की उसकी मु_ी में कुछ है उसने जब मु_ी खोली तो देखा की एक लेटर जिसमें यह लिखा था कि बेटा जब तू छोटा था तो खेलते वक्त तेरी आँख में सरिया धंस गयी थी और तू अँधा हो गया था तो मैंने तुम्हे अपनी आँखे दे दी थी।
इतना पढ़ कर लड़का जोर - जोर से रोने लगा। उसकी माँ उसके पास नहीं आ सकती थी।
दोस्तों वक्त रहते ही लोगों की वैल्यू करना सीखो। माँ - बाप का कर्ज हम कभी नहीं चूका सकते। हमारी प्यास का अंदाज भी अलग है दोस्तों, कभी समंदर को ठुकरा देते हंै, तो कभी आंसू तक पी जाते है ..!!!
बैठना भाइयों के बीच,
चाहे बैर ही क्यों ना हो,
और खाना माँ के हाथो का,
चाहे जहर ही क्यों ना हो...!!

लोमड़ी की तरह नहीं, शेर की तरह बनो

एक बौद्ध भिक्षु भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां चुन रहा था कि उसने कुछ अनोखा देखा। उसने एक बिना पैरों की लोमड़ी देखी जो ऊपर से स्वस्थ दिख रही थी। उसने सोचा कि आखिर इस हालत में ये लोमड़ी जिन्दा कैसे है
वह अपने विचारो में खोया था कि अचानक हलचल होने लगी। जंगल का राजा शेर उस तरफ  आ रहा था। भिक्षु भी तेजी से एक पेड़ पर चढ़ गया और वहां से देखने लगा।
शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ  बढ़ रहा था। उसने लोमड़ी पर हमला नहीं किया, बल्कि उसे खाने के लिए मांस के टुकड़े भी दे दिए। भिक्षु को यह देखकर और भी आश्चर्य हुआ कि शेर लोमड़ी को मारने की बजाय उसे भोजन दे रहा है।
भिक्षुक बुदबुदाया। उसे अपनी आँखों पर भरोसा नही हो रहा था। इसलिए वह अगले दिन फिर वहीं गया और छिप कर शेर का इंतजार करने लगा। आज भी वैसा ही हुआ। भिक्षुक बोला कि यह भगवान के होने का प्रमाण है। वह जिसे पैदा करता है, उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है। आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी ऊपर वाले की दया पर जिऊंगा। वही मेरे भोजन की व्यवस्था करेगा।
यही सोचकर वह एक वीरान जगह जा के बैठ गया। पहले दिन बिता। कोई नहीं आया। दूसरे दिन कुछ लोग आए पर किसी ने भिक्षुक की ओर नहीं देखा। धीरे - धीरे उसकी ताकत खत्म हो रही थी। वह चल - फिर भी नहीं पा रहा था। तभी एक महात्मा वहां से गुजरे और भिक्षु के पास पहुँचे।
भिक्षु ने अपनी पूरी कहानी महात्मा को सुनाई और बोला - आप ही बताए कि भगवान मेरे प्रति इतना निर्दयी कैसे हो गया ? किसी को इस हालात में पहुंचाना पाप नही है?
- बिलकुल है। महात्मा जी ने कहा- लेकिन तुम इतने मुर्ख कैसे हो सकते हो? क्यों नहीं समझते कि ईश्वर तुम्हें उस शेर की तरह बनते देखना चाहते थे, लोमड़ी की तरह नहीं।
जीवन में भी ऐसा ही होता है कि हमें चीजे जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां हैं जो हमें महान बना सकती हैं। जरुरत है उन्हें पहचानने की,यह ध्यान रखने की कि कहीं हम शेर की जगह लोमड़ी तो नहीं बन रहे हैं।

कवि कहानी कब लिखता है


हरिशंकर परसाईं

प्रिय बन्धु
आजकल नित्य ही कहीं न कहीं कहानी पर बहस होती है और बड़े मजे के वक्तव्य सुनने को मिलते हैं। एक दिन मैं एक क्लासिकल होटल में चाय पी रहा था। क्लासिकल होटल वह है जिसमे जलेबी दोने में दी जाती है और पानी ऊपर से पिलाया जाता है। आधुनिक होने के लिए ऐसे होटल चाय भी रखने लगे हैं। मैं बैठा बैठा एक पत्रिका के पन्ने पलट रहा था। मेरी नजर दिल्ली में हुई मनीषा की गोष्ठी की रपट पर पड़ी। मैने पढ़ा डाँ0 नामवरसिह ने कहा कि नयी कहानी मेरा दिया हुआ नाम नहीं है। कौन कहता है कि मैंने नयी कहानी का नाम चलाया। इसी समय मेरी नज़र दीवार पर टंगे रवि वर्मा के उस चित्र पर पड़ी जिसमें मेनका विश्वामित्र को अपनों और ऋषि को भी लडकी दे रही है और विश्वामित्र परेशान हो हाथ उठा कर उसे अस्वीकार कर रहे हैं। अवैध संतान के बाप की घबडाहट मुझे समझ में आती है।

मुझे विश्वामित्र और नामवरसिंह की अदा में एक साम्य दिखा। यों मै जानता हू कि नामवर सिंह नयी कहानी के पिता नहीं है मगर लोग खूबसूरत बच्चे को गोद भी तो ले लेते हैं। अगर नयी कहानी खूबसूरत बच्ची है और नामवर सिंह में अतृप्त वात्सल्य है तो गोद ले लेने में क्या हर्ज है घ् लोक लाज से इतना थोड़े ही घबड़ाया जाता है। अब उनका क्या होगा जो दसों सालों इस दम पर कहानी लिख रहे थे कि डाँ0 नामवरसिंह उसे नयी कहानी कहते हैं। जो भरोसा करके साथ हो ले उसे इस तरह बियाबान में तो किताब बेचने वाले भो नहीं छोड़ते। फिर डाक्टर साहब तो आलोचक हैं।

दूसरा आकर्षक वक्तव्य श्रीकांत वर्मा ने दिया। उन्होने कहा कि कविता लिखना ऊंचे दर्जे का काम है और कहानी लिखना घटिया काम है कवि जब ऊंचा काम करना चाहता है तब कविता लिखता है और घटिया काम करना चाहता है तब कहानी लिखता है। किसी कवि के मन में कोई घटिया काम करने की जैसे जेब काटने की इच्छा हो तो वह जेब न काट कर एक कहानी लिख लेगा। मात्र कहानीकार और कवि कहानीकार में यही अंतर है। मात्र कहानीकार जेब काटने की इच्छा होने पर जेब काटेगा मगर कवि कहानी लिखेगा।

यही बात कहानीकार कवि पर लागू होती है। अश्क कहानीकार है मगर जब जब उनकी इच्छा कोई घटिया काम करने की हुई है जैसे पीछे से किसी को लत्ती मार देने की उन्होंने कविता लिख दी है। राजेन्द्र यादव भी कभी कभी फौजदारी मामले को टालने के लिए कविता लिखते हैं। श्रीकांत ने सिर्फ दो को नया कहानीकार माना है। इससे अधिक उदार तो कुंवरनारायण हैं जिन्होंने पांच को माना है। कुँवरनारायण ने श्रीकांत का भी नाम लिया है मगर श्रीकांत ने उनका नाम नहीं लिया। दोस्ती क्या इसी तरह निभती हैघ् श्रीकांत पिछले 10 सालों से मेरा बड़ा प्यारा दोस्त है मगर उसने मेरा नाम भी नहीं लिया।

साहित्य के मूल्यांकन में अगर लोग दोस्तों को ही भूल जाएंगे तो मान दंड कैसे स्थिर होंगेघ् आलोचना के क्षेत्र में अराजकता का यही तो कारण है कि कुछ लोग दोस्तों को हमेशा याद रखते हैं और कुघ् लोग हमेशा भूल जाते हैं।

इसी गोष्ठी में एक और कहानी का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया सचेतन कहानी। अब नयी कहानी और सचेतन कहानी की व्यूह रचना हो रही है। लेकिन आगे हर 6 महीने में कहानी के लिए एक नये नाम की जरूरत पड़ेगी। ऐसे नाम अभी से सोच कर रखने चाहिए। कुछ नाम मैं सुझाता हूं अचेतन कहानी रेचन कहानी विरेचन कहानी विवेचन कहानी रामावतार चेतन कहानी।

मुझे अब यह समझ में आने लगा है कि कहानी लिखना कोई अच्छा काम नहीं है। मगर अच्छा काम तो जेब काटना भी नहीं है। फिर उसे लोग क्यों करते हैं . क्योंकि पैसे मिलते हैं कहानी लिखने से भी पैसे मिलते हैं न।

पिछला महीना दिलचस्प वक्तव्यों का महीना था। र्डो0 प्रभाकर माचवे ने कही कहा कि रोटी से आदमी के विचार नहीं बनते। बात बिल्कुल ठीक है। मगर मेरा नम्र निवेदन है कि रोटी पर जो घी चुपड़ा जाता है उससे तो बनते होंगे। अभी पिछले महीने की ज्ञानपीठ पत्रिका मेरे हाथ में आ गयी। कर्तार सिह दुग्गल ने लेख लिखा है कि मै क्यों लिखता हूँ। वे क्यों लिखते हैं देखिए . मैं लिखता हूँ क्योंकि दिल के इस कोने में एक दुलहिन छिपी बैठी है। इस हसीना का आशकार करना है। इसके यौवन की एक झलक दिखाना हैण्



. हाय हाय



काशए हमारे दिल के उस कोने में भी बैठी होती। या हमे वह कोना मालूम होता जहाँ वह अकसर बैठा करती है।



बन्धु दुग्गल जी जैसे सहज भाग्यशाली सब थोड़े ही हैं।



पत्र समाप्त होता है। अब एक मिथ्या औपचारिक वाक्य लिखना बाकी है दृ

आशा है आप सानंद हैं।

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व्यंग्य संग्रह . और अंत में से साभारण् अभिव्यक्ति प्रकाशनए 847ए यूनिवर्सिटी रोडए इलाहाबाद.2

