शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

नवम्‍बर 2017 से जनवरी 2018

आलेख
मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व / शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्‍तव

शोध लेख
दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी / डॉ. गिरीश काशिद
स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ' / डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशेटृे
भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान / शोधार्थी आशाराम साहू

कहानी
बदबू / हरिभटनागर
क्‍लॉड इथरली / गजानन माधव मुक्तिबोध
यहॉ - वहॉं, हर कहीं / अंजना वर्मा
चित्र / शंकर पुणतांबेकर
मंतर ( छत्‍तीसगढ़ी कहानी ) धर्मेन्‍द्र निर्मल

गीत / गज़ल / कविता
कवि आज सुनाओ वह गान रे ( गीत ) / अटल बिहारी बाजपेयी
हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ( कविता )
मोला सुनता अउ सुमत ले ( छत्‍तीसगढ़ी गीत ) / ईश्‍वर कुमार
छत्‍तीसगढ़ी लदका गे हे ( छत्‍तीसगढ़ी गीत ) मिलना मलरिहा
वह सुबह कब होगी ( कविता ) / राेज़लीन
दो चिडि़यां ( कविता )/ संतोष श्रीवास्‍तव ' सम '

व्‍यंग्‍य
गल्‍पाहार का अर्थशास्‍त्र / कमलनाथ

मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्‍तव

मुक्तिबोध एक कठिन कवि है। उन्हें एक बार पढ़ने के बाद उनकी कविताओं में दुबारा पढ़वा लेने का आकर्षण नहीं है। उनकी कविताओं को समझना भी एक दुरूह कार्य है। उनके शब्दों में शब्द - चयन में अर्थसंभरण में और बिम्ब - निर्मिति आदि में भी आकर्षित करने वाला सौंदर्य नहीं है। उनकी कविताओं की आरंभिक पंक्तियों में यह गुण भी नहीं है कि अगली पंक्तियों तक पाठक को ले जाने के लिए उसमें उत्सुकता जगाए। टी एस इलियट की कविता Óद वेस्ट लैंडÓ भी एक दुरूह कविता है किंतु उसकी आरंभिक पंक्तियों की रचना और शब्द - चयन कुछ ऐसे है कि पूरी कविता को पढ़ने के लिए पाठक में उत्सुकता जगाते हैं। Ó द वेस्ट लैंडÓ कविता को मैंने इसलिए उदाहृत किया है क्योंकि मुक्तिबोध पश्चिम के अनुसरण में अधिक हैं।
फिर भी मुक्तिबोध में कुछ है जो उनको पढ़ने के लिए हमें बाध्य करता है। उनकी कविताओं में हिंदी कविता के आदि से छायावाद तक की काव्य - रचना - प्रक्रिया से अलग रचना - प्रक्रिया मिलती है। उनमें अद्यतन बोध से संपृक्त दृष्टि और दृष्टि - विस्तार का आयोजन मिलता है। शब्दों में काव्य - संवेदन को पिरोने की और उसे भास्वर बनाने की उनकी योजना अलग है। दुरूह होने के बावजूद उनकी कविता अपने इस नए शिल्प के कारण आकर्षित करती है। इस शिल्प में परंपरागत भाववस्तु ने काव्य वस्तु का स्थान ले लिया है। छंदों में लयहीन मुक्तछंद का प्रयोग, दुरूह प्रतीक और विंब - योजनाएँ उनकी कविताओं की आम विशेषता है। इनकी कविताओं में जो कुछ भी है सब नया है, अद्यतीत है, उनके अपने पूर्ववर्तियों की परंपरा से अलग हैं। अशोक वाजपेई ठीक ही कहते हैं कि वह हिंदी में गोत्रहीन कवि हैं। किंतु उन्हीं के साक्ष्य से यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने पश्चिम में अपना गोत्र खोज लिया था।
हिंदी में नयी कविता का वातावरण बनाने में मुक्तिबोध और अज्ञेय का बहुत बड़ा योगदान है। किंतु ये दोनों लोग अंग्रेजी लेखकों के अनुसरण में हैं। मुद्राराक्षस के अनुसार तारसप्तक की भूमिका में अज्ञेय के कई सिद्धांत - वाक्य अमरीकन मॉडर्निष्ट कवियों के सिद्धांत - वाक्यों के हू- ब - हू अनुवाद हैं। मुक्तिबोध के कला के जिन तीन क्षणों की प्राय: चर्चा होती है वे उनके अपने चिंतन का परिणाम नहीं हैं। उन्होंने Óड्राईडनÓ के कवि - कल्पना के तीन स्तरों - अन्वेषण, फैंसी और वक्तृत्व को ही कुछ व्याख्या के साथ अनुभव के, संवेदना के और अभिव्यक्ति के क्षण कहा है - Óबिंब प्रतिबिंब - नंदकिशोर नवलÓ एक और बात मुक्तिबोध में देखने को मिलती है, वह समुच्चरित शब्दों के भेद की गहराई में जाने का प्रयास नहीं करते। अनुभव और अनुभूति का उनके लिए एक ही अर्थ है। हालांकि स्कूलों में इनके अर्थों में भेद लिखने के लिए प्रश्न पूछा जाता है।
मुक्तिबोध पर जो भी आलोचनाएँ मिलती हैं वे मार्क्सवादी आलोचनाएँ हैं। वे आलोचनाएँ महिमामंडक अधिक हैं और एक खास विचारधारा से प्रभावित हैं। पं हजारी प्रसाद द्विवेदी और नंददुलारे वाजपेई जैसे धुरीण और आग्रहमुक्त आलोचकों ने इन पर कुछ छिटफुट ही लिखा है। इनमें इन्हें प्रयोगवादी और नई कविता का प्रमुख कवि बताया गया है। कई मार्क्सवादी आलोचक इन्हें निराला की कोटि का महाकवि कहते हैं तो कई इन्हें निराला के बाद का सबसे बड़ा और केंद्रीय कवि कहते हैं। इन मार्क्सवादी आलोचकों की स्थिति यह है कि ये छायावाद की लीक तोड़ कर कुछ नया करने के ताजातरीन उत्साह में छायावाद की कड़ी आलोचना करते थे, किंतु आगे चल कर अपने कुछ वक्तव्यों के समर्थन में वे छायावाद से ही समर्थन लेने लगे थे Óनयी कविता और अस्तित्ववाद - रामविालस शर्माÓ ऐसे में उन्हें अस्थिर - चित्त कहा जाए तो उन्हें शिकायत नहीं होनी चाहिए। प्रगतिवादी कविता के आरंभ में मार्क्सवादी कवियों में भी एक विशेषता दिखती है - प्रगतिवादी कविता तो पनपी निराला और पंत के चित्तों में, आगे बढी दिनकर और बच्चन की लेखनियों से लेकिन इसे मार्क्सवादी कवियों ने लपक लिया। इस टाईप की कविताओं का प्रगतिवादी नाम इन्हीं का दिया है। लेकिन इसमें कविताओं की प्रगति इतनी ही हुई कि इसकी भाववस्तु, विषयवस्तु में बदल गई। कुछ शिल्प बदला, कुछ शब्द - चयन बदले, शब्दों में सौंदर्य डालने के नाम पर उनमें अजनवी अलंकरण डाले गए। उसमें शोषक और शोषित की बातें की जाने लगीं। वह भी इस कदर कि मार्क्सवादी चलन की कविताएँ ही प्रगतिवादी कविताएँ कहलाने लगीं। एक और बड़ी बात दिखी कि जन में इस नयी कविता Ó चाहे किसी वादी की हो Ó से दूर भागने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। अभी भी वे व्यंग्य कार्टून याद आते हैं जिनमें दिखाया जाता था कि मंच पर कवि कविता सुनाए जा रहे हैं और श्रोता ऊब कर पंडाल से जा चुके होते हैं। मेरे देखे नयी कविता की सौंदर्याभिव्यक्ति में कोई प्रगति नहीं हुई। जैसे - नाद सौंदर्य या विचार - सौंदर्य आदि में। सम जीवन में तो एक लय का होना परम आवश्यक है। साम्यवाद में भी एक लयबद्ध जीवन की ही कल्पना है।
मुक्तिबोध ने साहित्य के क्षेत्र में सन् 1936 में प्रवेश किया। मु. बो. आलोचना स. अं.- 55। आरंभ में वह छायावाद के सौंदर्यलोक की तरफ  आकर्षित थे - नंदकिशोर नवल - विंब प्रतिबिंब। किंतु छायावादी छवि से शीघ्र ही वह अपने को अलग कर लिए, आलोचना अं. वही उनको रूसी लेखक टॉल्सटॉय का यथार्थ - लोक अपनी तरफ  खींचता था। वह यथार्थवादी दृष्टिकोण वाली नए ढंग की कविताएँ लिखना चाहते थे। आलोचना अं वही। कुछ दिनों तक वह प्रगतिवादी कविताएँ लिखते रहे। फिर वह फ्रांसीसी दार्शनिक बर्गशाँ की ओर आकर्षित हुए। बर्गशाँ के प्रभाव में उनकी लिखी कविताएँ Ó तारसप्तकÓ में संकलित हैं नं. कि. नवल - वही। किंतु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। उनको कविता की अपनी स्टाईल और अपनी यथार्थवादी अभिव्यक्ति की खोज थी जो उन्हें मार्क्सवाद में मिलती दिखी। पर उनकी व्यक्ति - चेतना को वहाँ भी सुकून नहीं मिला। वह अपने चिंतन की खिड़कियाँ बंद नहीं रखना चाहते थे। बाद की, उनकी मृत्यु पूर्व तक की कविताएँ इसी द्वन्द्व में पड़े एक बेचैन मन की कविताएँ लगती हैं -Óअँधेरे मेंÓ कविता में संभवत: वह अपनी निर्द्वन्द्व अभिव्यक्ति की ही खोज में हैं जिसमें उनकी व्यक्ति - चेतना और यथार्थ - चेतना मेल में हों।
मुक्तिबोध मार्क्सवादी थे या नहीं पर मार्क्सवाद का उनपर गहरा प्रभाव था। उन्होंने अपनी कविताओं में मार्क्सवादी चिंतन और बोध का उपयोग किया है। भारतीय मार्क्सवादियों की एक विशेषता है कि वे मार्क्सवाद के सिद्धांत पर निश्चिंत नहीं चलते। मार्क्सवाद का एक प्रमुख सिद्धांत है सर्वहारा का अधिनायकवाद जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं है। सोवियत रूस में जब कोई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम ले लेता था तो उसे जेल में डाल दिया जाता था। जैसे साल्झेनिस्तिन को। चीन में तो अभी हाल ही में एक स्वतंत्रचेता लेखक की जेल में ही मृत्यु हुई है। ऐसी घटनाओं पर भारत में अति मुखर भारतीय मार्क्सवादी मार्क्सवाद के अनुसरण में चल रहे क्षेत्रों में घटित इन घटनाओं के विरुद्ध मुँह ही नहीं खोलते। ये मार्क्सवादी, भारत में अपने ही वाद के उलट होते हैं। यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए इन्हें लोकतंत्र प्रिय हो जाता है। हर घटना में शांति हेतु ही क्यों न हुई हो,उन्हें फासिज्म ही दिखता है। किंतु चीन में येन ऑन मान के दमन को ये फॉसिज्म नहीं मानते। कविता पर उनकी राजनीति हाबी होती है। कविता में कविता का स्वतंत्र व्यक्तित्व वह नहीं मानते। कहने का अर्थ यह कि भारतीय मार्क्सवादी मार्क्सवाद की और कविता की व्याख्या अपनी सुविधानुसार करते हैं ÓआलोचनाÓ त्रैमासिक के पचपनवें अंक के संपादकीय में अपूर्वानंद कहते हैं कि मार्क्सवाद भारत में सोवियत संघ की छननी से छनकर आया था। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय मार्क्सवादी मार्क्सवाद को जानने, समझने और पचाने में कितने परिश्रमशील रहे होंगे! हाँ, आम भारतीय मार्सवादियों की अपेक्षा मुक्तिबोध में एक विशेषता दिखती है। रूसी समाज को स्थिर करने के लिए वहाँ स्टालिन द्वारा कराए गए कत्लेआम को वह फॉसिज्म भले करार न दिए हों पर उसके इस कृत्य से वह सहमत नहीं थे।
मुक्तिबोध अपने मार्क्सवाद में - नंदकिशोर नवल मार्क्सवाद के कई रूप बताते हैं।Óबिंब प्रतिबिंबÓसिद्धांतत:उसमें अनपेक्षित व्यक्ति - स्वातंर्त्य को स्थान देते हैं। इसी आधार पर रामविलास शर्मा उन्हें मार्क्सवादी नहीं मानते,पर नंदकिशोर नवल उन्हें बेधड़क मार्क्सवादी करार देते हैं। ये मार्क्सवादी कितने अस्थिरचित्त हैं इसका अनुमान रांगेय राघव की इस कठोर टिप्पणी से लगाया जा सकता है जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के संबंध में है - मार्क्सवादी लेखक किस भाषा की बात करते हैं यह आज तक जाना नहीं जा सका। वे प्राय: वही भाषा लिखते हैं जिसे बिरला का हिंदुस्तान। उस समय की एक साप्ताहिक या डालमियाँ का धर्मयुग तब का साप्ताहिक छापता है, कैसे वही भाषा कम्युनिष्टों के हाथ में पड़कर जनतांत्रिक हो जाती है और हिंदुस्तान, धर्मयुग में प्रतिक्रियवादी, यह स्पष्ट नहीं होता इंद्रप्रस्थ भारती सितंबर सन् 2017 रामदरश मिश्र ने भी बहुत पहले प्रसिद्ध साहित्यिक मासिक ÓआजकलÓ के एक अंक में लिखे अपने लेख में लिखा था कि एक कवि, नाम याद नहीं, जब तक प्रलेस में थे, उनकी बड़ी प्रशंसा होती थी लेकिन किन्हीं कारणों से जब वे जलेस में चले गए तो वह प्रलेस वालों के लिए बहुत बुरे कवि हो गए।
मैंने इन बातों की चर्चा यहाँ इसलिए की कि आलोचना की आज जो दुर्गति है उसमें इस तरह की मनस्थियों, चाहे मार्क्सवादियों की हो या गैरमार्क्सवादियों की, का बहुत बड़ा हाथ है। मार्क्सवादी आलोचना का तो वाकायदा एक ढाँचा है। इसमें कवि की कविताओं में समाज की झलक अवश्य मिलनी चाहिए। मैनेजर पाण्डेय उसमें जन की चर्चा आवश्क मानते हैं Ó पाखीÓ में छपी एक परिचर्चा की चर्चा में हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह जन कौन है। मेरी समझ में स्वातंर्त्य - रण में गाँघी के पीछे जो लोगों का एक सैलाब उमड़ चला था वह जन ही था। किंतु मार्क्सवादी, साम्यवादी,उसे जन नहीं मानते। इस जन में स्वाधीनता नामक जीवन - मूल्य की पुकार थी। इसमें सभी वर्गों के लोग थे। इसी जन के Ó भारत छोड़ोÓ आंदोलन की बदौलत देश आजाद हुआ पर मार्क्सवादी भाईयों ने इस आंदोलन को दबाने में अंग्रेजों का साथ दिया,तो क्या मार्क्सवादियों का ÓजनÓ समाजवाद में प्रशिक्षित जन है? या Ó जनÓ वह है जिसे मार्क्सवाद में प्रशिक्षित करना आसान है। मुक्तिबोध, लेनिन के समय की सोवियत सत्ता की छोटी छोटी घटनाओं पर कलम चलाते हैं किंतु गाँधी के नेतृत्व वाले विराट ओंदोलन पर उनकी लेखनी मौन ही रही। मुझे लगता है, उस समय मुक्तिबोध मार्क्सवादी चिंतन, बंद चिंतन और व्यक्ति - स्वातंर्त्य - चिंतन के द्वन्द्व में पड़ गए थे। मुक्तिबोध राजनीतिक चेतना के कवि थे और उनके राजनीतिक विचार स्पष्ट नहीं थे।
मुक्तिबोध की यह मन:स्थिति आजीवन बनी रही। वह नए ढंग की मॉडर्निस्ट कविताएँ लिखना चाहते थे। लेकिन माडर्निज्म के तत्वों को ग्रहण करने और पचाने की वह क्षमता इनमें नहीं थी जो कभी भारतेंदु में थी। आधुनिकता का दौर तभी से शुरू हुआ। उसी समय भारतीय साहित्य में और हिंदी साहित्य में भी आधुनिकता के Ó स्वाधीनताÓ नामक तत्व का प्रवेश हुआ। लेकिन भारतेंदु के साहिय से ऐसा नहीं लगता कि यह कहीं से लिया गया है या वह पश्चिम के वैसे ही प्रभाव में हैं जैसे नए कवि यह पता लगाने के लिए एक शोध की आवश्यकता होगी। पंत और निराला की कविताओं को पढ़ने से भी ऐसा नहीं लगता, जबकि यह तथ्य है कि इनपर बंगला और अंग्रेजी साहित्य का बहुत प्रभाव था। क्योंकि इनकी पाचन शक्ति हिंदी की पाचन शक्ति की तरह की थी। किंतु अज्ञेय और मुक्तिबोध के साहित्य तो प्रथमदृष्टया ही पश्चिम से प्रभावित दिखते हैं, प्रभावित ही नहीं, उसके अनुसरण में भी दिखते हैं। मुक्तिबोध पर अंग्रेजी साहित्य का इस कदर प्रभाव था कि वे अपनी कविताओं के शीर्षक और विषय तक पश्चिम से लिए हैं Óओरांग ऊटांगÓ Ó क्या बेवीलोन सचमुच नष्ट हो गयाÓ आदि विषय ऐसे ही हैं।
आज की आलोचना मार्क्सवाद से आक्रांत है। आलोचना के इस Ó वादÓ के ढाँचे में हिंदी आलोचना बुरी तरह जकड़ी हुई है। आज एक तरह से हिंदी साहित्य पर मार्क्सवादियों का एकाधिकार लगता है। आज की अधिकांश हिंदी की बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएँ उन्हीं के संपादकत्व में निकलती हैं। उनमें गैरमार्क्सवादी लेखकों का प्रवेश वर्जित तो नहीं पर इसके लिए उन्हें बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।
अब कवि की कविता Ó एक अरुप शून्य के प्रतिÓ को लें।
कविता का यह शीर्षक आलोचनीय है। प्राय: कविता का शीर्षक, उसी कविता की एक पंक्ति होता है या यह शीर्षक ऐसा होता है जिसमें कमोबेश कविता का उद्देश्य परिलक्षित हो। इस शीर्षक से लगता है कि कवि को अरूपÓशून्यÓ से कुछ कहना है। यह कहना कुछ दर्शन सरीखी बातें होंगी। ÓतुमÓ संबोधन Óअरुप शून्यÓ के लिए ही है। मैं भारतीय पाठक हूँ, मुझे लगा उन्हें कदाचित बौद्ध नागार्जुन के शून्यवाद पर कोई बात करनी हो। किंतु कविता में प्रवेश करने पर ऐसा कुछ नहीं मिलता। इसमें Óअरुप शून्यÓ का जो चित्र खींचा गया है वह अरूप शून्य का नहीं है। जिसका चित्र खींचा गया है वह विराट रूपवाला कोई असाधारण व्यक्ति है। Óअरुप शून्यÓ और एक व्यक्ति जैसा !
इस शीर्षक से प्रतीत होता है कि Óअरुप शून्यÓ कई हैं जिसमें से एक को संबोधित कर यह कविता लिखी गई है। एक अरूप शून्य के प्रति सामान्य तर्क है, यदि Óअंरुप शून्यÓ है तोÓ सरुप शून्यÓ अवश्य होना चाहिए। जगत में हर अनुलोम का विलोम उपस्थित है। लगता है मुक्तिबोध की दृष्टि में शून्य के दो रूप हैं - अरुप और सरूप। उनके अनुसार - अरूप शून्य भी कई हैं। इसमें से एक को वह यहाँ संबोधित कर रहे हैं। मुक्तिबोध की यह सूझ अद्भुत और अभूतपूर्व है।
मुक्तिबोध की शून्य की अवधारणा क्या है, उनके साहित्य में न तो इसकी कोई पहचान मिलती है न सूचना। फिर उन्होंने यह शीर्षक क्यों चुना, जिसमें शून्य के संबंध में कोई बात ही नहीं की गई है। प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक नंदकिशोर नवल इस गुत्थी को यह कह कर सुलझाते हैं कि यह अरूप शून्य, ईश्वर का प्रतीक है। इस कविता को सीधे ईश्वर के प्रति शीर्षक देने में कवि को क्या अड़चन थी।
यह कविता लिखी तो गई है। एक अरूप शून्य के प्रति पर वह संबोधित है एक सरूप को जो शून्य नहीं है। इसे ईश्वर का प्रतीक मान लिया जाए तो क्या किसी समाज में शून्य को ईश्वर माना गया है? मुझे ऐसा कहीं सुनने को नहीं मिला। कविता में एक जगह Óओ रे निराधार शून्यÓ संबोधन आया है। ईश्वर संबोधन नहीं। वस्तुत: लोक - धारणा के ईश्वर को नकारना मार्क्सवाद की पहचान है, इसीलिए अरूप शून्य को ईश्वर का प्रतीक माना गया लगता है। मार्क्सवादी चिंतक राधामोहन गोकुल जी कहते हैं - ईश्वर एक ऐसा कल्पित पदार्थ है, जिसे कभी किसी ने अपनी ज्ञानेंन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं किया। इसलिए कि उसका सर्वथा अभाव है। इस हेतु वह केवल अंग्रेजी लेखकों का उद्धरण देते हैं। पूर्वी विचारकों में विवेकानंद का नाम लेते हैं जो ईश्वर के कर्तारूप को अस्वीकार करते हैं किंतु उसके क्रिएटीविटी को नहीं। प्रेम को भी आँखों से देखा नहीं जा सकता, किंतु उनकी दृष्टि में वह अस्तित्वान है। वह उसके वस्तुगत रूप के होने की जिद पर नहीं अड़ते। उनकी दृष्टि में मार्क्सवाद के अस्तित्व के लिए केवल ईश्वर का वस्तुगत रूप होना आवश्यक है। अगर ईश्वर के अतींद्रिय रूप को मानने वाले रह जाएँ तो मार्क्सवाद का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। शायद यही कारण है कि गोकुल जी विज्ञान को सत्य का पर्याय मानते हैं। जबकि विज्ञान वस्तुओं को समझने परखने का मात्र एक दृष्टिकोण है जिसके पहलू हैं प्रयोग और विश्लेषण। यह विचारशील वक्तव्य नहीं है।
मुक्तिबोध ने यदि अपने विवेक का सहारा लिया होता तो भारत में घटित उस तथ्यात्मक घटना पर विचार अवश्य करते, जिसे संचार माध्यमों से जानकर, दूर देश में बैठे प्रसिद्ध विचारक और अनुभावक मैंक्समूलर प्रभावित हुए बिना न रह सके थे। पर मुक्तिबोध अपने ही घर में घटित इस घटना की उपेक्षा कर गए। मेरा ईशारा उस घटना की तरफ है जो महान दार्शनिकों भारत के विवेकानंद और जर्मनी के फ्रेडरिक नीत्से के साथ घटी। ये दोनों किसी न किसी रूप में ईश्वर को जानना चाहते थे। ईश्वर को जानने की प्रबल आकांक्षा लिए विवेकानंद रामकृष्ण के पास पहुँचे और उनसे सीधे पूछा - क्या ईश्वर है?
- हाँ है। मैं उसे वैसे ही देखता हूँ जैसे तुम्हें।
यह कह रामकृष्ण ने विवेकानंद के दाएँ कंधे पर अपना पैर रख दिया। विवेकानंद बताते हैं कि उस क्षण उन्हें किसी शक्ति का ऐसा झटका लगा कि वह तत्काल समाधिस्थ हो गए। उन्हें ईश्वर का बोध हुआ। भारतीय अभिधारणा में ईश्वर का बोध ही होता है अनुभूति के द्वारा। नीत्से ने ईश्वर को वस्तुरूप में जानना चाहा क्योंकि बाईबल का ईश्वर संसार का निर्माता है। ईश्वर ने छै दिन में संसार को बना दिया, किंतु उन्हें विक्षिप्तता मिली। ओशो कहते हैं नीत्से अपने गहन प्रयास में उसी अवस्था में पहुँच चुका था जो समाधि पाने के पूर्व की स्थिति होती है, पर उस अवस्था के पार भी जाया जा सकता है यह कला पश्चिम में विकसित ही नहीं है। यह कला केवल सूफियों और पूर्व के धर्मों में ही विकसित है। रामकृष्ण सा गुरु मिल गया होता तो नीत्से बुद्ध हो गया होता।
उक्त घटी घटना एक तथ्य है। इस कविता को लिखने के पूर्व मुक्तिबोध का दायित्व था कि वह इसका विश्लेषण करते और जाँचते - परखते। कविता लिखने के पूर्व विवेक और विचारशीलता की यही माँग थी।
कविता का अर्थ:
रात और दिन पलंग पर सोए हो।
ओ रे अरूप शून्य! तुम रूपवान हो। तुम्हारी रूपाकृति के, रात और दिनरूपी दो लंबे चौड़े कान हैं। एक स्याह और एक सफेद। तुम अपने कान से आसमान को ढँके हुए आदिकाल से आसमानी शशि एक पाठ शीशे है, के पलंग पर सोए हुए हो। इस शशि या शीशे से आकाश की स्वच्छता का बोध होता है। एक अन्य पाठ में यह प्रत्येक दस घंटे में एक करवट बदलता है। साँझ और ऊषाकाल के समय को छोड़ कर बहुत सूक्ष्म निरीक्षण है कवि का!
इस शून्य का ईश्वर अर्थ लें तो यह क्रिश्चियनों या मुस्लिमों का ईश्वर गॉड, अल्लाह है। इनके ही ईश्वर आसमान में रहते हैं। वे अक्सर कहते हैं ऊपरवाला खैर करे या ऊपर वाला जाने। भारत में ईश्वर को अंतर्यामी कहते हैं। वह सृष्टि के कण - कण में है। हममें तुममें खड्ग खंभ में घट घट व्यापे राम।
