गुरुवार, 22 मई 2014

मई 2014 से जुलाई 2014

पाठकों की कलम से
प्रतिभा
बसंत की कुचियों में ग्रामीण जनजीवन मूर्तरुप लेता है : सुशील भोले
सम्‍पादकीय
छत्‍तीसगढ़ी के साहित्‍यकार: अपना दायित्‍व समझें
आलेख
लोक की समूहवादी चेतना और राऊत नाच : डां.गोरेलाल चंदेल
कहानी
खोल दो : सआदत हसन मन्‍टो
रोपवे : मनोज कुमार शुक्‍ल ' मनोज '
व्‍यंग्‍य
सुरा प्रेमियों का सम्‍मेलन : प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव
आलोचना का सुख : ब्रजकिशोर झा
चरित्र का जामुन : मिलिन्‍द साव
गीत / गजल / कविता
छत्‍तीसगढ़ी गीत : सबो सुख हे गांव म : गणेश यदु
दोहे : उसके हाथों में नहीं : ब्रजभूषण चतुर्वेदी ' ब्रजेश '
गीत : जीवन नगरी पर सदियों से : कृपाशंकर शर्मा ' अचूक '
दो दोहे : जगन्‍नाथ ' विश्‍व '
गीत : चांदी की छड़ी : डां. गार्गीशरण मिश्र ' मराल '
कविता : जल उठी ज्‍योति : जय जयराम आनन्‍द
कविता : मैं समझूंगी वरमाला है :  सरिता बाजपेयी ' साक्षी '
गजल : केशव शरण
लघु व्‍यंग्‍य कथा
भाषणबाज : नूतन प्रसाद
कुबेर की ल्‍ाघु व्‍यंग्‍य कथाएं
लघुकथा
अपराधी आंकड़े : अंकुश्री
सुरता
अव्दितीय क्रांतिकारी कवि : कुंजबिहारी चौबे : आचार्य सरोज व्दिवेदी
पुस्‍तक समीक्षा
उपदेशात्‍मक काव्‍य संग्रह : पीरा : समीक्षक - यशवंत मेश्राम
साहित्यिक सांस्‍कृतिक गतिविधियां
गंडई पंडरिया में साकेत साहित्‍य परिषद सुरगी का पंद्रहवां सम्‍मान समारोह एवं वैचारिक गोष्‍ठी सम्‍पन्‍न
चक्रधर की साहित्‍यधारा का विमोचन
विज्ञापन
किसानों की समृध्दि की पहचान

छत्‍तीसगढ़ी के साहित्‍यकार : अपना उत्‍तरदायित्‍व समझें

अंतत: किसी कवि ने कहा है - ’छत्तीससगढ़ में सब कुछ है, पर एक कमी है स्वाभिमान की। मुझसे सही नहीं जाती है, ऐसी चुप्पी वर्तमान की।’ कविता की इन पक्तियों में कवि की एक ओर जहाँ छत्तीसगढ़ के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और अटूट आस्था अभिव्यक्त होती है वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढिय़ों के शोषण और अपमान के प्रति उनका क्षोभ भी दिखाई देता है। स्वाभिमान को तार-तार करने वाला, छत्तीसगढिय़ों का अनावश्यक व कायराना भोलापन और उनकी चुप्पी के प्रति आक्रोश के भाव की अभिव्यंजना भी होती है। पर इस तथ्य से इन्‍कार करना मूर्खता होगा कि अमीर धरती के गरीब छत्तीसगढिय़ों की इस दीन-हीन स्थिति के लिए कोई और कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि  उनका यही अनावश्यक व कायराना भोलापन, उनकी अनावश्यक व कायराना चुप्पी ही उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
छत्तीसगढिय़ों के लिए कहा जाता है - ’पहिली जूता पाछू बात, तब आवै छत्तीसगढिया हाथ’। खेतों और खदानों में पुरूषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करने वाली यहाँ की श्रमशील हमारी माताओं और बहनों को अपमानित करने के लिए कहा जाता है - ’छत्तीसगढ़ की औरतें छत्तीस-छत्तीस मर्द बनाती हैं’। शोषको के इसी मानसिकता का परिणाम है कि ’अमटहा भाटा ल चुचर, बमलई म चढ़, इही ल कहिथे छत्तीसगढ़।’ जैसी कविताएँ कवि मंचों पर रस ले-लेकर कही और सुनी जाती हैं। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढिय़ों के लिए जो परिभाषा इस पंक्ति में गढ़ी गई है, यहाँ की आराध्य देवी के लिये जो मुहावरा कहा गया है; छत्तीसगढ़ी भाईयों और यहाँ की माताओं-बहनों के लिए जो बातें पहले से ही कही जाती रही हैं, उसे सिर्फ और सिर्फ यही के लोग बेशर्मी के साथ सुन और सह सकते हैं; सुनकर भी मुर्दों के समान चुप्पी साधे रह सकते हैं। हमारा यही अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी हमारी नेतृत्व क्षमता पर भी दिखाई देती है। हमारा नेतृत्व यहाँ के बहुंख्यक समुदाय के हाथों में कभी नहीं रहा; आयातित नेतृत्व का अनुचर और अनुगामी की भूमिका ही हम हमेशा पसंद करते रहे हैं, इसी में संतुष्ट होते रहे हैं। ऐसा आखिर कब तक ?
यहाँ की इस स्थिति के लिए यहाँ की आम जनता से अधिक  दोषी यहाँ के बुद्धिजीवी, कवि और साहित्यकार  हैं। माना कि साहित्य से क्राँतियाँ नहीं होती, पर क्राँति का मशाल जलाने के लिए चिंगारी और क्राँतिकारियों के दिलों में आग, तो यहीं से पैदा होती है। छत्तीसगढ़ में कवियों और साहित्यकारों की कमी नहीं है, देश की आजादी की लड़ाई  समय से ही यहाँ साहित्यकारों की एक समृद्ध परंपरा रही है। इनके साहित्य में क्राँति का मशाल जलाने के लिए चिंगारी और क्राँतिकारियों के दिलों में आग भड़काने की अद्भुत क्षमता भी होती थी, पर कवि-साहित्यकारों की आज की पीढ़ी, अपनी इस समृद्ध साहित्यिक विरासत को संभालने, सहेजने और आगे बढ़ाने में विफल रही है। छत्तीसगढ राज्य बनने के बाद तो यहाँ कवियों की भीड़ दिखाई देने लगी है। विचार वीथी के हर अंक के लिए छत्तीसगढ़ के सहित्यकारों के द्वारा नियमित रूप से मुझे पर्याप्त मात्रा में नई प्रकाशित पुस्तकें प्राप्त होती रहती हैं, परन्तु प्रारंभ में कविता की जिन पँक्तियों का मैंने उल्लेख किया है, उस तरह की कविता, उस तरह के कवि और क्राँति का मशाल जलाने के लिए जिस चिंगारी की आवश्यकता है, और क्राँति के लिए दिलों में आग पैदा करने के लिए साहित्य में जिस आग की जरूरत है, उसे पैदा करने वाला आज न तो कोई कवि ही दिखाई देता है और न ही वैसी पँक्तियाँ ही पढऩे को मिलती हैं।
विचार वीथी के पहले के अंकों में भी मैंने यह मुद्दा उठाया था। अपने आदरणीय साहित्यकारों से मैं पुन: निवेदन करना चाहता हू कि वे अपने साहित्यिक उत्तरदायित्व को समझें। समकालीन साहित्य की अवधारणाओं और प्रवृत्तियों को समझें। कोरी कल्पना का उड़ान भरना छोड़ें, यथार्थ की कड़वी और कठोर धरातल का दामन थामें, हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी पर प्रहार करने वाली, उसे तोडऩे वाली रचनाओं का सृजन करें।
याद रखें, हमारा नेतृत्व करने के लिए नेताओं का आयात करने की जरूरत नहीं है, हमारे नहीं चाहने पर भी वे आयातित होते रहेंगे, हमें मिलते रहेंगे; परन्तु वे हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी को और अधिक स्थायी बनाने का प्रयास ही करेंगे, क्योंकि इसी में उनका हित सधता है। हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व
कायराना चुप्पी को तोडऩे वाला तो हममें से ही कोई पैदा हो सकता है। चर्चा जारी रहेगा .........।
संपादक

