गुरुवार, 10 नवंबर 2016

नवम्‍बर 2016 से जनवरी 2017

सम्पादकीय
छत्‍तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिले, इस पर जाेर दें


आलेख
छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के बेजोड़ शिल्पी : खुमान साव - वीरेन्द्र बहादुर सिंह
' अंधेरे में ' पर पुर्नविचार - रामाज्ञा शशिधर
बाल साहित्य का उद्भव और विकास - यदुनंदन प्रसाद उपाध्याय
कहानी
उसकी माँ - पांडेय बचैन शर्मा ' उग्र '
चेहरा - मोना सिंह
जेबकतरा - भूपेन्द्र कुमार दवे
ग्यारह वर्ष का समय - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
ओते की कहानी - रविकांत मिश्रा
छत्तीसगढ़ी कहानी
आंजत - आंजत कानी होगे - सुशील भोले 
दहकत गोरसी - जयंत साहू
मिटठू मदरसा - किसान दीवान  (छत्तीसगढ़ी अनुवाद)

कविता/ गीत/ गजल
दो रचनाएं - सपना मांगलिक
नदिया के धार बहिस (छत्तीसगढ़ी गीत), - गीता सिंह 
खींच जायेगी खाल (दोहे)- ठाकुर प्रसाद सिद्ध
करिया बादर (छत्तीसगढ़ी गीत) श्रीमती जयभारती चंद्राकर
कश्मीर हमारा है (नवगीत) हरीलाल मिलन

बालकथा
जंगली - रामनरेश उज्जवल


पुस्तक समीक्षा
गलत समय पर प्रकाशित सही कविताएं / - समीक्षा - विवेक मिश्र
जीवन के हर रंग की कविताएं - समीक्षा - चिराग जैन
यादें
वो मेरा गाँव - घनश्याम भारतीय 
विज्ञापन
किसान हित में सबसे आगे
मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है 

छत्‍तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिले इस पर जोर दें

        जब अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने नहीं थे। वे छत्तीसगढ़ आये,छत्तीसगढ़ को देख कर उन्हें लगा होगाा कि छत्तीसगढ़ में विकास के अपार संभावना है। वे छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने के नीयत बना ली। उनकी नीति और नीयत साफ  थी, इसी का परिणाम था जैसे ही वे प्रधानमंत्री बने। छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बनाने की। तत्काल अमल में लाया गया और छत्तीसगढ़ राज्य बन गया। आज छत्तीसगढ़ में जो विकास और छत्तीसगढ़ के लोगों में बदलाव,उनके जीवन स्तर में सुधार, आर्थिक क्षेत्र में उन्नति दिख रहा है,वह सिर्फ और सिर्फ  माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के देन है।
        छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनाने के समय यह नहीं देखा गया कि कौन से क्षेत्र में साल - सागौन होता है। कौन से क्षेत्र में कोयला का भंडार हैै। कहां पर खनिज सम्पदा है, कहां धान, राहेर, चना, कोदो कूटकी हो व अन्य फसल होती है। सिर्फ यही देख गया कि कहां से ले कहां तक छत्तीसगढ़ी बोलने, समझने वाले लोग हैं। संभवत: इसी का निरधान किया गया और वहीं तक के क्षेत्र को छत्तीसगढ़ राज्य में शामिल कर लिया गया।
        मतलब साफ  है - पहिली छत्तीसगढ़ी बोली कानिरधान किया गया फिर छत्तीसगढ़ राज्य के लिए क्षेत्र का निरधान किया गया। इतना सब कुछ होने के बाद भी हम आज तक छत्तीसगढ़ी को राजभासा की दर्जा क्यों नहीं दिलवा पायें? हमें आत्ममंथन करना होगा? आत्मचिंतन करना पड़ेगा। हमें इस पर भी चिंतन करना होगा कि हमारी नीयत साफ  है या फिर हमारी नीति और नीयत में खोंट है?
        वैसे ही छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने की चर्चा चली तो वे धुरंधर लेखक जिन्हें छत्तीसगढ़ी से दुराव था, वे ही सबसे बड़े हितैषी बनकर सामने आ गये। छत्तीसगढ़ी के वे सर्जक जो आजीवन छत्तीसगढ़ी में सृजन करते रहे, उन्हें नेपथ्य में धकेल दिया गया। वे लोग जिन्हें छत्तीसगढ़ी से लगाव नहीं था, छत्तीसगढ़ी भाषा के मानकीकरण को लेकर विवाद की स्थिति पैदा कर रहे हैं जो छत्तीसगढ़ी भाषा के हित में नहीं लगता।
        छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण को लेकर भी अनेक बातें सामने आने लगी है। पूर्व में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग बोली के रूप में किया जाता था इसी का परिणाम था कि जो जिस क्षेत्र का रचनाकार था वह अपने क्षेत्र के आमबोल चाल का उपयोग साहित्य मे करता था, जिससे छत्तीसगढ़ी में एकरूपता नहीं आ सकी यदि हम ईमानदारी के साथ छत्तीसगढ़ी को राजभाषा के रुप में देखना चाहतें हैं तो प्रथम छत्तीसगढ़ी राजभाषा की दर्जा दिलाने कमर कसनी होगी। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा की दर्जा मिलेगी फिर धीरे - धीरे एकरुपता आ ही जायेगी। इसके लिए विभिन्न जिले के छत्तीसगढ़ी  जानकारों, साहित्यकारों, विद्वानों को एक मंच पर ला कर निर्धारण करना हो
         राज्य के विचारों की परम्परा और राज्य की समग्र भाषायी विविधता के प्रचलन और विकास करने तथा इसके लिये भाषायी अध्ययन, अनुसंधान तथा दस्तावेज संकलन, सृजन तथा अनुवाद, संरक्षण, प्रकाशन, सुझाव तथा अनुशंसाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी पारम्परिक भाषा को बढ़ावा देने हेतु शासन में भाषा के उपयोग को उन्नत बनाने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन किया गया है। आयोग के द्वारा प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है, जहां ऐसे लाखों रुपये खर्च दिए जाते हैं और परिणाम सिफर रहता है ऐसे उद्देश्यहीन आयोजनों का क्या औचित्य जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपयों की आहूति दे दी जाती हो, किस काम का?
        यदि हम वास्तव में छत्तीसगढ़ी को राजकाज की भाषा बनाने प्रतिबद्ध है तो अन्य - अन्य विषय पर बहस करके समय खराब नहीं करना चाहिए। हमें चाहिए कि हम सिर्फ और सिर्फ छत्तीसगढ़ी को राजकाज का दर्जा मिले इस पर जोर दें ...

उसकी मां

पांडेय बचैन शर्मा ' उग्र '

