सोमवार, 31 अगस्त 2015

अगस्‍त 2015 से अक्‍टूबर 2015

संपादकीय
का सही म हम छत्‍तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये खातिर ईमानदार हन
आलेख
छत्‍तीसगढ़ की सांस्‍कृतिक धरोहर : रंग सरोवर - वीरेन्‍द्र '' सरल ''
मुक्ति पर्व : 15 अगस्‍त - महेन्‍द्र भटनागर
छत्‍तीसगढ़ के सरुप : डॉ. चितरंजन कर
कहानी
हरम: अजय गोयल
बंटवारा : योगेन्‍द्र प्रताप मौर्य
कभी - कभी ऐसा होता है : अजय ठाकुर
बिना टिकट: मनोज सिंह
एक और सूरज : जितेन ठाकुर
दाग : सुशांत सुप्रिय

व्‍यंग्‍य
रचनात्‍मक भ्रष्‍टाचार : कुबेर
अंगद का पॉंव : श्रीलाल शुक्‍ल
सुधर जाओ परसाई : शशिकांत सिंह ' शशि '
रामसिंह की मौत : हनुमान मुक्‍त
लघुकथा
प्राण शर्मा की दो लघुकथाएं
बंद दरवाजा : मुंशी प्रेमचंद
गालियां : चन्‍द्रधर शर्मा ' गुलेरी '
ओछी मानसिकता : मीरा जैन
सुधार : हरिशंकर परसाई
ईश्‍वर का चेहरा : विष्‍णु प्रभाकर
मिल कर रहना, मिल कर मुस्‍कुराना : प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव
गीत- ग़ज़ल- कविता
लाला जगदलपुरी की तीन रचनाएं
तीजा (छत्‍तीसगढ़ी गीत) :  नंदकुमार साहू
खादी के टोपी : कोदूराम ' दलित '
धर मशाल तैं ह संगी : सुशील ' भोले '
तीजा के लुगरा : थनवार निषाद ' सचिन '
भूख मरत ईमान गली म (मुक्‍तक) स्‍व. कुंजबिहारी चौबे
लोककथा
एक तोता और एक बूढ़ा बैगा : डॉ. विजय चौरसिया
अंधरी के बेटा ( छत्‍तीसगढ़ी ): विट्ठल राम साहू ' निश्‍छल' 
व्‍यक्तित्‍व
बहुआयामी कलाकार : सुरेश यादव : वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह
पुस्‍तक समीक्षा
माइक्रो कविता और दसवां रस अर्थात भावनात्‍मक भ्रष्‍टाचार का पोष्‍टमार्टम : समीक्षक यशवंत
' यूं ही' अशोक अंजुम का ग़ज़ल संग्रह : समीक्षक डॉ. शिवओम अम्‍बर
फिल्‍म आलेख
कहां गुम हो गई छत्‍तीसगढ़ी जनजीवन की झलक : भूपेन्‍द्र मिश्र


का हम छत्‍तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये खातिर ईमानदार हन

        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये के उदिम म महूं सामिल हो गेंव। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये सेती दू ठन बड़का - बड़का आयोजन करे रिहीस। एक रायपुर म अउ दूसर भिलई म। ये आयोजन म सामिल होय के घलोक मोला नेवता मिले रिहीस पर पहुंच नइ पायव। तीसर बड़का  आयोजन बिलासपुर म आयोजित करे गीस तिहां महूं संगी - संगवारी मन संग पहुंच गेंव।
        छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाये बर हमर भासनबाज नेता किसम के कलमकार अउ सासन सत्ता म बइठे नेता मन कतका ईमानदार हवे, मंय इही ल परखना चाहत रहेंव। पहिली तो मन म अइस कि दू दिन के भूंके म का वास्तव म छत्तीसगढ़ी राजकाज के भासा बन जाही। पर सिरिफ दू दिन के आयोजन के बात तब मोला समझ म अइस जब बिलासपुर म देखेंव कि छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर सकलाये लोगन मन कइसे सरकारी पइसा के धुर्रा उड़ावत हवै। जिंहा तक मंय समझथौं , ये दू दिन म जतका रुपिया बोहाये गीस ओतका रुपिया म कम से कम तीन ठन बेटी के बिहाव हो जातीस। छत्तीसगढ़ी के पन्‍द्रह - बीस ठन किताब छप जतिस।
        बिकसस तभे संभव होथे जब मुंहूं म पैरा गोंज के काम करे जाथे पर मंय देखेंव, छत्तीसगढ़ी ल राजकाज के भासा बनाये बर जुरयाये लोगन मन कार्यक्रम के जघा म बकर करिन, ठोसलगहा पेट भरिन, उचहा लाज म रुकिन, थैली भरिन अउ बिन डकार मारे लहुंट गे।
        जब अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने नई रिहीन। उन हर छत्तीसगढ़ अइन अउ छत्तीसगढ़ ल देख के उन ल लगीस होही कि छत्तीसगढ़ म बिकास के अपार संभावना हवै। उन हर तभे छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के नीयत बना लीन। उंकर नीति अउ नीयत साफ रहै के परिणाम, जइसे उन देश के प्रधानमंत्री बनीन, छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के घोषणा कर दीन। आज छत्तीसगढ़ म जउन बिकास अउ छत्तीसगढ़ के लोगन म बदलाव के रुप दिखत हवै ओहर सिरफ अउ सिरफ माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के देन आवै।
        जब छत्तीसगढ़ ल अलग राज बनाये के बेरा ये नइ देखे गीस कि कते क्षेत्र म साल - सागौन होथे। कते क्षेत्र म कोइला के भंडार हवै। कते मेर धान अउ कोदो - कूटकी होथे। सिरिफ इही देखे गीस कि कतिहा ले कतिहा तक छत्तीसगढ़ी बोलइया, समझइया मन बगरे हवै। इही ल निरधान करिन अउ उहें तक ल छत्तीसगढ़ राज म सामिल कर ले गीस।
        मतलब साफ हवै - पहिली छत्तीसगढ़ी बोली के निरधान होइस फेर छत्तीसगढ़ राज बर क्षेत्र के निरधान करे गीस। अतका सब कुछ होय के बाद भी हम मन ल आज छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा देवाये खातिर काबर आयोजन करे के जरुरत होवत हवै? हमला आत्ममंथन करे ल पड़ही,आत्मचिंतन करे ल परही का हमर नीति अउ नीयत साफ हवै या फेर हमर नीति अउ नीयत म खोंट हवै?
        आज छत्तीसगढ़ के बड़का - बड़का पद म ओमन बिराजमान हवै जउन मन के खानदान न कभू छत्तीसगढ़ी पढ़े होही, न लीखे होही मंय तो कहिथौं कतको झन के खानदान छत्तीसगढ़ी बोले घलक नइ होही? अइसन मन काबर छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनन दीही? कहूं अइसन आयोजन उंकरे मन के खेल तो नोहय?
गांव म खेल देखाये सेती मदारी आथे। डमरु बजाथे। गाँव वाले मन जुरिया जाथे। मदारी खेल देखाथे। गाँव वाले मन तारी पीटथे। रुपिया दू रुपिया सकेल के मदारी चले जाथे। कहूं हम मन घलक अइनेच तो नइ करत हवन? हम मन ल सोचे ल परही, गुने ल परही ....। 
सम्‍पादक

छत्‍तीसगढ़ की सांस्‍कृतिक धरोहर : रंग सरोवर

वीरेन्‍द्र ' सरल '
शस्य श्‍यामला भारत भूमि की दुलारी बेटी रत्नगर्भा छत्‍तीसगढ़ महतारी न केवल वन संपदा और धन-धान्य से परिपूर्ण है बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति के मामले में भी बड़ी समृद्ध है। सुआ, ददारिया करमा, पंथी, पंडवानी, जस गीत, भोजली और जंवारा यहां के संस्कृति की धड़कन है। इसलिए भारत के मान चित्र पर छत्‍तीगढ़ की पहचान केवल भौगोलिक स्थिति के आधार पर निर्मित एक पृथक नये राज्य की ही नहीं बल्कि अपनी सांस्कृतिक समृद्धि के कारण  पूरे विश्‍व में है। आज जब जीवन के हर क्षेत्र में पाश्‍चात्य संस्कृति और व्यवसायिकता का  दुश्प्रभाव स्पष्‍ट दिखलायी पड़ रहा है तो ऐसे समय में कलाकारों का भी इससे अछूता रह पाना नामुमकिन नही तो कठिन अवश्‍य है। इसलिए कला मंचो पर अश्‍लील, फुहड़ और दो अर्थी संवादों के माध्यम से दर्शको को रिझाने वाले कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है। पैसा कमाने और सस्ती लोकप्रियता बटोरने  के फेर ने कलामंचों पर एक प्रश्‍न चिन्ह लगा दिया है। ऐसे समय में विशुद्ध रूप से अपनी कला संस्कृति के माध्यम से दर्शकों को रात भर बांधकर रखना एक कड़ी चुनौती साबित हो रही है। इस चुनौती को अपने मजबूत इरादों के कारण 'रंग सरोवर ' ने सहजता से स्वीकार कर लोक कला मंचों पर अपनी अनुपम प्रस्तुति देने के लिए कृत संकल्पित है। जो लोग परिस्थतियों से न तो हार मानते है और  न  ही उससे समझौता करते है बल्कि धारा के विपरीत चलकर जीतने का साहस रखते वही लोग लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच कर कामयाबी का पताका फहराते है और इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने में सफल होते है। बस इसी विश्‍वास को अपने मन में बिठाकर 'रंग सरोवर' के कलाकार छत्‍तीसगढ की सांस्कृतिक पताका लेकर छत्‍तीसगढ़ के साथ- साथ देश के अन्य प्रान्तों के कलामंचो पर सफलता के कीर्तिमान गढ़ने का स्तुत्य प्रयास कर रहें है।
        मुझे यह तो पता नहीं कि किस घटना या किस व्यक्तित्व की प्रेरणा से रंग सरोवर का गठन किया गया होगा पर इसकी मनमोहक प्रस्तुति देखने के बाद यह बात मैं दावें के साथ कह सकता हूँ कि रंग सरोवर लोक संस्कृति को पूर्णत: समर्पित ऊंगलियों पर गिनी जा सकने वाली चुनिंदा संस्थाओं में से एक हैं। इसकी प्रस्तुति की प्रतीक्षा दर्शक बेंसब्री से करते रहते है। जैसे-जैसे मंचन का समय और तिथि नजदीक आती जाती है वैसे-वैसे ही दर्शको का मन पुलकित होने  लगता है। प्रस्तुति के काफी पहले से ही कार्यक्रम स्थल पर दर्शको की भारी भीड़ लग जाती है। इंतजार की घड़िया समाप्त होते ही जब स्टेज के माइक पर रंग सरोवर के कला यात्रा का परिचय कराते हुये मंच संचालक श्री त्रेता चन्द्राकर की खनकदार आवाज गूँजती है तो दर्शको की निगाहें सीधे मंच पर टिक जाती है और ऐसे टिक जाती है कि कार्यक्रम के समापन के पहले वहाँ से हटती ही नहीं।
        विरासत में मिली कला को आत्मसात कर लोक संस्कृति को सहेज कर अपनी अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित करने के लिए संकल्पित आदरणीय भाई भुपेन्द्र साहू की परिकल्पना श्रद्धेय भाई मिथिलेश साहू  की मधुर आवाज के साथ मिलकर मंच पर साकार होने लगती है। मंच पर श्री मिथलेष साहू की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, नेपथ्य में श्री भूपेन्द्र साहू की भूमिका उससे बिलकुल कम नहीं है। छत्‍तीसगढ़ महतारी के वंदना गीत से जब कार्यक्रम का शुभारंभ होता है तो स्थल दर्शको की तालियों और छत्‍तीसगढ़ महतारी की जयकारा से गूँज उठता है। लोकधुन पर भाव नृत्य करते हुये नर्तको के पांव जब थिरकने लगते है। लोक संगीत की स्वर लहरियों के साथ जब लोक गायकों की सुमधुर आवाज कानो पर रस घोलने लगती है और जब दृष्यानुकूल रंगीन प्रकाशपुंज स्टेज पर झिलमिलाने लगता है तो दर्शकों पर ऐसा नशा छा जाता है जो उन्हें झूमने और नाचने के लिए मजबूर कर देता है। सुआ ,ददारिया करमा, पथी ,,पंडवानी, भोजली, जंवारा की झांकी मंच पर जीवन्त हो उठती है। दर्शको को अपनी माटी की सौधी महक महसूस होने लगती है। अपने गौरवशाली सांस्कृतिक संपदा से साक्षात्कार होने पर सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है और छाती तन जाती है। मन सोचने के लिए बाध्य हो जाता है कि सचमुच आज हम पाश्‍चात्य संस्कृति की अंधानुकरण करके कहीं अपनी ऐसी अनमोल दौलत को खो तो नहीं रहे हैं जो हमारे पुरखे हमें विरासत में दे गये है और जो हमारी अस्मिता की जान और हमारे प्रदेश की पहचान है। आखिर क्यों हम अपनी जड़ो से कट रहे है, क्यों अपनी संस्कृति की उपेक्षा करने पर तुले हुये है? अपनी लोक संस्कृति को खोकर आखिर हम अपनी नई पीढ़ी को क्या देने जा रहे हैं?
         रंग सरोवर के एक दृश्‍य में जब दादा बने कलाकार अपने पोते से कहता है कि बेटा! मोला डर लागथे हमर अतेक पोठ लोक संस्कृति कहूं नंदा तो नइ जाही? तो इस संवाद से संस्कृति क्षरण की पीड़ा स्पष्‍ट झलकती है। ऐसा लगता है मानो हमारी आत्मा हमसे ही प्रश्‍न कर रही है कि ये अंधी आधुनिकता आखिर हमें किस खाई पर ढकेलने जा रही है।
        रंग सरोवर के मनमोहक प्रस्तुति में श्री मिथलेश साहू, फागु तारक, छाया चन्द्राकर ,पूर्णिमा नेताम और तीजन पटेल के सुमधुर स्वर से सुसज्जित श्रृंगार गीतों के साथ ही लधु लोकनाटयों के माध्यम से लोकविलक्षण का पावन उद्देश्‍य भी है। एक ओर जहाँ खानाबदोश पर कला प्रेमी देवार जाति के गरीबी, अभाव, उपेक्षा और शोषण की पीड़ा है वहीं दूसरी ओर जीवन के शाश्‍वत सत्य प्रेम का प्रकटीकरण भी है। 'मया के मड़वा' में जहाँ  प्रेमी युगल के मिलन की सुखान्त अनुभूति है तो वहीं 'मया के बंधना' में समाज के दीवारों से सिर टकराकर दम तोड़ चुके प्रेमी युगल के अतृप्त आत्माओं की अधूरी प्रेम कहानी का मंचन भी है। रंग सरोवर कें मंचन के समय ज्यों-ज्यों रात गहरी होती जाती है त्यों-त्यों रंग सरोवर का रंग और भी अधिक गाढ़ा होता जाता है। 'लहर बुंदिया' लोक नाटय में झूठे प्रेम जाल में फँसकर आर्थिक रूप से बरबाद होते युवाओ की कथा है तो गरीबी के कारण किसी युवती के लहरबुदिंया बन जाने की व्यथा भी है। मजेदार बात यह है कि इन लघु लोकनाटयों में हास्य का पुट कूटकूटकर भरा है। जिसके कारण इनमें निहित गंभीर संदेश दर्शको के दिल दिमाग तक पहुँच पाने में सफल होता है।
        रंग सरोवर की प्रस्तुति कई बार देखने के बाद मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि मंजे हुये गायक, सधे हुये वादक और अभिनय की कसौटी पर कसे हुये कलाकरो से सुगठित, लोक संस्कृति की संवाहक कलामंच को ही छत्‍तीसगढ़ की जनता ने रंग सरोवर के प्यारा सा नाम देकर मान और सम्मान दिया है। इसलिए यदि कम से कम शब्दों में इसका परिचय दिया  जाय तो इसे छत्‍तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर, 'रंग सरोवर' कहना ही अधिक उपयुक्त होगा।
बोड़ला, मगरलोड, 
जिला - धमतरी (छ.ग.)