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फिरंतीन

शिवशंकर शुक्ल
जब गोटनिन ह पाँच रुपिया के दू लोट फिरंतिन के हाथ मां धिरस त पहिली ओखर झुक्खा ओठ ह हसउंक आसन दीखिसए फेर तुरते हंसउक ह रीनहुक मां फिर गेए आँखी ह डबडबा गे। हाथ मां धराय लोट ल फिरंतिन ह एकटक देखत रहय। ओला अइसन आगै के ये लोट ह ओखर गवांय जिनगी के गोठ ल आज फेर साम्हू ला के डार दे हावय।
वो नसाय जिनगी जोन ह अंगरा सही आइस अउ देखते देखत राख तरी बिलागे। जब ओखर भराय जोबना तरी किसिम किसिम के आस ह टेंगना साही फुदकत रहय वही टेम ओखर बिहाव किसन संग होगे। किसन अधबुढ़वा होगे रहय। ओखर जवानी ह बुतागे रहय।
समें के गोठ आय। फिरंतिन के ददा उप्पर किसन के बड़ अहसान रहय। एक बेर जब किरोरी सेठ ह कुरकी लेके ओखर कुरिया मां नींग रहय उही समें किसन ह पांच कोरी रुपिया किरोरी सेठ ल दे रिहिस। डोकरा ह मरत ले किसन के बड़वारी करते रिहिस के बुड़उती मां ओखर लाज न किसन बचांलिस।
फिरंतिन गोटियारी होगे रहय। ओ ह आज ले नइ भुलाय रहयए जब गाँव के सियान मनखे मन ओखर ददा ल कहंय के पहार असन बेटी ल मूडी उप्पर झिन बइठारे राख। डोकरा ह जम्मों झिन के गोठ ल सुनय फेर करै काघ् गरीबी बुजा के ह ओला अपन ओखी मां पोटार ले रहय। लागा ले अब ले नइ उबरे बेचारा ह। बेटी के बिहाव के चेत ओहुल चघे रहयए फेर करै काघ् पास मां कानी कौरी नइ रहय। सुततए जागत ओहा मोटियारी बेटी के बिहाव बर गुनत रहय। बुडई उप्पर ये चिन्ता ह डोकरा ल मांचा मां गिरा दिस। गांव के मनखे ओला देखे बर आवंय त मुडसरिया कोती ठाढ़े फिरंतिन न देख के उन्कर जांखी ले आँसू चुचुवा जावय। बिन दाई ददा के हो जाइय बेचारी ह। दू चार दिन के रहइया ये ह। इनकर अइसना गोठ ल सुनके फिरंतिन के पोटा ह झुक्खा हो जावय। अनेक बड संसार मां अकेल्ला रहय के गुनत जी ह डर्रा जावय।
ठउका बेरा मां किसन ह आसरा देवइया बनगे। जिनगी ल जियय के सहारा मिलगे। फिरंतिन ल आज ले आपन ददा के जाती के गोठ नइ भुलाय रहयए तै ह मोर उप्पर बड़ उपकार करे हाबस फेर अब चलती चलाती के बेरा मोर एक बात अउ मान लेते त कलेचुप जीवला छांड देतेंवए फिरंतिन के बिहाव नइ करे सकेव। कहूं तैं ओखर हाथ ल थाम लेवस त यहू बन जातिस। चलती बेरा मां फेर किसन ह डोकरा के लाज ल राख लिस। फिरंतिन ल भगवान उप्पर चिटको खुनिस नई चघिसए किसन डोकरा संग बिहाव होय ले। काबर ओला जियई के असरा ह मिलगे रहय।
किसन ह मनके बने मनखे रहय। गाँव के मनसे मन ओखर बडवारी करत नई अघायं। ओखर मिसरी सांही भाखा ह जम्मो ल बड मिठ लागय। गौंटिया घला ओला मांनय। ओखर जम्मों खेती पाती के रखवार इहीं त रहय। किसन के खटलाल बीते 10 बच्छर होगे रहय। अपन पाछू एक झिन दू साल के टुरा ल छांड गे रिहिस। मरे उप्पर कतको झिन दुसर बिहाव बर किसन ल किहिन फेर ओखर चेत ह नइ चघिस अपन रजवा बर मौसी दाई लाने केए फिरंतिन ले बिहाव करइ ह डोकरा ल चलती के बेरा धीर देवइ त आय। रवा ह अब 14 साल के पोठ टुरा हो गे रहय। फिरंतिन ह किसन के देउता असन करनी उप्पर रजवा ल अपन जाये बेटा ले बढ़ के मया करन लगिस।
झक्कना के फिरंतिन ह हाथ के कड़कड़ावत लोट ल जोरहा ले मु_ी मां भींच लिस। ओला अपन दुरदिन के छइहां दीखत रहय।
अभी फिरंतिन के पीवंरइ हनइ छूटे पाइस कि ओखर करम ह फाट गेए रांड़ी होगे। ओखर जिनगी के छहहां ह तिरिया गे। फेर करतिस कायए मोगइ त ओखर भाग मां रहय। पहिली ददा रेंग दिस अउ अब मनसे। जम्मों ये जग में अकेल्ला आथें अउ वइसने अकेल्ला रेंग देथे। सियान मन सहीं कहिथें।
दिन ह नहकत गे। रजवा के मुख ल देख.देख के ओखर जियइ मां ढग़ आइस। फेर कतको झिन कहयंए पहार असन जिनगी कइसे पहाबे वोए चूरी पहिर लेए फेर ओ ह अपन मरे मनसे के सुरता मं कभू हां नइ करिस। ओह कतको बेर कहय के मोर मरे उप्पर तैं रजवा ल कभू कइसनों दुरूख झिन देबे। ओ ह दाई के मया के चिट्टको सुख नइ पाइस तैं मया ले ओखर जिनगी ल बनाबे।
जिनगी के चढ़ती उतरती के संगेसंग ओ ह अपन करतब ल निभावत रहय। रजवा उप्पर कभू कइसनों दुरूख के छइहां नइ परन दिस। फेर किसन ह जोन थोर बहुत धन दोगानी छांडग़े रहय ओखर ले जिनगी के गाड़ी ह कब ले खिंचातिस। लांघन रहय के दिन ह झुमकत रहय फेर फिरंतिन ह अब ले बंधाय मुठ्ठी ल नइच उघारे रहय। रजवा ल अब ले अपन घर दुआर के कइसनों चिंता नइ रहय। फेर फिरंतिन ह कभू नइ गुनिस के ये काली के टुरा ह घर गिरस्ती के गोठ न गोठियाय। फेर कब ले लकर धकर के रेंगई ह चलतिस। एक दिन फगनी बड़ गुन के किहिसए रजवा तैं अपन गौंटिया घर बूता न अपन ददा सही तियार लेते त बने होतिस। अतेक बड़ जिनगी परे हवय कइसनों करके त जीव बचाय बर परबे करही बेट। रजवा न अपन मौसी दाई के अइसना गोठ ह चिटको नइ भाइस। ओखर भितरी के सइतान ह जाग गेए सहीं मां कहूँ मोर दाई होतिस न का अइसना गोठ न गोठियातिस। एक दिन रतिहा जब फिरंतिन ल सुते छोड़के रजवा ह घर ले निकर गिस। दूसर दिन मुँधियार फिरंतिन ह रजवा के मांचा ल खाली देखते बक्क खागे। अंगना मां निकल के देखिस त उहों रजवा ह नइ रहय। बिहनियाँ गाँव म किंजर.किंजर के एक.एक झिन मनखे ले पूछिस तम्भो ले ओखर कोनो आरो नइच्च मिलिस। ओ ह रो डारिसए काबर में करम छंड़हिन ह ओला बूता बर तियारेंवए कहूँ अइसने गोठ ल नइ चलातेंव त वो ह अपन दाई ल अघवार मां छांड़ के कभू नइ जातिस। थोर िदन त ओखर आस ह लगे रहय के मोर बेटा ह लहुट के आ जाही। कहइया गोठ के सुनतेच फिरंतिन के मुँह ह लटक जावय। ओ ह अपने ल जी भर के बखान लेवय। कोन कुबेरा मंए में ह अपन बेटा ल बूता बर कहेंव। नइ कहितेंव त नइ जातिस कहूँ।
दिन ह नहकत बच्छर होंगे। रजवा ल घर छोड़े पाँच बच्छर होगे। बिन बेटा के अतेक दिन फिरंतिन के कइसे बीतिस तेला उही जानंय। टेम उप्पर कोन्हों निहिं कोनों आसरा देबइया गाँव घर मां निकरे जाथें। जेखर सेवा चाकरी अपन जियत ले किसन ह करे रहय उही गौंटिया ये राड़ी डउकी ल गली.गली किंजरत कइमें देखतिस। ओह अपन घर मां काम करे बर फिरंतिन ल लगा लिसए शनिचरी बजार ले साग.भाजी लान देवय अउ घर के बुता। बलदा मां ओला दुनों जुवार के रोटीए महिना मां दस रुपिया अउ सालके दू लुगरा मिल जावयए अउ ओला काय खंगया। ये पाँच बच्छर मां एक्को दिन ह अइसन नइ गिस के ओ ह रजवा के खोर खभर नइ ले होवय। शहर ले कखरो अवइ के पता लगतेए वही मन साहीं अवइया मन मेंरन दउर के जावयए फेर अब ले ओखर आस ह नइच पुरिस।
आज जभ्भे ओला गौटनिन ह दस रुपिया के लोट देवत रहय तभ्भे ओला अपन भगाय बेटा रजवा के सुरता आगे। वो ह रजवा ले कहय के मने मन गुनयए रजवा अब तासेला कइसनों तकलीफ नइ होवन देववए मोला महिना के दस रुपिया मिलिच जाथे। मैं तोला बने.बने देखना चाहत हों। फेर रजवा उहां कहां रहय। वो गुनयए पाँच बच्छर नहाक गेए नइ जानव कोन मेरंन मोर करेजा ह होही। असरा ह बड़का होथे। फिरंतिन ल असरा रहय के रजवा ह लहुटबे करही अउ वोखर आये उप्पर मोर घर मां सुघ्घर बहुरिया के पांच करबे करही। चंदा के अंजोरिया असन डउकी ल पाके वो ह फेर कभू मोला छोड़के नइ जाय सकही। फिरंतिन इही सब गुनत कतको दिनले अनाज के सीधा मुख मां नइ राखिस। जुच्छा पेट पानी पीके रहिजावय। अइसने.अइसने थोंर बहुत पइसा सकेल सकेल के अपन अवइया बहू बर दू.चार ठिन गहना गुरिया बनवा लिस। वो गहना मन ल देख के अपन नवा बहुरिया के सुन्दरई मने मन गुन के बहूंत खुशी हो जावय।
रजवा ह शहर आके भिलाई करखाना मां नउकरी लगगे। महिना के दू कोरी पांच रुपिया उप्पर मिल जाववए जिनगी ह मंजा के कटत रहय। शहर के तड़क.भड़क मां निचट रम गे रहय। ओखर संग मां एक झिन डोकरा घलो बूता करत रहय। ओखर एक टुरी रहयए फगनी। शहर मन रजवा के अपन कहइया कोनोच नइ इही डोकरा ओला छइहां मां बइठे के जघा देय रहय। अखरो ये टुरी ल छोड़के कोनों अपन कहइया नइ रहय। फगनी के बिहाव ओ ह रजवा ले कर दिस। गरिबविन फगनी के सुभाव बड़ निक रहय एखरे ले वो ह रजवा के दील मां घर कर ले रहय। पहिली वोमन दू रहंयए फेर तीन होंगे। परिवार ह बाढ़िस। जोन रजवा अपन मौसी दाई के एक भाखा नइ सुने सकिसए तउने ह अब कमइया होगे रहय। फगनी बर किसिम.किसिम के लुगराए गहिना अउ नानुक बर रिंमी.चिंगी उन्हा लानय। सब्बो ल बने ठने देखके ओखरो जी ह जुरा जावय। घर छोड़े पाँच बच्छर तीन गे राहय। पहिली थोर दिन वोह अपन गाँवए संग के खिलइया संगवारी अउ मौसी दाई के सुरता भोरहा मां नइच करिस। फेर धीर ले अपन मयारुक मौसी के चेहरा ओखर आँखी मां झुल जावय। वो ह गुनय के मेंह बने नइ करेवंए आपन मौसी दाई ल बिन सहरा के छोड़ के बिन बताये आके। वो ह बूता करे बर त कहे रहयए फेर कब ले मोला बइठार के खवातिस। वो ह अपन तन ल तो भूख भरै अउ मोर पेट बर सकेल के रखै। अब वो ह गाँव मां अकेला हावयए कोनों ओकर पुछइया नइ हावय। कइसे करके ओह अपन जिनगी चलावत होही तेला कोन सरेखे। इही गुनइ ह ओखर मने मन चलत रहे। ये जम्मो गोठ ल वो ह फगनी ल घला बताय रिहिसए त ओखरो आंखी ह डबडबा गे।
एक दिन के गोठ आयए रजवा ह अपन बूता ल करके घर आइस त ओलास चिटको बने नइ लागत रहय घेरी.बेरी मौसी दाई के चेहरा ओखर आँखी मां झूलत रहय। रतिहा जेवन करत बेरा वो ह फगनी ले किहिसए हमन काली बिहिनियाँ बइला गाड़ी मां आपन गाँव चलबोनए फगनी। दाई के सुरता गजबेच्च आवत हे। मोर बिन अउ ओखर कोंन येघ् फगनी ल बड खुशी लागिस। बहू ह अबले अपन सास ल नइ देखे रहय। दुनों झिन मिलके समान बांधिन छदिन। अघरितहा दुनों झिन के नींद ह टूटगे। रजवा ल आपन गाँव के नान.नान बने सुघ्घर कुरियाए गाँव के मयारुक मनखेए आमा के गदगद ले फरे रूख अउ हरियर..हरियर लुगरा सांही खेत के बखान फगनी ले करत रहय। जब में ह तोला अउ नानुक ल लेके ओखर आघू जाहूँए त बक्क खा जाही। फगनी अपन मनसे के गोठ सुनके आपन सास के गढऩ ल मने मन गढ़त रहय। बिहिनियाँ होइस अउ एमन गाव बर रेंग दिन।
रजवा ल गाँव के मन देखते अचरिज मा आगेए काबर के ओमन यही गुनले रहंय के अब ये भगाये रजवा ह लहुट के नइच आही। फेर फगनी अउ नानुक ल देखके उनकरो जीन जूरागे।
ओतके बेर कोनो पाछू ले हांका पारे असन किहिसए रजवा झटकुन रेंग। तोर दाई ल बड दिन ले जार ह धर दबोचे हावय। लकर.धकर रजवा ह गाड़ी ल अपन घर कोती हंकाइस। घर के मुँहाटी मां पहुँचते डेरही के माटी ल कपार मां छुवइस अउ नींगगे भितरी। ओखर आँखी ह अपन मौंसी दाई ल खोजत रहय।
च्च्दाईए में आगेंव ओ।ज्ज्
च्च्रजवाए मोर बेटा। तें आगे रे! आ ण्ण्ण्ण्ण्आज रेण्ण्ण्ण्ण् मोर करेजा ले लगजा रे।ज्ज् फिरंतिन ह मांचा ले उच्चे के बइठ गे।
च्च्दाईए तोला का होगे ओघ् मेंह तोला बहूंत दुख दे हंवव ओ। मोला छिमा करदे ओण्ण्ण्ण्ण्ण्मोर मयारुक दाई।ज्ज् अतक बोलते ओ ह सुबक.सुबक के रो डारिस।
फिरंतिन के मुरझाये चेहरा उप्पर हंसी खेल गे अउ धीर बंधिस अपन बेटा के कलपइ ल देख के। बेट के सुरता कर.करके त खाट धर ले रहय। एक महिना होगे रहय जिनगी अउ मउत के छइया परत। वो ह संझा बिहनियाँ इही देवी दाई ले मनावै के मरती के बेरा मोर बेटा ले मोर भेट करा देबे। आज भगवान ह सुन लिस।
फगनी के अपन सास के पाँच परत के बेरा आँची ले आँसू चुचवा गे।
च्च्ये मोर बहू हे नए रजवाघ् अउ ये मोर सरग के अमरइया नाली आय नघ् फिरंतिन ह हंसउक मुख ले बोलिस।ज्ज्
च्च्ह हो महतरी।ज्ज्
च्च्मेंह कतेक दिन ले मने मन गुनत रहेंव के चंदा के अंजोरिया सांही बहू लानहूँ।ज्ज् फिरंतिन ह फगनी के मुड़ उप्पर हाथ फेरत किहिसए आज मोर साध ह पूर गे। अपन बहू बर थोर.थोर पइसा सकेल के गहना गढ़ाय रहेंव। हडिय़ा जए ले लानए अउ पहिर ले बेटी। में ह आँखी भरक ेअपन बहू के सुन्दई ल देख लेवंव। अउए हाँ रजवा ल समझा देबे बहू के वोह फेर कभू अपन दाई ल छोड़के झन जावय।
महतारीए रजवा ह सिसकारी लेत किहिसए में तोर उप्पर खुन्साके कहूं ना जाहूं। तुमन बने हो जाहू। फेर हमन बने बने दिन बिताबोन। में अब तोला बूता करे बर नई जानदूहूँ ओ। में शहर ले बड़अकन रुपिया कमा के लाने हाववं।
च्रजवाज्ए मोर भगवान ह मोर बिनती ल सुन ले हावय। वोही ह तुम्हर रखवारी करही !
अरेए देखतो मोर बहू ह गहना पहिरे उप्पर कतेक सुन्दर दीखत हावय। रजवाए नानुक ल खूब पढ़ाबे लिखाबेए फेर बनाबे केसानए ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् रजवा ण्ण्ण्ण्ण्बहूण्ण्ण्ण्रजवाण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्। अतेक बोलते.बोलत फिरंतिन के आँखी ह मुंदा गे।
च्दाईज् कहत रजवा कटाय रूख सांही ओखर लकड़ाय गोड़ उप्पर गिरगे। पंछी ह पिंजरा ल जुच्छा करके रेंग दिस।
हंसा उड़ागे! कोन कोतीघ् आरो नइ मिलिस।

अंग्रेजी लाल की हिन्दी


वीरेन्द्र सरल
सुबह.सुबह घर के बरामदे पर बैठकर मैं चाय पीते हुये अखबार पढ़ रहा था। तभी किसी महिला की सुरीली आवाज सुनायी पड़ीए श्श्हाय मिसेज सरल।श्श् मैं हड़बड़ायाए पहले मैं अपने पहनावे पर ध्यान दिया। पहनावा तो पूर्णत: मर्दाना ही था। श्रृंगार मैंने किया नहीं था। बाल मैंने बढ़ाये नहीं थेए सब कुछ ठीक.ठाक था पर गड़बड़ कहाँ हो गई हैघ् सामने देखा तो एक सुसभ्य महिला मुस्कुराती हुई खड़ी थी। मैंने हाथ जोड़कर कहा.श्श्बहन जी! जरूर आप को धोखा हुआ हैए आप जो समझ रही हैं वह मैं नहीं हूँ। शायद आप धोखे से गलत पते पर आ गई हैं।श्श् वह खिलखिलाकर हँस पड़ी और बोली.श्श्जीं नहींए मैं बिलकुल सही पते पर आई हूँ। भाई साहबए मैं आपको नहीं आपकी श्रीमती का अभिवादन कर रही हूँ।श्श् पीछे मुड़कर देखा तो सचमुच मेरी श्रीमती मुसकुरा रही थी। मैं झेंप गया। वे दोनों आत्मीयता से गले मिलते हुये अंदर वाले कमरे में जाकर बातचीत करने लगे।


    किसी गहन.गंभीर विषय पर लगभग घंटे भर तक उनकी बातचीत होती रही। शायद वे ध्वनिरोधक जुबान से बातचीत कर रही थी। मजाल है जो कमरे से एक शब्द भी बाहर निकलने की हिम्मत करे। मैं उस महिला को पहचानने का अथक और असफल प्रयास कर रहा था मगर मुझे कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। कुछ देर बाद वह विदुषी चली गई तब मैंने श्रीमती से पूछा.श्श्कौन थी यहघ्श्श् श्रीमती आश्चर्य से मुझे घूरती हुई बोली.श्श्अपने चश्मे का नम्बर बढ़वा लीजिये। धिक्कार हैए हिन्दी के लेखक होकर भी शहर के सबसे बड़े हिन्दी प्रेमी अंग्रेजी लाल की धर्मपत्नी अंग्रेजी बाई को नहीं जानतेघ्श्श्