कहानी प्रतियोगिता के संबंध में सूचना

 '' विचार वीथी ''  द्वारा  कहानी प्रतियोगिता 2014 का आयोजन किया जा गया है। अपरिहार्य कारणों से प्रविष्टियां भेजने की तिथि में वृद्धि की जा रही है। मई 2014 में आयोजित कार्यक्रम अब डां.बल्देव प्रसाद मिश्र की जयंती 12 सितम्बर 2014 में किया जायेगा। लेखक इस प्रतियोगिता हेतु अपनी रचना 31 अगस्त 2014 तक अपनी रचना भेज सकते हैं।
इस प्रतियोगिता हेतु चयनित प्रथम तीन कहानियों पर क्रमश 2100/-, 1100/-, 501/- रुपये नगद पुरस्‍कार , प्रशस्ति पत्र, शाल व श्रीफल प्रदान किया जायेगा।
कहानियों का चयन विचार वीथी द्वारा नामित निर्णायक मण्डल द्वारा किया जायेगा। निर्णायक मण्डल का निर्णय सर्वमान्य होगा।
पता
संपादक
विचार वीथी
17/ 297, पूनम कालोनी, वर्धमान नगर
शिव मंदिर के पास, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
मोबाईल - 94241 - 11060
मेल :vicharvithi@gmail.com

पाठकों की कलम से

एक अच्‍छा अंक, बधाई 
विचार वीथी अंक फरवरी-अप्रेल 2014। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग उद्देश्यहीन है। राजभाषा बन जाना और बात है, सदुपयोग होना अलग चीज है। छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक - माध्यमिक पाठयक्रमों में लागू करना ढकोसला है। रूपयों का दुरूपयोग है। जनता के साथ छल है। छत्तीसगढ़ी भाषा में पाठ्यक्रम लागू करने के पूर्व ध्यान देना पड़ेगा -
1. सर्वेक्षण। 2. माता-पिता, बालक - बालिका और समाज कितनी स्वीकृति प्रदान करता है। 3. औद्योगिक पृष्ठभूमि वाले छत्तीसगढिय़ा कितने हैं जो इस भाषा में पढ़ पायेंगे। 4. कितने छत्तीसगढ़ी भाषा शिक्षक हैं जिन्होंने स्नातकोत्तर विषय के रूप में छत्तीसगढ़ी को पढ़ा है। 5. शासकीय - अशासकीय क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ी भाषियों को लेकर कितनी नियुक्तियाँ हैं?
उपरोक्त कारणों के बिना छत्तीसगढ़ी भाषा लागू की गई तो जस हाल माधो, तस हाल उधो ही होगा। सर्वोत्तम उदाहरण ’हिन्दी’ हैं एक विशिष्ट उदाहरण दूँगा, मेरी बात स्पष्ट हो जायेगी। ’’आज भी पचासों साल बाद विद्वान लोग हिन्दी को ’राष्ट्र भाषा’ कह रहे हैं। यह हिन्दी का दुर्भाग्य है। हमने सन् 1948 में अपनी किशोरावस्था में स्व. सेठ गोविन्द दास के साथ हिन्दी का कार्य किया था। फिर 1963 में हिन्दी को मात्र ’राष्ट्रभाषा’ दर्जा दिला पाये। इस भ्रम को लोग आज भी पाले हैं कि हिन्दी ’राष्ट्रभाषा’ है।’’ (श्रीमती सुधा रानी श्रीवास्तव, जबलपुर म.प्र., वैचारिणी, कोलकाता, अंक मार्च-अप्रेल 2013, पृ. 81)  राकेश भारती हिन्दी दशा पर लिखते हैं - ’’आज की पीढ़ी को जिस ’चटनी प्रक्रिया’ से हिन्दी पढ़ाई जाती है वह छात्रों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से काटकर रखती है।’’ ऐसा ही हाल छत्तीसगढ़ राजभाषा का है और आगे भी जारी रहेगा। सर्वेद जायज लिखते हैं - ’’डॉ. सुरेन्द्र को लाज नहीं आती होगी।’’ कैसे आयेगी जब लोग अपनी डफली, अपना राग अलापने लगे हैं।
अंक में मनोज कुमार शुक्ल और संध्या विश्व के आलेख महत्वपूर्ण हैं। ’अरमान’ और ’फूलो’ दोनों कहानी में संघर्ष है; एक में पूर्ण होता है, दूसरे में लड़ाई का उत्सर्ग होने को है। देर-सबेर होगा ही। अर्पणा शाह की कहानी, ’जितना इलाज में पैसा लगेगी, दिक्कत होगी। उससे कम में आसानी से दूसरा बच्चा पैदा कर लोगी’। (पृ.29) तब भला आदर्श मनुष्य की  खोज जारी रहेगा? आजादी गिनने की नहीं समझने, जानने, विचार-विन्यास का विषय है। लघुकथाएँ उत्‍कृष्ट हैं। सर्वेद ने तीन पृष्ठ बेकार में रंगे हैं। महापर्व महाशिवरात्रि से सभी पाप हनन हो जाते तो दुनिया में कोई भी समस्या नहीं रहती। साहित्य के बहाने किसी एक वाद को लेकर चलना संपादक का काम नहीं , जनता-जनार्दन पर छोड़ देना चाहिए। थानसिंह वर्मा की कविता आज के दौर की कविता है। एक अच्छा अंक। सादर बधाई।
यशवंत मेश्राम,  शंकरपुर, वार्ड नं. 4, राजनांदगाँव 491441 (छ.ग.)
वंदनीय कार्य र रहे हैं, बधाई
आपके  द्वारा प्रेषित पत्रिका विचार वीथी हमें प्राप्त हुई। पढ़कर बड़ी खुशी हुई। विषय सामग्री चाहे वह गजल,कविता,कहानी व आलेख वगैरह हो सभी का चयन सावधानी पूर्वक किया गया है। पेपर के साथ प्रिंटिंग का भी स्तर बहुत अच्छा लगा। जिसके लिये आप एवं आपके सहयोगी गण बधाई के पात्र है।
मैं रायपुर में लगभग 11 वर्ष अपने बैंक में सेवा के दौरान रहा। रायपुर नगर के सभी साहित्य मनीषियों का स्नेह व आशीर्वाद मिला। कुछ पुराने अपनत्व भरे पलों की याद तरो ताजा हो आयी है। अच्छा लगा। श्री देवीसिंह चौहान, श्री सरयूकान्त झा, डां. राजेश्वर गुरु, श्री हरिठाकुर, श्री बबन मिश्रा, श्री प्रभाकर चौबे, डां. सालिग राम सलभ, श्री बालचंद कछवाहा, श्री लखनलाल गुप्ता, श्री केयूर भूषण, डां. रामकुमार बेहार, श्री अमरनाथ त्यागी जैसे अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों का सानिध्य सुख प्राप्त हुआ। बड़ा ही आनंद संयोग रहा है।
साहित्य की सेवा वस्तुत: एक समाज ही नहीं वरन राष्ट्र की सेवा है। जो अपने समाज व देश को बौद्धिक स्तर पर जागरुक करने का कार्य कर रही है। इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं। कलम के सिपाही अपनी क्षमता व शक्ति के द्वारा हमारे देश के तम को दूर कर प्रकाश फैलाने का वंदनीय कार्य कर रहे हैं।
मनोज कुमार शुक्ल ''  मनोज '' ,  जबलपुर ( म.प्र.)
48 पृष्ट की पत्रिका में बहुत कुछ मिला, बधाई
विचार वीथी पत्रि·ा लगातार मिल रही है। निश्चित रूप से अब यह पूर्ण साहित्यिक पत्रिका बन पड़ी है। रचनाओं का चयन आप बहुत ही अच्छे ढंग से कर रहे हैं। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। नवबंर अंक के मुख्य आवरण को देखकर बहुत अच्छा लगा। भीतर की सामग्री ने प्रभावित किया। जहां कुबेर द्वारा अनुदित कहानी मन को भा गया वहीं गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी जिंदगी की  कतरन पढ़कर मन प्रसन्न हो उठा । इसी अंक में इब्राहीम कुरैशी,डां. गार्गीशरण मिश्र मराल, केशव शरण, डां. सुशील गुरु की रचनाएं बहुत ही अच्छी लगी। 48 पृष्ट की इस पत्रिका में आपने इतना कुछ दे दिया जो सोच से बाहर है। पुन: बधाई ...
मंगलदास, जयपुर 