छत्‍तीसगढ़ के सरूप

डॉ.चितरंजन कर 

        छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ के डेढ़ करोड़ लोगन के मातृभासा, संपर्क भासा, ये अउ तीर - तखार के उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,अउ झारखण्ड के इलाका मन म तइहा ले रहत आत छत्तीसगढ़िया मन के भासा ए। छत्तीसगढ़ी के संगे - संग हमर राज म हलबी, गोंडी, कुउख, दोर्ली, परजी, भतरी, उड़िया, मराठी भासा मन के बोलइया मन घलो हवै। जउन मन छत्तीसगढ़ी के बेवहार करथें।
        छत्तीसगढ़ ह हिन्दी भाषी प्रदेश मन के सूची म क बरग म आथे। मतलब ये हे कि छत्तीसगढ़ी अउ हिन्दी हमर राज म सहोदरा बहिनी सही रथें। छत्तीसगढ़ी हो कि कउनो भासा होए, ओ ह तभे बढ़े सकही, जब ओ ह आने भासा मन के संग म संवाद करही। दू या तीन भासा के सम्पर्क म आदान- परदान होबेच करही अउ सब्द मन एती ले ओती जाबेच करही। फेर बियाकरन ह ओकर ले परभावित नइ होवै।
        छत्तीसगढ़ी म हिन्दी, संस्कृत अरबी, फारसी, अंगरेजी, उड़िया, मराठी अउ कउन - कउन भासा मन के सब्द मन आके रच बस गिन हें। फेर ओमन अब छत्तीसगढ़ी के हो गिन हें।
        असल म सब्द मन के जाति, बरग, इलाका धरम अब्बड़ उदार रथे। जेकर कारन ओ मन सुछिंद एती - ओती जात - आत रथें। असली लोकतंत्र भासा म नजर आथे। तभे ओ ह जनसाधारण के पूंजी होथे। तुलसी बबा ह अपन रामचरितमानस म सिरिफ अवधि के सब्द मन के परयोग नइ करे हें, बलकिन अरबी, फारसी, अउ संस्कृत के सब्द मन ल सइघो या अपन भासा के मुताबिक रेंदा मार के अपनाए हें। तभे तो आज रामचरितमानस ह अतका लोकप्रिय होइस अउ कतकोन आने भासा मन म ओकर अनुवाद होइस। अंगरेजी म हमर भासा के हजारों सब्द जस के तस ले लिए गे हे। इही कारन ए कि ओ ह दिन दुनिया म बगर गे हे। भासा ह एक नदी समान हे। ओ ह सुछिंद बोहाथे, तभे ओकर पानी ह निरमल रथे। ओ ल बियाकरन ह बांधे नहिं ओकर बरनन करते, ओकर बेवस्था ह सब्द मन ले बिगाड़े नहिं। भासा के सरूप तब बिगड़थे, जब ओकर बियाकरन ह परभावित होथे। बियाकरन का ओ ह सब्द मन के संरचना अउ वाक्य के संरचना के बेवस्था ए जेन म पुरुषवाचक सर्वनाम, क्रिया अउ अव्यय क्रिया विशेषण समुच्चय बोधक, संबंध बोधक, विस्मयादि बोधकद्ध मन असली होथें। ए मन के सेती भासा ह आने भासा ले अलग साबित होथे, जइसे मैं डॉक्टर करा गे रहैं। कहे म हमर भासा के बियाकरन ह परभावित नइ होए डॉक्टर सब्द अंगरेजी के ए । लेकिन जब मैं के जगह म आई या अहम् कहें जाए या गे रहैं के जगह म हेव गान कहे जाए तब ओ ह छत्तीसगढ़ी नइ रहे सकै।
        छत्तीसगढ़ी म आने भासा के अनेक परकार के सब्द लिए गे हे। ये म व्यक्तिवाचक संज्ञा अउ पारिभाषिक सब्द मन ल हमन जस के तस लेथन, जइसे मंत्री, प्रशासन, राष्ट्रपति, राज्यपाल राष्ट्रसंघ, विश्वहिन्दी परिषद आदि। व्यक्तिवाचक नाम मन ल जस के तस लिखे जाथे। भले ही ओकर उच्चारन हमन अपन अनुसार करथन। जइसे सुरेश ल छत्तीसगढ़ी म सुरेस बोले - पढ़े जाथे, शंकर ल संकर ए क्षमानिधि ल छिमानिधि ए कुरुक्षेत्र ल कुरुच्छेत्र आदि। काबर कि लिखना अउ बोलना अलग - अलग बेवस्था ए। दुनिया म जतका भासा हें, ओ मन के कमोवेश इही हाल ए। हमन जइसे बोलथन, ओइसे न तो लिखन अउ न ही लिखे ल ओइसे पढ़न।
भासा म भेद के कारन अउ कुछु नइ इही उदार मानसिकता होथे। भासा के बेवहार करइया मनखे ए अउ दू झन मनखे एकेच भासा ल एकेच परकार म नइ बोलें। चार कोस म पानी बदले, आठ कोस म बानी, के मतलब केवल छेत्रभेद नो हे ओ ह समाज, व्यक्ति, परिस्थिति भेद घलो आए। जउन भासा के बेवहार - क्षेत्र जतका बड़े होही, ओ म अइसन भेद जादा रही। हिन्दी या अंगरेजी के क्षेत्रभेद ल तो हमन सब जानत हन। महर्षि पतंजलि अपन महाभास्य म अपन समय म अइसन भासा भेद ल चिन्हित अउ बताइन कि गोष् सब्द के गौ, गावी, गोणी, गोपोत्रलिका जइसे भेद जगह - जगह बेवहार होत रहिस। एकर मतलब ये हे कि कउनो भासा अपने - अपने बनै या बिगरै नहीं, ओकर बोलइया मन के अनुसार ओ ह अपन आकार धारन करथे। जतका अउ जइसे भासा के गियान मोला हे, उहीच ह असली ए अउ आने मन के ह ना हे. ए सोच ह दरिद्री के लच्छन ए। भासा के बेवहार क्षेत्र म छोटे - बड़े सबे के हिस्सा अउ अधिकार होथे। तभे भासा ह समाज अउ संस्कृति के भार ल बोहे सकते अउ ओ ल एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी तक ले जाए म सच्छम होथे।
        हमर छत्तीसगढ़ म आने भासा के बोलइया मन जब छत्तीसगढ़ी बोलथें त ओ म अपन भासा या बोली के सब्द मन आबेच करहीं अउ ओकर ले छत्तीसगढ़ी ह पोठात जात हे। छत्तीसगढ़ी के क्षेत्रीय भेद गना, इही आने भासा के हाथ हे, जउन ल छत्तीसगढ़ी बर सुभ लच्छन मानना चाही।
रायपुर (छ.ग.)

मुक्‍ित का पर्व : 15 अगस्‍त

महेन्‍द्र भटनागर

प्रत्येक प्राणी स्वतंत्रता चाहता है। दासता की शृंखलाओं से उसे घृणा है। सब प्राणियों में मनुष्य सबसे उन्नत और विवेकशील प्राणी है। ऐसी अवस्था में स्वतंत्रता की चाह उसमें उत्कट रूप में होनी ही चाहिए। स्वतंत्रता की भावना मनुष्य की मनुष्यता का एक अंग है। जो मनुष्य स्वंतत्रता नहीं चाहता अथवा उसके पाने के प्रयत्न नहीं करता वह पशु से भी गया गुज़रा है। वह धरती पर व्यर्थ का भार है। उसे मानवीय जीवन अपनाने का अधिकार नहीं।
स्वतंत्रता ! कितना प्यारा शब्द है। स्वतंत्रता शब्द को सुनकर हमारा मस्तक ऊँचा उठ जाता है। हृदय में आनन्द की हिलोरें उठने लगती हैं। परतंत्रता के साथ समस्त सुख - सुविधाएँ भी हेय हैं य पर स्वतंत्रता के साथ भूखए ग़रीबी और कष्ट भी अंगीकार करने योग्य हैं। महाकवि तुलसीदास के शब्दों में पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।
मनुष्य ने सभी कालों और सभी देशों में स्वतंत्रता - देवी को वरण करने के लिए असंख्य बलिदान किये हैं। बिना उसको पाये वह एक पल भी चैन से नहीं बैठा हैय क्योंकि स्वतंत्रता उसके देश के स्वाभिमान की रक्षिका है। और देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए मर - मिटने में ही मनुष्य की महानता है। ऐसे मनुष्यों के नाम मानवीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाते हैं। वे हमारे प्रेमए आदर और श्रद्धा के पात्र होते हैं। इतिहास हमें बताता है कि एकता की भावना के अभाव के कारण हमारे देश भारत की स्वतंत्रता जाती रही। साम्राज्य.लोलुप अँग्रेज़ एक दिन सौदागर के वेष में हमारी धरती पर आये और हमसे व्यापार की सुविधाएँ माँगीं। भारत ने अपनी परम्परागत उदारता के फलस्वरूप सहज ही उन्हें वे सुविधाएँ प्रदान कीं । पर जिस तरह उँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ा जाता है। ठीक उसी तरह अँग्रेज़ों ने धीरे - धीरे हमारी दुर्बलताओं से लाभ उठाकर पूरे देश पर अधिकार कर लिया। भारत पराधीन हो गया। हम, हमारी धरती, हमारा आसमान और हमारा भविष्य सब परतंत्रता के कठोर - सीख़चों में आबद्ध हो गये।
पर हमारी स्वतंत्रता की भावना को कुचला न जा सका। विदेशी शासन के विरुद्ध भारतीयों ने संघर्ष किये। भारतीय स्वाधीनता - संग्राम की पहली लड़ाई सन् 1857 में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में लड़ी गयी। आगे चलकर सन् 1885 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। जिसने सम्पूर्ण देश में स्वातंर्त्य - संग्राम को सुव्यस्थित रूप दिया तथा जिसके तत्वावधान में अनेक आन्दोलन हुए। सर्वप्रथम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वंतत्रता का महामन्त्र फूँका और स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है का हमें प्रेरणादायक नारा दिया। महात्मा गाँधी ने काँग्रेस के तत्वावधान में अनेक आन्दोलनों का सूत्रपात किया। सन् 1920 - 21 के असहयोग और सविनय आज्ञा - भंग के आन्दोलन ने राष्ट्रीय चेतना के फैलाने में सर्वाधिक योग दिया। सरदार भगतसिंह आदि के बलिदान ने स्वतंत्रता की ज्वाला को और प्रज्वलित कर दिया। 26 जनवरी 1930 को श्री जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर - अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता के प्रस्ताव की घोषणा की। सन् 1942 में एक ओर गाँधीजी ने करो या मरो और भारत छोड़ो का मंत्र प्रदान किया तो दूसरी ओर सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिन्द फौज का अभियान दिल्ली चलो के नारे के साथ प्रारम्भ हुआ। इस घटना ने अँग्रेज़ी शासन के प्रति भारतीय सैनिकों की वफादारी को सामप्त सा कर दिया। समूचा भारतवर्ष स्वतंत्रता - प्राप्ति के लिए तड़प उठा। जगह - जगह अपूर्व बलिदान हुए।
इसी बीच महायुद्ध के कारण ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति बिगड़ी। साम्राज्यवादियों ने देखा कि अब भारत पर शासन करना बड़ा दुरूह और महँगा है य अत: उन्होंने उसे स्वतंत्र करने की घोषणा की, जिससे उनके आर्थिक हित सुरक्षित रह सकें। यही नहीं, भारत को सदैव कमज़ोर बनाये रखने की नीयत से उन्होंने उसके दो टुकड़े भी कर दिये। भारतीय नेताओं को विवश होकर विभाजन स्वीकार करना पड़ाय क्योंकि अस्वीकृति की दशा में स्वतंत्रता - प्राप्ति में विलम्ब तो होता ही, सम्पूर्ण देश हिन्दू - मुस्लिम दंगों से जर्जरित भी हो जाता और इस प्रकार हमें बहुत बड़ी राष्ट्रीय हानि चुकानी पड़ती । अन्त में 15 अगस्त 1947 के दिन देश की बागडोर हमारे प्रिय नेताओं के हाथ में आ गयी। 15 अगस्त 1947 का दिन हमारी जनता काए लगभग 200 वर्षों की दासता से मुक्ति - प्राप्ति का दिन है। 15 अगस्त ने हमारे देश के बहुमुखी विकास के द्वार खोल दिये और हमें विश्व के अन्य उन्नत देशों की पंक्ति में खड़ा होने योग्य बनाया। 15 अगस्त हमारी विजय के उल्लास का दिन है। वह असंख्य बलिदान हुई आत्माओं की मनोकामनाओं के पूर्ति का दिन है। उसे हम एक राष्ट्रीय - पर्व के रूप में प्रतिवर्ष मनाते हैं।
स्वतंत्रता दिवस को नगर में प्रभात फेरियाँ निकलती हैं। वन्देमातरम और जन गण मन के राष्ट्रीय गानों के साथ चक्र चिन्हित तिरंगा राष्ट्रीय झंडा फहराया जाता है। पुलिस - परेड, खेल - कूद, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। जिनमें वाद - विवाद, कवि सम्मेलन, नाटक आदि प्रमुख हैं। रात को नगर में रोशनी की जाती है। इस प्रकार बड़ी धूम - धाम और बड़े उत्साह के साथ हम प्रतिवर्ष 15 अगस्त के राष्ट्रीय त्योहार को मनाते हैं।
स्वतंत्रता का यह अर्थ नहीं है कि हम मनमानी करें। स्वतंत्र शब्द स्व और तंत्र शब्दों से बना है। अत: स्वतंत्रता का अर्थ हुआ, अपने द्वारा निर्मित नियमों के अनुसार जीवन - यापन करना। कुछ लोग स्वतंत्रता को नासमझी के कारण अराजकता समझ बैठते हैं। जिस तरह हमें अपना विकास करने की स्वतंत्रता हैं उसी प्रकार दूसरे को भी। उदाहरण के तौर पर कहा जाता है आपको स्वतंत्रता है आप जिस तरह चाहे लाठी चला सकते हैं,पर यह स्वतंत्रता वहाँ समाप्त हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक शुरू होती है, क्योंकि वह मेरी स्वतंत्रता का क्षेत्र है। आज हमारा कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ जनता को बताएँ और तन मन धन से उसकी रक्षा की दृढ़ प्रतिज्ञा करें। 15 अगस्त के दिन स्वातंत्रता संग्राम के शहीदों के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करना भी हमारा नैतिक और मानवीय कर्तव्य है। 15 अगस्त को हमने जो अपनी खोयी हुई स्वतंत्रता प्राप्त की है वह अमर हो ! हम और दुनिया के अन्य सभी देश अपने - अपने स्वतंत्रता - दिवस सदैव उत्साह और उल्लास से मानते रहें।

सर्जना भवन, 110 बलवन्तनगर, 
गांधी रोड, ग्वालियर - 474 002 म. प्र.
0751 - 4092908, 8109730048