कवि अरूप शून्य से कहता है - मैं सन्न हूँ यह गुन कर कि धरती पर चीख पुकार मची है। उन चीखों के शब्द तुम्हारे कानों के चतुर्दिक ऐसे गूँज रहे हैं, मानों बेचैन पंखदार कीड़े तुम्हारे बालों पर बैठते हैं। भिनभिनाते हुए घूमते हैं, पर तुम्हारी निद्रा टूटती नहीं। भारतीय भक्तों का ईश्वर तो सुने बिनु काना। विष्णु क्षीर सागर में सोते हैं पर दुनिया की खोज खबर रखते हैं। तुम्हारी आँखें धुँधली निहारिका जैसी हैं। तुम्हारी आँखें खुली हैं। उसकी पुतलियाँ लाल - लाल हैं। बुलबुलों की तरह बनती बिगड़ती हैं। इनमें करोड़ों कनीनिकाएँ हैं, फिर भी तुम्हें जन - समस्याएँ दिखाई नहीं देतीं। तुम्हारी आँखों में देखने की अनेक क्षमताएँ हैं। उनमें अनेकों बनते बिगड़ते दृष्टिकोण हैं, पर तुम नींद में हो। नींद में होने से बोलते नहीं। इसीलिए सर्वज्ञ कहे जाते हो बोलने से सर्वज्ञता की पोल खुल जाती है।
Óअरुप शून्यÓ का यह चित्रांकन न फबता है न उचित लगता है। हाँ, ईश्वर के वस्तुगत रूप का ऐसा चित्रण हो सकता है पर कवि की दृष्टि में ईश्वर तो है ही नहीं। इन पंक्तियों के माध्यम से कवि संभवत: यह कहना चाहता है कि वैसे तो तुम निरूप हो पर यदि तुम्हारा रूप होता तो ऐसा ही होता। एक दैत्य जैसा। यह चित्रण उन आम बाबाओं के जैसा है जो सब कुछ जानने का ढोंग करते है।
तुम नींद में हो या कहें मूर्तियों में सुसुप्त हो। फिर भी तुम्हारा यश सर्वत्र फैला हुआ है। दिक् और काल के सम्राट माने जाते हो तुम हालाँकि मेरे देखे तुम कुछ नहीं हो। तुम्हारा कोई महत्व नहीं है फिर भी जनता में तुम महत्वशाली हो। उनके लिए तुम सब कुछ हो। तुमने अपने एक काल्पनिक योग्य की पूँछ इसका अर्थ समझ से परे है।बालों को काट कर अपने ओठों पर किसी नट - नायक की तरह मूँछ जैसा लटका रखा है। नट - नायक का अपनी मंडली पर पूरा रुआब रहता है। तुम्हारा रोब भी समूचे संसार पर है। जगत में किसी में तुमसे टकराने की हिम्मत नहीं है। किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह तुम्हारी सत्ता को न माने। जब तुम्हारी मूँछों के बाल हवा में बलखाते, लहराते हैं तो हवा में मँडराते हमारे चेहरों पर उसके खुरदरे स्पर्श चुभते हैं। उस पर लाल लाल खरोंच उभर आते हैं, और हम समझते हैं यह कोई तुम्हारी नैतिक अनुभूति है, जो हमें कष्ट देती है। कदाचित मुक्तिबोध का सोचना है कि यह ईश्वर ही ईश्वर - भक्तों के लिए नैतिकता का स्रोत होता है। पर यह नैतिकता उसके जैसे लोगों को कष्ट देती है। वह कहते हैं - तुम्हारी यह नैतिकता की कीर्ति झूठी और सठियाई हुई है।
यहाँ ईश्वर का चित्रण उन बाबाओं की तरह किया गया है जो अपने भक्तों के शीश पर चँवर फेर कर आशीष देते हैं। यह ईश्वर अकेला नहीं है। इसका कोई काल्पनिक योग्य भी है क्रिशचियनिटी मे शैतान की कल्पना है, जो पूँछ वाला है। उसकी पूँछ के बाल काट कर इस ईश्वर ने अपनी मूँछ बला ली है। नंदकिशोर नवल ने इसे ईश्वर - दैत्य कहा है। दैत्यों में किसी की पूँछ के बाल काट कर अपनी मूँछ बनाने का आचरण होता है क्या?
यहाँ तक मुक्तिबोध ने Óअरुप शून्यÓ का अपनी कल्पना के सरूप ईश्वर के रूप का चित्रण किया है।
शायद अरूप शून्य के बारे में कहना उनकी शक्ति के बाहर की बात थी। क्या ईश्वर का कोई पश्चिमी या पूर्वी भक्त अपने ईश्वर को ऐसे भदेस रूप में देखता है। क्या Óअरुप शून्यÓ का कवि का यह यथार्थ अनुभव या अनुभूति है? तब तो नई कविता के उसूल के अनुसार इस अनुभूति की प्रामाणिकता चाहिए।
दरअसल मुक्तिबोध ने इस कविता के माध्यम से भक्तों के ईश्वर का भोंड़ा मजाक उड़ाया है। कुछ वैसा ही जैसा एक विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर कलबुर्गी अंधविश्वास दूर करने के नाम पर मूर्तिपूजकों का मजाक उड़ाते थे।
पर तुम तुम भी .... अँधियारी डूब हो
इस ÓबंदÓ में कवि कहता है - किंतु ईश्वर! तुम भी खूब माया के धनी हो। तुम्हारी माया से खिंच कर तुम्हारे भक्त की आत्मारूपी कुतिया अपने स्वार्थ - सफलता की चाह में पहाड़ी की चढ़ाई पर हाँफती हुई भी चढ़ जाती है Ó ढाल पर लोग उतरते हैं, चढ़ते नहींÓ राह में उसे गैरभक्तरूपी कुत्ते जो तुम ईश्वर को नहीं मानते। उसे छेड़ते हैं। छेंकते हैं। लेकिन तुम चढ़ाई की उँचाई के डोह में अँधियारी डूब हो। डोभ यानी दह तुम इस दह में डूब कर Ó नहा करÓ बाहर आए प्राणी की तरह हो। तुम्हारे इस रुप से तुम्हारी मायाविता टपकती है
इस बंद में कवि शून्य में ईश्वर को सरका लाया है। इस बंद में वह ईश्वर के भक्तों का उपहास करता है। उसके लिए भक्तों की आत्माएँ कुतिया हैं और राह में छेड़ने वाले कुत्ते ईश्वर के विरोधी हैं। कहीं ये मार्क्सवादी तो नहीं, कम्युनिस्ट देश में चर्च जाने वाले भक्तों को मार्क्सवादी ही छेड़ते हैं।
मुक्तिबोध तो अब रहे नहीं। मैं मार्क्सवादियों के सामने एक तथ्य रखता हूँ। वैज्ञानिक, कल - पुर्जों से एक ढाँचा बनाकर उसमें विद्युत प्रवेश कराकर उस ढाँचे में गति उत्पन्न कर देता है। वह माँ के डिंब और पिता के शुक्राणु को एक परखनली में डालकर एक उपयुक्त उष्मा पर संरक्षित कर देता है तो उसमें प्रजनन की क्रिया शुरू हो जाती है। यहाँ अलग से उसमें विद्युत प्रवेश नहीं कराता लेकिन कोई शक्ति उसमें प्रवेश करती है। बिना शक्ति के कोई गति नहीं आती तो भ्रूण बनाने के लिए यह शक्ति कहाँ से प्रवेश करती है? क्या यह सार्वत्रिक है। विद्युत छोटे छोटे सेलों में अंशरूप में होती है तो छोटे छोटे अंशों मे भक्त - मनुष्यों में हो सकती है। कुतिया कहने का अर्थ है कवि अपनी पूरी क्षमता से ईश्वर के अस्तित्व को नकारना चाहता है पर क्या नकार पाता है? यह पूर्वीय धारणा है
मात्र अनस्तित्व ......भी खूब है
यहाँ कवि आश्चर्य प्रकट करता है कि ईश्वर जो मात्र अनस्तित्व है अर्थात जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसका संसार में इतना बड़ा अस्तित्व। उसको बहुत से मानने वाले। यहाँ मात्र विशेषण के साथ अनस्तित्व को पढ़ने पर अर्थ होता है.अनस्तित्व के साथ कुछ और होता तो वह अस्तित्व और बड़ा होता। यह एक भ्रामक वाक्य है। कवि के अनुसार ईश्वर एक घुप्प अँधेरा है पर उसका उजाला बहुत तेज है। Ó घुप्प अँधेरे का तेज उजालाÓ बात गले उतरती नहीं। संभवत: कवि कहना चाहता है कि ईश्वर तो खुद अँधेरे में है। उसे किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं है किंतु लोग उसकी महिमा से अभिभूत हैं। लोग - बाग निराकार ब्रह्म के सीमाहीन शून्य के बुलबुले में गोल - गोल घूम कर जाने क्या खोजते हैं। ब्रह्म के सीमाहीन शून्य के बुलबुले शून्य के बुलबुले से भी कवि का तात्पर्य क्या ईश्वर की महिमा से है? शून्य को कवि ने न कुछ के अर्थ में प्रयोग किया है न कुछ में से बुलबुले कहाँ से निकलते हैं। हाँ उसके प्रति आकर्षित लोगों को ऐसा लगता होगा कि वे उसकी बूँद - बूँद महिमा से अभिभूत हो रहे हैं। यह कवि की अपनी कल्पना का ही प्रक्षेपण हो सकता है, अनुभव नहीं। यह शून्य या सिफर का अपना अँधेरा है। इसमें बिना बत्ती Ó क्या आत्म प्रकाश बत्तीÓ पर बिना ज्ञान के आत्म - प्रकाश कहाँ का सफर भी खूब है। यानी ईश्वर अँधेरे से भरा है और लोग - बाग उसमें बिना प्रकाश के ही सफर करते हैं। अद्भुत सूझ है कवि की। ईश्वर को मानने वाले तो ईश्वर को ही प्रकाश मानते हैं और कवि उसकी महिमा में लोगों को बत्ती लेकर जाने को कहता है-
सृजन के घर में ............ ऱिश्वतखोर थानेदार
कवि कहता है- सृजन के घर में अर्थात जहाँ सृजन हो रहा है, तुम मनोहर और शक्तिशाली हो किंतु दुर्जन के घर में विश्वात्मक फैंटेसी अर्थात विश्वमय दिवा - स्वप्न या स्वप्नचित्र सृजन का घर धरती पर केवल एक ही सृजन का घर है Ó स्त्री की कोखÓ ईश्वर वहीं शक्तिशाली है! और दुर्जन के भवन में विश्वमय स्वप्नचित्र! इस विश्वमय स्वप्नचित्र से क्या अर्थ है कवि का। क्या दुर्जनों का क्रीड़ा - लोक इसका अर्थ करते हुए नंदकिशोर नवल ने दुर्जन से मेल बिठाने के लिए सृजन को सज्जन कर लिया है। लगता है यह ईश्वर मुक्तिबोध की अपनी कल्पना का है। लोक - व्याप्त ईश्वर की दृष्टि सज्जन या दुर्जन सब पर समान रूप से पड़ती है पर मुक्तिबोध के इस कल्पित ईश्वर की सज्जन और दुर्जन के लिए अलग - अलग व्यवस्था है। कवि का ईश्वर प्रचंड शौर्य वाला और अंट - शंट बरदान देता है वह खूब रगदारी करता है। वह सज्जन और दुर्जन दोनों, जो एकदम विपरीत छोर पर हैं, के द्वारा पूजा जाता है। यह चुंगी वसूलने के लिए स्वर्ग के पुल पर भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेट और रिश्वतखोर थानेदार की तरह तैनात है यानी स्वर्ग पाने की अभिलाषा वाले लोगों से वह चढ़ावारूपी घूस उसी तरह लेता है जैसे कोई भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेट और रिश्वतखोर थानेदार।
कवि ईश्वर - भक्तों को चेताता है कि उनका ईश्वर पक्षपाती और भ्रष्ट है
ओ रे निराकार .................आविर्भूत
इस बंद में कवि ईश्वर को निराकार शून्य कहकर संबोधित किया है। अब तक के बंदों मे इस ईश्वर का निराकार शून्य की तरह चित्रण नहीं है। निराकार शून्य स्वयं ही एक विवादास्पद प्रयोग है। संत कवि कबीर ने जिस निराकार ईश्वर को संबोधित कर कविताएँ लिखीं हैं, थोड़े से ईशारे से वे समझ में भी आती हैं और आनंदानुभूति भी होती है पर इन पंक्तियों के पढ़ने पर कोई भी संवेदना नहीं उभरती। आनंदानुभूति तो दूर की कौड़ी है। कविता का मूल धर्म तो पाठक के हृदय में संवेदना जगाना ही है जो इन पंक्तियों मे नदारद है। नंदकिशोर नवल भी इस भाषा को अकाव्यात्मक भाषा कहते हैं Ó बिंब प्रतिबिंबÓ एक नयी बात यहाँ देखने को मिलती है. अकाव्यात्मक भाषा में भी कविता लिखी जाती है।  कवि का निराकार शून्य Óईश्वरÓ अपनी कीर्ति को सँवारने के लिए कवि के जनों की सारी महान विशेषताओं को उधार ले लिया है। निज को अवशेष कर लिया है अर्थात बचा लिया है। उसके पास अपनी कोई विशेषता नहीं है और सभी जगह आविर्भूत उत्पन्न होकर यश की काया वाला बन गया है। यह विचित्र लगता है। लोक - कल्पना में ईश्वर आविर्भूत नहीं होता। वह तो सर्वत्र वर्तमान है। वह लोक - कल्याण के लिए प्रकट होता है।
हमें तो यही पता है कि लोक - भावना को ईश्वर की जैसी प्रतीत होती है। वह उन्ही विशेषणों से अपने आराध्य को विभूषित करता है। उनका ईश्वर लोगों से उनकी विशेषताएँ माँग कर अपने को विभूषित नहीं करता लेकिन कवि तो व्यंग्य के मूड में है। व्यंग्य ही नहीं वह प्रतिक्रया में भी है। वह अपनी उद्भावना को ऊपर कर लोक - धारणा के ईश्वर का उपहास करता है।
लगता है अपनी कल्पना के ईश्वर से अलग हट कर कवि मंदिर के ईश्वर का जो अनुभव लेता है। इन पंक्तियों में उसी अनुभव को व्यक्त करता है। वह कहता है - मैं शाम के समय कदंब के वृक्ष के पास स्थित मंदिर के चबूतरे पर बैठ कर जब कभी तुझे देखता हूँ। मुझे भयभीत आँखों वाले हंस और घाव भरे कबूतर याद आते हैं। मुझे याद आते हैं मेरे लोग, उनके सब हृदय रोग, उनके घुप्प अँधेरे घर और उनके चेहरे पर चिंता के पीली - पीली अंगारों जैसे पंख। इस क्षण भगवान की भक्त शबरी और उसकी झोपड़ी में गरीबी की प्रतीक जलती ढिबरी भी याद आती है। मुझे अपना प्यारा - प्यारा देश भी याद आता है जो लाल - लाल सुनहले आवेश से भरा हुआ है। शायद यह ईशारा है स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले रहे लोगों की तरफ  जिसके वह विरोध में थे। संभवत: वह कहना चाहते हैं कि ये लोग अपनी भौतिक स्थिति की ओर ध्यान नहीं दे रहें और जोश आवेश से भरे हुए हैं Ó व्यंग्यÓ आगे कवि कहता है कि मैं कवि अंधा हूँ। खुदा के बंदों ÓसेवकोंÓ का बावला Ó पागलायाÓ बंदा हूँ, यह एक विरोधाभाषी वक्तव्य है, क्योंकि कवि के काव्य - उद्देश्य को देखते हुए इसका अर्थ होगा वह जन - सेवक है खुदा का सेवक नहीं। यह कोई काव्यानुभूति है या एक राजनीतिक वक्तव्य इसका एक अन्य अर्थ भी हो सकता है - वह खुदा के बंदों का बंदा अर्थात स्वयं खुदा का बंदा है। इस दृष्टि से कवि की तरफ  से यह एक वंचना है - अंधा बावला बंदा भी कैसा। सदा नहीं पर कभी - कभी शंका के काले - काले मेघ - सा गणित की काटी हुई तिर्यक रेखा और किसी सरीसृप पेट के बल चलने वाले जीव जैसे सर्प की माला के समान इस तरह के बंदों का मेरे आलोचक के मन में कोई चित्र नहीं उभरता न कोई संवेदना जगती है।
इस बंद में कवि की दृष्टि एक तरफ  लोगों द्वारा पूजे जा रहे ईश्वर पर है और दूतरी तरफ  उसकी पूजा कर रहे लोगों की आर्थिक स्थिति पर शबरी, ढिबरी की रोशनी में टूटी - टाटी झोपड़ी में रहती है। ईश्वर ने क्या दिया है उसे। मंदिर में घूमते फिरते हंस - कबूतर भी भयभीत - से लगते हैं। ईश्वर उन्हें सुरक्षा नहीं देता।
मेरे इस साँवले ...............जरूरत नहीं है।
यह कविता का अंतिम बंद है। इसमें कवि अरूप शून्य Óईश्वरÓ को अपनी उपलब्धि से अवगत कराता है - देखो, मेरे इस साँवले चेहरे पर कींचड़ के धब्बे पड़े हैं, दाग हैं । किस तरह के दाग, दाग तो स्थाई होते हैं। पहले से पड़े होंगे और मेरी इन फैली हथेलियों पर अग्नि - विवेक की जलती हुई आग है। किंतु कवि अगले ही क्षण इसे नकार देता है आग का उन्हें भ्रम हो गया था, कींचड़ से आग तो निकलती नहीं और महसूस करता है कि वह ज्वलंतÓ प्रकाशमानÓ सरसिज है। इसे छाती तक पानी में फँस कर और संसाररूपी कीचड़ के जिंदगीरूपी दलदल में धँस कर वह सरसिज निकाल लाए हैं, इसीलिए वह भीतर से गीला हैं और पंक से आवृत हैं। इस क्षण वह स्वयं घनीभूत हैं अर्थात तृप्त हैं। यह सरसिज संभवत: समाजवाद का है जो उन्हें तृप्ति दे गया है। वह कहते हैं - हे अरूप शून्य Ó ईश्वरÓ! अब मुझे तेरी कोई जरूरत नहीं, गोया ईश्वर ने उनसे कहा हो वह उनकी जरूरत है।
सरसिज प्रकृति की एक स्वतंत्र खिलावट है। कवि ने कीचड़ में धँस कर उस खिलावट को तोड़ लिया। अपने अंदर खिलाया नहीं। तोड़ी हुई खिलावट कवि की खिलावट कैसे हो गई? इस हेतु कवि के अग्नि - विवेक ने काम किया है या प्रतिक्रिया की अति ने यह कुछ उसी की तरह की कल्पना है जैसी हातिमताई की कहानी में आबे जम - जम लाने की।
समीक्षा
मुक्तिबोध का स्थान निस्संदेह नयी कविता की लीक बनाने वाले अग्रणियों में है। यह कविता भी उनके मन की एक नयी उद्भावना है। एक नयी लीक है। इस कविता के माध्यम से वह ईश्वर का निषेध करना चाहते है। ईश्वर - निषेध की हमारे यहाँ चार्वाकों की एक लंबी परंपरा है पर नयी कविता में संभवत:यह सर्वथा एक नयी पहल है। किंतु दोनों अभिव्यक्तियों में अंतर है। चार्वाक ईश्वर का निषेध करते हैं एक दर्शन खड़ा कर किंतु मुक्तिबोध ईश्वर की आलोचना करते हैं उसे न कुछ मानते हुए उसका उपहास उड़ाकर।
लेकिन देखने वाली बात है कि उसके उपहास के लिए कवि अपनी कल्पना का एक Óअरुप शून्यÓ अथवा ईश्वर का बिंब रचता हैं। रात और दिन इस ईश्वर के कान हैं। वह आकाश को, करवट में एक कान से ढँक कर पलंग पर सोया है। धरती पर चीख - पुकार मची है पर उसकी ध्वनि उसके कानों में नहीं पहुँचती। उसके शब्द उसके कान और सिर के बालों के हिलने से लगता है। उन पर पंख वाले कीड़ों की तरह भिनभिनाते हैं मानो वह दैत्य है। वह घोर निद्रा में है। कवि की दृष्टि में। असल में ईश्वर कुछ नहीं है, अनस्तित्व है। किंतु उसका यश सर्वत्र फैला है। वह सम्राट का रुतबा रखता है। नींद में होने से वह सर्वज्ञानी है क्योंकि वह बोलता नहीं, बोलने से उसकी अज्ञानता की पोल खुल सकती है। ईश्वर को कोसने और उसका उपहास उड़ाने के लिए क्या कवि ने यह कोई फैंटेसी बनाई है? ईश्वर -भक्तों के ईश्वर की यदि ऐसी कोई कल्पना मूर्ति होती तो इस उपहास में कुछ दम भी होता संभव है पश्चिम के ईश्वर की ऐसी कोई कल्पना हो क्योंकि वह आकाश में रहता है। उसी ने सृष्टि को बनाया है बाईबल तो कोई न कोई उसका रूप होगा ही और यह रूप पश्चिमी कलाकारों के निकट का है, किंतु भारतीय ईश्वर की ऐसी कोई कल्पना - मूर्ति नहीं है।  ऐसा न होने से कवि ईश्वर का उपहास कर वह स्वयं ही उपहास का पात्र बन गया है। जिस तरह की भाषा का इस कविता में प्रयोग किया गया है कत्तई सुरुचिपूर्ण नहीं है। नंदकिशोर नवल भी इस भाषा को अकाव्यात्मक मानते हैं। फिर भी वह इस कविता को विश्व की सर्वश्रेष्ठ कविता मानते हैं। पता नहीं कैसे? ईश्वर के इस चित्रण से न कोई संवेदना छलकती है न उसके प्रति किसी प्रकार की घृणा या सहानुभूति उभरती है जिससे कोई पाठक ईश्वर से विरत हो जाए। कविता की पंक्तियों से किसी तरह की काव्यानुभूति नहीं होती।
कवि के कविता के तीन क्षणों को लें। इनमें प्रथम क्षण, अनुभव का क्षण है। निश्चित ही यह सद्य: अनुभव का क्षण नहीं होगा। वह गहन अनुभव का क्षण होगा और कवि - विवेक पर कसा भी गया होगा। किंतु ऐसा लगता नहीं। क्योंकि एक ही समय में उन्नीसवीं सदी में दो महापुरुष हुए जो ईश्वर को जानना चाहते थे। पूरब में विवेकानंद और पश्चिम में फ्रेडरिक नीत्से रामकृष्ण के पदस्पर्श से विवेकानंद को ईश्वर मिला अनुभूति के रूप में किंतु नीत्से ईश्वर को वस्तुरूप में देखना चाहता था। उसे वस्तुगत ईश्वर नहीं मिला। उसने घोषणा कर दी ईश्वर मर गया है। उसके पास अनेक अंतर्दृष्टियाँ थी जिसे वह संभाल नहीं पाया फलत: विक्षिप्त हो गया। मुक्तिबोध इस मंथन में नहीं जाते कि रामकृष्ण के पदस्पर्श से विवेकानंद के साथ आखिर क्या घटा कि वह अकस्मात समाधिस्थ हो गए। उनके स्नायुओं में कौन सी तरंग घुमड़ गई जिसे उन्होंने ईश्वरानुभूति समझा। उस अनुभूति से उनमें कौन सी संवेदना जगी कवि ने यह जानने की कोशिश नहीं की।
जितना मुझे ज्ञात है, मैं यह कह सकता हूँ कि कवि अपने आप में परिपूर्ण नहीं होते बल्कि वे अनुभव और अनुभूतियों से आपूरित होते हैं। आपूरण के लिए कोई वर्जना नहीं होती कि वह इससे ले या उससे।
रामकृष्ण के पास ध्यान की लंबी परंपरा थी। ईश्वरानुभूति से उनका शरीर शक्ति का पुंज हो गया था। उन्होंने विवेकानंद पर शक्तिपात कर उन्हें भी ईश्वर का दर्शन करा दिया। अनुभूति के रूप में, विवेकानंद की एक - एक कोशिका ईश्वर को जानने की आकांक्षा से भरी थी। नीत्से ईश्वर को अपने से अलग वस्तुरूप में खोज रहे थे। उनके सामने बाईबल का ईश्वर था जिसने छै दिन में संसार को बनाया। यानी वह वस्तुरूप है। वह क्रिएटर है जबकि भारतीय धारणा में ईश्वर क्रिएटिविटी है। ईश्वर मनुष्य के भीतर है। संसार को किसी क्रिएटर ने नहीं बनाया। संसार बना है क्रिएटिविटी से। मुक्तिबोध ने इस संबंध में किसी तरह की खोजबीन की जरूरत नहीं समझी। ईश्वर के विरोध के लिए उनका बस इतना ही जानना काफी था कि ईश्वर है तो दिखाई क्यों नहीं देता। वह राधामोहन गोकुल के तर्कों में उलझ कर रह गए। वह भी यही कहते हैं कि ईश्वर अगर है तो उसे दिखाई देना ही चाहिए लेकिन यह नहीं कहते कि सत्य और प्रेम को क्यों नहीं वस्तुगत होना चाहिए जबकि इनके अस्तित्व हैं पर ये दीख नहीं पड़ते।
प्रसिद्ध पश्चिमी मनोवैज्ञानिक कार्ल जुस्ताव जुंग चेतना की भूमिका के संबंध में फ्रायड से सहमत नहीं था। वह चेतना के संवंध में और आगे जानने के लिए रमण महर्षि के संबंध में एक किताब पढ़ कर, उनसे मिलने भारत आया और उनसे सत्संग कर संतुष्ट हुआ। रमण महर्षि सन् 1950 में मरे। मुक्तिबोध भी अपनी खोज पूछ में उनके पास जा सकते थे पर वह नहीं गए। इसे देख कर तो अनकी व्यक्ति चेतना की स्वतंत्रता की बात भी अर्थपूर्ण नहीं लगती। उनका यह भी सोचना छद्म लगता है कि व्यक्ति - व्यक्ति समान है। उन्होंने व्यक्ति - व्यक्ति में भेद किया तभी तो रमण महर्षि के पास नहीं गए। उन्होंने अपनी खिड़कियाँ बंद कर ली थीं।
कवि ने इस कविता में पश्चिम के क्रिएटर ईश्वर को भारतीय अवधारणा के क्रिएटिविटी ईश्वर पर बलात लादने की कोशिश की है।
कविता लिखने के पहले कवि उहापोह में पड़ा लगता है। कवि कविता का शीर्षक रखता है Óअरुप शून्य के प्रतिÓ पर कविता में अरूप शून्य का कहीं जिक्र ही नहीं है। यहाँ अरूप शून्य के माध्यम से किसी सरूप को संबोधित किया गया है। Óअरुप शून्यÓ एक विचारशीलता का भ्रम देता है क्योंकि हमारे यहाँ नागार्जुन का शून्यवाद एक दर्शन के रूप में विद्यमान है। पर यहाँ शून्य के साथ अरूप लगा हुआ है। शून्य का यह अरूप विशेषण दिमाग में चुभता है। कविता में वह सरूप हो गया है और कुछ दूर तक चल कर निराकार और अनस्तित्व हो गया है। यहाँ पश्चिम की अवधारणा में पूरब की धारणा को मिला दिया गया है। यह एक स्वस्थ चिंतन का आभास नहीं देता। ईश्वर का वस्तुगत रूप होना चाहिए की जिद में अनुभूति को तिलांजलि दे दी गई है। यह निराकार संबोधन ही संकेत देता है कि कवि के कविता लिखने का अभीष्ट ही है ईश्वर पर व्यंग्य करने के बहाने ईश्वर -भक्तों के विश्वास को छलनी - छलनी करना।

