गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

फरवरी 2016 से अप्रैल 2016

संपादकीय
तब भी तिकड़ी थी, अब है, तो दोष कैसा मित्र?
आलेख

खिलवाड़ न करें धरती की चुम्‍बकीय शक्ति से : गोवर्धन यादव 
देवार गीत म संस्‍कृति के महक : देवचंद बंजारे

 
अनुवाद

मूल  ( अंग्रेजी ) द नाइटिंगल एण्‍ड द रोज: आस्‍कर वाईल्‍ड

( अनुवाद ): बुलबुल और गुलाब : व्दिजेन्‍द्र

कहानी

अखबार में नाम : यशपाल
रीती हुई :अनिल प्रभा कुमार
डे केयर : विद्या सिंह 


लघुकथा

बालकृष्‍ण गुप्‍ता ' गुरू ' की छह लघुकथाएं 
दो लघुकथाएं : कुबेर
गोवर्धन यादव की लघुकथाएं
और बारिस होने लगी : सुरेश सर्वेद 

शोध लेख

दलित साहित्‍य : उद्भ्‍ाव और विकास : यदुनंदन प्रसाद उपाध्‍याय
'' शिकंजे का दर्द '' में निहीत : दलित चेतना :अब्‍दुल हासिम
प्रेमकुमार मणि की रचना दृष्टि और विचारधारा : मनीष कनौजे

व्‍यंग्‍य

दुर्योधन काबर फेल होथे: दुरगा प्रसाद पारकर ( छत्‍तीसगढ़ी )
स्‍वार्थ के शिरोमणि : कांशीपुरी कुंदन
हे भगवान, यह कैसी प्रतियोगिता : प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव


 गीत / ग़ज़ल / कविता

कृष्‍ण कुमार '' मयंक '' की चार ग़ज़लें
हर तरफ चली है ( गजल ) : कविता सिंह '' वफा ''
काम नहीं जो करता ( गजल ) : श्‍याम '' अंकुर ''
जितेन्‍द्र '' सुकुमार '' की तीन गजलें
सहारों के सहारे सारे ( गजल ) : सदानंद सुमन
ऐसी कोई चटटान नहीं ( नवगीत ) : विनय शरण सिंह
डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्‍तव की दो कविताएं
सैंया भये कोतवाल : डॉ. पीसीलाल यादव ( छत्‍तीसगढ़ी गीत )
तइहा के जीनीस नंदा गे रे: गणेश यदु ( छत्‍तीसगढ़ी गीत )
तोर संग जोरेव पीरीत : विट्ठल राम '' निश्‍छल '' ( छत्‍तीसगढ़ी गीत )
राजनीति
बिहार हार के मायने : डॉ.संजीत कुमार
पुस्‍तक समीक्षा

स्‍वार्थ के वायरस : समीक्षक यशवंत

प्रविष्टियां
प्रविष्टियां आमंत्रित
विज्ञापन
विकास का पर्याय बनी सड़कें ( विज्ञापन )
राजिम कुंभ 2016




तब भी तिकड़ी थी, अब है, तो दोष कैसा मित्र?

     मुक्तिबोध ने लिखा है - '' समस्या एक  - मेरे सभ्य नगरों और ग्रामोंं में, सभी मानव सुखी, सुंदर और शोषणमुक्त कब होंगे? '' सभी मानव सुखी, सुंदर और शोषणमुक्त हों। इसकी चिंता केवल साहित्यकारों को हो, तो इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है, सबका प्रयास और सबकी सहभागिता जरूरी है। मुक्तिबोध हमारे अपने शहर राजनांदगाँव के हैं, अपने हैं, जन - जन की चिंता करने वाले कवि हैं, यह सोचकर हमें गर्व होता है।
     पिछले दिनों भिलाई में एक साहित्यिक मित्र मिल गये थे। साहित्य की कुछ बातें हुईं। कुछ संक्षिप्त चर्चा के बाद उसने कहा -  ' राजनांदगाँव कभी साहित्य के केन्द्र में होता था।' उसके इस कथन में राजनांदगाँव की आज की साहित्यिक स्थिति पर अफसोस तो था ही पर इससे अधिक साहित्य के मामले में खुद की और उनके अपने शहर की श्रेष्ठता के भाव की अभिव्यंजना अधिक थी। मुझे लगा, इसका जवाब देना जरूरी है, यह बताना जरूरी है कि राजनांदगाँव से निकलने वाला साहित्य - त्रिवेणी का उत्स अभी भी सूखा नहीं है, अनवरत जारी है, और जवाब दिया भी गया।
     यहाँ एक आत्मिक मित्र हैं। बड़े जुजाड़ू हैं, साहित्य, संगीत, राजनीति, सब ओर उनकी नजरें होती हैं। खुद की उनकी उपलब्धि तो अब तक शून्य है पर स्वयं को वे यहाँ के साहित्यकारों का गॉडफादर समझते हैं। उन्होंने एक शिगूफा छोड़ रखा है कि -  ' राजनांदगाँव में आजकल सर्वेद ( अर्थात मैं), कुबेर और यशवंत की तिकड़ी गुटबाजी करने लगी है, साहित्य की राजनीति करने लगी है। ' आपको बता दूँ, सर्वेद, कुबेर और यशवंत जब मिलते हैं तो साहित्य की चर्चा तो होती ही है पर इसमें उस महोदय को गुटबाजी नजर आती है, तो यह उनका दृष्टिदोष होगा, रह गई बात साहित्य की राजनीति की, तो इसका अभिप्राय वे ही बता सकते हैं। फिलहाल, कोरबा में गत 19 - 20 फरवरी को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का चौंथा प्रांतीय अधिवेशन हुआ था। राज्यभर के साहित्यकारों का वहाँ मेला लगा होगा, यहाँ से भी काफी लोग उस मेंले में गये थे। हमारे उपरोक्त आत्मिक मित्र इस मेले में न जाते, संभव नहीं था।
     एक दिन हमारी तिकड़ी बैठी हुई थी। सम्मेलन से लौटकर आये लोग कुबेर को बधाइयाँ दे रहे थे, यह बताते हुए कि सम्मेलन में उनकी काफी चर्चा हुई है। मित्र के बारे में यह सुनकर मुझे आत्मिक खुशी हुई। तभी मेले से ही लौटे एक अन्य मित्र ने बताया - ' लेकिन यार, आपके उस आत्मिक मित्र (जिसकी चर्चा इस पैरा के प्रारंभ में किया गया है) ने तो होटल के कमरे में कुबेर सर को दोनों दिन रात - रातभर जमकर कोसा है। अपनी टिप्पणी में इनके बारे में काफी अभद्र भाषा और असभ्य शब्दों को प्रयोग किया है।'
     सुनकर कुबेर ने हँसते हुए कहा - यार! तब तो मैं जरूर बड़ा आदमी बन गया हूँ। क्योंकि ऐसी अहेतुक टिप्पणियाँ तो बड़े लोगों के बारे में ही होती हैं।' मैंने पूछा - इस ' अहेतुक टिप्पणी ' से आपका क्या मतलब है? उन्होंने कहा - मैंने उनका किसी तरह से नुकसान, अपमान तो कभी किया नहीं है, तो मेरे बारे में उनकी यह टिप्पणी अहेतुक ही कही जायेगी न ? ' वाह! क्या बात है।
     मुक्तिबोध तो स्वयं में साहित्य की एक संस्था ही थे। किसी महान् व्यक्ति की प्रतिभा के संबंध में जिस '' फ्लैश ऑफ इमैजिनेशन '' की बातें होती है, वह उनके पास था। उनके जैसा दूसरा कोई हो नहीं सकता। कोई एक व्यक्ति उनकी साहित्यिक परंपरा को ढो नहीं सकता। प्रयास जरूर किया जा सकता है और मुझे लगता है हमारी यह तिकड़ी ऐसा कर भी रही है। आज मैं इस तिकड़ी के कुबेर और यशवंत के बारे में कुछ बातें करना चाहूँगा।
     कुबेर राजनांदगाँव के उसी दिग्विजय महाविद्यालय के स्नातक हैं जहाँ कभी मुक्तिबोध अध्यापन किया करते थे। अब तक उनकी सात पुस्तकें, तीन हिन्दी में और चार छत्तीसगढ़ी में, प्रकाशित हो चुकी हैं। दो किताबें प्रकाशन के लिए तैयार हैं। लेखन उनकी आजीविका का साधन नहीं है, उनका व्यवसाय नहीं है फिर भी पिछले ढाई दशक से वे निरंतर लिख रहे हैं।
     इस साल प्रकाशित उनके व्यंग्य संग्रह ' माइक्रोकविता और दसवाँ ' रस के बारे में व्यंग्यकार डॉ. सुरेशकांत ने अपने मित्रों को  संबोधित करते हुए अपने ब्लाग में लिखा है - '' क्या आप कुबेर को जानते हैं? जानेंगे भी कैसे? वे दिल्ली में जो नहीं रहते। वह दिल्ली, जिसने व्यंग्य - लेखकों को पुष्पित - पल्लवित - पुरस्कृत होने का मुंबई जैसी मायानगरी से भी ज्यादा मौका दिया। मुंबई अमिताभ जैसों को अमिताभ बच्चन बनने का मौका भले देती हो, पर यज्ञ शर्मा जैसा सतत लेखनरत व्यंग्यकार भी वहाँ नौसिखिये व्यंग्यकार की तरह गुमनाम मर गया। जबकि इधर दिल्ली में औसत दर्जे के व्यंग्यकार भी लिखने से ज्यादा दिखने के बल पर पहले धन्य और फिर मूर्धन्य होकर शीर्ष पर पहुंच गए तथा सारे इनामों - इकरामों पर हाथ साफ  करते रहे।
कुबेर का पहला व्यंग्य - संग्रह 'माइक्रो कविता और दसवाँ रंस '  पढ़ने के बाद से मेरे मन में यह सवाल कौंधता रहा है कि दिल्ली की तुलना में छोटी जगह पर रहकर लिखने वाले व्यक्ति के लिए उसकी यह स्थिति किस कदर अभिशाप है!
     दीपावली के दूसरे दिन की बात है, कुबेर को किसी सज्जन का फोन आया। लगभग दस मिनट की लंबी बातचीत हुई। आखिर मैंने पूछा - कौन था? कुबेर ने कहा - शंकर पुणतांबेकर, व्यंग्यकार। 'माइक्रोकविता और दसवाँ रस ' के बारे में चर्चा कर रहे थे।
     कुबेर की रचनाओं को पढ़कर उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को समझा जा सकता है। उनकी भाषा में प्रवाह है, आकर्षण है; स्पष्टता है और संप्रेषणीयता है; शैली में नवीनता है, जो उन्हें भीड़ से अलग करती है। 
     हमारी तिकड़ी के दूसरे सदस्य हैं - उभरते हुए समीक्षक, यशवंत। किसी कृति की समीक्षा के लिए अपना पैमाना और अपना निकर्ष वे स्वयं बनते हैं। पिछले कुछ महीनों से वे भावनात्मक-भ्रष्टाचार की बातें कर रहे हैं। भावनात्मक और भ्रष्टाचार - ये दोनों शब्द अपने पृथक - पृथक अर्थों में सुपरिचित शब्द हैं। परन्तु समकालीन - साहित्य जैसे पद की तरह एक पद के रूप में भावनात्मक - भ्रष्टाचार मेरे लिए सर्वथा अपरिभाषित शब्द है। मैंने उनसे इसका अर्थ पूछा। उन्होंने मुझे समझाया - ' यह तो आजकल चारों ओर व्याप्त है। समझ लो, ईश्वर घट - घट में बसते हैं, तो यह नीयत - नीयत में बसता है। व्यापार, व्यवहार, सरकार, दफ्तर और परिवार, सबके नियंता यही हैं।' उनकी यह व्याख्या मुझे संतुष्ट न कर सकी। बाद में कुबेर ने माइक्रों कविता और दसवाँ रस में अपने मन की बात में इस शब्दावलि की अच्छी खबर ली है।
     यह तिकड़ी यहाँ की साहित्यिक परंपरा के प्रति मुझे पूर्ण आश्वस्त करती है।
संपादक