बसंत की कुचियों में ग्रामीण जनजीवन मूर्तरुप लेता है

सुशील भोले

सुशील भोले
रंगों में ढलकर सहज और सरल जनजीवन असीम आंनद की किस तरह प्रतीती करा सकते हैं इसका अनुभव बसंत साहू
की पेंटिंग को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। आदिवासी जनजीवन में घुले रंगों से बनाई गई बसंत साहू की पेंटिंग में कभी खिलौने वाली का सहज सौंदर्य अभिभूत करता है, तो कभी बकरी चराने वाली वन बालाओं का सरल जीवन आकृष्ट करता है। बैलगाड़ी में सवार बाराती, मछली बेचने वाली, राउत नाचा की टोली, सुवा नाचती युवतियों की टोली, मुर्गा लड़ाई में रमे ग्रामीण जैसे जनजीवन को उकेरती बसंत साहू की पेंटिंग में रंगों का उछाह कुछ इस तरह है कि ग्रामीण जनजीवन मूर्त रूप लेता प्रतीत होता है।
बसंत साहू
15 दिसंबर 1995 को 23 वर्ष की अवस्था में दुर्घटना ग्रस्त होने के बाद रंगों को जीवन का संबल बनाने वाले बसंत साहू कहते हैं -  सहज और सरल जीवन का हिमायती हूं। और यही कारण है कि मेरी पेंटिंग में सहज और सरल जीवन चित्रांकित रहते हैं। दुर्घटना के पहले ग्रामीण जीवन के जिन रंगों को अनुभूत किया था आज उसे ही अभिव्यक्त कर रहा हूं। सभी रंगों के प्रति मेरा लगाव है लेकिन नारंगी और भूरे रंग मेरी पेंटिंग में अनायास ही घुल जाते हैं। लोकजीवन के साथ - साथ आध्यात्मिक चित्रण की ओर मेरा रुझान है। मैं अनुभूत करता हूं कि एक दिव्य शक्ति है जो अनवरत रंग बिखेरती रहती है। इस अनुभूति को केनवास में उकेरते हुए मुझे असीम आनंद की प्राप्ति होती है। जो कुछ मैंने सीखा है प्रकृति से सीखा है। हजारों पेंटिंग बनाने के बावजूद मैं प्रोफेशनल आर्टिस्ट नहीं बन पाया हूं। मैं किसी के आर्डर पर पेंटिंग नहीं बनाता हूं। चित्रकला को मैं तपस्या मानता हूं। रंगों से खेलना ही मेरा जीवन है। जिस दिन रंगों से नहीं खेल पाऊंगा उस दिन मेरा जीवन थम जाएगा। बसंत साहू  के चित्रों की प्रदर्शनी अनेक स्थानों पर हो चुकी है। उनका पता है -  बसंत साहू, पिता श्री श्याम साहू, सरोजनी चौक, कुरुद, जिला धमतरी छत्तीसगढ़ मोबाइल नं 098937 50570
पता :- 
संजय नगर, टिकरापारा
रायपुर छ.ग. मोबा.  080853 - 05931, 098269 - 92811
ईमेल  sushilbhole2@gmail.com, blog -  mayarumati.blogspor.com

लोक की समूहवादी चेतना और राऊत नाच

डां. गोरेलाल चंदेल

लोक श्रम का पर्याय है। लोक को श्रम से और श्रम को लोक से अलग कर दिया जाय तो एक ओर श्रम का अवमूल्यन होगा और दूसरी ओर लोक की अवधारणा गड़बड़ाने लगेगी। मानव समाज का विकास मनुष्य के सामाजिक-श्रम से ही संभव हो पाया है। प्रकृति को अपनी आवश्यकता के अनुरूप रूपान्तरित करने का प्रयास श्रमजीवी वर्ग द्वारा ही संभव हो सका है। आखेट कर भोजन जुटाने, जंगल काटकर कृषि योग्य भूमि बनाने, आधुनिक कल-कारखानों को चलाने में, मनुष्य के सामूहिक श्रम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विकास के हर युग और हर पहलू पर मानवीय श्रम के अमिट चिह्नों को देखा जा सकता है। उनके इन सामूहिक प्रयासों के चिन्तन को ही लोक दर्शन माना जा सकता है। यही वजह है कि विभिन्न वादों से घिरे हुए दर्शन का लोकजीवन, लोक संस्कृति, लोकभाषा, लोक-संस्कार तथा लोक-धर्म से कोई तालमेल दिखाई नहीं देता। उन दर्शनों को धार्मिक रंग देकर लोक जीवन को उससे रंगने की दिशा में अथक प्रयास के बाद भी लोक का श्रमवादी दर्शन अपने अस्तित्व का आभास करा ही देता है। लोक कला रूपों में, मिथकीय संरचना के भीतर से श्रम की महिमा और श्रम की सामाजिक महत्ता को देखा जा सकता है।
लोक का इतिहास और समाजशास्त्र ' मिथ ' से आवेष्ठित होता है। मिथकों की इतिहास सम्मत व्याख्या से ही लोकजीवन की कला, संस्कृति और सामाजिक जीवन की सामूहिकता का ज्ञान हो सकता है। इन्द्र का ब्रज पर कोप का ही ' मिथ ' ले लीजिय। ' मिथ' के अनुसार गोवर्धन की पूजा से इन्द्र नाराज होकर ब्रज को डुबाने के लिए भयंकर वर्षा करते हैं और कृष्ण सारे ग्वाल-बाल, ब्रजवासियों के साथ गोवर्धन पर्वत को उठाकर इन्द्र के कोप से ब्रज की रक्षा करते हैं। लोकजीवन में ' मिथ ' का यह रूप गोवर्धन पूजा के रूप में आज भी विद्यमान है। दीपावली के दूसरे दिन ' राऊत' (यादव) जाति के लोग नाचते-गाते, ग्राम प्रमुखों को सहयोग के लिए ' परघाते ' हुए, गाँव के बाल-वृद्ध-युवा-नारी-पुरूष के साथ ' सहडा़देव ' में पूजा के लिए इक के होते हैं जहाँ गोवर्धन का प्रतीक गोबर का ढेर रखा होता है। इस गोवर्धन के चारों तरफ  राऊत नाच में निमग्न दल घूम-घूमकर नाचता है और एक गाय को ' सुहई ' बाँधने का रस्म पूरी करता है। इस प्रक्रिया में ' मिथ ' और लोक जीवन की सामूहिकता का जो स्वरूप दिखाई देता है इसमें लोकजीवन की समूहवादी परम्परा का इतिहास आसानी से देखा जा सकता है।
कृष्ण के ' मिथ ' और आज के ' मिथ ' में अद्भुत साम्यता भी दिखाई देती है। कृष्ण ने देव पूजा की परम्परा को समय और काल की कसौटी पर कसकर, अव्यवहारिक और अनुपयोगी सिद्ध कर, समाज में परिवर्तन का शंखनाद किया था और पूजा को प्रकृति के साथ जोड़कर जीवनोपयोगी बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किया था। उन्होंने जीवन और समाज के लिए उपयोगी प्रकृति की पूजा को देवपूजा से ज्यादा जरूरी माना। इसीलिए उन्होंने इन्द्र की पूजा का निषेध कर, गोवर्धन की पूजा की शुरूआत की। सामाजिक परिवर्तन के इस महान् कार्य में कृष्ण अकेले नहीं थे वरन् उस युग का संपूर्ण यादव समाज उसके साथ था। परजीवी देव जाति का इससे कुपित होना स्वाभाविक ही है। इससे उनकी पूजा में व्यवधान डाला जाना ही प्रतीत होता है।
साथ ही इस ' मिथ ' की यदि ऐतिहासिक चीर-फाड़ की जावे, वैज्ञानिक विश्लेषण किया जावे तो यों प्रतीत होता है कि कृष्ण-काल में यमुना में महाप्लावन जैसे कोई भयंकरतम बाढ़ आई रही होगी और कृष्ण के नेतृत्व में ब्रज और गोकुल के तमाम निवासियों ने गोवर्धन पर्वत में शरण लेकर बाढ़ से अपनी रक्षा की होगी। किन्तु यह मात्र अनुमान है। इस दिशा में शोध कर इसकी ऐतिहासिकता सिद्ध की जा सकती है।
इन दोनों स्थितियों में लोक समाज का समूहवादी दर्शन बहुत स्पष्ट हो जाता है। इन्द्र से रक्षा के लिए जिस तरह सभी लोगों ने मिलकर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया ठीक उसी तरह बाढ़ से रक्षा के लिए भी सभी लोगों ने एक दूसरे का सहयोग करते हुए गोवर्धन पर्वत में शरण ली होगी। दोनों स्थिति में इस संकट से मुक्ति के पश्चात् यादवों का, प्रकृति सुलभ प्रसाधन सामग्रियों से सज-धजकर नृत्यगान करना भी स्वाभाविक ही प्रतीत होता है। इसीलिए इस नृत्य में लय अथवा ताल की शास्त्रीय नाप-जोख की अपेक्षा हृदय में उत्पन्न होने वाले उत्साह की लहरों का नाप-जोख अधिक जरूरी लगा है। आज भी  ' राऊत नाच ' में शास्त्रीय व्याकरण भले ही न हो किन्तु लोकजीवन का उत्साह, लोकजीवन की मस्ती अपने चरम पर दिखाई देती है।
लोक दर्शन समूहवादी दर्शन होता है। लोकजीवन में तमाम कलाओं का जन्म सामूहिक प्रयास से ही हुआ है। लोक समाज एक साथ नाचता भी था और गाता भी था, चित्र भी बनाता था और अभिनय भी करता था। वहाँ न कोई विशिष्ट होता था न कोई सामान्य। न कोई कला-मर्मज्ञ होता था न कोई कलाशून्य। जो कुछ भी था वह समाज का था, समूह का था। व्यक्ति विशेष का कुछ भी नहीं था। दूर अतीत में तो जाति विशेष का भी कुछ नहीं था। एक समूह के विशिष्टीकरण की प्रक्रिया तो काफी बाद की प्रक्रिया है। वादक और नर्तक, कलाकार और दर्शक में तब कोई अंतर नहीं होता था। दर्शक जरूरत पडऩे पर वादक भी हो सकता था और कलाकार भी। नृत्य से अलग रहने वाला व्यक्ति कब नृत्य में शामिल हो जाया करता था उसके लिए कोई कोमल-कठोर नियम भी नहीं था। गम्मत में कब दर्शकों के बीच से उठकर कोई व्यक्ति औपचारिक संवाद बोलने लगता था, गम्मत का हिस्सा बनकर कलाकार बन जाता था उसे तय कर पाना बड़ा कठिन कार्य है। लोककला, लोक और लोकदर्शन के बीच तब भेद कर पाना बेहद मुश्किल था। लोक कलाकार ही एक अर्थ में लोक होता रहा है और लोकदर्शन लोक-चेतना का पर्याय होता रहा है।
राऊत नाच में लोककला के इस समूहवादी चेतना अथवा लोकदर्शन के समूहवादी पक्ष को आसानी से देखा जा सकता है। यहाँ वादक, चाहे वह ' गुदुम', 'दफड़ा' अथवा मोहरी का वादक हो या फिर बाँसुरी का; वह वादक होने के साथ ही साथ नर्तक भी होता है। यहाँ बच्चे से लेकर वृद्ध तक, उम्र की तमाम सीमाओं के बंधनों को तोड़कर मस्ती में झूमझूमकर नृत्य किया करते हैं। मैंने बचपन में वह दृष्य भी देखा है जब राऊतों के साथ गाँव के अन्य जाति के उत्साही युवा वर्ग भी अपनी लाठी ऊँचा करके नाचने लगते थे। कभी-कभी तो पांवों में ' पैजन ' या घूँघरू पहनकर लोक समाज को राऊतों के साथ नाचते-गाते और दोहा बोलते हुए देखा गया है। तब राऊत और अन्य जाति के लोगों में अंतर कर पाना लगभग असंभव ही होता था। समूहवादी चेतना का ऐसा बेमिसाल उदाहरण लोकसमाज के बाहर देख पाना दुर्लभ है। अन्तर सिर्फ ' सजुआ '  और सादा का ही रह जाता है। ऐसी स्थिति में कभी यह भी भ्रम होता रहा है कि यह नृत्य लोकसमाज का है कि राऊतों का। न यहाँ मालिक का भेद होता है न ' मजूर ' का, न यहाँ धनी का भेद होता है न निर्धन का, न यहाँ स्तरता का भेद होता है न स्तरहीनता का; मात्र यहाँ लोक का, समूह का और समूह के लोक का ही दर्शन होता है। 
पता : -
दाऊ चौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