715 डी, पार्वतीपुरम, चकशाहुसेन,
बशारतपुर, गोरखपुर 273004

दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी

डॉ. गिरीश काशिद

बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में हिंदी कहानी में जो महत्वपूर्ण मोड़ मिलते हैं। उनमें से एक प्रमुख मोड़ है - हिंदी दलित कहानी। सन 1960 में मराठी साहित्य में दलित साहित्य का उद्भव हुआ। इसके भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद हुए। तत्पश्चात भारतीय भाषाओं से मौलिक रूप में दलित साहित्य का लेखन होने लगा। और इस साहित्य ने जल्द ही अपनी पहचान बना ली। हिंदी में ओमप्रकाश वाल्मीकि मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, रमणिका गुप्ता, अजय नवारिया आदि ने हिंदी दलित कहानी को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब दलित हिंदी कहानी अपनी पहचान बना चुकी है। एक ओर हिंदी में भारतीय भाषाओं से दलित कहानियों का अनुवाद हो रहा है तो दूसरी ओर हिंदी दलित कहानी नित नये संदर्भ लेकर अवतरित हो रही है। यह कहानी परंपरा से दबाये गये स्वर को वाणी दे रही है। हमारी विषम व्यवस्था और दोगली मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह् लगा रही है। दलित कहानी की वास्तविक चिंता अपने समाज को पराधीनता की उन परंपराओं से मुक्ति दिलाने के लिए है जिसने उन्हें सदियों से भारतीय समाज की मुख्यधारा में अस्पृश्य और कमजोर बनाये रखा है।1 हिंदी दलित कहानी में ये संदर्भ विविध रूप में अभिव्यक्त हो रहे हैं।
अब हिंदी दलित कहानी का तक दूसरा दौर शुरु हो चुका है। इससे अनेक अछूते संदर्भ उजागर हो रहे हैं। नये कहानीकार नये संदर्भों को रुपायित कर रहे हैं। विपिन बिहारी, सुशीला टाकभौरे, असंग घोष,कुसुम वियोगी,बुध्दशरण हंस आदि अनेक रचनाकार पूरे तेवर के साथ कलम चला रहे है। 2 विपिन बिहारी का नाम इसमें विशेष उल्लेखनीय कहना होगा। झारखंड के देहाती परिवेश में रहकर वे बेहद ईमानदारी से साहित्य सर्जन कर रहे हैं। अब तक उनकी सवा दो सौ कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी है। केवल संख्यात्मक दृष्टि से ही नहीं अपितु गुणात्मक दृष्टि से भी उनकी कहानियाँ उल्लेखनीय है। अपना मकान, पुनर्वास,आधे पर अंत, राजमार्ग पर गोलीकांड और चील ये उनके अब तक प्रकाशित कहानी संग्रह हैं।
यहाँ विपिन बिहारी के दो प्रतिनिधि कहानी संग्रह Ó पुनर्वासÓ और Óआधे पर अंतÓ के आधार पर उनकी कहानियों में अभिव्यक्त दलित विमर्श को देखेंगे। विपिन बिहारी का Ó पुनर्वासÓ कहानी संग्रह सन 2000 में तोÓआधे अंतÓ कहानी संग्रह सन 2001 में प्रकाशित हुआ है। अर्थात इन कहानियों में बिल्कुल वर्तमान परिवेश का अंकन हुआ है। इन दो संग्रहों में कुल पंद्रह कहानियाँ संकलित है। इन सभी कहानियों के केंद्र में दलित जीवन है। इसमें उत्तर भारत का दलित जीवन पूरे यथार्थ के साथ रेखांकित हुआ है।
Ó पुनर्वासÓ कहानी संग्रह में Ó सीमाएँÓ Ó कीर्तन मंडलीÓ Ó प्रतिकारÓ Óआमने सामनेÓ Ó काँचÓ Ó समय चेतÓ Ó पुनर्वासÓ ये सात कहानियाँ संकलित हैं। आधे पर अंत कहानी संग्रह में तीर्थयात्रा,पहचानश्, पत्थर की लकीर,मुक्का, षडयंत्र,कठपुतली,बदस्तूर,आधे पर अंत। ये आठ कहानियाँ संकलित है। ये कहानियाँ दलित जीवन के विविध संदर्भों की यथार्थ पड़ताल करती है। इनका कथ्य गाँव से लेकर नगर तक फैला है लेकिन केंद्र में गाँव ही है। सीमाएँ हरमेश और जोगंदर इन दो मित्रों की कहानी है। हरमेश सवर्ण है तो जागेंदर अवर्ण बावजूद दोनों में गाढ़ी दोस्ती है। हरमेश समता और बंधुता का समर्थक है। उसकी बहन सरोजी बालविधवा है। जोगिंदर और सरोजी में प्यार हो जाता है। वे सीमा लाँघते हैं। परिणामस्वरूप सरोजी पेट से रहती है। दोनों विवाह भी करना चाहते हैं लेकिन जोगिंदर के दलित होने से सरोजी की माँ भैरोदेवी को यह रिश्ता मंजूर नहीं है। दोनों के अवैध संबंध उसे स्वीकार है लेकिन वैध संबंध नहीं। जोगेंदर के प्रश्न पर वह कहती है - जोगिंदर तुम जिस बिरादरी को हो उस बिरादरी की औरतें इस घर में आई चाहे जिस रूप में आई। मेरी बिरादरी की औरतें कभी नहीं गई तुम्हारी बिरादरी में। कभी नहीं चाहूँगी मैं कि सरोजी ब्याह जाए तुमसे। 3 यहाँ सवर्ण वर्ग की दोगली मानसिकता उजागर होती है। हरमेश की शादी में जोगिंदर शामिल होता है तो उसके रिश्तेदार आपत्ति उठाते हैं। हरमेश सभी को समझाने की कोशिश करता है। जोगिंदर चुप रहना ही मुनासिब समझता है। हरमेश उसे कहता है कि क्या तुम्हें अपमान - बोध महसूस नहीं होता। इस पर जोगिंदर अपने अस्तित्व और अस्मिता के प्रति सजग होते हुए कहता है - मैं भी चाहता हूँ कि स्थिति नहीं बदले और मुझमें एक रोष अक्सर बना रहे भीतर - भीतर। युगों प्रताड़ित रहा मैं मेरी बिरादरी, मेरा वर्ग....मैं तो ऐसी कल्पना करता हूँ कि मैं प्रतिशोध ले लूँ और उन्हें भी ऐसे समय पर अपमानित और प्रताड़ित करुँ। 4. जोगिंदर के इस कथन के साथ ही कहानी खत्म होती है। इसके जरिए कहानीकार ने दलित अस्मिता और चेतना को रेखांकित किया है। इसी प्रकार Ó कीर्तन मंडलीÓ कहानी में कनाई गोडाईत अपनी कीर्तन मंडली के आधार पर अपनी चेतना बनाये रखता है।
प्रतिकार कहानी में दलित औरतों का सवर्णों व्दारा किया जाने वाला भयावह यौन शोषण चित्रित हुआ है। कहानी में चित्रित ग्रामीण परिवेश में पूँजीवादी, ब्राह्मण आदि दुसाधों चमारों की बेटियों का खुलेआम यौन शोषण करते हैं। जिउत और उसकी स्त्री सुन्नर पांडे के खेत में मजदूरी करते हैं। उन्हें जबरन बंधुआ मजदूर बना दिया है। जिउत की बेटी गेंदवा को समझ आने से पहले किसी ब्राह्मण व्दारा कौमार्य भंग किया जाता है। फिर तो हर कोई उसका शोषण करता है। सुन्नर पांडे तो उसका ही नही तो हर दलित औरत का यौन शोषण करते है। जिउत को पाँच सौ रुपये देकर उसे फँसाते है। और गेंदवा का निरंतर यौन शोषण करते है। जिउत सब जानकर भी अनजान बनता है। जहाँ भूखए प्यास और अभाव से मुठभेड़ रोज हो जाती हो तो फिर न बेटी की देह का महत्व रह जाता है न औरत की देह का। सिर्फ  पेट पोषण का लक्ष्य सामने हो जाता है। 5. जिउत जब गेंदवा की शादी करना चाहता है तो सुन्नर पांडे उधार दिये पाँच सौ रुपए के सूदसमेत पच्चीस सौ रुपए लौटाने को कहते है। पिता की दशा देखकर गेंदवा बदला लेने की ठान लेती है। जब सुन्नर पांडे उस पर फिर बलात्कार करने लगता है तो वह उसकी बुरी तरह से पिटाई करती है। उसको पछाड़कर उसके मुँह में पेशाब कर देती है। गॉव में ऐसा होना क्रांति से कम नहीं था। सभी औरतें गेंदवा की बात का समर्थन करती हैं। और प्रतिकार की एक लहर पैदा होती है। पहचान कहानी में इसी प्रकार लोकनाथ और नंदकेसरी की सुंदर बेटी लाजो का जमींदार जवाहरबाबू यौन शोषण करते हैं। उनका बेटा दशरथ भी उसका यौन शोषण करता है। लेकिन वह जब पेट से रहती है तो दोनों मुकर जाते हैं। इस पर लाजो की माँ नंदकेसरी उन्हें सबक सिखाती है। वह अपनी बेटी को अवैध संतान को जन्म देने को कहती है। और उस बेटे को जवाहर बाबू को उनका पाप बताकर उनके चबूतरे पर छोड़ आती है। समय चेत कहानी में भी दलित मंगरी में अद्भुत चेतना मिलती है। जमींदार बदरी बाबू भुइया मजदूरों का शोषण करते हैं। जब उनमें चेतना उत्पन्न होती है तो वे उन्हें शराब की लत लगाकर अपना काम जारी रखते हैं। मंगरी जब समस्या की जड़ जानती है तो अपनी टोली की औरतों का जत्था निकालकर शराब की दूकान तोड़ देती है। इससे क्रोधित बदरी बाबू उसका अपहरण करते हैं तो उनसे भी दो हाथ करती है। बदस्तूर कहानी में यौन शोषण का अलग संदर्भ में चित्रण हुआ है। यहाँ के डोमटोले के लोगों को जाति पर आधारित काम सौंपे जाते हैं। जिन पर उनकी रोजी रोटी नहीं चलती। इससे मजबूरन उनकी औरतों को देह विक्रय करना पड़ता है। गूजिया के इस कथन से उसकी बिरादरी की पीड़ा एवं आक्रोश व्यक्त होता है - करी बहनिया के सबे छुआता हय हमनी से, इ देहिया के का हय जेउ सबके छुआय में रोग - बीमारी लग जाती है। 6. इससे यह बात स्पष्ट होती है कि आज भी ग्रामीण दलित औरत का शोषण किया जाता है।
आमने सामने दलितोध्दार का नकाब ओढ़कर षडयंत्र करने वालों की पोल खोलने वाली कहानी है। ब्राह्मण श्रीमुख मिश्रा दलितों से कोई नेता न उभरे इसलिए उनके नेता बनते हैं। लेकिन संघर्ष के समय वे अक्सर अनुपस्थित रहते हैं। उनके इस षडयंत्र को शिक्षित कमला पहचान लेता है। हरिहर पांडे का बेटा उसकी बहन पर बलात्कार करता है तो वह भी उसका बदला हरिहर पांडे की बेटी पर बलात्कार करके लेता है। वह अपनी बिरादरी को संगठित करता है। परंपरा से उसकी बिरादरी पर सौंपे जानेवाले निम्न काम करने को इन्कार कर देता है। वह श्रीमुख मिश्रा को तक सुना देता है - युगों से आप पाला बदलते रहे हैं। जब - जब आप पर खतरा आया, कई - कई शगूफे छोड़कर अपनी रक्षा की जिसका कि इतिहास है। 7. यहाँ पर दलितों में से एक व्यक्ति का शिक्षित होना तक उनमें चेतना जगाने का कारक बन जाता है।
काँच पीढ़ी संघर्ष की कथा है। बसंतबाबू काफी कष्ट उठाकर अपना स्थान बनाते हैं। उनका बेटा सुयश शिक्षित होता है तो अपनी जिंदगी जीना चाहता है। वह जातीय उपेक्षा, प्रताड़ना से मुक्ति चाहता है। पिता जातीय दलदल को दूर करना चाहते हैं और बेटा उससे दूर भागता है। सुयश सवर्ण लड़की से शादी करना चाहता है और बसंतबाबू चाहते है कि वह अपनी बिरादरी की लड़की से शादी करें ताकि अपना समाज उपर उठेगा। उन्हें लगता है कि बेटा सवर्ण लड़की से शादी करेगा तो अपनी बिरादरी से कट जाएगा। वे नौकरपेशा है। उन्हें अपनी जाति को लेकर गर्व है। इसी कारण वे सुयश को कहते है - जात से कब तक भागेंगे? जिस जात के बल पर तुमने उँचाई तय की है, उसे भी एक उँचाई दो न कि भाग जाओ। अपना काम निकालकर। 8. लेकिन बेटा अपने निर्णय पर अडिग रहता है और बसंत बाबू का दिल काँच की भॉति टूट जाता है। पत्थर की लकीर कहानी की सुनयना बसंतबाबू के विचारों को अंजाम देती नजर आती है। उसका पिता तेतर शहर में चपरासी है। वह शिक्षा के महत्व को समझकर अपनी बेटी को पढ़ाना चाहता है। गाँव में तमाम मुश्किलें सहकर सुनयना पढ़ती है। उच्च शिक्षा तेतर के साथ रहकर शहर में लेती है। बचपन से ही वे शैक्षिक माहौल में अकेलापन महसूस करती है। कॉलेज के दौरान उसकी सवर्ण देवेंद्र से दोस्ती हो जाती है जो प्यार में बदल जाती है। कुछ विरोध के बाद दोनों के माता - पिता इस रिश्ते को मंजूरी देते हैं। लेकिन देवेंद्र के माता - पिता उसका धर्मांतरण करने की बात करते हैं। अंतत: सुनयना इस रिश्ते को ही नकारती हुई कहती है - मैं कम पढ़े - लिखे से ब्याह कर लूँगी लेकिन देवेंद्र से नहीं करुँगी। हमारा वर्ग काफी निर्धन, पिछड़ा, अशिक्षित है। मैं एक पढ़ी - लिखी, ब्याह होने पर मैं अपने वर्ग से कट ही जाउँगी न, तो मेरे पढ़ने लिखने का फायदा किसे मिलेगा। 9. यहाँ सुनयना बसंतबाबू के विचार को मूर्त कर देती है। तीर्थयात्रा कहानी ऐसे विवाह के परिणाम को सामने रखती है। महेश राम सवर्ण विजया से विवाह करते हैं और धीरे -धीरे अपने ही घर में आगंतुक बन जाते हैं। सेवानिवृति के बाद तो वे घर के एक फालतू सदस्य बन जाते हैं। पत्नी विजया दोनों बेटों के विवाह उन्हें पूछे बगैर सवर्ण लड़कियों से तय करती है और घर में ही वर्णव्यवस्था लागू कर देती है। इससे परेशान महेश राम अंतत: घर छोड़कर चले जाते हैं।
पुनर्वास एक उल्लेखनीय कहानी है। इसमें दलित चेतना के मौन संदर्भ को रेखांकित किया है। दलितों के झोपड़ों को बेवजह आग लगाई जाती है। और फिर पूरा सरकारी तमाशा संपन्न होता है। यह घटना बैरागी को की उव्देलित कर देती है। दलितों की हिफाजत का जिम्मा सरकारी होना बैरागी को अखरता और वह सोचता है। अलबत्ता दलित नपुंसक हो गये सरकार की इस नीति से। लाख दो लाख सहायता के नाम पर लुटा देगी सरकार दलितों के बीच लेकिन लाख दो लाख का रोजगार नहीं खड़ा करवा सकती।10. सरकार रूपए गरीबी हटाने के लिए खर्च नहीं करती अपितु गरीबी बनाये रखने के लिए करती है। इस झूठी सांत्वना नीति को लेकर बैरागी के मन में प्रश्न निर्माण होता है। बैरागी तो आग लगाने वाले गाँव के सवर्णों को जानता भी है लेकिन आग लगाने का कारण बूझ नहीं पाता। और बैरागी की अस्मिता जाग्रत होती है। वह जूठन खाता नहीं और वह न लाने की बात पत्नी को कह देता है। कठपुतली श्याम रज्जाक की त्रासद कथा है। दलित श्याम रज्जाक को मंत्री और उनके चेले प्रमोशन देकर निदेशक बना देते हैं और फिर उनसे अपने काम करवाते हैं। वे अनाकानी करते हैं तो उनकी जवान बेटी का अपहरण कर उसकी इज्जत लूटते हैं। उनको भी शराब और औरत की लत लगाते हैं और फिर उन्हें ब्लैकमेल करते हैं।
षडयंत्र कहानी में ग्रामीण शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त धांधली का चित्रण मिलता है। यह इलाका पिछड़ी जातियों का है और सभी मास्टर अगड़ी जाति के है। वे नहीं चाहते के दलित बच्चे पढ़े। इसी कारण वे कक्षा में पढ़ाते ही नहीं। मास्टर दुबे तो गोडाइत की लड़की निमिया पर बलात्कार करने की कोशिश करता है। स्कूल में दलित धनेसर राम मास्टर आते हैं तो शिक्षा का माहौल बना देते हैं। इससे सवर्ण मास्टरों को के अहं को ठेस पहुँचती है। वे उसे धमकाकर भगाने की तक कोशिश करते हैं। लेकिन धनेसर राम उन्हें कड़ा जवाब देता हैं। गॉव के लोग उनके पीछे खड़े होते हैं। शिक्षा के प्रति सजग हुए गाँववाले अन्य मास्टरों को यहाँ तक सुना देते है - इ स्कूल हमरा है, हमरा गाँव का है, हमर जर - जमीन पर है।11
आधे पर अंत एक लंबी कहानी है। इसके केंद्र में संपत पासवान है। उसके जन्म से ही उसकी बीमारी से माता -पिता परेशान है। बचपन से उसे पिता की उपेक्षा सहनी पड़ती है चॅूंकि उसका जन्म अशुभ मुहूर्त पर हुआ। दूसरी ओर उसे जाति के कारण बचपन से प्रताड़ना सहनी पड़ती है। लेकिन वह पढ़ाई में तेज निकलता है और अपनी पहचान बनाता है। आगे वह पढ़ाई हेतु शहर जाता है। उसके बी.ए.  एक  होने पर पिता उसे पढ़ाई बंद कर नौकरी पकड़ने को और शादी करने को कहते हैं। लेकिन संपत नकार देता है। वह टयूशन लेकर एम. ए. तक की पढ़ाई पूरी करता है। पढ़ाई पूरी होने पर वह आरक्षण की बैसाखी के बिना नौकरी करना चाहता है लेकिन उसे विचित्र अनुभव आते हैं। अंतत: वह ट्रक ड्रायवर बन जाता है। गाँव में आरक्षण को लेकर ताने कोसने वाले जदु महतो को वह सुना देता है - नौकरी मिल रही थी लेकिन मैंने नहीं की। मैं कोटे का आदमी हूँ और बन गया ड्रायवर। ये किसी का निजी ट्रक है न की सरकारी।12. वह नौकरी छूट जाती है तो वह विधवा अपर्णा देवी का ड्रायवर बन जाता है। दोनों में यौन संबंध भी स्थापित हो जाते हैं। अपर्णा देवी उस पर खुश होकर उसको संपति का वारिस बना देती है और उसकी शादी भी करवा देती है। फिर संपत जनरल सीट पर चुनाव लड़ता है और हार जाता है। फिर अपने आसपास अपनी जाति की फौज जमा कर देता है। और वह कोटे की सीट पर चुनाव लड़कर सांसद बन जाता है। उसकी यह यात्रा दिशा - हीन है। उसने जो चाहा वह नहीं हुआ जो नहीं चाहा वह हुआ। उसका अंत आधे पर ही हुआ। अपने विचारों को वह अंजाम न दे सका। उसकी इस दिशाहीनता को ही कहानीकार ने चित्रित किया है।
समग्रत: इन कहानियों में दलित जीवन का विविध कोणों से अंकन हुआ है। इनमें एक ओर दलितों के भयावह शोषण का चित्रण हुआ है तो दूसरी ओर इसके विरुध्द पनप रही चेतना का भी अंकन हुआ है। इसमें जो चेतना मिलती है वह आरोपित नहीं लगती। वह वहाँ के परिवेश की उपज तो है ही लेकिन वह प्रजातांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर खड़ी है। इन कहानियों में अभिव्यक्त दलित चेतना डॉ. अम्बेडकर के पढ़ो, संगठित बनो और संघर्ष करो पर आधारित है। इसी कारण इन कहानियों के पात्र न्याय, स्वतंत्रता और समता के लिए संघर्ष करते हैं। उनके संघर्ष में विद्रोह का कड़ा रुख मिलता है। संघर्ष करने वाले पात्र विभिन्न स्तर के हैं। डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि गुलाम को उसके गुलाम होने का एहसास करा दो तब वह जाग जाएगा। बिल्कुल इसी तर्ज पर समय चेत कहानी का शिवमूरत अपने टोले के लोगों को कहता है - जब तलक न लड़ोगे अपन हक - अधिकार के खातिर, कुत्ता नहीं पूछेगा और अधिकार बेलड़े - झगड़े नहीं मिलता।13 इसी प्रकार आमने सामने कहानी में कमला अपनी बिरादरी को सजग करता मिलता है। बसंतबाबू, सुनयना आदि पात्रों में जातीय चेतना देखने को मिलती है। कहानीकार ने दलित नारी में उत्पन्न चेतना को भी सार्थक रूप में प्रस्तुत किया है। मंगरी, गेंदवा, सुनयना, नंदकेसरी आदि पात्र अपनी पहचान बनाने में सक्षम है। ये कहानियाँ एक साथ वर्ण और वर्ग संघर्ष के लिए जमीन तैयार करती है। समता, स्वातंर्त्य और बंधुता की माँग करती है।
इन कहानियों का कथ्य उल्लेखनीय है। ये कहानियाँ दलित जीवन के विविध संदर्भों को यथातथ्य प्रस्तुत करती है। कहानीकार ने कथ्य के अनुकूल भाषा का प्रयोग किया है। प्रयोग से दलित परिवेश को यथार्थ रूप में वाणी मिली है। ये कहानियाँ कोई कला नहीं करती अपितु सामाजिक परिवर्तन हेतु सार्थक पहल करती है।
संदर्भ
1. प्रो. कमला प्रसाद, वसुधा अंक 58, जुलाई - सितंबर 2003, पृ.198, देवेंद्र चौबे, दलित कहानी की जमीन।
2. जयप्रकाश कर्दम, दलित साहित्य वार्षिकी 2005, पृ. 70
3.हेमलता महीश्वर, हिंदी दलित कथा साहित्य की सामाजिकता विपिन बिहारी, पुनर्वास, पृ. 6
4. वही पृ. 18 - 19, 5. वही पृ. 33 ,6. विपिन बिहारी, आधे पर अंत पृ. 134 ,7. विपिन बिहारी, पुनर्वास पृ. 62 ,8. वही पृ. 65 ,9. विपिन बिहारी, आधे पर अंत पृ. 58 ,10. विपिन बिहारी, पुनर्वास, पृ. 99
11. विपिन बिहारी, आधे पर अंत पृ. 98 ,12. वही पृ. 177,13. विपिन बिहारी, पुनर्वास पृ.83