         दोपहर को जरा आराम  करके  उठा था।  अपने पढ़ने - लिखने  के कमरे में  खड़ा - खड़ा धीरे - धीरे सिगार पी रहा था और बड़ी - बड़ी अलमारियों  में सजे  पुस्तकालय  की ओर  निहार रहा था। किसी महान लेखक की कोई कृति उनमें से निकालकर देखने की सोच रहा था। मगर पुस्तकालय के एक सिरे से लेकर दूसरे तक मुझे महान ही महान नजर आए। कहीं गेटे, कहीं रूसो, कहीं मेजिनी, कहीं नीत्शे, कहीं शेक्सपीयर, कहीं टॉलस्टाय, कहीं ह्यूगो, कहीं मोपासाँ, कहीं डिकेंस,सपेंसर,मैकाले, मिल्टन, मोलियर ... उफ़ ! इधर से उधर तक एक - से - एक महान ही तो थे! आखिर मैं किसके साथ चंद  मिनट मनबहलाव  करूँ, यह निश्चय ही न हो सका। महानों के नाम ही पढ़ते - पढ़ते परेशान  सा हो गया।
      इतने में मोटर  की पों - पों सुनाई पड़ी। खिड़की से झाँका तो सुरमई रंग की कोई फिएट गाड़ी दिखाई पड़ी। मैं सोचने लगा - शायद कोई मित्र पधारे हैं, अच्छा ही है।  महानों से जान बची!
      जब नौकर ने सलाम कर आने वाले का कार्ड दिया, तब मैं कुछ घबराया। उस पर शहर के पुलिस सुपरिटेंडेंट का नाम छपा था। ऐसे बेवक्त ये कैसे आए?
      पुलिस - पति भीतर आए।  मैंने हाथ मिलाकर, चक्कर खानेवाली एक गद्दीदार कुर्सी पर उन्हें आसन दिया। वे व्यापारिक मुसकराहट से लैस होकर बोले - '' इस अचानक आगमन के लिए आप मुझे क्षमा  करें। ''
- आज्ञा हो!'' मैंने भी नम्रता से कहा।
      उन्होंने पॉकेट से डायरी निकाली। डायरी से एक तसवीर। बोले - देखिए इसे, जरा बताइए तो आप पहचानते हैं इसको ?''
- हाँ, पहचानता तो हूँ।'' जरा सहमते हुए मैंने बताया।
- इसके बारे में मुझे आपसे कुछ  पूछना है।''
- पूछिए।''
- इसका नाम क्या है ? ''
- लाल! मैं इसी नाम से बचपन ही से इसे पुकारता आ रहा हूँ। मगर यह पुकारने का नाम है। एक नाम कोई और है, सो मुझे स्मरण नहीं। ''
- कहाँ रहता है यह ? '' सुपरिटेंडेंट ने मेरी ओर देखकर पूछा।
- मेरे बँगले के ठीक सामने एक दोमंजिला, कच्चा - पक्का घर है, उसी में वह रहता है। वह है और उसकी बूढ़ी माँ। ''
- बूढ़ी का नाम क्या है ? ''
- जानकी। ''
- और कोई नहीं है क्या इसके परिवार में। दोनों का पालन - पोषण कौन करता है ? ''
- सात - आठ वर्ष हुए, लाल के पिता का देहांत हो गया। अब उस परिवार में वह और उसकी माता ही बचे हैं। उसका पिता जब तक जीवित रहा, बराबर मेरी जमींदारी का मुख्य मैनेजर रहा। उसका नाम रामनाथ था। वही मेरे पास कुछ हजार रुपए जमा कर गया था, जिससे अब तक उनका खर्चा चल रहा है। लड़का कॉलेज में पढ़ रहा है। जानकी को आशा है, वह साल - दो साल बाद कमाने और परिवार को सँभालने लगेगा। मगर क्षमा  कीजिए, क्या  मैं यह पूछ सकता हूँ कि आप उसके बारे  में क्यों इतनी पूछताछ कर रहे हैं ? ''
- यह तो मैं आपको नहीं बता सकता, मगर इतना आप समझ लें, यह सरकारी काम है। इसलिए आज मैंने आपको इतनी तकलीफ दी है। ''
- अजी, इसमें  तकलीफ की क्या बात है!  हम तो सात पुश्त से सरकार के फरमाबरदार हैं। और कुछ आज्ञा ...।''
- एक बात और ... '' पुलिस - पति ने  गंभीरतापूर्वक धीरे से कहा - मैं मित्रता से आपसे निवेदन करता हूँ, आप इस परिवार से जरा सावधान और दूर रहें।  फिलहाल इससे अधिक मुझे कुछ कहना नहीं।''
- लाल की माँ!'' एक दिन जानकी को बुलाकर मैंने समझाया - तुम्हारा लाल आजकल क्या पाजीपन करता है? तुम उसे केवल प्यार ही करती हो  न!  हूँ! भोगोगी! ''
- क्या है, बाबू ? '' उसने कहा।
- लाल क्या करता है ? ''
- मैं तो उसे कोई भी बुरा काम करते नहीं देखती।''
- बिना किए ही तो सरकार किसी के पीछे पड़ती नहीं। हाँ, लाल की माँ, बड़ी धर्मात्मा, विवेकी और न्यायी सरकार है यह। जरूर तुम्हारा लाल कुछ  करता होगा।''
- माँ... माँ ! '' पुकारता हुआ उसी समय लाल भी आया। लंबा, सुडौल, सुंदर, तेजस्वी।
- माँ, उसने मुझे  '' नमस्कार '' कर  जानकी से कहा - तू यहाँ भाग आई है।  चल तो ! मेरे कई सहपाठी वहाँ खड़े हैं। उन्हें चटपट कुछ जलपान करा दे।  फिर हम घूमने जाएँगे!''
- अरे!'' जानकी के चेहरे की झुर्रियाँ चमकने लगीं। काँपने लगीं। उसे  देखकर - तू आ  गया लाल! चलती हूँ, भैया! पर देख तो तेरे चाचा क्या शिकायत कर रहे हैं ? तू क्या पाजीपना करता है, बेटा ? ''
- क्या है, चाचा जी ? '' उसने सविनय, सुमधुर स्वर में मुझसे पूछा - मैंने क्या अपराध किया है ?''
- मैं तुमसे नाराज हूँ लाल!'' मैंने  गंभीर स्वर में कहा।
- क्यों, चाचा जी ?''
- तुम बहुत बुरे होते जा रहे हो, जो सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र करने वाले के साथी हो। हाँ, तुम हो! देखो लाल की माँ, इसके चेहरे का  रंग उड़  गया।  यह सोचकर कि यह खबर मुझे कैसे मिली।''
      सचमुच एक बार उसका खिला हुआ रंग जरा मुरझा गया। मेरी बातों से, पर तुरंत ही वह सँभला। - आपने गलत सुना, चाचा जी। मैं किसी षड्यंत्र में नहीं। हाँ, मेरे  विचार स्वतंत्र अवश्य हैं। मैं जरूरत - बेजरूरत जिस - तिस के आगे उबल अवश्य उठता हूँ। देश की दुरवस्था पर उबल उठता हूँ, इस पशु - हृदय परतंत्रता पर। ''
- तुम्हारी ही बात सही, तुम षड्यंत्र में नहीं, विद्रोह में नहीं, पर यह  बक - बक क्यों ? इससे फायदा ? तुम्हारी इस बक - बक से न तो देश की दुर्दशा  दूर होगी और न उसकी पराधीनता। तुम्हारा काम पढ़ना है, पढ़ो। इसके बाद कर्म करना होगा, परिवार और देश की मर्यादा बचानी होगी। तुम पहले अपने घर का उद्धार तो कर लो, तब सरकार के सुधार का विचार करना।''
उसने नम्रता से कहा - चाचा जी, क्षमा  कीजिए। इस विषय में मैं आपसे विवाद नहीं करना चाहता।''
-चाहना होगा, विवाद करना होगा। मैं केवल चाचा जी नहीं, तुम्हारा बहुत कुछ हूँ। तुम्हें देखते ही मेरी आँखों के सामने रामनाथ नाचने लगते हैं,  तुम्हारी बूढ़ी माँ घूमने लगती है। भला मैं तुम्हें बेहाथ होने दे सकता हूँ! इस  भरोसे मत रहना। ''
- इस  पराधीनता के विवाद में, चाचा जी, मैं और आप दो भिन्न सिरों पर हैं। आप कट्टर राजभक्त, मैं कट्टर राजविद्रोही। आप पहली बात को उचित समझते हैं। कुछ  कारणों से, मैं दूसरी को। दूसरे कारणों से। आप अपना पद छोड़ नहीं सकते। अपनी प्यारी कल्पनाओं के लिए, मैं अपना भी नहीं छोड़  सकता।''
- तुम्हारी कल्पनाएँ क्या हैं, सुनूँ तो जरा मैं भी जान लूँ कि अबके लड़के कॉलेज की गरदन तक पहुँचते - पहुँचते कैसे - कैसे हवाई किले उठाने के सपने देखने लगते हैं। जरा मैं भी तो सुनूँ, बेटा।''
- मेरी कल्पना यह है कि जो व्यक्ति समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता  हो, उसका सर्वनाश हो जाए!''
       जानकी उठकर बाहर चली - अरे! तू  तो  जमकर चाचा से  जूझने लगा। वहाँ चार बच्चे बेचारे दरवाजे पर खड़े  होंगे। लड़ तू, मैं जाती हूँ।'' उसने मुझसे कहा - समझा दो बाबू, मैं तो आप ही कुछ नहीं समझती। फिर इसे क्या  समझाऊँगी!'' उसने फिर लाल की ओर देखा - चाचा जो कहें, मान जा बेटा। यह तेरे भले ही की कहेंगे।''
वह बेचारी कमर  झुकाए।  उस साठ  बरस की वय में भी घूँघट सँभाले, चली गई। उस दिन उसने मेरी और लाल की बातों की गंभीरता नहीं समझी।
- मेरी कल्पना यह  है कि ... '' उत्तेजित स्वर में लाल ने कहा - ऐसे दुष्ट,  व्यक्ति - नाशक राष्ट्र के सर्वनाश में मेरा भी हाथ हो।''
- तुम्हारे हाथ दुर्बल हैं, उनसे जिनसे तुम पंगा लेने जा रहे हो। चर्र - मर्र हो उठेंगे। नष्ट हो जाएँगे।''
- चाचा जी, नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो सँवारा गया है। वह बिगड़ेगा ही। हमें दुर्बलता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कर्म के समय हमारी भुजाएँ दुर्बल नहीं, भगवान की सहस्र भुजाओं की सखियाँ हैं।''
- तो  तुम  क्या  करना चाहते  हो ? ''
- जो भी मुझसे हो सकेगा,करूँगा।''
- षड्यंत्र ? ''
- जरूरत पड़ी तो जरूर ...।''
- विद्रोह ...।''
- हाँ, अवश्य ! ''
- हत्या ...।''
- हाँ, हाँ, हाँ!''
- बेटा, तुम्हारा माथा न जाने कौन सी किताब पढ़ते - पढ़ते बिगड़ रहा है। सावधान!''
       मेरी धर्मपत्नी और लाल की माँ  एक दिन बैठी हुई बातें कर रही थीं कि मैं पहुँच गया। कुछ पूछने के लिए कई दिनों से मैं उसकी तलाश में था।
- क्यों लाल की माँ, लाल के साथ किसके लड़के आते हैं तुम्हारे घर  में...।''
- मैं क्या जानूँ , बाबू!'' उसने सरलता से कहा - मगर वे सभी मेरे लाल ही की तरह मुझे प्यारे दिखते हैं। सब लापरवाह! वे इतना हँसते, गाते और हो - हल्ला मचाते हैं कि मैं मुग्ध हो जाती हूँ।''
मैंने एक ठंडी साँस ली - हूँ, ठीक कहती हो। वे बातें कैसी करते हैं। कुछ समझ पाती हो ? ''
- बाबू, वे  लाल की बैठक में बैठते हैं। कभी - कभी जब मैं उन्हें कुछ खिलाने - पिलाने जाती हूँ, तब वे बड़े  प्रेम से मुझे माँ कहते हैं। मेरी छाती फूल उठती है ... मानो वे मेरे ही बच्चे हैं।''
- हूँ ...'' मैंने फिर साँस ली।
- एक लड़का उनमें बहुत ही हँसोड़ है। खूब तगड़ा और बली दिखता है। लाल कहता था - वह डंडा लड़ने में, दौड़ने में, घूँसेबाजी में, खाने में,छेड़ खानी करने और हो - हो, हा - हा कर  हँसने में समूचे कालेज में फर्स्ट है। उसी  लड़के ने एक दिन जब मैं उन्हें हलवा परोस रही थी, मेरे मुँह की ओर देखकर कहा - माँ ! तू  तो ठीक भारत माता - सी लगती है। तू बूढ़ी, वह बूढ़ी। उसका उजला हिमालय है, तेरे केश। हाँ, नक्शे से साबित करता हूँ ... तू भारत माता है। सिर तेरा हिमालय ... माथे की दोनों गहरी बड़ी  रेखाएँ गंगा  और यमुना, यह नाक विंध्याचल,ठोढ़ी कन्याकुमारी तथा छोटी बड़ी  झुरियाँ - रेखाएँ भिन्न - भिन्न पहाड़ और नदियाँ हैं। जरा पास आ मेरे! तेरे केशों को पीछे से आगे बाएँ कंधे पर लहरा दूँ, वह बर्मा बन जाएगा। बिना उसके भारत माता का श्रृंगार शुद्ध न होगा। ''
       जानकी उस लड़के की बातें सोच गदगद हो उठी - बाबू, ऐसा ढीठ लड़का! सारे बच्चे हँसते रहे और उसने मुझे पकड़, मेरे  बालों को बाहर कर अपना बर्मा तैयार कर लिया!''
        उसकी सरलता मेरी आँखों में आँसू बनकर छा गई। मैंने पूछा - लाल की माँ, और भी वे कुछ बातें करते हैं ? लड़ने की,  झगड़ने की,  गोला,  गोली या बंदूक की ? ''
- अरे, बाबू। उसने  मुसकराकर कहा - वे सभी बातें करते हैं। उनकी  बातों का कोई मतलब थोड़े ही होता है। सब जवान हैं, लापरवाह हैं। जो मुँह में आता है, बकते हैं। कभी - कभी तो पागलों - सी बातें करते हैं। महीनाभर  पहले एक दिन लड़के बहुत उत्तेजित थे। न जाने कहाँ, लड़कों को सरकार पकड़ रही है। मालूम नहीं, पकड़ती भी है या वे यों ही गप हाँकते थे। मगर उस दिन वे यही बक रहे थे - पुलिसवाले केवल संदेह पर भले आदमियों के बच्चों को त्रस देते हैं, मारते हैं, सताते हैं। यह अत्याचारी पुलिस की नीचता है। ऐसी नीच शासन - प्रणाली को स्वीकार करना अपने धर्म को, कर्म को,  आत्मा को, परमात्मा को भुलाना है। धीरे - धीरे घुलाना - मिटाना है।
एक ने उत्तेजित भाव से कहा - अजी, ये परदेसी कौन लगते हैं हमारे,  जो बरबस राजभक्ति बनाए रखने के लिए हमारी छाती पर तोप का  मुँह लगाए अड़े और  खड़े हैं। उफ् ! इस देश के लोगों के हिये  की आँखें  मुँद   गई  हैं।  तभी तो इतने जुल्मों पर भी आदमी, आदमी से डरता है। ये लोग शरीर की रक्षा के लिए अपनी - अपनी आत्मा की चिता सँवारते फिरते हैं। नाश हो इस  परतंत्रवाद का! ''
दूसरे ने कहा - लोग ज्ञान न पा सकें, इसलिए इस सरकार ने हमारे पढ़ने - लिखने के साधनों को अज्ञान से भर रखा है। लोग वीर और स्वाधीन न हो  सकें, इसलिए अपमानजनक और मनुष्यताहीन नीति - मर्दक कानून गढ़े हैं।  गरीबों को चूसकर, सेना के नाम पर पले हुए पशुओं को शराब से, कबाब से,  मोटा - ताजा रखती  है यह सरकार। धीरे - धीरे जोंक की तरह हमारे धर्म,    प्राण और धन चूसती चली जा रही है यह शासन प्रणाली!''
- ऐसे ही अंट - संट ये  बातूनी बका करते हैं, बाबू। जभी चार छोकरे  जुटे, तभी यही चर्चा। लाल के साथियों का  मिजाज  भी उसी - सा  अल्हड़ - बिल्हड़ मुझे मालूम पड़ता है। ये लड़के ज्यों - ज्यों पढ़ते जा रहे हैं,  त्यों - त्यों बक - बक में बढ़ते जा रहे हैं।''
- यह बुरा है, लाल की माँ!'' मैंने गहरी साँस ली।
        जमींदारी के कुछ जरूरी काम से चार - पाँच दिनों के लिए बाहर गया था। लौटने पर बँगले में घुसने के पूर्व लाल के दरवाजे पर नजर पड़ी तो वहाँ एक भयानक सन्नाटा - सा नजर आया। जैसे घर उदास हो, रोता हो।
भीतर आने पर मेरी धर्मपत्नी मेरे सामने उदास मुख खड़ी हो गई।
- तुमने सुना ...?''
- नहीं तो, कौन सी बात ? ''
- लाल की माँ पर भयानक विपत्ति टूट पड़ी है।''
       मैं कुछ - कुछ समझ गया, फिर भी विस्तृत विवरण जानने को उत्सुक हो उठा - क्या  हुआ ? जरा साफ  - साफ  बताओ।''
- वही हुआ जिसका तुम्हें भय था। कल पुलिस की एक पलटन ने लाल का घर घेर लिया था। बारह घंटे तक तलाशी हुई। लाल, उसके बारह - पंद्रह साथी, सभी पकड़ लिए गए हैं। सबके घरों से भयानक - भयानक चीजें   निकली हैं।''
- लाल के यहाँ ? ''
- उसके यहाँ भी दो पिस्तौल, बहुत से कारतूस और पत्र पाए गए हैं। सुना है, उन पर हत्या, षड्यंत्र, सरकारी राज्य उलटने की चेष्टा आदि अपराध लगाए गए हैं।''
- हूँ ...।''  मैंने  ठंडी साँस ली। मैं तो महीनों से चिल्ला रहा था कि वह लौंडा धोखा देगा। अब यह बूढ़ी बेचारी मरी। वह कहाँ  है ? तलाशी के बाद तुम्हारे पास आई थी ? ''
- जानकी मेरे पास कहाँ  आई! बुलवाने पर भी कल नकार गई। नौकर से कहलाया - परांठे बना रही हूँ, हलवा, तरकारी अभी बनाना है, नहीं तो, वे बिल्हड़ बच्चे हवालात में मुरझा न जाएँगे। जेलवाले और उत्साही बच्चों की दुश्मन यह सरकार उन्हें भूखों मार डालेगी। मगर मेरे जीते - जी यह नहीं  होने  का।''
- वह पागल है, भोगेगी।'' मैं दुख से टूटकर चारपाई पर गिर पड़ा। मुझे लाल के कर्मों पर घोर खेद हुआ।
       इसके बाद  प्राय: एक वर्ष तक वह मुकदमा चला। कोई भी अदालत के कागज उलटकर देख सकता है,  सी.आई.डी. ने और उनके प्रमुख सरकारी वकील ने उन लड़कों पर बड़े - बड़े दोषारोपण किए। उन्होंने चारों ओर गुप्त समितियाँ कायम की थीं, खर्चे और प्रचार के लिए डाके डाले थे, सरकारी अधिकारियों के यहाँ रात में छापा मारकर शस्त्र एकत्र किए थे। उन्होंने न जाने किस पुलिस के दारोगा को मारा था और न जाने कहाँ, न  जाने किस  पुलिस सुपरिटेंडेंट को। ये सभी बातें सरकार की ओर से  प्रमाणित की गईं।
        उधर उन लड़कों की पीठ पर कौन था ?  प्राय: कोई नहीं। सरकार के डर के मारे पहले तो कोई वकील ही उन्हें नहीं मिल रहा था, फिर एक बेचारा मिला भी तो नहीं का भाई। हाँ, उनकी पैरवी में सबसे अधिक परेशान वह बूढ़ी रहा करती। वह लोटा, थाली, जेवर आदि बेच - बेचकर सुबह - शाम उन बच्चों को भोजन पहुँचाती। फिर वकीलों के यहाँ जाकर दाँत निपोरती, गिड़गिड़ाती, कहती - सब झूठ है। न जाने कहाँ से पुलिसवालों ने ऐसी - ऐसी चीजें हमारे घरों से पैदा कर दी हैं। वे लड़के केवल बातूनी हैं। हाँ, मैं  भगवान का चरण छूकर कह सकती हूँ।  तुम जेल में जाकर देख आओ,   वकील बाबू। भला,फूल - से बच्चे हत्या कर  सकते हैं ? उसका तन सूखकर  काँटा हो गया, कमर झुककर धनुष - सी हो गई। आँखें निस्तेज, मगर उन बच्चों के लिए दौड़ना। हाय - हाय करना उसने बंद न किया। कभी - कभी  सरकारी नौकर, पुलिस या वार्डन झुँझलाकर उसे झिड़क देते, धकिया देते।
       उसको अंत तक यह विश्वास रहा कि यह सब पुलिस की चालबाजी है। अदालत में जब दूध का दूध और पानी  का पानी  किया जाएगा, तब वे बच्चे जरूर बेदाग छूट जाएँगे। वे फिर उसके घर में लाल के साथ आएँगे। उसे   माँ कहकर पुकारेंगे।
       मगर उस दिन उसकी कमर  टूट गई, जिस दिन ऊँची अदालत ने भी लाल को, उस बंगड़ लठैत को तथा दो और लड़कों को फाँसी और दस को दस वर्ष से सात वर्ष तक की कड़ी सजाएँ सुना दीं।
       वह अदालत के बाहर झुकी खड़ी थी। बच्चे  बेड़ियाँ बजाते, मस्ती से झूमते बाहर आए। सबसे पहले उस बंगड़ की नजर उस पर पड़ी।
- माँ! '' वह मुसकराया - अरे, हमें तो हलवा खिला - खिलाकर तूने गधे - सा तगड़ा कर दिया है, ऐसा कि फाँसी की रस्सी टूट जाए और हम अमर के अमर बने रहें मगर तू स्वयं सूखकर काँटा हो गई है। क्यों पगली, तेरे लिए  घर में खाना नहीं है क्या ? ''
- माँ! '' उसके लाल ने कहा - तू भी जल्द वहीं आना जहाँ हम लोग जा रहे हैं। यहाँ से थोड़ी ही देर का रास्ता है, माँ! एक साँस में पहुँचेगी। वहीं हम स्वतंत्रता से मिलेंगे। तेरी गोद में खेलेंगे। तुझे कंधे पर उठाकर इधर से उधर दौड़ते फिरेंगे। समझती है ? वहाँ बड़ा आनंद है।''
- आएगी न, माँ ? '' बंगड़ ने पूछा।
- आएगी न, माँ ? '' लाल ने पूछा।
- आएगी न, माँ ?'' फाँसी - दंड प्राप्त दो दूसरे लड़कों ने भी पूछा।
       और वह टुकुर - टुकुर उनका मुँह ताकती रही - तुम कहाँ जाओगे पगलो ?''
       जब से लाल और उसके साथी पकड़े  गए, तब से शहर या मुहल्ले का कोई भी आदमी लाल की माँ से मिलने से डरता था। उसे रास्ते  में देखकर जाने - पहचाने बगलें झाँकने लगते। मेरा स्वयं अपार प्रेम था उस बेचारी  बूढ़ी पर, मगर मैं भी बराबर दूर ही रहा। कौन अपनी गदरन मुसीबत में डालता। विद्रोही की माँ से संबंध रखकर?
       उस दिन ब्यालू करने के बाद कुछ देर के लिए पुस्तकालय वाले कमरे में गया, किसी महान लेखक की कोई महान कृति क्षणभर देखने के लालच से।  मैंने मेजिनी की एक जिल्द निकालकर उसे खोला। पहले ही पन्ने पर पेंसिल  की लिखावट देखकर चौंका। ध्यान देने पर पता चला। वे लाल के हस्ताक्षर थे। मुझे याद पड़ गई। तीन वर्ष पूर्व उस पुस्तक को मुझसे माँगकर उस लड़के ने पढ़ा था।
       एक बार मेरे मन में बड़ा मोह उत्पन्न हुआ उस लड़के के लिए। उसके पिता रामनाथ की दिव्य और स्वर्गीय तसवीर मेरी आँखों के आगे नाच गई। लाल की माँ पर उसके सिद्धांतों, विचारों या आचरणों  के कारण जो वज्रपात हुआ था। उसकी एक ठेस मुझे भी, उसके हस्ताक्षर को देखते ही लगी। मेरे मुँह से एक गंभीर, लाचार, दुर्बल साँस निकलकर रह गई।
       पर दूसरे ही क्षण पुलिस सुपरिटेंडेंट का ध्यान आया। उसकी भूरी , डरावनी,अमानवी आँखें मेरी,आप सुखी तो जग सुखी आँखों में वैसे ही चमक गईं।  जैसे ऊजड़  गाँव के सिवान में कभी - कभी भुतही चिनगारी चमक जाया करती है। उसके रूखे फौलादी हाथ जिनमें लाल की तसवीर थी,  मानो मेरी गरदन चापने लगे। मैं मेज पर से रबर इरेजर उठाकर उस पुस्तक पर से उसका नाम उधेड़ने लगा। उसी समय मेरी  पत्नी के साथ लाल की माँ वहाँ आई। उसके हाथ में एक पत्र था।
- अरे!'' मैं अपने को रोक न सका - लाल की माँ! तुम तो बिलकुल पीली पड़ गई हो। तुम इस तरह मेरी ओर निहारती हो, मानो कुछ देखती ही नहीं हो। यह हाथ में क्या है ?''
       उसने चुपचाप पत्र मेरे हाथ में दे दिया। मैंने देखा - उस पर जेल की मुहर  थी। सजा सुनाने के बाद वह वहीं भेज दिया गया था। यह मुझे मालूम था। मैं पत्र निकालकर पढ़ने लगा। वह उसकी अंतिम चिटठी थी। मैंने कलेजा रखकर उसे जोर से पढ़ दिया-
माँ,
     जिस दिन तुम्हें यह पत्र मिलेगा उसके सवेरे मैं बाल अरुण के किरण - रथ पर चढ़कर उस ओर चला जाऊँगा।  मैं चाहता तो अंत समय तुमसे मिल सकता था,  मगर इससे क्या फायदा! मुझे  विश्वास है,  तुम मेरी जन्म - जन्मांतर की जननी ही रहोगी। मैं तुमसे दूर कहाँ जा सकता हूँ! माँ, जब तक पवन साँस लेता है, सूर्य  चमकता है,  समुद्र लहराता है, तब तक कौन मुझे  तुम्हारी करुणामयी गोद से दूर  खींच सकता है ? दिवाकर थमा  रहेगा, अरुण रथ लिए जमा रहेगा। मैं बंगड़ वह, यह सभी   तेरे इंतजार में रहेंगे।
हम मिले थे, मिले हैं, मिलेंगे। हाँ, माँ!
                                                                                                        तेरा ... लाल
       काँपते हाथ से पढ़ने के बाद पत्र को मैंने उस भयानक लिफाफे में भर दिया। मेरी पत्नी की विकलता हिचकियों पर चढ़कर कमरे को करुणा से  कँपाने लगी। मगर वह जानकी ज्यों - की - त्यों लकड़ी पर झुकी, पूरी  खुली और भावहीन आँखों से मेरी ओर देखती रही, मानो वह उस कमरे में थी ही नहीं। क्षणभर बाद हाथ बढ़ाकर मौन भाषा में उसने पत्र माँगा। और फिर बिना कुछ कहे  कमरे के फाटक के बाहर हो गई। डुगुर - डुगुर लाठी  टेकती हुई। इसके बाद  शून्य - सा होकर  मैं धम से कुरसी पर गिर पड़ा। माथा चक्कर खाने लगा। उस पाजी लड़के के लिए नहीं, इस सरकार की क्रूरता के लिए भी नहीं, उस बेचारी भोली, बूढ़ी जानकी लाल की माँ के लिए। आह! वह कैसी स्तब्ध थी। उतनी स्तब्धता किसी दिन प्रकृति को मिलती तो आँधी आ जाती। समुद्र पाता तो बौखला उठता।
        जब एक का घंटा बजा। मैं जरा सगबगाया। ऐसा मालूम पड़ने लगा मानो  हरारत पैदा हो गई है ... माथे  में, छाती में,  रग - रग में। पत्नी ने आकर कहा - बैठे ही  रहोगे! सोओगे नहीं ? '' मैंने इशारे से उन्हें जाने कहा।
फिर मेजिनी की जिल्द पर नजर गई। उसके ऊपर पड़े  रबर पर भी। फिर अपने सुखों की,जमींदारी की, धनिक जीवन की और  उस पुलिस - अधिकारी की निर्दय, नीरस, निस्सार आँखों की स्मृति कलेजे में कंपन भर गई। फिर रबर उठाकर मैंने उस पाजी का पेंसिल - खचित नाम पुस्तक की छाती पर से मिटा डालना चाहा।
'' माँ... ''
       मुझे सुनाई पड़ा। ऐसा लगा, गोया लाल की माँ कराह रही है। मैं रबर हाथ में लिए, दहलते दिल से, खिड़की की ओर बढ़ा। लाल के घर की ओर कान लगाने पर सुनाई न पड़ा। मैं सोचने लगा,भ्रम होगा। वह अगर कराहती  होती तो  एकाध  आवाज और अवश्य सुनाई पड़ती। वह कराहने वाली औरत है भी नहीं। रामनाथ के मरने पर भी उस तरह नहीं घिघियाई जैसे साधारण स्त्रियाँ ऐसे अवसरों पर तड़पा करती हैं।
       मैं पुन: सोचने लगा। वह उस नालायक के लिए क्या नहीं करती थी! खिलौने की तरह, आराध्य की तरह, उसे दुलराती और सँवारती फिरती थी। पर आह रे छोकरे!
'' माँ...''
        फिर वही आवाज। जरूर जानकी रो रही है। जरूर वही विकल, व्यथित,  विवश बिलख रही है। हाय री माँ! अभागिनी वैसे ही पुकार रही है जैसे वह पाजी गाकर, मचलकर, स्वर को खींचकर उसे पुकारता था।
       अँधेरा धूमिल हुआ, फीका पड़ा मिट चला। उषा पीली हुई, लाल हुई।  रवि रथ लेकर वहाँ  क्षितिज  से उस छोर पर आकर पवित्र मन से खड़ा हो गया। मुझे लाल के पत्र की याद आ गई।
'' माँ... ''
       मानो लाल पुकार रहा था, मानो जानकी  प्रतिध्वनि की तरह उसी पुकार को गा रही  थी। मेरी  छाती धक् धक् करने लगी। मैंने नौकर को पुकारकर कहा - देखो तो,लाल की माँ क्या कर  रही है?
      जब वह लौटकर आया, तब मैं एक बार पुन: मेज और मेजिनी के सामने खड़ा था। हाथ में रबर लिए उसी उद्देश्य से। उसने घबराए स्वर से कहा  - हुजूर, उनकी तो अजीब हालत है। घर में ताला पड़ा है और वे दरवाजे पर पाँव पसारे हाथ में कोई चि_ी लिए, मुँह  खोल, मरी बैठी हैं। हाँ सरकार, विश्वास मानिए, वे मर गई हैं। साँस बंद है, आँखें  खुलीं...  
साभार : कला का पुरस्कार 1955