साफ ना - कामयाब हो चाहे

केशव शरण
साफ ना - कामयाब हो चाहे
देख लूं ख्‍वाब, ख्‍वाब हो चाहे

हो गया इश्‍क खूबसूरत से
जि़दगी अब खराब हो चाहे

लग गयी है तो लग गयी है लत
ज़हर माफिक शराब हो चाहे

नफरतों की ये पुस्तिका तो नहीं
आशिकी की किताब हो चाहे

हुस्न दिल में उतार लूंगा मैं
मुंह पे घूंघट, ऩकाब हो चाहे

दिल तो अपना सवाल रक्खेगा
दौर अब ला - जवाब हो चाहे

आंख से रात ओस टपकाऊं
खुश्क बासी गुलाब हो चाहे
- पता -
एस 2/ 564, सिकरौल,
वाराणसी - 221002
मोबाईल : 0 9415295137

मैं समझूंगी वरमाला है

सरिता बाजपेयी ' साक्षी '
आज चली इस दुनियां से,
साजन न मिला इस घरती पर
यदि अपनी सी मैं तुम्हें लगू
दो फूल चढाना अर्थी पर
ये मौन हड्डियां अब मेरी
तुमको न बुलानें जायेंगी
कुछ समझ सको तो आ जाना
वर्ना य़ुँ ही जल जायेंगी,
यूँ तो जीवन भर बला किया बस
आज आखिरी ज्वाला है
तुम दो आंसू टपका देना
मैं समझूंगी वरमाला  है..!!!
- पता -
शिवम संगीत अकादमी, 250, वाडूजई, 
शाहजहांपुर - मो. 094252756034

जल उठी ज्‍योति

डां: जय जयराम आनन्‍द
मछुआ  रे ने कहा मछरिया
तू मेरी  रोटी का जरिया
मेरा जाल तुझको बुलाता
सोन मछरिया फस जा फस जा
सोनमछरिया हँस हँस बोली
भैया अपनी खोलो झोली
डाल दिया झोले में मोती
दोनों ओर  जल उठी जोती
E7/70 Ashoka Society Arera colony,Bhopal, MP 462016
0755-2467604, 085179125

रोपवे

मनोज कुमार शुक्‍ल ' मनोज '