अध्यक्ष हिंदी विभाग
श्रीमान भाउसाहेब झाडबुके महाविद्यालय बार्शी
जिला - सोलापुर - 413401 (महाराष्ट्र)

स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या भीतर गुडि़या '

- डॉ. गोविंद गुंडप्पा शिवशेट्टे -

 समकालीन हिंदी साहित्य जगत् में जिन लेखिकाओं का साहित्य पाठकों के रुचि का और आलोचकों के चिन्तन का विषय रहा है उनमें मैत्रेयी पुष्पा का अग्रणी स्थान है । मैत्रेयी अपने उपन्यासों के जरिए स्त्री को स्त्री के, हिस्से के लोकतंत्र की मांग की है । मैत्रेयी का औपन्यासिक रचना संसार जितना सराहा गया उतनी सराहना उनके आत्मकथाओं के दोनों खण्डों की हुई हैं। ग्रामांचल में बसी मैत्रेयी ने जिस दिलचस्पी तथा प्रामाणिकता के साथ आत्मकथाओं को रचा है वह निश्चित ही बेमिसाल है। आत्मकथा का प्रथम खण्ड 'कस्तूरी कुंडल बसैÓ काफी चर्चित रहा। द्वितीय खण्ड सन् 2008 में 'गुड़िया - भीतर - गुड़ियाÓ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जिसमें आत्मवृतांत के साथ - साथ भारतीय स्त्री की सामाजिक,राजनीतिक,पारिवारिक,धार्मिक और आर्थिक दशा और दिशा के बृहद रुप को उद्घाटित किया है।
भारतीय पितृसत्ताक व्यवस्था में भारतीय स्त्री की स्थिति कितनी सोचनीय और दयनीय है, इस ओर पाठकों तथा आलोचकों का ध्यान आकर्षित करती है मैत्रेयी। मैत्रेयी का यह लेखन तथाकथित सामाजिक व्यवस्था से स्वयं को मुक्त करने का संकल्प है  - ''न मैं धर्म के खिलाफ थी, न नैतिकता के विरुद्ध। मैं तो सदियों से चली आ रही तथाकथित सामाजिक व्यवस्था से खुद को मुक्त कर रही थी।ÓÓ1 'गुड़िया - भीतर - गुड़ियाÓ आत्मकथा में प्रसंग क्रम को अट्टठारह हिस्सो में विभाजित किया है। यह अलग - अलग हिस्से प्रसंग क्रम को प्रवाह के समान कथा को आगे बढ़ाते है।
'गुड़िया - भीतर - गुड़ियाÓ शीर्षक से ही स्पष्ट है कि मैत्रेयी गुड़िया के भीतर जो एक और गुड़िया है उससे रु - ब - रु होना चाहती है। उसके जिने का स्वायत्त हक मांगती है। इसी गुड़िया की चेतना ही इस रचना का प्रेरक रुप है। मैत्रेयी निवेदन में इसका संकेत देते लिखती है - ''मैं तो पहले ही माँ के सपनों को रौंदती हुई वैवाहिक जीवन चुनकर खुद उनसे अलग हुई थी। मकसद भी साफ  था - एक पुरुष साथी मिलने से मेरे रात - दिन सुरक्षित हो जाएंगे। मैं अपने आचरण से पत्नी लेकिन मानसिक स्तर पर जो दखल देने लगती, वह कौन थी? कौन थी वह जो धीरे - धीरे मुझे विवाह संसथा से विरक्त करती हुई ... मैं आसपास देखती किस - किसने तो मेरी दृष्टि बदली और दृष्टिकोण पलटकर रख दिया।ÓÓ2 शायद यह भीतरवाली गुड़िया मैत्रेयी की माँ कस्तूरी ही होगी। आत्मकथा के प्रथम खण्ड में माँ कस्तूरी बेटी को विवाह के जाल में न फसने की सलाह देती रही पर मैत्रेयी ने नहीं माना। आज मैत्रेयी को लग रहा है कि विवाह एक संस्कार नहीं बल्कि स्त्री के लिए एक दलदल है।
मैत्रेयी की आत्मकथा का प्रत्येक प्रसंग पुरुष मानसिकता, सांस्कृतिक प्रथा, परंपराओं और साामाजिक मान्यताओं पर कड़ा प्रहार है। मैत्रेयी ने आत्मकथा के जरिए भारतीय स्त्री की उस छवि को सामने रखा है जो किसी न किसी तरह पितृसत्ताक संस्कति का शिकार हुई है। पुरुषों को आजादी मिल गई पर स्त्री की आजादी का क्या? कौन है जो उसके आजादी की बात कहेगा - ''उफ् ! मेरी जिदंगी रत्तिभर आजादी की हकदार नहीं, यही बाते मेरा कलेजा काटती रहती है।ÓÓ3 एक ओर पुरुष स्वच्छंद रुप से उड़ते फिरे और स्त्री रत्तिभर आजादी के लिए तरसे आदि प्रश्न मैत्रेयी उपस्थित करती है।
मैत्रेयी स्त्री होने के कारण कई स्तरों पर बार - बार अपमानित और प्रताड़ित होना पड़ा है। संस्कृति ने पतिवृत्त धर्म को निभाने की जिम्मेदारी स्त्री के लिए अनिवार्य शर्त मानी गयी पर मैत्रेयी कहती है कि एक तरफ व्रत कब तक और क्यों - ''यदि कोई पति अपनी पत्नी की कोमल भावनाओं को कुचलकर खत्म करता है तो पत्नी को पतिवृत्त के नियमों का उल्लंघन हर हालत में करना होगा।ÓÓ4 पत्नी पतिवृत्त धर्म का पालन करे और पति बेलगाम घूमता रहे। कुछ यही रवैया प्रेम करने वाले के प्रति समाज का रहा है। पुरुष का प्रेम जायज है और स्त्री का प्रेम बदचलनी का रुप। मैत्रेयी सतीत्व धर्म पर भी करारा प्रहार करती हैं हमारे देश में स्त्री की जीते जी कोई दखल नहीं ली जाती पर दूर्भाग्य से पति की चिता पर स्त्री सतित्व को जाने वाली स्त्री स्वर्ग कर्म प्राप्त करेगी जैसी गलत मान्यताएँ हमारे समाज में प्रचलित हैं, आखिर कब तक सतित्व के नाम पर पत्नियाँ चिता पर चढ़ती रहेगी। मैत्रेयी स्वयं के अनुभवों के सहारे समाज की उन तमाम तथाकथित मान्यताओं को खारिज करती है। जिन धर्मों, वृत्तों पर से स्त्री के वफादारी की अग्नि परीक्षा बार - बार ली जाती रही है। उनका मैत्रेयी विरोध करती हैे - ''पति का प्रेम... आह् ! मैं गद्दार, कुटिल, बेवफा... सोच रही हूँ... या करवा चौथ जैसे त्यौहार हमारे वफादार होने की कसौटी है? पतिवृत्ता का लाइसेंस प्रदान करने वाले ये त्यौहार,लोकाचार... जिनके द्वारा हमारा सतित्व हर साल रिन्यू होता है।ÓÓ5 सब कुछ सहने की अपेक्षा स्त्री की ओर से ही की जाती है। नैतिक मर्यादाएँ, सेवा, समर्पण, त्याग, स्त्री के माथे पर थोपे गए है। इस थोपी गई बातों पर मैत्रेयी को सख्त ऐतराज है - ''नैतिकता के मानसिक कष्ट ऊपर से हुई शर्मिंदगी ढोते - ढोते मौत की इच्छा... हमने पढ़ - लिखकर अपना वजुद मर्दों के आसरे डाल रखा है। हम अपने पुरुषों के विश्वास पर आत्मविश्वास खोते चले गए है ।ÓÓ6
मैत्रेयी एक डॉक्टर की पत्नी होने के बावजूद घर परिवार में घूटन महसूस करती रहीं। पति डॉक्टर पर मानसिकता किसी आदिम मानव की मैत्रेयी को तीन बेटियाँ थी। स्वयं तो खुश थी पर समाज हमें मानों निपुत्रिक की तरह देखता था। हमेशा बेटा और बेटी में अन्तर किया जाता है। बेटे को जन्म उत्साह के रुप में मनाया जाता है। मैत्रेयी लिखती है - ''लड़की का जन्म उल्लास का विषय नहीं, उपहास है, यह उल्लास नहीं, अभिशाप है ।ÓÓ7
मैत्रेयी के अनुभव किसी लोकगीतों या लोककथाओं में वर्णित स्त्रियों के नहीं बल्कि वह तो स्वयं अपने है। यह अनुभव महानगरों में बसने वाले सभ्य समाज से मिले हैं। सभ्य समाज का असली चेहरा स्त्री को लेकर बड़ा ही बदहवास है - ''सभ्य और आधुनिक समाज में भी फेमिली प्लानिंग का रूप है दो बेटे एक बेटी। एक बेटा एक बेटी। दो बेटे तो फर्क नहीं पड़ता मगर जैसे ही लड़कियों की संख्या दो हो जाती है, तो लड़के की पुकार तेज होती जाती। न यकीन हो तो जो सिर्फ लड़कियों के माता - पिता है, उनके लिए समाज का नजरिया देख लो, अपने विकास वैभव के बाद भी वे नि:संतान माता की तरह देखे जाते है ।ÓÓ8 तीन बेटियों की माँ बनी मैत्रेयी को बेटा न होने से सास, ससूर और समाज के तिरस्कार, उपेक्षा और अवमानना को सहना पडता है। वहाँ अनपढ़ गवाँर स्त्री की स्थिति कैसी होगी इस पर प्रश्न चिन्ह है।
मैत्रेयी आलोच्य आत्मकथा में उन कटु अनुभवों को व्यक्त करती है जो उच्च शिक्षित डॉक्टर पति की ओर से मिले है। स्वयं को जो सम्मान मिला वह स्त्रित्व की अस्मिता को, उपने हक्क को, अपने अधिकारों को भूलने के कारण मिला। यदि मैं अपने अन्दर की औरत को न भूलती तो काश आज दर - दर की ठोकरे खा रही होती। डॉक्टर की पत्नी होने के बावजूद कई बार अपमानित होती रही हूँ - ''मेरी भाषा का रुप सिर्फ आँसू है। मेरे पति की इच्छा इस इच्छा में मेरा दखल भी क्या है? सिनेमा, पार्टी, मंदिर और बाजार तक मैं गाडी में बैठकर जाती हूँ, तब मैं नहीं जाती डॉक्टर साहब की धर्म पत्नी जाती है ।ÓÓ9
आलोच्य आत्मकथा में मैत्रेयी ने साहित्यिक जगत् के आत्मवृत्त का विस्तार से वर्णित किया है। मैत्रेयी का साहित्यिक जगत में आगमन 'साप्ताहिक हिंदुस्तानÓ की कहानी प्रतियोगिता के रुप में हुआ। प्रारंभ में कहानियाँ छपाने के लिए संपादकों की अवमानना और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। मैत्रेयी यह अनुभव कर चुकी है स्त्री चाहे कितनी भी प्रगति करे, चाहे सफलता की चोटी पर पहँुचे,चाहे वह सृजनशील रचनाकार बने बावजूद इसके पुरुष की नजर में वह केवल भुक्त भोगी ही है। हिंदी के जाने माने कथाकार एवं संपादक राजेंद्र यादव और मैत्रेयी के आपसी संबंधों को लेकर लिखने वालों ने मनगढ़त कहानी रच डाली, मैत्रेयी जानती थी कि हमारा सभ्य समाज एक स्त्री और पुरुष के बीच केवल और केवल एक ही रिश्ता देख लेता है। मैत्रेयी के पति भी इनके रिश्ते के संदर्भ में संदेह की निगाह रखे हुए थे। पर मैत्रेयी इन सारी उपेक्षा, अपमान, यातनाओं से त्रस्त होकर अपने लेखन से लबरेज नहीं होने वाली थी।
भारतीय समाज में जहाँ औरत के लिए सुरक्षा के नाम पर सामंती व्यवस्था आज भी है। जहाँ पुरुष वर्चस्व के दायरे में रहती हुई स्त्री, खेत - खलिहान में जी - जान से मेहनत करती है, बावजूद इसके पुरुष की यह साजिश रही है कि स्त्री के लिए सुरक्षा के इन्तेजामात जरुरी है। सुरक्षा के लिए पतिवृत्त धर्म नैतिकता, मर्यादाएँ आदि मूल्यों को बनाया है। मैत्रेयी इन मूल्यों का स्त्री जीवन व्यवस्था के विपरित सिद्ध करती है - ''हाँ मैं भी इस सत्य को दुनिया के सामने लाना चाहती हूँ कि स्त्री के लिए शास्त्रों द्वारा दी गई नैतिक संस्कृति बताए गए जीवन मूल्य और शुचिता का पाठ हमारी सक्रिय जिंदगी के अनुरुप नहीं, क्योंकि पुरुष जाति ही इसे खण्ड - खण्ड तोड़ डालती है । मर्दांनगी ही हमारी शुचिता को क्षत - विक्षत करती है।ÓÓ10
मैत्रेयी की यह आत्मकथा स्त्रीवादी साहित्य की चिंतन परक रचना मानी जा सकती है। एक ओर मैत्रेयी अपने नीजी अनुभवों को बड़े साहस और धैर्य के साथ व्यक्त करती है। इन नीजि अनुभवों को स्व:पर से निकालकर सर्वव्यापक बना डालती है। इस स्थिति पर व्यक्त विचार प्रत्येक स्त्री को अपने लगने लगते हैं। मैत्रेयी को मिली यातना, तिरस्कार, उपेक्षा तमाम भारतीय नारी के दैनिक जीवन का कटू सत्य है। स्त्री के हक्क, अधिकार, समानता, तथा उसके लोकतंत्र की माँग मैत्रेयी ने इस आत्मकथा के जरिए की है।
आत्मकथा की भाषा शैली अत्यंत पाठकीय पर उतनी ही विचारोत्तेजक और चिंतन के लिए बाध्य करने वाली है। लोकगीतों, लोककथाओं की भाषा रचना को रोचक बनाती है। मैत्रेयी परंपरागत पुरुष वर्चस्व की भाषा को नकार कर नई स्त्रीवादी भाषा को अपनाती है ।
संदर्भ ग्रंथ
1.संपा. दीक्षित दया, मैत्रेयी पुष्पा: तथ्य और सत्य, कमलाप्रसाद,अति सुधो स्नेह, पृ.सं. 99
2.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, निवेदन से उध्दृत
3.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 67
4.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 15
5.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 245
6.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 344
7.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 104
8.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 95
9.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 196
10.पुष्पा मैत्रेयी, गुड़िया भीतर गुड़िया, पृ.सं. 327

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भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान

शोधार्थी : आशाराम साहू 

आचार्य भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रंगमंच के स्वरूप तथा रंगमंच की कला का विस्तृत वर्णन किया है। उसके अनुशीलन से स्पष्ट है कि भरतमुनि के पूर्व ही रंगमंच का पर्याप्त विकास हो चुका था जिसके आधार पर उन्होंने शास्त्रीय दृष्टि से रंगमंच का विवरण प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त जन - रंगमंचों का भी उन्होंने उल्लेख किया है, जिनके प्रतिरूप आज नौटंकी, रामलीला, रासलीला, भाण आदि के रूप में हमें देखने को मिलती है। जिस रंगमंच पर हिन्दी नाटकों का अभिनय प्रारंभ हुआ, उसे हम सीधे संस्कृत रंगमंच परम्परा का ही सोपान नहीं कह सकते, बल्कि उस पर पाश्चात्य प्रभाव भी पर्याप्त सीमा तक दिखाई देता है। हिन्दी रंगमंच के समय संस्कृत युगीन रंगशालाएँ ध्वस्त हो चुकी थी तथा मुस्लिम शासन व्यवस्था ने भी इसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। भारत में यूरोपीय जातियों के प्रवेश से ही थियेटरों की स्थापना को बल मिला और धीरे - धीरे यह भारत के विभिन्न प्रान्तों में स्थापित होने लगा। पारसी रंगमंच व्यवसायिक रूप से फलने - फूलने लगे जिनका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के माध्यम से केवल धन अर्जित करना था। जिसमें अश्लीलता एवं कुरूचिपूर्ण भाव - भंगिमाओं का समावेश होता था। नाटक की कथावस्तु अधिकतर पौराणिक होती थी क्योंकि रंगनिर्देशक यह निश्चित रूप से जानते थे, कि हिन्दू जनता में ऐसे ही कथानक पसन्द किये जाते हैं। गीतों की मात्रा भी अधिक होती थी, और ये गीत साहित्यिक नाटकों के गीतों से भिन्न होते थे।
नि:संदेह पारसी रंगमंच से नाट्यकला,अभिनयकला आदि का विकास तो हुआ लेकिन भारतीय जनता की सांस्कृतिक अभिरूचि पर गहरा आघात भी पहुँचा। ऐसे में पारसी रंगमंच की अश्लीलता के फलस्वरूप ही हिन्दी जगत का ध्यान रंगमंच कला की ओर आकृष्ट हुआ, तथा भारतेन्दु एवं उनके युगीन नाटककारों ने भारतीय संस्कृति के संरक्षण में अपने नाटकों के माध्यम से महत्वपूर्ण कार्य किया। भारतेन्दु एवं उनके सहयोगी नाटककारों ने अभिनेयात्मक दृष्टिकोण से नाटकों का निर्माण किया। भारतेन्दु युगीन नाटककार सफल अभिनेता भी थे, इसी कारण इस युग में हिन्दी रंगमंच सर्वाधिक सक्रिय रहा। भारतेन्दु युगीन रंगमंच ने प्रचलित परंपरा का अनुकरण करते हुए भी सुरुचि एवं गंभीरता की रक्षा की, नाटकों में साहित्यिक एवं रंगमंचीय अनिवार्यताओं को यथाशक्ति संग्रहित करने का प्रयास भी किया। भारतेन्दु युग के पश्चात् द्विवेदी युग में नाटक उन ऊँचाईयों तक नहीं पहुँच पाया। हाँ, इतना जरूर है इस युग में नाटककारों की संख्या कुछ कम जरूर हो गई और अपेक्षाकृत कुछ अच्छे नाटककार इस क्षेत्र में आये, जिनमें बालकृष्ण भट्ट, किशोरीलाल गोस्वामी,माखनलाल चतुर्वेदी,चतुरसेन शास्त्री,मैथिलीशरणगुप्त, गोविन्दवल्लभ पंत आदि। इस युग के नाटकों में नवोत्थान एवं सुधारवादी दृष्टि हावी रही, फिर भी प्रहसनों की दिशा में इस युग में विशेष प्रगति हुई, जिसमें बदरीनाथ भट्ट का 'कुरू वदन दहनÓ, मैथिलीशरणगुप्त का 'चन्द्रहासÓ सुदर्शन का 'अंजनाÓ माखनलाल चतुर्वेदी का 'कृष्णार्जुन-युद्धÓ आदि उल्लेखनीय है। फिर भी नाटकों की साहित्यिक उपलब्धि सीमित ही रही। इस युग में मौलिक नाटकों की अपेक्षा अनुवादित नाटक विशेष रूप से चर्चित रही, जिसमें लाला सीताराम बी.ए. द्वारा शेक्सपियर का अनुवादित नाटक, एवं सत्यनारायण 'कविरत्नÓ द्वारा 'उत्तमरामचरितÓ एवं 'मालती माधवÓ का अनुवाद आदि प्रमुख रूप से प्रसिद्ध रही। द्विवेदी युगीन नाटककारों के संदर्भ में डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं-''इनमें कोई दूर तक जाने वाला वैशिष्ट्य नहीं। अत: इनका प्रभाव अपने तक ही सीमित रहा। ''1
फिर भी द्विवेदी युगीन प्रभाव को विस्मृत नहीं किया जा सकता क्योंकि हर पूर्ववर्ती युग अपने परवर्ती युग को किसी ना किसी तरह प्रभावित करता ही है। डॉ. सोमनाथ गुप्ता द्विवेदी युगीन नाटक साहित्य के सन्दर्भ में अपना विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं ''यह हिन्दी नाट्य साहित्य का महत्वपूर्ण संधिकाल था जिसमें उच्चकोटि के नाटक, साहित्य का निर्माण तो नहीं हुआ, परन्तु उसमें कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ अवश्य उत्पन्न हो गई जो आगे चलकर लोकप्रिय नाटक साहित्य के निर्माण में सहायक सिद्ध हुई और जिनके स्वास्थ्यप्रद प्रभाव ने प्रसाद एवं उनके परवर्तियों के लिए नया मार्ग प्रशस्त किया। ''2 परवर्ती युग में नाटक को एक नई दिशा देने वाले कवि नाटककार जयशंकर प्रसाद के प्रारंभिक नाटक अपने पूर्ववर्ती भारतेन्दु एवं द्विवेदी युग की नाटकों से प्रभावित अवश्य रहा परन्तु बहुत ही जल्दी उन्होंने अपने लिए एक नया मार्ग प्रशस्त किया। प्रसाद ने अपने नाटकों में संस्कृत तथा अंग्रेजी नाट्य शैलियों की समन्वित परंपरा का सूत्रपात किया। प्रसाद ने अपनी सांस्कृतिक चेतना एवं रोमाण्टिक कल्पना के माध्यम से भारतीय रंगमंच को एक नया आयाम दिया। आर्य संस्कृति के प्रति अटूट आस्था एवं गूढ़ चिन्तन उनके नाटकों में हमें दिखाई देती है। प्रसाद की नाट्य शैली में प्राचीन एवं नवीन नाट्य शैली का समन्वय उन्हें अन्य नाटककारों से अलग पंक्ति में लाकर खड़ा कर देती है। प्रसाद ने हर दिशा में समन्वय प्रस्तुत किया। इतिहास का कल्पना से, साहित्य का दर्शन से,और तत्व का तथ्य से। श्री जयनाथ नलिन के अनुसार - ''प्रसाद युग हिन्दी नाटकों के इतिहास में उत्थान या स्वर्ण युग है, इसी युग में प्रसाद ने भारती के मंदिर में दिव्य भेंट चढ़ायी। नाटकों के स्वरूप, साहित्यिक, कलापूर्ण, स्वाभाविक, मौलिक और स्वाधीन रूप देने का सर्वप्रथम श्रेय प्रसाद की प्रतिभा को है। प्रसाद युग में हिन्दी नाट्क - कला शैली, टेक्नीक आदि की दृष्टि से पूर्ण विकास को पहुँचा।''3
हिन्दी नाटक साहित्य के इतिहास में प्रसाद का आगमन एक महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। प्रसाद जी की यह उत्कृट अभिलाषा थी कि हिन्दी रंगमंच का उत्थान हो। हिन्दी रंगमंच के विकास की कामना में भी प्रसाद जी का राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण प्रधान था। उनका कहना था ''हिन्दी रंगमंच की स्वतंत्र चेतना को सजीव रखकर रंगमंच की रक्षा करनी चाहिए। केवल नई पश्चिमी प्रेरणाएँ हमारी पथ - प्रदर्शिका न बन जाएँ। हाँ, उन सब साधनों से जो वर्तमान द्वारा उपलब्ध है हमको वंचित न होना चाहिए।ÓÓ4
इस प्रकार प्रसाद ने अपने नाटकों के माध्यम से भारतीय रंगमंच को एक नई ऊँचाई के साथ - साथ एक नई दिशा भी प्रदान की तथा भारतीय सांस्कृतिक गौरवगाथाओं को आधुनिक समस्याओं के संदर्भ में नाटकीय रूप प्रदान करने का भागीरथ प्रयत्न किया। भारतीय रंगमंच के उत्थान में प्रसाद के नाटकों का योगदान अतुलनीय है। प्रसाद ने अपने नाटकों के द्वारा,बदलते सामाजिक मूल्यों की रक्षा, विधवा विवाह, अन्तर्जातीय विवाह,नारी शिक्षा,नारी स्वातन्त्रय एवं पुरुषों के समक्ष स्त्रियों को अधिकार दिलाने का पुरजोर समर्थन अपने नाटकों में किया है।
डॉ. गिरीश रस्तोगी के अनुसार ''जयशंकर प्रसाद हिन्दी नाटक और रंगमंच को गंभीर मोड़ देने वाले नाटककार हैं। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय और सांस्कृतिक परम्पराओं को आत्मसात करते हुए समूचे राष्ट्रीय संघर्ष,चरित्र और आधुनिक मानवीय द्वन्द्व को नवीन सौन्दर्य बोध के साथ नाटक में अभिव्यक्त किया।''5
प्रसाद ने अपने ऐतिहासिक नाटकों के माध्यम से भारतीय रंगमंच को नयी शैली एवं नया विजन प्रदान किया। अतीत को वर्तमान संदर्भ में प्रस्तुत करके हमें इतिहास के उन अनदेखे - अनछुए पहलुओं का दिग्दर्शन कराया जो महज हमारे लिए एक गाथा बन कर रह गई थी। प्रसाद के अलावा और भी ऐतिहासिक नाटककार हुए, लेकिन प्रसाद जी के नाटकों की भाँति ऐतिहासिकता का संरक्षण उनके नाटकों में हमें दिखाई नहीं देता।
रंगमंच का प्रश्न लेकर 'प्रसादÓ के नाटक विवादग्रस्त जरूर रहे। इस संदर्भ में  प्रसाद का अपना मन विचारणीय है ''मेरी रचनाएँ तुलसीदत्त, शैदा या आगाहश्र की व्यावसायिक रचनाओं के साथ नहीं नापी तौली जानी चाहिए। मैंने उन कम्पनियों के लिए नाटक नहीं लिखे हैं, जो चार चलते अभिनेताओं को एकत्र कर कुछ पैसा जुटाकर, चार पर्दे मंगनी मांग लेती है और दुअन्नी - अठन्नी के टिकट पर इक्के वाले, खोमचे वाले और दुकानदार को बटोरकर जगह - जगह प्रहसन करती फिरती है। ....यदि परिष्कृत बुद्धि के अभिनेता हो, सुरुचि - सम्पन्न सामाजिक हो और पर्याप्त द्रव्य काम में लाया जाए तो ये नाटक अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।ÓÓ6
अत: हम अगर प्रसाद की दृष्टि से देखें उनकी ही दृष्टि से इनका मूल्यांकन करें, तो इनके नाटक रंगमंचीयता की कसौटी पर पूर्णत: खरा उतरती हैं। रही बात भाषा की, तो प्रसाद जी का स्पष्ट अभिमत है ''सरलता और क्लिष्टा पात्रों के भावों और विचारों के अनुसार ही होगी और पात्रों के भावों और विचारों के ही आधार पर भाषा का प्रयोग नाटकों में होना चाहिए।ÓÓ7
अत: प्रसाद के नाटकों का सही मूल्यांकन हम प्रसाद की दृष्टि से ही कर सकते हैं एवं भारतीय रंगमंच में उसके योगदान को भी समझ सकते हैं।
संदर्भ
1. मोहन डॉ. नरेन्द्र ''समकालीन हिन्दी नाटक और रंगमंचÓÓ पृ. 67, वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली, आवृत्ति संस्करण-2014
2. वही, पृष्ठ-67
3. 'गुंजनÓ शर्मा, गिरीराज ''हिन्दी नाटक:मूल्य संक्रमणÓÓ पृष्ठ 29, संघीप्रकाशन, 1978
4. मल्होत्रा, सुषमापाल ''प्रसाद के नाटक तथा रंगमंचÓÓपृष्ठ 165, राजपाल एण्ड सन्स, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 1974
5. रस्तोगी, डॉ. गिरीश: ''बीसवी शताब्दी का हिन्दी नाटक और रंगमंच,
पृष्ठ-85, भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004
6. मल्होत्रा सुषमापाल, ''प्रसाद के नाटक तथा रंगमंचÓÓ पृष्ठ 166,
राजपाल एण्ड सन्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1974
7. वही, पृ. 165

इं.क.सं.वि.वि. खैरागढ़ ,
जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. 9575229842

बदबू

हरिभटनागर

आपके लिए यह घटना गैरज़रूरी, कान न देने वाली, हो सकती है। लेकिन मेरे लिए इसकी अहमियत है। यही वजह है कि मैं इससे बेचैन हूँ और इसके तले मेरा दम घुटा जा रहा है।
इस घटना के बारे में सोचता हूँ जो मेरे साथ घटी, तो समझ में आता है कि इसका संबंध उस बदबू से था जो दो दिन से मेरी नाक में दम किए हुए थी।
लेकिन वह बदबू न माँ को महसूस हो रही थी और न पत्नी - बेटे को। अजब हाल था। मैं बेचैन था। गुस्से से भरा। बेहद गालियाँ बकता हुआ जो थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
उस दिन सुबह - सुबह जब मुझे तीखी बदबू महसूस हुई बाहर और बैठके में जहाँ मैं सोता हूँ, कुछ नज़र नहीं आया, तो मैंने माँ से पूछा।
माँ ने अगल - बगल सूँघते हुए मुझे देखा और कहा कुछ तो नहीं है!
माँ पर मुझे गुस्सा आया। बुढ़िया, पत्नी की बुराई तुरंत सूँघ लेती है और इस पर चिटकती रहती है। बदबू के लिए कह रही है। कुछ तो नहीं है! बहुत ही कमीन है रांड!!!
माँ पर मेरा गुस्सा बढ़ता गया और मैं उसे गंदी - गंदी गालियाँ देने लगा। उसी रौ में पहले मैंने बैठके को उलट - पुलट डाला। जितनी बड़ी माँ की कुठरिया है जिसमें सिर्फ  माँ की खाट आती है। उतना ही बड़ा मेरा बैठक है। जिसमें एक चर्राता तखत पड़ा है। तखत के नीचे घर भर के सूखे - ऐंठे जूते -चप्पलों का हुजूम है। कई सारे मसहरी के डंडे, खाट की पाटियाँ, पुराना स्टोव, कनस्तर, जंग खाए डिब्बे, झाड़ू, कूँची के अवशेष। बैठके की कुल जमा पूँजी थी जिसे मैंने छितरा डाला। बदबू का सुराग न मिला। मिला तो सिर्फ  तीखी गंध का भभका जिससे मेरे नथुनों में बेतरह खुजाल पड़ गई।
जब सुराग न मिला तो गुस्से को बढ़ना था। गालियों की रफ्तार अब अपने चरम पर थी। चीखते हुए मैंने माँ की कुठरिया को खखोना चाहा।
अब आप यह देखिए कि लम्बे अरसे के बाद, अगर इसकी गणना की जाए तो पाँच -छै: साल का समय तो निकल ही गया होगा। मैं माँ की कुठरिया में झाँक रहा हूँ। इस कुठरिया में माँ अपनी दुनिया बसाए है और उसी में मगन है। एक खाट जो गड़हे की शक्ल ले चुकी है, दो टीन के टूटे - पिचके बकसे हैं जो इंर्टों के ऊपर रखे हैं। जिन पर माँ की पुरानी धूल खाई घिसी धोतियाँ पड़ी हैं। चारों तरफ  भगवान के कैलेण्डर गंजे हैं, जो धूल और धुएँ को गले लगाए हैं जिन्हें दीवाल अपने से दूर करना चाह रही है और वे हैं कि दीवाल छोड़ना नहीं चाह रहे हैं। सिर के ऊपर एक गाँठदार डोरी है जिस पर गूदड़ होते रजाई - कम्बल और कपड़े झूल रहे हैं।
अपनी दुनिया में माँ मुझे घुसने नहीं दे रही है। मैं हूँ कि जबरन घुस आया हूँ और सुराग को पकड़ लेना चाह रहा हूँ और सुराग है कि अंगूठा दिखला रहा है।
बकसों को धकियाने पर माँ उतना नहीं किड़किड़ाई जितना खाट के खींचे जाने पर। वह चीख पड़ी जोरों से जैसे नोंच खाएगी नासपीटे टूट जाएगी! कहाँ लेटूँगी मैं। तेरी छाती पर!!!
माँ की मैंने एक न सुनी और खाट को खींच के खड़ा कर दिया। जब से कुठरिया में खाट पड़ी थी, शायद पहली बार अब खड़ी की जा रही थी। जालों, असंख्य मकड़े - मकड़ियों, भुरभुरी सीली मिट्टी के अलावा वहाँ कुछ न था।
मैं बाहर आ खड़ा हुआ। अंदर माँ अपनी फूटी किस्मत को टोकती और मुझे कोसती हुई अपनी बिगड़ी दुनिया को पुरानी शक्ल दे रही थी।
अब पत्नी की कुठरिया की तरफ  मेरी निगाह थी जो सोने की जगह भी थी और चौका भी।
कुठरिया की छत धुएँ से काली, मोर्चा खाई थी। जिसमें पपड़ियाँ उधड़ रही थीं जिसमें वह अपने दुखी, भयावने कुनबे को छुपाए थी। कुनबे के सदस्य थे कि झाँकने से बाज नहीं आ रहे थे और उसमें से निकल पड़ना चाह रहे थे। दीवारें सीलन से ओदी थीं कि छूने से सहम जाएँगी।
जमीन पर एक कोने में स्टोव था और उसके गिर्द रात के ढेर सारे जूठे बर्तन जो झूठे जैसे नहीं लग रहे थे। शायद ये बता रहे थे कि दाल - रोटी की तंगी का गुस्सा। उनको बेरहमी से खंगाल के उतारा गया है।
तखत पर पत्नी चित्त पड़ी सो रही थी किसी गुड़ी - मुड़ी सड़ी कथरी जैसी। अगर कोई उसे देखे तो कथरी और उसमें फ$र्क नहीं कर पाए। पता नहीं क्यों पत्नी हर व$क्त थकी टूटी उनींदी रहती और ज़्यादातर तखत पर पड़ीं सोती रहती जैसे कि अभी सोई पड़ी है। सुबह - शाम किसी तरह चाय बना देने या रोटी पाथ के रख देने के अलावा उसकी दिनचर्या निढाल पड़े रहने की थी। बेटा भी हर व$क्त उससे चिपटा रहता।
पत्नी मुँह बाएं खर्राटे भरती, खुली आँखों छत देख रही थी मानों छत के कुनबों से राज की बात कर रही हो। बाल उसके छितरे थे और तकिये से होते हुए फर्श की तरफ  मुँह किए थे। काले रंग का फीता उनमें उलझा था जो गिरने - गिरने को था। पत्नी के बगल, दीवाल की तरफ बेटा सो रहा था। गिरने के भय से शायद पत्नी उसे दीवाल की तरफ लिटा लेती थी।
सहसा मेरे दिगाम में आया कि पत्नी से मेरी कब बात हुई थी और बेटे से? कोई ऐसा पल पास न था जो जाग रहा हो! क्या मैं किसी सराय में हूँ, जिसमें किसी से कोई लेना - देना नहीं! ये तो हद है! यह सोचते ही बदबू के तीखे झोंके ने मेरा बुरा हाल कर दिया, लेकिन ताज्जुब था कि पत्नी और बेटा, दोनों आराम से, बेसुध - से सो रहे थे। जाहिर है, बदबू का एहसास उन्हें न था।
बदबू के सुराग के लिए जब मैं जोरों से किड़किड़ाया तो पत्नी ने घबराकर आँखें खोलीं और उठकर बैठ गई और उबासियों के बीच बोली - चाय बनाऊँ? रोटी पका दूँ?
मुझे गुस्सा छूटा। मन हुआ कि खैंच के एक थबाड़ा दूँ रांड को। चाय और रोटी के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है हरामखोर को! गुस्से के बावजूद मैंने अपने पर नियंत्रण रखा। थबाड़ा न सही गालियाँ तो बरसती रहीं और उसी के साथ तखत के नीचे झाँकने लगा। बारीक जर्रों के अलावा सामने कुछ न था। संभव है, पायताने कुछ हो। इसी विचार के तहत मैंने बेटे को खिसकाया तो वह टस से मस न हुआ। गहरी नींद में था।
मैं अपना नियंत्रण खो बैठा और बेटे को जोरों से थबाड़ा मारा।
दुखद था कि बेटे पर थबाड़े का जरा भी असर न था। वह पूर्ववत सोता रहा। दाँत पीसते हुए मैंने मुट्ठी में उसके बाल भरे, झिंझोड़ दिया और चटाक से फिर थबाड़ा मारा।
बेटा फिर भी बेअसर रहा।
यकायक पत्नी जो कुछ क्षण पूर्व उठकर बैठ गई थी और तुरंत ही लेटकर खर्राटे भरने लगी थी। थबाड़े की आवाज से शायद फिर उठ बैठी और उसने वही सवाल किया - चाय बना दूँ? रोटी पका दूँ?
मैंने उसे घूरकर देखा। उसने मेरी तरफ  देखा भी नहीं और फिर लेट गई और पलक मींचते खर्राटे भरने लगी।
होंठ चाभते हुए मैंने कहा - मुझे न रोटी खानी है न चाय पीनी है रांड! तू पड़ी - पड़ी सुसा और तेरा यह कमीन चेंचड़ा भी...।
और फिर मैंने कुठरिया के सारे सामानों को उलट - पुलट डाला।
लेकिन सुराग मिला तो मिला नहीं! नतीजा था कि मेरा गुस्सा फिर बढ़ा और बढ़ता चला गया। यह दु:खद ही था कि मेरे गुस्से की किसी को तनिक परवाह न थी। माँ अपनी दुनिया दुरुस्त करके पूजा - पाठ करने और घंटी टुनटुनाने में लग गई थी। और पत्नी चाय बनाने और रोटी पाथने में!
मैं अंदर - बाहर फटफटाता रहा।
पत्नी ने चाय दी तो देखी न गई। रोटी दी तो उबकाई छूटी।
पूरा दिन मेरा अंदर - बाहर होने, सुराग ढूँढ़ने में निकल गया। दूसरा दिन भी तकरीबन ऐसा ही गुजरा।