बहुआयामी कलाकार : सुरेश यादव

वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह

वीरेन्‍द्र बहादुर सिह
        संगीत साधना वस्तुत: ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा की मुखर अभिव्यक्ति है। संगीत साधक अपनी साधना एवं प्रस्तुतियों से अपने व्यक्तित्व का विकास कर अपनी माटी और परिवेश को गौरवान्वित करते हैं। लोक संगीत के क्षेत्र में ऐसी ही अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने वाले एक कलाकार हैं सुरेश यादव, जिन्होंने भजनों से लेकर जसगीत एवं पारम्परिक लोकगीतों से लेकर फागगीत के गायन तथा सुगत संगीत से लेकर हारमोनियम, बेंजों एवं ढोलक नंगाड़ा जैसे स्वर एवं अवनद्य दोनों वाद्यों पर अपने सधे हुए हाथों का कमाल दिखाकर तथा नृत्य तथा नाट्य निर्देशन में अपनी कला को और जीवंत तथा मुखरित किया है।
सुरेश यादव
        लोक मंचों पर गायक-वादक दोनों भूमिका का सहजतापूर्वक निर्वहन करने वाले श्री सुरेश यादव का जन्म 02 जुलाई 1967 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के  छुईखदान नगर में एक मध्यमवर्गीय यादव परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री बनवाली यादव एवं माता का नाम श्रीमती मेहतरीनबाई यादव था। श्री यादव अपने माता-पिता की पहली संतान हैं। उन्होंने प्रायमरी से लेकर मिडिल स्कूल तक की शिक्षा छुईखदान के शैक्षणिक संस्थानों में पूर्ण की। तदुपरान्त शासकीय सेवा के दौरान उनकी माताजी का स्थानांतरण क्रमश: कुसमकसा (राजहरा) एवं बेमेतरा होने कारण हायर सेकेण्डरी स्कूल की परीक्षा उन्होंने 1985 में शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला बेमेतरा से उत्तीर्ण की।
        कुछ समय के अंतराल के पश्चात उन्होंने स्वाध्यायी छात्र के रूप में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर से 1990 में  कला स्नातक एवं 1992 में इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। लोक संगीत में गहरी रूचि के चलते उन्होंने वर्ष 2002 में स्वाध्यायी छात्र के रूप में इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से द्विवर्षीय लोक संगीत में डिप्लोमा विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
        श्री यादव को बचपन से ही गायन का शौक था। स्कूली शिक्षा के दौरान जब वे कक्षा चौथी के विद्यार्थी थे तो स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उनके द्वारा मधुर स्वर में प्रस्तुत किये गये एक देशभक्ति गीत से प्रसन्न होकर नगर पालिका प्राथमिक शाला नम्बर एक छुईखदान के तत्कालीन कक्षा चौथी के कक्षा शिक्षक पं. श्याम प्रसाद तिवारी ने उन्हें पहली बार पुरस्कृत किया। इसी पुरस्कार ने श्री यादव को गायन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और वे गायन के क्षेत्र में अग्रसर हुए। बाद में श्री यादव ने अपने स्कृली जीवन में अनेक बार सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी गायन शैली से श्रोताओं को प्रभावित किया तथा पुरस्कृत एवं सम्मानित हुए।
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वे लगभग छह-सात वर्षों तक गण्डई-पण्डरिया में अपने मामा के पास रहे तथा उनके व्यवसाय में हाथ बंटाया। इसी दौरान उनका संपर्क पण्डरिया में मां शीतला सेवा समिति से हुआ और शीघ्र ही वे इस समिति के सदस्य के रूप में शामिल हो गये। श्री यादव मूलत: गायक तो थे ही उन्होंने पण्डरिया में इस समिति के सानिध्य में  देवी जसगीत गायन की बारीकियां सीखी। साथ ही उन्होंने शौकियाना तौर पर हारमोनियम, बेंजों, ढोलक एवं नंगाड़ा वादन सीखा। शीघ्र ही वे इन वाद्यों को बजाने में दक्ष हो गये।
        लोकसंगीत में रूचि के कारण वे गण्डई-पंडरिया की लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी लोक सांस्कृतिक संस्था ''मया के फूल''  में शामिल हो गये। इस संस्था में उन्होंने अनेक बार गायक एवं मंच संचालक की दोहरी भूमिका निभाई। उन्होंने लोकगायक धुरवाराम मरकाम एवं सुप्रसिद्ध लोकगायिका दुखिया बाई के साथ कई कार्यक्रमों में गीत प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी। गण्डई पंडरिया में युवा मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने ''सप्तरंग''  सांस्कृतिक संस्था का गठन किया तथा अपने गण्डई प्रवास के दौरान उसका लगातार संचालन किया। श्री यादव को सुप्रसिद्ध भरधरी गायिका रेखा जलक्षत्रिय एवं पंडवानी गायिका श्रीमती रितु वर्मा के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत करने का गौरव भी प्राप्त है।
        श्री सुरेश यादव सन् 1993 में अपने जन्मस्थान छुईखदान वापस लौट आये। यहां उन्होंने श्री जगन्नाथ फाग भजन एवं जस समिति का गठन किया। इस समिति में वे रचनाकार, गायक एवं ढोलक वादक की तिहरी भूमिका निभाते थे। इसके अलावा उन्होंने कुछ समय के लिए अस्तित्व में आये ''जयभारती'' पार्टी छुईखदान के गायक के रूप में हिन्दी फिल्मों के कई गीतों को अपना स्वर दिया। श्री यादव ने नब्बे के दशक में छुईखदान में स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में निर्देशक की भूमिका निभाई। उन्होंने स्कूली बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये नृत्यों की कोरियोग्राफी कर अपनी परिकल्पना को बच्चों के माध्यम से मंच पर साकार किया। उनकी प्रस्तुतियां अधिकांश अवसरों पर सराही गयी।
        हंसमुख एवं मिलनसार स्वभाग के श्री सुरेश यादव ने 1994 में संपन्न नगर पंचायत चुनाव में वार्ड क्रमांक-2 छुईखदान से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पार्षद का चुनाव जीता एवं अपनी क्षमतानुसार वार्ड एवं नगरवासियों की सेवा की। श्री यादव हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान के उपाध्यक्ष हैं तथा लंबे समय तक छुईखदान की सक्रिय रचनात्मक संस्था ''प्रेरणा'' से जुड़े रहे।
        श्री यादव के नेतृत्व में उनकी संस्था ''सतरंग'' गण्डई पण्डरिया ने 1994 में 17 मार्च से 24 मार्च 1994 तक भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (युवा कार्य एवं खेल विभाग) द्वारा उत्तरप्रदेश के नेहरू युवा केन्द्र अमेटी के तत्ववधान में आयोजित ''राष्ट्रीय एकता शिविर'' में अविभाजित मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम की समाप्ति के पश्चात उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा एवं तत्कालीन केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री केप्टन सतीश शर्मा ने उन्हें एवं उनकी टीम को सम्मानित किया।
        सहज स्वभाव वाले श्री यादव ने अनेक मंचों पर अपनी सहभागिता दर्शायी है। भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित छत्तीसगढ़ लोककला महोत्सव 1992 में उन्हें गायक के रूप में एवं छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव दल्ली राजहरा में 1996 में उन्हें ढोलक वादक के रूप में सम्मानित किया गया। नेहरू युवा केन्द्र राजनांदगांव द्वारा 1994 में उन्हें गायन एवं नृत्य निर्देशन का प्रथम पुरस्कार दिया गया।
        श्री यादव ने राजनांदगांव जिले के साक्षरता महायज्ञ में अपनी सक्रिय सहभागिता निभाई है। 07 अप्रैल से 13 अप्रैल 1995 तक जिला प्रशासन राजनांदगांव द्वारा आयोजित साक्षरता अभियान जिला स्तरीय, स्रोत व्यक्तियों की नाट्य कार्यशाला में उन्होंने स्रोत कलाकार के रूप में सहभागिता की। 14 मई से 20 मई 1995 तक खैरागढ़ में आयोजित ब्लाक स्तरीय कला जत्था नाट्य कार्यशाला में उन्होंने गायक एवं वादन स्रोत व्यक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दी।
        श्री यादव ने राष्ट्रीय कुष्ठ अभियान के तहत 21 जनवरी से 30 जनवरी 1990 तक उदयपुर (छुईखदान) में आयोजित ''तन रक्षा और घाव मुक्ति पर्व'' शिविर में एक कलाकार के रूप में हिस्सा लिया। शिविर के दौरान कुष्ठ मुक्ति के प्रचार-प्रसारक हेतु श्री यादव ने शिविर में शामिल कलाकारों के साथ मिलकर एक नाटक का वीडियो कैसेट तैयार किया। इस कैसेट को कुष्ठ विभाग द्वारा डेनमार्क भेजा गया।
        श्री यादव की कला और प्रतिभा को अनेक अवसरों पर सम्मानित किया गया है। उन्हें शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला छुईखदान, शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला बेमेतरा, नगर पंचायत छुईखदान, जनपद पंचायत छुईखदान, सेवाभावी संस्था ''प्रेरणा'' छुईखदान, हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान, नेहरू युवा केन्द्र राजनांदगांव, चक्रधर कत्थक कल्याण केन्द्र राजनांदगांव द्वारा प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया है। श्री यादव ने विभिन्न स्थानों पर आयोजित जस एवं फाग गीत प्रतियोगिताओं में अपनी टीम के लिए अनेक बार पुरस्कार जीता है।
        श्री सुरेश यादव न केवल गायक, वादक और उद्घोषक हैं अपितु लेखन के क्षेत्र में भी दखल रखते हैं। उनकी कुछ व्यंग्य रचनाएं एवं कविताएं नब्बे के दशक में स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। रचनात्मक कार्यों में संलग्न छुईखदान की संस्था ''प्रेरणा'' के दशक समारोह के दौरान सन् 2000 में छुईखदान में आयोजित प्रथम छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव के आयोजन की परिकल्पना उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक (वीरेन्द्र बहादुर सिंह) के साथ मिलकर की। उस दौर में कस्बाई क्षेत्र में लोककला महोत्सव जैसे वृहद आयोजन की कल्पना करना और उसे सफलतापूर्वक साकार करना मुश्किल ही नहीं असंभव था, जिसे उन्होंने साकार कर दिखाया। श्री सुरेश यादव का मानना है कि अपनी धरती से जुड़े लोगों का सम्मान करके ही हम सम्मान प्राप्त कर सकते हैं।
        पुराने फिल्मी गीतों को सुनने के शौकीन और सबको सहज सुलभ रूप में उपलब्ध होने वाले श्री सुरेश यादव ने एक दौर में अपनी कला के माध्यम से छुईखदान नगर को गौरवान्वित किया है लेकिन कालान्तर में एक लत के चलते उनकी सारी प्रतिभा का धीरे-धीरे क्षरण होने लगा। जनप्रतिनिधि बनने के बाद शौकियाना तौर पर शुरू किये इस लत ने सुरेश यादव को इस बुरी तरह से जकड़ा कि वे इसमें बुरी तरह डूबते गये। शराब ने सुरेश यादव को न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कर दिया बल्कि उनके भीतर के कलाकार को भी मार डाला। तमाम मित्रों और शुभचिंतकों की समझाईश को उन्होंने हवा में उड़ा दिया और केवल अपने मन की बात ही सुनते रहे।
        सुरेश यादव ने अपने जीवन यापन के लिए कई तरह के व्यवसायों को अपनाया जिनमें क्रमश: पान ठेला, फोटो फ्रेमिंग, फोटो कापी, किराना व्यवसाय आदि शामिल हैं लेकिन दुर्भाग्य से वे किसी भी व्यवसाय में सफल नहीं हो पाये बल्कि उल्टे उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। दो पुत्रियों के पिता श्री यादव उम्र के पांचवें दशक में आज भी बेरोजगार है।  बहरहाल सिर्फ एक लत ने एक बेजोड़ कलाकार की प्रतिभा को निगल लिया।
सबेरा संकेत बल्‍देव बाग
राजनांदगांव (छ.ग.)