बुधवार, 9 नवंबर 2016

छत्‍तीसगढ़ी लोक संगीत के बेजोड़ शिल्‍पी - खुमान साव

वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह

- वीरेन्द्र बहादुर सिंह -

        छत्तीसगढ़ की समृद्धशाली लोक सांस्कृतिक  परंपरा में रचे बसे गीतों और विलुप्त होती लोक धुनों को परिमार्जित कर तथा आधुनिक कवियों की छत्तीसगढ़ी रचनाओं को स्वरबद्ध कर उसे लोकप्रियता की दृष्टि से फिल्मी गीतों के समकक्ष खड़ा देने वाले संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित स्वनाम धन्य लोक संगीतकार खुमान लाल साव सही अर्थों में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक दूत है, जिन्होंने अपनी विलक्षण संगीत साधना और पांच हजार मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ महतारी का यश चहुंओर फैलाया है।
छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए प्रतिष्ठित
 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015 से सम्मानित किया गया है।
महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी नई दिल्ली व्‍दारा
राष्ट्रपति भवन में सम्‍मान प्राप्‍त करते हुए श्री खमान साव जी
        लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत एवं सुगम संगीत के साधक श्री साव का जन्म 5 सिंतबर 1929 को डोंगरगांव के समीप खुर्सीटिकुल नामक गांव में एक संपन्न माल गुजार परिवार में हुआ। बचपन से संगीत के प्रति रूचि रखने वाले श्री साव ने योग्य गुरूओं के संरक्षण में संगीत की बारीकियों को समझा। 14 वर्ष की कच्ची उम्र में उन्होंने नाचा के युग पुरूष मंदराजी दाऊ की रवेली नाचा पार्टी में शामिल होकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। विभिन्न नाचा पार्टियों में अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए श्री साव ने बाद में राजनांदगांव में आर्केस्ट्रा की शुरूआत की। खुमान एंड पार्टी, सरस्वती संगीत समिति, शारदा संगीत समिति और सरस संगीत समिति का संचालन करते हुए उन्होंने अंत में राज भारती संगीत समिति तक का सफर तय किया, लेकिन आर्केस्ट्रा पार्टियों में फिल्मी गीत संगीत के अनुशरण से वे कतई संतुष्ट नहीं थे। उनके भीतर का संगीतकार उन्हें बार बार मौलिक संगीत रचना के लिए प्रेरित कर रहा था।
मेघदूत थियेटर नई दिल्ली में अपनी प्रस्‍तुति देते हुए '' चंदैनी गोंदा '' के कलाकार
        सन 1970 में उनकी मुलाकात लोक कला मर्मज्ञ बघेरा निवासी दाऊ रामचंद देखमुख से हुई जो छत्तीसगढ़ की प्रथम लोक सांस्कृतिक संस्था ' चंदैनी गोंदा ' के निर्माण की योजना बनाकर योग्य कलाकारों की तलाश में घूम रहे थे। उन्हें एक ऐसे संगीत निर्देशक की तलाश थी, जो छत्तीसगढ़ी आंचलिक गीतों में नया प्राण फूंक सके। श्री साव स्वयं अपनी मौलिक संगीत रचना की प्रस्तुति के लिए बेचैन थे। श्री देशमुख के आग्रह को स्वीकार कर श्री साव ' चंदैनी गोंदा ' में संगीत निर्देशक के रूप में शामिल हुए। संगीतकार श्री साव और गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया ने दिन-रात मेहनत कर 'चंदैनी गोंदा '  के रूप में श्री देशमुख के सपने को साकार किया। 7 नवंबर 1970 से दुर्ग जिले के बघेरा से जारी 'चंदैनी गोंदा ' की अविराम यात्रा 45 वर्षों बाद भी जारी है और श्री साव आज भी ' चंदैनी गोंदा ' रूपी रथ के सारथी बने हुए हैं।
        ' चंदैनी गोंदा ' के उद्भव के पूर्व छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का पारंपारिक स्वरूप ज्यों का त्यों गांवों, खेतों, खलिहानों में उत्सव के राग रंगों और नाचा गम्मत की टोलियों तक ही सीमित था। ' चंदैनी गोंदा ' के माध्यम से श्री खुमान साव ने यत्र तत्र बिखरे हुए बहुप्रचलित पारंपारिक लोक गीतों कर्मा, ददरिया, नचौरी, सुआ, गौरा, विवाह गीत, बसदेवा गीत, सोहर, भोजली, पंथी तथा देवी जसगीतों को उनकी मौलिकता बरकरार रखते हुए परिष्कृत और परिमार्जित कर अपने कर्णप्रिय संगीत के द्वारा लोकप्रिय बना दिया। छत्तीसगढ़ी पारंपारिक लोक गीतों के अलावा श्री साव ने छत्तीसगढ़ के स्वनाम धन्य कवियों द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र', स्व. प्यारे लाल गुप्त, स्व. हरि ठाकुर, स्व. हेमनाथ यदु, पं. रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मण मस्तुरिया, पवन दीवान एवं मुकुंद कौशल के गीतों को संगीतबद्ध कर उसे जन जन का कंठहार बना दिया।
मेघदूत थियेटर नई दिल्ली में अपनी प्रस्‍तुति देते हुए '' चंदैनी गोंदा '' के कलाकार
        तोर धरती-तोर माटी रे भैय्या, मोर संग चलव रे, धरती मैय्या जय होवय तोर, काबर तैं मारे नैना बान, मन डोले रे माघ फगुनुवा, मोर खेती खार रूनझुन, धनी बिना जग लागे सुन्ना, मंगनी मा मांगे मया नई मिलै, मोर गंवई गंगा ए, बखरी के तुमा नार बरोबर, पता दे जा रहे गाड़ी वाला जैसे विविध भाव-भरे गीतों की संगीत सर्जना कर श्री साव ने इन गीतों को अमर कर दिया। श्री साव के संगीतबद्ध इन गीतों को जहां लोगों ने आकाशवाणी रायपुर के सुर सिंगार कार्यक्रम में सुना। वहीं ' चंदैनी गोंदा ' की मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से अब तक लाखों श्रोताओं ने इन गीतों के भावों को पूरी तरह महसूस किया है। ' चंदैनी गोंदा ' के प्रस्तुति के दौरान लोग श्री साव की अद्भुत सर्जना जन्य माधुर्य की अनुगूंज से सराबोर हो उठते है। हजारों का जनसैलाब अब भी ' चंदैनी गोंदा ' की विहंगम प्रस्तुति को देखने उमड़ पड़ता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों को परिष्कृत, परिमार्जित और कर्णप्रिय संगीत देकर फिल्मी गीतों के समानांतर लाकर खड़ा कर दिया है।
        श्री खुमान साव का मन कभी कभी आज के बदले परिवेश में गीतों के स्तर, द्विअर्थी भावों और संगीत की मूलभूत लोक संरचना में आई विकृतियों से आहत हो जाता है। वे चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति की धरोहर सुरक्षित और संरक्षित रहे। 87 वर्ष की उम्र के बावजूद श्री साव की लगन, समर्पण, आत्मनिष्ठा और छत्तीसगढ़ की माटी के प्रति मोह का वही स्वरूप आज भी ' चंदैनी गोंदा ' मंच पर देखने को मिलता है। 87 वर्ष की आयु में भी पूरी रात ' चंदैनी गोंदा ' के मंच पर हारमोनियम की रीड पर ऊंगलियंा चलाते श्री साव को देखना अद्भुत अनुभव है।
        धुन के पक्के श्री साव में गजब की सांगठनिक क्षमता हैै। ' चंदैनी गोंदा ' की साढ़े चार दशकों की यात्रा के दौरान अनेक कलाकार ' चंदैनी गोंदा ' से जूुड़े और श्री साव के कुशल निर्देशन में अपनी प्रतिभा को तराशा। बाद में कई कलाकारों ने धीरे धीरे अपना अगल आशियाना भी बना लिया, लेकिन श्री साव कभी भी विचलित नहीं हुए। नैसर्गिक कलाकारों को तलाश कर उन्हें तराशना, मंच, नाम, दाम और सम्मान देना तथा उनके सुख-दुख में सहभागी बनना श्री साव की खास विशेषता रही है। अत्यंत स्वाभिमानी श्री साव ने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। अनुशासन के प्रबल पक्षधर श्री साव जुबान से कड़े जरूर हैं, लेकिन उनका हृदय बच्चों की तरह कोमल है। उनकी डांट में भी हमेशा एक अभिभावक की समझाईश होती है।
मेघदूत थियेटर नई दिल्ली में अपनी प्रस्‍तुति देते हुए '' चंदैनी गोंदा '' के कलाकार
        ' न यश की लिप्सा और न सम्मान की आकांक्षा ' रखने वाले श्री खुमान साव अपने धुन के पक्के हैं। युवावस्था के दौरान खेतों में काम करती हुई एक ग्राम्य बाला के मुंह से एक फिल्मी गीत सुनकर उनका मन वितृष्णा से भर उठा था। माटी का आत्म गौरव जागा, उसी दिन  से उन्होंने अपने आप को छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के लिए समर्पित कर दिया। हारमोनियम की रीड पर चलती ऊंगलियों ने अनेक कालजयी संगीत की रचना की। उनके सुर ताल, लय और धुन को सुनकर समूचा छत्तीसगढ़ अचंभित रह गया।
        श्री साव को अभी हाल ही में विगत 4 अक्टूबर 2016 को छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015 से सम्मानित किया गया है। महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य एवं गरिमामय समारोह में उन्हें सम्मानित किया। सम्मान समारोह के दूसरे दिन  श्री साव ने मेघदूत थियेटर नई दिल्ली में अपनी 31 सदस्यीय टीम के साथ मात्र 55 मिनट की प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोकगीत, नृत्य एवं कर्णप्रिय संगीत की सरिता बहाकर राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के बौद्धिक वर्ग को न केवल छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की लोकप्रियता से परिचित कराया, अपितु प्रभावी प्रस्तुति की धाक भी जमाई।
        बहरहाल अपने समय की किवदंती बन चुके श्री खुमान साव छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के जिंदा इतिहास हैं। उनके द्वारा संगीतबद्ध लोक गीत चिरस्थायी है। उनकी संगीत साधना से अमर कालजयी गीत रचनाएं छत्तीसगढ़ की धरोहर है। उनकी अनवरत संगीत साधना आज भी जारी है।


संपर्क : 4/5 बल्देव बाग, 
वार्ड क्रमांक-16, बालभारती स्कूल के पीछे,
राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़़ ) मो. नं-94077-60700