    अब मुझे याद आया। सचमुच चेहरा कुछ जाना.पहचाना लग रहा था। जरूर कभी मैंने इन्हें भाई अंग्रेजी लाल के साथ ही कहीं देखा रहा होगा वैसे अंग्रेजी लाल मेरे पुराने और सबसे अच्छे दोस्तों में से एक हैंए ये अलग बात है कि अभी बहुत दिनों से मेरी मुलाकात उनसे नहीं हो पाई है। बहरहालए मैंने  श्रीमती से पूछा.श्श्वैसे अंग्रेजी बाई जी अभी आपसे क्या कह रही थी घ्श्श् श्रीमती ने कहा.श्श्क्या कहेगी बेचारी। हिन्दी की चिन्ता में दुबली हुई जा रही है। पखवाड़े भर से हिन्दी माता के नाम पर व्रत कर रही है और आज हिन्दी दिवस के पावन पर्व पर हिन्दी माता व्रत कथा.पूजन का आयोजन कर रही हैं। उसी का निमंत्रण देने आयी थी।श्श् इतना बताकर श्रीमती जी उसका दिया हुआ कार्ड मुझे थमाकर अपने काम में ब्यस्त हो गईं।


    मैंने देखाए खूबसूरत और मंहगे निमंत्रण पत्र पर लिखा था कि हिन्दी माता की असीम अनुकंपा से हिन्दी दिवस के पावन पर्व पर आज हमारे यहाँ हिन्दी माता व्रत कथा.पूजा का आयोजन रखा गया है। जिसमें आप सपरिवार पधार कर हमें अनुगृहीत करें। दिनांक चौदह सितम्बरए संध्या पाँच बजेए स्थान अंग्रेजी बंगला हिन्दी कालोनी ।
    इस तरह का यह पहला निमंत्रण कार्ड था इसलिये इसे पढ़कर मेरा दिमाग चकरा गयाए  सुनहरे अक्षरों मे छपे इस निमंत्रण कार्ड को पढ़कर मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। बाप.रे.बाप! इतना खतरनाक ढंग से हिन्दी प्रेमघ् नमन है हिन्दी प्रेमी इस दंपत्ति की भावनाओं और हिन्दी दिवस को इस अनुपम ढंग से मनाने के तरीके को। काश! आज अंग्रेजी लाल जी से मेरी भेंट हो जाती तो मैं भी उससे जी भरकर बातें करके अपना जी हल्का कर लेता। वैसे वर्षो से हम चौदह सितम्बर को हिन्दी की दिशाए दशाए दुर्दशाए विकास और महत्व इत्यादि विषयों पर सभा.संगोष्ठी आयोजित करके अपना जी हल्का करने का पुण्य कमा रहे हैं। कुछ ऐसे ही विचारों में खोया मैं फिर से अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गया ।


    कुछ ही समय हुआ था कि फिर किसी ने श्गुडमार्निंग सरश् कहते हुये मेरा अभिवादन किया। सामने देखा तो अंग्रेजी लाल मुस्कुराते हुये खड़े थे। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। हिन्दी माता ने मेरे मन की बातें सुन ली थी और अपनी सदप्रेरणा से अंग्रेजी लाल को यहाँ भेज दिया था। मैंने खुशी से उछलते हुये कहा.श्श्अरे! आओ भाई अंग्रेजीलालए बाजार से गायब शुद्ध घी की तरह बहुत दिनों के बाद दिखाई दिये हो। ऐसा लग रहा हैए मानो चुनाव जीतने के पूरे पाँच साल बाद फिर से वोट माँगने के लिये ही पधार रहे हो।श्श् वह मुस्कुराते हुये आगे बढ़ा और गर्मजोशी से मुझसे हाथ मिलाते हुये बोला.श्श्हैलो माय डियर फ्रेन्डए हैप्पी हिन्दी डेए कान्ग्रेच्यूलेशन। थैंक्स गॉड आपने मुझे पहचाना तो सही।श्श्

हम आमने.सामने रखी कुर्सियों पर बैठ गये। फिर उसने शिकायती लहजे में कहा.श्श्क्या यार! देते भी हो तो वही घिसी.पिटी उपमा। अरे कहना है तो कहोए महीने भर से डयूटी से नदारद अधिकारी की तरह वेतन लेने ही पधारे हो और उसने जोरदार ठहाका लगाया।श्श् फिर उसने पूछा.श्श्अच्छा यार! मेरा निमंत्रण कार्ड मिला य नहींघ्श्श् मैंने कहा.श्श्मिला है भईए मिला है। भाभी जी अभी.अभी देकर गई हैं। मगर हिन्दी माता व्रत पूजा.कथा मेरी समझ से बाहर है। आज तक मैं अन्यान्य देवी.देवताओं के व्रत कथा.पूजन के बारे में ही पढ़ा.सुना है पर हिन्दी माताघ्श्श् उसने पहले मुझे किसी पहुँचे हुये महात्मा की तरह देखाए फिर अपनी छाती ठोंकते हुये कहा.श्श्इस शहर में मुझसे बड़ा हिन्दी भक्त शायद ही कोई दूसरा होगा। लोग भले ही सभा.संगोष्ठियां करके हिन्दी पखवाड़ा मना रहे हों मगर मैं एक अकेला आदमी हूँ जो पखवाडे भर से सपत्नीक हिन्दी माता के नाम पर व्रत कर रहा हूँ। आज उसका उद्यापन है जैसे लोग सोलह शुक्रवार तक संतोषी माता का व्रत रखने के बाद कराते हैंए समझाघ्श्श् मैंने मूर्खों की तरह सिर हिलाकर जिज्ञासा प्रकट कीए शायद आप इसमें पन्द्रह हिन्दी लेखकों को भोजन करायेंगे जैसे लोग नवरात्रि मे नवकन्या भोज कराते हैंए है नाघ् उसने माथा पीटते हुये कहा.श्श्अब तुम जैसे मूर्ख को कौन समझाये। घर आकर सब कुछ अपनी आँखो से देखोगे तभी समझ पाओगे।श्श् मैंने सहमति में सिर हिलाया।


    फिर उसने आगे कहा.श्श्अभी तुम मेरे साथ थोड़ा बैंक चलोए मैं तुमको गारंटर बनाना चाहता हूँ।श्श् मैंने घबराते हुये कहा.श्श्तुम इस शहर के सबसे बड़े हिन्दी भक्त हो इसकी गांरटी भी क्या मुझे लेनी पड़ेगीघ् हिन्दी दिवस के पावन अवसर पर बैंक में ऐसा कौन.सा काम आ पड़ाघ्श्श् उसने गुस्साते हुये घूर कर देखा फिर बोला.श्श्अरे नहीं यार! मैं हिन्दी के विकास और महत्व के लिये कुछ करना चाहता हूँ। देश के दस.बीस बड़े शहरों में अंग्रेजी मिडियम के स्कूल खोलना चाहता हूँ। इसलिये बैंक से लोन ले रहा हूँए जिसमें तुमको गारंटर बनना हैं।श्श् मैंने पूछा.श्श्मगर हिन्दी के विकास के लिये अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का क्या योगदान है भईघ्श्श् अब उसने मुझे लगभग डांटने वाले अंदाज में कहा.श्श्फिर वही मूर्खों जैसी बातेंए सीधी बात भी तुम्हें समझ में आती है य नहींघ् बात बिल्कुल साफ है। जब अंग्रेजी पढ़ने.लिखने वालों की संख्या बढ़ेगी और हिन्दी जानने वाले कम हो जायेंगे तब हिन्दी का महत्व नहीं बढ़ेगा क्याघ्श्श्


मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। मैंने थूक गटकते हुये कहा.श्श्बाप.रे.बाप! तुम इतने खतरनाक स्तर के हिन्दी प्रेमी हो इसका मुझे अंदाजा नहीं था। मगर भैया मुझे माफ करो कोई दूसरा दरवाजा देखो। तुम्हारे इतने निम्न कोटी के उच्च विचार में मैं कोई सहायता नहीं कर सकता।श्श् मेरी हिचकिचाहट देख कर उसने अपने सीने पर हाथ रखते हुये कहा.श्श्मैं हिन्दी माता की कसम खाकर कहता हूँए तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। तुम्हें मेरी दोस्ती की कसम।श्श् इस ब्रह्मास्त्र से मैं ढेर हो गया। अन्तत: मुझे उसके साथ बैंक जाने के लिये तैयार होना ही पड़ा।


    मेरे घर के सामने उसकी विलायती कार खड़ी थी। हम दोनों उस पर बैठ गये। गाड़ी वह स्वयं चलाने लगा। बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हुआ। मैंने पूछा.श्श्यार! अब तो तुम कार बंगलेदार आदमी हो गये हो। बहुत कम समय में तुमने इतनी तरक्की कैसे कर लीघ्श्श् उसने कहा.श्श्सब हिन्दी माता की कृपा और भैया जी का आशीर्वाद है। भैया जी की कृपा से एक अकादमी में पैर जमाये बैठा हूँ।श्श् मैं उससे कुछ और पूछता तब तक हम बैंक पहुँच गये थे। निर्धारित स्थान पर गाड़ी रखकर हम दोनों बैंक के अंदर गये। मैंने देखाए शाखा प्रबंधक की कुर्सी के ठीक ऊपर एक बैनर टंगा था। जिसमे लिखा थाए श्श्हिन्दी पढ़ना आसानए लिखना आसानए बोलना आसानश्श् तो छोटी.छोटी बातों से हिन्दी सीखना शुरू करें। शायद प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी वहाँ हिन्दी पखवाड़ा मनाया जा रहा था। प्रबंधक के मेज पर उसके नाम की पट्टिका रखी हुई थी जिसमें उसके नाम के साथ अंग्रेजी में लिखा  हुआ थाए श्श्मे आई हेल्प यू।श्श्


    अंग्रेजी लाल प्रबंधक को नमस्ते श्रीमान कहते हुये अंदर घुसने लगा तो प्रबंधक उसकी इस हरकत से गुस्साते हुये बोला.श्श्ये क्या बदतमीजी हैघ् श्रीमान.श्रीमान रटे जा रहे हो। अदब से सर कहो और परमिशन लेकर अंदर आओ।श्श् अंग्रेजी लाल हुकुम मेरे आका के अंदाज में झुका और श्श्मे आई कम इन सरश्श् कहते हुये पुन: अंदर घुसा। शाखा प्रबंधक मोंगेंम्बो के अंदाज में खुश हुआ। मैं बाहर बैठ कर  अंग्रेजी लाल का इंतजार करने लगा।


    कुछ समय बाद जब अंग्रेजी लाल कर्ज संबंधी दस्तावेज पर जमानतदार के स्थान पर मुझसे हस्ताक्षर कराने के लिये लाया तो मेरा दिमाग घूम गया। सारे कागजात अंग्रेजी में थे। मैं सोचने लगाए आखिर न्यायालय से लेकर  सभी महत्वपूर्ण कार्यालयों के कागजात अंग्रेजी में ही क्यों होते हैं। ये अंग्रेजी भूत आखिर हिन्दी को ऐसे कब तक चिढ़ाता रहेगा। मित्रता के कारण मुझे उन कागजात पर हस्ताक्षर करना पड़ा। शाखा प्रबंधक के पास कागजात जमा करके हम बैंक से बाहर निकल आये और घर की ओर चल पड़े। अंग्रेजी लाल मुझे मेरे घर पर छोड़कर आगे बढ़ गया।


    निर्धारित समयानुसार मैं संध्या पाँच बजे अंग्रेजी लाल के बंगले पर पहुँच गया। बंगले को रंगीन झालरों से खूब सजाया गया था। वहाँ काफी चहल.पहल थी। अंग्रेजी परिधान में सुसज्जित बहुत सारे लोगए हिन्दी माता व्रत कथा.पूजन में भाग लेने आये हुये थे। मैं उस कमरे में गया जहाँ पूजा कार्यक्रम रखा गया था। मैंने देखाए एक उच्चासन पर सफेद कपड़ा रखा गया था। उस पर हिन्दी वर्णमाला को सुंदर तस्वीर की तरह मढ़वा कर स्थापित किया गया था और उसी की पूजा.अर्चना की गई थी। उस पर अक्षतए गुलाल चढ़ाया गया थाए पास में ही नारियल फोड़ा गया था और खूशबूदार अगरबत्ती जलाई गई थी। पूरा कमरा महक रहा थाए पूजा कार्यक्रम तो सम्पन्न हो गया था। अभी आरती हो रही थी। सब मिल कर श्जय हिन्दी माताए मैया जय हिन्दी माताश् गा रहे थे। कमरे का वातावरण बिल्कुल वैसा ही था जैसे सत्य नारायण कथा पूजा में होता है।


    आरती के बाद जब अंग्रेजीलाल की नजर मुझ पर पड़ी तो वह श्वेलकम माय फ्रेन्डश् कहते हुये मेरे पास आया। अंग्रेजी बाई भी किसी महिला को देखकरए श्हाय हाऊ आर यू डियरए प्लीज कम फ्राम हियरश् कहते हुये स्वागत कर रही थी। वहाँ बहुत सारे लोग श्हायश् कहते हुये आ रह थे और कुछ लोग श्बायश् कहते हुये जा रहे थे।


    प्रसाद वितरण के पश्चात भोजन ग्रहण करके मैं भी कमरे से बाहर निकल आया था। अपने घर जाने के लिये बस आगे बढ़ा ही था तभी उस बंगले के एक कोने के कमरे से किसी महिला की रोने की आवाज सुनाई दी। मैंने नजदीक जाकर देखाए दरवाजा अंदर से बंद था। मैंने खिड़की से झाँक कर देखने की कोशिश की। एक अधेड़ महिला अपने आँचल से मुँह ढांक कर सुबक.सुबक कर रो रही थी। चेहरा पहचान नहीं आ रहा था। तभी अचानक मेरे दिमाग में एक प्रश्न कौंधाए कहीं ये हमारी हिन्दी माता तो नहींघ्


वीरेन्द्र श्सरलश्
बोड़रा;मगरलोड़द्ध
जिला.धमतरी ;छत्तीसगढ़द्ध

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लोक गीतों में झलकती संस्कृति का प्रतीक होली