शनिवार, 29 अगस्त 2015

हरम

अजय गोयल  
        वेटिंग हॉल में टंगी गुलाम भारत की याद दिलाती दिल्ली दरबार की जीवन्त आदमकद पेंटिंग होटल में आने वाले को क्लीन बोल्ड कर देती। पहली नजर में सकपकाये आगंतुक को लगता कि बरतानिया के किंग जॉर्ज और रानी मेरी उसके स्वागत के लिए वर्षों से बैठे - बैठे पथरा गये हैं। उन दोनों के पीछे सजे - धजे खड़े और अपनी - अपनी पगड़ियों में बँधे भारतीय राजा महाराजे उनको लाँघने के लिए नाकाम आतुर लगते।
        दस घंटे की लंबी सड़क यात्रा के बाद पंकज शिमला के उस होटल के कमरे में जाकर आराम करना चाहता था जबकि उसका बेटा मुन्ना माँ से अपने पालतू ब्लैकी बिल्ले की बातें करता हुआ थका नहीं था। बिटिया पावनी चुपचाप अपनी बार्बी डॉल के साथ बैठी रही। उसकी चुप्पी पापा पंकज को चुभ रही थी। जबकि ऐसी यात्राओं में पावनी मोबाइल फोन पर गूगल मैप खोलकर रास्तों का अता - पता बताती रहती। उसका सपना एक जीती - जागती बार्बी बन जाने का था। वह अक्सर आई एम ए बार्बी डॉल। गीत गाना पसंद करती। वह अपने लिए बार्बी डॉल जैसा ड्रीमरूम बनवाना चाहती। जैसा बार्बी की कहानियों में मोबाइल फोन की स्कीन पर झाँकता। इंटरनेट से डाउनलोड कर वह बार्बी की कहानियाँ देखना पसंद करती।
        बार्बी को केन्द्र बनाकर पावनी कुछ कहानियाँ लिख चुकी थी। जैसे- बार्बी एंड टाइमलैस स्टोरी। बार्बी सेव ब्लैकी कैटश्।  जिन्हें वह फेसबुक पर अपलोड कर चुकी थी। बार्बी सेव ब्लैकी कैटश् की शुरुआत में उसने लिखा था - जब वह ठंडी रात काँप कर रजाई में दुबक गयी थी। यह एक सच्ची घटना थी। ब्लैकी के रहने का प्रबंध पंकज ने छत के लिए जाने वाले जीने से कर दिया था। उस रात छत का दरवाजा खुला रह गया था। आधी रात में एक कातर महीन म्याऊँ - म्याऊँ की पुकार से उसकी नींद खुली। उसे लगा कि ब्लैकी की आवाज है। ब्लैकी पुकार रहा था। दरवाजा खोलने पर उसके सामने एक मोटा जंगली बिल्ला था। पंजा उठाए। उसके नीचे ब्लैकी पड़ा कराह रहा था। जब तक जंगली बिल्ला उसकी पिछली टाँगों की पिंडलियों का माँस नोच चुका था। भागना तो दूर उठने की ताकत नहीं बची थी ब्लैकी में।
- तो आप इस तरह अपना चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं। यह इलाका आपका हरम है ही भाई, एक हरम में दो मर्द कैसे रह सकते हैं । पंकज ने कहा।
        बिल्ला अब भी उसके सामने था। अपना पंजा वह जमीन पर रख चुका था।
- इस तरह आप बच्चों को स्वर्ग भेज देते हैं। उठने लायक तक नहीं छोड़ा। चलेगा नहीं तो खाएगा क्या? पियेगा क्या? कितनी भूखी बेरहम मौत की सौगात देते हो। उसने कहते हुए डंडा फटकारा। जंगली बिल्ला कैसे रूकता। पीछे - पीछे पावनी भी आ गयी थी। टांगें ठीक होने तक पावनी रोजाना ब्लैकी की मरहम - पट्टी करती। जबकि मुन्ना उसे दूध भरा कटोरा दिन में कई बार पेश करता। अपनी इन कहानियों को पावनी चाहती की बार्बी कम्पनी अपनी कहानियों में जगह दे। वह ईमेल द्वारा कम्पनी को भेज चुकी थी। कम्पनी से जवाब आने की प्रतीक्षा कर रही थी। इसलिए शिमला के रास्ते में अनमनी रही। पंकज उसे बहलाने की कोशिश में उससे कहता- गुड़िया मेरी बातों की पुड़िया। जिसका वह जवाब नहीं दे रही थी।
- फेसबुक पर तुम्हारी कहानियों को सब लाइक कर रहे हैं। कह कर मम्मी उसे ढाढस बँधाना चाहती। साथ ही मुस्करा कर उसकी बैचेनी को दूर करने की कोशिश करती।
पावनी को मालूम था कि बार्बी की दुनिया में उसके पास चालीस पालतू जानवर हैं। जिनमें से एक बिल्ला भी है।
        ब्लैकी बिल्ले को अपनाने के लिए पावनी के लिए इतना काफी था।
ब्लैकी के चमकते काले बालों व भूरी आंखों के कारण पावनी ने उसका नाम ब्लेकी रखा था। लगता कि प्रकृति ने उसके शरीर में पम्प लगाकर स्कूर्ति भर दी है। पता नहीं कौन से तेल के कारण उसके चमकते बाल सम्मोहित करते।
        जंगली बिल्ले के हमले के बाद ब्लैकी पावनी के पैर का अँगूठा धीरे - धीरे अपने दाँतों से सहलाकर प्यार जताता।
         मुंडेर पर चढ़े ब्लैकी को पावनी यदि आवाज देती तो दौड़कर आ जाता।
        भूख लगने पर उसने दूध माँगने का तरीका ढूँढ लिया था। वह रेफ्रिजरेटर के पास जाकर म्याऊँ - म्याऊँ करने लगता।
        चाकलेट निगलता।
        कोल्ड ड्रिंक तक चाटता।
        जब तेज संगीत के साथ पावनी और मुन्ना धमाल करते तो वह म्याऊँ - म्याऊँ कर सब कुछ समझ आने का दावा पेश करता।
        सुबह उठकर मुन्ना सबसे पहले ब्लैकी को ढूँढता। उसे जीने में न पाकर उसकी नजरें मोहल्ले के घरों की मुंडेरों पर होती।
- सुबह - सुबह से ब्लैकी क्यों भागा - भागा फिरता है ? मुन्ना ने एक दिन पंकज से पूछा था।
- तुम तो सोते रहते हो पर ब्लैकी को सुबह - सुबह सूरज को जगाना होता है। वह आसमान में जाकर खिड़की खोलता है। तभी तो सूरज बाहर आता है।
        मुन्ना उसके उत्तर से संतुष्ट हो गया था। जबकि पावनी बहुत देर तक इस उत्तर से मुस्कराती रही।
चार - पाँच साल का मुन्ना ब्लैकी को अपना दोस्त कहता। वह ब्लैकी को अपनी गोद में बैठाकर शिमला लाना चाहता था। पिछले तीन - चार दिनों से खडा को दूध पिलाते समय वह कहता कि इन गर्मियों में वे शिमला जा रहे हैं। वहाँ गर्मियों में भी ठंड होती है। तुम भी मेरे साथ चलना। मेरी गोद में बैठ कर। तुम मुझे ज्यादा प्यार करते हो ना। ये सामने वाला चीनू तो तुमसे प्यार का नाटक करता है। तुम्हें दूध में पानी मिलाकर पिलाता है। पापा कह रहे थे कि वहाँ बड़ा मजा आयेगा।
        हद होती। जब वह ब्लैकी को स्कूल पढ़ाने के लिए ले जाना चाहता  या जब मुन्ना मोबाइल फोन ब्लैकी के हालचाल पूछने के लिए स्कूल ले जाना चाहता था। इस पर मम्मी उसे झिड़क देती। कहती - मैं हूँ तो तुम्हारे ब्लैकी के लिए। तुम स्कूल जाते हो तो वह जीने में आराम करता है। बन्द किवाड़ों में भी वह कैसे आ जाएगा जंगली बिल्ला। उससे ब्लैकी डरता है। मैं तो नहीं डरती।
        उस ताकतवर जंगली बिल्ले से बचाने के लिए मुन्ना ब्लैकी को अपने साथ ले जाना चाहता था। चलते समय उसने ब्लैकी को पकड़कर गोद में बैठा लिया था। पर जैसे ही कार स्टार्ट हुई, वह कूदकर भाग गया। जबकि मम्मी उसके रहने का प्रबंध चीनू के घर कर चुकी थी।
        वेटिंग हॉल की विशाल पारदर्शक शीशों की दीवार के पार फैली घाटियों में चहलकदमी करते अँधेरे उजाले को देख मंत्रमुग्ध सा मुन्ना दीवार के पास जा खड़ा हुआ था। उस समय सूरज थककर जा चुका था।
        ऐतिहासिक होटल के मैनेजर से बात करते समय पंकज का ध्यान वेटिंग हॉल की एक दीवार पर खूबसूरत लिखावट में लटकी एक घोषणा पर गया, जो स्वतंत्र भारतीय दिलों में बसी गुलामी का पता बता देती। सागवान के आयताकार टुकड़े पर बसी घोषणा वायसरायों और अंग्रेज सैन्य अधिकारियों को दर्प के साथ याद करती। जो जलती गर्मी में सुकून के लिए पिछली शताब्दियों में भौरों की तरह खींचें चले आये थे। आगन्तुक यह सब जानकर एक साँस में शान की एवरेस्ट पर बिना ऑक्सीजन के जा पहुँचता।
        होटल के गलियारे बीते वक्त से रोशन थे। फोटो फ्रेमों से झाँकते बीते पल गये वक्त का एक झरोखा खोल देते। रजवाड़ों के दरबारों से लेकर शिकार के लिए जाते वायसरायों के भरे पूरे फोटो एक तिलिस्म सा गढ़ने में सफल थे। इन्हीं बीते पलों से खोयी पावनी ने पंकज को आवाज देकर कमरे से बुलाया था - पापा! देखो। चर्च के गेट के पास बैठा बंदर चर्च में जाते वायसराय को कैसे दाँत दिखा रहा है।
फोटो में वायसराय अचंभित मुद्रा में थे। शायद सोच रहे थे कि जब सारा भारत उनके सामने घुटनों पर था तो एक अदने बंदर ने इतनी हिमाकत कैसे की।
        पंकज ने होटल के गलियारे से वापस कमरे में जाते वक्त महसूस किया कि ज्यादातर वायसराय और सैन्य अधिकारियों के द्वारा मारे गये शेरों के फोटोग्राफ  वक्त के गवाह हैं। शिकारी वेशभूषा में राइफल लिए अधिकारी शेरों के सिरों पर अपना एक पैर रखे हैं। जिनके बगलगीर भारतीय राजे महाराजे और नवाब प्यादे बने खड़े हुए थे। होटल के गलियारे से गुजरना पंकज के लिए किसी कब्रिस्तान के बीचों - बीच खुली हुई कब्रों के ऊपर से गुजरना जैसा हो गया था।
        कमरे में मुन्ना लाइव वीडियो काल पर ब्लैकी को चीनू द्वारा दूध पिलाते देख रहा था।
        फोन पर मुन्ना उसे ब्लैकी कहकर पुकारता।
        दूरियाँ पार कर मुन्ना की आवाज ब्लैकी तक पहुँचती। फोन पर वह मुन्ना की पुकार सुनता। चौंकता। दूध पीते - पीते वह नजरें उठाता। चौंक कर इधर - उधर देखता। उसे चीनू के सिवाय कोई नहीं दिखता। यह सब वीडियो कॉल पर देख होटल के कमरे में बैठा मुन्ना तालियां बजाने लगा था।
कुछ देर बाद कल घूमने जाने के लिए पंकज रूपरेखा बनाने लगा।
        तभी मासूम बचपन का इंद्रधनुष कमरे में उतर आया। मुस्कराता मुन्ना अचानक ठिनकने लगा था।
        चीनू द्वारा वीडियो कॉल पर ब्लैकी को दूध पिलाते देख, बोला - ब्लैकी अब चीनू से शादी कर लेगा। मुझे मना कर देगा। ठिनकता मुन्ना रोने लगा था।
        पावनी ने उसे गोद में भर लिया। बोली - मैं ब्लैकी से मना कर आयी हूँ ना।
- ना। पर उससे कर लेगा। मुन्ना जोर - जोर से रोने लगा था।
        पावनी उसे बालकनी में ले गयी।
        उस उतरती दोपहर मोहल्ले में शोर मचा था कि कुत्ते एक बिल्ले को पकड़ने में लगे थे। कुछ घंटों बाद शाम को आश्रय ढूँढता निढाल और बेजान - सा ब्लैकी घर के दरवाजे के पीछे पावनी को मिला। चीते की बोन्साई लगता बिल्ला। भागने की ताकत उस समय ब्लैकी में नहीं थी। सूखा शरीर। तेज - तेज चलती साँसों के साथ जिन्दगी से जंग लड़ रहा था। मुन्ना उसे देखकर मचल गया। पावनी उसके लिए दूध भरा कटोरा ले आयी थी। एक परी - कथा की तरह जीवन में आया था। चीनू और मुन्ना के लिए जीता जागता एक साझा खिलौना।
        दोनों स्कूल से आकर उसे दूध पिलाते। उसके लिए नई - नई शर्ते लगाते। झगड़ते। इन झगड़ों और शर्तों के हिंडोलो में सारा मोहल्ला हँसता। मुस्कराता। शहर का एक पुराना मोहल्ला। जहाँ सुबह घरों की मुँडेरों पर कबूतरों की गुटर गूँ गुटर गूँ में प्रकृति का स्वागत करती। दोपहर में धूप स्वयं वहाँ अलसा जाती। संध्या आरती और फिल्मी गानों के साथ बच्चों की किलकारियों में घुलमिल जाती।
बिल्ली को पावनी और मुन्ना अपने साथ अपने कमरे में रखना चाहते। जिसके लिए मम्मी तैयार नहीं थी। कहती-  बिल्ली असहनीय है। घर में पालना परम्पराओं के विरुद्ध है।
        पंकज ने बीच का एक रास्ता खोजा। जीने में उसके लिए जगह बनायी गयी। पावनी ने एक गत्ते के डिब्बे में पुराने अखबार लगाकर उसका बिस्तर बनाया। मम्मी ने दूध के लिए एक कटोरी दी। दोनों को उलझन होती, जब मुन्ना ब्लैकी के मुँह से अपना मुँह लगाने की कोशिश करता। या ब्लैकी पावनी के बिस्तर में घुस जाता। एक दिन पंकज ने कहा - तुमने पाला है ब्लैकी। इसकी वैक्सीन का खर्चा तुम अपनी जेब खर्च से दोगी। पहले से नाराज पावनी इस बात पर ठुनक गयी। जबकि वह अपनी जेब खर्च से बार्बी की नयी ड्रेस लाना चाहती थी।
उस रात पावनी कुछ जल्द सो गयी। डायरी लिखना उसकी आदत में शामिल हो चुका था। इसका कारण बार्बी का नियमित डायरी लिखने का प्रचार था। टेबल लैम्प जल रहा था। पंकज पावनी के कमरे में गया। पावनी मीठी नींद में थी।
        डायरी खुली थी। पंकज ने पड़ा- मैं पापा से नाराज हूँ। बहुत ज्यादा नाराज। मेरी कोई बात सुनते नहीं हैं। बार्बी के पास अपना ड्रीम हाऊस है। जैसे मेरे पास क्या ड्रीम रूम नहीं हो सकता। क्या वे मेरी यह इच्छा पूरी नहीं कर सकते। पापा जानते हैं कि बार्बी के पालतू जानवरों में शेर का एक बच्चा भी है। मैंने तो एक बिल्ला पाला है। उसके टीके भी अपनी जेब खर्च से लगवाऊँ। वैसे मुझे वे अपनी गुड़िया बातों की पुड़िया कहते हैं। सब झूठ। उनका जीवन एक घटना में अटका है। जो सालों पहले भोपाल में घटित हुई। एक यूनियन कार्बाइड कंपनी थी। जिससे एक रात में निकली जहरीली मिक गैस से बीस हजार आदमी मारे गये। वे कहते हैं कि हमारी सरकार उस कंपनी के चीफ  एंडरसन को एक दिन की भी सजा नहीं दिला सकी। इन सबका मेरे ड्रीम रूम और ब्लैकी की वैक्सीन से क्या संबंध?
        आखिरी सवाल पंकज को छील गया था। सोती पावनी को उसने देखा। कमरे से बाहर निकलते वक्त अतीत एक बार फिर सामने था। बीस हजार बदनसीब लाशों में उसके अपने चाचा - चाची थे। उस रात सोने के बाद उनके भाग्य में सुबह नहीं थी। उन्हें जहरीली गैस से बचाव के लिए पानी से भीगे रूमाल रखने का मौका भी नहीं मिला। उस गैस से बचाव का एक साधारण सा उपाय नाक पर गीला कपड़ा रखना था। इसके प्रचार के लिए वकील चाचा जी ने कोर्ट के नोटिस द्वारा अपनी बात कंपनी से कही थी। जिसे कंपनी ने अनसुना कर दिया। उस समय खून से भरी फिजा में प्यादे से सत्ताधीश एंडरसन को वापस भेज न्याय- न्याय चिल्लाने लगे थे। उसके मन में एक सवाल बार - बार आता। उस रात हवा का रुख हुक्मरानों के महलों की तरफ  क्यों नहीं था?
        सुबह पावनी गलियारों में शिकार में मारे गये शेरों की गिनती करना चाहती थी। बाहर घूमने जाने के लिए देर हो रही थी। पंकज उसके पास पहुँचा। दोनों वायसराय कर्जन के सामने थे। फोटोग्राफ  में एक शेर के सर पर पैर रखकर खड़े कर्जन ने कुल पाँच शेर मारे थे। उसके बगलगीर प्यादा सा खड़ा नवाब हैदराबाद था। फोटोग्राफ के नीचे लगा था, वायसराय को शिकार के लिए बुलाना उस समय शान का प्रतीक था। नवाब हैदराबाद के साथ खड़े लार्ड कर्जन ने एक बार कहा था- ज लांग एज वी रूल इंडिया, वी आर ग्रेटेस्ट पावर ऑफ  दी वर्ड। जब तक हम भारत पर काबिज हैं, हम विश्व की महान शक्ति रहेंगे।
- पापा! अपना ब्लैकी देखने में शेर जैसा लगता है।
- कोई ई-मेल आया बार्बी की कंपनी से। विषय बदलते हुए पंकज ने पूछा।
        चुप रही पावनी।
        पंकज ने दोबारा पूछा।
- पापा! मैं आपको बता देती न। कुछ - कुछ झल्लाकर वह बोली।
        गलियारा पार कर दोनों होटल से बाहर निकलते वक्त पंकज पावनी से बोला- दो सौ साल के अंग्रेजों के शासन में इंडिया ने बहुत तरक्की की। इतनी कि एक सुई के लिए भी दूसरे देशों का मोहताज रहा। बार्बी कम्पनी भी चाहती है, तुम जैसी बार्बी दीवानी मीरा हर घर - ऑगन में हो। तुम बार्बी बनो इसमें तुम्हारी नहीं उस कम्पनी की सफलता है।
        होटल के बाहर धूप खिली थी। गर्मी के मौसम में काटने को आती धूप पहाड़ों पर सौम्य और दुलारती लग रही थी।
        कार में पावनी पापा के पास बैठी थी।
- मेरी जीनियस बातों की पुड़िया। कहकर पंकज ने उसे प्यार से थपथपाया।
- पापा। पापा। कहकर वह उससे लिपट गयी।
        पिछले कुछ दिनों में उलझी - उलझी पावनी के चेहरे पर उजास झाँकने लगा था। तभी पंकज को लगा कि पावनी ने बार्बी को पहाडी घाटियों को नजर कर दिया है। जिसे वह उस वक्त देख नहीं सका था।
निदान नर्सिंग होम, फ्री गंज रोड
हापुड़ - 245101
                                                                                                               मेल :  a.ajaygoyal@rediffmail.com