तीसरे दिन जब भूख से बेहाल था। नाक बंद करके किसी तरह चाय गटकी और पानी के सहारे दो - तीन कौर निगले और बाहर आ खड़ा हुआ। बदबू का सुराग हाथ आ गया।
बाहर, बगलवाले घर के सामने, ईंटों के ढेर पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। दूर से उड़ती नहीं दीख रही थीं। मैंने यूँ ही ढेला फेंका तो असंख्य मक्खियाँ उड़ीं। शक हुआ। आगे बढ़ा, देखा तो मक्खियाँ ही मक्खियाँ थीं और कुछ नजर नहीं आ रहा था। आड़े - तिरछे होकर देखा तो ईंटों के ढेर के अंदर कुछ था। पैर से अद्धा हटाया तो कुत्ते का पिल्ला था जिस पर मक्खियों की मारा - मारी थी। पिल्ला कई दिनों का मरा लग रहा था। कुछ - कुछ गला - सा। तीखी बू छोड़ता। लेकिन ताज्जुब कि चिनी ईंटों के अंदर वह था! खैर, मैं बेहद खुश हुआ जैसे किला $फतह कर लिया हो।
माँ से कहा तो उसने मोतियाबिंद से सफेद होती आँखें तरेरीं - क्या करूँ मैं? आरती उतारूँ!!! जानवर कहीं का!!! खाट खींचे जाने का गुस्सा अभी भी माँ पर था!
पत्नी ने कोई जवाब न दिया। सूनी आँखों वह मुझे देखती रही। बेटे से कहने का कोई सवाल न था। स्टोव के सामने वह बैठा था। थाली लिए, भिखारी जैसा, रोटी पाने के इंतजार में।
स्टोव की रोशनी में पत्नी भड़भूजन लग रही थी जो मरी - मरी सी लौ को बढ़ाने के लिए स्टोव में अंधाधुंध हवा भरे जा रही थी और हवा थी कि स्टोव में जाने से इंकार कर रही थी। इस चक्कर में स्टोव से कई बार तवा गिरा। गिरने पर वह हर बार पत्नी की गाली खाता।
पिल्ले को परे हटाकर चैन की साँस लेने की बात सोची तो इसमें दिक्$कत आ खड़ी हुई। जैसे यही कि छत पर तिवारी दिख गया। वह मुझे ऐसे देख रहा था मानों कह रहा हो कि मेरे घर के आगे बदबू क्यों बढ़ा रहा है? अपने घर की बदबू अपने घर रख ... मेरा बढ़ा डण्डा रुक गया और मैं अपने बैठके में आ गया। तखत पर बैठ गया। यह सोचकर कि जैसे ही तिवारी हटेगा, पिल्ला दूर, आगे बढ़ा दूँगा और बस ...।
लेकिन मैंने आड़ से देखा, तिवारी हटने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसने पड़ोसी शर्मा को आवाज देकर बुला लिया था।
अब दोनों सामने छत पर थे। आपस में बात करतेए ध्यान मेरी तरफ किए।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा तो दोनों छत पर न थे। बाहर निकला तो दोनों सीढ़ियाँ उतरते नीचे आ खड़े हुए। अपने को बातों में मशगूल दिखाते।
मैंने यूँ ही सामने गली पर नजर डाली। गली बहुत ही संकरी थी और बेहद गंदी। हर तरफ  कूड़े - करकट का ढेर था और उसे बिखेरता आहार ढूँढ़ता मुर्गे - मुर्गी, कुत्तों - सुअरों का दस्ता। गली के बीच नाली जाम थी। पानी के बहाव की वजह से कचरा सड़क पर उमड़ पड़ा था और लोग किसी तरह कूँदते - फाँदते निकल रहे थे। जगह - जगह बच्चे पाखाना फिर रहे थे। मुझे गुस्सा आया, तिवारी और शर्मा को यह गंदगी नहीं दिख रही है। सिर्फ मेरा पिल्ले को हटाना दिख रहा है मरदूदों को!!!
सब कुछ कचरा होने के बावजूद मैं शर्म - संकोच को ढो रहा था और गहरे असमंजस में था। तभी मैंने वह रास्ता अपनाया जिससे वह घटना घटी जिसने मुझे बेचैन कर दिया था।
हुआ यह जब तिवारी और शर्मा दरवाजे से नहीं हटे और पूरी तरह चौकस रहे तो मैंने राजू मेहतर को बुला लाने का मन बनाया। राजू मेहतर पहड़िया पर झुग्गी में रहता था। वैसे वह नगरपालिका का मेहतर था और मुहल्ले की सफाई उसी के जिम्मे थी। लेकिन ताड़ी के चक्कर में वह कभी - कभार ही काम पर आता था। संभव है, इस वक्त भी ताड़ी में कहीं धुत्त पड़ा हो तो क्या होगा? तब किसी और को पकड़ूँगा इस सोच के तहत मैं पहाड़िया की तरफ  बढ़ा।
धूल - कीच भरी चक्करदार गलियाँ पार करता जब मैं राजू मेहतर की झुग्गी के सामने पहुँचा राजू ताड़ी के नशे में डूबा, धूल में पड़ा था, चित्त।
मुझे देखकर उसने उठने की कोशिश की लेकिन उठ नहीं पाया। चक्कर खाकर धूल में लोट गया।
थोड़ी देर में लटपटाती - नकनकाई आवाज में वह बोला जिसका आशय था कि हुजूर पहली दफे दरवाजे पर आए हैं और वह किसी काबिल नहीं। लेकिन हुजूर जो हुकुम देंगे वह पूरा होगा कहते हुए उसने सिर के ऊपर हाथ जोड़ने की कोशिश की। हाथ जुड़ नहीं पाए। बेकाबू होकर अगल - बगल झूल गए।
उसने लटपटाती आवाज में कहा - हुजूर, चिंता न करें। हमारा यह लौंडा, आपका हुकुम बजाएगा। आप हुकुम करें ...।
राजू ने जमीन पर पड़े - पड़े अधमुँदी आँखों से अपने दस - एक साल के लड़के की तरफ  इशारा किया जो मेरे सामने तना हुआ - सा खड़ा था। कुछ -कुछ ऐसे जैसे उससे विनती करो तभी वह काम के लिए सोचेगा।
मैंने जब काम बताया जो वह गर्दन टेढ़ी करके, होंठों को बिचकाता, तीखी आवाज में बोला - हो जाएगा, पंद्रा रुपये लगेंगे!!!
- क्या!!! पंद्रा रुपये! जरा - से काम के पंद्रा रुपये!!! तेरी तो ... शब्दों को चबाते अंदर ही अंदर खाक होते मैंने लड़के की ओर देखा। गाली बकते हुए।
लड़का घिसी - घिसी सी काफी पुरानी जीन्स की चुस्त पैंट पहने था जिसकी आगे की जेबों में वह दोनों हाथों की उंगलियाँ खोंसे हुए मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कह रहा हो कि पंद्रा रुपये में हवा ढीली हो गई तो खुद कर लो! उसकी पैंट के पाँयचे उधड़े थे और उसके डोरे काँतर जैसे चिपके थे। पाँव में हवाई चप्पल थी जो नल के नीचे ब्रश से चमचमाई गई थी। पैंट के ऊपर काली टी -शर्ट थी जिसमें चमकीले बटन लगे हुए थे। गले में गोल धागा था जो माला की तरह पड़ा था जिसका छोर टी - शर्ट में अंदर दबा था। वह अभी - अभी नहाकर आया था। आगे को उंछे हुए बालों में पानी चमक रहा था।
उसकी हुलिया पर नजर डालते मैंने उसे मन में भद्दी गालियाँ दीं। कमीना, पंद्रा लेगा। पंद्रा जूते मारूँगा। भूल जाएगा सारी हेकड़ी ऊपर से मुस्कुराते हुए लाड़ जताया चल तो सही, पैसे मिल जाएँगे! कहीं भाग नहीं रहे हैं!!!
- नईं, पेले बोलो! वह सख्त होकर बोला।
पंद्रह रुपये अखर रहे थे। अफसोस में सिर हिलाता बोला - पाँच में तो तेरा बाप कर दे!
- बाप की छोड़ो। वह मुफ्त भी कर सकता है। अपुन करेगा तो पूरे पैसे लेगा। क्या ...? उसने कंधे झटके।
मैंने राजू की तरफ  देखा जो करवट लेकर खर्राटे भरने लगा था, मुँह उसका खुला था जिसमें से राल टपक रही थी। फिर इस शोख लौंडे को जो बाप से बिलकुल उलट था चाल - ढाल और व्यवहार से! जरा भी लिहाज नहीं। निगाहों से छेदता मैं बोला - कह तो दिया, दूँगा। काहे हुज्जत कर रहा है!
- कित्ते दोगे? पेले ये बताओ। लड़के की भवें तनी थीं।
- वही जो कहा।
- वही जो क्या?
सोचा कि कहने में क्या जाता है, कह दो। काम होने पर पाँच दो। ज़्यादा चें - चें करे तो गधे की पिछाड़ी... मुस्कुराते हुए कहा - पंद्रा और क्या!
- सच कह रहे हो?
- तो क्या झूठ! हद्द है!!! झूठे अफसोस में मैंने सिर हिलाया। लड़का खुश हुआ। काम के लिए मेरे आगे - आगे मुस्तैदी से चला।
घर के पास पहुँचकर वह ईंटों के ढेर पर चढ़ - सा बैठा। शिकारी कुत्ते की तरह वह शिकार को सूँघने लगा। जब कुछ हाथ न लगा तो वह ईंटों को हटाने लगा। ईंटों के हटते ही पिल्ला सामने था। वह खुश हुआ। जहरीले साँप को जैसे सँपेरा मिनटों में पकड़ लेता है, ठीक उसी तरह इस लड़के ने बहुत ही फर्ती से सामने पड़ी रस्सी का फंदा बनाया और पलक झपकते बिना हाथ लगाए, पिल्ले को फंदे में फँसा लिया। तिरछी नजरों से मुझे देखा, मुस्कुराया जैसे कह रहा हो कि ऐसे काम होता है और अपुन इसी का पैसा माँगता था! रस्सी को उसने कलई में लपेटा, पिल्ले को भद्दी गाली दी जैसे कह रहा हो कि तेरे खलास होने की जगह नाला है। यहाँ क्यों निबटा। चल वहीं, चील कौवे तेरे इंतजार में हैं! अपनी बड़ी आँखों से मुझे देखता। कुत्ते को घिर्राता वह आगे बढ़ा। मानों कहना चाह रहा हो कि बस अभी आया। रफूचक्कर मत हो जाना।
पिल्ले के साथ बदबू खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन वह घर में घर बना चुकी थी। थू - थू करता मैं बाहर आया। लड़का सामने था। पिल्ले को वह नाले में फेंक आया था और भौंहों को मटकाकर उंगलियों के इशारे से पैसे माँग रहा था।
मैंने पाँच का नोट हथेली पर रखा तो उसे मेरी ओर फेंकता तिड़तिड़ाया जैसे कोई गंदी चीज आ गई हो - पाँच!!! पंद्रा चाहिए!!!
- जा नहीं, सही कर दूँगा। सख़्त आवाज में ऐंठकर मैंने कहा।
- क्या सही कर देंगे? अकड़ता - सा वह बोला।
- तेरी हुलिया!!!
अपुन की हुलिया राइट है साब, अपनी देखिए और अपुन का मेहनताना दीजिए!
- पंद्रा रुपये नहीं दूँगा। मैंने स्पष्ट कहा।
- क्यों नहीं दोगे?
- काम पाँच रुपये का था!
- अच्छा, बात कित्ते की हुई थी?
- होने से क्या होता है? पचास - सौ की भी हो सकती है। क्या मैं दे दूँगा, चूतिया हूँ क्या?
कमर पर हाथ रखे वह हैरत.सा मुझे देखने लगा। गोया पैसे हासिल करने की नई चाल के बारे में सोच रहा हो।
- उठा पैसे। मैंने कहा और फूट यहाँ से!
- फूट यहाँ से! वह आश्चर्य में था पैसे, नईं दोगे। कमर पर मुट्ठी टिकाकर गहरी साँस छोड़ता वह बोला। आँखें फाड़े।
बिलकुल नहीं। पहाड़ की तरह अचल होकर मैंने जवाब दिया।
- क्यों नईं दोगे साब?
- इसलिए कि तू गलत पैसे माँग रहा है!
- फिर आपने हामी काहे भरी थी!
- मैंने हामी नहीं भरी थी!
- झूठ काहे बोलते हो साब! दस रुपए में ईमान काहे गलाते हो? उसने मेरी मजबूती में सूराख बनाना चाहा।
- ईमान मैं गला रहा हूँ कि तू?
अचानक छत पर तिवारी दिखा जो संभवत: पुरानी रंजिश निकालना चाह रहा था, इसलिए हमारी बातें सुनते हुए कमीनेपन से हँसा। चहक कर। जैसे कह रहा हो कि भंगी तक के पैसे मार रहा है कमीना! थंू तेरी जात पर!!! लेकिन जाहिर तौर पर दिखा रहा था कि बेटी की किसी बात पर हँसा है! शर्मा भी उसके पास था। वह भी जोर - जोर से हँसे जा रहा था। ताली बजाते, मटकते हुए। उसने लड़की को अब कंधे पर बैठा लिया और क्या खूब है क्या खूब है कमाल है। जोरों से चीखता गाना - सा गा रहा था।
मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। काटो तो खून नहीं। फिर यकायक दाँत पीसता, फाड़ खाता लड़के से बोला - आँख निकालता है। जाता है कि करूँ बम्बू तेरी ...।
लड़का पहुँचा खिलाड़ी था। तिवारी और मेरी स्थिति को अच्छी तरह ताड़ गया था। तिवारी और शर्मा के अलावा पूरे मुहल्ले को सुनाता शेर होता दहाड़ा एक  तो पूरे पेसे नइंर् दे रहे, उस पर बम्बू की धमकी! तेरे जैसा अब अपुन भी सुलूक करेगा, पिल्ला अभी यहीं डाले जाता हूँ। देखता हूँ क्या करते हो। किस मेहतर को बुलाते हो कहता होंठ चाभता, रोष में भरा, पैर पटकता वह नाले की तरफ  बढ़ा। दौड़ता हुआ - सा।
तिवारी की इस पर हँसी गूँजी और शर्मा की क्या खूब है, कमाल है, की तीखी बरछी जैसी मार!
मैं दाँव हार गया था। लड़का हाथ से निकल गया था। गला फाड़कर उसे बुलाना चाह रहा और पूरे - पूरे पैसे देना। लेकिन मुँह से आवाज़ नहीं फूट रही थी। जैसे जबान न हो।
बदबू से बड़ी बदबू के तले दबा जा रहा था मैं!!!

मंतर

धर्मेन्‍द्र  निर्मल 

अहिल्या ह दुये - चार कौंरा भात ल खाये रिहिस होही। ओतकेच बेरा परमिला झरफिर - झरफिर करत आइस। ओरवाती के खालहे म बैठ गे। अहिल्या देखते सांठ समझ गे। परमिला ह, आज फेर अपन बेटा - बहू संग दू - चार बात कहा  - सुनी होके आवत हे। अहिल्या परमिला के नस - नस ल टमर डारे हवय। जब कभू परमिला बेरा -कुबेरा अहिल्या घर आथे। थोथना फूले रहिथे। मुड़ी - चुंदी बही बरन छरियाये रहिथे। मार गोटारन कस बड़े - बड़े आँखी ल नटेरत, परेतीन बानी अपने अपन बुड़ुर - बुडुर करे लागथे त अहिल्या फट्ट ले जान डारथे के परमिला काकरो संग होवय लड़ झगड़ के आवत हे। आखिर परोसीन होथे। संग लगाती ससुरार आये हे। घर के मुहाटी जुरे हे। संगे रेगत हे। संगे - संग उठत - बइठत हे। एके मुँह म खावत हे एके कूला म हागत हे त का ओतको ल नइ समझही। जब कभू अइसन बात होथे त परमिला ल बइठे बर कहे ल नइ लागय। वोह खुदे हाथ - गोड़ ल लमा - पसार के बइठ जाथे अउ पसरा बगराके सुनाय लगथे। अपन राम कहानी ल। बिन संदर्भ बिन प्रसंग के। पूछे - पाछे के कोनो नेेंगे नइ राखय। आजो वोइसने होइस।
अहिल्या अचोते - अचोवत गोठ के मुहतुर करिस - का साग खाए हस दीदी?
हारन के बाजत भर के देरी रिहिस हे। भइगे ताहने का पूछत हस। परमिला के रेलगाड़ी पोंपियावत छुक - छुक करत दउड़े लगिस - अइ, का खवइ - पीयइ ल पूछथस बहिनी। खाये हवन तभो लांघन। नइ खाये हवन तभो लांघन। अतका कहिके परमिला अपने अपन करू - करू करे लगिस। मुड़ म हाथ ल रखके अनते कोती मुँह ल करके अँइठत बइठ गे। जना मना अहिल्या संग अनबन होगे हावय तइसे। मुड़ ल गड़ियायेे भीतरे - भीतर आँखी ल कनखिया के देख तको डारिस के अहिल्या ह,कुछू बोलत हे के नहीं।
अहिल्या के मुँह उले के उले रही गे। अपने ह फेर हाथ ल झर्रावत केहे लागिस - हरहिंसा खाबे तेला खवई कहिथे अउ उही ह अंग लागथे। हरहर - कटकट म काय सिध परही।
- अइ का होगेे परमिला आज कइसन गुसिया गे हावस वो? गुंझियाये गाँठ परे फूचरा ल फरियावत अहिल्या ह पूछिस।
हालेके अहिल्या जानत हे के परमिला ह बिगर पूछे सबो बात ल उछरही। ओकर पेट म काही बात नइ पचय। छेरी के मँुह त परमिला के मुँह एके जान। तभो ले परमिला ल घलो तो अइसे लगना चाही के अहिल्या ह ओकर दुख - पीरा  ल समझत - सरेखत हावय। अहिल्या के बात ह अभीन सिरायच नइ रिहिस हे। काला बताबे ... एक ठन राहय तेला बतावंव इहाँ तो ... अइसे काहत परमिला फेर थोथना ल ओरमा दिस।
बइला ल धूरा पटकत देखके जइसे किसान के जी बमक जाथे तइसे कस परमिला के ओरमत थोथना ल देखके अहिल्या के जी हो गे रिहिस हे। फेर मन ल मारके उपरसाँसी लेवत कहिस - का करबे दीदी जिंहा चार ठन बरतन -भँड़वा मिलथे तिंहा ठिनिन - ठानन तो होबे करथे ...।
परमिला बीचे म बात काटत कहिस -तभ्भो ले, तभो ले। हमर घर तो बहुतेच हे ....कुच्छूच बात नोहय। हाथ ल झर्रारत आगू कहिस - ओकर जउंहर होवय। नाती टूरा ह अपन ददा संग खाए बर बइठे रिहिसे। घेरी भेरी अपन दाइ जघा आलू  दे ! आलू दे कहिके मांगय।
ओकर आलू मंगइ ल देखके मही ह कहि परेंव - अइ आलू दे दे न। वो कब के आलू - आलू रटन धरे हे। ओकर थारी म भांट च भांटा दिखत हे अउ मोर म आलू च आलू ल भर दे हस। पीलखाहा निपोर ह मीठावत हे न कांही।
परमिला हाथ ल हला - हला के आँखी ल मटकावत तो गोठियाते रिहिस हे। अब मुँह ल घलो दू बीता फार दिस अउ कहिस - हाय राम! बहू के जबान ल तो देख, मोरे बर बघवा कस बरनियागे बाइ। मुही ल कहे लगिस -मं छांट - छांट के परोसत हॅव का? फोकटे -फोकट मोर उपर लांछन लगावत हस।
अब परमिला अपन औकात म आ गे। दाँत ल पीसत,थूँक ल छटकारत उल्टा अहिल्या ल पूछे लगिस - अब बता तंय, भला अपन दाइ ददा ल अइसने जुवाब देवत रिहिस होही ... उहू टूरा के चाल ल तो देख। ओकरे आघू म अतेक बड़ बात होगे फेर एक भाखा बहू ल नइ बरजे सकिस। तंय कालेचुप राहा वो। दाई ह बने काहत हे। अतका तो कहि सकत रहिस हे। फेर काबर बोलय,ओला तो मोहनी - थोपनी देके मोह डारे हे रांड़ी कलजगरी ह।
आज ओकर ससुर जीयत रहितिस त का होतिस जानथस, बखेड़ा खड़ा हो जातिस बखेड़ा? परमिला खुदे सवाल करथे अउ खुदे जुवाब देथे। अहिल्या कभू मुड़ी ल डोलावय। कभू हंू  - हंू काहय। त कभू मुँह ल चक - चक बजा देवय। जइसे जम्मो के जम्मो बिपत ह ओकरे मुंड़ म आके खपला गे हे।
थोरिक थिराके परमिला के एक्सप्रेस फेर दउड़े लागिस। कहिस - मोर चलतिस त मंय एकर कदाप मुँह नइ देखतेंव वो। कहाँ - कहाँ के नीच घरायन म बिहा परेन। मंय पचासो पइत ओकर ददा ल बरजे हौं। आरा - पारा, तीर - तखार ल बने पूछ - गौछ के, देख - परखके मांगबे न कहिके। उहू मुड़पेलवा ह, अपनेच मन के करिस। उहेंच जाके झपाइस। मोर एको नइ चलन दिस। अपन ह तो जुड़ा सितरा के बनौका ल बना लिस। मंय ह फाँदा म परगेंव।
उही होइस जेकर अनमान अहिल्या ल पहिलीच ले रहिस हे। गोठियाते - गोठियावत परमिला बोमफार के रोये लगिस। रोवत - रोवत परमिला अपन जम्मो पुरखा के सबो गुनदोस ल फलफल - फलफल बांच के ओसा तको डारिस। ले दे के सांत होइस तब जाके अहिल्या के जी जुड़ाइस।
अहिल्या जानथे के बात ल बतंगड़ बनाये के परमिला के आदतेच हे। तभो ले ओकर खांध म हाथ ल मड़ाके सहिलावत कहिथे - आज - काल के बहू मन ल का कहिबे बहिनी। कहिबे तेनो अनभल हे। नइ कहिबे तेनो।
परमिला ल लागे लगिस के अहिल्या ह घलो मोर दुख म बियाकुल हे। ओकर ताव थोरिक जुड़ाय लगिस। जम्मो भड़ास निकल गे। मुड़ी ल नवाये सोचे लगिस। अहिल्या समझ गे के परमिला के नारी जुड़ा गे। अब  लोहा म पानी मारे के बेरा आ गे।
कहिथे - बड़ेमन ल घुरूवा होयेच बर परथे परमिला। नान - नान बात म किटिर - काटर होवत रहिबो त परवार ह कइसे चलही। गलती काकर से नइ होवय। लइका ह जाँघ म हग देही त जाँघे ल थोरे काट के फेंक देबे। धोये पोंछे बर तो हमीच ल परही न!
अहिल्या जानथे के कहॅू मंय थोरको खसलेंव ताहेंन परमिला मोरे उपर चढ़ बैठही। परमिला ल समझाना माने तलवार के धार म रेंगना आवय।
बात  ल साधत कहिस - कोन ल का कहिबे बहिनी! हमरे घर हमरे दुवार। बनही त हमरे बिगड़ही त हमरे। कोनो ह अपन मन म काँही राखय। हमी ह अपन फरज ल निभा लेथन सोचके बेटा ल बेटा अउ बहू ल बेटी ले दूसर भाखा नइ काहन। लइका मन संग खेल खाके दुख पीरा ल बिसरा लेथन। फेर हाँ! गउकीन इमान से परमिला तंय पतिया चाहे झन पतिया। जेेन दिन ले मंय बहू ल बेटी कहे ल धरे हॅव वो दिन ले सास - बहू के बीच के डबरा पटा गे हे। बेटी कस मया - दुलार ल पाके मोर सबिता ह बेटी ले जादा मोर हियाव करे लगे हे। मोला कांही  के संसो फिकर नइहे। मंय मन म सोंचे - सपनाये नइ राहव आगू - आगू ले मोर साध पूरा हो जाथे।
अतके ल सुनिस अउ परमिला कुला ल झर्रावत उठके मुसकावत चलते बनिस। जना - मना कोनो खचित बूता - काम के सुरता आगे।
अहिल्या सोचत देखते रहिगे। बोकबाय के बोकबाय।

कवि, आज सुनाओ वह गान रे

अटल बिहारी बाजपेयी

कवि आज सुना वह गान रे,
जिससे खुल जाएँ अलस पलक।
नस - नस में जीवन झंकृत हो,
हो अंग - अंग में जोश झलक।

ये - बंधन चिरबंधन
टूटें -फूटें प्रासाद गगनचुम्बी
हम मिलकर हर्ष मना डालें,
हूकें उर की मिट जाएँ सभी।

यह भूख - भूख सत्यानाशी
बुझ जाय उदर की जीवन में।
हम वर्षों से रोते आए
अब परिवर्तन हो जीवन में।

क्रंदन - कं्रदन चीत्कार और,
हाहाकारों से चिर परिचय।
कुछ क्षण को दूर चला जाए,
यह वर्षों से दुख का संचय।

हम ऊब चुके इस जीवन से,
अब तो विस्फोट मचा देंगे।
हम धू - धू जलते अंगारे हैं,
अब तो कुछ कर दिखला देंगे।

अरे! हमारी ही हड्डी पर,
इन दुष्टों ने महल रचाए।
हमें निरंतर चूस - चूस कर,
झूम - झूम कर कोष बढ़ाए।

रोटी - रोटी के टुकड़े को,
बिलख बिलखकर लाल मरे हैं।
इन, मतवाले उन्मत्तों ने,
लूट - लूट कर गेह भरे हैं।
पानी फेरा मर्यादा पर,
मान और अभिमान लुटाया।
इस जीवन में कैसे आए,
आने पर भी क्या पाया?