- आत्माराम यादव पीव

होली की एक अलग ही उमंग और मस्ती होती है जो अनायास ही लोगों के दिलों में गुदगुदी व रोमांच से भर देती है। खेतों में गेहूं चने की फसल पकने लगती है। जंगलों में महुए की गंध मादकता भर देती है। कहीं आम की मंजरियों की महक वातावरण को बासन्ती हवा के साथ उल्लास भरती है तो कहीं पलाश दिल को हर लेता है। ऐसे में फागुन मास की निराली हवा में लोक संस्कृति परम्परागत परिधानों में आन्तरिक प्रेमानुभूति के सुसज्जित होकर चारों ओर मस्ती भंग आलम बिखेरती है जिससे लोग जिन्दगी के दुख - दर्द भूलकर रंगों में डूब जाते है। शीत ऋतु की विदाई एवं ग्रीष्म ऋतु के आगमन की संधि बेला में युग मन प्रणय के मधुर सपने सजोये मौसम के साथ अजीव हिलोरें महसूस करता है। जब सभी के साथ ऐसा हो रहा हो तो यह कैसे हो सकता है कि ब्रज की होली को बिसराया जा सके। हमारे देश के गाँव - गाँव में नगाड़े पर थाप पड़ने लगती है,झांझरों की झंकार खनखना उठती है और लोक गीतों के स्वर समूचे वातावरण को मादक बना देते हैं। आज भी ब्रज की तरह गांवों व शहरों के नर - नारी बालक - वृद्ध सभी एकत्रित होकर खाते हैं पीते - गाते हैं और मस्ती में गाते - नाचते हैं।
राधा कृष्ण की रासस्थली सहित चौरासी कोस की ब्रजभूमि के अपने तेवर होते हैं जिसकी झलक गीतों में इस तरह फूट पड़ने को आतुर है जहां युवक युवतियों में पारंपरिक प्रेमाकंट के उदय होने की प्राचीन पराकाष्ठा परिष्कृत रूप से कूक उठती है:
आज विरज में होली रे रसिया
होली रे रसिया बरजोरी रे रसिया
कहॅू बहुत कहॅू थोरी रे रसिया
आज विरज में होली रे रसिया।
नटखट कृष्ण होली में अपनी ही चलाते है। गोपियों का रास्ता रोके खड़े होना उनकी फितरत है तभी जी भर कर फाग खेलने की उन जैसी उच्छृखंलता कहीं देखने को नहीं मिलती। उनकी करामाती हरकतों से गोपियां समर्पित हो जाती है और वे अपनी बेबसी घंूघट काढ़ने की शर्महया को बरकरार रखे मनमोहन की चितवन को एक नजर देखने की हसरत लिये जतलाती है कि सच मैं अपने भाई की सौगंध खाकर कहती हूं कि मैं तुम्हें देखने से रही। इसलिये उलाहना करते हुये कहती है कि
भावै तुम्हें सो करौ सोहि लालन
पाव पड़ौ जनि घूंघट टारौ
वीर की सौ तुम्हे देखि है कैसे
अबीर तो आँख बचाय के डारौ
जब कभी होली खेलते हुए कान्हा कहीं छिप जाते है तब गोपियां व्याकुल हो उन्हें ढूंढती है। उनके लिए कृष्ण उस अमोल रत्न की तरह है जो लाखों में एक होता है। वे कृष्ण के मन ही मन नहीं अपितु अंगों की सहज संवेदनाओं से भी चिर - परिचित है तभी उनके अंग स्पर्श के अनुभव को तारण करते हुए उपमा देती है कि उनके अंग माखन की लुगदी से भी ज्यादा कोमल है:
अपने प्रभु को हम ढूंढ लियों
जैसे लाल अमोलक लाखन में
प्रभु के अंग की नरमी है जिती
नरमी नहीं ऐसी माखन में।
वे कृष्ण को एक नजरभर के लिये भी अपने से अलग रखने को कल्पना नहीं करती। यदि वे नजरों के आगे नहीं होते तो उस बिछोह तक को वे अपने कुल की मर्यादा पानी में मिलाकर पीने का मोह नहीं त्यागती। जब कृष्ण दो चार दिन नहीं मिलते तो उस बिछुड़न की दशा में उनको होश भी नहीं रहता कि कब उनकी आँखों से बरसने वाले आँसुओं से शरीर धुल गया है:
मनमोहन सों बिछुरी जब से
तन आँसुन सौ नित धोबति है
हरीचन्द्र जू प्रेम के फन्द परी
कुल की कुल लाजहि खोवती है।
इस कारण सभी गोपियां मान प्रतिष्ठा खोकर दुख उठाने के लिये सदैव तत्पर रहती हैं। उन्हें भोजन में रूचि नहीं है, बशर्ते कृष्ण ब्रजभूमि त्यागने को न कहे। ब्रज भूमि से इतना अधिक गहरा लगाव हो गया है जैसे आशा का संबंध शरीर से एकाकार हो जाता है.
कहीं मान प्रतिष्ठा मिले - न -मिले
अपमान गले में बंधवाना पड़े
अभिलाषा नहीं सुख की कुछ भी
दुख नित नवीन उठाना पड़े
ब्रजभूमि के बाहर किन्तु प्रभो
हमको कभी भूल के न जाना पड़े
जल भोजन की परवाह नहीं
करके व्रत जीवन यूँ ही बिताना पड़े।
फाग की घनी अंधेरी रात में श्याम का रंग उसमें मेल खाता है। गोपी उन्हें रंगने को दौड़ती है किन्तु वे पहले ही सतर्क है और गोपियां अपने मनोरथ सिद्घ किये बिना कृष्ण के हाथों अपने वस्त्र ओढ़नी तक लुटा आती है:
फाग की रैनि अंधेरी गलि
जामें मेल भयो सखि श्याम छलि को
पकड़ बाँह मेरी ओढ़नी छीनी
गालन में मलि दयो रंग गुलाल को टीको।
आयो हाथ न कन्हैया गयो न भयो
सखी हाय मनोरथ मेरे जीको।
कृष्ण पर रीझी गोपियां अनेक अवसर खो बैठती है तो कई पाती भी है। इधर कृष्ण, गोपी को अकेला पाकर उस पर अपना अधिकार जताते है तो उधर गोपियां कृष्ण को गलियों में रोक गालियां गाते हुए तालियां बजाती पिचकारी से रंग देती है:
मैल में माई के गारी दई फिरि
तारी दई ओ दई ओ दई पिचकारी
त्यों पदमाकर मेलि मुढ़ि इत
पाई अकेली करी अधिकारी।
फाग हो और बृजभान दुलारी न हो ऐसा संभव नहीं। रंग गुलाल केसर लिये मधुवन में कृष्ण के मन विनोद हिलोर लेता है कि अब बृजभान ललि के साथ होली खेलने का आनन्द रंग लायेगा:
हरि खेलत फाग मधुवन में
ले अबीर सुकेसरि रंग सनै
उत चाड़ भरी बृजभान सुता
उमंग्यों हरि के उत मोढ़ मनै।
होली खेलते समय कृष्ण लाल रंगमय हो जाते है जागते हुए उनकी आंखें भी लाल हो गई है। नंदलाल, लाल रंग से रंगे है यहाँ तक कि पीत वस्त्र पीताम्बर सहित मुकुट भी लाल हो गया है:
लाल ही लाल के लाल ही लोचन
लालन के मुख लाल ही पीरा
लाल हुई कटि काछनी लाल को
लाल के शीश पै लस्त ही चीरा।
मजाक की अति इससे कहीं दूसरी नहीं मिलेगी जब गोपियां मिलकर कृष्ण को पकड़ उनके पीताम्बर व काम्बलियाँ को उतारकर उन्हें साड़ी झुमकी आदि पहना दे फिर पांव में महावर आँखों में अंजन लगा गोपी स्वरूप बनाकर अपने झुण्ड में शामिल कर लें तब होली का मजा दूना हुए नहीं रह सकेगा:
छीन पीताम्बर कारिया
पहनाई कसूरमर सुन्दर सारी
आंखन काजर पाव महावर
सावरौ नैनन खात हहारी।
कृष्ण इस रूप में अपने ग्वाल सखाओं के साथ हँसी ठहाका करने में माहिर है। बृजभान ललि भीड़ का लाभ लेकर कृष्ण को घर के अन्दर ले जाती है और नयनों को नचाते हुए मुस्कुराहटे बिखेरती हुई दोबारा होली खेलने का निमंत्रण इस तरह देती है:
फाग की भीर में पकड़ के हाथ
गोविन्दहि ले गई भीतर गोरी
नैन नचाई कही मुसुकाइ के
लला फिर आईयों खेलन होरी।
होली के राग रंग में कोई अधिक देर रूठा नहीं रहता जल्दी ही एक दूसरे को मनाने की पहल चल पड़ती है फिर मिला जुला प्रेम पाने की उम्मीद में सभी रंगों में खो जाते है। लक्ष्य और भावना के चरम आनन्द की भाव भंगिया को आंखों में अंग प्रत्यंग में व्यक्त किये पीढ़ी दर पीढ़ी यह पर्व अनन्तकाल से चला आ रहा है। कृष्ण ब्रज को मन में बसाये एक महारास की निश्छलता श्रद्घा को जीवन्त रखने हेतु सभी को प्रेरित करता हुआ आनन्द की तरंगें फैलाता जीवन में रंग घोल जीने की कला लिये।

द्वारकाधीश मंदिर के सामने,
केसी नामदेव निवास, जगदीशपुरा,
वार्ड नं. 2, होशंगाबाद (मध्यप्रदेश )