'' अंधेरे में '' पर पुर्नविचार

रामाज्ञा शशिधर
   

        यह मुक्तिबोध की अंतिम कविता '' अंधेरे में '' का पचासवां साल है। '' अंधेरे में '' कविता 1957 से 1962 के बीच रची गई, जिसका अंतिम संशोधन 1962 में हुआ तथा प्रकाशन आशंका के द्वीप '' अंधेरे में '' शीर्षक से कल्पना में नवंबर 1964 में हुआ। यह मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब भारत इतिहास और संस्कृति का भी पचासवां साल है। ग्वालियर से 1962 में प्रकाशित होने और मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद जबलपुर न्यायालय द्वारा 1963 में किताब के प्रतिबंधित अंश हटाकर अतिरिक्त छापने के फैसले का यह पचासवां साल आशंका के द्वीप भारत के '' अंधेरे '' को ज्यादा विचारणीय बना देता है। यह अनायास नहीं है कि '' अंधेरे में '' की जब पचासवीं सालगिरह मनायी जा रही है, तब मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब पर कहीं कोई बहस नहीं है। शायद इसका जवाब भी '' अंधेरे में '' कविता में मौजूद है।
        '' अंधेरे में '' फैंटेसी में निर्मित कविता है। स्वाधीनता के छियासठ और भूमंडलीकरण के बाईस वर्षों बाद भारतीय समय, समाज, सत्ता और राष्ट्र का अंधेरा फैंटेसीमय हो गया है। मध्यवर्ग का चरित्र ज्यादा पतित हो गया है। आम जनता से उसका लगभग संबंध विच्छेद हो गया है। सत्ता के साथ वह ज्यादा नाभिनालबद्ध है। बौद्धिक वर्ग पूर्णतरू रक्तपाई वर्ग का क्रीतदास हो गया है। राष्ट्रवाद, वर्गचेतना, सर्वहारा, जनक्रांति आदि शब्द मध्यवर्ग के शब्दकोश से गायब हो गए हैं। पश्चिमी आधुनिकता और कॉरपोरेट पूंजी राष्ट्रराज्य से गठबंधन कर जनता के सामने तानाशाह की भूमिका में है। शीतयुद्ध समाप्ति के बाद रहा - सहा मार्क्‍सवादी संस्कृति चिंतन बासी कढ़ी में उबाल की तरह दिखता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा सभ्यतागत विनाश के आखिरी कगार पर विस्थापन, आत्महत्या, दमन और संघर्ष में संलग्न है लेकिन मध्यवर्ग और क्रीतदास बौद्धिक वर्ग का उससे किसी तरह का सृजनशील जुड़ाव नहीं है। वैश्विक सत्ता प्राकृतिक संसाधन और गांव - खेत के साथ मानव अचेतन के तिलस्मी इलाके पर भी उच्च तकनीकी संस्कृति के माध्यम से कब्जा कर चुकी है। अस्तित्व और चेतना का पूरा इलाका राजनीति बाजार और भाषा के पाखंड एवं झूठ से पटा हुआ है। अंधेरे की फैंटेसी ने रहस्य और जादू के जटिल खेल में पूरी सभ्यता को उलझा दिया है।
        सभ्यता संकट के इस सर्वग्रासी दौर में '' अंधेरे में '' कविता पाठकों के लिए एक नई रोशनी का काम कर सकती है। लेकिन हिंदी आलोचना के मठवाद और गढ़वाद ने मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में का अंधेरा और बढ़ा दिया है। दिलचस्प है कि हिंदी आलोचना के फैंटेसी जैसे कला रूप से भले संबंध नहीं हो लेकिन '' अंधेरे में '' जैसी कविता की आलोचना के क्रम में उसका फैंटेसीमय गड्डमड स्वप्नचित्र देखने लायक है। क्लासिक मार्क्‍सवादी और यथार्थवादी आलोचक रामविलास शर्मा के लिए इस कविता पर एक ओर विकृत मनोचेतना के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सार्त्र के खंडित व्यक्तित्व के अस्तित्ववाद का। आधुनिकताबोध और नई समीक्षा से प्रभावित नामवर सिंह के लिए वहां भाषिक एवं साहित्यवादी अस्मिता की खोज है, वहीं स्थूल मार्क्‍सवादी प्रभाकर माचवे के लिए वह गुएरनिका इन वर्स है। शमशेर के लिए यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है तो कलावादी अशोक वाजपेयी के लिए खंडित रामायण। एक आलोचक को इसमें लंदन की रात दिखती है तो दूसरे कवि को जापानी फिल्म का जंगल। बात यहीं ठहर जाये तो गनीमत है। तिलस्मी खोह में कुहासा बढ़ाने के लिए हिंदी आलोचना की हांफती हुई युवा पीढ़ी मुक्तिबोध पर किताब लिखती है तथा मार्शल लॉ लगाने वाली शक्ति से पुरस्कृत होती है। यहां गाइड छाप पदोन्नतिमूलक समीक्षा की चर्चा करना व्यर्थ है जिसे हिंदी आलोचना में कूड़ावाद के प्रर्वतन का श्रेय दिया जाना चाहिए। जितनी चेतना मध्यवर्ग की तथा फैंटेसी की टूटी बिखरी हुई नहीं होती है, उससे ज्यादा कविता की आलोचना की है। विचारणीय है कि व्यक्तिपूजा और कर्मकांड से ग्रस्त हिंदी मनीषा पिछले समय में नदी के द्वीप के अज्ञेय की जिस तल्लीनता से पूजा - पाठ कर थी, इस वर्ष से आशंका के द्वीप '' अंधेरे में '' के कवि मुक्तिबोध का उसी सम पर भजन - कीर्तन शुरू कर चुकी है। ऐसी परिस्थिति में मुक्तिबोध की इस कविता की आलोचना आग में पूरी हथेली डालने जैसा काम है।
        '' अंधेरे में '' कविता के विश्लेषण - मूल्यांकन का संकट वस्तुत: उसमें प्रयुक्त फैंटेसी कलारूप, अचेतन विश्लेषण एवं मनोभाषिकी के संबंधों को ठीक से नहीं साधने - समझने का संकट है। यह समस्या हिंदी में जितनी बड़ी कलावादियों के सामने रही है, उससे कम बड़ी क्लासिक मार्क्‍सवादियों के लिए नहीं। वस्तुत: उपनिवेशित आधुनिकता के प्रचंड प्रभाव से पीड़ित हिंदी का ज्ञानकांड चेतन - अचेतन में जरूरत से ज्यादा यथार्थवाहक और पश्चिमोन्मुख है। इसकी जड़ें पुराने औपनिवेशिक ज्ञानकांड से नव साम्राज्यी चेतना कांड तक महीन रूप से फैली हुई हैं। '' अंधेरे में ''आधुनिक हिंदी में अकेली कविता है जो चार सौ साल के औपनिवेशिक ज्ञानकांड और कला रूप को बहुआयामी चुनौती देती है।
        मुक्तिबोध ने गहरी साधना से इस काव्यरूप को अपने लिए संभव किया था। वे एक साथ सत्ता व्यवस्था और सभ्यता के सच्चे समीक्षक थे। इसके लिए उन्होंने पूरा जीवन दांव पर लगा दिया तथा इस कारण उनकी अकाल मौत हुई। फैंटेसी एक यातनाकारी काव्यरूप है जो कलाकार से पूरा जीवन मांगती है। फैंटेसी ऐसा कलारूप है, जो मानव मन के चेतन, अवचेतन और अचेतन में विशिष्ट ढंग से आवाजाही करते हुए स्वप्न बिंबों की शृंखला का भाषिक सृजन करती है। फैंटेसी जाग्रत स्वप्न चित्रावली है। परिवेश के दमन और दबाव से फैंटेसी की शक्ति बढ़ती है। प्रतिरोध का आधार अंतर्वस्तु के रूप में भी होता है। फैंटेसी एक भाववादी किंतु क्रांतिकारी शिल्प है जो आधुनिकता और यथार्थ के दमनकारी एवं गैरलोकतांत्रिक रूपों का संकेत अपनी उपस्थिति से ही नहीं करती है बल्कि रचना प्रक्रिया के दौरान अंतर्वस्तु चित्रण के माध्यम से दमन प्रक्रिया से भी साक्षात्कार कराती है।
         मुक्तिबोध की कविता '' अंधेरे में '' को चरित्र,आख्यान और विचार तीन बिंदुओं के माध्मय से समझने की कोशिश होनी चाहिए। अंधेरे में के दो नायक हैं। एक काव्य नायक, दूसरा स्वप्न नायक। पहला ' मैं ' है तथा दूसरा ' उसका' अन्य। दोनों के घात - प्रतिघात से कविता के आख्यान का विकास होता है। आठ खंडों में विभाजित महाकाव्यात्मक उपाख्यान के लिए यह कविता काव्य नायक और और स्वप्ननायक की विभाजित चेतना को एक करने का प्रयास करती है तथा अन्य में मैं का व्यक्तित्वांतरण कर सत्ता, व्यवस्था और सभ्यता के मूलगामी प्रश्नों का हल खोजती है।
        काव्य नायक का स्वप्न नायक में विलोप कैसे होता है। कविता में काव्य नायक कवि और मध्यवर्गीय बौद्धिक वर्ग है। वह आधुनिकताबोध से ग्रस्त मनुष्य है। स्वतंत्रता के बाद उसकी चेतना बहुविभाजित, बहुखंडित और जनविरोधी हो गई है। वह नदी का द्वीप है। यह औपनिवेशिक दृष्टि पश्चिमी ज्ञानवाद, तर्कप्रणाली, जीवनशैली और मशीनी सभ्यता के कारण हुई है। काव्य नायक का अहं प्रचंड व्यक्तित्ववाद का शिकार है। काव्य नायक की छटपटाहट से कविता आरंभ होती है तथा वह स्वप्ननायक को मनु श्वेत आकृति रक्तालोक स्नात पुरुष संभावित स्नेह सा प्रिय आजानुभुज रहस्यमय व्यक्ति अब तक न पाई गई अभिव्यक्ति आत्मा की प्रतिमा हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव निज संभावना और प्रतिभा आदि के रूप में बार - बार देखता है। आत्मालोचन और आत्मग्लानि के माध्यम से काव्य नायक धीरे - धीरे स्वप्न नायक के पास पहुंचता है, एकाकार होता है, दमन सहता है, संघर्ष करता है और अंतत: उसके अस्तित्व का विलय हो जाता है। फैंटेसी द्वारा विलोपीकरण की प्रक्रिया अचेतन मन के भीतर मुमकिन होती है।
        मन की तीन अवस्थाएं होती हैं ? चेतन - अवचेतन,अचेतन। जीवनानुभव का दो तिहाई हिस्से यथार्थ और भाषा दोनों अचेतन में रहते हैं। कला के दो क्षण यहीं घटित होते हैं। मन के तीन रूप होते हैं। बाह्य मन, प्रतीक मन और कल्पना मन। प्रतीक मन में भाषा - मिथक होते हैं जो सामूहिक अचेतन का प्रतिनिधित्व करते हैं। कल्पना मन तो अचेतन का वह इलाका है जहां फैंटेसी घटित होती है। जब काव्य नायक का मैं और स्वप्न नायक का अन्य कल्पना मन में पहुंचते हैं तथा कला के तीसरे क्षण में संवेदन उद्देश्य से प्रेरित होते हुए पिघल जाते हैं तब वहीं दोनों की एकता होती है। फिर स्वप्न चित्र प्रतीक मन में आकर भाषिक संरचना में ठोस रूप में तब्दील हो जाते हैं। इस तरह मैं और अन्य का अचेतन इलाके में विलोपीकरण होता है। इसे मुक्तिबोध कला के तीन क्षण और संवेदन उद्देश्य द्वारा अपनी तरह से आलोचना में व्याख्यायित करते हैं।
        पूंजीवाद की बुनियादी विशेषता है कि वह संरचना, अवधारणा और अनुभव के क्षेत्र में दरार पैदा कर देता है। सार्वजनिक और निजी के बीच, सामाजिकता और मनोविज्ञान के बीच, राजनीति और काव्य के बीच, इतिहास, समाज और व्यक्ति के बीच। इस कारण वैयक्तिक विषय में हमारा चिंतन विकलांग हो जाता है। समय और बदलाव के बारे में हमारी सोच लकवाग्रस्त हो जाती है। इस तरह पूंजीवाद हमें हमारी वैयक्तिक अभिव्यक्ति से अलग - थलग कर देता है फ्रेडरिक जेम्सन। यह समस्या स्थूल समाजशास्त्रीय और मार्क्‍सवादी दोनों दृष्टियों पर समान रूप से लागू होती है। मुक्तिबोध के संदर्भ में इसके सबसे बड़े उदाहरण रामविलास शर्मा हैं। मुक्तिबोध की कविता इसी पूंजीवादी दृष्टि की शिकार हुई।
        औपनिवेशिक आधुनिकता के दमनकारी, तानाशाह, एकांगी, यथार्थवादी, तर्कप्रधान, मशीनी एवं तकनीकी सत्य को चुनौती देने के लिए मुक्तिबोध ने फैंटेसी प्रविधि का प्रयोग किया। लेकिन उत्तर आधुनिकता से उपजी समस्या के दौर में फैंटेसी का महत्व और बढ़ गया है। उत्तर आधुनिकता ने यथार्थ को छवियों में बदल दिया है तथा समय को वर्तमान क्षणों में खंडित कर दिया है। मुक्तिबोध द्वारा अर्जित फैंटेसी प्रविधि आज उत्तर आधुनिक वायवीय एवं भ्रममूलक स्वप्न छवियों तथा समय के खंडित क्षणों को साहित्य की दुनिया में चुनौती देने में सर्वाधिक सक्षम कलारूप है। '' अंधेरे में '' कविता की समकालीनता इस कसौटी पर और बढ़ गई है। फैंटेसी साहित्य रचना के क्रम में एक ओर भाषा के खोए हुए जीवनमूल्य और अर्थमूल्य को पुनर्सृजन द्वारा लाती है तथा दूसरी ओर यथार्थ की बाह्य मन में मौजूद वस्तु संरचना तथा कल्पना मन में प्रवाहित स्वप्न संरचना के विभ्रममूलक एवं आडंबरीकृत परत को हटा देती है। संभवत: फैंटेसी शिल्प के कारण अंधेरे में का काव्य नायक मध्यवर्गीय मिथ्या चेतना से मुक्त होकर वर्ण चेतना से संपन्न होता है। इस कविता के काव्य नायक की सर्वहारा के स्वप्न नायक से एकता का प्रश्न कविता में चेतना और अस्तित्व दोनों स्तरों पर है। इस तरह एक मरते हुए मूल्य का अग्रगामी मूल्य में गुणात्मक रूपांतरण होता है।
        इसके व्यक्तित्वांतरण की चुनौती दरअसल मध्यवर्ग के अविभाजित नायक को जनयूथ और जनक्रांति में शामिल करने की चुनौती है जहां उसे जनांदोलन का नेतृत्व सौंपा जाए। मेरे युवकों में व्यक्ति त्वांतरध्वि भिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगरध्मानो कि ज्वाला - पुंखरी - दल में घिरे हुए सब अग्नि कमल के केंद्र में बैठे दूत वेग बहती हैं शक्तियां संचयी कहीं आग लग गई। कहीं गोली चल गई। कलावादी आरोप लगा सकते हैं कि क्या कविता क्रांति कर सकती है। जवाब होगा कि कविता क्रांति नहीं कर सकती है,किंतु एक ओर क्रांति प्रक्रियाओं का चित्रण करती है तथा दूसरी ओर क्रांति प्रक्रिया में रचनात्मक योगदान देती है। दुनिया भर की कविता और हमारा स्वतंत्र साहित्य इसका जीवित प्रमाण है।