अगस्त माह । कभी तेज बारिष होती तो कभी थम जाती । हम वर्षा की इस ऑंख मिचौली से काफी परेशान  थे । जबलपुर से मेरा छोटा भाई अखिलेश सपत्नीक अपनी तीन साल की नन्हीं बच्ची सोनल के साथ आया हुआ था । मेरे तीन बच्चों में एक बड़ा मनीष ,सपना और  गौरव  को तो मानो सोनल एक गुडिय़ा के रूप में खेलने को मिल गई थी । सभी उसकी प्यारी मीठी तोतली बाते सुनकर खुशियॉं लूटने में मगन थे । छोटे भाई अखिलेश का अपना व्यवसाय था। पत्नी के साथ निकलने का कम ही मौका मिलता था इसलिये उसे अपने धंधा से अवकाश बहुत कम  मिलता था। बड़ी मुश्किल से तीन दिन के लिये आ पाया था। उसका एक दिन रायपुर में रिश्तेदारों से मिलने जुलने में गुजर गया। दूसरे ही दिन  मेरी पत्नी पल्लवी और अखिलेश की पत्नी सुनंदा ने डोंगरगढ़ चलने का प्रस्ताव रखा। देवी दर्शन के साथ-साथ मनोहारी प्राकृतिक छटा का दृष्यावलोकन । अधिकांष ने अपनी सहमति प्रगट कर दी।
इस प्रस्ताव पर मुझे छोड़ कर सभी एक मतेन थे। मेरी देवी देवताओं पर पूर्ण आस्था तो थी। पर बाप रे ...डोंगरगढ़  की चढ़ाई ...सपाट सीधी - ऊंची ... नहीं भाई ... भगवान ही बचाए । सुनते ही मेरे हाथ पाँव काँपने लगे । पैरों की पिंडलियों में असहनीय दर्द उठने लगता - हाथ पाँव फूलने लगते, चूंकि मैं अपनी पल्लवी के साथ मैहर एवं डोंगरगढ़ की सीढिय़ॉं चढ़ चुका था। मुझ जैसे नाजुक बैंक में काम करने वाले सुख  भोगी  इंसान के लिये तो मिरजापुर की माँ विंध्यवासिनी के दर्शन ही बड़े भले लगते हैं  मैं छुट्टी न मिलने के बहाने बनाकर अपनी जान बचाते फिर रहा था। तभी भोली-भाली नन्ही मासूम सोनल जो मुझे काफी देर से घूर-घूर कर देखे जा रही थी , तुतलाहट भरे मासूम अंदाज में अपने नन्हें हाथों को  मटका कर बोली - '' अले... क्या ताऊ जी ... सीली तढऩे से डलते हैं । मेले साथ मेली ऊॅंगली पकल तडऩा ताऊ जी !... मैं साली की साली ... सीली तड़ा दूंगी ...'' यह सुनकर सभी खिलखिलाकर हॅंस पड़े । सबकी नजरें  मेरी ओर लगी थीं। मैं नि:सहाय सा असमंजस में पड़ गया था । तभी मेरी बेटी सपना ने कान में कहा - '' पापाजी ! आप चिंता क्यों करते हैं ? आजकल वहॉं रोपवे चलते हैं । सर्र से ऊपर , सर्र से नीचे । पिछली बार मैं मामा जी के साथ गयी थी। कोई तकलीफ  नहीं हुई । '' यह सुनते ही मुझमें एक साहस का संचार हुआ और एक शक्ति सी आ गई । अपने सभी बहाने के हथियार डाल कर , सहर्ष चलने की सहमति दे दी ।
अब हम सभी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में जुट गए। सुबह पॉंच बजे की ट्रेन पकडऩे के लिये चार बजे उठना। नहा धोकर घर से निकलना । स्टेशन तक रिक्शे का जुगाड़ करना। रास्ते के लिये नाश्ता व खाने की व्यवस्था आदि अनेकों प्रश्न एक साथ उठ खड़े हुये। सभी की अलग अलग ड्यूटी लगा दी गई। कब रात्रि के दस बज गये, पता ही नहीं चला। किचिन से आ रही  बर्तनों व हॅंसी ठहाकों के बीच दीवार घड़ी ने संगीत मय टन...टन... की ध्वनि से सबको आकर्षित कर चौंका दिया । रात्रि के बारह बज गये थे। समय बड़ी तेजी से भाग रहा था। मैं सभी को सुबह चार बजे उठने की सलाह देकर स्वयं शयन कक्ष में सोने को चला गया ।
टेबल घड़ी ने अपने वायदे के मुताबिक सुबह के चार बजे ही अपनी कर्कश अलार्म बजा दी। नींद में डूबे हुए लोग बिस्तर से उठने को मजबूर हो गये। सभी अपनी अधखुली ऑंखों से यंत्रवत नित्य क्रिया कलापों में जुट गए थे । घर के बच्चों को बिस्तर से उठा-उठाकर बैठाने की बार -बार प्रक्रिया ने झुंझलाहट शोर शराबे और तनावों की ध्वनि तरंगों को और तेज कर दिया था। रिक्शे की तलाश से लेकर स्टेशन के प्लेटफार्म तक पहुंचते -पहुंचते जैसे सब कुछ शांत हो गया था । चूंकि सुबह डोंगरगढ़ जाने वाली वह गाड़ी तीन घंटे लेट चल रही थी। इतनी मेहनत मशक्कत की पर सब बेकार लगने लगा था, पर कर भी क्या सकते थे। अगर हम लोग लेट हो जाते तो गाड़ी थोड़े ही हमारे लिये रूक सकती थी। यह एक सत्य था ।
प्लेटफार्म में इतना लम्बा समय काटना अक्सर लोगों के लिए बड़ा मुश्किल कार्य होता है । हम सभी अपने अतीत को वर्तमान में खड़ा करके कभी उसका पुनरावलोकन करके , तो कभी किसी का छिद्रान्वेशण करके समय काटने  में लग गये। रात्रि की तैयारी से लेकर सुबह की भागम-भाग तक एक दूसरे के क्रिया- कलापों का लेखा-जोखा बनाने में किसी लेखा प्रवर समिति की भांति जुट गए थे। बीच -बीच में सोनल अपनी उपेक्षा पर अपनी तोतली बातों से सबका ध्यान आकर्षित कर हंसाने व गुदगुदाने का कार्य करती रही। प्लेटफार्म पर आती ट्रेन की सीटी ने जैसे सभी की बातों में ब्रेक लगा दी हो। सभी पूर्वर्निधारित अपने -अपने हाथों में सामानों को थामे ट्रेन के अंदर घुसने में व्यस्त हो गये ।
ट्रेन अंतत: एक लम्बी सीटी बजाकर रवाना हुयी। उसके संग वह प्लेटफार्म पीछे छूटने लगा । खड़े रिश्तेदार  अपने चिरपरिचितो को हाथ हिला हिला कर बिदा कर रहे थे। दौड़ते-भागते , गाँव-शहर। खेत खलिहान। सड़के -पगडंडियॉं । खम्बे- पहाड़ । झाड़- झाडिय़ाँ। नदी- नाले । हम सभी खिड़की से देखते जा रहे थे। महिलाओं का तो अपना एक संसार अलग होता है।  सुनंदा और पल्लवी  दोनो अपनी घरेलू बातों में मग्न थीं। चलती रेल की खिड़की से झांकती सोनल की बाल सुलभ जिज्ञासा जागती और - ''ताऊ  जी.... ताऊ जी ... ये  थब क्यों भाग लहे  हैं ?''
मैंने कहा -ये सब हमारी सोनल के साथ-साथ जाने को दौड़ रहे हैं।
''ताऊ  जी.... ताऊ जी ....वो क्या कल लहे हैं ?''
मैंने कहा -वो खेतों में काम कर रहे हैं ।
''ताम क्यों कलते हैं,ताऊ  जी...?''
मैंने कहा -उससे फसल पैदा होती है । जिसे हम सभी खाते हैं और अपने पेट की भूख मिटाते हैं ।
जैसे अनेक प्रश्न किए जा रही थी। हमारे उत्तरों से उसके प्रश्नों का समाधान होता था या नहीं। मैं नहीं जानता किन्तु वह उत्तर के बाद ''अच्छा '' कहकर मुझे संतुष्टि का बोध अवश्य कराती जाती थी।
तभी ट्रेन में एक खिलौने वाला अपने मुंह को फुलाकर पुंगी से शोर मचाता प्रकट हुआ और सोनल के सामने ही खड़ा होकर  जोर- जोर से बजाने लगा। जिसमें उसको सफलता मिली। सोनल अपने पापा के पीछे पड़ गयी -''पापा... पापा...हमको भी पुंगी ले दो ना ...।''
अखिलेश ने कहा - नहीं.. तू मेरे सामने हरदम शोर मचाएगी  और सबको परेशान करेगी ।
''थत् पापा..., हम सोल नहीं मताएंगे ..., तब आप  थो दाएंगे ...तब बदॉंएंगे ...। ले दो न पापा ... ले दो न पापा ... ले दो न ताई जी ...।''
उसकी इस बात पर हम सभी हॅंस पड़े। आखिर पुंगी उसको लेके देनी ही पड़ी। सोनल के साथ बात करते- करते कब समय गुजर गया , मालूम ही नहीं पड़ा। गाड़ी डोंगरगढ़ प्लेटफार्म पर खड़ी थी। सामने ऊंचे पहाड़  पर मंदिर दिख रहा था। देवी माता की आस्था और विश्वास का केन्द्र बिन्दु ,यह बम्बलेश्वरी देवी का मंदिर है - लोगों ने बताया। यहॉं दर्शनों को लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं, पहाड़ की चोटी पर चढ़कर अनुपम प्राकृतिक छटा को निहारते और मन ही मन आहलादित होते हैं।
ऐसे स्थानों पर निरंतर बढ़ती भीड़ स्थानीय लोगों के जीविका का साधन भी बन जाती है । निराश्रित अपंग बूढ़े बढ़े भिक्षा मॉंग कर कुछ जुटाने में लग जाते हैं। होटल, दुकानों के साथ -साथ व्यवसाय के नए- नए रूप उभर कर सामने आने लगते हैं। यही सोचते हुए हम सभी दुकानों और होटलों की लम्बी कतारों को पार करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि बड़ी-बड़ी बूदों के साथ वर्षा ने मार्ग रोकना चाहा। भीगने से घबराकर पास की एक दुकान में घुस गये।
दुकानदार इतने सारे ग्राहकों को देखकर बड़ा खुश हो गया । मानों ''बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा हो ।'' वर्षा को मन ही मन धन्यवाद दे रहा था। वह तुरंत लम्बी बैंच की ओर ईशारा करके सभी को बैठने का आग्रह करने लगा। और ''क्या लाऊं,  भाई साहिब ...?'' कह कर सामने खड़ा हो गया।
चाय का आर्डर मिलते ही वह फिर तुरंत ही लाल तूस के कपड़ों में बंधे प्रसाद, फूल- माला  को खरीदने का आग्रह करने लगा। उसकी व्यवसायिक चतुराई और हम लोगों की परेशानी दोनों ने मिलकर आपसी सामंजस्य स्थापित कर लिया था। बीस मिनिट गुजर गए थे। बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
सामने रोपवे के प्रवेश द्वार पर टँगा एक बोर्ड मुझको मुँह चिढ़ाता नजर आ रहा था। सभी दर्शनार्थियों से तकनीकी खराबी के कारण खेद सहित क्षमा याचना की मांग रहा था। घर के सभी लोगों की निगाहें मेरे चेहरे पर लगीं हुयीं थी मानो वह बोर्ड मेरे लिये ही बना था। उस समय सबकी नजरों में मैं एक बेचारा सहानुभूति का पात्र बन गया था। किन्तु मैं भी चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा लगाए बड़े निर्विकार भाव से वर्षा को देखे जाने का नाटक कर रहा था। क्योकि जब सिर ऊखल में दिया हो तो मुसर से क्या डरना ।
''ऐसी विपत्ति को झेलने काश ... घर से छाता लाए होते , तो हम लोग भी वर्षा के आनंद के साथ-साथ  देवी दर्शनों का लाभ उठाते।''  मेरी पत्नी पल्लवी ने कहा ।
दुकानदार तो जैसे यही वाक्य सुनने को आतुर था, बोला -'' बाबू जी, यहॉं छाता मिल सकता है  किराया मात्र दस रुपया। जमानत के पचास रुपया। लाऊं....?''
अखिलेश ने परेशानी का सहज हल मिल जाने पर खुशी प्रकट की। बोला - '' लाईए । पर दो से क्या बनेगा, तीन मिलते तो ...। ''
दुकानदार ने उसके कथन की वास्तविकता समझी। छाता लगाए सामने बैठी भिखारिन के पास गया। कुछ धीरे से बात कर उसका  छाता ले आया ।
 '' अब तीन छातों में सब भीगनें से बच जायेंगे ।''  सुनंदा बोल उठी ।
मैंने देखा उस वृद्धा का चेहरा खिल उठा था। हाथ का कटोरा अपने थैला  में रखकर दुकानदार की बनायी छाया में आकर बैठ गयी थी। उसकी आँखों में एक नया आत्मविश्वास झलक  रहा था। उसे बड़ी खुशी हुई।
छाते को तान कर हम सभी एक फर्लांग बढ़े ही थे कि एकाएक खुला आकाश हम पर ठहाका मार कर हँसता नजर आया। छातों को बंद कर इस बोझ से मुक्ति की छटपटाहट का भाव मेरे छोटे बेटे गौरव ने भांप लिया था। वह किसी मैराथन धावकों की भांति विशल बजने के इंतजार में तैयार था । इसके लिए मेरी पत्नी पल्लवी ने भूमिका बांधते हुए कहा -'' अब इन छातों को भी ढोना पड़ेगा और ऊपर से किराया भी लगेगा । गौरव प्लीज ...।''
आदेश पाते ही गौरव दौड़ पड़ा। मेरी कल्पना में उसी क्षण उस वृद्धा भिखारिन का खिला चेहरा उदास सा दिखाई देने लगा। तभी गौरव ने आकर चतुर व्यवसायिक दुकानदार का संदेश एक सांस में सुना दिया कि '' मम्मी किराया तो लगेगा,जब लौटोगे तो किराया काट कर पैसे वापस मिल जाएंगे ।''
सुन कर मुझे मन ही मन अच्छा लगा। आकाश की इस मसखरी पर हम सभी हॅंसते खिलखिलाते चढ़ाई चढऩे, सीढिय़ों के पास पहुंच गए ।
तुरंत सोनल ने आकर अपने नन्हे हाथ मेरे सामने कर ऊंगली बढ़ा दी और बोली ''ताऊ जी डलना नईं मेली ऊंगली अत्थे से पकल के चलना... '' मानों उसे अपना दिया वचन स्मरण था । उसकी बातों पर हम सभी हॅंस पड़े।
अभी हमारे कदम मंदिर की पहली सीढ़ी पर पड़े ही थे कि - बाबू जी ...के सम्बोधन ने वहीं रोक दिया। पीछे पलट कर देखा तो एक वृद्ध था। छोटे-बच्चों को गोद में लेकर आने-जाने की यात्रा का सहायक श्रमजीवी। इनकी भी एक जमात है -उसी का यह भी एक सदस्य था। वृद्ध ने हाथ जोड़कर दीनता भरी आवाज में याचना की -''बाबू जी ... हम सिर्फ  बीस रुपए लेंगें ... इस बच्ची के ...ना, नहीं करना बाबू जी ... दो दिनो से कोई मजदूरी नहीं बनी ... इसे लेकर चढ़ेंगे तो आप थक जाएंगे ... देवी मॉं आप सबका भला करे । आज रोपवे बंद है, सो आशा बंधी है बाबू जी ...''
मैंने सुनंदा - सोनल के भाव जाने । सुनंदा प्रभावित थी सो सहमत दिखी - किन्तु सोनल ने अपनी माँ का आँचल छोड़ पीछे छिपकर विरोध का स्पष्ट संकेत दे दिया - ''नईं ...सीली  मैं  (चढ़ूंगी ) तढ़ूंगी ...तढ़ूंगीं ...तढ़ूंगी...।''
मेरे सामने दुविधा थी। एक तरफ  सोनल का बालहठ तो दूसरी ओर यह श्रमजीवी बेबस वृद्ध ।
''आ जा रानी बिटिया... बाबाजी की बात मान ले ... तू जानती नहीं ... थक जाएगी। जा... बाबा जी की गोद में जा...'' सुनंदा ने पुचकारते हुए कहा।
पर सोनल ने बाबा की  गोदी में जाने की बजाय पलभर में पाँच- छ: सीढिय़ाँ चढ़कर अपनी शक्ति की विश्वसनीयता प्रकट कर दी । सुनंदा को भी अपना रुख बदलना पड़ा। '' बाबा जी छोडि़ए .. यह बहुत हठी है , बात नही मानेगी ।''
मैंने वृद्ध की ओर देखा। याचना की निश्फलता देख उसे दुख हुआ। पाँच का नोट उसकी ओर बढ़ा दिए पर उसकी सजल आँखों कांपते हाथों ने उसे ग्रहण करने में असहमति दे दी ।
''नहीं बाबू जी ... बिना मेहनत नहीं ... उस देवी माँ की शायद यही मर्जी है...आप लोग जाइए ...आप सभी का कल्याण हो ...।''
कुछ सीढ़ी चढ़ी सोनल ने वृद्ध के निकलते आँसू देखे तो तुरंत नीचे उतर आई । उनके करीब आकर बोली - ''मत लो बाबा जी ... तुम तो मेरे दादा जी से हो ना ... वे भी ज्यादा नईं तलते ...थक जाते हैं । तुम भी थक जाओगे बाबा जी ... है ना, ताऊ जी  ...है ना मम्मी... है ना पापा....।''
बाबा जी के रूप में हमारे वृद्ध पिता की तस्वीर ऑंखों के सामने झूल गयी। मेरे लिये यह भावुकता की चरम सीमा थी। जेब से बीस रुपए निकाले । जबरन उसे थमा दिए , बोला - ''ना नहीं करना बाबा जी ... दिल टूट जायेगा ... हमको अपना बेटा समझ कर ही इसे रख लीजिए ....इसके आगे अवरुद्ध कंठ ने दोनों को कुछ कहने न दिया ।
बाबा ने सोनल को अपनी गोद में उठा सीनें से लगा लिया । ऐसी आत्मीयता पाकर वह भावव्हिल हो सोनल के सिर पर लगातार हाथ फेरे जा रहा था। उसे साक्षात् देवी समझ अपने दोनों हाथ जोड़ दिये थे।
इन आत्मीय  मधुर स्मृतियों के संग हम सभी के कदम माँ दर्शन के लिए  बढ़े जा रहे थे। पीछे पलट कर देखा वह ''बाबा '' हमारी मंगलमय यात्रा के लिये नीचे खड़े हाथ हिलाये जा रहे थे और हम मंदिर के लिये आगे बढ़े जा रहे थे । 
पता - 
58, आशीष दीप, उत्‍तर मिलौनीगंज, 
जबलपुर ( म.प्र.) 
मोबाईल : 94258 - 62550