दलित साहित्‍य : उद्भ्‍ाव और विकास

यदुनन्दन प्रसाद उपाध्याय

     आज साहित्य में दलित साहित्य की बहुत चर्चा है। अनेक लेखक और लेखिकाएं इस साहित्य सृजन में अपना योगदान दे रहें हैं। इसलिए यह साहित्य न केवल भारत में वरन् विष्व स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुका है। हिन्दी ही नहीं प्रायः सभी भाशाओं में इसका लेखन निरन्तर हो रहा है। हिन्दी का दलित साहित्य किसको माना जाए, इस पर बहस आज भी जारी है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के एक खास दौर-अस्सी और नब्बे के दशक में उभरा यह एक साहित्यिक आंदोलन है, जिसमें दलित लेखक-कवियों ने अपनी आत्मा की सजगता के साथ इसको चलाया और इसे एक साहित्यिक धारा के रूप में मनवाने के लिए संघर्श भी किया। इन रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में अपनी जाति के साथ होने वाले भेद-भावों और जुल्मों को दिखाया। इनकी रचनाएं प्रारम्भ में साहित्यिक कसौटियों पर भले ही कमजोर रहीं हों किन्तु इसके बावजूद इन रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में झेली हुई तकलीफों और अपनी खीज को प्रकट किया। अपने साहित्य को महत्व दिलाने के लिए न केवल रचनाओं को ही माध्यम बनाया गया बल्कि अपनी पत्रिकाएं निकाली, लेख लिखे और कई सेमिनार तथा सम्मेलनों का आयोजन भी किया गया। अब भी यह आंदोलन जारी है।
     ‘दलित साहित्य’ वास्तव में क्या है, इस पर विद्वानों ने विचार किया है। दलित साहित्यकार डा0 कंवल भारती के अनुसार-‘‘दलित साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से है, जिनमें दलितों ने स्वयं अपनी पीड़ा को रूपायित किया है, अपने जीवन-संघर्ष में जिस यथार्थ को भोगा है, दलित साहित्य उनका उसी की अभिव्यक्ति का साहित्य है। यह कला के लिए कला का नहीं, बल्कि जीवन का और जीवन की जिजीविषा का साहित्य है।’’(1)
    दलित साहित्यकार श्री सी0बी0 भारत के अनुसार-‘‘ दलित साहित्य अब साहित्यिक विधाओं का अलग-अलग सा कोई अजूबा नहीें है, अपितु नवयुग का एक व्यापक, वैज्ञानिक, यथार्थपरक, संवेदनशील साहित्यिक हस्तक्षेप है जो कुछ तर्कसंगत वैज्ञानिक परम्पराओं का पूर्वाग्रहों से मुक्त साहित्यिक सृजन है, हम उसे दलित के नाम से संज्ञापित करते हैं। दलित साहित्य सामाजिक बदलाव का दस्तावेज है।‘‘(2)
शरण कुमार लिम्बाले के अनुसार-‘‘ दलित साहित्य अपना केन्द्रबिन्दु मनुष्‍य को मानता है। बाबा साहब के विचारों से दलित को अपनी गुलामी का अहसास हुआ, उसकी वेदना को वाणी मिली, क्योंकि उस मूल समाज को बाबा साहब के रूप में अपना नायक मिला। दलितों की वह वेदना दलित साहित्य की जन्मदात्री है। दलित साहित्य की वेदना ‘मैं‘ की वेदना नहीं, वह बहिष्‍कृत समाज की वेदना है।’’(3)
     श्री माता प्रसाद के अनुसार-‘‘ दलित साहित्य वह साहित्य है जिसमें वर्ण समाज में सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक दृष्टि से दलित, शोशित, उत्पीड़ित, अपमानित, उपेक्षित, तिरस्कृत, वंचित, निराश्रित, पराश्रित, बाधित, अस्पृश्‍य और असहाय है, पर साहित्य की रचनाएं हैं, वही दलित साहित्य की श्रेणी में आता है। इसमें बंधनों में जकड़ी स्त्रियां, बंधुआ मजदूर, दास, घुमन्तू जातियां, अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां आती हैं। दलित साहित्य वेदना, चीख और छटपटाहट का साहित्य है।’’(4)
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्‍ट हो जाता है कि भारत की अन्त्यज और अस्पृश्‍य मानी जाने वाली जातियों को जो अशिक्षित और अज्ञान के अंधकार में जी रहीं थीं, दलित मानी गई और दलित साहित्य में आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पिछड़्रेपन को भी स्थान दिया गया है।
      दलित साहित्य में हमें तीन श्रेणियां दिखाई देती हैं - पहली धारा उन दलित लेखकों की है जिन्होंने दलित जातियों में जन्म लिया और जिनके पास भोगा हुआ अनुभव, स्वानुभूतियां हैं। इसलिए इनके साहित्य में मनुष्‍य के भावों और विचारों की समश्टि है। दूसरी धारा या श्रेणी उन सवर्ण लेखकों की है जो दलित तो नहीं हैं लेकिन उन्होंने अपने रचना संसार में दलितों का सहानुभूतिपूर्वक चित्रण किया है। कुछ लोग इन सवर्ण लेखकों द्वारा दलितो पर लिखे गये साहित्य को ‘दलित साहित्य’ नहीं मानते और इन पर आज भी विवाद है। तीसरी धारा या श्रेणी प्रगतिषील लेखकों की है जो दलित को सर्वहारा की स्थिति में देखते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के समय जब दलित मुक्ति का प्रश्‍न उठा और ‘पूना पैक्ट’ के बाद जब गांधीजी अछूतोद्धार के लिए काम कर रहे थे तो इसी समय प्रगतिशील साहित्य भी अस्तित्व में आया। इनका मानना है कि समाज परिवर्तनशील है और समाज का साहित्य भी परिवर्तनशील होना चाहिए। प्रेमचंद इस धारा के सशक्त लेखक है और डॉ0 अम्बेडकर तथा गांधीजी दोनों के विचारों का प्रभाव इन पर पड़ा इसलिए इन्होेंने ‘ठाकुर का कुआं‘, सद्गति जैसी कहानियों की रचना की। इस परम्परा का क्रमबद्ध विकास होता रहा। यह धारा आरम्भ से ही वेद और वर्ण व्यवस्था विरोधी रही है।
     दलित साहित्य के उद्भव का जहां तक प्रश्‍न है, तो यह साहित्य सर्वप्रथम महाराष्‍ट्र में उत्पन्न हुआ। इसका कारण यह है कि महाराष्‍ट्र क्षेत्रों के दलितों के लिए शिक्षा के दरवाजे बहुत पहले ही खुल गये थे। इसके अतिरिक्त इस प्रदेश के महापुरूषों - ज्योति बा फुले, डॉ0 अम्बेडकर एवं राजर्षि साहू जैसे जननायकों ने इस वर्ग को प्रेरणा दी और यही प्रेरणा हिन्दी भाशी प्रदेश के दलित वर्ग को भी मिली। दलित विमर्श के साहित्यिक युग को हम कुछ इस प्रकार वर्गों में बांट सकते हैं-
1.    आदिकाल या प्रारम्भिक काल
2.    19वीं शती का दलित साहित्य
3.    20वीे शती का दलित साहित्य
4.    प्रगतिश्‍ाील दलित साहित्य
5.     1960 के पश्‍चात् का दलित साहित्य
     हिन्दी साहित्य के इतिहास के आदिकाल में दलित साहित्य का अर्थ वेद और वर्ण व्यवस्था विरोधी साहित्य माना जा सकता है। यह परम्परा बाद में बौद्धों, सिद्धों और नाथों से होती हुई मध्यकाल में संत साहित्य तक पहुंची है। कंवल भारती ने इसी बात को इस प्रकार कहा है-‘‘ लोकायत जनता का धर्म था........। उसने एक ऐसी विचार परम्परा को जन्म दिया वेद और वर्ण व्यवस्था विरोधी था। यह परम्परा बाद में बौद्धों, सिद्धों और नाथों से होती हुई मध्यकाल में दलित संतों तक पहुंची थी।’’(5)
     मध्यकाल में कबीरदास तथा रैदास जैसे संतों ने इस धारा में अपना योगदान दिया। लेकिन यह योगदान वर्तमान जैसा नहीं है। निर्गुण संतों ने हिन्दू और मुस्लिम धर्मों में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करके इस धारा में योगदान दिया। इन्होंने न केवल धर्मो पर आघात किया बल्कि पाखण्ड और कुरीतियां फैलाने वाले मुल्ला और पण्डितों को लताड़ा भी। कबीर लिखते है-
‘‘सुर नर मुनिजन औलिया,
यह सब उरली तीर।
लह राम की गम नहीं,
तह घर किया कबीर।’’ (6)
     भक्तिकाल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें अधिकांश निर्गुण भक्त कवि दलित जाति से सम्बद्ध रहे हैं। ‘‘ कबीर जुलाहे थे। संत सेना नाई जाति में पैदा हुए। रैदास चमार थे। दादू दयाल बनिया जाति में जन्मे थे। संत बखना मीरासी थे। दीन दरवेश लोहार थे। बिहार वाले दरियादास मुसलमान थे। संत त्रिलोचन वैश्‍य थे। कश्‍मीर की महिला संत लल्ला मेहतर जाति की थीं, जबकि महाराष्‍ट्र के नाम देव छीपी नामक जाति में पैदा हुए थे। निर्गुण संतों की पूरी जमात इस प्रकार निम्न वर्णों और निम्न वर्गीय थे जिनका व्यापक प्रभाव शिल्‍पी जातियां और श्रमिक वर्ग पर पड़ा था।’’(7)
     इस युग के संत निर्भीक, स्पष्‍टवादी, साहसी, समानता की बात करने वाले तथा सत्यवादी थे। इसलिए सभी ने कहीं न कहीं छुआछूत, जाति-पांति का विरोध किया और मनुष्‍यमात्र के प्रति प्रेम की बात की। कबीर जाति के प्रति अभिमानी लोगों को समझाते हुए कहते है-