        शमशेर की टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि यह कविता स्वतंत्रतापूर्व और स्वतंत्रता पश्चात का दहकता इस्पाती दस्तावेज है। मुक्तिबोध ने अपनी बीमारी की अवस्था में मित्र श्रीकांत वर्मा से आग्रह किया था कि '' चांद का मुंह टेढ़ा है '' में उनकी दो कविताएं एक साथ चंबल की घाटियां और आशंका के द्वीप '' अंधेरे में '' को जरूर शामिल किया जाए। उन्होंने कहा था कि आशंका के द्वीप '' अंधेरे में '' शीर्षक एक विशेष मन:स्थिति के प्रवाह में दिया गया था। श्रीकांत वर्मा का भी मानना है कि यह शीर्षक इस कविता के अर्थ को अच्छी तरह व्यंजित करता है। गौरतलब है कि कविता को अंतिम रूप देने के दौरान मुक्तिबोध गंभीर तनाव से गुजर रहे थे। उनके अस्तित्व को बचाने वाली स्कूली पाठ्यक्रम की किताब भारत इतिहास और संस्कृति तत्कालीन सत्ता द्वारा प्रतिबंधित हो गई थी। इस प्रतिबंध मांग अभियान में मध्य प्रदेश की कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। यह नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालीन कम्युनिस्ट आंदोलन पर नेहरू युग का नशा इतना था कि इसका तेलंगाना किसान आंदोलन के दमन और प्रगतिवादी आंदोलन की समाप्ति से बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है। उस दौर में मुक्तिबोध के लिए भारतीय उपमहाद्वीप का प्रश्न, अधूरी आजादी का प्रश्न, औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न था। यूं ही मध्यवर्गीय काव्य नायक के सम्मुख छंद लय से युक्त गीत एक पागल नहीं गाता है। अब तक क्या किया। जीवन क्या जिया। ज्यादा लिया और दिया बहुत बहुत कम, मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम। तब मार्क्‍सवादी आलोचना अंतरराष्ट्रीयता बोध से इतनी मोहग्रस्त थी कि राष्ट्र, राष्ट्रीयता और संघर्ष का प्रश्न गौण लगता था। मुक्तिबोध के सम्मुख '' अधूरी आजादी '' के स्थान पर '' मुकम्मल आजादी '' का संभावित नक्शा पेश करने का प्रश्न था। इस तम शून्य में तैरती है जगत समीक्षा की हुई इस उसकी विवेक विक्षोभ महान उसका तम अंतराल में अंधियारे मुझमें द्युति आकृति सा भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका। काव्य नायक को बोध है। लोकहित पिता को घर से निकाल दिया। जन मन करुणा सी मां को हकाल दिया। स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया। जमे जाम हुए फंस गए। अपने ही कीचड़ में धंस गए।
         राष्ट्रवाद का प्रश्न मार्क्‍सवादी विचारधारा के लिए भी अब अर्थव्यवस्था की मुक्ति का उपप्रश्न नहीं है। यह मानवता के संपूर्ण अस्तित्व के लिए ऊर्जा पाने का प्राथमिक प्रश्न है। मार्क्‍स ने कभी कहा था कि क्रांति राष्ट्र करता है पार्टी नहीं। यह तथ्य आज ज्यादा सच है। आज भारत जैसा देश बाहरी औपनिवेशिक विकसित राष्ट्रों के बाजारवादी और हथियारवादी राष्ट्रवाद तथा आंतरिक उन्मादी सांप्रदायिक राष्ट्रवाद दोनों के दमन, शोषण का शिकार है। अंधेरे में कविता इन दोनों कट्टर राहों से अलग जनता के जनराष्ट्रवाद का नक्शा देती है। इसे कविता में तिलक और गांधी के रूपकों से समझना चाहिए। तिलक की प्रतिमा का हिलना, चिंता से मस्तिष्क का फटना तथा खून की धार का बहना राष्ट्रीय मुक्ति के क्रांतिकारी मसौदे का अगला संकेत है। कविता में गांधी के कंधों पर सवार शिशु वह स्वातंर्त्य शिशु स्वप्न है जो पहले तो सूरजमुखी के प्रकाश कण से भरे पुष्प गुच्छ में बदलता है तथा अंतत: काव्य नायक के कंधे पर भारी रायफल में तब्दील हो जाता है। आजादी के बाद राष्ट्र के सामने प्रश्न शेष थे। किसकी आजादी? कैसी आजादी ? किसका राष्ट्र ? कैसा राष्ट्र ? तेलंगाना किसान आंदोलन से नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के बीच बीस सालों का अंतराल आम जनता और मध्यवर्ग के असंतोष, आक्रोश और बेचैनी का दौर था जिसे अनगिनत राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय घटनाएं प्रेरित एवं प्रभावित कर रही थीं। वस्तुत : तिलक और गांधी के स्मृति निर्माण की काव्य राजनीति नेहरू युगीन स्मृति लोप की राजनीति का सृजनात्मक जवाब है। इस कविता से यह प्रेरणा मिलती है कि पुराने दौर की तरह आज भी राष्ट्रीय मुक्ति और वर्ग मुक्ति का सवाल एक दूसरे से अलग नहीं है, बल्कि नवउपनिवेश ने राष्ट्रमुक्ति के प्रश्न को जीवनमरण का प्रश्न बना दिया है। कहना न होगा आधुनिक सभ्यता की भूलने की राजनीति का विश्लेषण और याद करने की राजनीति का मार्ग अन्वेषण फैंटेसी कला रूप के द्वारा ही संभव है।
        मुक्तिबोध के लिए जनमुक्ति का प्रश्न राष्ट्रमुक्ति से जुड़ा हुआ है तथा राष्ट्रमुक्ति और जनमुक्ति का संयुक्त प्रश्न मध्यवर्गीय चेतना की मुक्ति से है। मुक्तिबोध को इन प्रश्नों का हल सभ्यता मुक्ति में दिखता है। उन्हें मालूम है कि पूंजीवादी राष्ट्रराज्य दमनकारी है। वह पश्चिमी आधुनिकता के विजय रथ पर आरूढ़ है। कविता में मौजूद पागल का रूप आधुनिकता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। आधुनिकता के उजाले में जिसे पागल साबित किया गया है '' अंधेरे में '' वह जागरित बुद्धि और आत्मोद्बोधमय है। वस्तुत: आधुनिकता के भीतर विद्रोही, विसंगत, स्वप्नमय मनुष्य के लिए कोई जगह नहीं है। उस कथित पागल विद्रोही को पता है कि पूरा मध्यवर्ग इतना मूल्यहीन है कि वह उदर भरने के लिए आत्मा बेचता है, भूतों की शादी में कनात सा तनता है, व्यभिचार का विस्तर बनता है, दुखों के दागों को तमगों सा पहनता है, असंग बुद्धि और निष्क्रिय जीवन शैली के साथ दिन - रात अपने ही ख्यालों में मग्न रहता है। इसलिए आधुनिकता के उजाले ने उसे खारिज कर दिया है। बिना सभ्यता मुक्ति के मनुष्य को कथित पागलपन और विखंडित व्यक्तित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता है।
         मुक्तिबोध के मध्यवर्गीय काव्य नायक की समस्या केवल बाह्य औपनिवेशिक आधुनिकता नहीं है बल्कि आंतरिक गढ़वाद और मठवाद भी है। सच्ची जनमुक्ति और जनक्रांति के लिए , अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। तोडने होंगे ही मठ और गढ़ सब। पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार। तब कहीं मिलेगी हमको नीली झील की लहरीली थाहें। जिसमें कि प्रतिपल कांपता रहता,अरुण कमल एक। '' अंधेरे में '' कविता में मौजूद प्रकृति की संवेदन सघनता तथा पुरानी इमारतों, मठों, गढ़ों की जर्जरता हमारे सामने एक वैकल्पिक सभ्यता निर्माण का मानचित्र उपस्थित करती है।
        मुक्तिबोध ऐेसे दौर के कवि हैं जिनके सामने रूप,भाषा और काव्यजीवन से जुड़ी दोहरी चुनौतियां थीं। एक तरफ  प्रगतिवादी साहित्य का एकांगी यथार्थ बोध तथा दूसरी तरफ  नई कविता का संत्रासमूलक व्यक्तिवाद। मुक्तिबोध ने इन दोनों चुनौतियों का हल अपनी कविता में प्रस्तुत किया। इसके लिए उन्हें कला संघर्ष, आत्म संघर्ष और युग संघर्ष तीनों करने पड़े। मुक्तिबोध कला में जिस सौंदर्य अनुभव और जीवनबोध को लाना चाहते थे, इसके लिए आधुनिकता और उसका यथार्थवाद दोनों दमनकारी और अपर्याप्त थे। वस्तुत: यह कला नियम की अपर्याप्तता पश्चिम के ज्ञानोदय, नवजागरण, विज्ञानवाद और आधुनिकता संबंधी धारणा सेे पैदा हुई थी जो पुरानी औपनिवेशिक सत्ता के दौरान भारतीय समाज का पूर्ण यथार्थ बन चुकी थी।
        आधुनिकता की कुछ बुनियादी समस्याएं हैं, संपूर्णता पश्चिमी वैश्विक मूल्य, पूंजीवादी महाआख्यान, वस्तुनिष्ठ विज्ञानवादी ज्ञान, सांस्कृतिक अभिजातवाद, राष्ट्रराज्य, उपभोक्तामूलक जीवन शैली, व्यक्तिवाद आदि। मुक्तिबोध अपने कला रूप फैंटेसी,काव्यभाषा, जीवनबोध और विचारधारा के माध्यम से इस कविता में इन समस्याओं का हल ढूंढ़ते हैं। अचेतन मन के इलाके में कवि का संवेदन उद्देश्य यही है। सभ्यता संकट इतना गहरा है कि विचार और सौंदर्य अनुभव की जमीन पर समाज लगभग अघाया हुआ दिख रहा है। कविता संतृप्त समाज के सामने पूंजीवाद द्वारा चलाए जा रहे सांस्कृतिक - आर्थिक अभियान के अचेतन की राजनीति का तिलस्मी द्वार खोलती है। दुर्भाग्य से मार्क्‍सवादी चिंतन इस पक्ष की सर्वाधिक उपेक्षा करता है जिसका शिकार हिंदी आलोचना है। आज कला और संस्कृति की राजनीति वस्तुत: अचेतन की राजनीति है।
        आधुनिकता उपनिवेशित मध्यवर्गीय अचेतन के काव्य नायक के स्वप्न नायक में व्यक्तित्वांतरित होने तथा जनक्रांति का नायकत्व प्रदान करने की समस्या बहुत गहरी है। इसके दो बड़े कारण हैं, एक तो सत्ता द्वारा दमन अभियान, दूसरी मध्यवर्ग की भूमिका। मध्यवर्ग जनक्रांति के समय कविता में दो रूपों में मौजूद है।
        जनमुक्ति की सबसे बड़ी समस्या राष्ट्रराज्य का दमन अभियान है। सत्ता के दो रूप हैं। वह अंधेरे में दमन करती है तथा उजाले में लोकतंत्र का कारोबार। जनक्रांति के दमन निमित्त मार्शल लॉ की यात्रा दिल दहला देने वाली है। निस्तब्ध नगर की मध्य रात्रि में बैंड बाजे के साथ जुलूस चल रहा है। आधुनिक सभ्यता के '' अंधेरे में ''  काव्य नायक को कोलतार की सड़क मरी हुई खिंची हुई काली जिह्वा तथा खंभे पर टंगे बिजली के बल्ब मरे हुए दांतों का चमकदार नमूना लगते हैं। चमकदार बैंडदल अस्थि रूप, यकृत स्वरूप, उदर आकृति और उलझी हुई आंतों के जालों जैसा विरूपित है। इस शोभायात्रा में संगीन नोकों का चमकता जंगल चल रही पदचाप तालबद्ध दीर्घ पात टैंक दल, मोर्टार, आर्टिलरी,सन्न धीरे - धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना जैसा दृश्य है। इस जुलूस में कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल, सेनापति, अध्यक्ष, मंत्री, उद्योगपति सभी शामिल हैं। इससे ज्यादा डरावनी बात काव्य नायक के लिए यह है कि जुलूस में पत्रकार, प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण भी शामिल हैं। विडंबना तब चरम पर पहुंच जाती है जब उनके साथ शहर के हत्यारे कुख्यात डोमाजी उस्ताद की सक्रिय सहभागिता जगमगाती हुई दिखाई पड़ती है। सत्ता के साथ मध्यवर्गीय बौद्धिक का यह अनैतिक, मूल्यहीन गठबंधन ही जनक्रांति में बाधक है। काव्य नायक की त्रासदी है कि दिन के दफ्तरों में नग्न हो जाने के डर से यह बौद्धिक वर्ग उसे अंधेरे में खत्म कर देना चाहता है। काव्य नायक को संकट की गहरी पहचान है। गहन मृतात्माएं इसी नगर की हर रात जुलूस में चलतीं परंतु दिन में बैठकर हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र विभिन्न दफ्तरों, कार्यालयों, केंद्रों में घरों में।
         काव्य नायक के स्वप्न नायक में एकाकार होकर शुरू की गई जनक्रांति प्रक्रिया की दूसरी बाधा मध्यवर्ग की तमाशबीन भूमिका है। उसकी तटस्थता और उदासीनता के ठोस कारण हैं। मुक्तिबोध को इस संकट की भी प्रामाणिक पहचान है। बौद्धिक वर्ग का जब श्रमजीवी वर्ग से रिश्ता कट जाता है तब वह जन मन उद्देश्य से भटक जाता है। आजकल मध्य वर्ग कलम और कुदाल, शब्द और श्रम, ज्ञान और कर्म की फांक से गुजर रहा है। हिंदी जनता गन प्वाइंट पर है और हिंदी साहित्य पावर प्वाइंट पर है। काव्य नायक की मान्यता है कि बौद्धिक वर्ग क्रीतदास है, उसके विचार किराए के हैं तथा अपनी काली करतूतों में इतना डूब गया है कि चेहरे पर स्याही पुत गई है। जब बौद्धिक वर्ग रक्तचूसक सत्ता से नाभिनाल बंध जाता है तब जनक्रांति पर संकट अवश्यंभावी है। काव्य नायक हैरान है कि ऐसे कठिन वक्त में साहित्यकार चुप हैं और कविजन निर्वाक। चिंतक, शिल्पकार, नर्तक सबके लिए बदलाव एक ख्याली गप है, कोरी किंवदंती है। ऐसा इसलिए है। रक्तपाई वर्ग से नाभिनाल बद्ध ये सब लोग नपुंसक भोग - शिरा - जालों में उलझे प्रश्न की उथली सी पहचान प्रवाह से अनजान।
        '' अंधेरे में '' की महत्वपूर्ण चिंता मिथ्या चेतना से लैस काव्य नायक को वर्ग चेतना से युक्त करना है। कविता में एक मध्यवर्गीय कलाकार की असंग मृत्यु का क्या अर्थ संकेत है ? जब शिशु फूल के गुच्छ से रायफल में बदलता है, ठीक उसी वक्त एक एकांतप्रिय कलाकार की हत्या हो जाती है। काव्य नायक '' अंधेरे में '' टार्च फैलाकर देखता है, तो उसे खून भरे बाल में उलझा माथा, भौंहों के बीच में गोली की सुराख, होठों पर कत्थई धारा, फूटा चश्मा दिखाई पड़ता है। सचाई थी सिर्फ  एक अहसास वह कलाकार था। गलियों में अंधेरे का हृदय में भार था। पर कार्यक्षमता से वंचित व्यक्तित्व चलाता था अपना असंग अस्तित्व किंतु न जाने किस झोंक में क्या कर गुजरा कि संदेहास्पद समझा गया और मारा गया वह बधिकों के हाथों। वस्तुत: असंग अस्तित्व की खोज में जनविमुख कलाकार और कोई नहीं काव्यनायक का मध्यवर्गीय बौद्धिक अचेतन है। आज का मध्यवर्गीय बौद्धिक बाजार संस्कृति और बजरंग संस्कृति, सत्ता संस्कृति और जन संस्कृति, मार्शल लॉ और जनसंघर्ष, क्रांति और भ्रांति, आधुनिकता और बर्बरता, मध्यकालीनता और उत्तरआधुनिकता के विभ्रमकारी भंवर में इस कदर फंस गया है कि उसका असंग व्यक्तित्व आसन्न विध्वंस की ओर मुखातिब है। यह पुराना प्रश्न है कि कला, कला के लिए होनी चाहिए या कला जीवन के लिए। नया जवाब है कि अब कला जीवन के लिए नहीं, जीवन - यापन, आत्म विज्ञापन और ब्रांड सत्यापन का अंग बन गई है। तब मुक्तिबोध और '' अंधेरे में '' की सार्थकता और बढ़ गई है।
         '' अंधेरे में '' कविता फैंटेसी रूपक द्वारा संस्कृति के अचेतन के राजनीतिक प्रतिमानों का निर्माण करती है, मानव अचेतन पर हो रहे दमन, अधिग्रहण और अतिक्रमण का विरोध करती है। काल्पनिक अचेतन में भाषा के नए सृजनशील संसार का आह्वान करती है तथा अधूरे यूटोपिया को पूर्ण स्वप्न में बदल देने का मानचित्र बनाती है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि आलोचक साहित्य का दारोगा होता है। '' अंधेरे में '' कविता आधुनिक सत्ता, व्यवस्था और सभ्यता से नाभिनाल बद्ध आलोचक की दारोगाई चेतना को अपने काव्य रूप, काव्य वस्तु और विचार धारा से कटघरे में खड़ा कर देती है। दुनिया न कचरे का ढेर कि जिस पर दानों को चुगने चढ़ा हुआ कोई भी कुक्कुट, कोई मुर्गा यदि बांग दे उठे जोरदार बन जाए मसीहा।
        क्या वर्तमान दुनिया कचरे के ढेर में नहीं बदल गई है! तब क्या मुमकिन नहीं कि कोई मुर्गा जब चाहे ढेर पर दाना चुगने चढ़े और जोरदार बांग देकर मसीहा बन जाये! आजकल तो ऐसा है।