चांदी की छड़ी

गार्गीशरण मिश्र '' मराल ''

संगीनों का रंग हरेगी चाँदी की यह छड़ी हमारी।
चाँदी की यह छड़ी कि जिसकी
खाते मार न लोग अघाते,
चेहरे होते लाल खुशी से
फिर भी फूले नहीं समाते,
लोहे की हथकड़ी पुलिस की, सोने की हथकड़ी हमारी।
चाँदी की चहारदीवारी
अंदर सोने की कोठरियाँ
सुरा सुराही लेकर कर में
पहरे पर रहती सुंदरियाँ
कैद कड़ी है सरकारी तो कैद और भी कड़ी है हमारी।
करामात जादू की देखो
बड़े - बड़े है इससे डरते
खाते रकम राजकोषों से
पर हैं काम हमारा करते
बात बड़ी है राजा की तो बात और भी बड़ी हमारी।
वहाँ ज्योति आशा की झिलमिल
यहाँ प्रभा चाँदी की फैली,
वहाँ भरे कागज के थैले
यहाँ भरी नोटों  की थैली,
चैन कहाँ आये जब तीली आँखों में हो गड़ी हमारी।
- पता -
1436 / सरस्वती कालोनी, चेरीताल वार्ड, जबलपुर म.प्र. - 482002

दो दोहे

जगन्‍नाथ '' विश्‍व ''
बच्‍चे पुष्‍प समान 
बच्चे पुष्प समान है खुशबू के भंडार
खुशबू को गुरु लोग ही देते है विस्तार