नरेश मेहता के उपन्यास Ó यह पथ बन्धु थाÓ में लोक सांस्कृतिक परिदृश्य के विविध रुप


- शोधार्थी आशाराम साहू

उपन्यास, साहित्य की प्रमुख विधाओं में सबसे आधुनिक है। उपन्यासों में प्राय: जीवन और संस्कृति का समावेश होता है, इसी कारण वह लोक संस्कृति का वाहक बनता है। यह अवश्य है कि कथा की मांग के अनुसार किसी उपन्यास में लोक संस्कृति का चित्रण कम होता है और किसी में अधिक। बसाहट की दृष्टि से भारतीय जनसंख्या का दूसरा प्रवर्ग कस्बों,छोटे शहरों,नगरों और महानगरों में निवास करती है, जिसे सुविधा के लिएÓ ग्रामेतरÓ प्रवर्ग की संज्ञा दे दी जानी है। नगरों - कस्बों की पृष्ठभूमि पर रचित सभी उपन्यासों में चाहे उनका केन्द्रीय कथ्य जो भी हो, मध्यवर्ग किसी न किसी रूप में अवश्य विद्यमान है। नगरीय परिवेश में मध्यवर्गीय जीवन, उनके रहन - सहन, लोक संस्कृति के विविध रूपों का अंकन प्रमाणित रूप से नरेश मेहता द्वारा लिखित उपन्यासÓ यह पथ बन्धु थाÓ में देखने को मिलती है, साथ ही साथ पारिवारिक विघटन एवं स्त्री के प्रति अमानवीय क्रूरता का भी बड़ी ही संजीदगी के साथ चित्रण हुआ है, साथ ही एक ईमानदार व्यक्ति के पूरे शासन के प्रति विद्रोह एवं उसकी पराजय की करूण गाथा को मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है।
चूँकि यह उपन्यास कस्बों एवं नगरों के जनजीवन पर आधारित है, फिर भी उपन्यासकार ने लोक संस्कृति से जुड़े अनेक परिदृश्यों को बड़ी ही रोचकता एवं सजीवता के साथ उभारा है।
ÓÓ दिनभर घानी में पिलकर बैल बाहर बँधा हुआ खली खाता हुआ मिलता। खली की गंध दूर से ही आती जिसके साथ कच्चे तैल की भी चिपचिपाहट होती। घर के सामने कोने में बड़ी सी बावड़ी में कहीं दुबके कबूतरों की गुटरगूँ बहुत गरे से आती लगती।ÓÓ1
इस प्रकार के दृश्यों से जब हमारा सामना होता है तो लगता है जैसे ये सब हमारे आँखो के सामने है, हम उसे देख रहे है, महसूस कर रहे है, उन्हें जी रहे है, ऐसा लगता है ये सारे परिदृश्य हमारे जीवन में आकर समाहित हो गये हो। इसके अलावा नरेश मेहता ने इस उपन्यास में तीज - त्यौहारों, विवाह, मेले, रहन - सहन, खान - पान आदि लोक परंपराओं को भी बखूबी दर्शाया है - ÓÓ घर का सामान झाड़ - पोछकर साफ  किया जा रहा था। इस सबमें बच्चों और स्त्रियों का मन बहुत लगता है। नये चूने के पोते जाने की गंध आ रही थी। छतों, खिड़कियों, दरवाजों, खम्भों की लकड़ियों पर तैल - पानी किया जा रहा था।ÓÓ2
भारत पर्वो एवं त्यौहारों का देश है। यहाँ विभिन्न प्रकार की त्यौहारें मनायी जाती है, और लेखक भली- भाँति इन पर्वो एवं त्यौहारों से परिचित है और उनकी महत्ता से भी। इसी कारण लोक पर्वो एवं त्यौहारों का चित्रण उनके उपन्यासों में बखूबी हुआ है।
ÓÓ फाल्गुन बीत चुका था। चैत्र के आरंभिक दिन थे। रात के गहरे सन्नाटे में दूर कहीं फाग और ढपली के स्वर सुनायी पड़ जाते।ÓÓ3
हमारी भारतीय परंपरा में सोलह संस्कार माने जाते है। जिनमें विवाह संस्कार का विशेष महत्व है। यह एक ऐसा संस्कार है। जिसके लिए हर माता - पिता लालायित रहता है। मंडप सजा होता है, कानों में शहनाईयों की स्वर लहरियाँ गूँजने लगती है, पूरा वातावरण खुशियों से भरा होता है,कुछ ऐसी ही खुशियों का पल आज ठाकुर परिवार में है। श्री धर की छोटी बेटी सुशीला का विवाह होने जा रहा है, उन पर हल्दी का लेप लगाया जा रहा है और महिलायें हँसी - ठिठोली करते हुये गीत गा रही है-
ÓÓ बरेली के बाजार में झुमका गिरा दी!
सास मेरी ढूढ़े
ननद मोरी ढूढ़े
अरे, बलमा ढूँढ़े री!!
बरेली के बाजार में झुमका गिरी दी !ÓÓ4
रात को आँगन में चौक पूरा जाता। सुशीला का श्रृंगार कर औरतें घेर कर बैठ जाती और गीत शुरू हो जाता -
ÓÓ न पकड़ो हाथ मनमोहन
कलाई टूट जायेगी
जवाहर की जड़ी - चूड़ी
हमारी टूट जायेगीÓÓ5
नरेश मेहता जी कुछ वर्ष बंगाल में भी रहे, वहाँ की लोक संस्कृति को भी उसने बड़ी ही मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है -
ÓÓ बंगाली बाबू आएँ तो बड़ा मजा होवे !
मंदिर वनवावें
शिवाला वनवावें
और हमको बंगला - हो
बंगाली बाबू आवें तो बड़ा मजा होवेÓÓ 6
अर्थात लोक संस्कृति कहीं की भी हो, हमें प्रभावित करती ही है, उसमें प्राय: समानता पायी जाती है।
चूँकि यह नरेश मेहता का महाकाव्यात्मक उपन्यास माना जाता है। इसकी पृष्ठभूमि में लेखक ने और भी कथाएँ गढ़ी है - जो अलग - अलग विजन को साथ लिए चलती है। उन्हीं के शब्दों में जो उन्होंने Ó यह पथ बन्धु थाÓ की भूमिका में कहा था -ÓÓ यह उपन्यास बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के सामाजिक जीवन मूल्यों एवं मान्यताओं पर आधारित है। यह युग तथा इसके चरित्र एवं इसकी विशिष्टताएँ अभी - अभी शेष हुई सी है, अतएव स्मृति अधिक है, इतिहास कम। हमारा इनसे अभी भी सायुज्य भाव है, लेकिन अनागत में जब ये इतिहास बन जायेंगे तब इस काल के केवल सफल पुरुष ही स्मरण किये जायेंगे। इतिहास केवल क्रूरों तथा महापुरूषों का ही होता है, जबकि हमारी स्मृतियों में ऐसे अनेक साधारणजन होते हैं जो व्यक्ति भी नहीं बन पाते, केवल संख्या होते है। लेकिन हम जानते है कि ये असफल सामान्य जन इतिहास न हो, महापुरुष न हो, किन्तु मानुष होते है। इतिहास में मात्र संज्ञाएँ सत्य होती है जबकि साहित्य में संज्ञाएँ काल्पनिक। इतिहास सफलता का गौरव देता है जबकि साहित्य केवल मानवता को। इसलिए दोनों में मामूली अंतर यह है कि इतिहास सफलता का चारण है, जबकि साहित्य मानवता का उदगाथा।ÓÓ7
Ó यह पथ बन्धु थाÓ उपन्यास के माध्यम से लेखक ने मध्यम वर्ग के टूटते हुए व्यक्ति एवं उसके पारिवारिक जीवन के विघटन को बड़ी ही मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जहाँ  Ó यह पथ बन्धु थाÓ में बाह्य घटनाओं का विस्तार है वहीं निजी प्रसंगो का समावेश भी।
अगर इस उपन्यास की कथा वस्तु को देखा जाय तो, यह दो भागों में विभाजित है, पहला भाग वह है जिसमें श्रीनाथ ठाकुर का परिवार छिन्न -भिन्न हो रहा है, कलह और अमानवीय हद तक शत्रुता से भरे इस वातावरण में पिसने वाला पक्ष श्रीधर का परिवार है, जिसकी त्रासदी सबसे अधिक सरों और गुनी के माध्यम से व्यक्त हुई है। दूसरे पक्ष में श्रीमोहन और श्रीवल्लभ हैं, जिनकी पत्नियाँ - बँटवारे की जिनकी मांगे - श्रीनाथ ठाकुर को इस विघटन का द्रष्टा मात्र बनाकर छोड़ती है। पूरी परिस्थिति में कोई सबसे अधिक टूटा है तो श्रीनाथ ठाकुर। परिस्थिति के किसी भी हिस्से से उनका लगाव नकारात्मक ही है। श्रीधर जो उपन्यास का एक प्रमुख पात्र है, पेशे से शिक्षक, स्कूल में हिन्दी, इतिहास तथा भूगोल पढ़ाते है। उन्होंने Ó राज्य का गौरवमय इतिहासÓ नाम पुस्तक लिखा था, इसलिए उसे हम इतिहास लेखक भी कह सकते हैं और इसी इतिहास पुस्तक के फलस्वरूप उनके वर्तमान जीवन में उथल - पुथल मच जाता है,क्योंकि उन्होंने श्रीमंत सरकार तथा उनके पूर्वजों का बारंबार उल्लेख करते हुये भी उनके सम्मान में राजकीय सम्बोधनों एवं पदवियों का प्रयोग नहीं किया था जो श्रीमंत सरकार के असंतोष का प्रमख कारण भी था। जिनके एवज में उन्हें नौकरी से त्याग पत्र देना पड़ता है। और यही से शुरूवात होती पारिवारिक विघटन एवं सबंधहीनता का दौर। जब श्रीमोहन जो श्रीधर का बड़ा भाई है, उससे इस संबंध में बात करना चाहता है तो श्रीमोहन की पत्नी उसे टोकते हुए कहती है -ÓÓतुम्हें क्या है ? जाने कैसे किताब लिखी। न लिखते समय, न सरकार की चि_ी आयी उस समय, जब हमसे कुछ पूछा ही नहीं, तब अब हम बीच में क्यों पड़े ? सरकारी मामला है। तुम बीच में मत पड़ना। अपनी नौकरी और बाल - बच्चे भी तो देखने है। अरे, देवर जी की नौकरी ही क्या है, मास्टरी की न ? न होगा दूसरी कर लेंगे। और मान लो न करे कुछ, हमें किसी से क्या ? 8
इस तरह मुसीबत के समय श्रीमोहन अपने भाई श्रीधर का कोई मदद नहीं करता।
स्वयं नरेश मेहता के शब्दों में - यह निपट साधारणजन की दूबगाथा है। इस उपन्यास में मध्यवर्गीय जीवन की पृष्ठभूमि में वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक दायरे में होने वाले मूल्यगत विघटन और व्यापक मोहभंग का सशक्त अंकन किया गया है। नेमिचन्द्र जैन के अनुसार - इसमें एक युग के सामाजिक, राजनीतिक जीवन - मूल्यों और मान्यताओं की पृष्ठभूमि में वैयक्तिक जीवन का संवेदनशील और आत्मीयतापूर्ण चित्र है जो भाव संकुल, तीखा और संयत है।9
श्रीधर एक अध्यापक हैं साथ ही अपने भाईयों में सबसे अलग, आदर्शवादी, सिद्धांतवादी और संकोची और इसी आदर्शवाद एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए वह एक दिन अपने परिवार को सोता हुआ छोड़कर बिना किसी से कुछ कहे चुपचाप चला जाता है, एक नये परिवेश में। और उस नये परिवेश में जोड़ने के क्रम में निरन्तर टूटता चला जाता है। मूल्य तथा सार्थकता का बहुत बड़ा स्वप्न लेकर चलने वाला व्यक्ति अंत में अपने को चारो - ओर से हारा हुआ अकेला और अजनबी पाता है। प्रखर आलोचक - रामदरश मिश्र लिखते है - ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓÓ उपन्यास का पथ अनुभव का है, इसीलिए वही बन्धु है। अनुभव ही बन्धु हो सकता है, सुख का, दुख का। उसके बिना मूल्यवान - से - मूल्यवान दिखने वाली जिन्दगी रीती है।10
श्रीधर और सरस्वती पति - पत्नी है, लेकिन दोनों का जीवन एक वृत्त के समान थे जो एक - दूसरे को छूते तो थे लेकिन काटते नहीं थे। घर छोड़कर जाने के बाद श्रीधर उज्जैन, इंदौर, आदि स्थानों में बारी - बारी ठहरता है और इंदौर में क्रांतिकारियों के संपर्क में आता है परन्तु उनके शांत संस्कार क्रांतिकारी बनने से रोकता है और वह कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेकर राजनीति से अपने को जोड़ना अवश्य चाहता है। कुछ राजनीतिक घटनाओं के कारण उन्हें इंदौर छोड़कर बनारस आना पड़ता है। वहाँ उसे परिश्रम करके, प्रकाशक के यहाँ अनुवाद बेचकर कभी साहित्य के प्रतिष्ठित आचार्य की पत्रिका में मुफ्त काम करके जैसे - तैसे गुजारा करना पड़ता है। वहाँ वह प्रकाशकों, साहित्यिकों, प्रतिष्ठित नेताओं के संपर्क में आता है, लेकिन उसे सर्वत्र एक रीतापन, एक भयंकर विसंगति दिखाई देती है। वह हर बार अपने को सार्थक करने के लिए अपने आप को परिवेश से जोड़ना चाहता है, परन्तु हर बार परिवेश की कुरूपता, कठोरता उसे तोड़ जाती है। उसके मन में अखबार निकालने की इच्छा होती है और प्रकाशक के साथ मिलकर मेहनत भी करता है किन्तु अनुभव करता है कि वहाँ भी विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है। पैसा शोषण का अस्त्र है, वह चाहे प्रकाशक के हाथ मे हो, चाहे स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले ठाकुर साहब जैसे तपे हुऐ नेता के हाथ में हो, चाहे किसी और के हाथ में हो। वह शोषण का अस्त्र बार - बार श्रीधर जैसे ईमानदार, असमझौतावादी, स्वप्नदर्शी व्यक्ति को तोड़ता है और श्रीधर अंत में हारा हुआ, टूटा हुआ आदमी बनकर शेष रह जाता है। श्रीधर के चले जाने के बाद सरो की जिंदगी में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, वैसे तो वह पहले भी सुखी नहीं थी लेकिन अनाथ भी नहीं थी। श्रीधर के न होने पर भाई - भौजाई को एक तरह से छूट मिल गई और बातों - बातों में सरो को खरी - खोटी सुनाने का मौका भी।