चेहरा

मोनी सिंह

         सुबह उठते ही शीशे में मैं अपना चेहरा देखा करती हूं। हर दिन की शुरूआत मेरी वही से होती है। जिस दिन न देखूं कुछ अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे मैने खाना न खाया हो। किसी से बात करने का मन नही होता। अजीब से ख्याल आते मेरे मन में। राम जाने आज क्या होगा ? आज के दिन तो मैने अपना चेहरा शीशे में नही देखा। यही सोचकर मैं कालेज में प्रेक्टिकल देने जा रही थी। मां ने बड़े प्यार से लंच पैक किया था। घर से निकल कर बस स्टाप के लिए रिक्शा लेने को खड़ी थी। काफी देर से कोई रिक्शा वाला तैयार नही होता, जो होता पैसे ज्यादा मांगता। प्रेक्टिकल के लिए देरी हो रही थी।
         तभी मैने एक रिक्शे वाले को रूकाया बस स्टाप चलने को कहा। उसने हां कर दिया। बड़ी खुशी से मै जैसे बैठी। तभी, मैडम 30 रुपए लगेगें।
         मेरे तो होश उड़ गए थे। 15 रूपए की जगह 30 रूपए मांग रहा है, हलकट कहीं का। जैसे मैं बैठी वैसे ही रिक्शे से नीचे उतर आई।
        एक बार दिल मे ख्याल आया चलो पैदल ही चलते हैं। इतनी देर में तो बस स्टाप क्या कॉलेज पहुंच जाते।
मन में एक बात बार - बार मचल रही थी। अपना चेहरा क्यों नही देखा। जल्दी - जल्दी में क्यों भूल गई। इतनी देर से यहां खड़ी हूं। 2 मिनट वहां नही दे सकती थी।
        उदास मन लिए तेजी से पैदल बस स्टाप के लिए चल दिया। समय भी कम था। वहां पहुंचकर बस का इंतजार भी करना था।
        मैं पैदल चल रही थी तभी पीछे से गाड़ी का हार्न सुनाई पड़ा। और मेरे बगल में आकर गाड़ी रूक गई। हेलमेट होने की वजह से मैं उसे पहचान न सकी थी।
         मैने अपना कदम और तेजी से बढ़ा दिया। ऐसे लोगों का काम होता है सरे राह अकेली लड़की देखी, छेड़ दिया।
         तभी उस लड़के की आवाज आती है- रानी पहचाना नही क्या ?''
        अपना नाम सुनकर मै थोड़ा हैरान रह गई। पीछे मुड़कर देखा तो मेरे भाई का दोस्त था। जो कभी एक या दो बार घर आया था।
         वह मेरे पास आया और बोला - कहा जा रही हो। पैदल ही।'' अपनी परेशानी मैंने उसे बताई '' रिक्शा नही मिल रहा है। आज कॉलेज में प्रैक्टिकल है। देर हो रही थी इसलिए पैदल बस स्टाप जा रही हूं।''
- चलो मै छोड़ देता हूं। उधर ही जा रहा हूं।'' बस स्टाप पहुंचकर मैने उसे '' शुक्रिया '' कहा। अब बस का इंतजार था।
         इंतजार की घड़ी की फिर से शुरूआत हो चुकी थी। आधे घण्टे बीत चुके थे। अब क्या होगा ? प्रैक्टिकल शुरू होने में सिर्फ  45 मिनट बचे थे। मै नरबस होती जा रही थी। ऐसा लग रहा है कि अब तो ये साल गया अगले साल फिर इसी क्लास में गुजारना पड़ेगा। उलझन से इधर से उधर क्या करूं ? भाई भी घर पर नही था कि फोन कर लेती।
        सिर नीचे किए मैं वही पर बैठी थी। तभी एक नया करिश्मा होना था। कोई आवाज आई - तुम अभी तक यहीं हो। पेपर नहीं देना क्या? कब से पेपर शुरू है? मुझे लग ये आवाज भगवान की तो नही है। ऊपर चेहरा किया तो आदित्य मेरे भाई का दोस्त था। वहीं से गुजरा।
        जिसने मुझे बस स्टाप छोड़ा था। पीठ पर बैट टांगे लगता है कही क्रिकेट खेलने जा रहा है। मैंने कहा - पहले रिक्शा अब बस नहीं मिल रही है।
- चलो कॉलेज छोड़ देता हूं।''
- नहीं आप जहां जा रहे है, आपको देर हो जाएगी।''
- कोई बात नहीं पर तुम्हारा पेपर तो छूट जाएगा। मेरे देर से पहुंचने के बाद भी काम चल जाएगा।''
         मैं उसके साथ गाड़ी पर बैठ गई। टोपी लगाए हुए, लम्बे बाल, सफेद लोवर और टी शर्ट पहने। आदित्य ने कॉलेज के सामने हमें उतारा। और कहा - दो तीन घण्टे बाद मैं वापसी करूंगा। अगर पेपर हो जाए तो साथ चल लेना। मेरा नम्बर ले लो। बता देना मुझे।''
        नम्बर को लेकर मै कॉलेज चली गई। वहां अपनी सहेली रीता से सारी बात बताई - यार आज का दिन तो मेरे लिए तो खतरनाक था। रोज मैं अपना चेहरा शीशे मे देखकर निकलती थी। आज जल्दबाजी में भूल गई। न रिक्शा मिल रहा था। न बस वो तो आदित्य मिल गया तो आ गई नही तो पेपर नही दे पाती।''
- अरे क्या बात है, बहाना अच्छा है। अपने ब्यायफ्रेंड के साथ घूमने का।''
- अरे नही कहां ले जा रही हो बातों को। मेरे भाई का दोस्त है। एक दो बार घर गया है।''
- ओह, तो घर भी हो आया है। रानी तेरी तो कहानी शुरू हो गई।''
- अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं।''
- तो कैसी बात है, मेरी जान। '' हम दोनों हँसने लगे।
        तभी घण्टी की आवाज सुनाई देती है। प्रैक्टिकल शुरू हो गया था। दो घण्टे बाद हम बाहर निकले तो सोंचा कि फोन कर ले। लेकिन तब तक बस आ गई थी। तो उसी से लौट आए। घर आकर मैंने मम्मी को सारी बात बताई। चलो भला हो उसका जो उसने छोड़ दिया नहीं तो पेपर छूट जाता। मैंने मां से कहा - उसे मैंने पहचाना नहीं था।''
        उस रात मुझे नींद नही आ रही थी। पूरी रात उस घटना के बारे में सोचती रही। सबसे ज्यादा तो रीता की बातों को। और हंसती रही। उसके लम्बे बाल, वो टोपी लगा कर रखना। क्या लग रहा था। खैर, रात बीत गई किसी तरह। दूसरे दिन रीता का फोन आया। हाल - चाल पूछने के बाद उसने कहा - तुम्हारे उनका क्या हाल है।'' मेरी जुबान से न चाहते हुए भी निकल गया - ठीक है। '' तभी उसने कहा - अभी कल कह रही थी कुछ नहीं है और आज कह रही हो ठीक हैं।'' मैं बातों को बनाने लगी। पर वो एक न मानी।
         सच्चाई ये थी कि कुछ नही था। लेकिन उसकी बातों को सुनकर कुछ जरूर होने लगा था। फोन कटते ही याद आया कि अरे, मैं कितनी अहसान फरामोश हूं। शुक्रिया तक नहीं किया उसका। चलो, ये तो एक बहाना था। बात करने का। फोन किया पर कोई जवाब नहीं। गुस्सा आया कोई परवाह ही नहीं। जैसे मैं कोई रोज फोन करती हूं उसे।
        दिन में भी ख्याल शुरू हो गए थे। तबी फोन की घण्टी सुनाई देती है। फोन उठाते ही - हैलो, कौन।'' उधर से आवाज आई।
        मन मे सोचा कल कॉलेज छोड़ा और आज भूल गया। मैंने भी अंजान बन कहा - किससे बात करनी है।''
उसने कहा '' आपका फोन आया था।''
         कितना अजीब बंदा है नम्बर भी सेव नही किया था। फिर मैंने कहा ' रानी बोल रही हूं। कल आपने कॉलेज छोड़ा था। याद आया।''
- हाँ, बताओ, रानी पेपर कैसा गया।''
- ठीक गया। मैंने सोचा शुक्रिया अदा कर दे आपका। आप न आते तो पेपर छूट गया होता।''
         फोन कट चुका था। शायद बैलेंस खत्म हो गया था। बात पूरी नहीं हो सकी थी। दिल में बहुत कुछ था। उस दिन से ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं खो चुकी हूं। अब न तो चेहरा देखने की फिकर नहीं थी। दिल में जो आदित्य का चेहरा उतर गया था। अब हर दिन उससे बात करने का मन होता था। वो नासमझ इससे अंजान था। उसे क्या फर्क उसे क्या पता कि कोई उसके फोन का इंतजार कर रहा हैं।
         काफी दिन हो गए थे मेरी बात उससे नहीं हुई थी। परेशान खोई, मैं कोई बहाना तलाश रही थी। पर साला बहाना ढूंढो तो नहीं मिलेगा। आखिर वो दिन आ ही गया। बहाने का दिन। मेरा जन्म दिन था।
        मैने मां पूछकर आदित्य को बुलाया था।
         शाम को मेहमान आने से ज्यादा मैं आदित्य का इंतजार कर रही थी। निक्कमा कहीं का। अभी तक आया नहीं। समय की कोई परवाह नहीं है।
        मेहमान आ गए थे। केक भी कटने जा रहा था। तभी पीछे से हैप्पी बर्थ डे की आवाज सुनकर मुड़ी तो देखा आदित्य खड़ा था। खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। केक पर चाकू नहीं चल रहा था वो अब दौड़ने जा रहा था। केक काटकर मां को खिलाया। और लोगों को खिलाया पर दिल कह रहा था सबसे पहले आदित्य को खिलाऊं पर चाहते हुए भी न कर सकी।
        तभी फोटो खींची जा रही थी। मैंने भी मोबाइल में उसकी फोटो खींच ली। किसी को पता न चले और न ही उसको की मैंने फोटों खींची है उसकी।
        सब खाना खाकर जा रहे थे। दिल कह रहा था कि आदित्य को रोक लूं। थोड़ी देर बाद जाए पर कैसे रोकूं। वो तो तैयार बैठा था, घोड़े पर। वो चला गया था। अब उसकी फोटो मेरी पास थी। उसका एक चेहरा मेरे पास था। जिसे देखने के लिए मैं बेचैन रहती थी।
        अब क्या था ? अपने चेहरे को देखना छोड़ सुबह मोबाइल में उसका चेहरा सामने देखती थी। इस पूरे बात से आदित्य अंजान था। पर उस दिन से मैं उसे बेपनाह चाह रही हूं। अब ऐसा लगता है कि उसका चेहरा ही सब कुछ है। न देखो तो दिन नहीं जाता सही से। फर्क इतना था कि पहले शीशे में अपना चेहरा देखती थी और आज मोबाइल पर हर रोज आदित्य का।
        इस इंतजार में कि उसे इस बात की खबर हो जाए। वो मुझसे बात करना शुरू कर दे। कभी - कभी तो अपने आसूंओं से तकिए को गीला कर देती थी।
         चेहरे के साथ मेरी सारी दिन चर्या बदल गई थी।

जेबकतरा

भूपेन्‍द्र कुमार दवे


        उसे तो उसके मामा - मामी अपने पास ले गये थे। चलो, उसे देखनेवाला कोई तो मिला। यह कहती भीड़ बाढ़ के गंदे पानी की तरह नालों की तरफ  रुख कर बह गई।
        बंटी पलने लगा, बढ़ने लगा, अपने इर्द - गिर्द फैले स्वार्थ के कीचड़ में धँसते हुए। पहले तो उसे स्कूल में दाखिला दिला दिया गया और इस जानकारी के फैलते ही जैसे शिक्षा ग्रहण कराने की खानापूर्ति की जा चुकी थी। शिक्षा से हटकर जीवन की पायदान पर पैर रखना बंटी को अल्हड़ बनाने लगा था, या यह कहें कि वह उचक्का भी बनने लगा था। उसकी माँ होती तो कहती - बेचारा मन लगाकर काम नहीं करता है। उसे तो हर वक्त जल्दी मची रहती है। समय उसे अच्छा बना देगा। लेकिन मामी ने इसके लिये गाली भरी उलहना देना अपना लिया था। गाली देने की आदत व्यवहारिक छिछौरेपन तथा बुद्धि में ओछेपन का वृहत् रुप ही तो हुआ करती है।
माँ कभी भी अपने बेटे पर शक की निगाह से नहीं देखती। उसका अंतर्मन हर सच को जानता है,पहचानता है। सत्य की खोज में माँ को शंकारूपी मजदूरों की खोदने के लिये जरुरत नहीं पड़ती। माँ की ममता व सत्य के बीच एक अद्भुत रिश्ता होता है। लेकिन बंटी की मामी व मामा हमेशा शंका की कुल्हाड़ी लिये उसके पीछे पड़े रहते थे। इस कुल्हाड़ी के निशान बंटी की हर हरकत पर उभर जाया करते थे।
        बंटी को सामान लेने भेजा जाता और लौटकर आने पर पाई - पाई का हिसाब देना होता था। बंटी लापरवाह था ... खुद के प्रति और अपनी जिम्मेदारी के तरफ  ... कारण यह था कि वह हर काम अनमने तरीके से करता था। शिक्षा के अभाव में हर बच्चा ऐसा ही बन जाता है। यह एक तथ्य है।
         एक बार बंटी उचकता - कूदता घर पर आया। उसने मामी को हिसाब दिया। पच्चीस रुपये देने उसने अपनी मुठ्ठी खोली ... बीस का नोट तो था पर पाँच का सिक्का नदारद था। माँ होती तो कहती - कहीं गिर गया होगा। चल, फिकर मत कर। हाथ - पैर साफ  कर आ। खाना खा ले।
         पर यहाँ तो मामी के मुँह से निकली गाली के पहले लफ्ज के साथ पड़े झन्नाटेदार थप्पड़ के पड़ते ही बंटी भाग खड़ा हुआ। घर से बाजार तक की सड़क उसने दो बार छान डाली। जब वह सब्जीवाले के ढेले के पास तीसरी बार पाँच का सिक्का ढूँढ़ने पहुँचा तो सब्जीवाला बोल पड़ा - बेटा! क्या ढूँढ़ रहे हो? कुछ खो गया है क्या?
- हाँ, पाँच का सिक्का जो तुमने दिया था वह कहीं गिर गया है? यह जवाब देते समय बंटी का अंत: अपने किये गुनाह को याद कर रो पड़ा। सब्जीवाला ने कहा - बस एक पाँच के सिक्के के लिये अपने कीमती आँसू बहा रहे हो।
- मेरी मामी का गुस्सा तुम नहीं जानते। बंटी बोल पड़ा।
- अच्छा, यह लो पाँच का सिक्का, अब रोना नहीं। यह कह उसने बंटी को सिक्का पकड़ा दिया।
        बंटी करीबन दौड़ता हुआ खुशी से भरा घर आया और उसने अपनी नन्हीं मुठ्ठी में रखा सिक्का मामी को दिखाने लगा। तभी गाली उगलता एक झन्नाटेदार तमाचा उसे लगा। वह गिर पड़ा।
- अब ये पैसे कहाँ से चुरा लाया? मामी चिल्लाई।
          बंटी का रोना सुन मामाजी आ गये और पूछा - अब क्या हो गया? मामी ने पाँच रुपये के गुम हो जाने से लेकर बंटी के हाथ में वापस आये तक की कहानी एक साँस में बयाँ कर दी। वह बोली पाँच का सिक्का सड़क पर गिरा नहीं था। वह भाजी में फँसा मिल गया है और जो सिक्का बंटी लेकर आया है वह कहीं से चुराकर लाया जान पड़ता है। बंटी पर चोरी का इल्जाम लगा देख मामाजी ने बंटी की धुनकाई चालू कर दी।
जब अति हो चुकी तो बंटी ने सुबकते हुए सफाई दी। वह बोला - मैं सिक्का ढूँढने गया था। तब सब्जीवाले को मुझ पर दया आयी और उसने यह दूसरा सिक्का मुझे दिया था। आगे वह कहना चाहता था कि दूसरा सिक्का चोरी का नहीं है, परन्तु तभी मामाजी बंटी का कान मरोड़ते नया इल्जाम लगा दिया - तो अब सड़क पर जाकर भीख भी माँगने लगा है।
         मामाजी उसे खींचकर बाहर लाये - चल, बता किस सब्जीवाले से भीख माँगकर सिक्का लाया था। वे बाजार पहुँचे, पर तब तक सब्जीवाला अपना ठेला लिये अन्यत्र चला गया था। मामाजी तो अब बौखला उठे और बंटी पर घूँसे बरसाने लगे।
- माँ कसम! वह सब्जीवाला यहीं पर था। अब कहीं चला गया होगा। बंटी ने कहा।
- अब तू झूठी कसम खाना भी सीख गया है। माँ की कसम खाता है। राक्षस! तू माँ को खुद चबा गया और स्साला अब उसकी ही कसम खाता हैं। चोर कहीं का!
- चोर कहीं का। यह शब्द मामाजी ने जानबूझकर जोर से कहा था।  जिसे सुन भीड़ तैश में आ गई। तैश में आयी भीड़ शैतान की टोली बन जाती है। जिसको मौका मिला, उसने बंटी को लात, घूँसे जड़ दिये। बेचारा जमीन पर गिर छटपटा रहा था और लोग उसे बेरहमी से पीटे जा रहे थे।
         तभी ईश्वर ने पिटते नन्हें बंटी पर दया का नाटक रचते हुए उस सब्जीवाले को भीड़ की तरफ  ढकेला। सब्जीवाला पिटते बच्चे को तुरंत पहचान गया। वह आगे बढ़ा और मामाजी से पूरी बात सुनकर बोला - मैंने ही पाँच का सिक्का दिया था। ये बच्चा सच कह रहा है। मात्र पाँच का सिक्का नहीं मिलने पर वह रो रहा था। वह डरा हुआ था। मुझे उस पर दया आयी और उसे मैंने उसे सिक्का दिया। दया आना अगर गुनाह है तो आप मुझे पीटिये। इतनी सी छोटी रकम के लिये इस छोटे बच्चे को पीटना आपको शोभा नहीं देता। इस उम्र के बच्चे को प्यार की जरुरत होती है।
          परन्तु मामाजी को सब्जीवाले के ये वाक्य कडुवे लगे। वे कहने लगे - क्यों बे, अब हमारी बुराई सब जगह करता फिरने लगा है? शहर में सबको बताता फिरेगा कि तुझे हम प्यार नहीं करते। घर चल, अभी तेरी अच्छी खबर लेता हूँ।
         लेकिन मामाजी के ये सारे शब्द दब गये। कोई भीड़ को चीरता चिल्लाता आ रहा था - कहाँ है वो जेबकतरा ...?
         यह आवाज भीड़ की आखरी कतार में खड़े एक महोदय की थी, जो सब्जी लेकर आगे बढ़ चुके थे। परन्तु वहाँ जब उन्होंने अपनी जेब को टटोला तो उनका पर्स गायब हो चुका था। उनका जेब काट लिया गया था। वे पलटे और भीड़ को चीरते अंदर आ गये। वे चक्रव्यूह भेदने की कला के अच्छे ज्ञाता जान पड़े और उन्होंने आनन - फानन दो - तीन लातें बंटी को लगा दी।
         तभी भीड़ में से एक सज्जन बोले - आपका जेबकतरा और कोई होगा जनाब। यह लड़का तो अभी - अभी उन महाशय के साथ आया था। आप तो यहाँ से खरीदी कर बहुत पहले ही चले गये थे।
- और क्या? एक अन्य व्यक्ति ने कहा - सच है। जब इस बच्चे को यहाँ लाया गया था तो आप महोदय आठ ठेले पार जा चुके थे।
         पर यह सुन शर्मिंदा होने के बजाय उन महाशय ने एक जोरदार लात बंटी के जबड़े पर लगाई और बड़बड़ाया - जेबकतरे कोई भी हो उसे सजा तो मिलनी ही चाहिये। उधर बंटी के मुँह से खून निकलता देख भीड़ में झूमा - झपटी मच गई और बाहर भागते महोदय का थैला उनके हाथ से छूटकर नीचे गिर पड़ा। आलू के बीच में पड़ा उनका पर्स छाँक रहा था।
- ये रहा वो पर्स जिसके लिये आपने उसे लात मारी। चलिये महोदय, उस बच्चे से माफी माँगिये।
वे माफी किससे माँगते? बच्चा भीड़ के बीचोंबीच बेहोश पड़ा था। उसके मुँह से खून बह रहा था।
- बुलावो, उस कमीने को जिसने इसके जबड़े पर लात मारी थी। घृणा की लपटें विकट होने लगी। मौका पाकर मामाजी भी भाग चुके थे। बंटी की साँसें थम चुकीं थी। बेचारा,बिना माँ - बाप का था। किसी ने कहा।
          भीड़ लहरों की तरह एक बार आगे बढ़ी और फिर शनै: शनै: छटने लगी। बंटी बाजार बीच पड़ा था, एकदम शांत और उसके इर्दगिर्द पड़े थे तरह - तरह के रंग - बिरंगी नोट और नोटों के बीच पाँच के असंख्य सिक्के अपनी चमक बिखरते शांत मुद्रा में आकाश को निहार रहे थे।
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43, सहकार नगर, रामपुर,
जबलपुर (म.प्र.)
मोबाइल :  09893060419