रोना, भूखों मरना, ठोकर खाना,
क्या यही हमारा जीवन है?
हम स्वच्छंद जगत में जन्मे,
फिर कैसा यह बंधन है?

मानव स्वामी बने और,
मानव ही करे गुलामी उसकी।
किसने है यह नियम बनाया,
ऐसी है आज्ञा किसकी?

सब स्वच्छंद यहाँ पर जन्मे,
और मृत्यु सब पाएँगे।
फिर यह कैसा बंधन जिसमें,
मानव पशु से बंध जाएँगे?

अरे! हमारी ज्वाला सारे,
बंधन टूक - टूक कर देगी।
पीड़ित दलितों के हृदयों में,
अब न एक भी हूक उठेगी।

हम दीवाने आज जोश की,
मदिरा पी उन्मत्त हुए।
सब में हम उल्लास भरेंगे,
ज्वाला से संतप्त हुए।

रे कवि! तू भी स्वरलहरी से,
आज आग में आहुति दे।
और वेग से भभक उठें हम,
हृद् - तंत्री झंकृत कर दे।
कवि आज सुना वह गान रे,

हरिवंश राय बच्‍चन की रचना

1
इस पार, प्रिये, मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

यह चाँद उदित हो कर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का।
लहरा - लहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देतीं मन का।
कल मुरझाने वाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो।
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का।
तुम दे कर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो।
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

2
जग में रस की नदियाँ बहतीं
रसना दो बूँदें पाती है।
जीवन की झिलमिल - सी झाँकी
नयनों के आगे आती है।
स्वरतालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे।
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है।
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे।
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

3
प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको।
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थ बना कितना हमको।
कहने वाले, पर कहते हैं,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा।
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको।
कह तो सकते हैं, कह कर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

4
कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये।
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो - रो कर हमने ढोए।
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा।
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए।
अब तो हम अपने जीवन भर
उस जरूर कठिन को कोस चुके।
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

5
संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी।
जब दिनकर की तमहर किरणें,
तम के अन्दर छिप जाएँगी।
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी।
तब रवि  शशि पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबे - चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पायेगा।
तब हम दोनों का नन्हा - सा
संसार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

6
ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी।
बुलबुल न अँधेरे में गा - गा
जीवन की ज्योति जगाएगी।
अगणित मृदु - नव पल्लव के स्वर
मरमर न सुने फिर जाएँगे,
अलि अवली कलि  दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी।
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा।
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

7
सुन काल प्रबल का गुरु - गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन।
निर्झर भूलेगा निज टलमल
सरिता अपना कलकल गायन।
वह गायक - नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा।
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगणय
संगीत सजीव हुआ जिनमें।
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब प्राण तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

8
उतरे इन आँखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने।
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने।
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी।
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने।
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा - सुषमा लुट जाएगी।
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा!

9
दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है।
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है।
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी।
दुनिया रोती- धोती रहती।
जिसको जाना है, जाता है,
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो।
उस पार न जाने क्या होगा।

वह सुबह कब होगी

रोजलीन

यह तो केवल रात है
और
रात की नींद है
या कि
एक स्वप्न है दौड़ का
जो ...
नींद में घुलकर
थकान बन गया
और
थकान एक अभिशप्त $खामोशी
पता नहीं
वह सुबह कब होगी
जो -
जागने के लिए होती है?

535, गली नं. 7, कर्ण विहार
मेरठ रोड, करनाल - 132001
(हरियाणा)

मोला सुनता अउ सुमत ले

ईश्‍वर कुमार

मोला सुनता अउ सुमत ले सुबिचार चाही जी।
ए माटी के जतन करैया, समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

पुरखा के बटोरे सबो संस्कृति के मान लावय
छरियाये माटी ला गढ़ के सुघ्घर पहिचान लावय
पबरित माटी ला जनावै फेर जग मा धान कटोरा
ए धरती मां के महिमा गावै बइठार के आरुग चौरा
मोला अइसन मीत मितवा हितवार चाही जी
ए माटी के जतन करैया, समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

राजनीती राजधरम ला नित नित नियाव मा धारय
भ्रष्टाचारी काला धन ला जर ले उखान बिदारय
देश के सेवा परहित जिनगी के सांस खपत ले
देश ला संवार के जाहूं अंतस ले इहि सपथ लय
मोला अइसन राज परजा सरकार चाही जी
ए माटी के जतन करैया,समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

पाँव कांटा गड़ही तभो ले बिपदा ला राउंडत रेंगय
अड़े राहय सत मारग मा बने गिनहा सौहत देखय
धरम अउ करम ला मानय पुरसारथ करय करावै
दाई ददा सत सियान के मान करके गरब ला पावै
मोला अइसन बेटी बेटा परिवार चाही जी
ए माटी के जतन करैया, समाज ला बने गढ़ैया।
धरती के रखवार चाही जी, माटी के रखवार चाही जी

छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे

मिलना मलरिहा

सेमी के नार म जईसे मैनी लुकसी छागे रे
पररजिहा भाखा तरी छत्तीसगढ़ी लदकागे रे

तीवरा के भाजी तैहा होगेच ओमन होगे बटुरा
महतारी भाखा होगे बैरी उड़िया कइसे हितवा
छत्तीसगढ़ी बिछागे बोलइया घलो लजावतहे रे
हमरे खेत के धान खाके उड़िया - सड़वा मोटागे रे
गहुँ बर पलोएव पानी बन दूबी हर बने पोठागे रे
सेमी के नार म जईसे मैनी लुकसी छागे रे
पररजिहा भाखा तरी छत्तीसगढ़ी लदकागे र

भाखा हे चिनहारी संगी इही हवय हमर ईमान
माटी हवय दाई के अचरा हरियर हमर पहचान
तुमा तरोइ छानही चढ़के झिन होरा ल भूँजबे
जरी नार काट खाही त ओहिमेर भँवाके गिरबे
अपन भाखा जरी काटवाके तुमा कस पटकागे रे
सेमी के नार म जईसे मैनी लुकसी छागे रे
पररजिहा भाखा तरी छत्तीसगढ़ी लदकागे रे

भाटा बारी म मुसवा हर बीला खोदत हे
पररजिहा गोठ बोली दीयार सही छावत हे
छत्तीसगढ़ी बीही बारी म अमरबेल घपटत हे
जाम बीही ल बिहारी बेन्दरा रउन्दत टोरत हे
हमरे बारी खेत म अपन भाखा भाजी जगागे रे
सेमी के नार म जईसे मैनी लुकसी छागे रे
पररजिहा भाखा तरी छत्तीसगढ़ी लदकागे रे

भाखा के बल पाके उड़िया राईगढ़ ल चपेलही
बिहारी बेन्दरा कुद नाचके घर म कबजा करही
महतारी भाखा तोर भुलवार के अपन ल चलाही
छत्तीसगढ़ी हे हमर चिनहारी झिन एला भूलाबे रे
संसकिरति हमर पररजिहा सेतिर कती गवागे रे
सेमी के नार म जईसे मैनी लुकसी छागे रे
पररजिहा भाखा तरी छत्तीसगढ़ी लदकागे र

मल्हार बिलासपुर

दो चिड़ियाँ

संतोष श्रीवास्‍तव सम

दो चिड़ियाँ मेरे आँगन में
पंख फड़फड़ाती
और लिपटती
प्रेम तत्व की
अंग लगाती
आँगन पर पड़ती
शीत की धूप
खूब खिलाती
उनका रुप
बड़ी उछलती
फर - फर करती
इठलाती है
उड़ती है
दो चिड़ियाँ है
पर बीच की जैसी
घेर रही है
सारा आँगन
अथाह उत्साह
जगा रही है
भाव एक सा
लेती है
दो चिड़ियाँ मेरे आँगन में
जीवन की उमंग
बताती है।

बरदे भाटा, कांकेर
जिला - कांकेर (छ.ग.)