ÓÓ पति की एक छाया होती है जो अनजाने में ही पत्नी, बाल - बच्चों के ऊपर ही ऊपर मौसमों के विभिन्न तापमान स्वयं झेल लिया करती है। पति के पास में न रहने पर आकाश एकदम सिर ऊपर आ जाता है। सारी तपन, सियरापन सभी तो फिर सीधे - सीधे भुगतना होता है ..... यदि आप अपने दारिद्रय में न सही वस्त्र तो घर तो पहने हुए होते हैं, लेकिन सहसा भूकम्प आ जाये और दीवारें ढह जाएं तो, तो क्या हो ? आप निपट न हो जाएँ ?11
सरो की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई थी। जेठ - जेठानी आये दिन किसी न किसी बहाने दो - चार सुनाकर ही दम लेते है। सरो का जीवन अब जेठानी सावित्री के लिए किसी हास - परिहास के विषय से ज्यादा कुछ नहीं थी।
ÓÓ बीमार है तो क्या है। और ऐसी क्या बीमारी है ? कोई मोतीझरा निकला है ? जलोदर है क्या ? सन्निपात हुआ है ? क्या हुआ है। कोई पूछे तो जरा इन महारानी से ? कहती है रात को हल्का - हल्का बुखार हड्डियों में हो जाता है। सुनती हो बहना! हड्डियों में बुखार!! हाय - हाय कुरबान जाऊँ ऐसी नजाकत पर। इस देहात में लखनऊ की बेगम साहबा आय गयी बेचारी!12
इस तरह सावित्री रोज - किसी न किसी बहाने सरो को ताना मारती रहती,और खुश रहती। सरो के पास सहन करने के अलावा कोई उपाय भी तो नहीं था। आखिर जल में रहकर कोई मगरमच्छ से बैर करे तो भला कैसे और कब तक ?
इधर गुनी भी अब बड़ी हो गई,कुछ दिनों के बाद उनका विवाह भी तय हो गया। और वो शुभ घड़ी भी बहुत जल्दी आ गई, आज ही तो बारात आने वाली है सारा - घर सगा - संबंधियो से भरा पड़ा है, कहीं एक तिल धरने की भी जगह नहीं है। बारात आगमन के बाद विवाह की सारी रस्में एक - एक करके संपन्न होने लगी - पुरोहित जी जोर - जोर से हवन पाठ पढ़ने लगे
वाजन्त्री सावधान !!
ढोल - नगारा सावधान !!
मंगलगानी - सावधान !!
वर - वधु - सावधान !!13
चौबीस घड़ी सावधान!! इस तरह विवाह के सभी रस्मों के साथ गुनी की विदाई भी हो गई। कुछ दिन तो सब ठीक रहा उसके बाद उनके घरवालों ने दहेज के नाम पर मारना - पीटना शुरू कर दिया और इतना मारा - पीटा की बेचारी लंगड़ी ही हो गई। परिस्थिति कहीं और ज्यादा ना बिगड़ जाये यही सोचकर श्रीनाथ ठाकुर गुनी को उनके ससुराल से वापस ले आये। गुनी की ऐसी हालत को देखकर घर के सभी लोग सदमे में थे।
ÓÓ पूरे परिवार में एक अजीब तरह की घुटन समा गयी थी। सब अपने - अपने ढंग से या तो बीमार, या वृद्ध हो गये थे,या रोगी हो गये थे, या उपेक्षित थेÓÓ14 घर का बँटवारा तो पहले ही हो चुका था,श्रीमोहन ठाकुर अपने परिवार वालों के साथ छावनी वाले मकान में चले गये थे। श्रीवल्लभ तो पहले ही ससुराल में समाधि लगाकर बैठ गये थे। बच गया श्रीधर का परिवार तो सरों, माँ - बापू बच्चे सभी पुराने घर में ही रह रहे थे। श्रीनाथ ठाकुर का परिवार पर ही दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। श्रीधर का अभी तक कुछ पता ही नहीं था, गुनी को लेकर भी घर में सभी दुखी रहने लगे -ÓÓ दुख भी जब रोज का जीवन बन जाता है तब उसका वैशिष्ट्य नष्ट हो जाता है। तब भोक्ताओं की ऐसी मनोदशा हो जाती है कि छोटे - मोटे कष्ट, रोग - ताप तो जैसे अनिवार्य मान लिए जाते है। ऐसी भोक्ताओं को तब तक किसी बात पर आश्चर्य नहीं होता जब तक कि कुछ बहुत बड़ी दुख की बात न हो जाये। और जब सहते - सहते व्यक्ति की यह मनोवृत्ति हो जाती है तब उसे फिर कोई दुख नहीं व्यापता - संभवत: बड़े से बड़ा दुख भी। इसलिए ठाकुर - परिवार को विपन्नताएँ हो सकती थी लेकिन दुख नहीं। दुखों की पराकाष्ठा के बाद दुख नहीं होते।ÓÓ15
दुख की कितनी मार्मिक अभिव्यक्ति यहाँ पर नरेश मेहता ने की है। यहाँ पर हमें वो एक दार्शनिक के रूप में मिलते है- गुनी के माध्यम से वे कहते है - जिजी! जीवन में आंसुओं का मूल्य है न भावना का। केवल सहना ही सत्य है। बिना सहे तो कोई गति नहीं। अपने प्रति भी निर्दय होना पड़ता है जिजी! हम सब सह रहे है। बापू, माँ, तुम, मैं, बाबा सभी तो अपने - अपने ढंग से सह रहे है। दुख किस बात की? बोलने से व्यक्ति कमजोर होता है। इसीलिए मैं चुप रहती हूँ। दुख वाणीहीन होता है। हमें कष्ट नहीं, तकलीफें नहीं है कि उन्हें बँटा ले। दुख वह परमपद है जिजी! जिसे स्वत: ही भोगना होता है। सब व्यर्थ है यहाँ।ÓÓ16
जीवन में सुख - दुख की जो स्थिति है उसे उपन्यासकार ने बड़ी ही वास्तविकता के साथ यहाँ पर प्रस्तुत किया है सुख में तो सहभागिता हो सकती है किन्तु दुख में कोई सहभागिता नहीं होती।
इधर श्रीधर 25 वर्षो के बाद, हारकर, टूटकर अपने घर आता है, तो पाता है सब कुछ जैसे खत्म हो गया हो, पत्नी बीमारी से घुट - घुट कर मर रही है। बेटी अपाहिज की जिंदगी जी रही है मर - मर कर। माँ - बापू परलोक सिधार गये है। इनके दोनों भाई अपने - अपने परिवारों के साथ सुख की जिंदगी जी रहे है। श्रीधर के मन में एक अन्तर्द्वन्द्व चल रहा है। कैसा घर है यह ? क्या इसी हाहाकार के लिए घर होता है ? लेकिन इस हाहाकार का दायित्व किस पर ? हमारा पुरूषार्थ, आदर्श, कर्म सब जब झूठे पड़ जाये तो व्यक्ति क्या करें?ÓÓ17
यह प्रश्न केवल श्रीधर से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि ये हमारे समाज, संस्कृति और आदर्शो से भी जुड़ी हुई है। किताबों में पढ़ी हुई जिन आदर्शो की बातों को लेकर श्रीधर जिस सच्चाई, जीवन मूल्यों के लिए लड़ता है और अपना सब कुछ गँवा बैठता है, वह उन आदर्शो की वास्तविक जीवन में कहीं कोई मेल नहीं पाता। चारो - ओर विरोधाभास की स्थिति दिखाई देती है, और अंत में वह सब कुछ हार जाता है।
सरो की बीमारी अंतिम पड़ाव में पहुँच चुका है! श्रीधर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है और एक दिन सरों भी उन आदर्शो की भेंट चढ़ जाती है, उनकी मृत्यु हो जाती है - लेकिन देखा जाये तो क्या सरो आज पहली बार मरी है ? नहीं, वह तो जीवन में कई मौतें मरी - कभी पति के वियोग में, कभी बच्चो की लाचारी में, लेकिन हमें केवल एक बार का मरना ही दिखाई दिया, और यही अंतिम था। कान्ता ने सरो को कैसा अंतिम यात्रा के लिये सजाया था, हाथ - पैरों में मेंहदी, महावर लगायी थी, बाल काढ़े थे। माँग और टीका कैसे सुलग पड़े थे ..... बस्ती के इस एकमात्र पथ को साक्षी बना वह पालकी में बैठकर आई थी और आज अपनी देह से उत्पन्न प्रजा के बीच उसी पथ से सबको बंधु बना लौट गयी है।ÓÓ18
हमारी भारतीय संस्कृति, हमारे लोक जीवन में मृत्यु संस्कार की जो परंपरा है उसी का निर्वाह करते हुए सरो को भी अंतिम विदाई दी गई।
डॉ. गोपाल राय लिखते है - ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓÓ केवल एक ईमानदार आदमी की पराजय गाथा नहीं है, इसके साथ ही भारतीय नारी की करुणा से भरी नियति कथा भी है। इसकी एक प्रमुख पात्र सरो (सरस्वती) मध्यवर्गीय परिवारों की उस बहू का प्रारूप है जो परिवार के सदस्यों द्वारा अनेक प्रकार से पीड़ित, अपमानित और शोषित है ..... इस प्रकार नरेश मेहता ने मध्यवर्गीय परिवारों में नारी की दुर्भाग्यपूर्ण नियति का अत्यंत यथार्थ और करुण चित्र प्रस्तुत किया है।ÓÓ19
नरेश मेहता ने ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓÓ उपन्यास के माध्यम से परिवार में उभरने वाले मूल्यों की टकराहट, संबंधों की विच्छिन्नता, आदर्शो एवं सिद्धांतो के गिरते हुए मूल्य, परायेपन का बोध, साथ ही साथ लोक संस्कृति एवं लोक जीवन से जुड़े अनेक संस्कारों एवं पर्वों को बड़ी ही मार्मिकता के साथ उभारा है।
डॉ. रामदरश मिश्र के अनुसार -ÓÓ यह उपन्यास अनुभवों का उपन्यास है। मध्यवर्ग के एक ईमानदार व्यक्ति के अनुभवो का इतिहास। लेकिन इस व्यक्ति का अनुभव केवल अपने भीतर से नहीं गुजरता बल्कि विराट परिवेश के बीच से गुजरता है। इसलिए इसमें एक साथ बड़े प्रमाणिक रूप में व्यक्ति का भी अनुभव गुजरता है। और समाज का भी। सामाजिक जीवन के जिन सत्यों को लिया गया है वे फारमूलें नहीं मालूम पड़ते बल्कि अनुभव मालूम पड़ते है।Ó गोदानÓ का निम्न वर्गीय होरी अपने समूचे अनुभव में जितना प्रमाणिक है, मध्यवर्गीय श्रीधर भी उतना ही प्रमाणिक है। होरी को घेरने वाले परिवेश का स्वरूप थोड़ा दूसरा है, श्रीधर को घेरने वाला परिवेश कुछ दूसरा। दोनों अपनी - अपनी तरह से टूटते और बिखरते है।Ó यह पथ बन्धु थाÓ गोदान के समान अपने यथार्थ की प्रमाणिकता के कारण ही विशिष्ट हैं। कहीं - कहीं तो गोदान में भी फारमूलें है परन्तुÓ यह पथ बन्धु थाÓ अपनी विराट काया में कहीं भी अनुभव के पथ से नहीं हटता।ÓÓ20
इस प्रकारÓ यह पथ बन्धु थाÓ के माध्यम से लेखक ने जीवन के अनेक मानवीय पक्षों एवं विसंगतियों को इसÓ औपन्यासिक कथाÓ में समाहित करके जीवन को एक नयी मानवीय दृष्टि प्रदान करने का अथक प्रयास किया है, जिसमें वे पूर्णत: सफल भी हुए है।
संदर्भ ग्रंथ:
1. मेहता, नरेश ÓÓ यह पथ बन्धु थाÓ लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण - 1982
2. वहीं, पृष्ठ - 98
3. वहीं, पृष्ठ - 511
4. वहीं, पृष्ठ - 519
5. वहीं, पृष्ठ - 519
6. वहीं, पृष्ठ - 520
7. वहीं, भूमिका
8.  वहींं
9. राय, डॉ. विद्याशंकर ÓÓआधुनिक हिन्दी उपन्यास और अजनबीपनÓÓ पृष्ठ - 105 सरस्वती प्रकाशन मंदिर, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण - 1981
10. मिश्र, डॉ. रामदरश Óहिन्दी उपन्यास: एक अंतर्यात्राÓÓ, पृष्ठ - 142, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण - 1968
11. मेहता, नरेश, ÓÓयह पथ बन्धु थाÓ पृष्ठ - 324, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद,
द्वितीय संस्करण - 1982
12. वहीं, पृष्ठ - 328
13. वहीं, पृष्ठ - 460
14. वहीं, पृष्ठ - 471
15. वहीं, पृष्ठ - 515
16. वहीं, पृष्ठ - 488
17. वहीं, पृष्ठ - 573
18. वहीं, पृष्ठ - 591
19. राय, डॉ. गोपाल ÓÓहिन्दी उपन्यास का इतिहासÓÓ, पृष्ठ - 253, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,
 चौथी आवृत्ति - 2014