ओते की कहानी

रविकांत मिश्रा

         खरखाई नदी के किनारे बसा मेरा गांव कुलुपटांगा, जहां एक मिट्टी खपरैल के घर में मेरा जन्म हुआ था। होश सम्भालते ही मैंने अपने आपको रंग बिरंगे मुखौटो के बीच खेलते देखा था। उन मुखौटो से मैं बातें करती थी। उसे अपने सिर पर उठा कर घर में इधर - उधर भागती थी। मुखौटा मेरे लिए खिलौना भी था और मेरे बचपन का साथी भी। बाबा और मां मुखौटा बनाने का काम करते थे। बाबा और मां के बनाये मुखौटे छऊ नृत्य करने वाले आकर ले जाते थे, बदले में बाबा के हाथ कुछ रूपये रख जाते थे। बाबा के बनाये मुखौटे हमारे घर के दिवार पर इस तरह टंगे रहते की कभी - कभी ऐसा लगता कि हमारे घर की दिवार मुखौटो की दिवार है, घर के भीतर चारों तरफ मुखौटे ही मुखौटे, इन मुखौटे में जानवर, देवता और मनुष्य के मुखौटे थे। मेरा बचपन इन मुखौटो के बीच पल रहा था, बढ़ रहा था। तभी मेरे भाई का जन्म हुआ। रात जब उसके रोने की आवाज मेरे कानों में पड़ी तब मैं गहरी नींद में सो रही थी। उसके जोर - जोर से रोनेे के कारण मेरी नींद खुल गई थी। मैं अलसाई आंखों से खाट पर उठ बैठी। सामने दरवाजे पर बाबा बैठे लम्बी सी बीड़ी पी रहे थे। दूसरे कमरे से बच्चे के रोने की आवाज लागातार आ रही थी। मैंने अपनी तोतली जुबान से बाबा से पूछा - बाबा यह कौन लो रहा है? बाबा बीड़ी का धुआं मुंह से बाहर फेंकते हुए बोले -  ओते तुम्हारा भाई आया है। अब तुम्हे उसे खिलाना है, उसके साथ खेलना है। इतना सुन मैं तेजी से खाट से नीचे उतर गई थी और अपने भाई को देखने के लिए तेजी से उस कमरे के भीतर भागी, जहां गांव की औरतें जोर - जोर से हंस की बातें कर रही थी। मैं जब उस कमरे के भीतर पहुंची तो देखी मेरा भाई खाट में मां के बगल में सोया हुआ दूध पी रहा था। गांव की औरतों में से एक औरत दाईमनी मुझे गोद में उठाकर बोली - ओते देख तेरा भाई आया, बिल्कुल तेरे जैसा नहीं है। बिल्कुल अपनी मां पर गया है। तु तो अपने बाबा पर गई है। अब तु अकेले मुखौटो से नहीं खेल पायेगी। अब तेरा भाई भी मुखौटो से खेलेगा। मेरा मासूम भाई खाट पर किसी देवता की तरह सो रहा था। उसका चेहरा देवता वाले मुखौटो से बहुत मिलता जुलता था। मैंने झट से दिवार पर नजर डाली तो सामने एक कतार से देवता के मुखौटे लगे हुए थे। मैं तोतली जुबान में बोली - इसका चेहला तो उस देवता वाले मुखौटे से मिलता है। इस पर गांव की औरते खिल - खिलाकर हंसने लगी थी। दाईमनी मेरा माथा चुमते हुए बोली - हां ओते, तेरा भाई देवता जैसा ही है, पर तुझे इसकी देख - भाल करनी होगीं करेगी न देखभाल अपने भाई की?  मैंने सहमति से सिर हिला दी थी। एक वो रात थी आज से चैबीस साल पहले और आज एक रात है बहुत कुछ बदल चुका है। घर की दिवारे खाली है। एक भी मुखौटा नहीं है। बाबा की आंखे देखना बन्द कर दी। मां इस दुनियां से चली गई। पांच वर्षों से बाबा ने कोई मुखौटा नहीं बनाया। रिमिल मेरा भाई एक रात जंगल की तरफ भागा तो फिर वापस नहीं आया। बाबा घर पर अकेले रहते। पड़ोस की काकी बाबा का खाना बना देती थी। मैं साल में एक बार गांव लौटती तो यह खरखाई नदी, यह पहाड़, बांस के जंगल, यह सागवान के पेड़, यह पुटुस की झाड़ी, यह पलास के फूल, यह तलाब में तैरते हंस के जोड़े सभी मुझसे यह सवाल पूछते - तुम हमारे पास आकर बार - बार क्यों वापस चली जाती हो? अब बाबा के पास रहो। हमारे साथ रहो। अपने जल, जंगल जमीन के साथ रहो, और इस बार कुछ ऐसा ही हुआ, मैं हमेशा के लिए वापस चली आई। भूदेव दा के घर से हमेशा के लिए वापस। मेरे वापस आने में मेरी इच्छा थी। जबकि भूदेव दा चाहते थे कि मैं उसकी पत्नी मानसी और बेटा आशिष के साथ अमेरिका चलूं पर अपने बाबा को छोड़कर सात समुद्र पार जाना मेरे लिए सम्भव नहीं था। मुझे वह दिन एक बार फिर याद आ गया जब मैं पहली बार भूदेव दा के साथ अपने गांव छोड़कर कोलकोत्ता रहने जा रही थी। हुआ यूं कि भूूदेव दा हमारे गांव फोटोग्राफी करने आये थे। गांव का मुखिया चन्दू सोरेन भूदेव दा का दोस्त था। चन्दू सोरेन भूदेव दा को लेकर हमारे घर पर आया था। वे बरसात के दिन थे। बाबा का काम बिल्कुल बन्द था। भूदेव दा ने बाबा के बनाये मुखौटो की तस्वीर ली और बदले में बाबा के हाथ कुछ रूपये रख दिये। बाबा भूदेव दा से रूपये लेकर हाथ जोड़ दिये तभी मैं और मेरा भाई रिमिल घर के भीतर से मुखौटो लगाये भागते हुए बाहर निकले। मैं मां दुर्गा का मुखौटा लगाये तेजी से आगे भाग रही थी। मेरे पीछे भैंसासुर का मुखौटा लगाये रिमिल भाग रहा था। हम दोनों शोर मचाते हुए घर के आंगन में आ गये जहां भूदेव दा बाबा और चन्दू काका के साथ खड़े थे। हम दोनों भाई - बहन छऊ नृत्य के कलाकार की तरह नाचने की नकल करने लगे। यह देख भूदेव दा फटाफट हमारी तस्वीर खींचने लगे। हम दोनों अपने खेल में मस्त थे। हमें इस बात की कोई जानकारी नहीं हुई कि भूदेव दा हमारे बचपन को हमेशा के लिए अपने कैमरे में कैद कर चुके हैं। कुछ पल तक भूदेव दा हम दोनों भाई - बहन को चुपचाप खड़े देखते रहे फिर चन्दू काका से बोले - इन बच्चों से मैं बात करना चाहता हूं। तुम अपनी भाषा में इनसे कहो कि यह थोड़ी देर के लिए खेलना बन्द करे। चन्दू काका ने हमदोनों से ऐसा ही कहा। हमदोनों खेलना छोड़कर अपनी जगह रूक गये परंतु अभी भी हमारे चेहरे पर मुखौटे लगे हुए थे। तभी बाबा की आवाज हमें सुनाई दी। ओते , रिमिल मुखौटा उतारो। देखो तुम दोनों से बात करने कौन आये हैं ? हमदोनों ने मुखौटे उतार लिए तो अपने सामने भूदेव दा को खड़ा पाया। जीन्स के पैंट और सफेद खादी के कुरते पहने आंखों पर चश्मा लगाए गले में कैमरा, कन्धों पर चमड़ा वाला बैग लटक रहा था। एक भारी भरकम चेहरे वाला व्यक्ति हमारे सामने खड़ा था। रिमिल को भूदेव दा कुछ ज्यादा अच्छा नहीं लगे क्योंकि उनके कारण हमारा खेल बीच में ही रूक गया था। वह थोड़ा गुस्से से भूदेव दा को देख रहा था। परंतु मुझे भूदेव दा महावीर कर्ण के मुखौटे जैसे लगे। बड़ी - बड़ी आंखे, लम्बा - चौंड़ा शरीर और चेहरों पर बच्चों जैसी मुस्कुराहट। तभी भूदेव दा ने हम दोनों को पास बुलाया और जेब से अंग्रेजी टॉफी निकालकर दी जो हमारे गांव की दुकान में नहीं मिलता था। हमदोनों लम्बी सी रेलगाड़ी वाली चॉकलेट कई दिनों तक तोड़ - तोड़ कर खाये और कई दिनों तक इसके रैपर को सम्भाल कर रखा। गांव के कई बच्चों ने उस चॉकलेट के रैपर को छुकर और सुंघकर अपना जीवन धन्य कर लिया। करीब दस दिनों बाद भूदेव दा फिर वापस चन्दू काका के साथ आये। हमदोनों को वही चॉकलेट दिये। मेरे सिर पर हाथ रख कर बड़े प्यार से पूछे - अपनीे तस्वीर देखोगी? हमदोनों भाई - बहन झट अपनी तस्वीर देखने को राजी हो गये। तब भूदेव दा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाल कर उसमें से हमारी भैसासुर और दुर्गा मां वाली कुछ तस्वीर निकाली। जिसे देखकर हम बहुत हंसे। हमारी हंसी में भूदेव दा भी शामिल हो गये। फिर कुछ पल बाद हमें तस्वीर देकर बाबा के पास बरगद पेड़ के नीचे चले गये। बाबा बरगद पेड़ के नीचे चन्दू काका से बीड़ी पीते हुए कुछ बातें कर रहे थे। थोड़ी देर बाद बाबा बरगद पेड़ के नीचे से उठकर घर के भीतर आये और मां से अकेले में कुछ बातें की जिसे सुनकर मां रोने लगी। परंतु बाबा धीरे - धीरे मां को कुछ समझाने की कोशिश करते रहे। मैं घर के दरवाजे पर खड़ी यह सब कुछ देख रही थी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। इधर मां का रोना धीरे - धीरे बन्द हो गया। वह एकटक मेरी तरफ  देखने लगी। मां का अपनी तरफ  एकटक देखना, मुझे अजीब - सा लग रहा था। आज तक मां मेरी तरफ  एकटकी बांधकर नहीं देखी थी। वह शाम एक तरफ  सूरज हमारे गांव के पहाड़ के पीछे छुप रहा था। दूसरी तरफ  मेरी जिन्दगी में एक नया सूरज उगने की तैयारी कर रहा था। मुझे बताया गया कि बाबा ने भूदेव दा की बीमार पत्नी के लिए मुझे उनके साथ जाने को कहा है। कुछ महीनों की बात है पत्नी जब ठीक जायेगी तब ओते को भूदेव दा वापस गांव पहुंचा देंगे। इस काम के लिए भूदेव दा ने बाबा को दो हजार रूपये हर महीने देने का वादा किया है।
         बरसात के दिन अभी खत्म हुए थे। घर की तंगी से मैं भी भलीभांति परिचित थी। पिछले एक महीने से हमारे घर में दाल नहीं बनी थी। हम बगान से साग और सरकारी स्टोर से मिलने वाली चावल ही खा रहे थे। इस बीच हम भगवान सिंगवोगा से प्रार्थना करते रहते कि हमारे घर को बीमारी से दूर रखना। नहीं तो हम अपना इलाज नहीं करवा सकते थे। दूसरे दिन सुबह आंगन में मां और रिमिल फफक - फफक कर रो रहे थे। रिमिल जमीन पर बैठा अपना सिर घुटने के नीचे छुपाये रोये जा रहा था। मां एक तरफ  अपना आंचल मुंह में दबाये धीरे - धीरे सिसक रही थी। बाबा पत्थर की मूर्ति की तरह जड़ भूदेव दा के सामने खड़े थे। मैं अपने टीन के बक्से के साथ आंगन में सिर झुकाये खड़ी आंगन की कच्ची जमीन को पैर के अंगुठे से कुरेद रही थी। रिमिल का रोना, मां का सिसकना और बाबा की चुप्पी सब कुछ मेरे भीतर गूंजने लगे। मेरी आंखों में खारे पानी तैरने लगा और दूसरे ही पल आंखो से आंसू टप - टप कर कच्ची जमीन पर गिरने लगे। मेरी जमीन पर आज मेरे आंसू मिल गये थे। जिस जमीन पर मैंने अपना बचपन देखा था आज उसी जमीन से मैं दूर जा रही थी। अपने जल, जंगल, जमीन से दूर अपने मां, बाबा और भाई से दूर। थोड़ी देर में यह सब कुछ! यह विचार मन में आते ही मैं रोते हुए चीखी - मां। और दौड़कर मां से लिपट गई। मां भी मुझे सीने से लगा ली और रोने लगी। परंतु रोने से समस्या बदल नहीं सकती थी। समस्या तो अपनी जगह पर खड़ी होकर हमारे तरफ  बिना पलक झपकाये देख रही थी। आखिर रोते - रोते मैं अपने घर से विदा हुई। भूदेव दा बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखे। भाई रिमिल जिद करने लगा कि उसे भी ओते के साथ ले चलो, परंतु बाबा ने रिमिल को समझाया - दीदी पढ़ने जा रही है। बहुत जल्द वापस आ जायेगी, तब तुम पढ़ने जाना। रिमिल रोता रहा जब गांव की कच्ची सड़क पर बस आई उसमें भूदेवदा के साथ मैं चढ़ गई। तभी रिमिल बाबा की गोद से नीचे उतर गया। तब बस आगे बढ़ गई रिमिल बस के पीछे - पीछे ओते .... ओते चीखते हुए भाग रहा था। मैं बस के पीछे लगी खिड़की से अपने भाई को अपनी तरफ भागता देख रही थी। धीरे - धीरे मेरा भाई सड़क की धूल में अदृष्य हो गया। मेरी आंखो से मेरा गांव पल - पल दूर होता जा रहा था, मेरे कान में अब भी ओते - ओते की आवाज गूंज रही थी। रिमिल मां बाबा का चेहरा बार - बार मेरी आंखो के सामने घुम रहा था। भूदेव दा खामोशी से मेरे बगल में बैठे थे। शायद उनको भी यह सब कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मैं धीरे से आंख उठा कर देखी तो भूदेव दा अपना चश्मा साफ  करते हुए दिखे। उनकी आंखे लाल हो गई थी। पूरे रास्ते हम दोनों खामोश रहे। बस तेजी से सड़क पर भागती रही।