‘‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान।।’’(8)  
     रैदास कबीर की भांति निडर तो नहीं थे किन्तु उनके पदों में एक अविचल आत्मविश्‍वास दिखाई देता है। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति जाति से नहीं गुणों से ऊंचा होता है-
‘‘रैदास वामन मत पूजिए, जऊ होवे गुनहीन।
पूजहिं चरन चांडाल के, जऊ होवे गुन प्रवीन।।‘‘(9)
     कबीर आदि संतों ने जिस दलित विचारधारा का सूत्रपात किया था आगे चलकर इस धारा का विकास हमें दिखाई नहीं देता। लेकिन 19वीं शताब्दी में साहित्य की यह दलित धारा भारत की लगभग सभी भाषाओं में पुनः उभरती हुई नजर आती है। इसका कारण यह था कि इस युग तक आते - आते भारत में अंग्रेजी राज स्थापित हो चुका था और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से अछूतों में शिक्षा का प्रभाव पहुंचने लगा था। इसके प्रभाव से प्रायः सभी भाषाओं में दलित रचनाकार पैदा हुए।
     19 वीं शताब्दी में हम सबसे पहले महाराष्‍ट्र में इस दलित धारा को प्रभाव देखते हैं। महाराष्‍ट्र में ज्योति बा फूले के नाटकों और पंवाड़ा काव्य में इस विचारधारा के सबसे पहले दर्शन होते है। महात्मा फूले की प्रख्यात रचना ‘गुलामगीरी’ है जिसमें उन्होेंने ब्राह्मणवाद के आवरण के अंदर विष्‍ट अंग्रेजी राज को गुलामगीरी नाम दिया था। इसमें ब्राह्मणवाद पर जितना तीखा प्रहार मिलता है उतना और ग्रंथ में नहीं मिलता। यह रचना संवाद शैली में लिखी गई है। वे लिखते है-
‘‘मनु जलकर खाक हो गया,
जब अंग्रेज आया।
ज्ञानरूपी मां ने,   
हमको दूध पिलाया।।
अब तो तुम भी पीछे न रहो।
भाइयों, पूरी तरह जलाकर,  
खाक कर दो मनुवाद को।।’’(10)
     इनकी कविताओं में दलित विमर्श, अछूत और शुद्रों के लिए नवजागरण का विमर्श है।
20वीं शताब्दी में दलित विमर्श और व्यापकता के साथ दिखाई देता है। महाराष्‍ट  के साथ - साथ यह विमर्श अब अन्य राज्यों में भी दिखाई देता है। इसलिए इसी समय केरल में के0वी0 करूप्पन कवि हुए जो जाति से अछूत (मछूआरे) थे। इन्होंने शंकराचार्य के ‘अद्वैत दर्शन’ की नयी व्याख्या करते हुए अपनी ‘जाति कुंभी’ नाम से एक लम्बी कविता लिखी। वास्तव में केरल में दलित विमर्श का आंदोलन चलाने वाले नारायण गुरू है। इन्होंन अपनी रचनाओं में ‘जाति मत पूछो, जाति मत बताओ और जाति के बारे में मत सोचो’ के नारे को लोकप्रिय बनाया। इनके विश्य कुमारन आसन ने भी इस विचारधारा में अपना योग दिया और ‘चांडाल भिक्षुकी’ और ‘दुरवस्था’ जैसी रचनओं में जातिवादिता का विरोध किया।
     20वीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य में दलित चेतना और अधिक प्रखर रूप में हमारे सामने आती है। इस युग में दर्जनों दलित लेखक इस धारा में सक्रिय हैं। इनमें हीरा डोम और अछूतानंद के नाम उल्लेखनीय है। हीरा डोम ने एकमात्र कविता लिखी जो 1914 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में ‘अछूत की शिकायत’ नाम से छपी थी। इसे विशुद्ध दलित संवेदना की कविता माना जाता है, जिसमें एक अछूत अपने कष्‍टों का वर्णन भगवान के सामने और सबके सामने कर रहा है-
‘‘हमनी के रात-दिन दुखवा भोगत बानी,
हमनी के सहेजे से मिनती सुनाइबि।
हमनी के दुःख भगवानों न देखता जे,
हमनी के कबले कलेसवा उठाइबि।
                     *****
 डोम जानिके हमनी के छुए से डेरइले,
हमनी के इनरा के निगिचे न जाइले जा।
पांके में से भरि, पियतानी पानी,
पनही से पिटि पिटि हाथ गोड़ तुरि दैलैं,
हमनी के इतनी काही के हलकानी।’’(11)
     इसी युग में दूसरे सबसे प्रभावी लेखक स्वामी अछूतानंद हैं जो ‘हरिहर‘ उपनाम से कविता करते थे। ये कवि होने के साथ-साथ नाटककार और पत्रकार भी थे। इन्होंने उत्तर भारत में ‘आदि हिन्दू’ आंदोलन भी चलाया। आदि हिन्दू पत्र निकालकर इन्होंने दलित पत्रकारिता को जन्म दिया। अपने पत्र में इन्होंने दलित पर होने वाले अत्याचारों को प्रकाशित किया साथ ही दलितों को उनके इतिहास से परिचित कराकर उनमें चेतना और स्वाभिमान उत्पन्न करने की कोशिश की। स्वामी अछूतानंद की एक कविता ‘मनुस्मृति’ में हीरा डोम की कविता जैसे ही भाव दिखाई देते हैं-
‘‘निसदिन मनुस्मृति ये हमको जला रही है।
ऊपर न उठने देती नीचे गिरा रही है।’’(12)
स्वामीजी की इस दलित धारा को शंकरानंद, केवलानंद और अयोध्यानाथ दंडी जैसे कवियों ने आगे बढ़ाया। आज भी केवलानंद का यह गीत दलित वर्गों में प्रसिद्ध है-
‘‘मनु जी तुमने वर्ण बना दिए चार।
जा दिन तुमने वर्ण बनाया
बनिया पीले बनाये क्यों ना।
गेरे ब्राह्मण, लाल क्षत्रिय,
न्यारेऊ रंग बनाये क्यों ना।
शुद्र बनाते काले वर्ण के,
पीछे को पैर लगवाए क्यों ना।’’
     दलित चेतना की यह धारा सवर्ण लेखकों तक भी आई। इसका सीधा सा कारण 20वीं शताब्दी के राजनैतिक और सामाजिक आंदोलनों का प्रभाव था। डा0 अम्बेडकर और महात्मा गांधी जी के बीच हुए संवाद और ‘पूना पैक्ट’ (1932) के समझौते ने सवर्ण लेखकों को इस ओर प्रेरित किया। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, मैथिलीशरण गुप्त, गया प्रसाद शुक्ल, व रामचन्द्र शुक्ल आदि ने दलितों के ऊपर सहानुभूुतिपूूर्वक रचनाएं लिखीं। हालांकि इनकी रचनाओं में दलित लेखकों जैसी दलित मुक्ति का कोई स्वर दिखाई नहीं देता। निराला प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था में विश्‍वास रखते थे लेकिन बाद में उन्होंने अपनी विचारधारा में परिवर्तन किया और दलितों के समर्थन में ‘चतुरी चमार’ जैसी रचनाएं भी लिखीं।
     हिन्दी साहित्य में प्रगतिशील धारा जो 1930 में प्रारम्भ हुई और जिसका विधिवत् नामकरण 1936 में हुआ, दलित विमर्श की यह धारा विभिन्न सोपानों को पार करती हुई इस आंदोलन तक भी पहुंची। प्रेमचंद इस धारा से जुड़े पहले लेखक थे जिन्होंने अपनी रचनाओं में दलित समस्या का चित्रण किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में दलितों के प्रति सवर्णों के कठोर व्यवहार की निन्दा की और डा0 अम्बेडकर ने तालाब में पानी लेने और मंदिर में प्रवेश के अधिकार को लेकर जो आंदोलन किए उससे प्रभावित होकर ‘ठाकुर का कुंआ’, ‘मंदिर’ और ‘सद्गति’ जैसी दलित-विशयक कहानियां लिखीं। आगे चलकर प्रेमचंद के पश्‍चात् प्रगतिशील साहित्य मे दलित वर्ग की स्थिति मजदूर वर्ग के रूप में चित्रित की गई। मुक्तिबोध, नरेन्द्र शर्मा, त्रिलोचन, धूमिल और नागार्जुन जैसे साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में दलितों को शोषित वर्ग के रूप में चित्रित किया है। जैसे धूमिल की प्रसिद्ध रचना ‘मोचीराम’ में दलित मोची के लिए समाज का हर आदमी एक जोड़ी जूता है-
‘‘रांपी से उड़ी हुई आंखों ने
मुझे क्षणभर टटोला, और
और फिर पतियाते हुए स्वर में बोला
बाबू जी सच कहूं
मेरी निगाह में, न कोई बड़ा है, न छोटा
मेरे लिए हर आदमी
एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है।’’(13)
     इसी प्रकार नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘हरिजन गाथा’ में दलितों के सामूहिक हत्याकाण्ड के विरूद्ध अराजक तत्वों के खिलाफ एक विद्रोही स्वर दिखाई देता है-
‘‘ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं-
तेरह के तेरह अभागे
टकिंचन मनुपुत्र
जिन्दा झोंक दिए गए हों
प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन संपन्न ऊंची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था।’’(14)