बंटवारा

योगेन्‍द्र प्रताप मौर्य

घड़ी में जैसे ही रात के 11:59 बजे कि राम ने माँ को जल्दी से उनकी छड़ी पकड़ा दी और उधर श्याम ने पिताजी को। माँ और पिताजी को भी पता था कि सोलहवाँ दिन लगने वाला है इसलिये वे पहले से ही तैयार बैठे थे। कहीं देर हो गई तो बहुओं में सिर फुटौवल शुरु हो जायेगी। माँ ने घर का चौखट लांघा। तो उधर पिताजी छड़ी लिए घर में प्रवेश के लिए खड़े थे। माँ , पिताजी को और पिताजी, माँ को आंसू भरी नयनों से निहार रहे थे। पूरे पंद्रह दिन बाद यह मिलन क्षणिक था। थोड़ा बातें कर लें नहीं तो पंद्रह दिन का इंतजार करना पड़ेगा। न जाने कितनी ही बातें आँखों ही आँखों में हो गई। उजाला भरी रात थी। मानो आज चाँद भी उन्हें एक - दूसरे को जी भर देखने के लिए अपनी आँखे खोल दी हो। पर चाँद भी मनुष्य के निष्ठुरता के आगे लाचार है।
'' पिताजी जल्दी अंदर आ जाओ,बिस्तर लगा है।'' राम ने कहा।
        उधर श्याम माँ का हाथ पकड़कर अंदर खींच ले गया, ''सो जाओ बिस्तर पर पिताजी का है'' श्याम ने कहा।
- '' बेटा थोड़ा पानी पिला दो'' माँ ने कहा।
- '' अच्छा '' राम की जुगनी ने पानी नहीं पिलाया। हाँ पिलाती भी क्यों उन्हें तो पता था माँ को अभी ठेल देंगे श्याम के यहाँ। फिर उसकी जिम्मेदारी हो जायेगी। पर हम भी पानी नहीं देगे। सुबह का इंतजार करो। और सो जाओ। श्याम ने माँ से कहा।
        शायद माँ ने आँसुओ से ही प्यास बुझा ली हो। पता नहीं स्वामीजी किस हाल में होंगे? कहींं राम उन्हें मेरी टूटी हुई चारपाई ही न दे दे सोने के लिए। उन्हें नींद कैसे आएगी। जिंदगी भर राम और श्याम की ख़ुशी के लिए अथक परिश्रम करते रहे। अब बुढ़ापा में ... किसे उनकी परवाह है।
        माँ को नींद कहाँ आने वाली थी। माँ सोचने लगी कि आखिर मेरे परवरिश में कहाँ खोट रह गई थी। अपने हिस्से की रोटी इन्हें खिलाई। पहले प्यास इनकी बुझाई। स्वामीजी जब कोई सामान बाजार से लाते थे तो पहले राम और श्याम को खिलाते थे। यदि बच गया तो हम और स्वामी जी खाते थे। माँ वैष्णो हमारी कैसी परीक्षा ले रही है?
        आज भी याद है कि जब कभी भी राम और श्याम को किसी चीज की जरूरत पड़ती थी। तो वे दोनों कैसे मेरे आँचल से लिपट जाया करते थे, पगले तरह - तरह के बहाने बनाकर हमसे ओ चीज हासिल कर लेते थे। मैं हमेशा उन दोनों की तरफ  ही रहती थी उनके पिताजी को किसी न किसी तरह मिला ही लेती थी। यदि कभी मैं राम और श्याम से रूठ जाती थी तो वे दोनों इतने भोले बनकर हमें मनाते थे कि हम दुबारा रूठना भूल जाते थे। उनके पसंद का खाना बनाना, उनके पसंद का पहनावा,उनकी हर एक इच्छाओं को पूरा करना स्वामी जी की पहली प्राथमिकता होती थी। स्वामी जी को भले ही इसके लिए अतिरिक्त कार्य करना पड़ा हो। फिर भी राम और श्याम ले लिए क्या कुछ नहीं किये पढ़ाई - लिखाई से लेकर खुद के पैर खड़े होने तक आदि - आदि।
        मैं और स्वामी जी न जाने कहाँ - कहाँ मत्था टेके होंगे। मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारा तथा गिरिजाघर जिसने जहाँ कहा। हम वहां गए। अंतिम बार एक भिखारी के कहने पर हम दोनों माँ वैष्णो के दरबार गए थे।
माँ वैष्णो ने ही प्रसाद स्वरुप हमें दो रत्न दी राम और श्याम।
        सवा महीने बाद पुन: मैं और स्वामी जी माँ वैष्णो के दरबार गए। दर्शन की। चुनरी चढ़ाई। हम दोनों ने खूब खर्च किये। सभी भीखारियों की झोलिया लड्डुओं से भर दी थी। तब से हर साल माँ वैष्णो के दरबार दर्शन करने पहुँच ही जाती थी।
        राम और श्याम भी हम दोनों से मोहब्बत करते थे। कभी- कभी वे दोनों स्वयं अपने हाथो से खाना बनाकर हम दोनों को खिलाते थे। मेरा और स्वामी जी का रोज शाम को पैर दबाना उनका नित्य का काम था। पूरे कॉलोनी में राम और श्याम की बड़ी प्रशंसा होती थी। स्कूल में हमेशा वही दोनों टॉप पर रहते थे। स्कूल से लौटने पर झट से आँचल में छिप जाना। लंच न करने का बहाना। उनकी प्यार भरी बातें। सब कहाँ चली गई। बहुओ के आते ही उनका स्वभाव बदलने लगा। पहले तो लगता था। अभी बच्चे है नासमझ है। धीरे - धीरे हालात ठीक हो जायेगा। पर दिन ब दिन घर के हालात बिगड़ते गए। सब कुछ वे दोनों अपनी मर्जी के करते गए। न हम से कोई राय- बात, न स्वामीजी से। मैं तो दाँत पीस के रह जाती थी।
        पर स्वामीजी के नाते कुछ बोल नहीं पाती थी। ओ तो अक्सर मुझे समझाया करते थे कि देख कौशिल्या ये बच्चे नए जमाने के हैं इनको अपनी मर्जी से जिंदगी जीने दो। इनके मामले में दखल न करो उसी में भलाई। नहीं तो ये कब क्या जवाब दे दे कुछ गारंटी नहीं है। अब हम वृद्ध हो गए। यूं समझ लो चाय में गिरी हुई मक्खी। चुटकी से पकड़कर बाहर करने में देर नहीं लगेगी। किन्तु मैं कहाँ मानने वाली थी। मैं सोचती थी राम और श्याम मेरे औलाद है क्या इन्हें सही - गलत पर डांट - फटकार नहीं सकती हूँ। जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने राम और श्याम को बुलाकर कह दिया कि तुम लोगो की मनमानी नहीं चलेगी। घर में क्या हो रहा है कब मायके कब ससुराल क्या योजना बन रही हैं हमें भनक तक नहीं लगती। जब जी में आया पर्स उठाके चल दिया। समझ देना अपनी- अपनी बीबियों को यहाँ रहना है तो हमारी मर्जी से रहे। नहीं तो अपने मायके चली जाये। राम और श्याम को माँ की यह बात अच्छी नहीं लगी। वे माँ को घूरते हुए अपने कमरे में चले गए।
        समय के साथ - साथ माँ और पिताजी से राम और श्याम की दूरियां बढ़ने लगी। यह दूरी कब खाई में तब्दील हो गई पता ही नहीं चला।
        आये दिन दोनों अपने माँ और पिताजी से झगड़ते तो उनकी माँ और पिताजी अपना मकान दूसरों को लिख देने की बात करते।
        किन्तु किसी के माता - पिता ऐसा नहीं करते हैं। पुत्र भले ही कुपुत्र हो जाये किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती है न ही पिता कुपित होता है।
        धीरे - धीरे राम और श्याम में भी झगड़ा - झंझट होने लगा। और दोनों में बँटवारा हो गया। कौशिल्या और स्वामीजी की तबीयत भी अक्सर खराब रहने लगी। दोनों बेटो ने मिलकर अपने माँ और पिताजी को बाँट लिया वह भी पन्द्रह - पंद्रह दिन के लिए। घर के बीचों बीच दीवार खींच गई। वर्षों से साथ - साथ रहने वाले माता - पिता को जब एक - दूसरे की अधिक आवश्यकता थी तब उनके कुपुत्रो ने उन्हें अलग- थलग कर दिया। वे भी साथ - साथ रहने की जिद नहीं कर पाये।
        भोर हुई श्याम जब नित्यक्रिया से खाली हुआ। तब याद आया कि माँ ने रात में पानी माँगा था। वह पानी लाया।
- '' माँ उठो पानी पी लो।'' श्याम ने कहा।
        किन्तु माँ तो चिरनिद्रा में जा चुकी थी ... जब यह खबर स्वामी जी को मिली तो उठाकर जोर से बोले - मैं भी आ रहा हूँ कौशिल्या ...'' तभी तपाक से गिर पड़े। ऐसे गिरे की दुबारा न उठ पाये।
बरसठी जौनपुर

कभी- कभी ऐसा होता है

अजय ठाकुर

तीन महीने बाद आज नैना को वो लम्हा मिला था जो एक जगह कहीं ठहर जाने जैसा था। कॉफी शॉप में कप थामे, उसकी नज़र शीशे के बाहर भींगी शाम के अँधेरे में खुद को उतारना चाहती तो आसमान में टंगे यादों के काले बादल, उसे रोक लेते। बाहर गिरती बारिश की बूंदों के शोर से नैना का एक ऐसा दर्द जुडा था, जो उसके दिल की सारी मस्तियाँ, सारी जिंदादिली छीन चुकी थी। बच गई थी, तो उसके अंदर सिर्फ  एक चुभती हुई खामोशी, एक दर्द। जिससे दूर जाने के लिए, उसने शहर बदला, नौकरी बदली। पर दूर तो दूसरों से जाया जाता है, अपने दिल से, खुद से नहीं। अर्णव और उसकी यादें भी तो कोई दूसरी नहीं थी।
        बारिश की इस शाम ने नैना के उन जख्मों को कुरेद दिया। जिसको दिल्ली आने के बाद वह अपने मसरूफियत से भरने की कोशिश कर रही थी। फोन की घंटी बजी, उठाया तो - कहाँ हो नैना, पार्टी शुरू होने वाली है।
- सॉरी अंजलि, मैं नहीं आ पाऊँगी। ऑफिस के बाद बारिश में फँस गई हूँ।
- पर इधर तो नहीं हो रही।
- बारिश तो हर वक्त कहीं न कहीं होती ही है, पर भींगता कोई - कोई है।
नैना ने अपने ज़ज्बात को उन लम्हों से जोड़ा तो अंजलि ने सवाल की।
- मैं समझी नहीं, क्या बोल रही है तू?
- श्वेल लीव दिस, इधर तो बहुत हो रही है, तुम सब एन्जॉय करो। वन्स अगेन हैप्पी बर्थडे टू यू डिअर।
        सच कहा था नैना ने भींगता कोई -कोई ही है। यहाँ बैठे - बैठे, वह भी तो भींग ही रही थी अर्णव की यादों में, और बाहर बारिश रुक सी गई थी।
        कानपुर में वह बरसात का ही दिन था। जब नैना कॉलेज से अपनी एमबीऐ की डिग्री लेकर, रोहन के बाइक पर सवार होकर भींगते हुए अर्णव के पास पहुँची थी। जिसे अर्णव ने न जाने किन बातों से जोड़ दिया। तुम रोहन के साथ वो भी इस हालत में आई हो। क्या है ये? कब से चल रहा है ये सब। अर्णव इतने पर कहाँ रुका था। उसने तो रोहन को भी क्या - क्या कह दिया, उन दोनों की दोस्ती के रिश्ते को गालियाँ तक दे दी - तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरी गर्ल फ्रेंड को अपने बाइक पर बैठाने की। अर्णव के इस तमाशे ने वहाँ कितने चेहरे को खड़े कर दिए थे। जैसे किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हो। नैना को ये देख जब रहा नहीं गया तो वह बोली - अर्णव क्या हो गया तुम्हें। अर्णव चिल्लाते हुए कहा -तुम चुप रहो,मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ। फिर वह बाद कहाँ, नैना उसी वक्त वहाँ से चली आई।
        यह अच्छी बात है कि सामने वाला पज़ेसिव हो पर इतना न हो कि पज़ेसिवनेस शक का रूप इख्तियार कर ले। रिश्तों को खाक कर देता है ये शक। उस दिन के बाद, फिर न कभी नैना ने उससे संपर्क किया और न ही अर्णव ने।
        आज तीन महीने के बाद दोपहर में ऑफिस के टेलीफोन पर अर्णव का कॉल आया था, नैना आई एम सो सॉरी, न जाने उस दिन मुझे क्या हो गया था। रोहन के साथ तुमको देखने के बाद। सो प्लीज फोर्गिव मी। मैं आज शाम के फ्लाइट से दिल्ली आ रहा हूँ। मुझे वहाँ जॉब मिल गई है। प्लीज एअरपोर्ट आ जाना नौ बजे। नैना ने बिना जवाब दिए रिसीवर रख दिया।
        उसके लिए जितना अर्णव का कॉल आना सवाल नहीं बना, उतना ये आखिर अर्णव को यहाँ का नंबर कहाँ से मिला। दिमाग पर जोर दिया तो याद आया करीब सप्ताह भर पहले फेसबुक पर उसका रिक्वेस्ट आया था। जिसे उसने अब तक पेंडिंग छोड़ रखा है। शायद वहीं से मिला होगा।
        घड़ी को देखा तो सात बज रहे थे। वक्त तो दौड़ रहा था मगर बारिश ने दिल्ली को रोक दिया था। ठहर गई थी दिल्ली पर जो कुछ नहीं ठहर था, तो वह थी- हर बीतते लम्हों के साथ नैना के दिल की बेचैनी। फोन उठा कर एक नंबर मिलाया - हेल्लो इजी कैब।
- यस, हाउ मे आई असिस्ट यू मेम।
- आई एम नैना अग्रवाल ।
        नैना ने पिकअप और ड्राप पॉइंट नोट करवाया तो अगले पन्द्रह मिनटों में कैब कॉफी शॉप के बाहर आ कर खड़ी हो गई। नैना के बैठते ही कैब सड़क पर जमे पानी को तेज रफ़्तार के साथ हवा में उछालते दौड़ने लगी। वो अपने प्यार को एक ऐसा ही रफ़्तार देने को निकली है, जो तीन महीने से कहीं ठहर गया था। ठहरे पानी में तो काई भी लग जाती है, और वह अपने प्यार को शक की आग में खाक होते नहीं देखना चाहती।
        सीपी से एअरपोर्ट के इस स$फर में वह बहुत खुश थी। तेज़ रफ़्तार से दौड़ती कैब के विंडो से हाथ बाहर निकालती और बारिश की बूंदें हथेलियों पर जमा कर अंदर कर लेती। ये बूंदे उसकी तीन महीने से जाया होने वाले वे आँसू थे। जिसे समेटने का उसे आज मौका मिल रहा था।
         एअरपोर्ट पर कैब से उतर कर, वह एराइवल के गेट नंबर तीन पर एक फूलों का गुलदस्तां ले कर खड़ी हो गई। अर्णव के इंतजार में। गेट से एग्जिट करते हुए नैना ने अर्णव को देख लिया था, मगर लोगों की भीड़ में अर्णव नैना को नहीं देख पाया। नैना ने उसे आवाज लगाया - अर्णव, दिस साइड।
        नैना को तलाशती अर्णव की नज़रें जब एक जगह ठहरी तो उसे मुस्कुराती हुई नैना दिखी, जिसका उसने कभी दिल दुखाया था। उसकी नज़रे शर्म से झुकी तो नहीं पर नैना की प्यार से भरे जरुर दिखे। नैना के सामने पहुँच कर जब उसने अपना सनग्लास उतारा तो लगा अब छलक जायेंगे।
        नैना ने फूलों का गुलदस्तां अर्णव को देते हुए बोली - वेलकम बेक।
         अर्णव लोगों के भीड़ के सामने नैना से फिर से माफी माँगने की कोशिश की तो नैना ने उसके होठों पर हाथ रखते हुए बोली- मुझे यकीन था, तुम एक दिन आओगे। तुम आये यही काफी है। और हँसते हुए कहा- यार, प्यार में कभी - कभी ऐसा होता है।
        अर्णव ने आगे बढ़कर नैना को बाँहों में भरा और माथे को चूमते हुए बोला -हाँ, कभी - कभी ऐसा होता है। फिर तो बिजली की तेज करकराहट के साथ पूरी रात बारिश होती रही।
मधेपुरा, बिहार