         डरी हुई सहमी हुई हिरण की तरह मैं जब कोलकत्ता भूदेव दा के घर पहुंची तो मुझे मानसी भूदेवदा की पत्नी ने प्यार भरी नजरों से देखा और अपने पास बुलाया। मैं धीरे - धीरे उनके पास गई वह चक्के वाली कुर्सी पर बैठी थी। उसके पीछे एक गोरा लड़का खड़ा था जो कुर्सी को पीछे से धक्का लगाकर कमरे में लाया था। मानसी काकी मेरे सिर पर हाथ रखते हुए बोली बेटी यह कोलकात्ता है, यह तुम्हारा जंगल नहीं है और न ही घर के पास नदी बहती है। तुम्हें अपना मन लगाना होगा। यह मेरा बेटा आशिष है। आशिष मुझे देख कर मुस्कुरा दिया था। परंतु मैं चुपचाप रही। न जाने क्यों यह मोटा गोरा बंगाली लड़का मुझे पागल सा लगा जो इतना बड़ा होकर भी मां के हाथ से खाना खाता था और बात - बात पर मां से झगड़ा करता था। मां उसे दिन में पांच छ: बार मनाती रहती। पर आशिष अपनी जिद् पर अड़ा रहता। जब तक उसका गुस्सा शांत नहीं होता तब तक वह चुपचाप रहता किसी से बात नहीं करता। पर आशिष न जाने क्यों मुझसे बातें करता। अपनी मां के बारे में पूछता मम्मी ने दवा खाई, खाना खाया। मम्मी को जूस पिलाया, क्या तुमने खाना खाया, तुम्हे अगर चॉकलेट चाहिये तो मेरे टेवल पर रखी है ले लो। मैं चॉकलेट जब चाहे आशिष के टेवल से ले लेती। यह देख आशिष हमेशा मुझे देख मुस्कुरा देता और बोलता तुम तो चॉकलेट बच्चों की तरह खाती हो चुस - चुस कर। देखो चॉकलेट बड़ो की तरह खाओ जैसे मेरे पापा खाते हैं। रैपर खोला, मुंह में डाला चबाया और पेट के भीतर। आशिष भूदेव दा की नकल करते हुए चॉकलेट खा लेता। दिन - रात इसी तरह गुजरते गये। मैं जब भी अकेली होती मां, बाबा रिमिल की यादें आने लगती। अपने घर की दिवारों पर जो रंग - बिरंगे मुखौटे लगे हुए हैं। कभी - कभी उसके सपने मुझे आते कि सभी देवता वाले मुखौटे जानवर के मुखौटे में बदल गये है और देखते - देखते सभी जानवर वाले मुखौटे जंगल में तेजी से भाग रहे हैं। बस मेरी आंखें खुल जाती। फिर मैं रात भर सोचती आखिर इस सपने का मतलब क्या है? पर बहुत सोचने के बाद मेरी समझ में कुछ नहीं आता। तब एक दिन दोपहर को मैंने अपने सपने के बारे में टूटी -फूटी बंगला भाषा में आशिष को बताया। जिसे सुनकर आशिष किसी बूढ़े व्यक्ति की तरह चेहरे पर गम्भीरता के भाव लाते हुए बोला - तुम सपना आदिवासी भाषा में देखती हो, इसलिए मुझे पहले आदिवासी भाषा सीखनी होगी। तब मैं तुम्हारे सपने का मतलब बता पाऊंगा। चलो, तुम मुझे आदिवासी भाषा बोलना सिखाओ मैं तुम्हे बंगला भाषा बोलना सीखाऊंगा और यहां से सीखने - सीखाने का किस्सा शुरु हो गया। हर दोपहर को आशिष स्कूल से आकर खाना खाता फिर आदिवासी भाषा की किताब और बंगला भाषा की किताब लेकर मेरे साथ बैठ जाता। उस समय मानसी काकी बिस्तर पर सो रही होती। इस तरह मैंने बंगला भाषा सीखी और आशिष आदिवासी भाषा सीख गया। करीब छ: महीने बाद मैं आशिष से बंगला में बोलती और आशिष मुझसे आदिवासी भाषा में बातें करता। हमदोनों की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई थी। भूदेव दा मानसी काकी और आशिष ने मुझे बहुत प्यार दिया। अपना समझ कर मेरी हर छोटी - छोटी बातों का ख्याल रखा।
        मुझे कमी यह एहसास नहीं हुआ कि मैं दूर गांव से कोलकोत्ता लाई गई हूं। भूदेव दा जो कपड़े, चॉकलेट आशिष के लिए लाते, वह मेरे लिए लाते। हमदोनों साथ - साथ दुर्गा पूजा घूमने जाते। दुर्गा मां को देख मुझे रिमिल और अपनी लड़ाई की याद आ जाती। मुखौटा लगाये रिमिल भैंसासुर बन कर मेरे पीछे भागता और मां दुर्गा का मुखौटा लगाए मैं उससे आगे - आगे भागती। समय बीत रहा था। पूरे दो साल हो गये और मुझे वापस गांव लौटना पड़ा। गांव में सब कुछ वैसा नही था। खरखाई नदी का पानी पहले से ज्यादा गंदा हो गया था। जंगल अब भी वैसे ही थे, परंतु कुछ सागवान के पेड़ सूखकर नरकंकाल में बदल गये थे। तालाब अपनी जगह पर था पर सुख कर रेगिस्तान में बदल चुका था। राजहंस अब गली के नाले में तैरते दिखाई दे रहे थे। मेरा घर वैसा ही था परंतु घर में मां नहीं थी। मेरे जाने के छ: महीने बाद मां को बुखार हो गया था। बाबा कहते हैं बुखार दिमाग पर चढ़ गया और मां मर गईं। बाबा ने मुझे खबर नहीं की क्योंकि अगर मैं वापस आ जाती तो घर का खर्च कैसे चलता? बाबा को डर था कि मैं गांव वापस आकर फिर कोलकोत्ता न जाऊं तो जो दो हजार रूपये का आसरा बना हुआ था, वह खत्म हो जायेगा। मैं सब कुछ बिना बताए ही समझ गई थी। आज कोलकोत्ता से वापस लौटे पांच साल हो गये थे। इन पांच सालों में अमेरिका से आशिष ने सात पत्र लिखे थे। आदिवासी भाषा में और मैंने बंगला भाषा उसके जवाब दिये थे। अब भी हर मास भूदेव दा तीन हजार रूपये मेरे बैंक एकाउंट में डाल देते है। मैंने कई बार इसके लिए मना किया परंतु भूदेव दा बोले जब आशिष को मैं तीन हजार रुपये जेब खर्च के लिए दे सकता हूं तो तुम्हे कैसे नहीं दे सकता हूं। बस मैं चुप हो जाती। भूदेवदा और मानसी काकी का प्रेम और सहयोग मेरे लिए ऑक्सीजन की तरह है। पर मैं कुछ करना चाहती थी। बाबा मां के काम को फिर से शुरु करना चहती थी। थोड़े - थोड़े रुपये बचा कर मैंने बाबा से पूछ - पूछ कर वह सारी चीजें धीरे -धीरे खरीद ली और फिर बाबा के निर्देशन में मैंने मुखौटा बनाना शुरु किया। पहला मुखौटा जो मैंने बनाया वह नर और सिंह का था। आधा चेहरा नर का और आधा सिंह का बाबा मेरे बनाये मेरे मुखौटे को छूकर बोले - चलो, मुखौटा बनाना एक बार फिर से शुरु हो गया। बेटी होकर तुम मेरी इस कला को आगे ले जायेगी। बेटा तो जंगल में भटक गया है। कहता है हक की लड़ाई लड़ रहा हूं, परंतु यह कौन सी हक की लड़ाई है? जो इन्सान को जानवर की तरह जंगल में छुपने को मजबूर कर देता है। बेटी ओते बिरसा मुंडा की लड़ाई गोरे अंग्रेजों से थी, जो विदेशी थे। परंतु रिमिल की लड़ाई काले अंग्रेजों से है जो विदेशी नहीं अपने देश के हैं। अपनी जाति के हैं। और सत्ता शक्ति के मालिक हैं। रिमिल भटक गया है उसका अन्त होगा परंतु इस भटकाव का अन्त नहीं होगा। अभी न जाने सत्ता के कितने सियार कितने रिमिल की बली चढ़ायेंगे? बाबा की बात सुनकर मैं यह सोचने लगी कि मेरा देवता सा दिखने वाला भाई हिंसक जानवर में कैसे बदल गया। फिर मुझे सपने की याद आ गया। यह कौन लोग है जो इन्सान को हिंसक जानवर में बदल रहे हैं। कई बार इच्छा हुई कि चन्दू काका के साथ जंगल में जाऊं और अपने भाई को वापस लेे आऊं परंतु चन्दू काका इसके लिए तैयार नहीं हुए। पर चन्दू काका ने रिमिल तक मेरा संदेशा भेजवा दिया। दूसरी रात रिमिल घर पर आया और मुझसे मिला। मेरे हाथ में नोट की पांच गड्डी रखते हुए बोला -  चलो अच्छा हुआ अमीर लोगों ने तुम्हे सदा के लिए छोड़ दिया। यह लोग ऐसे ही होते हैं। हमारा उपयोग करते हैं, और फेंक देते हैं कुड़ेदान में। मैं चुपचाप उसकी बातें सुनती रही। कितना बड़ा और न समझा हो गया था। मेरा भाई खुद अमिर लोगों के हाथों की कठपुतली बना जंगल - जंगल भटक रहा था। अपने इस भटकाव को उसने एक नाम भी दे रखा था उल्गुलान। उस रात वह घर पर कुछ ही देर रुका और वापस चला गया, अन्धेरे में। मैं उसे पूरी तरह देख भी नहीं पाइ। बस जाते - जाते बोली - रिमिल वापस आ जाओ। मैं और बाबा तुम्हें बहुत याद करते हैं। देखो पहाड़ से सिर टकराने से पहाड़ अपनी जगह से नहीं हटेगा। हां तुम्हारा सिर जरूर लहुलुहान हो जायेगा। तुम जिनके खिलाफ लड़ना चाह रहे हो, वो सभी शातिर पहाड़ है। जो तुम्हे लड़वा भी रहे हैं और मरवा भी देंगे। रिमिल यह सुन कर इतना ही बोला - ओते सेन्दरा ,शिकार खेलने वाला कभी न कभी शिकार के हाथ मारा जाता है। मेरा भी यही हाल होगा। हमलोग सभी शिकार युग में जी रहे हैं। इतना बोलकर रिमिल दौड़ता हुआ अंधेरे में गुम हो गया। मैं दरवाजे पर खड़ी अन्धेरे को एकटक देखती रही। आज इस अंधेरे में कई बचपन के दृष्य उभर रहे थे। मेरी गोद में खेला रिमिल, मेरे साथ नदी में डूबकियां लगाता रिमिल मेरे पीछे - पीछे खेतों के बीच भागता रिमिल, भैंसासुर बनकर मेरे पीछे भागता रिमिल। आज किसके पीछे भाग रहा है? शायद अपनी मौत के पीछे। परंतु उसकी मौत ... हुआ यूं कि आशिष अमेरिका से कोलकोत्ता आया और कोलकोत्ता से हमारे गांव मुझसे मिलने आ रहा था। उसके आने की सूचना पाकर मैं खुशी से पागल हो गई थी। परंतु मुझे चन्दू काका ने सूचना दी कि जब वह आशिष को रेलवे स्टेशन से लेकर वापस गांव आ रहा था, तभी बीच रास्ते में रिमिल और उसके साथी ने आशिष का अपहरण कर लिया और मुझसे कह दिया कि जब तक इसका बाप पचास लाख रुपया नहीं देगा तब तक हम इस नहीं छोड़ेंगे। इतना सुनने के बाद मैं एक पल भी घर पर ठहर न सकी। चन्दू काका को साथ लेकर जंगल, पठार, नदी, नाले को पार करते हुए उस स्थान पर पहुंची जहां रिमिल अपने साथियों के साथ कैम्प कर रहा था। मुझे अपने सामने देखते ही रिमिल गुस्से से चीखा - ओते, तुम्हे यहां आने की क्या जरूरत थी? और चन्दू काका तुम ओते को यहां लेकर क्यों आए? आशिष कहां है? मैंने रिमिल के प्रश्न पर प्रश्न दाग दिया। गुस्सा और नफरत से मेरा मन रिमिल के प्रति भर चुका था। जिस परिवार ने हमारा भरण - पोषण किया। हमें इतना सम्मान और प्यार दिया और आज भी अपनी बेटी की तरह मुझे प्यार करता है उसी परिवार के बेटे पर रिमिल ने हमला किया। क्या यही उल्गुलान है? क्या हमारे पूर्वज बिरसा मुंडा, सिद्धो कान्हू ने हमें उल्गुलान का मतलब यही सिखाया है? मैं दोबारा चीखी - रिमिल आशिष कहां है? मेरी चीख सुनकर आशिष एक टेन्ट से खुद बाहर निकला। मुझे देखते ही बोला -  ओते तुम चिन्ता मत करो। इनको जितना रुपया चाहिये पापा दे देंगे। तुम वापस चली जाओ। हां, मैं वापस चली जाऊंगी पर अकेले नहीं तुम्हें अपने साथ लेकर। चलो मेरे साथ। मैं दौड़कर आशिष के पास गई और उसका हाथ पकड़कर वापस जाने के लिए मुड़ी। तभी रिमिल सामने से बन्दुक लेकर आ गया। वह एकटक मेरी तरफ  देख रहा था। उसकी आंखो में नफरत और गुस्सा साफ  दिखाई पड़ रहा था। मैंने बिना कुछ बोले अपने छोटे से बैग से नोट की वो बंडल निकाली जो रिमिल ने मुझे घर पर आकर दिये। उसे रिमिल को वापस देते हुए बोली लो अपने इस रुपये को एक रुपया भी तुम्हारी इस पाप की कमाई से खर्च नहीं की हूं। रिमिल एकटक मेरी तरफ  देख रहा था। उसका ध्यान एक पल के लिए रुपये पर गया फिर मेरी तरफ  देखने लगा। मुझे गुस्सा आ गया। मैं रिमिल के गाल पर तीन - चार थप्पड़ मारते हुए बोली - तु देवता के रुप में पैदा हो कर देवता के रुप में ही मर जाता तो आज मुझे तुम्हारा यह जानवर वाला चेहरा नहीं देखना पड़ता। रिमिल मार खाने के बाद भी चुप रहा। मैं आशिष को लेकर आगे निकल गई। अभी चार - पांच कदम चली होगी तभी रिमिल पीछे से चीखा - ओते रूक जाओ, गोरे बाबू को यहीं छोड़ दो ... नहीं तो ... वोल्ट कसने की आवाज आई, बन्दुक तन गई। मैं तेजी से रिमिल के पास पहुंची और उसका गन पकड़ लिया। दूसरे ही पल हमदोनों भाई - बहन में भैंसासुर और मां दुर्गा वाला युद्ध शुरु हो गया। रिमिल बार - बार अपना गन छुड़वाने के लिए कोशिष कर रहा था और भैंसासुर की तरह चीखते हुए बोल रहा था -  ओते बन्दुक छोड़ दो ... बन्दुक छोड़ दो ... पर मैं बन्दुक रिमिल से छीनने की कोशिश करती रही और तभी न जाने कैसे गोली चल गई और गोली रिमिल की गर्दन को आर - पार कर गई। रिमिल भयानक चीख के साथ जमीन पर गिरा मछली की तरह दो पल तड़पा और दम तोड़ दिया। मैं पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ी देखती रह गई। दो पल पहले जिस भाई से मैं लड़ रही थी। वह मेरा भाई जमीन पर खून से लथपत पड़ा हुआ था। उसकी आंखें अब भी मुझे एकटक देख रही थी। रिमिल के साथी सभी बड़े आश्चर्य से सब अपनी जगह खड़े थे। किसी को समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि यह भाई - बहन के झगड़े में क्या हो गया। चन्दू काका और आशिष तेजी से मेरे पास आये। मेरे कन्धे को छुआ और मैं बेहोश हो गई। तीन दिन बाद मैं होश में आई तो अपने आपको अस्पताल के बेड पर पाया। चन्दू और आशिष पास बैठे थे। होश में आते ही मैं दहाड़ मारकर रोने लगी। मेरा भाई रिमिल मैंने तुम्हे नहीं मारा। मैं तुम्हे मारना नहीं चाहती थी। डॉक्टर ने मुझे रोता देख मुझे बेहोशी का इन्जेक्शन लगा कर सुला दिया। कुछ समय बाद आशिष मुझे लेकर मेरे घर पर आ गया। मैं पहले से बेहतर हो गई थी। परंतु मन बार - बार अपराध बोध से ग्रसित हो जाता। रिमिल की आंखे, उसका खून से लथपत शरीर आंखों के सामने उभर आता। बाबा को रिमिल की मौत पर कुछ ज्यादा ही सदमा लग गया था। वे बिल्कुल चुप हो गये थे। आशिष कुछ दिनों तक गांव में रहा। मेरा मनोबल बढ़ाता रहा। मुझे हर तरह से यह एहसास करवाता रहा कि जो हुआ उसमें तुम्हारा दोष नहीं है मैं भी धीरे - धीरे पहले से सामान्य होने लगी। जिन्दगी बड़ी जिद्दी नदी के समान होती है, जो हमेशा पीछे से धक्का मारती है और हमारा अतीत पीछे छुटता चला जाता है। करीब चार महीने बाद एक शाम आशिष नदी के किनारे टहलते हुए मुझसे बोला - ओते, चलो मेरे साथ बाबा को भीे अपने साथ ले चलो। कोलकोत्ता में हमसब साथ रहेंगे। अब तो मां भी नहीं है मेरे पापा और मुझे तुम्हारा साथ भी मिल जायेगा। तुम जानती मां के बाद अगर मैंने किसी को चाहा है तो तुम हो। पहली बार जीवन में आशिष ने अपना दिल खोलकर मेरे सामने रख दिया था। आशिष की बातें आज इतना साफ. साफ  सुन कर मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। जी चाहा आशिष के साथ चल दूं, परंतु फिर भी चुप रही। कारण मेरा जंगल, गांव और मुखौटा, यह सब कुछ छुट जायेगा। फिर रिमिल की यादें भी तो इस घर में बसी है, उसे भला मैं और बाबा कैसे छोड़कर जा सकते थे। इसलिए मैं इतना हीे बोली- आशिष तुम जाओ, परंतु मैं तुम्हारे आने का इन्तजार हमेशा करती रहूंगी। तुम आते रहना ... हमारी जिन्दगी ऐसी ही चलती रहेगी। मिलना और बिछुड़ना और अपनी यादों में साथ जीना।