     दलित विमर्श का तीव्र विद्रोह के साथ विकास हिन्दी साहित्य में 1960 के बाद दिखाई देता है। इस युग में आकर कविता, आत्मकथा, और कहानी जैसी विधाओं मे सामाजिक व्यवस्था के प्रति विद्रोह के भावों का चित्रण मिलता है। साठोतरी हिन्दी साहित्य में लेखक कभी लघु मानव की बात करता है, तो कभी दलित मानव की मनःस्थिति का वर्णन करता है। भटकता हुआ अकेलापन - यही इस युग की कविता का यथार्थ है। इस युग में दलित विमर्ष का कोई अलग स्वरूप नहीं है। मार्क्सवाद से प्रभावित इन जनवादी कविताओं में पूरा मनुष्‍य ही दलित है जिसे जनतंत्र ने अपहिज बना दिया है। जगदीश गुप्त ने अपने ‘शंबूक’ काव्य में वर्ण व्यवस्था पर इस प्रकार करारा प्रहार किया है-
‘‘जो व्यवस्था व्यक्ति के सत्कर्म को भी
मान ले अपराध
जो व्यवस्था फूल को
खिलने दे निर्बाध
जो व्यवस्था वर्ग सीमित
स्वाथे से हो ग्रस्त
वह विष्‍ाम घातक व्यवस्था
शीघ्र ही हो अस्त।’’(15)
     इस प्रकार दलित साहित्य का आर्विभाव विभिन्न सोपानों से होता हुआ स्वयं दलित साहित्य में आया और इसी दशक मे दलित लेखकों का साहित्य भी अस्तित्व में आया। कहा जाता है कि दलित साहित्य पहले मराठी में आया लेकिन ऐसा नहीं है। इस दशक में ही मराठी और हिन्दी में एक साथ दलित साहित्य का उदय हुआ है- ‘‘इसी दशक में स्वयं दलित लेखकों का साहित्य अस्तित्व में आया। कहा जाता है कि पहले यह मराठी में आया, पर ऐसा नहीं है। दलित साहित्य का उदय हिन्दी और मराठी में लगभग एक ही समय हुआ है।’’(16)
     हिन्दी साहित्य में साठ के दशक में अनके रचनाकार जैसे-चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ललई सिंह, डॉ0 डी0 आर0 जाटव, रचनीकांत शास्त्री, रामस्वरूप वर्मा आदि लेखकों की पुस्तकें प्रकााशित हुईं। इनके अतिरिक्त डॉ0 भीमराव अम्बेडकर, राहुल सांकृत्यायन, अछूतानंद आदि की रचनाओं ने भी क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए।
1960 के पश्‍चात् दलित साहित्य की रचनाओं के क्रम में तेजी आई और 1980 तक आते-आते यह हिन्दी में यह साहित्य स्थापित हो गया- ‘‘ 1960 के आसपास मराठी में दलित आंदोलन के उभार के साथ ही धीरे-धीरे दलित जीवन से जुड़ी रचनाओं का हिन्दी में आना शुरू हुआ तथा 1980 तक आते - आते हिन्दी में दलित साहित्य के रूप में रचनाओं की रचना शुरू हुई। इस बीच 1976 में नागपुर में पहली बार दलित साहित्य सम्मेलन का आयोजन हुआ तथा इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि दलित साहित्य के आंदोलन की प्रक्रिया अब धीमी नहीं, तेज होगी। इसी दौरान हिन्दी में दलितों द्वारा परम्परा के प्रति विद्रोह के रूप में छिटपुट लेखन की शुरूआत हुई, जिसने धीरे - धीरे एक विशेष प्रकार के साहित्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। आज हिन्दी में जो दलित साहित्य लिखा जा रहा है, उसका एक बड़ा हिस्सा दलितों द्वारा रचित है और वास्तव में वही ‘दलित साहित्य’ है।’’(17)
     इधर हिन्दी में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, सोहनपाल सुमनाक्षर, धर्मवीर, श्‍यौराज सिंह बेचैन, कंवल भारती, जयप्रकाश कर्दम, प्रेमशंकर, सुशीला टांकभौरे, सुखबीर सिंह, कुसुम मेघवाल, रजतरानी मीनू, सूरजपाल सिंह चौहान, आदि प्रमुख हैं। इन रचनाकारों में अधिकांश कहानी, कविता, आत्मकथा, संस्मरण और आलोचना लगभग सभी विधाओं में लिख रहें हैं तथा भाषा पर अधिकार न होने के बावजूद अनगढ़ शैली में अपनी पहचान एक दलित साहित्यकार के रूप में बना रहे हैं। इस सम्बन्ध में मोहनदास नैमिशराय की आत्मकथा ‘अपने अपने पिंजरे’ का विशेष महत्व है। इस कृति में शहर में रहने वाले चमार समुदाय की पीड़ा को उभारा गया है। इस आत्मकथा में लेखक ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि दलित चाहे शहर में रहें या गांव में, सवर्णों की बस्ती में रहे या मुस्लिम बस्ती में उसे घोर अपमान ही सहना पड़ता है। लेखक अपनी पीड़ा को इन शब्दों में व्यक्त करता है-‘‘हम लम्बे समय से अपमान सहते आये थे। पर गुनहगार न थे। हम हारे हुए लोग थे, जिन्हें आर्यों ने जीतकर हाशिए पर डाल दिया था। हमारे पास सिर्फ कड़वा अतीत और जख्मी अनुभव था। सदियों से गर्दिश में रहते - रहते हम अपने इतिहास से कट गये थे। अपनी संस्कृति भूल गये थे।’’(18)
     बाल्मीकि समाज की असहनीय पीड़ाओं और भोगे हुए अनुभवों को ओमप्रकाश बाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में समेटा है। इस कृति में लेखक ने लिखा है-‘‘ एक ऐसी समाज व्यवस्था में हमने सांस ली है जो बेहद क्रूर और अमानवीय है, दलितों के प्रति असंवेदनशील भी।’’ इस पुस्तक में लेखक ने दलित ‘चूहड़ा’ समाज की दयनीय स्थिति का चित्रण किया है।
     लेखक ने इस कृति में कई प्रश्‍न उठाए हैं जैसे आदर्श हिन्दू समाज में जहां पेड़ - पौधों, पशु - पक्षियों तक की पूजा की जाती है, वहां दलितों के प्रति उनका रवैया असहिष्‍णु क्यों है।
     दलित साहित्य में केवल पुरूषों ने ही अपनी लेखनी नहीं चलाई बल्कि इधर महिला रचनाकारों ने भी अपनी भोगे यथार्थ को अपनी आत्मकथाओं में चित्रित करने का प्रयास किया है। इस दृष्‍टि से कौशल्या बैसंत्री ने अपनी आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ में न केवल दलित होने की पीड़ा को जीवन्तता दी है अपितु स्त्री होने की पीड़ा को भी पाठकों को संवेदनशीलता के साथ अहसास करा दिया है। लेखिका का मानना है कि स्त्रियों के मामले में सवर्ण पुरूषों की सोच और दलित पुरूषों की सोच में कोई अंतर नहीं है। खुद लेखिका का जीवन इस बात का प्रमाण है कि उनके व्यक्तित्व निर्माण में सर्वाधिक बाधाएं उनकी बिरादरी के पुरूषों ने ही खड़ी की। लेखिका के शब्दों में-‘‘बाबा साहेब के निकट सहयोगी ने मेरे साथ जबरन यौनाचार करना चाहा। उन्हीें के बस्ती के लोगों ने मेरा जीना मुहाल कर दिया। इसलिए हमारी पहली मुठभेड़ सवर्ण पुरूष सत्ता से नहीं दलित पुरूष सत्ता से है।’’(19)
     आज दलित साहित्य हिन्दी की सभी विधाओं में लिखा जा रहा है। प्रमुख रूप से काव्य ग्रन्थ, उपन्यास, कहानियां, नाटक, निबन्ध, आत्मकथाएं व आलोचना-ग्रंथोें में दलित विमर्श उपलब्ध है। इस प्रकार हम अंत में निष्‍कर्ष रूप में यही कह सकते हैं कि दलित साहित्यकारों ने दलित समाज के सम्पूर्ण दैन्य - दारिद्रय, अज्ञानता, अंधविश्‍वास, धार्मिक वितण्डता, शोषण एवं तिरस्कार का जीवन्त चित्रण किया है। चाहे आत्मकथा लेखक महार, मातंग, बाल्मीकि, केकाड़ी, उठाईगीर, चमार आदि किसी भी समाज का हो इनकी मूलभूत समस्याएं एक ही हैं और इसी एक समस्या ने हिन्दी में विशाल दलित लेखक वर्ग तैयार किया जिनका रचना कर्म दलित सवालों को न केवल प्रखर रूप से उठा रहा है, बल्कि उसके पक्ष में दलित साहित्य का माहौल भी विकसित कर रहा है।
 संदर्भ ग्रन्थ सूची
(1)    दलित साहित्य की भूमिका: कंवल भारती
(2)    दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र: शंरण कुमार लिम्बाले
(3)    दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र: शरण कुमार लिम्बाले
(4)    दलित समाज: जिया लाल आर्य
(5)    दलित विमर्श की भूमिका: कंवल भारती, पृ0 103
(6)    कबीर ग्रंथावली: डा0 भगवत स्वरूप मिश्र, पृ0 101
(7)    आलोचना, अप्रैल-जून, दलित विमर्श का इतिहास चक्र, ब्रजकुमार पाण्डेय, 2005, पृ0 60
(8)    कबीर ग्रंथावली, पारसनाथ तिवारी, पद 162
(9)    संत काव्य: आचार्य परसुराम चतुर्वेदी, पृ0 17
(10)    दलित विमर्श की भूमिका: कंवल भारती, पृ0 106
(11)    अछूत की शिकायत: हीरा डोम, 1914 सरस्वती पत्रिका
(12)    दलित विमर्श की भूमिका: कंवल भारती, पृ0 113
(13)    दलित विमर्श की भूमिका: कंवल भारती, पृ0 122
(14)    दलित विमर्श की भूमिका: कंवल भारती, पृ0 123
(15)    शंबूक (खण्ड काव्य ) : जगदीश गुप्त, पृ0 37
(16)    दलित साहित्य का विमर्श: कंवल भारती, पृ0 123
(17)    दलित साहित्य की मुख्यधारा: देवेन्द्र चौबे, पृ0 184
(18)    अपने अपने पिंजरे: मोहनदास नैमिशराय, पृ0 39
(19)    कथा-क्रम (दलित विशेषांक , नवम्बर 2000, पृ0 115
पता
शोधार्थी छात्र
जीवाजी विश्‍वविद्यालय ,
ग्‍वालियर ( म.प्र.)