गिरधर से भी है बड़ा गुरुवर का स्थान
इसीलिए है वंदनीय सारस्वत सम्मान

वेतन मिलता है तभी टीचर को सौ टंच
आवेदन पर ठोक दें ठप्पा गर सरपंच

वर्ष भर सहता रहता अध्यापक अपमान
शिक्षक दिवस इक मात्र ही मिल पाता सम्मान

लक्ष्मी देवी जम गई उल्लूओं के द्वार
डिग्री लेकर पढ़ा लिखा घूम रहा बेकार

चाता तो अनुकूल था गया धूल में मूल
उम्र सारी बीत गई बोये बीज बबूल

शनि कर्क संग हो गया ले आँधी तूफान
जब- जब भी ऐसा हुआ होता लहुलुहान

बंदर दाँत दिखा रहा पाकर लम्बी पूँछ
अकड़ रहा है आदमी और मरोड़े मूँछ
पर्यावरण आधार
धरती दुल्हन सी लगे पर्यावरण आधार
जन जीवन फूले फले हरियाली  ही सार

प्रदूषण मुक्ति के लिए चलो हमारे साथ
पौधे रोपे रोज ही सभी हजारों हाथ

अच्छा है हम जी रहे अपने अपने गाँव
यदि शहर में होते तो आते उल्टे पाँव

रोपा अब अनुकूल था पर पाया प्रतिकूल
गैरों को क्या दोष दें बोये बीज बबूल

गौ माता के देश में है गोबर का काल
बाँध सको तो बाँध लो पानी पहले पाल

सड़क ढूंढते - ढूंढते  बिगड़ गई रे चाल
बिजली भी बीमार है हाल हुआ बेहाल

भूले चंदन की महक भूले रंग गुलाल
इक दूजे पर बेशरम कीचड़ रहे उछाल
'' मनोबल '' ,25 एम.आई.जी.
हनुमान नगर, नागदा जं. म.प्र. 456335
ई मेल : jagannthvishwa@ gmail.com 

जीवन नगरी पर सदियों से

कृपाशंकर शर्मा '' अचूक ''
जीवन नगरी पर सदियों से शासित कर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
किसी किसी को दृष्टिदोष ने
दूषित कर डाला
कोई तो है अमृत पीता
और कोई हाला
उछल रहा बाजार अजब - सा धीरज धर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
पंखों बिन उड़ान है भरते
नील गगन नीचे
जिसकी जैसी ताकत होती
इधर उधर खींचे
दोनों ओर लगी है होड़ें नदी न उतर सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
चौबे जी छब्बे बनने में
सब कुछ भूल गए
चकाचौंध जगती में आ के
उलटे फूल गये
उधड़बुनी के चक्कर खाते तनिक सुधर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके
जोड़ रहे सब अपनी - अपनी
कटी हुई नाकें
अपनी ओर कभी न देखा
दुनियां को ताके
गज भर की अचूक छाती ले खुद से डर न सके
अब तक सुख - दुख की परिभाषा भाषित कर न सके

उसके हाथों में नहीं

ब्रजभूषण चतुर्वेदी '' ब्रजेश ''
उसके हाथों में नहीं आजादी की रेख।
अब भी धनिया ढो रही, सिर पर मैला देख।।
संविधान ने दे दिया, समता का अधिकार।
पर होरी के भाग्य में, लिखी वही बेगार।।
सब रिश्तों को भूल कर, बस दौलत से प्यार।
आज आदमी कर रहा, यह कैसा व्यवहार।।
बहशी बाजों ने किया, जब से लहूलुहान।
खोई है उस रोज से, चिडिय़ा की मुस्कान।।
आजादी की भोर में होरी मिला उदास।
रहन महाजन के रखा खुशियों का मधुमास।।
काले धन की हो रही चर्चा चारों ओर।
कैद तिजोरी में हुई, आजादी की भोर।।
आज व्यवस्था दे रही, कैसे - कैसे घाव।
अंतर से उठने लगा, पीड़ा की सैलाव।।
लूट अपहरण हादसे, हत्या बलात्कार।
लाते हैं खबरें यही, रोज सुबह अखबार।।
नेताओं ने कर दिये, सपने लहूलुहान।
आजादी हित जो दिये, व्यर्थ गये बलिदान।।

सबो सुख हे गांव म

गणेश यदु
आजा रे मोर संगवारी सबो सुख हे गाँव म।
सुरुज ललचय सुसताये बर, पीपर - बर छॉव म।।
गोकुल कस गाँव म, चरवाहा कन्हइया ए।
जसोदा कस महतारी, बर - कदम के छंइया ए।।
कसेली के दूध नई मिलय, सहर के मोल भाव म ...।
गाँव म हावय तीरिथ संगी गाँव म हावय धाम।
मंदिर , देवाला, गौरा - चंवरा, रमायन म राम।।
नंदिया - नरवा गंगा सांही, लछमी हे पटाव म ...।
गुंडरा हमर बाग - बगइचा, चातर ह मइदान।
खेती - किसानी जिनगी हमर, जंगल हे परान।।
गाँव म अपन - बिरान के सुन्दर हाव - भाव म ...।
कुकरा बासती के पाहटा, बिहनिया के बासी।
चिरई - चुरगुन के बोली अउ बुढ़वा के खांसी।।
अतका सुग्घर पुरवाही कहां पाबे काँव - काँव म ...।
सेवा करबो ए धरती के दया कभू त उलही।
दुख - पीरा सहिके रहिबो, घुरवा कस दिन बहुरही।।
मया - पीरित ल बिसर झनि तै पर के बरगलाव म।
आजा रे संगवारी सबो सुख हे गाँव म।