बिना टिकट

मनोज सिंह

        बचपन का नाम सुनते ही मेरा तुरंत पीछे मुड़कर देखना स्वाभाविक था। अब तो राघव भी कोई नहीं बोलता। मि. राघवेंद्र या मि. सिंह ही बोला जाता है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर भीड़ अभी कम थी और मेरी दृष्टि अपना नाम पुकारने वाले को आसानी से ढूँढ सकती थी।
- कौन, सुनील! ज़्यादा फर्क उसमें भी नहीं आया था। नौवीं कक्षा तक आते - आते चेहरा व शरीर अपना पूरा आकार तकरीबन ले ही लेते हैं। और तभी हम बिछड़े थे। हाँ, आज उसकी जींस की पैंट घुटने के नीचे से कुछ ज़्यादा फटी हुई थी। नहीं, शायद फाड़ दी गई थी। पता नहीं। ऊपर मामूली - सी टी.शर्ट और कंधे के पीछे लटका बड़ा - सा मगर पुराना बैग। इसे झोला भी कहा जा सकता था। रंग उसका गोरा न होता तो हिंदुस्तान में उसे भीख माँगने वाला घोषित कर दिया जाता। मेरी कौतूहल व खोजती निगाहें रुक - रुक कर सरकते हुए और नीचे पहुँची तो देखा कि उसकी चप्पलें अपने जीवन की अंतिम साँसे गिन रही थीं। उसकी ऐसी हालत देख मेरी आँखें में चमक उभरी थी। और क्यों न उभरती, मेरे कपड़े जो बेहतर थे।
- कहाँ जा रहा है? ''उसके नजदीक आकर पूछा था।
- मैं भोपाल जा रहा हूँ ... और तू ...।''
- वैसे तो गोवा जा रहा था, पर चल, तेरे साथ भोपाल चलता हूँ।कुछ दिन तेरे पास रुककर फिर वहीं से चला जाऊँगा। रास्ते में ही तो है। फिर बहुत दिनों बाद मिले हैं कुछ बातचीत और मस्ती भी हो जाएगी।''
        और अगले ही पल वो बिना किसी इजाजत के मेरे साथ ट्रेन की बोगी में था। अजीब आदमी है। सोच कर हैरानी हुई थी। मगर फिर लगा कि बचपन के घनिष्ठ मित्र ऐसा ही करते हैं। और फिर उसका साथ अचानक अच्छा लगने लगा था और मैं खुश था। लेकिन कहाँ अब मैं दोस्तों के लिए घंटे भी नहीं निकाल पाता हूँ और इसने तो दिनों में बात कह दी। सोच - सोच कर आश्चर्य हो रहा था। मगर ट्रेन के प्लेटफार्म छोड़ते ही उसको जानने की जिज्ञासा, फिर एक -दो सवाल और उस ओर से जवाब। दूसरी तरफ  से कोई खास पूछताछ नहीं की जा रही थी फिर भी प्रवाह में सब कुछ भूलकर मैं कुछ ही देर में अपनी ऊँची - ऊँची सुनाने लगा तो वो धीरे -धीरे मेरी बर्थ पर पसर चुका था। कंडक्टर नहीं आता तो शायद मैं बोलता ही रहता। इस दौरान मैंने तो पूछा भी नहीं था कि उसकी टिकट का क्या होगा। मेरे दिमाग में यह सवाल आता भी कैसे, और फिर उसने इसका जि़क्र भी तो नहीं किया था। कंडक्टर को देखकर भी उसके चेहरे पर कोई शिकन न थी। चेहरे से निर्भय, तनावमुक्त। मानो उसने कुछ किया ही न हो। मैं अपनी टिकट दिखा चुका था परंतु कंडक्टर के उसकी टिकट के लिए खड़े रहने से मुझे परेशानी होने लगी थी। दूसरी बार उससे टिकट पूछे जाने पर उसने बेझिझक होकर एक नज़र मेरी ओर डाली थी। और अंत में उसकी टिकट मुझे ही लेनी पड़ी थी। पैनल्टी के साथ। और साथ थी टीटी की उलाहना भरी नज़र। जिसके पास उसे गलत साबित करने के लिए पूरा प्रमाण था।
        मगर उसके चेहरे पर कोई शरम न थी जबकि मैं पानी - पानी हो रहा था। टिकट कलेक्टर के जाने के बाद ही मैं लंबी साँस ले पाया था। मानो मैंने ही कोई चोरी की हो। एक मिनट के लिए झुंझलाहट हुई थी। ये कोई बात हुई! ख़ैर, बचपन के दोस्त आपस में ऐसा ही अधिकार दिखाते हैं। यही सोचकर मैंने खिड़की से बाहर झाँका तो वहाँ अंधेरा हो चुका था। कुछ देर बाद मैं फिर सामान्य क्या हुआ कि अचानक मन में भाव उमड़े थे कि कम से कम धन्यवाद तो कहना था। और मैं उसे इस बात का अहसास दिलाने अंदर मुड़कर कुछ कहना चाहा तो देखा कि वो झोले में से एक अंग्रेज़ी नॉवल निकालकर पढ़ने में मस्त हो चुका था। यह उसकी बचपन की आदत है। देखते ही पुरानी यादें ताजा हुई थीं। यह तो बिल्कुल भी नहीं बदला। और मैं, शायद मैं भी नहीं। आदमी का मूल स्वभाव कहाँ बदलता है। और मैं अचानक उससे जुड़ी पुरानी यादों में खोने लगा था। वैसे मैं इतना जरूर जानता था कि उसने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया था। उसके डैडी के स्थानांतरण के बाद हम स्कूल से अलग - अलग क्या हुए, मुझे अपने पापा से उसके बारे में जानकारी मिलती रहती थी। हमारे दोनों के पिता एक ही विभाग में जो थे। इधर मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला क्या लिया मेरी प्रतिष्ठा समाज में स्थापित होने लगी थी। और दिनों में एक बार फिर मैं सुनील से अपने आपको ऊपर रखवाने में सफल हुआ था। कालोनी में भी मम्मी - पापा की पूछ ज़्यादा रहती जब मेरा नाम बेहतर ढंग से लिया जाता। और यह सिलसिला कुछ सालों तक तब तक चलता रहा जब तक उसकी ख़बर मिलती रही। शायद फाइनल ईयर में पता चला था कि वह दिल्ली के किसी फाइव स्टार होटल में नौकरी करने लगा है।
- उंह, बेयरे की नौकरी ही तो है फिर चाहे बड़े होटल में क्यों न सही। कभी माँ तो कभी पड़ोस की आँटी बोल ही देती थीं। और सुनक मैं भी मन ही मन खुश होता था। वह आखिरी खबर थी उसके बाद उसकी कोई जानकारी नहीं थी।
- खाने का क्या है? '' उसने बेझिझक होकर पूछा था। उसकी आवाज ने मुझे भूतकाल से बाहर निकाला था।
- ऑर्डर दे दिया है। आगरा में सर्व होगा। आगरा शायद नौ बजे आता है। अभी लगता है, टाइम लगेगा।'' 
        मैंने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखते हुए कहा था। ताजमहाल के शहर की लाइटें अभी दूर थीं। और मेरी निगाह घड़ी पर फिर वापस पहुँची थी।
-दारू चलेगी ?''कहते हुए उसने अपने उसी बैग से शराब की छोटी - सी बोतल निकाली थी। प्लास्टिक के दो गिलास उसने स्टेशन पर चाय वाले से जब माँगे तो मैं कुछ समझा न था। अब वही काम में लिए जा रहे थे।
- नहीं - नहीं। वैसे कभी - कभी लेता तो हूँ, मगर ...।'' देसी देखकर मेरे चेहरे पर आड़ी - तेड़ी कुछ रेखाएँ उभरी थीं।
- अरे यार, देसी मस्त होती है, ऊपर से सस्ती भी पड़ती है। फिर स्टेशन के बाहर यहीं मिल रही थी।'' शायद उसने मुझे पढ़ लिया था।
        मैं पीने तो लगा था लेकिन देसी नाम से भी परहेज था। तभी तो उसे देख हैरानी हो रही थी ... तो यही इसका स्टैंडर्ड है। और फिर मैं जब स्वयं को रोक न सका तो धीरे से बोल ही पड़ा - कोई बात नहीं, तुम लो। मैं सिर्फ  अंग्रेज़ी लेता हूँ।''
- अच्छा।'' उसने मुस्कुराते हुए आँखों से मेरे बड़प्पन को स्वीकारा था। अगले घूँट के साथ उसने एक निगाह सामने के बर्थ वाले पर डाली थी और फिर बिना किसी परवाह के एक बार फिर गिलास भरकर उसे बगल में रखा और नॉवल खोलकर पढ़ने लगा था। तभी सामने वाले की निगाह मुझसे टकराई तो मैं झेंप गया था। दारू गिलास में से छलक न जाए, सामने वाला यात्री कहीं कुछ टोके नए मुझे ज़्यादा चिंता हो रही थी। और फिर हमें देसी पीता देख पता नहीं दूसरे क्या सोचते होंगे। मगर वह बेपरवाह था। और फिर आगरा में खा - पीकर वह तुरंत सो गया था। हाँ, लेटने पर उसने इतना ज़रूर कहा था - कोई दिक्कत तो नहीं। और मैंने अपना सिर हिलाते हुए मन किया था।
        सुबह भोपाल पहुँचकर फ्लैट में मैं उसके साथ पहुँचा तो मेरा चेहरा कमरे की तरह सिकुड़ रहा था। जिन लोगों के सामने अपने आपको छिपाना है उन्हें घर कभी नहीं लाता था। उसने घर के अंदर पहुँचते ही चारों ओर नज़र डाली तो लगा कि आज मेरा अभिमान इसके सामने टूट जाएगा। मगर उसने तुरंत अपनी प्रसन्नता प्रकट की तो एक मिनट के लिए आश्चर्य हुआ था। और क्यों न होता एक कमरे का फ्लैट अंदर से अव्यवस्थित और गंदा जो था। साफ़. सफाई कौन करता। प्राइवेट नौकरी में रात देर हो जाती और फिर बीवी का इंतजाम भी अभी तक नहीं हुआ था। कैसे होता, छोटी - सी नौकरी में इंजीनियरिंग कॉलेज की सारी हवा निकल रही थी तो शादी की हवा कैसे बन पाती। शादी के पहले कुछ पैसा इकटठा हो जाए, इस चक्कर में जवानी बेकार जा रही थी और मैं अक्सर रात में हिंदुस्तानी इंग्लिश शराब के दो पैग लगाकर अपनी भड़ास निकाल लिया करता था। तो क्या हुआ, इंजीनियर तो हूँ इससे बेहतर ही है। तभी तो इसे ये भी अच्छा लग रहा है और क्या...? और मैं तुरंत घर में बिखरे सामान को समेटने की कोशिश में लगा तो उसने किचन में घुसकर तांक - झांक कर चाय बना डाली थी।
- दूध तो होगा नहीं।'' मैंने सफाई दी थी।
- कोई बात नहीं, ब्लैक टी ज़्यादा अच्छी होती है।'' और वह चाय की चुस्कियाँ ले रहा था।
        बचपन का दोस्त आया है तो जवानी के कुछ दोस्त भी इकटठा हुए थे। और देर शाम दारू की महफिल ज़मीन पर ही जम गई थी। लड़के ज़्यादा और कुर्सियाँ कम थीं। बड़े गर्व से मैंने नई बोतल सुनील के हाथ में पकड़ाई तो उसने खुशी - खुशी उसको दोनों हाथों से समेटा था।
- अरे यार, वही ब्रांड ... आज तो कोई अच्छी मँगाता। ये तो अंग्रेज़ी के नाम पर विदेशी ठर्रा है..।''. एक मुँहफट दोस्त बोल पड़ा था।
- क्यों! अच्छा ब्रांड तो है। इससे किक जल्दी मिलती है।'' बोलते हुए सुनील ने बोतल का ढक्कन बड़ी सरीके से खोला था।
- खाने में क्या है... अच्छा! आज तो नमकीन के साथ अंडे भी हैं...क्या बात है।'' एक बार फिर उसी दोस्त द्वारा बोला गया था। नौकरी के दोस्तों और बचपन की दोस्ती में यही फर्क होता है। तभी तो प्याज़ के साथ खाने वाला, अंडा देखकर भी टोंट मार रहा है। और कहाँ सुनील फाइव स्टार होटल वाला होकर भी कुछ नहीं बोल रहा। पहली बार मुझे सुनील में अच्छाई दिखी थी। और मैंने भी उसकी बड़ाई कर दी थी। क्यों न करता, दोस्त की बड़ाई में खुद की भी तो बड़ाई है।
- अरे इसके लिए यह क्या है। फाइव स्टार में तो एक से एक नानवेज डिश मिलती है, क्यों सुनील?'' सुनकर स्थानीय दोस्तों ने उसे आश्चर्य से देखा मगर वह सिफ़र्  मुस्कुराया था। और उसने पैग बनाने के लिए बोतल को गिलास में डालना शुरू किया तो शराब उड़ेलने के अंदाज़ में विशेषता थी। साफ  जाहिर हो रहा था कि उसे बार में काम करने का एक लंबा अनुभव है।
- क्या बात है... फाइव स्टार की तो बात ही कुछ और है। एक बार फिर उसी लम्पट दोस्त ने छेड़ा था।'' सुनकर अबकी बार उसकी आँखों से लार टपक रही थी। ऐसा ही है। लालची कहीं का।
- ऐसी कोई बात नहीं यार ...।'' सुनील ने टरकाया था।
- ऐसे कैसे नहीं। एक से एक सुंदर लड़कियाँ देखी होंगी।'' दूसरे दोस्त ने भी हिस्सा लिया था।
- सब एक - सी होती हैं। कई होटलों में काम कर चुका हूँ। इटालियन, रशियन, आयरिश, अफ्रीकन, अमेरिकन... तुम समझ लो कि कई देश की लड़कियों का अनुभव है।'' सुनील ने मानो सबकी नस पकड़ ली थी।
- अच्छा!! दोस्तों के लिए यह एक दिलचस्प और सबसे प्रिय विषय था। शराब भी कमाल की चीज है अंदर जाते ही शरीर में आग लगा देती है। फिर क्या, हर कोई पहलवान और फिर सबको चाहिए सपनों की राजकुमारी। और उसकी ड्रेस को देखकर मुँह बनाने वाले अब उससे चिपकने लगे थे। एक की अभी पूरी चढ़ी भी नहीं थी कि उसने तो कह भी दिया - हमसे साली एक तो पटती नहीं और तेरे से ... कहीं फेंक तो नहीं रहा... उसी लंपट ने ताना मारा तो मैंने अबकी बार उसे घूरा था।
- अब यहाँ पर आकर होटलों में कई - कई दिन अकेले रहती हैं तो किसी - किसी के साथ, कभी -कभी मौका मिल ही जाता है। फिर हमने कौन साथ - साथ जिंदगी बितानी है... ये तो समय की माँग है। और फिर उस सोसायटी में ये सब गलत भी नहीं।
        गरमा - गरम बातों का असर था जो दूसरी रात दोस्तों ने शहर के छोटे से होटल में उसे पार्टी दी थी। उम्मीद थी कुछ और विस्तार में सुनाएगा। मगर वहाँ भी सुनील चैन से बैठ नहीं पाया था। बेयरे के हाथ से गिलास की ट्रे लेकर खुद ही पैग बनाने लगा। साथ ही वही उन्मुक्त हँसी... बचपन की तरह...। शुरू से उसका दिमाग चंचल था अत्याधिक होशियार। कुछ लोग सनकी भी कहते थे। मैं उससे अक्सर एक - दो नंबरों से बाजी मार लेता और वह क्लास में हमेशा दुसरे पायदान पर ही रह जाता था। मगर उसे इस बात का कभी मलाल न होता और परीक्षा से पहले किसी मैग्ज़ीन को पलटने में उसे कोई भी हिचकिचाहट नहीं होती थी। उसके चेहरे पर शांति रहती थी और मैं टेंश की कहीं मेरा फर्स्ट रेंक न छिन जाए। तो क्या हुआ, आख़िरकार मैं आगे रहता भी तो था। शीर्ष पर पहुँचने के लिए तपस्या करनी होती है, माँ की इस बात से मुझे फक्र होता। वही आदत अभी तक बनी हुई है। पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की चिंता फिर नौकरी फिर अब एक छोकरी। साला कहाँ मैं अब तक एक के लिए परेशान हूँ और कहाँ ये इतने मौज कर चुका है। उँह, ऐसी ही होगी बेकार, बाज़ारू नहीं तो। और मैंने अपनी भावनाओं को सँभाला था। लेकिन देर रात घर वापस आया तो बिस्तर पर लेटते ही कई एक ने सपनों में आकर तंग करना शुरू कर दिया था। तभी उसकी आवाज बगल के बिस्तर से आई थी।
- अंकल - आंटी कैसे हैं?''
- ठीक हैं।'' मैंने दूसरी तरफ़  करवट लेते हुए जवाब दिया था। चूँकि ख्वाबों से निकलना नहीं चाहता था।
- मुझे उनके हाथ के परांठे आज भी याद हैं। और तूने शादी नहीं की।''
- हाँ, माँ ने देख तो रखी है। बस मुझे ही छुट्टी नहीं मिल रही।''
- छुट्टी! ये क्या बात हुई! ऐसी नौकरी को तो लात मारते हैं यार।'' उसने भरपूर छेड़ने की कोशिश की थी।        सुनकर मैं मुस्कुराया तो था मगर मन ही मन कहने लगा- ये नौकरी तो बड़ी मुश्किल से मिली है वह भी गई तो क्या खाऊँगा।''
        उसे भोपाल आए तीन दिन बीत चुके थे। बस इतना पता चला था कि उसके मम्मी - पापा रिटायरमेंट के बाद पंजाब जा बसे हैं। और उसने और अधिक उनके बारे में बताने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई थी। हाँ, चौथे दिन जब उसने सुबह - सुबह अचानक तीन सौ रुपए की माँग कर डाली तो मैं सुनकर सन्न रह गया था।
- यार दो सो पचहत्तर रुपए की गोवा की टिकट है और पच्चीस रुपए में वहाँ पहुँचकर कुछ मूँगफल्ली खरीदूँगा।''
- वह क्यों?''
- बस यार, गोवा में कुछ दिन रहने का मन है। इस बार खाने कमाने के लिए समुद्र किनारे मूँगफल्ली बेचने की सोच है। आसान काम है। बाकी काम से मैं बोर हो चुका हूं देख ले। है तो दे दे। नहीं तो कोई बात नहीं।'' वह एक बार फिर एकदम सपाट था। और मैं, अपने आप से उलझ रहा था। महीने का आखिरी था। जेब में सौ - सौ के आखिरी तीन - चार नोट बचे थे। शायद इसमें मेरा बड़प्पन झलकता या पता नहीं क्या, और मैं यंत्रवत उसे पैसे देने लगा था। हाँ, इस बार थोड़ी चिंता जरूर ज्यादा हुई थी।
        देर शाम वह निकल चुका था। बिना कुछ कहे। कोई थैंक्स नहीं। बस सीधा सरल। मिले तो ठीक न मिले तो ठीक। उसके जाते ही सोचा तो पहले पहल लगा कि पागल है। देख तो शरम भी नहीं आई पैसे माँगने में। वापस करने का ज़िक्र भी नहीं किया। पता नहीं कैसा है। रात बिस्तर पर लेटा तो करवट बदलते ही लगा कि कोई आज मुझे झकझोर रहा है। और मैं बँधा हुआ हूँ। अचानक लगा कि मैं सबसे स्वतंत्र होना चाहता हूँ। अगले पल बेचैनी बढ़ी थी कि कुछ ही देर में चिंताओं ने फिर आ घेरा था। सुबह दूध वाले को पैसे देने हैं। और किराने वाला... हाँ,उसके भी बकाया हैं। साला, क्या ज़िंदगी है। क्या मेरी इन बातों का कोई अंत है? पता नहीं। और एक वह है रोज़ मस्ती से इधर - उधर घूम रहा है। उसके पास कुछ नहीं, मगर उसे कोई परवाह नहीं। और मैं, दिन भर चिंता में। तो कहीं वह मुझसे बेहतर तो नहीं? शायद। अचानक मन ने विद्रोह किया और मैं तुरंत सुबह की पहली गाड़ी से घर जाने के लिए सामान बाँधने लगा था। बे टिकट।