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

खिलवाड़ न करें धरती की चुम्‍बकीय शक्ति से


गोवर्धन यादव

     परमात्मा,ईश्वर,ब्रह्म, परमपिता आदि कई नामों से पुकारी जाने वाली एक अनादि शक्ति का प्रकाश और उसकी प्रेरणा से ही इस जगत को और जगत के पदार्थों को स्फ़ुरण मिल रहा है. उसी के प्रभाव से सृष्टि के विभिन्न पदार्थों का ज्ञान, कार्य एवं सौन्दर्य प्रतिभासित होता है. वही अपने समग्र रूप में अवतीर्ण होता रहता है और सत्य रूप प्रतिष्ठित होता रहता है. साधक जब विराट ’जगत’ के रूप में परमात्मा का दर्शन करता है, उन्हीं की चेतना को सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, तारागण आदि में प्रकाशित होते देखता है, तो उसे सत्य का दर्शन होता है, जगत और अध्यात्म का स्थूल और सूक्ष्म का, दृष्य और तत्व का जहाँ परिपूर्ण सामंजस्य होता है, वहीं सत्य की परिभाषा पूर्ण होती है और यह सत्य जब जीवन साधना का आधार बनता है, तब जगत की प्रेरक और सर्जन शक्ति का परिचय प्राप्त होता है.
     अपनी इस धरती की समर्थता एवं सम्पदा को पर्यवेक्षकों ने अनेक दृष्टियों से देखा और अनेक कसौटियों पर परखा है. उन निष्कर्शों में एक यह भी है कि धरती एक विशालकाय चुम्बक है. उसकी संरचना भर रासायनिक पदार्थों से हुई है. हलचलों के मूल में उसकी चुम्बकीय क्षमताएँ ही विभिन्न स्तर की हलचलें करतीं और एक से एक बढे-चढे चमत्कार प्रस्तुत करती है.
     अणु शक्ति में परमाणु का नाभिक ही ऊर्जा-भण्डार माना जाता है. यह संचय धरती के प्रचण्ड चुम्बकत्व का ही एक घटक है. जीवाणुओं के भीतर जो सचेतन क्षमता काम करती है, उसे भी संव्याप्त चेतना का अंशधारी कहा गया है. यह समर्थता और चेतना दोनों ही उस चुम्बकत्व की दो गंगा-जमुना धाराएँ है, जिनके संयोग से धरती का वातावरण सौंदर्य, वैभव और उल्लास से भरा पूरा बना रहता है.
     लन्दन विश्वविद्यालय के किंग्स कालेज के प्रोफ़ेसर. जान टेलर और फ़्रान्सिस हिचिंग ने मिलकर एक पुस्तक लिखी—अर्थ मैजिक. उनमें उन्होंने यह सिद्ध किया है, कि धरती पर दृष्टिगोचर होने वाले अगणित हलचलें जादू, चमत्कार जैसी प्रतीत होती है. उनके मूल में पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति ही काम करती है. यदि यह घटने-बढने लगे तो उसके परिणाम प्रस्तुत व्यवस्था में असन्तुलन उत्पन्न करेंगे और भयावह परिणाम उत्पन्न होंगे.
     वैज्ञानिक शोध संस्था ’ नासा” ’ के अन्तर्गत चलने वाले अनुसन्धान केन्द्रों ने प्रमाणित किया है कि धरती पर कारणवश होने वाले चुम्बकीय परिवर्तन ही सृष्टि के इतिहास क्रम में अनोखे और अप्रत्याशित अध्याय जोडते रहे हैं. भविष्य में यदि कभी कोई असाधारण उथल-पुथल होगी तो उसका मूलभूत कारण एक ही होगा--धरती के चुम्बकीय प्रवाह में उथल-पुथल, उलट-पलट.
     समग्र पृथ्वी तो एक विशाल चुम्बक है ही, किन्तु उसका उभार क्षेत्र विशेष में न्यूनाधिक भी पाया जाता है. इसका प्रभाव उन स्थानों के पदार्थो और प्राणियों पर पडता है. उनकी आकृति और प्रकृति में जो अन्तर पाया जाता है उसमें अन्य कारण उतने प्रबल नहीं होते, जितने के स्थान-स्थान पर पाए जाने वाले चुम्बकत्व के दबते-उभरते प्रवाह. इस दृष्टि से वे विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न क्षेत्रों की उपयोगिता सिद्ध करते हैं. जो कार्य एक स्थान पर नहीं हो सकत या कठिन पडता है, वह दूसरे उपयुक्त स्थान पर स्वल्प प्रयास से ही सरलतापूर्वक सम्पन्न हो सकता है.
      पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति क्षेत्र विशेष के आधार पर ध्रुव प्रदेशों में सबसे अधिक पायी जाती है और रिओडी-जानीरो क्षेत्र मे न्यून्तम आँकी गई है. विलक्षणता एक और भी है कि यह सदा किसी स्थान पर एक जैसी नहीं रहती, उसमें कारणवश परिवर्तन होता रहता है.
     पिछले दिनों बारमूडा क्षेत्र में अनेक अद्भुत घटनाएँ घटी हैं. उस क्षेत्र से गुजरने वाले जलयान एवं वायुयान इस प्रकार अदृष्य हुए हैं कि बहुत खोजने पर भी उनका कुछ भी अता-पता न मिल सका. विज्ञजनों का कहना है कि उस क्षेत्र में चुम्बकीय विलक्षणता ही ऎसे उपद्रवों के लिए उत्तरदायी है. इस दृष्टि से वह क्षेत्र सर्वथा अनोखा और विलक्षण है. वहाँ चित्र-विचित्र प्रकार के चुम्बकीय भँवर पडते रहते है.
     प्रसिद्ध डच भूगर्भ शास्त्री प्रो. सोल्को.डब्ल्यु.ट्राम्प ने साइकिल फ़िजिक्स पुस्तक में विभिन्न प्रयोग परीक्षण करके यह लिखा है कि पृथ्वी अगणित विशेषताओं और धाराओं से भरे-पूरे चुम्बकत्व से भरी पूरी है. वैज्ञानिक उपलब्धियों में प्रकारान्तर से इसी क्षमता से स्त्रोतों को खोजा और प्रयोग में लाया गया है. इसका समर्थन फ़्रेंच एटामिक एनर्जी कमीशन के सदस्य इकोले नारमल और अमेरिका के सुरक्षा-विभाग एवं अर्कन्सास विश्वविद्यालय के डा.जाबोज हारवलिक ने भी किया है. डा.आबोज अमेरिकन सोसायटी आफ़ डाउसर्स के प्रमुख हैं.
      अमेरिका के सिविल ऎवियेशन बोर्ड की ’ऎक्सीडेन्ट इन्वेस्टीगेशन रिपोर्टमें बतलाया गया है कि बारमूडा क्षेत्र में जाने वाले  हवाई या जल जाहज के चालकों को कभी-कभी दुर्घटना का पूर्वाभास हो जाता है. डा.जाबोज हारवलिक ने अनुसन्धान करके पता लगाया है कि इस स्थान विशेष से गुजरने पर मस्तिष्क की ’पीनियल ग्रन्थि’ पर चुम्बकीय परिवर्तन का गहरा प्रभाव पडता है. इस परिवर्तन से ’सीरोटोनिन’ नामक हार्मोन पैदा होता है, जो मानसिक विक्षिप्तता पैदा कर देता है.