हिन्दी विभाग
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (खैरागढ़)
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मो0 - 9575229842

Ó जमुनीÓ कहानी संग्रह में लोक जीवन और लोक संस्कृति

- शोधार्थी जीतलाल

अपराजेय मानवीय जिजीविषा के समर्थ कहानीकार मिथिलेश्वर जी की कहानियों में लोक संस्कृति और समाज से जुड़ी समस्याओं, आकांक्षाओं और संघर्षो को मुखरित कर साहित्य की परम्परा को स्थापित किया है। मिथिलेश्वर जी ग्रामीण जन-जीवन के कुशल चितेरे हैं। ÓजमुनीÓ कहानी संग्रह 2001 में प्रकाशित हुई है। प्राय: उनकी कहानियों में गाँव की जिन्दगी अपने समस्त रूप, रंग, गंध, राग-विराग के साथ चित्रित की है। स्वतंत्रता के बाद जिस तरह से शहरों में परिवर्तन आया, वैसा गाँव में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो पाया। मिथिलेश्वर जी की कहानियों में रीति-रिवाज, परम्परा के रूढ़िवादी विचारधारा एवं देवी-देवताओं, अंधविश्वास और भाग्यवादी जैसी मान्यताएं आज भी ग्रामीण जन-जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रखर आलोचक डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं - ÓÓइस पीढ़ी के कहानीकारों में से अधिकांश गाँव से शहर आये हैं, इसलिए उन्होंने अपनी कहानियों में ग्रामीण जन की समस्याओं को अंकित किया है, लेकिन उनकी कहानियों में आंचलिकता की स्थानीय रंगत नहीं है, क्योंकि न तो उनकी दृष्टि रूमानी है, और न ही वे अतीत के मोह से ग्रस्त है।ÓÓ1 प्राय: उनका यह वक्तव्य आश्चर्यजनक ही नहीं अपितु हास्यास्पद प्रतीत होता है चूँकि ÓजमुनीÓ कहानी में मिथिलेश्वर जी लिखते हैं - ÓÓहे काली माई! हे गौरेया बाबा! हे महावीर जी! हे सतगुरू! हे छठी मइया! हमार जमुनी कसहुँ निमन हो जाए...। वह पुन: देवी-देवताओं को गोहराने और मनौतियाँ मनाने लगती है। उसके रूआंसे मन के भीतर जाने-अनजाने छठ का एक गीत बज उठता है:
चार पहर राति जल-थ सेईले
सेईले चरण तोहार
छठी मइया.....
दुखवा हरना हमार.....2
ÓछूँछीÓ कहानी में मिथिलेश्वर जी लिखते हैं - ÓÓएहिजा चिलार पर पुन कमाए नइखीं बइठल। अपना परिवार के रोजी-रोटी खातिर बइठल बानीं। लाश लवारिस ह कि केहू के घर के, हमरा एहसे कवनो मतलब नइखे। आग दिआई पइसा से मतलब बा।ÓÓ3  प्राय: इन कहानियों में आंचलिकता की स्थानीय रंगत स्पष्ट दिखाई देती है।
मिथिलेश्वर जी की प्राय: कहानियों में लोक संस्कृति और लोक जीवन की छटा बिखरी पड़ी है - ÓÓपरानपुर आरा शहर का एक उपेक्षित मुहल्ला था। उसे मुहल्ला न कहकर अगर गाँव कहा जाए तो ज्यादा उचित होगा। वह गाँव था भी। शहर बढ़ते-बढ़ते वहाँ तक आ गया था। परानपुर के सभ्य और सम्पन्न कहे जाने वाले लोग उसे छोड़कर शहर के अच्छे मोहल्लों में जा बसे थे। लेकिन वहाँ के गरीब, उपेक्षित और पिछड़े वहीं रह गए थे। उनके साथ उनका वह गाँव भी रह गया था। कच्ची मिट्टी के खपड़ैल के घर फूँस की झोपड़ियां, पुराने जमाने के दो-एक पक्के मकान, सब यथावत् बरकरार थे। वहाँ के बाशिंदो की भाँति उस गांव की पुरानी संस्कृति भी बरकरार थी। दाई-बारी, धोबी-कुम्हार, कुली-मजदूर, मेहतर-मिस्त्री, डोम-चमार और पासी-कहार का काम करने वाले उस गाँव के लोग आम शहरियों की तरह एक-दूसरे से कटकर नहीं, सटकर जीते थे।''4 कमाने के लिए चाहे वे शहर के किसी मोहल्ले में जाते हों, लेकिन शाम को गाँव लौटने पर अपने गाँव के होकर ही जीते थे। जन्म-मरण, शादी-ब्याह और पर्व-त्योहारों के अवसरों पर ही नहीं, सदैव एक-दूसरे के सुख-दुख के साथ होते थे। किसके यहाँ क्या हो रहा है? किसके यहाँ कौन आया? किसे यहाँ क्या बना है? सब जानते थे। एक-दूूसरे का घर और एक-दूसरे का जीवन उनके लिए तनिक भी गोपनीय और अबूझ नहीं था। जो अपने में सिमटकर जीने वाले थे, ऐसे लोगों का वास इस मुहल्ले में नहीं। शायद इसीलिए ऐसे लोग इस मुहल्ले में थे भी नहीं।
ÓछूँछाÓ कहानी में बूढ़ी औरत की दयनीय स्थिति को चित्रित की गई है। बूढ़ी औरत को पीठ पीछे दँतुली कहते हैं। उसके पति के मर जाने और उनकी इकलौती बेटी को उनके ससुराल वाले ने जिंदा जला देने से उनकी मानसिक संतुलन खो जाती है। इसको देखते हुए, उसके देवर ने उसे पागल करार कर दिया। जिससे उसकी संपत्ति को हड़प कर, उसे घर से बाहर निकाल दिया जाता है। और वह दर-दर भटकती हुई परानपुर गाँव में पहुँच आयी है - ''परानपुरÓ में दँतुली किसी के दरवाजे पर नहीं रहती थी। गाँव के उत्तरी छोर पर स्थित ÓगोरेयाथानÓ (गोरेया बाबा नाम देवता का स्थान) के पास उसने डेरा जमाया था। नीम के एक पुराने वृक्ष के नीचे गोरेया बाबा का चबूतरा था। पर्व-त्योहारों के दिन परानपुर की औरतें गौरेया बाबा की पूजा करती थी। वह सार्वजनिक स्थल था।ÓÓ5 ÓगोरेयाथानÓ के पास एक गोरेया बाबा का चबूतरा था और दूसरी ओर परानपुर के कबाड़ों का ढेर। लोग अपने घर का कूड़ा-कर्कट और बेकार हो गए सामान वहीं फेंकते थे। उन्हीं कबाड़ों के पीछे अपने लिए जगह बनाकर वह रहती थी। बारिश के दिनों में किसी के ओसारे में जाकर छिप जाती थी। फिर बारिश के दिनों में किसी ओसारे में जाकर छिप जाती थी। फिर बारिश छूटते ही अपनी जगह पर आ जाती थी।
मिथिलेश्वर की कहानियों में लोक पर्व, उत्सव व संस्कार का उल्लेख मिलता है। दँतुली की मृत्यु पर दाह-संस्कार का मार्मिक चित्रण किया है - सुबह का उजाला फैलते और दिन की शुरूआत होते ही पुरानपुरवासी गोरेयाथान जुटने लगे थे। इस बीच मुहल्ले की औरतें पहले ही पहुँच चुकी थीं दँतुली के पास और उसे घेरकर रोना भी प्रारम्भ कर दिया था - एकदम गऊ थी बेचारी....?
अरे, अब हम अपने बच्चों को किसके पास सोनपापड़ी के लिए भेजेंगी? कौन उन्हें दुलार से सोनपापड़ी खिलाएगा....?
अरे, गोरेयाथान आने पर अब कौन हमें आशीषेगी? जी खोलकर दुआएँ देती थी बेचारी। अपनी बहू-बेटी से भी हमें अधिक समझती थी। हमें छोड़कर चली गई एकाएक....।
परानपुर के मर्द एकत्रित होते ही उसके दाह-संस्कार की तैयारी में लग गए थे। भले ही वह उनकी कोई नहीं थी, लेकिन उनके गाँव में तो रहती थी। खून का न सही, साथ रहने का संबंध तो था ही। फिर यह तो पुण्य का काम था। उनके गाँव की यह पुरानी परंपरा भी थी। गाँव में मरे व्यक्ति की लाश को वह लावारिस की तरह कभी नहीं फेंकते। उनहोंने बड़े लोगों के मुहल्ले में मरने वाले लावारिसों की दुर्गति देखी थी। वे उसके सख्त खिलाफ थे।
इस अवसर पर परानपुर के प्रमुख व्यक्ति जगन पासी ने गोरेयाथान में एकत्रित लोगों को संबोधित करते हुए कहा - ÓÓअब देर करने की जरूरत नहीं। यह हमारी माँ-बहन से कम नहीं है। जिसकी जैसी औकात हो उसी अनुसार चंदा देकर इसका उचित दाह-संस्कार हमें करना है....।''6
ÓछूँछीÓ कहानी में परानपुर गाँव का सूक्ष्म चित्रण किया है, जिसका एक-एक दृश्य आँखों के सामने दिखाई देती है। यहाँ के लोगों में आत्मीयता के साथ एक-दूसरे के सुख-दु:ख में सटकर रहता है। साथ ही अपनी परम्परा और संस्कृति का निर्वाह करता है।
Óनदी की राह मेंÓ कहानी में नदी की अविरल धारा की तरह, लोक जीवन अपनी सम्पूर्ण हाव-भाव से परिलक्षित प्रतीत होती है, मिथिलेश्वर जी इसी नदी की पवित्र धारा को रेखांकित करते हुए लिखते हैं - ÓÓवह अक्सर नीम और बबूल के दातौन से ही मुँह धोता था। जब तक गाँव में रहा उसका यह नियम अबाध रूप चलता रहा। लेकिन गाँव छूटते ही सारे नियम छूटते चले गए। उसके झोले में ब्रश और पेस्ट भी मौजूद है। लेकिन ब्रश न निकाल उसने एक आदिवासी लड़की से दातौन खरीद मुँह धोना शुरू कर दिया। वह दातौन नीम या बबूल का तो नहीं था, पर जिस जंगली लकड़ी का था, उसे ख_े-मि_े गँवई स्वाद से तरोताजा हो गया उसका मन। उसे पुन: याद हो आया अपना गाँव। उसने देखा, दातौन बेचने वाली वह लड़की कच्ची उम्र की थी। लेकिन अपनी गोद में एक बच्ची भी लिये हुए थी। गौर करना पर उसे पता चल गया कि वह बच्ची उसकी अपनी थी। इसी छोटी उम्र में माँ बन गई। क्या जानेगी इस जीवन और जगत का सुख। इसे असमय में माँ बनाने वाला इसका पति अवश्यक अशिक्षित, गँवार और जाहिल होगा....।ÓÓ7
Óगूँगा गंगूÓ कहानी में जन्मजात गूँगे गंगू की विवशता और उनकी दु:ख भरी कहानी है। वह जीवन की कठिनाई से हार मानने वाले नहीं हैं। जीवन में आने वाली सभी संघर्षो को चुनौतीपूर्ण मात देने वाले हैं। पवितरी गूँगे गंगू से आत्मीय भाव से स्नेह रखती है - पराहू की दूसरी पत्नी मायके वाले कलकत्ता चटकल और इटागढ़ में काम करते थे। गाँव में कभी मजदूरी मिलती थी, कभी नहीं। पराहू की आय एकदम कम थी। झोंपड़ीनुमा घर के सिवाय गाँव में उसकी और कोई संपत्ति भी नहीं थी। कलकत्ता में कामों की कमी नहीं है और आय भी मेहनत के अनुसार अच्छी थी। उसकी पत्नी उसे कलकत्ता लेकर चल पड़ी। पराहू, गंगू को भी साथ ले जाना चाहता था, लेकिन उसकी पत्नी तैयार नहीं हुई - इस गूंगे-बलाय को हम कहाँ-कहाँ ढोते चलेंगे? यहाँ गाँव में इसका गुजर-बसर हो जाएगा, कलकत्ता में इसका वास नहीं। यहाँ पवितरी काफी संभाल लेगी इसे....।
बस एक रात गंगू को सोता छोड़ दोनों पति-पत्नी निकल गए थे। उस वक्त गंगू की उम्र दस-ग्यारह वर्ष की थी। अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए वह गाँव की झाड़ियों से वनबेर तोड़कर खाता। कट चुके खेतों से अनाज के दाने चुन लाता। गाँव के गड्ढों और पोखरों से मछलियाँ पकड़ लाता। कोई छोटा-मोटा काम कराने के लिए कभी कोई पकड़कर ले जाता तो वही खिला देता। कभी कुछ नहीं मिलता तो पवितरी के दरवाजे पर जा बैठता। वह उसे अवश्य खिलाती। पूरे गाँव में एक पवितरी ही थी जो उस पर स्नेह रखती थी। गूँगे गंगू को भी यह लखते देर नहीं लगी थी। शायद यही कारण था कि अस्वस्थ होने पर या कहीं से भी हारने-थकने और निराश होने पर वह पवितरी के ही दरवाजे जाकर पड़ जाता था।
पवितरी सिताबगंज गाँव की कहारिन थी। कुछ वर्ष पूर्व पति का निधन हो गया था। उसे दो बेटियां थी। दोनों की शादी कर वह मुक्त हो गई थी। अब वह अकेले रहती थी। उसका घर भी अन्य कहारों की अपेक्षा अच्छा था। उसकी स्थिति भी ठीक थी। चाँदी की हँसुली, चाँदी के कंगन आदि कुछ पुराने जेवर भी उसके बदन पर बने हुए थे। वह दुबली-पतली और अधेड़ उम्र की हो गई थी। लेकिन काम करने में बहुत फूर्तीबाज थी। अभिजित सिंह के यहाँ चौका-बर्तन वहीं करती थी। अपने दरवाजे गंगू को पड़ा देख उसके अंदर मातृत्व उमड़ आता था - मेरा गंगू बेटा, अब तक तू कहाँ था रे ? चल, हाथ-मुँह धोकर खा ले। कैसे कसाई माँ-बाप थे कि तुझे छोड़कर गए ? भगवान ने तेरा मुँह चीरा है तो आहार भी देंगे।  Óगूँगा गंगूÓ कहानी में रज्जू बाबा की पंडिताई गिरी के खोखलेपन को उजागर किया है! भविष्यवाणी व चमत्कार के नाम पर लोगों से ठग किया जाता है। गाँव के सीधे-साधे, भोले-भाले लोग उनके चंगुल में फंस जाते हैं। ऐसे ढोगी बाबा का पोल Óगूँगा गंगूÓ ने खोलकर रख दिया है। रज्जू बाबा सिताबगंज गाँव को छोड़कर बाहर के आगुंतकों से पहले यही पूछते थे कि उसे किस-किस पर संदेह है और उसके परिचय के दायरे में कौन-कौन लोग हैं ? फिर उन्हीं नामों में से आवश्यकतानुसार किसी एक का नाम या दो-चार नामों की घोषणा वे कर देते थे। अभिजित सिंह के मामा से भी ऐसे ही नामों की सूची की माँग उन्होंने की। लेकिन ठीक इसी वक्त गंगू ने जोर-जोर से Óआऊ-आऊÓ चिल्लाते हुए रज्जू बाबा के आसन के दक्खिनी छोर की ओर हाथ का इशारा कर सबका ध्यान उधर आकृष्ट कर दिया। लोगों ने देखा, सचमुच रज्जू बाबा के आसन के दक्खिनी छोर के नीचे से साँप की पूँछ लटक रही थी। उसे देखते ही लोग चिल्ला पड़े - ÓÓसाँप-साँप।ÓÓ
रज्जू बाबा भी आसन से उछलकर नीचे आ गए। लोगों ने रज्जू बाबा को साँप की पूँछ दिखाते हुए कहा - ÓÓआपके आसन के नीचे साँप घुस गया है बाबा। ठहरिये, हम अभी इसका काम तमाम कर देते हैं....।ÓÓ8
साँप मारने के अभ्यस्त गाँववालों ने अपनी लाठी-डंडे सँभाल तत्क्षण मोर्चा ले लिया। रज्जू बाबा रोकने लगी। अपनी दयालुता का परिचय देते हुए साँप को जीवित भगाने की फिराक में लग गए। एक ग्रामीण का डंडा ले दूर से ही अपने आसन को ठोंकने लगे कि साँप निकलकर भाग जाए। लेकिन साँप पर इसका कोई असर नहीं। इसके बाद रज्जू बाबा के लाख रोकने और ना-ना करने के बावजूद साँप को मारने के लिए गाँव के लोगों ने आसन के गद्दे को उलट दिया। कोई और अवसर होता तो वे रज्जू बाबा की इच्छा के विरूद्ध ऐसा कदापि नहीं करते। लेकिन यह आपात्स्थिति थी। रज्जू बाबा की रक्षा के लिए ही वे ऐसा कर रहे थे। लेकिन यह क्या ? गद्दा हटते ही लोगों ने देखा कि आसन के नीचे पड़ा वह साँप मरा हुआ था। उससे कुछ ही दूर पर अभिजित सिंह की पत्नी का वह गायब हुआ हार पड़ा था। अभी हाल ही में शिवेंदु की चोरी हुई विदेशी घड़ी तथा गोबरधन की बेटी के चोरी गए जेवर भी पड़े थे। अब लोगो को यह समझते देर नही लगी की बाबा क्यों आसन नही उलटने देना चाहता था और क्यों आसन पर ही सदैव मौजूद रहा था ? आसन के पास किसी और को न जाने देने के पीछे भी उसकी मंशा क्या थी ?
'जमुनी' कहानी संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी 'जमुनी' को कही जा सकती है। जमुनी एक भैंस है। पूरी कहानी का केन्द्र बिन्दु जमुनी है। शुरू से अंत तक उन्ही पर मँडराती है। जमुनी के बीमार पड़ने पर जिउत, जोगिनी और परिवार के सभी जन अचेतन अवस्था में रहकर पूर्व की घटनाएं को ताजा करता है। अत: जमुनी कहानी का अधिकांश भाग पूर्वदीप्ति शैली में है। प्राय: 'जमुनी' कहानी कुछ सीमा तक 'गोदान' की पृष्ठभूमि को रेखांकित करती मालूम होती है। 'जमुनी' कहानी में मिथिलेश्वर जी लिखते हैं- ''जमुनी को किसी ने माहूर तो नहीं दे दिया या टोना-टोटका तो नहीं कर दिया। दरवाजे पर हाथी की तरह मस्त जमुनी को देखकर कितने मुदइयों का कलेजा फट रहा था। जरूर उन्हीं में से किसी ने कुछ किया है। वह सुरूज बाबा को गोहराती है कि जमुनी को ठीक कर  दे.....।''9 इस तरह मिथिलेश्वर की कहानियों के संबंध मे प्रखर आलोचक डॉ. रामचन्द्र तिवारी जी लिखते है- ''वस्तुत: मिथिलेश्वर ने अपने प्रत्यक्ष अनुभव को सहज कथा-शिल्प में ढालकर प्रेमचन्द की कहानी-परम्परा को पुन: प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया है।''10
जमुनी एक लम्बी कहानी है, जिनमें गौना, पचरा, बैसाखी मेला, संकरात परब का उल्लेख हुआ है। जोगिनी विश्वास के नाम पर अलिआर के ओझाई पर कुछ चढ़ावा देती है। अलिआर जोगिनी से कहता है-मैने सब इंतजाम कर दिया है भौजी, उसके बाण को काट दिया है....... अब सिर्फ साचर स्थान पर दारू ढरकाना और मुर्गी काटना बाकी है। इसके बाद तो उसे भैंस को छोड़कर भागना ही है।
अलिआर ने महाजन देखकर ही अपनी फर्माइश की है। अपनी फर्माइश के पीछे अपने प्रति महाजन का विश्वास और उसकी सामर्थ्य को वह सदैव ध्यान में रखता है। अगर महाजन श्रद्धालु है और आर्थिक दृष्टि से तंगी में नहीं है, तो उसके यहाँ वह खसी काटने, वस्त्र अर्पित करने और देवास के नाम पर सवा मन धान निकालने का आग्रह करता है। पर यहाँ जिउत की स्थिति-विश्वास को देखकर ही वह सिर्फ मुर्गी और दारू का न्यूनतम आग्रह करता है। लेकिन इस आग्रह पर भी एक क्षण के लिए जिउत का परिवार असमंजस की स्थिति में पड़ जाता है! मुर्गी और दारू का नाम सुन जोगिनी जिउत की ओर ताकती है और जिउत जोगिनी की ओर! फिर दोनों कातर दृष्टि से अलिआर की ओर ताकने लगते हैं। उनकी आँखों की भाषा अलिआर समझ जाता है। अपनी स्थिति पर तरस खाने का आग्रह उनकी आँखें कर रही होती है। जवाब में वह मँजे हुए खिलाड़ी की तरह कहता है - इतना तो करना ही होगा भौजी! साचर को बिना संतुष्ट किए कुछ नहीं हो सकता।
इसके बाद न चाहते हुए भी जोगिनी अँचरा के खूँट से चंद सिक्के निकाल अलिआर की हथेली पर रख देती है - ÓÓमुर्गे के चूजा ही ले लेना भाईजी और एक पौवा ही दारू! इतने से ही साचर को मना लेना....। हाथ सकेत में है, नहीं तो मनमाफिक चढ़ावा देती....।ÓÓ11 एक तरफ दुनिया बड़े-बड़े दावे करते है, चाँद मंगल पर बसने की बात करते हैं। वहीं दूसरी ओर समाज की यथार्थ स्थिति कुछ और बयान करता है। इस पर प्रखर आलोचक डॉ.रामचन्द्र तिवारी लिखते हैं - ÓÓस्वतंत्रता-प्राप्ति के चालीस वर्ष बाद भी आज का भारतीय गाँव आर्थिक समृद्धि और मानसिकता दोनों स्तरों पर बहुत पीछे है।ÓÓ12 वहीं ÓजमुनीÓ कहानी के संबंध में डॉ. राकेश गुप्त एवं डॉ. ऋषिकुमार चतुर्वेदी हिन्दी कहानी 1991-95, खण्ड-2 का भूमिकांश में लिखते हैं - ÓÓमिथिलेश्वर ग्रामीण परिवेश के सशक्त कथाकार हैं। उनकी लम्बी कहानी जमुनी को कृषक- जीवन की महागाथा कहा जा सकता है, जिसमें एक सामान्य भारतीय कृषक परिवार के प्रेम-घृणा, आस्था-विश्वास, आशा-निराशा, हर्ष-विवाद, सम्पत्ति-विपत्ति और उत्थान-पतन का मार्मिक एवं सजीव चित्र प्रस्तुत किया है....। शिल्प का रचाव निश्चय ही कहानी को महत्वपूर्ण बना देता है, किन्तु कहीं-कहीं अनायास सादगी ही शिल्प का शृंगार बन जाती है। प्रेमचन्द का कथाशिल्प ऐसा ही था। वर्तमान कथाकरों में मिथिलेश्वर का कथाशिल्प भी इसी प्रकार है।ÓÓ13
शीर्षक कथा जमुनी एक लम्बी कहानी है जिनमें एक कृषक परिवार का संघर्ष जीवन्त हो उठता है और जहाँ अपनी भूख-प्यास और नींद-आराम को दरकिनार करते हुए हर एक की चिन्ता बीमार भैंस को मृत्यु के मुख में जाने से बचाने की है, क्योंकि वह भैंस ही उनकी सुख -समृद्धि का केन्द्र है।
जमुनी के अतिरिक्त इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी जीवन और जगत के जरूरी सवालों के जवाब तलाशती अमिट प्रभाव कायम करने वाली कहानियाँ है। नि:सन्देह यह कहानी- संग्रह समर्थ कथाशिल्पी मिथिलेश्वर के प्रौढ़ कथा-लेखन की सार्थक यात्रा का द्योतक है। ÓबाबूजीÓ के कथाकार ने अपने लेखकीय नैरन्तर्य और श्रेष्ठ कथा-लेखन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट मौजूदगी का एहसास कराते हुए हिन्दी कथा-जगत को और अधिक ऊर्जस्वित और विकसित किया है....।
निष्कर्षत: समकालीन कहानीकारों के संबंध में प्रखर आलोचक डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं- ÓÓमिथिलेश्वर, बलराम, शिवमूर्ति आदि की कहानियों में समकालीन भारतीय ग्रामीण-समाज का यथार्थ रूप उसकी यथार्थ समस्याओं को चित्रित होते हुए देखा जा सकता है। इस सब कहानीकारों की सहानुभूति गाँव के सामान्य शोषित जन के प्रति हैं और शोषणकर्ताओं के प्रति विरोध की भावना है।ÓÓ14
संदर्भ ग्रंथ:-
1. डॉ. नगेन्द्र, संपादक हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपर बैक्स प्रकाशन नोएडा,
सैतालीसवां पुनर्मुद्रण संस्करण: 2014 पृ.सं. - 752
2. मिथिलेश्वर ÓजमुनीÓ कहानी संग्रह, राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन नई दिल्ली,
पहला संस्करण: 2010 पृ.सं. - 95
3. वही - पृ.सं. 14
4. वही - पृ.सं. 9
5. वही - पृ.सं. 10-11
6. वही - पृ.सं. 11
7. वही - पृ.सं. 136-137
8. वही - पृ.सं. 139-140
9.  वही - पृ.सं. 70
10. तिवारी डॉ. रामचन्द्र हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी,
पंचम संस्करण 2006 ईं. पृ.सं. - 316
11. मिथिलेश्वर ÓजमुनीÓ कहानी संग्रह, राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन नई दिल्ली,
पहला संस्करण: 2010 पृ.सं. - 77
12. तिवारी डॉ. रामचन्द्र हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी,
पंचम संस्करण 2006 ईं. पृ.सं. - 316
13. मिथिलेश्वर ÓजमुनीÓ कहानी संग्रह, राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन नई दिल्ली,
पहला संस्करण: 2010 - नेपथ्य से
14. डॉ. नगेन्द्र, संपादक हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपर बैक्स प्रकाशन नोएडा,
सैतालीसवां पुनर्मुद्रण संस्करण: 2014 पृ.सं. - 752