एक और सूरज

जितेन्‍द्र ठाकुर

        अधिकांश लोगों ने मान लिया था कि वह पगला चुका है। कुछ अधिक उदार दृष्टि रखने वाले लोग पगलाने के स्थान पर सनकना शब्द प्रयोग करते। परंतु यह तो लगभग तय था कि अब वह पहले जैसा सामान्य व्यक्ति नहीं रह गया है। इसके विपरीत वह अपने प्रति आश्वस्त था और अपने साथियों के प्रति चिंतित। वह अक्सर सोचता कि उसके इन बाबू साथियों की आँखें इतनी सूनी क्यों हैं? इनमें कभी भी कोई सपना क्यों नहीं उभरता।
दरअसल, हुआ यों था कि उसने अपनी बेदाग़ नौकरी के सत्रहवें साल में स्कूटर ख़रीदने के लिए कर्ज की अर्जी दी थी। दफ्तर ने कर्ज मंजूर करते समय जो कागज माँगे थे उनमें ड्राइविंग लाइसेंस भी शामिल था। वह लाइसेंस बनवाने आरटीओ गया था। उसने लाइसेंस बनवा भी लिया था। पर जब लाइसेंस उसके हाथ में आया तो वह चौंक गया! स्कूटर की जगह कार का लाइसेंस बना हुआ था।
        दफ़्तरी भाषा में तो यह महज़ एक क्लैरिकल मिस्टेक थी। पैन की निब स्कूटर पर टिकने की जगह कार पर टिक गई थी। इस गलती को बिना जद्दोजहद के सुधारा भी जा सकता था। परंतु उसके लिए तो यह एक ईश्वरीय संकेत था।
- हमें प्रभु की इच्छा का सम्मान करना चाहिए,।'' उसने पूरा प्रकरण साथियों को बतला कर बात समाप्त कर दी थी।
- अबे चरखी के ... ईसाई हो गया है क्या? जो प्रभु की इच्छा गाए जा रहा है। चुप करके जा और लाइसेंस ठीक करवा ले। वरना कार तो दूर, स्कूटर का लोन भी न मिलने का?'' मुँहफट करनवाल से रहा नहीं गया। '' मुझे अब स्कूटर का लोन नहीं चाहिए।''  उसकी घोषणा ने बाबू समुदाय के सपाट चेहरों को परेशान कर दिया था। तो क्या हवाई जहाज का लोन चाहिए। सभी हँस पड़े थे। 
- नहीं, हवाई जहाज का नहीं  कार का लोन चाहिए। मैं अब कार खरीदूँगा, स्कूटर नहीं।'' उसने बिना विचलित हुए उत्तर दिया। 
- कार। कौन - सी। शैवर लैट या बयूक।'' एक बार फिर ठहाका फूट पड़ा था। कोई भी उसकी बात के प्रति गंभीर नहीं था। सब यही सोच रहे थे कि या तो वह मजाक कर रहा है या यह सब उसका दिमागी फितूर है। दो चार घंटे न सही दो चार दिन में ठीक हो जाएगा। पर जब हालात नहीं बदले तो उसे समझाने की कोशिशें शुरू हो गई। पागलपन छोड़ो। मान लो तुमने अपनी कुल जमा पूँजी लगाकर कार खरीद भी ली तो उस सफेद हाथी को पालोगे कैसे? जितनी तुम्हारी तनख्व़ाह है उतना तो पेट्रोल ही फुँक जाएगा।
- नहीं ऐसा नहीं होगा, वक्त तेजी से बदल रहा है। किसने सोचा था कि एक दिन मोबाइल फोन पाँच सौ में मिल जाएगा। बस इसी तरह एक दिन कार भी मिलेगी।'' उसका विश्वास नहीं दरका। 
- ये तुम्हारा दीवानापन है। ऐसा दिन शायद हमारी जिंदगी में कभी नहीं आएगा।'' साथी ने लंबी साँस ली थी।
- न आए तो न सही। पर अब मैं स्कूटर नहीं खरीदूँगा। जब भी खरीदूँगा कार ही खरीदूँगा।'' वह स्थिर दृष्टि से शून्य में घूर रहा था जहाँ कई कारें सरसराती हुई फिसली जा रही थीं। तेरे घर के दोहरे कोई पागलों का डाक्टर नहीं है क्या? करनवाल फिर चिढ़ गया। वह चुप रहा। अपने दिमाग का इलाज करवा ले। जो साहब ने तेरी बातें सुनीं तो बेवक्त रिटायर कर देगा।
        उसके बाकी साथी इतनी तल्ख बातें कहते तो नहीं थे पर उनकी रज़ामंदी भी इसी में शामिल थी। उसे भी इस हक़ीक़त का इल्म था। पर इस सबके बावजूद वह अडिग था। स्कूटर की जगह कार का लाइसेंस बन जाना उसके लिए न तो क्लैरिकल मिस्टेक थी और ना ही कोई दुर्योग। वह इसे विशुद्ध ईश्वरीय संकेत मानता था जो उसे कार खरीदने के लिए प्रेरित कर रहा था। इसीलिए उसने एक मोटर ड्राइविंग स्कूल में दाखिला ले लिया था और सुबह - सवेरे उठकर कार सीखने जाने भी लगा था। उसे विश्वास था कि हालात बदलने वाले हैं।
उसने एक डायरी बनाई और उसमें कारों का विवरण दर्ज करने लगा। किस कार में क्या खूबी है। कितना माईलेज देती है। शो रूम का मूल दाम क्या है और इंश्योरेंस - टैक्स वगैरह लगाकर सड़क तक आने में कितना रुपया और लगेगा। यह सब उसकी डायरी में दर्ज रहता। इसके साथ ही वह देखी गई कारों के नाम, रंग और मॉडल भी तारीखवार नोट करता। उसका मानना था कि इससे, उसे एक ऐसी कार खरीदने में मदद मिलेगी जो शहर में सबसे अलग होगी। और तब लोग उसकी कार देखकर उसे दूर से ही पहचान जाएँगे।
        कुछ इतवार उसने कार बाजार में भी गुजारे। पर वहाँ जल्दी ही लोग उससे कतराने लगे। दलाल उससे बात करने में समय की बरबादी को समझ गए। किसी - किसी ने तो खीझकर उसे झिड़क भी दिया। अंत में उसने कार बाजार का रास्ता ही छोड़ दिया। वैसे भी अब उसके लिए कार बाजार का आकर्षण समाप्त हो चुका था। वहाँ इकठ्ठा सारी कारों का विवरण अब उसकी डायरी में दर्ज था।
        कभी - कभी सड़क पर चलते - चलते, वह अचानक रुक जाता। जेब से सिगरेट की डिब्बी निकालता। सिगरेट सुलगाता और किनारे खड़ी किसी सुंदर कार से पीठ टिका कर धुएँ के गोले बनाने लगता। छुपी नजरों से लोगों के चेहरे टटोलता। यदि किसी चेहरे पर कार से टिकी उसकी भंगिमा का दबदबा उभरता तो उसका मन लहलहा उठता। उसकी ऐसी सनकाने वाली स्थिति से भला किसी को क्या एतराज हो सकता था, परंतु इसके बाद उसके बढ़ते जुनून ने कुछ मुश्किलें पैदा कर दी थीं। जैसे पास से गुजरती किसी कार को रोक कर वह पूछता - आपने यह जो सीट कवर लगाया है, बहुत सुंदर है। कहाँ से खरीदा। या फिर रोक कर कहता - आपका हार्न बहुत म्यूजिकल है। मुझे भी अपनी गाड़ी में यही लगवाना है। कहाँ मिलेगा?
        बेवजह अचानक गाड़ी रुकवाए जाने पर कई बार प्रतिक्रिया अत्यंत विस्फोटक होती। पर उस पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। सिर झुकाए हुए चुपचाप वह आगे बढ़ जाता। गाड़ियों के प्रति उसका रुझान जितना बढ़ रहा था, जिस्म और पहरावे के प्रति उतना ही घट रहा था। कई सुबह तो उसकी आँखों में मैला भरा रहता, दाढ़ी बढ़ी रहती और बालों में कंघी करना भी भूल जाता। मैले कफ.कॉलर वाली कमीज हो। उधड़ी सिलाई वाला स्वेटर या बिना क्रीज की पैंट। उसे कोई अंतर नहीं पड़ता। कंधे पर लटकते झोले में डायरी, मफलर, टोपी, पानी की बोतल और टिफिन ठुँसे रहते। कई - कई बार तो घर से भर कर चला टिफिन शाम को भरा हुआ ही घर लौट आता। अलबत्ता उस दिन डायरी में किसी खास गाड़ी के टायर से लेकर वाईपर तक का सारा विवरण अंकित रहता।
        एक दिन तो हद ही हो गई। एक जनरल स्टोर के बाहर खड़ी कार का दरवाजा खोल कर वह उसमें बैठ गया। स्टेयरिंग घुमा कर देखा। सीट को आगे पीछे किया। हैंड ब्रेक को हिलाया डुलाया और मीटर की सुइयों को जाँच - परख कर नीचे उतर गया। गनीमत यह रही कि कार के मालिक ने उसकी यह हरकत नहीं देखी और वह एक बड़ी मुसीबत से बच गया।
        ऐसे अविस्मरणीय कृत्य वह सड़कों पर ही करता था। दफ्तर में चुपचाप सिर झुकाए हुए काम करता रहता। यह बात अलग थी कि उसे अब जिम्मेदारी का काम दिया जाना बंद हो गया था। समझाने वाले कुछ साथी नियति को स्वीकार कर चुके थे, पर कुछ अब भी नाउम्मीद नहीं थे। हँसने वाले पहले भी हँसते थे और अब भी हँस रहे थे।
        कार लोन के लिए उसने जो दरख्वास्त दी थी पहले ही नामंजूर हो चुकी थी। प्राविडेंड फंड से रुपया निकालने की अर्जी भी खारिज होने के बाद वह हताश हो गया। शाम को लोगों ने एक नया दृश्य देखा। वह दफ्तर की सीढ़ियों से उतरकर पोर्च में खड़ा हुआ और उँगलियों से चाबी फँसाने का उपक्रम करते हुए मुँह से कार स्टार्ट होने की ध्वनि निकालने लगा। फिर गीयर बदल कर अदृश्य स्टेयरिंग को घुमाया हुआ दफ्तर के अहाते से बाहर निकल गया। मुख्य सड़क पर आने से पहले हॉर्न देकर उसने राहगीरों को सचेत भी किया था। अब ये कौतुक प्रतिदिन देखने को मिलता। स्टेयरिंग घुमाते और हार्न बजाते हुए दफ्तर में आने के बाद वह पार्किंग वाले टीन शेड में जाता। अदृश्य कार खड़ी करता। दरवाजा बंद करके उसे बाकायदा लाक करता और फिर शालीनता से सिर झुकाए दफ्तर की बिल्डिंग में समा जाता। वह नहीं चाहता था कि उसके पास कार आने के बाद, उसके व्यवहार में कुछ ऐसा लक्षित हो कि साथी उसे घमंडी समझ लें।
        यदि कोई कहता - यार तुम्हारी कार हमें दिखलाई नहीं देती। तो वह तमक कर उत्तर देता - आँख का इलाज करवाओ दिखलाई दे जाएगी। कोई छेड़ता - कार का क्या हाल बना रखा है। साफ. सफाई भी करते हो या नहीं? सर्विसिंग करवानी है यार। टाइम नहीं मिलता। वह निहायत चिंतित स्वर में उत्तर देता या फिर कभी स्वयं ही कहता। आज रास्ते में कुछ प्रॉब्लम कर रही थी। लगता है टयूनिंग करवानी पड़ेगी। ऐसे ही कारणों से उसके लिए पगला गया है जैसा विशेषण प्रयोग होने लगा था। अन्यथा उसके व्यवहार में अन्य कोई ऐसा लक्षण नहीं था कि उसे पागल करार दिया जाता।
        इकत्तीस दिसंबर की रात बेहद ठंडी थी। चारों तरफ  घने कोहरे की परत जमी हुई थी। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। इसके बावजूद सड़कें आबाद थीं। गाड़ियों के पीछे गाड़ियाँ दौड़ी चली जा रही थीं। उसने भी अपनी अदृश्य कार सड़क पर निकाल ली। जब लाइट जलाने के बाद भी कुछ दिखलाई नहीं दिया तो उसने फॉग लाइट आन कर दी। अब कुछ दिखलाई देने लगा था। उसने गीयर बदला, एक्सीलेटर पर पैर का दबाव बढ़ाया। कार उड़ चली। कायदे से इंडिकेटर और डिपर देता हुआ वह बड़ी सड़क पर आ चुका था। पर जाने कैसे अचानक स्टेयरिंग बहक गया। कार लहरा कर सड़क के बीचो - बीच आ गई। और एक भयानक आवाज के साथ कोहरे की घनी चादर फट गई!
        अगली सुबह! रंगीन फूलों के हजारों खुशनुमा गुलदस्तों से लदा हुआ सूरज उसके करीब से गुजरता हुआ शहर की तरफ  बढ़ गया।