     बारमूडा क्षेत्र अटलांटिक महासागर के मध्य आता है. ’एडगर केयसी’ नामक प्रसिद्ध व्यक्ति, जो ’स्लीपिंग प्रोफ़ेट’ के नाम से जाने जाते थे, का कहना है—’ईसा से 50,000 वर्ष पूर्व अटलांटिक महासागर में एक बडा भूखण्ड था, जहाँ पर ’अटलांटियनसभ्यता का विकास हुआ था. उस सभ्यता ने तकनीकी साधन जैसे- टेलीविजन, एक्स-रे, लेसर बीम और एन्टीग्रेविटी यन्त्र आदि का विकास कर लिया था, लेकिन इन साधनों के दुरूपयोग करने अपना विनाश कर लिया. यह विनाश ईसा से 28,000 वर्ष पूर्व हुआ था. इस सभ्यता से बचे हुए लोगों ने ’मय’ और ’मिस्र’ संस्कृति का विकास किया. मिस्र में जैसे विशालकाय पिरामिड बने हैं उसी प्रकार के विशालकाय पिरामिडॊं के अवशेष बारमूडा क्षेत्र में पाये जाते हैं. मिस्र के ’चोलुला’ नामक पिरामिड में लगे पत्थरों का आयतन 3,88,20,000 घन गज है.
     सन 1940 ई. में एडगर केयसी ने भविष्य कथन किया था कि भूकम्प के माध्यम से अटलांटिक महासागर में पुरानी सभ्यता के द्वीप समूह 1968 में ऊपर आने लगेंगे. 1968 में बहुत से गोताखोर, मछली पकडने वालों ने छिछले पानी में दीवारें, सडके और प्लेटफ़ार्म देखे. यह भविष्य कथन बिल्कुल सच निकला.
     एडगर केयसी के अनुसार अटलांटिक सभ्यता का विस्तार ’सरगोसा’ समुद्र से ’एजोर्स’ तक है. रूस के प्रसिद्ध भूगर्भ शास्त्री डा.मेरिया क्लिनोवा ने ’एकेडेमी आफ़ साइन्स आफ़ यू.एस.एस.आर.’ की ओर से प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया गया है, कि इन चट्टानों के साथ किसी पुरातन सुविकसित सभ्यता का इतिहास जुडा हुआ है.
     ’केयसी’ के अनुसार इस सभ्यता के लोगों ने सूर्य शक्ति का नियन्त्रण करके आधुनिक लेसर किरणॊं जैसे ’जादुई आग के पत्थर’ बना लिए थे. इनसे निकलने वाली किरणें आँखों से नहीं देखी जा सकती थी परन्तु उनकी प्रतिक्रिया पत्थरों पर होती थी. पत्थरों से ऎसी शक्ति निकलती थी जो जमीन पर चलने वाले वाहन, पानी के ऊपर व भीतर तथा हवा में चलने वाले वाहनों पर भी अपना प्रभाव डाल सकती थी.
      केयसी के कथनानुसार अटलांटिक सभ्यता के लोग ’एन्टीमैटर’ के हथियार प्रयोग करते थे. उन्होंने यह भी बताया कि वे सूर्य शक्ति से ऎसी ऊर्जा पैदा कर सकते थे जो परमाणु का विखण्डन कर सकती थी और उसी के दुरुपयोग से वह सभ्यता विनष्ट हो गई. केयसी के कथन का समर्थन लन्दन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ’पैट्रिक स्मिथ’ ने भी लिया है कि जो पिरामिड चित्र लिपि के अच्छे ज्ञाता हैं. स्मिथ के अनुसार अटलांटिक सभ्यता के उत्तराधिकारियों ने मैक्सिको, पेरू और मिस्र में पिरामिड बनाये हैं. इन पिरामिडॊं की बनावाट में पुनर्जन्म, आत्मा की अमरता, अनन्तता आदि सिद्धान्तों को शिल्पाकार दिया गया है. उन्हें ज्योतिर्विज्ञान का गहरा ज्ञान था-ऎसा पिरामिडॊं से पता चला है. ’चीजेन ईजा’ नामक पिरामिड में पत्थरों की ऎसी रचना बनायी गई है कि सूर्य की किरणें सर्पाकार मार्ग से पिरामिड के मूल में बने सर्प के मुख जैसी आकृतियों में पहुँचती हैं. वर्ष में दो बार सूर्य की किरणें बसन्त और शरद ऋतु में इस पिरामिड के सर्पाकार मार्ग से चढती-उतरती देखी जाती है.
    मिस्र के ’चेफ़्रैन’ नामक विशाल पिरामिड में किसी गुप्त रहस्य का उद्घाटन करने के लिए ’यू.एस.ए.’ और ’यूनाइटेड अरब रिपब्लिकसंयुक्त प्रयास कर रहे हैं.
     वैज्ञानिकों की मान्यता है कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के क्षेत्र का कोई सूत्र इन पिरामिडॊं की रचना में छिपा है. ये पिरामिड बिल्कुल ठीक उसी स्थान पर बने हैं, जो धरती का केन्द्र हैं. प्रत्येक पिरामिड की सतहें समबाहु त्रिभुजाकर हैं. सदियों से प्रेतों का आव्हान करने वाले और देवताओं का आव्हान करने वाले कर्मकाण्डी समबाहु त्रिभुजों का उपयोग करते देखे जाते हैं. आज के प्रसिद्ध ’आकल्टिस्ट’ फ़ास्ट, एलीस्टर, क्राडली आदि की मान्यता है कि इन त्रिभुजों की परिधि कभी अन्य लोकवासियों के बुलाने का माध्यम रही होगी.
     इन दिनों पृथ्वी की वायु, जल,स्थिति, उर्वरता, खनिज सम्पदा एवं शक्ति का औद्योगिक तथा वैज्ञानिक प्रयोजनों के निमित्त व्यतिरेक किया जा रहा है. फ़लतः इन सभी क्षेत्रों में प्रदूषण विकिरण बढ रहा है. इस बढती विषाक्तता से होने वाले भावी संकट से सभी चिन्तित हैं. इस चिन्ता में सूक्ष्मदर्शी वैज्ञानिकों ने एक कडी जोडी है, कि प्रुथ्वी के सुव्यवस्थित चुम्बकत्व के साथ खिलवाड न की जाय. यह तथ्य बहुत समय पूर्व ही माना जा चुका है कि यदि पृथ्वी की सही धुरी का पता लगाया और उस पर कस कर एक घूँसा लगाया जा सके तो इतने भर से परिभ्रमण पथ में भारी अन्तर ही नहीं, महाविनाश का संकट उत्पन्न हो सकता है. चुम्बकत्व की निश्चित दिशाधारा में व्यतिरेक उत्पन्न होने के परिणाम कितने भयानक हो सकते हैं, इसे उपर्युक्त निर्धारण से भली प्रकार माना जा सकता है.
     वृत्रासुर, हिरण्याक्ष, सहस्त्रार्जुन, रावण, कुम्भकरण जैसे अनेक वैज्ञानक बने. सब प्रकृति से छॆडखानी करने पर अपने और असंख्यों के लिए विपत्ति खडी कर चुके हैं. पिरामिड काल से पूर्व की मय-सभ्यता भी उसी उद्धत आचरण से विनाश के गर्त में गईं. इन दिनों उन्ही प्रयोगों की पुनरावृत्ति चल रही है. इसका क्या परिणाम हो सकता है, उसे अनुभव करके देखने की अपेक्षा यह अच्छा है, कि पूर्ववर्ती इतिहास से कुछ सीख और विनाश में कूदने से बचाया जाए. इन दिनों प्रकृति पर अधिकार करने की वैज्ञानिक महत्त्वाकांक्षाएँ धरती के चुम्बकत्व को डगमगा सकती है और ऎसे भविष्य की विभीषिका उत्पन्न कर सकती हैं जिससे उबरना कदाचित फ़िर कभी भी सम्भव न हो सके.
पता
103,, कावेरी नगर,
छिन्दवाडा(म.प्र.) 480-001
मोबा. - 09424356400

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

डॉ. कृष्‍ण कुमार सिंह ' मयंक ' की चार गजलें

डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ' मयंक '

1.