क्लाॅड ईथरली

गजानन माधव मुक्तिबोध 
मैं सड़क पार कर लेता हूँ। जंगली, बेमहक लेकिन खूबसूरत विदेशी फूलों के नीचे ठहर-सा जाता हूँ कि जो फूल, भीत के पासवाले अहाते की आदमकद दीवार के ऊपर फैले, सड़क के बाजू पर बाँहें बिछा कर झुक गए हैं। पता नहीं कैसे, किस साहस से व क्‍यों उसी अहाते के पास बिजली का ऊँचा खंभा - जो पाँच-छह दिशाओं में जानेवाली सूनी सड़कों पर तारों की सीधी लकीरें भेज रहा है - मुझे दीखता है और एकाएक खयाल आता है कि दुमंजिला मकानों पर चढ़ने की एक ऊँची निसैनी उसी से टिकी हुई है। शायद, ऐसे मकानों की लंब-तड़ंग भीतों की रचना अभी भी पुराने ढंग से होती है।
सहज, जिज्ञासावश देखें, कहाँ, क्‍या होता है। दृश्‍य कौन-से, कौन-से दिखाई देते हैं! मैं उस निसैनी पर चढ़ जाता हूँ और सामनेवाली पीली ऊँची भीत के नीली फ्रेमवाले रोशनदान में से मेरी निगाहें पार निकल जाती हैं।
और, मैं स्‍तब्‍ध हो उठता हूँ।
छत से टँगे ढिलाई से गोल-गोल घूमते पंखे के नीचे, दो पीली स्‍फटिक-सी तेज आँखे और लंबी शलवटों-भरा तंग मोतिया चेहरा है जो ठीक उन्‍हीं ऊँचे रोशनदानों में से, भीतर से बाहर, पार जाने के लिए ही मानो अपनी दृष्टि केंद्रित कर रहा है। आँखों से आँखे लड़ पड़ती हैं। ध्‍यान से एक-दूसरे की ओर देखती है। स्‍तब्‍ध, एकाग्र!
आश्‍चर्य?
साँस के साथ शब्‍द निकले! ऐसी ही कोई आवाज उसने भी की होगी!
चेहरा बहुत बुरा नहीं है, अच्‍छा है, भला आदमी मालूम होता है। पैंट पर शर्ट ढीली पड़ गई है। लेकिन यह क्‍या!
मैं नीचे उतर पड़ता हूँ। चुपचाप रास्‍ता चलने लगता हूँ। कम-से-कम दो फर्लांग दूरी पर एक आदमी मिलता है। सिर्फ एक आदमी! इतनी बड़ी सड़क होने पर भी लोग नहीं! क्‍यों नहीं?
पूछने पर वह शख्‍स कहता है, शहर तो इस पार है, उस ओर है; वहीं कहीं इस सड़क पर बिल्डिंग का पिछवाड़ा पड़ता है। देखते नहीं हो!
मैंने उसका चेहरा देखा ध्‍यान से। बाईं और दाहिनी भौंहें नाक के शुरू पर मिल गई थीं। खुरदुरा चेहरा, पंजाबी कहला सकता था। वह नि:संदेह जनाना आदमी होने की संभावना रखता है! नारी तुल्‍य पुरुष, जिनका विकास किशोर काव्‍य में विशेषज्ञों का विषय है।
इतने में मैंने उससे स्‍वाभाविक रूप से, अति सहज बन कर पूछा, 'यह पीली बिल्डिंग कौन-सी है।' उसने मुझ पर अविश्‍वास करते हुए कहा, 'जानते नहीं हो? यह पागलखाना है - प्रसिद्ध पागलखाना!'
'अच्‍छा...!' का एक लहरदार डैश लगा कर मैं चुप हो गया और नीची निगाह किए चलने लगा।
और फिर हम दोनों के बीच दूरियाँ चौड़ी हो कर गोल होने लगीं। हमारे साथ हमारे सिफर भी चलने लगे।
अपने-अपने शून्‍यों की खिड़कियाँ खोल कर मैंने - हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा कि आपस में बात कर सकते हैं या नहीं! कि इतने में उसने मुझसे पूछा, 'आप क्‍या काम करते हैं?'
मैंने झेंप कर कहा, 'मैं? उठाईगिरा समझिए।'
'समझें क्‍यों? जो हैं सो बताइए।'
'पता नहीं क्‍यों, मैं बहुत ईमानदारी की जिंदगी जीता हूँ; झूठ नहीं बोला करता, पर-स्‍त्री को नहीं देखता; रिश्‍वत नहीं लेता; भ्रष्‍टाचारी नहीं हूँ; दगा या फरेब नहीं करता; अलबत्‍ता कर्ज मुझ पर जरूर है जो मैं चुका नहीं पाता। फिर भी कमाई की रकम कर्ज में जाती है। इस पर भी मैं यह सोचता हूँ कि बुनियादी तौर से बेईमान हूँ। इसीलिए, मैंने अपने को पुलिस की जबान में उठाईगिरा कहा। मैं लेखक हूँ। अब बताइए, आप क्‍या हैं?'
वह सिर्फ हँस दिया। कहा कुछ नहीं। जरा देर से उसका मुँह खुला। उसने कहा, 'मैं भी आप ही हूँ।'
एकदम दब कर मैंने उससे शेकहैंड किया (दिल में भीतर से किसी ने कचोट लिया। हाल ही में निसैनी पर चढ़ कर मैंने उस रोशनदान में से एक आदमी की सूरत देखी थी; वह चोरी नहीं तो क्‍या था। संदिग्‍धावस्‍था में उस साले ने मुझे देख लिया!)
'बड़ी अच्‍छी बात है। मुझे भी इस धंधे में दिलचस्‍पी है, हम लेखकों का पेशा इससे कुछ मिलता-जुलता है।'
इतने में भीमाकार पत्‍थरों की विक्‍टोरियन बिल्डिंग के दृश्‍य दूर से झलक रहे थे। हम खड़े हो गए हैं। एक बड़े-से पेड़ के नीचे पान की दुकान थी वहाँ। वहाँ एक सिलेटी रंग की औरत मिस्‍सी और काजल लगाए हुए बैठी हुई थी।
मेरे मुँह से अचानक निकल पड़ा, 'तो यहाँ भी पान की दुकान है?'
उसने सिर्फ इतना ही कहा, 'हाँ, यहाँ भी।'
और मैं उन अध-विलायती नंगी औरतों की तस्‍वीरें देखने लगा जो उस दुकान की शौकत को बढ़ा रही थीं।
दुकान में आईना लगा था। लहर थीं धुँधली, पीछे के मसाले के दोष से। ज्‍यों ही उसमें मैं अपना मुँह देखता, बिगड़ा नजर आता। कभी मोटा, लंबा, तो कभी चौड़ा। कभी नाक एकदम छोटी, तो एकदम लंबी और मोटी! मन में वितृष्‍णा भर उठी। रास्‍ता लंबा था, सूनी दुपहर। कपड़े पसीने से भीतर चिपचिपा रहे थे। ऐसे मौके पर दो बातें करने वाला आदमी मिल जाना समय और रास्‍‍ता कटने का साधन होता है।
उससे वह औरत कुछ मजाक करती रही। इतने में चार-पाँच आदमी और आ गए। वे सब घेरे खड़े रहे। चुपचाप कुछ बातें हुईं।
मैंने गौर नहीं किया। मैं इन सब बातों से दूर रहता हूँ। जो सुनाई दिया उससे यह जा‍हिर हुआ कि वे या तो निचले तबके में पुलिस के इनफॉर्मर्स हैं या ऐसे ही कुछ!
हम दोनों ने अपने-अपने और एक-दूसरे के चेहरे देखे! दोनों खराब नजर आए। दोनों रूप बदलने लगे! दोनों हँस पड़े और यही मजाक चलता रहा।
पान खा कर हम लोग आगे बढ़े। पता नहीं क्‍यों मुझे अपने अजनबी साथी के जनानेपन में कोई ईश्‍वरीय अर्थ दिखाई दिया। जो आदमी आत्‍मा की आवाज दाब देता है, विवेक-चेतना को घुटाले में डाल देता है, उसे क्‍या कहा जाए! वैसे, वह शख्‍स भला मालूम होता था। फिर, क्‍या कारण है कि उसने यह पेशा अख्तियार किया! साहसी, हाँ, कुछ साहसिक लोग पत्रकार या गुप्‍तचर या ऐसे ही कुछ हो जाते हैं, अपनी आँखों में महत्‍वपूर्ण बनने के लिए, अस्तित्‍व की तीखी संवेदनाएँ अनुभव करने और करते रहने के लिए!
लेकिन, प्रश्‍न यह है कि वे वैसा क्‍यों करते हैं! किसी भीतरी न्‍यूनता के भाव पर विजय प्राप्‍त करने का यह एक तरीका भी हो सकता है। फिर भी, उसके दूसरे रास्‍ते भी हो सकते हैं! यही पेशा क्‍यों? इसलिए, उसमें पेट और प्रवृत्ति का समन्‍वय है! जो हो, इस शख्‍स का जनानापन ख़ास मानी रखता है!
हमने वह रास्‍ता पार कर लिया और अब हम फिर से फैशनेबल रास्‍ते पर आ गए, जिसके दोनों ओर युकलिप्‍टस के पेड़ कतार बाँधे खड़े थे। मैंने पूछा, 'यह रास्‍ता कहाँ जाता है?' उसने कहा, 'पागलखाने की ओर ।' मैं जाने क्‍यों सन्‍नाटे में आ गया।
विषय बदलने के लिए मैंने कहा, 'तुम यह धंधा कब से कर रहे हो?'
उसने मेरी तरफ इस तरह देखा मानो यह सवाल उसे नागवार गुजरा हो।
मैं कुछ नहीं बोला। चुपचाप चला, चलता रहा। लगभग पाँच मिनट बाद जब हम उस भैरों के गेरूए, सुनहले, पन्‍नी जड़े पत्‍थर तक पहुँच गए, जो इस अत्‍या‍धुनिक युग में एक तार के खंभे के पास श्रद्धापूर्वक स्‍थापित किया गया था, उसने कहा, 'मेरा किस्‍सा मुख्‍तसर है। लाज-शरम दिखावे की चीजें हैं। तुम मेरे दोस्‍त हो, इसलिए कह रहा हूँ। मैं एक बहुत बड़े करोड़पति सेठ का लड़का हूँ। उनके घर में जो काम करनेवालियाँ हुआ करती थीं, उनमें-से एक मेरी माँ है, जो अभी भी वहीं हैं। मैं, घर से दूर पाला-पोसा गया, मेरे पिता के खर्चे से! माँ पिलाने आती। उसी के कहने से मैंने बमुश्किल तमाम मैट्रिक किया। फिर, किसी सिफारिश से सी.आई.डी. की ट्रेनिंग में चला गया। तबसे यही काम कर रहा हूँ। बाद में पता चला कि वहाँ का खर्च भी वही सेठ देता है। उसका हाथ मुझ पर अभी तक है। तुम उठाईगिरे हो, इसलिए कहा! अरे! वैसे तो तुम लेखक-वेखक भी हो। बहुत-से लेखक और पत्रकार इनफॉर्मर हैं! तो, इसलिए, मैंने सोचा, चलो अच्‍छा हुआ। एक साथी मिल गया।'
उस आदमी में मेरी दिलचस्‍पी बहुत बढ़ गई। डर भी लगा। घृणा भी हुई। किस आदमी से पाला पड़ा। फिर भी, उस अहाते पर चढ़ कर मैं झाँक चुका था। इसलिए एक अनदिखती जंजीर से बँध तो गया ही था।
उस जनाने ने कहना जारी रखा, 'उस पागलखाने में कई ऐसे लोग डाल दिए गए हैं जो सचमुच आज की निगाह से बड़े पागल हैं। लेकिन उन्‍हें पागल कहने की इच्‍छा रखने के लिए आज की निगाह होना जरूरी है।'
मैंने उकसाते हुए कहा, 'आज की निगाह से क्‍या मतलब?'
उसने भौंहें समेट लीं। मेरी आँखों में आँखे डाल कर उसने कहना शुरू किया, 'जो आदमी आत्‍मा की आवाज कभी-कभी सुन लिया करता है और उसे बयान करके उससे छुट्टी पा लेता है, वह लेखक हो जाता है। आत्‍मा की आवाज को लगातार सुनता है, और कहता कुछ नहीं, वह भोला-भाला सीधा-सादा बेवकूफ है। जो उसकी आवाज बहुत ज्‍यादा सुना करता है और वैसा करने लगता है, वह समाज-विरोधी तत्‍वों में यों ही शामिल हो जाया करता है। लेकिन जो आदमी आत्‍मा की आवाज जरूरत से ज्‍यादा सुन करके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्‍म का पालन करता है, वह निहायत पागल है। पुराने जमाने में संत हो सकता था। आजकल उसे पागलखाने में डाल दिया जाता है।'
मुझे शक हुआ कि मैं किसी फैंटेसी में रह रहा हूँ। यह कोई ऐसा-वैसा कोई गुप्‍तचर नहीं है। या तो यह खुद पागल है या कोई पहुँचा हुआ आदमी है! लेकिन वह पागल भी नहीं है न पहुँचा हुआ है। वह तो सिर्फ जनाना आदमी है या वैज्ञानिक शब्‍दावली प्रयोग करूँ तो यह कहना होगा कि वह है तो जवान-पट्ठा लेकिन उसमें जो लचक है वह औरत के चलने की याद दिलाती है!
मैंने उससे पूछा, 'तुमने कहीं ट्रेनिंग पाई है?'
'सिर्फ तजुर्बे से सीखा है! मुझे इनाम भी मिला है।'
मैंने कहा, 'अच्‍छा!'
और मैं जिज्ञासा और कुतूहल से प्रेरित हो कर उसकी अंधकारपूर्ण थाहों में डूबने का प्रयत्‍न करने लगा।
किंतु उसने सिर्फ मुस्‍करा दिया! तब मुझे वह ऐसा लगा मानो वह अज्ञात साइंस के गणितिक सूत्र की अंक-राशि हो, जिसका मतलब तो कुछ जरूर होता है लेकिन समझ में नहीं आता।
मन में विचारों की पंक्तियों की पंक्तियाँ बनती गईं। पंक्तियों पर पंक्तियाँ। शायद उसे भी महसूस हुआ होगा! और जब दोनों के मन में चार-चार पंक्तियाँ बन गईं कि इस बीच उसने कहा, 'तुम क्‍यों नहीं यह धंधा करते?'
मैं हतप्रभ हो गया। यह एक विलक्षण विचार था! मुझे मालूम था कि धंधा पैसों के लिए किया जाता है। आजकल बड़े-बड़े शहरों के मामूली होटलों में जहाँ दस-पाँच आदमी तरह-तरह की गप लड़ाते हुए बैठते हैं, उनकी बातें सुन कर, अपना अंदाज जमाने के लिए, कई भीतरी सूची-भेदक-प्रवेशक आँखे भी सुनती बैठती रहती हैं। यह मैं सब जानता हूँ। खुद के तजुर्बे से बता सकता हूँ। लेकिन, फिर भी, उस आदमी की हिम्‍मत तो देखिए कि उसने कैसा पेचीदा सवाल किया!
आज तक किसी आदमी ने मुझसे इस तरह का सवाल न किया था। जरूर मुझमें ऐसा कुछ है कि जिसे मैं विशेष योग्‍यता कह सकता हूँ। मैंने अपने जीवन में जो शिक्षा और अशिक्षा प्राप्‍त की, स्‍कूलों-कॉलेजों में में जो विद्या और अविद्या उपलब्‍ध की, जो कौशल और अकौशल प्राप्‍त की, उसने - मैं मानूँ या न मानूँ - भद्रवर्ग का ही अंग बना दिया है। हाँ, मैं उस भद्रवर्ग का अंग हूँ कि जिसे अपनी भद्रता के निर्वाह के लिए अब आर्थिक कष्‍ट का सामना करना पड़ता है, और यह भाव मन में जमा रहता है कि नाश सन्निकट है। संक्षेप में, मैं सचेत व्‍यक्ति हूँ, अति-शिक्षित हूँ, अति-सं‍स्‍कृत हूँ। लेकिन चूँकि अपनी इस अतिशिक्षा और अतिसं‍स्‍‍कृति के सौष्‍ठव को उद्घाटित करते रहने के लिए, जो स्निग्‍ध प्रसन्‍नमुख चाहिए, वह न होने से मैं उठाईगिरा भी लगता हूँ - अपने-आप को!
तो मेरी इस महक को पहचान उस अद्भुत व्‍यक्ति ने मेरे सामने जो प्रस्‍ताव रखा, उससे मैं अपने-आप से एकदम सचेत हो उठा! क्‍या हर्ज है? इनकम का एक ख़ासा जरिया यह भी तो हो सकता है।
मैंने बात पलट कर उससे पूछा, 'तो हाँ, तुम उस पागलखाने की बात कह रहे थे। उसका क्‍या?'
मैंने गरदन नीचे डाल ली। कानों में अविराम शब्‍द-प्रवाह गतिमान हुआ। मैं सुनता गया। शायद वह उसके वक्‍तव्‍य की भूमिका रही होगी। इस बीच मैंने उससे टोक कर पूछा, 'तो उसका नाम क्‍या है?
'क्‍लॉड ईथरली!'
'क्‍या वह रोमन कैथलिक है - आदिवासी इसाई है?'
उसने नाराज हो कर कहा, 'तो अब तक तुम मेरी बात ही नहीं सुन रहे थे?'
मैंने उसे विश्‍वास दिलाया कि उसकी एक-एक बात दिल में उतर रही थी। फिर भी उसके चेहरे के भाव से पता चला कि उसे मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ। उसने कहा, 'क्‍लॉड ईथरली वह अमरीकी विमान चालक है, जिसने हिरोशिमा पर बम गिराया था।'
मुझे आश्‍चर्य का एक धक्‍का लगा। या तो वह पागल है, या मैं! मैंने उससे पूछा, 'तो उससे क्‍या होता है?'
अब उसने बहुत ही नाराज हो कर कहा, 'अबे बेवकूफ! नेस्‍तनाबूद हुए हिरोशिमा की बदरंग और बदसूरत, उदास और गमगीन जिंदगी की सरदारत करनेवाले मेयर को वह हर माह चेक भेजता रहा जिससे कि उन पैसों से दीन-हीनों को सहायता तो पहुँचे ही; उसने जो भयानक पाप किया है वह भी कुछ कम हो!'
मैंने उसके चेहरे का अध्ययन करना शुरू किया। उसकी वे खुरदुरी घनी मोटी भौंहें नाक के पास आ मिलती थीं। कड़े बालों की तेज रेजर से हजामत किया हुआ उसका वह हरा-गोरा चेहरा, सीधी-मोटी नाक और मजाकिया होठ और गमगीन आँखे, जिस्‍म की जनाना लचक, डबल ठुड्डी, जिसके बीच में हलका-सा गड्ढा!
यह कौन शख्‍स है, जो मुझसे इस तरह बात कर रहा है। लगा कि मैं सचमुच इस दुनिया में नहीं रह रहा हूँ, उससे कोई दो सौ मील ऊपर आ गया हूँ, जहाँ आकाश, चाँद-तारे, सूरज सभी दिखाई देते हैं। रॉकेट उड़ रहे हैं। आते हैं, जाते हैं और पृथ्‍वी एक चौड़े-नीले गोल जगत-सी दिखाई दे रही है, जहाँ हम किसी एक देश के नहीं हैं, सभी देशों के हैं। मन में एक भयानक उद्वेगपूर्ण भावहीन चंचलता है! कुल मिला कर, पल-भर यही हालत रही। लेकिन वह पल बहुत ही घनघोर था। भयावह और संदिग्‍ध! और उसी पल से अभिभूत हो कर मैंने उससे पूछा, 'तो क्‍या हिरोशिमा वाला क्‍लॉड ईथरली इस पागलखाने में है।'
वह हाथ फैला कर उँगलियों से उस पीली बिल्डिंग की तरफ इशारा कर रहा था, जिसके अहाते की दीवार पर चढ़ कर मेरी आँखों ने रोशनदान पार करके उन तेज आँखों को देखा था, जो उसी रोशनदान में से गुजर कर बाहर जाना चाहती हैं। तो, अगर मैं जस जनाने लचकदार शख्‍स पर यकीन करूँ तो इसका मतलब यह हुआ कि मेरी देखी वे आँखे और किसी की नहीं, ख़ास क्‍लॉड ईथरली की ही थीं। लेकिन यह कैसे हो सकता है!
उसने मेरी बात ताड़ कर कहा, 'हाँ, वह क्‍लॉड ईथरली ही था।'
मैंने चिढ़ कर कहा, 'तो क्‍या यह हिंदुस्‍तान नहीं है। हम अमेरिका में ही रह रहे हैं?'
उसने मानो मेरी बेवकूफी पर हँसी का ठहाका मारा, कहा, 'भारत के हर बड़े नगर में एक-एक अमेरिका है! तुमने लाल ओठवाली चमकदार, गोरी-सुनहली औरतें नहीं देखी, उनके कीमती कपड़े नहीं देखे! शानदार मोटरों में घूमने वाले अशिक्षित लोग नहीं देखे! नफीस किस्‍म की वेश्‍यावृत्ति नहीं देखी! सेमिनार नहीं देखे! एक जमाने में हम लंदन जाते थे और इंग्‍लैंड‍ रिर्टन कहलाते थे और आज वाशिंगटन जाते हैं। अगर हमारा बस चले और आज हम सचमुच उतने ही धनी हों और हमारे पास उतने ही एटम बम और हाइड्रोजन बम हों और रॉकेट हों तो फिर क्‍या पूछना! अखबार पढ़ते हो कि नहीं?'
मैंने कहा, 'हाँ।'
तो तुमने मैकमिलन की वह तकरीर भी पढ़ी होगी जो उसने... को दी थी। उसने क्‍या कहा था? यह देश, हमारे सैनिक गुट में तो नहीं है, किंतु संस्‍कृति और आत्‍मा से हमारे साथ है। क्‍या मैकमिलन सफेद झूठ कह रहा था? कतई नहीं। वह एक महत्‍वपूर्ण तथ्‍य पर प्रकाश डाल रहा था।
और अगर यह सच है तो यह भी सही है कि उनकी संस्‍कृति और आत्‍मा का संकट हमारी संस्‍कृति और आत्‍मा का संकट है! यही कारण है कि आजकल के लेखक और कवि अमरीकी, ब्रिटिश तथा पश्चिम यूरोपीय साहित्‍य तथा विचारधाराओं में गोते लगाते हैं और वहाँ से अपनी आत्‍मा को शिक्षा और संस्‍कृति प्रदान करते हैं! क्‍या यह झूठ है। और हमारे तथाकथित राष्‍ट्रीय अखबार और प्रकाशन-केंद्र! वे अपनी विचारधारा और दृष्टिकोण कहाँ से लेते हैं?'
यह कह कर वह जोर से हँस पड़ा और हँसी की लहरों में उसका जिस्‍म लचकने लगा।
उसने कहना जारी रखा, 'क्‍या हमने इंडो‍नेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्‍य से प्रेरणा ली है या लुमुंबा के काव्‍य से? छि: छि:! वह जानवरों का, चौपायों का साहित्‍य है! और रूस का? अरे! यह तो स्‍वार्थ की बात है! इसका राज और ही है। रूस से हम मदद चाहते हैं, लेकिन डरते भी हैं।'
'छोड़ो! तो मतलब यह है कि अगर उनकी संस्‍कृति हमारी संस्‍कृति है, उनकी आत्‍मा हमारी आत्‍मा और उनका संकट हमारा संकट है - जैसा कि सिद्ध है - जरा पढ़ो अखबार, करो बातचीत अंगरेजीदाँ फर्राटेबाज लोगों से - तो हमारे यहाँ भी हिरोशिमा पर बम गिरानेवाला विमान चालक क्‍यों नहीं हो सकता और हमारे यहाँ भी संप्रदायवादी, युद्धवादी लोग क्‍यों नहीं हो सकते! मुख्‍तसर किस्‍सा यह है कि हिंदुस्‍तान भी अमेरिका ही है।'
मुझे पसीना छूटने लगा। फिर भी मन यह स्‍वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि भारत अमेरिका ही है और यह कि क्‍लॉड ईथरली उसी पागलखाने में रहते हैं - उसी पागलखाने में रहता है! मेरी आँखों में संदेह, अविश्‍वास, भय और आशंका की मिली-जुली चमक जरूर रही होगी, जिसको देख कर वह बुरी तरह हँस पड़ा। और उसने मुझे एक सिगरेट दी।
एक पेड़ के नीचे खड़े हो कर हम दोनों बात करते हुए नीचे एक पत्‍थर पर बैठ गए। उसने कहा, 'देखा नहीं! ब्रिटिश-अमरीकी या फ्रांसीसी कविता में जो मूड्स, जो मनःस्थितियाँ रहती हैं - बस वे ही हमारे यहाँ भी हैं, लाई जाती हैं। सुरुचि और आधुनिक भावबोध का तकाजा है कि उन्‍हें लाया जाया क्‍यों? इसलिए कि वहाँ औद्योगिक सभ्‍यता है, हमारे यहाँ भी। मानो कि कल-कारखाने खोले जाने से आदर्श ओर कर्तव्‍य बदल जाते हों।'
मैंने नाराज हो कर सिगरेट फेंक दी। उसके सामने हो लिया। शायद, उस समय मैं उसे मारना चाहता था। हाथापाई करना चाहता था। लेकिन वह व्‍यंग्‍य-भरे चेहरे से हँस पड़ा और उसकी आँखे ज्‍यादा गमगीन हो गईं।'
उसने कहा, 'क्‍लॉड ईथरली एक विमान चालक था! उसके एटमबम से हिरोशिमा नष्‍ट हुआ। वह अपनी कारगुजारी देखने उस शहर गया। उस भयानक, बदरंग, बदसूरत कटी लोथों के शहर को देख कर उसका दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। उसको पता नहीं था कि उसके पास ऐसा हथियार है और उस हथियार का यह अंजाम होगा। उसके दिल में निरपराध जनों के प्रेतों, शवों, लोथों, लाशों के कटे-पिटे चेहरे तैरने लगे। उसके हृदय में करुणा उमड़ आई। उधर, अमरीकी सरकार ने उसे इनाम दिया। वह 'वॉर हीरो' हो गया। लेकिन उसकी आत्‍मा कहती थी कि उसने पाप किया, जघन्‍य पाप किया है। उसे दंड मिलना ही चाहिए। नहीं। लेकिन उसका देश तो उसे हीरो मानता था। अब क्‍या किया जाय। उसने सरकारी नौकरी छोड़ दी। मामूली से मामूली काम किया। लेकिन, फिर भी वह 'वॉर हीरो' था, महान् था। क्‍लॉड ईथरली महानता नहीं, दंड चाहता था, दंड!'
'उसने वारदातें शुरू कीं जिससे कि वह गिरफ्तार हो सके और जेल में डाला जा सके। किंतु प्रमाण के अभाव में वह हर बार छोड़ दिया गया। उसने घोषित किया कि वह पापी है, पापी है, उसे दंड मिलना चाहिए, उसने निरपराध जनों की हत्‍या की है, उसे दंड दो। हे ईश्‍वर! लेकिन अमरीकी व्‍यवस्‍था उसे पाप नहीं, महान् कार्य मानती थी। देश-भक्ति मानती थी। जब उसने ईथरली की ये हरकतें देखीं तो उसे पागलखाने में डाल दिया। टेक्‍सॉस प्रांत में वायो नाम की एक जगह है - वहाँ उसका दिमाग दुरुस्त करने के लिए उसे डाल दिया गया। वहाँ वह चार साल तक रहा, लेकिन उसका पागलपन दुरुस्त नहीं हो सका।'
'चार साल बाद वह वहाँ से छूटा तो उसे राय.एल. मैनटूथ नाम का एक गुंडा मिला। उसकी मदद से उसने डाकघरों पर धावा मारा। आखिर मय साथी के वह पकड़ लिया गया। मुकदमा चला। कोई फायदा नहीं। जब यह मालूम हुआ कि वह कौन है और क्‍या चाहता है तो उसे तुरंत छोड़ दिया गया। उसके बाद, उसने डल्‍लॉस नाम की एक जगह के कैशियर पर सशस्‍त्र आक्रमण किया। परिणाम कुछ नहीं निकला, क्‍योंकि बड़े सैनिक अधिकारियों को यह महसूस हुआ कि ऐसे 'प्रख्‍यात युद्ध वीर' को मामूली उचक्‍का और चोर कह कर उसकी बदनामी न हो। इसलिए उसके उस प्राप्‍त पद की रक्षा करने के लिए, उसे फिर से पागलखाने में डाल दिया गया।'
'यह है क्‍लॉड ईथरली! ईथरली की ईमानदारी पर अविश्‍वास करने की किसी को शंका ही नहीं रही। उसकी जीवन-कथा की फिल्‍म बनाने का अधिकार ख़रीदने के लिए कंपनी ने उसे एक लाख रुपए देने का प्रस्‍ताव रखा। उसने कतई इनकार कर दिया। उसके इस अस्‍वीकार से सबके सामने यह जाहिर हो गया कि वह झूठा और फरेबी नहीं है। वह बन नहीं रहा।'
'कौन नहीं जानता कि क्‍लॉड ईथरली अणु युद्ध का विरोध करने वाली आत्‍मा की आवाज का दूसरा नाम है। हाँ! ईथरली मानसिक रोगी नहीं है। आध्‍या‍त्मिक अशांति का, आध्‍यात्मिक उद्विग्‍नता का ज्‍वलंत प्रतीक है। क्‍या इससे तुम इनकार करते हो?'
उसके हाथ की सिगरेट कभी की नीचे गिर चुकी थी। वह जनाना आदमी तमतमा उठा था। चेहरे पर बेचैनी की मलिनता छाई थी।
वह कहता गया, 'इस आध्‍यात्मिक अशांति, इस आध्‍यात्मिक उद्विग्‍नता को समझने वाले लोग कितने हैं! उन्‍हें विचित्र, विलक्षण, विक्षिप्‍त कह कर पागलखाने में डालने की इच्‍छा रखने वाले लोग न जाने कितने हैं! इसलिए पुराने जमाने में हमारे बहुतेरे विद्रोही संतों को भी पागल कहा गया। आज भी बहुतों को पागल कहा जाता है। अगर वह बहुत तुच्‍छ हुए तो सिर्फ उनकी उपेक्षा की जाती है, जिससे कि उनकी बात प्रकट न हो और फैल न जाए।'
'हमारे अपने-अपने मन-हृदय-मस्तिष्‍क में ऐसा ही एक पागलखाना है, जहाँ हम उन उच्‍च पवित्र और विद्रोही विचारों और भावों को फेंक देते हैं, जिससे कि धीरे-धीरे या तो वह खुद बदल कर समझौतावादी पोशाक पहन सभ्‍य भद्र हो जाए यानी दुरुस्त हो जाए या उसी पागलखाने में पड़ा रहे!'
मैं हतप्रभ तो हो ही गया! साथ-ही-साथ, उसकी इस कहानी पर मुग्‍ध भी। उस जीवन-कथा से अत्‍यधिक प्रभावित हो कर मैंने पूछा, 'तो क्‍या यह कहानी सच्‍ची है?'
उसने जवाब दिया, भई वाह! अमरीकी साहित्‍य पढ़ते हो कि नहीं? ब्रिटिश भी नहीं! तो क्‍या पढ़ते हो खाक!... अरे भाई रूस पर तो अनेक भाषाओं में कई पुस्‍तकें निकल गई हैं। तो क्‍या पत्‍थर जानकारी रखते हो। विश्‍वास न हो, तो खंडन करो, जाओ टटोलो। और, इस बीच में इसी पागलखाने की सैर करवा लाता हूँ।'
मैंने हाथ हिला कर इनकार करते हुए कहा, 'नहीं मुझे नहीं जाना।'
क्‍यों नहीं? उसने झिड़क कर कहा, 'आजकल हमारे अवचेतन में हमारी आत्‍मा आ गई है, चेतन में स्‍व-हित और अधिचेतन में समाज से सामंजस्‍य का आदर्श भले ही वह बुरा समाज क्‍यों न हो? यही आज के जीवन-विवेक का रहस्‍य है।...'
'तुमको वहाँ की सैर करनी होगी। मैं तुम्‍हें पागलखाने ले चल रहा हूँ, लेकिन पिछले दरवाजे से नहीं, खुले अगले से।'
रास्‍ते में मैंने उससे कहा, 'मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि भारत अमेरिका है! तुम कुछ भी कहो! न वह कभी हो सकता है, न वह कभी होगा ही।'
इस बात को उसने उड़ा दिया। उसे चाहिए था कि वह उस बात का जवाब देता । उसने सिर्फ इतना कहा, 'मुश्किल यह है कि तुम मेरी बात नहीं समझते।' मैंने कहा, 'कैसे?'
'क्‍लॉड ईथरली हमारे यहाँ भले ही देह-रूप में न रहे, लेकिन आत्‍मा की वैसी बेचैनी रखने वाले लोग तो यहाँ रह ही सकते हैं।'
मैंने अविश्‍वास प्रकट करके उसके प्रति घृणा भाव व्‍यक्‍त करते हुए कहा, 'यह भी ठीक नहीं मालूम होता।'
उसने कहा, 'क्‍यों नहीं? देश के प्रति ईमानदारी रखनेवाले लोगों के मन में, व्‍यापक पापाचारों के प्रति कोई व्‍यक्तिगत भावना नहीं रहती क्‍या?'
'समझा नहीं।'
'मतलब यह कि ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो पापाचार रूपी, शोषण रूपी डाकुओं को अपनी छाती पर बैठा समझते हैं। वह डाकू न केवल बाहर का व्‍यक्ति है, वह उनके घर का आदमी भी है। समझने की कोशिश करो!'
मैंने भौंहें उठा कर कहा, 'तो क्‍या हुआ?'
'यह कि उस व्‍यापक अन्‍याय को अनुभव करनेवाले किंतु उसका विरोध करनेवाले लोगों के अंत:करण में व्‍यक्तिगत पाप-भावना रहती ही है, रहनी चाहिए। ईथरली में और उनमें यह बुनियादी एकता और अभेद है।'
'इससे सिद्ध क्‍या हुआ?'
'इससे यह सिद्ध हुआ कि तुम-सरीखे सचेत जागरुक संवेदनशील जन क्‍लॉड ईथरली हैं।'
उसने मेरे दिल में खंजर मार दिया। हाँ, यह सच था! बिलकुल सच! अवचेतन के अँधेरे तहखाने में पड़ी हुई आत्‍मा का विद्रोह करती है। आत्‍मा पापाचारों के लिए, अपने-आपको जिम्‍मेदार समझती है। हाय रे! यह मेरा भी तो रोग रहा है।
मैंने अपने चेहरे को सख्‍त बना लिया। गंभीर हो कर कहा, 'लेकिन ये सब बातें तुम मुझसे क्‍यों कह रहे हो?'
'इसलिए कि मैं सी.आई.डी. हूँ और मैं तुम्‍हारी स्‍क्रीनिंग कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे विभाग से संबद्ध रहो। तुम इनकार क्‍यों करते हो। कहो कि यह तुम्‍हारी अंतरात्‍मा के अनुकूल है।'
'तो क्‍या तुम मुझे टटोलने के लिए ये बातें कर रहे थे। और, तुम्‍हारी ये सब बातें बनावटी थीं! मेरे दिल का भेद लेने के लिए थीं? बदमाश!'
'मैं तो सिर्फ तुम्‍हारे अनुकूल प्रसंगों की जो हो सकती थी, वही कर रहा था।'