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डॉ. पीसीलाल यादव के कविता म पीरित अउ पीरा के आरो

 - यशपाल जंघेल

 जब हमन छत्तीसगढ़ी कविता के इतिहास के गोठ करथन, त हमर मंझोत म छत्तीसगढ़ी लोकगीत आके ठाढ़ हो जथे। सिरतोन म लोकगीत ह, लिखित साहित्य के पुरखा आय। तभे त हिंदी के जब्बर आलोचक रामचंद्र शुक्ल ह अपन प्रसिद्ध निबंध Ó कविता क्या है ?Ó म लिखे हे - ÓÓ मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है, कि संसार की सभ्य असभ्य सभी जातियों में किसी न किसी रूप में पायी जाती है।ÓÓ( चिंतामणि भाग-1, पृष्ठ-108) शुक्लजी के ईशारा लोकगीत कोति हे। कोनो भी देस या अंचल के समृद्धि के पता उहां के साहित्य ले चलथे। साहित्य चाहे लिखित होय कि मौखिक होय। छत्तीसगढ़, लोकसाहित्य म तो बड़हर हवेच, अब धीरे - धीरे लिखित साहित्य के कोठी घलो सीग होवत जात हे।
छत्तीसगढ़ी कविता के भंडार के श्रीवृद्धि म गंडई के साहित्यकार डा. पीसीलाल यादव के घलो बड़ योगदान हवय। बालसाहित्य के छोड़े अभी तक उंकर कविता के पांच ठन संघरा छप के आगे हें - मोर गाँव के कोरा (2003), सुरता के सुतरी (2009), काम बर उरा परसाद बर पूरा (गजल संग्रह-2012), पिरकी ह घाव होगे (2015)अउ महिनत म मोती मिलय (2016)। पीसीलाल यादवजी के गीत के एक - एक सब्द मन मया - पीरित के रंग म बुड़े हवय। मया - पीरित के अनभो तो सबो मनखे करथें, फेर साहित्यकार मन आने मनखे ले जादा संवेदनसील होथें, ओकरे सेती ओमन चुप रहे नई सकें अउ अपन जिनगी के अनभो ल कागद म उतार लेथें। यादवजी जब सुरता के सुतरी म एक घांव अरझथे त, सरलग अरझथे जाथे अउ अइसे अरझथे कि वोहा निकले नई पाय। कवि ह निकले उदीम घलो नई करंय। अब सवाल उठथे काकर सुरता ? ये सुरता मयारूक भर के नोहे। ये सुरता आय गांव के, पीपर के छांव के, गली - खोर के, अमराई, भाठा, पटपर, चिरई - चुरगुन, खेत - खार, रूख - राई, तरिया, नदिया अउ ओ हर जिनिस के जेमा कवि के बालपन के स्मृति बसे हे।
साहित्य के इतिहास ल देखन त नायक - नायिका बर कई ठन प्रतीक अउ उपमान रूढ़ हे जइसे चंदा - चकोर, फूल - भौंरा, मेघ -चातक,  सुरूज - कमल। यादवजी मन ये पंरपरागत प्रतीक अउ उपमान मन ल अपन गीत म बउरेच हें, संगेसंग नवा प्रतीक अउ उपमान घलो खोजे हें -
ÓÓ मया तोर लटके हे गर के फाँसी कस।
मन ल मिलायेंव नून अऊ बासी कस।।ÓÓ
(सुरता के सुतरी,पृष्ठ -04)
यादवजी अपन गीत म जउन मया के गोठ करथें, ओहा आरूग मया ए। ओमा वासना के नांव तक नई हे। कवि ह मया के सार्थकता, मन ले मन के जुरे ल मानथें -
ÓÓ गाड़ी के जुड़ा सुमेला जोता।
मन ले हे मन के नता गोता।।ÓÓ (मोर गाँव के कोरा, पृष्ठ-41 )
गीत म लोकजीवन ले जुड़े ठेठ  छत्तीसगढ़ी सब्द के बउरे ले छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति जीवंत होगे हे। कवि ह छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के आत्मा ले परिचित हें। ऊंकर गीत मन लोकगीत के निच्चट लकठा म हेें। या दूसर सब्द म कहन त छत्तीसगढ़ी लोकगीत के विकास हमन ल पीसीलाल यादव के गीत म देखे ल मिलथे। उंकर गीत मन लोकगीत सन अइसे मिंझर जथें, जइसे चटनी सन बासी।
छत्तीसगढ़ी के बड़का कवि डा. जीवन यदु जी ठंउका लिखे हे -Ó संसार ल सिरजे म मया - पीरित के बड़ हाथ हे। मया - पीरित नई होतिस,त ये दुनिया नई होतिस। मया - पीरित वाला कविता ह भाई पीसीलाल यादव के माई चिन्हारी आय। इही ओकर असल पहिचान आय।Ó( महिनत म मोती मिलय, भूमिका, पृष्ठ-06 ) ये धियान देके के बात आय कि ऊंकर कविता म आए मया - पीरित ह सिरिफ  नायक - नायिका के बीच के नोहे,बल्कि ये मया - पीरित ह मनखे - मनखे के बीच के आय। कवि के मया भरे गीत मन नायक - नायिका के सांकुर खोर ले निकल के सामाजिक जीवन के बड़का भाठा म दऊंड़थें -
ÓÓमँय मोंगरा अंगना भर ल ममहावत रेहेंव,
तंय निरदई टोर के अकेल्ला सूँघ डारे।ÓÓ (सुरता के सुतरी पृष्ठ-08)
ये गीत ल पढ़त खानी जयशंकर प्रसाद के कहिनी Ó आकाशदीपÓ के ठुक ले सुरता आ जथे। जब हिरदे म मया उपजथे त पाछू पीरा घलो जनम लेथे। अउ पीरा के कोख ले हरूवाथे गीत ह। तांहन ये समझ नई आय कि मया बर पीरा हे कि पीरा बर मया। तभे त छत्तीसगढ़ी के बड़े कवि अउ समीक्षक डॉ. विनय कुमार पाठक ह लिखे हें- ÓÓ छत्तीसगढ़ी कविता,पीड़ा की कोख में जन्मी और प्रेम के पर्यंक में पली है।(भूमिका, सुरता के सुतरी) कवि ल मयारूक संग भेट म तो सुख मिलबे करथे, वियोग के पीरा म घलो ओहर सुख खोज लेथें। महादेवी वर्मा कस पीरा ल सकेलत कवि कहिथें -
Ó संसो के आगी म, जिनगी ल जोरत हँव।
कंगलिन कस पीरा के,धन ल बटोरत हँव।।ÓÓ
(सुरता के सुतरी, पृष्ठ-36)
कवि के मन म राजनीतिक - व्यवस्था ले उपजे पीरा घलो हमाए हे। अनियाव अउ सोसन ल देखथें, त कवि चुप नई रहे सकें। अनियाव, सोसन, लबारी, अतियाचार के पुरा के आय ले कवि के धीरज केे  बांधा फुट जाथे अउ पीरा म तरमरावत ओहर कहिथें -
ÓÓ गुड़ के सवाद ल बतावथे कोंदा।
सिंघासन म माढ़े, माटी के लोंदा।ÓÓ
(काम बर पूरा परसाद बर उरा, पृष्ठ-42)
जब कवि के संयम टूटथे, त कभू - कभू कवित्व के हिनमान घलो हो जथे। पीसीलाल यादवजी के कविता म घलो अइसना कई घांव होय हे। उही पाय के हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के पोठ आलोचक डॉ. गोरेलाल चंदेल ह लिखथें-ÓÓ शोषक और शोषितों के बीच के फर्क को वह ( डॉ.पीसीलाल यादव ) कई गीतों में उजागर करते हुए चलते हैं। इन दोनों वर्ग के अंतर को खोलने में कवि इतने मगन हो जाते हैं कि भावों की आवृत्तियों का भी सुध नहीं रह जाता।ÓÓ
(पिरकी ह घाव होगे भूमिका, पृष्ठ-05)
यादवजी के पीरा के पाग म पगे कविता मन ल पढ़त खानी पाठक मन ल जयदेव,विद्यापति,सूरदास,घनानंद जइसे महाकवि मन के घेरी - भेेरी सुरता आथे। मैथिली कवि, विद्यापति लिखथें कि कृष्ण के वियोग म राधा ह लकड़ी म खुसरे ओ कीरा सहीं होगे हे, जेकर दूनो छोर म आगी ढिलाए हे। इही भाव के कविता महाकवि सूरदास घलो लिखे हें - ÓÓ सुनो स्याम! यह बात और कोउ क्यों समझाय कहै। दुहुँ दिसि की रति बिरह बिरहिनी कैसे कै जो सहै।ÓÓ (सूरदास, पृष्ठ-564) ए कोति यादवजी लिखथें -
ÓÓ तन मोर सुक्खा लकड़ी, पीरा भँवारी होगे, .............
आँखी म बसे - बसे, पीरा मोटियारी होगे।ÓÓ
(सुरता के सुतरी पृष्ठ-11)
यादवजी के कविता मन कोनो कोति ले कपाए अस नई दिखें। उंकर कविता म छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के जम्मों तत्व मन ल अपन व्यापकता के संग देखे अउ अनभो करे जा सकथें। कविता तो सदादिन मनखे ल करम करे बर आगू डहर बढ़ाए के उदीम करथे, फेर जब हमन छत्तीसगढ़ी कविता के समकालीन परिदृष्य ल देखथन, त अनभो करथन कि छत्तीसगढ़ी कविता ह आजो चटनी - बासी, मोर मयारू किसान, मोर गंवई - गांव अउ गांव के सनसी - कोलकी मन म भटकत हे। छत्तीसगढ़ी के बहुत कम कवि मन अपन कविता ल ये सनसी - कोलकी ले निकालके मानुखपन के ऊंचहा भूंईया म पहुंचाय हें। कवि डॉ. पीसीलाल यादव मन अपन कविता म कई ठन जुन्ना रूंधना - बंधना मन ल टोरे के उदीम करे हें। कवि ह समाज के ओ मनखे मन सन खड़े दिखथें, जेमन सोसित हें, पीड़ित हें, अपन अधिकार तक ल नई जानत हें। कवि अतियाचार के प्रतिरोध के गोठ करथें। सोसित मनखे मन ल कभू डोमी नाग कस फुफकारे ल कहिथें, त कभू गोल्लर कस खुरखुंद मताए ल कहिथें-
ÓÓसोके सपना देखे त का ?
अरे! जाग के सपना देख.......
कब तक रहिबे पिटपिटी बने ?
डोमी नाग के सपना देख।ÓÓ (पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-39-40)
Ó छत्तीसगढ़िया, सबले बढ़ियाÓ येहर छत्तीसगढ़िया मन ल भुलवारे के नारा आय। कवि ह एकरो परछो पा गेहें। ओमन लिखथें -
ÓÓधरके आए फूटहा लोटा,
चुहक- चुहक के गरीब के पोटा।ÓÓ(पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-43)
कवि ह एके कोति भर ल नई सरेखें। ओमन जम्मों डहर ले समस्या के विस्लेसन करथें,तब कोनो ठाहिल निस्कर्स म पहुंचथें। कवि ह सोसन के कारन सिरिफ  सासक वर्ग ल नई मानें, बल्कि एमा सोसित वर्ग के कमजोरी मन ल घलो ऊजागर करत चलथें -
ÓÓ सगा ह सगा ल, देवथे अब दगा
Ó बेंठÓ टंगिया, ÓमुठियाÓ आरा-आरी के।ÓÓ
(पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-65)
तइहा बेरा म राजनीति ह साहित्य के पाछू म रेंगे, फेर अब समे बहुत बदल गे। अब साहित्य ह राजनीति के रागी होगे हे।Ó संतन को कहा सीकरी सों कामÓ अइसन सोचइया कवि बहुत कम हें। ए बात के अनभो आचार्य रामचंद्र शुक्ल बहुत पहिली कर डरे रहिस। ओकरे सेती ओमन अपन इतिहास ग्रंथ Ó हिंदी साहित्य का इतिहासÓ (1929) म केहे हें-ÓÓ साहित्य को राजनीति के ऊपर रहना चाहिए, सदा उसके ईशारों पर ही न नाचना चाहिएÓÓ(पृष्ठ-357) यादवजी राजनीति के पाछू दऊंड़या मनखे नोहे। बल्कि ओहा तो सश्रा म पैठू खुसरे मनखे मन ल ललकारत कहिथें -ÓÓदेस में बड़ करलई हे,
दही के रखवार बिलई हे।ÓÓ( पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-34)
साहित्य के इतिहास म एक दौर प्रगतिवादी आंदोलन के चलिस। ओ समे के कवि मन अनियाव अउ सोसन के खिलाफ  मुअखरा विरोध भर नही,ं बल्कि लाठी - बेड़गा उठाय के गोठ घलो करिन। प्रगतिवादी विचारधारा ले प्रभावित कई ठन कविता यादवजी लिखे हें -
ÓÓसोसन के मुड़ी म पथरा कचार,
मनखे होके तैं झन हो लचार।ÓÓ(पिरकी ह घाव होगे, पृष्ठ-29)
फेर ये किसिम के कविता मन म कवि के विचार हावी हो जथे। अउ जब कविता म कवि के विचार मन जोर मारे ल धर लेथें, त कविता ह, कविता नई रहिके सिरिफ नारा होके रहि जथे। कवि के विचार म सामाजिक यथार्थ तोपा जथे। बल्कि कविता म सामाजिक यथार्थ अउ कवि के विचार के उचित संतुलन होना चाही।
यादवजी के अनुसार कवि के जिनगी अउ लेखन म कोनो अंतर नई होना चाही। कविता के ये दू डांड़ ल पढ़के, पाठक मन कवि के पूरा रचना - प्रक्रिया के गम पा सकत हें -
ÓÓ जइसे लिखथस, तइसनेच् दिख,
अउ जइसने दिखथस, तइसने लिख।ÓÓ(पिरकी ह घाव होगे,पृष्ठ -102)
डॉ. पीसीलाल यादव के कविता मन ल कोनो भी विचारधारा म छांदे - बांधे नई जा सके। उंकर कविता म कभू भक्तिकालीन उपदेसात्मकता मिलथे, त कभू द्विवेदीयुगीन इतिवृश्रात्मकता, कभू छायावादी प्रेम - संवेदना मिलथे, त कभू प्रगतिवादी चेतना। उंकर कविता म पीरित अउ पीरा के सुंदर संगम मिलथे। पीसीलाल यादव के कविता के जर मन ह लोकजीवन के हिरदे तक समाय हें, जिहां ले ओला मया - पीरित के रस सरलग मिलत रहिथे। उंकर कविता ह नार - बेयार कस ढलगे मनखे मन बर ढेखरा कस खड़े होथे। उंकर कविता ह अनियाय के मुड़ी म पखरा अस गिरथे।

सहायक शिक्षक
पी.एस. - बैगा साल्हेवारा
जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)
मोबा. - 9009910363