अंगद का पॉंव

श्रीलाल शुक्‍ल

        वैसे तो मुझे स्टेशन जा कर लोगों को विदा देने का चलन नापसंद है पर इस बार मुझे स्टेशन जाना पड़ा और मित्रों को विदा देनी पड़ी। इसके कई कारण थे। पहला तो यही कि वे मित्र थे। और मित्रों के सामने सिद्धांत का प्रश्न उठाना ही बेकार होता है। दूसरे वे आज निश्चय ही पहले दर्जे में सफर करने वाले थे जिसके सामने खड़े हो कर रूमाल हिलाना मुझे निहायत दिलचस्प हरकत जान पड़ती है।
        इसलिए मैं स्टेशन पहुँचा। मित्र के और भी बहुत - से मित्र स्टेशन पर पहुँचे हुए थे। उनके विभाग के सब कर्मचारी भी वहीं मौजूद थे। प्लेटफार्म पर अच्छी - खासी रौनक थी। चारों ओर उत्साह फूटा - सा पड़ रहा था। अपने दफ्तर में मित्र जैसे ठीक समय से पहुँचते थे, वैसे ही गाड़ी भी ठीक समय पर आ गई थी। अब उन्होंने स्वामिभक्त मातहतों के हाथों गले में मालाएँ पहनी, सबसे हाथ मिलाया, सबसे दो - चार रस्मी बातें कहीं और फर्स्ट क्लास के डिब्बे के इतने नजदीक खड़े हो गए कि गाड़ी छूटने का खतरा न रहे।
        गाड़ी छूटने वाली थी। लोगों ने सिगनल की ओर देखा। वह गिर चुका था।
        अब चूँकि कुछ और करना बाकी न था इसलिए उन्होंने उन लोगों में से एक आदमी से बातें करनी शुरु की जो ऊपरी मन से हर काम के आदमी को दावत के लिए बुलाते हैं और जिनकी दावतों को हर आदमी ऊपरी मन से हँस कर टाल दिया करता है। हमारे मित्र भी उनकी दावत टाल चुके थे। इसलिए वे कहने लगे - इस बार आऊँगा तो आपके यहाँ रुकूँगा।
        वे हँसने लगे। कहने लगे - आप ही का घर है। आने की सूचना भेज दीजिएगा। मोटर ले कर स्टेशन आ जाएँगे। तब मित्र ने कहा-  इसमें तकल्लुफ की क्या जरूरत है। तब मित्र बोले कि तकल्लुफ  घर वालों से तो किया नहीं जाता। तब वे बोले - जाइए साहब, ऐसा ही घर वाला मानते तो आप बिना एक शाम हमारे गरीबखाने पर रूखा - सूखा खाए यों ही न निकल जाते। तब मित्र ने कहा कि ऐसी क्या बात है, आप ही का खाता हूँ। तब वे हें - हें करने लगे। तभी गाड़ी ने सीटी दे दी और लोग आशापूर्वक सिगनल की ओर झाँकने लगे।
मैंने इस बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि मित्र को हमेशा मेरे ही यहाँ आ कर रुकना था और हम दोनों इस बात को जानते थे।
        ठीक वैसे ही जैसे मित्र दफ्तर में आते तो समय से थे पर जाने में हमेशा कुछ देर कर देते थे वैसे ही समय हो जाने पर भी गाड़ी ने सीटी तो दे दी पर चली नहीं। इसलिए फिर रुक - रुक कर इन विषयों पर बातें होने लगी कि मित्र को पहुँचते ही सबको चिठ्ठी लिखनी चाहिए और उस शहर में अमरूद अच्छे मिलते हैं और साहब, आइएगा तो अमरुद जरूर लाइएगा। तब पुराने नौकर ने बताया कि नाश्तेदान को बिस्तर के पीछे रख दिया है। तभी पुराने हेड क्लर्क बोले कि बिस्तर का सिरहाना उधर के बजाय इधर होता तो अच्छा होता क्योंकि उधर कोयला उड़ कर आएगा। तब हेड क्लर्क बोले कि नहीं, कोयला उधर नहीं आएगा बल्कि उधर से सीनरी अच्छी दिखेगी। तभी कैशियर बाबू आ गए। उन्होंने मित्र को दस रुपए की रेजगारी दे दी। तब मित्र ने खुलेआम उनके कंधे को थपथपाया और खुले गले से उन्हें धन्यवाद दिया।
        पर इस सबसे न तो कुछ होना था, न हुआ। लोग महीना भर से जानते थे कि मित्र को जाना है। इसलिए मतलब की सभी बातें पहले ही अकेले में खत्म हो चुकी थीं और सबके सामने वे सभी बातें की जा चुकी थी जो सबके सामने कही जाती हैं। सामान रखा जा चुका था। टिकट खरीदा ही जा चुका था। मालाएँ डाली ही जा चुकी थीं। हाथ या गले या दोनों मिल ही चुके थे और गाड़ी चलने का नाम तक न लेती थी। थियेटर में जब हीरो पर वार करने के लिए विलेन खंजर तान कर तिरछा खड़ा हो जाता है, उस वक्त परदे की डोरी अटक जाए तो सोचिए क्या होगा? कुछ वैसी ही हालत थी। परदा नहीं गिर रहा था।
        चूँकि मेरे पास करने को कोई बात नहीं रह गई थी इसलिए मैं मित्र से कुछ दूर जा कर खड़ा हो गया और किसी ऐसे आदमी की तलाश करने लगा जो बराबर बात कर सकता हो। जो ऐसा आदमी नजर में आया उसे मित्र की ओर ठेल भी दिया। उसने अपनी हमेशा वाली मुस्कान दिखाते हुए कहा-  आपके जाने से यहाँ का क्लब सूना हो जाएगा। मित्र ने हँस कर इस तारीफ  से इन्कार किया। उसने कहा - पहले ब्राउन साहब के जमाने में टेनिस इसी तरह चली थी, पर अब देखिए क्या होता है। मित्र बोले - होता क्या है? आप चलाइए। तभी वे एकदम नाराज हो गए। तुनक कर बोले - मैं क्या चला सकता हूँ जनाब, मुझे तो ये लड़के क्लब का सेक्रेटरी ही नहीं होने देना चाहते। अब कोई टिकियाचोर सेक्रेटरी हो तभी टेनिस चलेगी। मुझे तो ये निकालने पर आमादा हैं। बोलते - बोलते वे अकड़ कर खड़े हो गए। मित्र ने हँस कर इस विषय को टाला। उसके बाद इनकी बातों का भी दिवाला पिट गया और बात आई - गई हो गई।
        पर गाड़ी नहीं चली।
        मित्र कुछ देर तक बेचैनी से सिग्नल की ओर देखते रहे। कुछ लोग प्लेटफार्म पर इधर - उधर टहल कर पान सिगरेट के इंतजाम में लग गए। कुछ को अंतरराष्ट्रीय समस्याओं ने इस कदर बेजार किया कि वे पास के बुकस्टॉल पर अखबार उलटने लगे। कुछ के मन में कला, कौशल और ग्रामोद्योगों के प्रति एकदम से प्रेम उत्पन्न हो गया। वे पास की एक दूकान पर जा कर हैंडिक्रैफ्ट के कुछ नमूने देखने लगे। तब एक पुराना स्थानीय नौकर मित्र के हाथ लग गया। उसे देखते ही अचानक मित्र के मन में समाज की समाजवादी व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा हो गया। वे हँस कर उसकी प्रशंसा करने लगे। तब वह रो कर अपनी पारिवारिक विपत्तियाँ सुनाने लगा। अब मित्र बड़े करुणाजनक भाव से उसकी बातें सुनने लगे। तब कुछ टिकट - चेकर तेजी से आए और सामने से निकल गए। मित्र ने उनकी ओर देखा पर जब तक वे कुछ बात करने की बात तय करें कि वे आगे निकल गए। तब तक एक लंबा - सा गार्ड सीटी बजाता हुआ निकला। हेड क्लर्क ने कहा - सुनिए साहब। पर यह उसने अनसुना कर दिया और सीटी बजाता हुआ आगे बढ़ गया।
        पर गाड़ी फिर भी नहीं चली।
        कुछ को परिस्थिति पर दया आई और वे मित्र के पास सिमट आए। पर घूम - घूम कर कई लोगों ने कई छोट - छोटे गुट बना लिए और कला के लिए जैसे कला, वैसे बात के लिए बातें चल निकलीं। एक साहब की निगाह मित्र की फूल - मालाओं पर गई। उनको उसी से प्रेरणा मिली। बोले - गेंदे के फूल भी क्या कमाल पैदा करते हैं असली फूल - मालाएँ तो गेंदे के फूलों की ही बनती है।
        बातचीत की सड़ियल मोटर एक बार जब धक्का खा कर स्टार्ट हो गई तो उसके फटफटाहट फिर क्या पूछना! दूसरे महाशय ने कहा - इंडिया में अभी तो जैसे हम बैलगाड़ी के लेवल से ऊपर नहीं उठे, वैसे ही फूलों के मामले में गेंदे से ऊपर नहीं उभर पाए। गाड़ियों में बैलगाड़ी, मिठाइयों में पेड़ा, फूलों में गेंदा, लीजिए जनाब, यही है आपका इंडियन कल्चर!
        इसके जवाब में एक - दूसरे साहब ने भीड़ के दूसरे कोने से चीख कर कहा - अंग्रेज चला गया पर अपनी औलाद छोड़ गया।
       इधर से उन्होंने कहा - जी हाँ, आप जैसा हिंदुस्तानी रह गया पर दिमाग बह गया। इतना कह कर जवाब में आनेवाली बात का वार बचाने के लिए वे फिर मित्र की ओर मुखातिब हुए और कहने लगे - बताइए साहब, गुलाब की वो- वो वैरायटी निकाली है कि ...।
        तभी गार्ड ने फिर सीटी दी और वे चौंक कर इंजिन की ओर देखने लगे। इंजिन एक नए ढंग से सी - सी करने लगा था। कुछ सेकंड तक यह आवाज चलती रही, पर उसके बाद फिर पहले वाली हालत पर आ गई। ठीक वैसे ही, जैसे दफ्तर छोड़ने के पहले मित्र कभी - कभी कुर्सी से उठ कर भी कोई नया कागज देखते ही फिर से बैठ जाते थे। तब उस पुष्प प्रेमी ने अपना व्याख्यान फिर से शुरु किया - हाँ साहब, तो अंग्रेजों ने गुलाब की वो - वो वैरायटी निकाली है कि कमाल हासिल है! सन बर्स्ट, पिंक पर्ल, लेडी हैलिंग्टन, ब्लैक प्रिंस, वाह, कमाल हासिल है! और अपने यहाँ, यहाँ तो जनाब वही पुराना टुइयाँ गुलाब लीजिए और खुशबू का नगाड़ा बजाइए।
बात यहीं पर थी कि इस बार गार्ड ने सीटी दी। बहस थम गई। पर कुछ देर गाड़ी में कोई हरकत नहीं हुई। इसलिए वे दूसरे महाशय भी भीड़ को फाड़ कर सामने आ गए। अकड़ कर बोले - हाँ साहब,जरा फिर से तो चालू कीजिए वही पहले का दिमाग वाला मजमून। मेरा तो भई, दिमाग हिंदुस्तानी ही है, पर आइए, आपके दिमाग को भी देख लें।
        तब मित्र महोदय बड़े जोर से हँसे और बोले - हातिम भाई और सक्सेना साहब में यह हमेशा ही चला करता है। याद रहेंगे, साहब, ये झगड़े भी याद रहेंगे।
        इस तरह यह बात भी खत्म हुई। झगड़े को मजबूरन मैदान छोड़ना पड़ा। उधर सिग्नल गिरा हुआ था। इंजिन फिर से सी - सी करने लगा था। पर गाड़ी अंगद के पाँव - सी अपनी जगह टिकी थी।
         भीड़ के पिछले हिस्से में दर्शन - शास्त्र के एक प्रोफेसर धीरे - धीरे किसी मित्र को समझा रहे थे - जनाब, जिंदगी में तीन बटे चार तो दबाव है, कोएर्शन को बोलबाला है, बाकी एक बटे चार अपनी तबीयत की जिंदगी है। देखिए नए मेरा काम तो एक तख्त से चल जाता है, फिर भी दूसरों के लिए ड्राइंग - रूम में सोफे डालने पड़ते हैं। तन ढाँकने को एक धोती बहुत काफी है पर देखिए बाहर जाने के लिए यह सूट पहनना पड़ता है। यही कोएर्शन है। यही जिंदगी है। स्वाद खराब होने पर भी दूध छोड़ कर कॉफी पीता हूँ, जासूसी उपन्यास पढ़ने का मन करता है पर कांट और हीगेल पढ़ता हूँ, और जनाब गठिया का मरीज हूँ, पर मित्रों के लिए स्टेशन आ कर घंटों खड़ा रहता हूँ।
        वे और उनके श्रोता, दोनों रहस्यपूर्ण ढंग से हँसने लगे और फिर मुझे अपने नजदीक खड़ा पा कर जोर से खुल कर हँसने लगे ताकि मुझे उनकी निश्छलता पर संदेह न हो सके।
         गाड़ी फिर भी नहीं चली।
        अब भीड़ तितर - बितर होने लगी थी और मित्र के मुँह पर एक ऐसी दयनीय मुस्कान आ गई थी जो अपने लड़कों से झूठ बोलते समय अपनी बीवी से चुरा कर सिनेमा देखते समय या वोट माँगने में भविष्य के वादे करते समय हमारे मुँह पर आ जाती होगी। लगता था कि वे मुस्कुराना तो चाहते हैं पर किसी से आँख नहीं मिलाना चाहते।
        तभी अचानक गार्ड ने सीटी दी। झंडी हिलाई। इंजिन का भोंपू बजा और गाड़ी चलने को हुई। लोगों ने मित्र से उत्साहपूर्वक हाथ मिलाए। फिर मित्र ही डिब्बे में पहुँच कर लोगों से हाथ मिलाने लगे। कुछ लोग रूमाल हिलाने लगे। मैं इसी दृश्य के लिए बैचैन हो रहा था। मैंने भी रूमाल निकालना चाहा, पर रूमाल सदा की भाँति घर पर ही छूट गया था। मैं हाथ हिलाने लगा।
        एक साहब वजन लेनेवाली मशीन पर बड़ी देर से अपना वजन ले रहे थे और दूसरों का वजन लेना देख रहे थे। गार्ड की सीटी सुनते ही वे दौड़ कर आए और भीड़ को चीरते हुए मित्र तक पहुँचे। गाड़ी के चलते - चलते उन्होंने उत्साह से हाथ मिलाया। फिर गाड़ी को निश्चित रूप से चलती हुई पा कर हसरत से साथ बोले- काश, कि यह गाड़ी यहीं रह जाती।