कभी बहार की रंगत, कभी खि़ज़ां का मिज़ाज।
कब एक जैसा रहा गर्दिशे - जहाँ का मिज़ाज।।

ग़ुरुरे - वक्‍़त से कह दो कि होश में आये,
जमीन पूछने वाली है कहकशां का मिज़ाज।

हमारे क़द की बुलंदी को नापने वालो,
हमारा हैसला रखता है आसमां का मिज़ाज।

नई बहार की ये दोरुख़ी अरे तौबा,
गुलों से मिलता नहीं सहने - गुलसितां का मिज़ाज।

समझने वाले मेरे दिल का मुद्दआ समझें,
है  लफ्ज़ - लफ्ज़ से ज़ाहिर मिरी ज़बां का मिज़ाज।

' मयंक ' मंजि़ले - मक़सूद का खुदा हाफि़ज़,
है कारवां से अलग मीरे - कारवां का मिज़ाज।

2

अब मुहब्बत के हों या हों जंग के यारो महाज।
हमने देखे हैं बहुत से रंग के यारों महाज।।

फि़तनाकारों के इरादे मिल गए सब ख़ाक में,
संग से तोड़े गए जब संग के यारो महाज।

भाई की गर्दन पे भाई ही की शमशीरें तनें,
क्या करोगे जीत कर इस ढंग के यारो महाज।

अपने हों या ग़ैर हों, होली में मिलते हैं गले,
आपने देखे नहीं हुड़दंग के यारों महाज।

जिस्म या धरती पे हमला तो सुना ऐ ' मयंक ',
अब सभी कहने लगे हर अंग के यारो महाज।
3
तड़प - तड़प के ही गुज़रेगी जिंद़गी शायद।
मेरे नसीब में लिक्खी नहीं खुशी शायद।।

सुलूक देख के लोगों का ऐसा लगता है,
वफ़ा की रस्म ज़माने से उठ गई शायद।

ज़माना क्या है ये मैंने समझ लिया लेकिन,
समझ न पाया ज़माना मुझे भी शायद।

किये हैं मैंने जो एहसान भूल जाएंगे,
मेरी वफ़ा का सिला देंगे वह यही शायद।

गुलों के रंगे - तबस्सुम से ऐसा लगता है,
उड़ा रहे हैं मेरे ग़म की ये हंसी शायद।

उदास - उदास जो चेहरे है अह्ले महफिल के,
उन्हें भी खलने लगी है मेरी कमी शायद।

गुनह का लेके सहारा ' मयंक ' दुनिया में,
ज़मीर बेच के आया है आदमी शायद।

4

यूँ लगा हो लाचारी विरोध।
क्या यही होता है सरकारी विरोध।।

हाथ जोड़े और नत्मस्तक भी है,
कर रहे हैं आज दरबारी विरोध।

मसअला हल ही न पाएगा कभी,
एक मुद्दत से तो है जारी विरोध।

अब समर्थन कोई करता ही नहीं,
बन गया है अब महामारी विरोध।

एक दिन ख़ामोश हो जाएंगे सब,
चार दिन का है ये अख़बारी विरोध।

आम जन बोले, कि यह है इन्‍क़लाब,
मंत्री बोले है ग़द्दारी विरोध।

इतना सच क्यों बोलते हो तुम ' मयंक' ,
जल्द ही झेलोगे तुम भारी विरोध।

पता

ग़ज़ल 5 / 507, विकास खण्ड
गोमती नगर, लखनऊ - 226010
मोबा. : 09415418569

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

बालकृष्‍ण गुप्‍ता ' गुरु ' की छह लघुकथाएं

सोच
-'' आ गए बेटा? '' चंदन लगाए, एक ऊँची तोंद वाले जनेऊधारी ने बेटे से पूछा।
- '' हाँ पिताजी। ''
- '' कहाँ गए थे ?''
- '' यजमान के यहाँ भोज में गया था। ''
- '' क्या - क्या खाया भोज में ? '' 
- '' दो पूरी और साग ?''
          उनका चेहरा उतर गया। लड़के को घूर - घूर कर देखने लगे। बेचारा, सिर नीचा करके चला गया।
- '' महँगाई के जम़ाने और कितना खाऊंगा ? '' लड़का सोचता है।
- '' मेरी नाक कटवाएगा यह । '' चंदनधारी सोचता है।
- '' जम़ाना तेज़ी से बदल रहा है। '' दोनों सोचते हैं।
झुका कंधा
     बेटे ने उसे काफी कीमती सूट दिया था। वह सूट में अच्छा लग रहा था। एकदम किसी बड़े अधिकारी के बाप जैसा। पत्नी की बड़ी इच्छा थी, इसलिए थोड़ी ना - नुकर के बाद सूट पहनने के लिए तैयार हो गया था।
बेटे ने पुराना सूट देते हुए बताया था - '' मेरे पास पूरे दस सूट हो गए हैं। वैसे यह ज़्यादा पुराना नहीं है। आखिर अफसर के बाप के पास कोई तरीके की ड्रेस तो होनी चाहिए। ''
     सूट पहनने के बाद बुजुर्ग ने पत्नी से कहा - '' बाकी सब तो ठीक है, बस, कंधा कुछ झुक गया है। '' इतना कहकर अपने कमरे में चला गया।
     पत्नी फोन पर ऊँची आवाज में बेटे को बता रही थी, या शायद पति को सुना रही थी- '' पहली बार सूट पहना है इसलिए कुछ हिचक रहे थे। कीमती सूट है न, इसलिए बड़े अच्छे लग रहे थे। ''
दर्द
     शिक्षक समयलाल के सामने समाचार पत्र पड़ा था और वे कुछ सोच रहे थे। मैंने पूछा - '' क्या सोच रहे हैं? ''
वे बोले - '' दो समाचार अगल - बगल छपे हैं। एक चालीस किलो का बकरा पाँच हजार रुपये में बिका। दूसरा - एक गरीब किसान ने अपनी जवान पत्नी पाँच हजार के बदले एक दलाल को दे दी। मैं सोच रहा हूं कि पहला तो एक ही बार हलाल होगा, परंतु दूसरी पता नहीं कितनी बार हलाल होती रहेगी। ''
गुलाब
     उसके घर के आँगन में पड़ोसी की बाड़ी लगी हुई थी। दीवार भी महज पाँच फुट ऊँची थी। इसलिए वह अपने घर का सारा कचरा बाहर कुड़ेदान में डालने के बजाय पड़ोसी की बाड़ी में फेंकना सुविधाजनक मानता था। यह सिलसिला कई महीनों से चला आ रहा था।
     अचानक एक दिन पड़ोसी बड़े - बड़े गुलाबों का गुलदस्ता लेकर भेंट करने पहुँचा। उसने आकर्षक गुलाबों की तारीफ की और गुलदस्ते के लिए धन्यवाद दिया। वह हैरान भी था। पड़ोसी ने मुस्कराते हुए बताया- '' यह सब आपकी ही मेहनत है। दरअसल, आप पिछले कई महीनों से जो कचरा हमारी बाड़ी में डाल रहे थे, वहाँ मैंने गुलाब के पौधे रोप दिए थे। कचरे की खाद की बदौलत ही ये फूल इतने आकर्षक हो सके। ''
सुबह का सपना
     उसने देखा, प्लेट पूरी तरह भरी हुई थी। चमचम, गुलाबजामुन, के साथ पकौड़े और कचौरियाँ भी। पुलाव था और रायता भी। उसने पेट भर खाया, प्लेट सामने खेलते बच्चों के सामने रख दी। पल भर में वह साफ हो गई।
     अचानक उसकी नींद खुल गई। पर सपना याद रहा।
     माँ का चेहरा अपनी ओर घुमाते हुए उसने कहा -  माँ, भूख लगी है। '' पर माँ चेहरा ढंक कर सो गई। उसके चेहरे से चादर हटाते हुए वह बोला -  सचमुच बहुत जोर की भूख लगी है।'' माँ ने एक चाँटा उसके गाल पर लगाते हुए कहा -  सुबह - सुबह तो सोने दे। ''
     इस बार उसने पूरी चादर खींच दी और चिल्लाया - '' माँ, बहुत भूख लगी है। कुछ भी खाने को दो। '' माँ ने उसके दूसरे गाल पर चाँटा रसीद करते हुए कहा - ''  ले, अब जा तू भी सो और मुझे भी सोने दे। भूख के कारण रात भर नींद नहीं आई।''
सवाल
     रमेश ने अपने पुत्र राम को महापुरुषों की जीवनी वाली पुस्तक ला कर दी थी। रात में राम ने बड़े चाव से पुस्तक पढ़ी। सुबह उसने पिता से पूछा - '' पापा, आपको देश के लिए सोचने, कुछ करने का मौका मिला था क्या? मिला, तो कुछ किया या नहीं कर पाए? ''
     स्कूल में अपने टीचर से पूछा - ''  क्या आपने महापुरुषों के बारे में पढ़ाते - पढ़ाते उनके रास्ते पर चलने के बारे में सोचा भी? कुछ प्रयत्न किया? '' 
     शाम को घर लौट रहा था, तो मुहल्ले के एक नेता जी दस - बीस लोगों के बीच भाषण दे रहे थे। राम ने पूछा - '' आपने भाषण में तो बहुत कुछ कहा, पर अपने ही कहे पर ईमानदारी से चले क्या?'' 
     वह दिन भर सवाल पूछता रहा, पर कहीं से भी जवाब नहीं मिला। हर जगह झिड़की, डाँट और फटकार ही मिली। घर में घुसता हुआ राम सोच रहा था - हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और होते हैं। यह कहावत उसने कोर्स की किताब में पढ़ी थी।
पता
डॉ. बख्शी मार्ग
खैरागढ़ - 491- 881
जिला - राजनांदगांव(छ.ग.)
मो.- 09424111454
ईमेल:ggbalkrishna@gmail.com         

डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्‍तव की दो कविताएं

            बसन्त    

जो विषम वाण से सज्जित है
मकरध्वज रथ को साथ लिये
मन पर शासन करने आया
ऋतुराज मदन को साथ लिये
स्वागत में पुष्पित पूर्ण धरा
कल कल झरना विरूदावलि है
मदमस्त पवन है अस्त शस्त्र
सेना उसकी भ्रमरावलि है
उच्छंृखल बहती चलती थी
सकुचाकर लज्जावनत हुई
किसा स्पर्श हुआ उसको
मर्यादित चंचल नदी हुई
वृक्षो ने वस्त्र नये पहिने
सर मुकुर बना कर देख रहे
कब लता उठे वे जरा
कब से उसका रूख देख रहे
तन बोराये मन बोराये
बोराये आमए बगीचो में
पदत्राण रहित वे नाच रहे
जो चलते सदा गलीचो में
पक्षी पेड़ो पर नाच रहे
नर्तन रत पुष्प हुये सारे
ऋतुराज नचाता तितली दल
नर्तन रत जग को करता रे
हिम ऋतु में सोये सिकुड़े थे
हिम खण्ड पिघलने लगते है
नदियों में अपने को खोकर
सागर तक चलने लगते है
वन श्री कर जागृत पुष्प खिला
केशरिया भाव जगाता रे
फिर वन नि:संग क्यों सोंप उसे
वह प्रचार ग्रीष्म को जाता रे
उदयाचल शिशिर ग्रीष्म पश्चिम
है ग्रीष्म पृष्ट और पूर्व शिशिर
है ऋतु वसन्त जलता दीपक
और शिशिर पिघलता एक तिमिर

          क्या वह धुंधलका है
प्रकाश कुछ छिपा नहीं सकता।
और अंधकार कुछ प्रकाशित नहीं कर सकता।
सब कुछ छिपा कर रखता है।
मगर इन दोनो का संधि स्थल
रहस्यमय लगता है।
बिल्कुल एक किशोर या किशोरी
जैसा वह विस्तृत क्षेत्र/जिस में प्रकाश
डूबता जाता है अंधकार में/या
अंधकार क्रमश: निर्वस्त होता
जाता है प्रकाश के समक्ष।
उसका क्या नाम सकता है घ्
संध्या तो हो नहीं सकता।
संध्या तो दिन और रात का
संधि स्थल है।
छाया के लिये प्रकाश
और सतह के बीच में एक
अमेद्य पदार्थ होना चाहिये/पर
छाया भी वह क्षेत्र नहीं है।
जिसे प्रकाश एवं
अंधकार के मध्य का स्थान कहां जा सके।
मेघो की धरती पर परछाई
वह स्थान हो सकती है क्या घ्
जलते दीपक और अंधकार के
गहन तिमिर के मध्य/वह
क्षेत्र हो सकता है जहाँ अंधकार
प्रकाश में चहलकदमी करता है
और प्रकाश अंधकार को 
अनावृत करने का प्रयत्न करता है।
ऐसा होता है वह विस्तृत क्षेत्र
जहाँ जागरण क्रमश: समाधि में
डूबता है और समाधि क्रमश:
जागरण में खुलती है।

पता

विष्णु नगर,परासिया मार्ग
छिन्दवाड़ा ( म.प्र.)पिन 480002
मोबाईल 09424636145

हर तरफ चली है

कविता सिंह ''वफा ''

हर तरफ चली है बात अपनी शनासाई की
साथ ही बात है अब तेरी बेवफाई की।

अब भी वही रात है चांदनी भी फैली है
पर सियाही कितनी है शब तेरी जुदाई की ।।

तस्कीन - ए - दिल था फिर से आमद का तेरे
कैसे कहूँ भूल गया बात थी रुसवाई की !!

रूदाद - ए - ग़म कह न सकी ख़त्म आशिकी का
बात दूर तक़ गई है तेरी आशनाई की !!

तुझमें '' वफ़ा '' थी नहीं कोई कहाँ माना ये
लोग जानते थे बात तेरी मसीहाई की ।।

सैंया भये कोतवाल

डॉ.पीसी लाल यादव

कोढ़िया, अलाल,दलाल, आज होगे मालामाल।
ऊँखरे बपौती होगे हे सबो, संगी सरकारी माल।।
कोनो बेचे ग गांजा - दारु,
कोनो लिखत हे सट्टा।
सरकारी जमीन के उन ला,
मिलगे हे फोकटे पट्टा।
गदहा डरुहात हे सब ला, ओढ़े बघवा के खाल।
कोढ़िया - अलाल - दलाल, आज होगे मालामाल।।
राजनीति अब सेवा कहाँ?
बनगे हे चोखा धंधा।
हर्रा लगे न फिटकिरी,
घर बइठे मिलय चंदा।
थाना - पुलुस घलो हे ऊंखरे, सैंया भये कोतवाल।
कोढ़िया - अलाल - दलाल, आज होगे मालामाल।।
मंत्री मन के आगू - पिछू,
घूमे ले बाढ़त हे भाव।
अधिकारी - करमचारी ऊपर,
जमत हे ठउका परभाव।
धमका - चमका के चम्मच, झारा होवत सबे लाल।
कोढ़िया - अलाल - दलाल, आज होगे मालामाल।।
गाँव - सहर म जेहू - तेहू,
धरलिन नेता के बाना।
करनी म कुछ खास नहीं,
सिरतोन होवत हे हाना।
गदहा खीर खावत मनमाने, घोड़वा के हाल - बेहाल।
कोढ़िया - अलाल - दलाल, आज होगे मालामाल।।

पता
साहित्य कुटीर
गंडई
जिला - राजनांदगांव (छत्‍तीसगढ़ )
मो.नं.: 09424113122

तइहा के जीनीस नंदा गे रे

गणेश यदु  
तइहा के बात ल बइहा लेगे, नवां जमाना आ गे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        पहाती समे ढेंकी के बजना,
        मूसर म जी मेरखू ल कूटना।
        जांता के घरर - घरर - घर करना,
        टेड़ा - पाटी म पानी पलोना।।
पनिहारिन के मुचमुच हंसना कहां गंवागे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        सड़क तीर खेत खार कहां गे,
        गाँव के खरिखाडांड़ कहां गे।
        चरांगन - चारा ल कोन ह खा गे,
        चरवाहा - राउत कहां परागे।
कसेली के दूध अउ दही कहां बोहागे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        छकड़ा गाड़ी, घांटी नंदागे,
        कुआं के टेड़ा - पाटी नंदागे।
        ढेंकी जाता - घानी ह नंदागे,
        गिल्ली , भौंरा अउ बांटी नंदागे।।
नानपन के खेलकूद ल कोन ह चोरागे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        मोटयारी के खोपा ह नइहे,
        खोपा म दावना, गोंदा नइहे।
        बेनी फुंदरा - फीता ह नइहे,
        मितान बदई के जोखा नइहे।
गोदना गोदइया अउ गवइया नंजरागे रे
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
       चुटकी, पइरी, पैजन अउ टोंड़ा,
        ऐंठी, पहूंची, ककनी - बनुरिया।
       सुंररा, सूंता, पुतरी - नवलखिया,
       फुली, खिनवा, ढार, बारी - पनिया।
ए गहना - गूठा के पहिरइया मन कहां गे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        हरेली परब म पान खोंचइया,
        भितिया म पुतरी  - पुतरा बनइया।
        बांस खाप के गेंड़ी बनइया,
        रेंहची अउ गेंड़ी के चघइया।
डंडा पचरंगा तुये के खेलइया कहां गे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        तीजा के लेनदार ह कहां गे,
        बेटी बर मया - दुलार कहां गे।
        सगा माने के रिवाज कहां गे,
        तीजा - पोरा म पियार कहां गे।
लइका मन के नंदिया बइला कहां भगा गे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        गुरतुर पपची, बोबरा - अनअइरसा,
        ठेठरी, खुरमी, सोंहारी बरा।
        अंगाकर - चीला, फरा दूधफरा,
        खाये पाबे अब काखर करा।
अइसन कलेवा - मिठई ल बनइया कहां गे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
        परवार बर पीरा - मया नइहे,
       दाई - ददा संग रहइया नइहे।
       गोरसी तीर बइठइया नइहे,
       किस्सा - कहिनी के बतइया नइहे।
लोक संस्किरिति - संस्कार के देवइया कहां गे रे।
मोला बड़ संसो होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
मोला बड़ संसों होथे जी, तइहा के जिनीस नंदागे रे।।
पता:
संबलपुर
जिला - कांकेर (छत्तीसगढ़) 494 635
मोबा. नं. 07898950591

काम नहींं जो करता


श्याम अंकुर 
काम नहीं जो करता कुछ उसका है मधुमास नहीं
दुनियां को जो ठगता जी उस पर कुछ विश्वास नहीं।

मन में जिसके हिम्मत है, पर्वत बौने मानो जी,
मंजिल का वह मालिक है, बनता यारो दास नहीं।

रोना रोते रहते जी कर्म नहीं जो करते कुछ,
कर्म सदा जो करते हैं, उनको दुख कुछ खास नहीं।

मान लिया है दौलत से मुठ्ठी में सब लोग रहे,
ठोकर जग में खाते वे दौलत जिनके पास नहीं।

फूल खिले हैं बागों में मौसम बहुत सुहाना सा,
' अंकुर ' वह ही दुखिया है जिसके मन उल्लास नहीं

पता :
हठीला भैरूजी की टेक
मण्डोला वार्ड, बारां - 325205
मो.नं. : 09461295238

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

तोर संग जोरेव पीरीत


विट्ठल राम साहू '' निश्छल ''

बिगन अंगना के सब घर इंहा, त तुलसी के कहां गंध।
सासन ह अब कर डरिस चीर हरन संग अनुबंध।।

पीरा बादर बनके बगरगे, कहाँ मिलही सुख के धूप।
सोनहा मिरगा के हे इंहां करोड़ करोड़ प्रतिरुप।।

कहां मया के बोली इहां, अब सुसके पीपर के छांव।
चौपाल तक मजहबी होगे हमर गाँव - गाँव।।

जउन मन ये राज ल बना दीन दुकान।
आज उकरे घर म साजे हावय गुलदान ।।

सुसकत हवय सुख, अब व्यथा सुनाथे गीत।
बस हमर अपराध इही, तोर संग जोरेन पीरीत।।

पता:
मौवहारी भाठा, 
वार्ड नं. - 18, 
महासमुन्द - 493 - 445
मो. - 09977543153