पता - सम्‍बलपुर, जिला - कांकेर पिन - 494635
 

आलोचना का सुख

ब्रजकिशोर झा

मैं एक गुप्त नाम आलोचक हूँ और आपको अपना नाम बताये बिना ही अपनी आत्मकथा सुनाता हूँ। अगर मन्दिर में गुप्त दान हो सकता है तो साहित्य में गुप्त नाम क्यों नहीं हो सकता।
आलोचना किसे कहते हैं ? शुरू - शुरू में मैं समझता था कि जब आलू और चना को मिला दिया जाता है तो उसे आलूचना, या आलोचना कहते हैं। हमारे स्कूल के सामने उबले हुए आलू और चना को मिलाकर कमाल का बंगाली तड़का बेचा जाता था। जिसे बँगला में आलू - काम्बली कहते हैं।
मगर बाद में मेरे पिताजी के कारण मुझे अपनी स्थापना पर भ्रम होने लगा और एक नई स्थापना बनी। मैं बताता हूँ,भले आप ना ही पूछें! मैं जब भी किसी का जिक्र घर में करता तो पिता जी कह देते - किसी की आलोचना नहीं करनी चाहिए। अब जब पिता जी के मुंह से किसी चीज के बारे में नहीं निकलती तो मैं वह चीज करने को और जिज्ञासु हो जाता। कारण हर शरीफ बच्चे की तरह मैं भी मना करने वाली चीज के प्रति और जिज्ञासु हो जाता।
आलोचना का अर्थ तब मालूम नहीं था। मगर अंदाजा यही लगाता कि किसी की बुराई करना ही आलोचना होगा क्योंकि मैं यही तो किया करता हूँ। सो मैं घर में जम कर बुराई करता स्कूल के टीचरों की। क्लास रूम में करता अपने माँ - बाप की। दोनों जगहों पर मैं डिमांड में था। बुराई करना मेरे निजी संस्कार के अनुकूल था। मैं आम के गाछ से बबूल पैदा हुआ था। पिताजी कहा करते, साला, आम के पेड़ में बबूल हो गया है। हमेशा किसी न किसी की बुराई करता रहता है। कहता है इंग्लिश टीचर ठीक से अंग्रेजी बोलना नहीं जानता है। लैंग्वेज को लान्ग्वेज बोलता है। टोमोर्रोव को टोमारो बोलता है। इम्पॉसिबल को इम्पोसेबूल बोलता है और तो और एक दिन एक प्रधानमन्त्री की बुराई कर रहा था कि फलां प्रधानमन्त्री कहते थे करना पड़ेगी जबकि शुद्ध होगा करना पड़ेगा या करनी पड़ेगी या करने पड़ेंगे किसी ने कहीं सुन लिया तो घर में आग लगा देगा। किसी को नहीं छोड़ता। हे भगवान पता नहीं इस रावण को पैदा करके मुझसे कौन सा बड़ा अपराध हो गया है! मैं चुपचाप पिताजी की बातें पढ़ते हुए सुनता रहता। हलाकि शुरू में मैंने कई बार प्रतिवाद भी किया परन्तु रोज - रोज गाल पर बाप के फिंगरप्रिंट लेकर स्कूल जाना किसे अच्छा लगेगा? सो चुप रह जाता।
हाँ तो, यही प्रश्न मेरे सामने फिर ऑनर्स के आठवें पेपर में था कि आलोचना किसे कहते हैं ? मगर अबकी मैं 100 प्रतिशत निश्चित था कि मेरे बचपन की स्थापना ही ठीक है। किताबों में भी मेरी स्थापना ही लिखी थी मगर थोडा मस्का मारकर जिसे मैंने पढ़ लिया था। एक दूसरे की किताब में मीन - मेष निकालना। यानि बुराई करना ही आलोचना है। और ऐसा करने वाले का मार्किट में काफी सम्मान है। यह बात मेरे दिमाग में बैठ गयी। मैं तो अब हर कुछ आलोचना के नाम पर ही करने लगा था।
किसी लड़की को गौर से देखता और अगर गर्ल फ्रेंड द्वारा लतारा जाता तो यही कहता - अरे! मैं तो आलोचक की दृष्टि से देख रहा हूँ कि उतनी पतली कमर के नीचे का हिस्सा कैसे उतना विकसित हुआ। यह ब्रह्मा की विसंगति है या वह बहुत गोरी है उसे या तो गुलाबी लिपस्टिक लगाना चाहिए या काली लिपस्टिक, लाल तो बिलकुल नहीं। यही आलोचना का सौन्दर्य शास्त्र है। किसी तरह विपत्ति टलती। गर्लफ्रेंड की मुलाक़ात न तो कभी आलोचना से हुई थी ना ही आलोचना के सौन्दर्य शास्त्र से। कारण वह माइक्रोबायोलॉजी की छात्रा थी। मेरे साथ - साथ वह हिंदी को भी कचरा ही समझा करती थी। अक्सर कहती - अंग्रेजी में कुछ क्यों नहीं लिखते। हिंदी में लिखोगे तो कुँए के मेढक रह जाओगे। कोई विदेशी पुरस्कार नहीं मिलेगा। भारत के लोग भले ठीक से अंग्रेजी न जानें मगर ट्रेन के एसी क्लास में अंग्रेजी किताबों के साथ ही सफऱ करना उन्हें अच्छा लगता है। अंग्रेजी किताबों का कवर बहुत सुन्दर दीखता है। हिंदी की तरह घिसा - पिटा नहीं! कुछ दिन ऐसा ही रहा तो मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूंगी। मगर मैं पुराना बेहया हूँ कभी नहीं बदलूँगा।
एक बार तो हद हो गया। कामसूत्र की किताब तकिये के नीचे से पकड़ लिया गया। चचेरे भाई की करतूत थी मुझे पकडवाने में। त्रिकोणीय प्रेम कहानी में मेरे अलावा दूसरा हीरो वही था। वह मेरा कट्टर आलोचक था। मैं दुनिया की आलोचना करता हूँ। वह मेरी आलोचना करता है। आलोचना की आलोचना। बात चाचा तक पहुंची। मैंने सीधे - सीधे बता दिया, हिंदी के सर बोले हैं कि किसी पुस्तक की आलोचना लिखकर लाना। सो मैंने...। चाचा बोले - तो तुमको पुस्तक के नाम पर कामसूत्र ही मिली आलोचना के लिए। मैं बोला - मैंने देखा नहीं था, किताब कागज़ में लिपटकर किताब वाले ने दिया था, खैर काका ने अपने तकिये के नीचे उस किताब को सहेजते हुए कहा - जाओ, फिर किताब खरीदो तो देखकर। जाओ चाची को कहना चाचा बुला रहे हैं। मैंने कहा- लाइए मैं किताब लौटा आता हूं। पर वे बोले - नहीं, खरीदी किताब लौटाई नहीं जाती। इसे मैं गंगा में विसर्जित कर आऊंगा।
इस प्रकार मुझसा प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थी के साथ जो होना था सो हुआ। मैं आलोचना पर पी.एच.डी करके प्रोफेसर बन गया। विश्विद्यालय में पढ़ाने को आलोचना ही मिला। नहीं कैसे मिलता। विभागाध्यक्ष की ही आलोचना कर देता। सो मैंने अपने पैदाइशी गुण को ही अपना पेशा बनाया। आदमी अपने पैदाइशी गुणों का विकास ठीक से करे तो वह मेरी तरह जीवन में बहुत आगे बढ़ सकता है। हालांकि मुझे बहुत ज्यादा लोग नहीं जानते।  मगर जब भी किसी सेमीनार में मंच से हिंदी के विद्यार्थियों के सामने मेरे नाम के आगे आलोचक लगाकर बुलाया जाता है तो दोस्तों क्या बताऊँ, उस रात सोने के लिए मुझे नींद की गोटी लेनी पड़ जाती है।
जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ कि आलोचना मेरा पैदाइशी गुण है और इस गुण को ही मैंने अपना पेशा भी बनाया सो इसमें मेरा विकास बहुत जल्दी हुआ। शुरू - शुरू में मैं बहुत किताबों से विशेषकर पुरानी - फटी किताबों से, जो आम जनों के लिए अनुपलब्ध होती। वहीँ से किसी लेख को चुराकर उसकी भाषा बदलकर, टायटल बदलकर किसी पत्रिका में छपने के लिए भेज देता और सौभाग्य से वह छप भी जाती। क्यों न छपे! वह लेख ही कुछ ऐसा क्रांतिकारी बन जाता कि उसका छपना तय हो जाता। विस्तार से बताता हूँ। जब भी मैं नेशनल लाइब्रेरी जाता तो सबसे पुरानी पुस्तकों की टोह लेता जो मार्केट में नहीं मिलती और फिर उससे नकल करता।
अब आप कहेंगे कि नकल करके कौन सा महान काम तुमने किया। ये तो आजकल फैशन है। दरअसल मैं सच में महान काम करता। यथा तुलसी की आलोचना चुराकर कबीर पर आलोचना लिख देता। प्रत्येक स्थान पर तुलसी के नाम और कोटेशन्स की जगह कबीर कर देता। अब इससे या इस टाइप से मेरी आलोचना महाक्रन्तिकारी हो जाती। लोगबाग, साथी प्रोफेसर कहते- यार तुमने बड़ा महत्वपूर्ण आलेख लिखा है। कबीर पर एक नई दृष्टि से विचार किया है। एकदम आलोचना में तुलसी के स्थान पर कबीर को बिठाने की कोशिश की है। अब कोशिश की है का क्या मतलब है बे! हर जगह तुलसी का नाम हटाकर कबीर तो बिठा ही दिया है। तो हुआ न तुलसी के स्थान पर कबीर को बिठाना! बेवकूफ हैं सब!
दोस्तों, इस प्रकार आज मुझे खुद याद नहीं कि मैंने किन - किन लेखकों को किन - किन लेखकों के स्थान पर बिठाया है ?् भगवान भला करे पुरानी किताब सहेजने वाला नेशनल लाइब्रेरी का! दोस्तों आज मुझे अपने बारे में कोई भी बात कहने में शर्म नहीं आती है, क्योंकि आज मैं उस लेबल पर आ गया हूँ। हालांकि मैं जानता हूँ कि अपने देश में हिंदी लेखकों को पढऩे वाले ही कितने हैं, जो भी अंग्रेजी बाबू लोग हिंदी पढऩा चाहते हैं वह अंग्रेजी किताबों का ही अनुवाद पढ़ कर हिंदी पढऩे का शौक पूरा कर लेते हैं। जहां तक हिंदी के छात्रों की बात है तो ईमानदारी से कहता हूँ कि कम से कम मुझे तो हिंदी में अधिकांश छात्र गरीब, लाचार, बीमार,  निकम्मा,नकलची ही मिले। धनवाले या दिमागवाले मैनेजमेंट मेडिकल सी.ए. या इसी तरह का कुछ बनते होंगे। बहुत ज्यादा धन हुआ तो किसी का नकल कर उपन्यास या कहानी लिख ली या फिर घोस्ट रायटर से कुछ भी लिखवाकर लाखों खर्च कर किसी नील कमल प्रकाशन से छपवाकर बंटवा देते हैं अब इससे क्वंालिटी तो नहीं आ जाती न! हालांकि एक मेरे नेता दोस्त ने कहा था। आप हिंदी के आलोचक, लेखक होकर भी हिंदी की कटु आलोचना करते हैं!
मैंने इतना ही कहा था कि जिस दिन आप अपने बेटे को अमेरिका से बुलाकर भारत के किसी हिंदी मीडियम स्कूल में नामांकन करवा देंगे मैं हिंदी की कटु आलोचना करना छोड़ दूंगा। उनका मुंह सुख गया। मिथिला में कहावत है - चलनी दुसलक बढऩी के, जेकरा अपने सहस्र गो छेद। यानी कबीर की भाषा में बुरा जो देखन मैं चला। खैर विषय बदल के लिए माफी चाहता हूँ। मगर अंतरात्मा भी कोई चीज होती है। मैं जानता हूँ कि मैंने जीवन में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी को हिंदी के माध्यम से ही पाया है। इस लिहाज से हिंदी मेरे लिए भगवान है।
धर्म की जहाँ तक बात है।  माँ - बाप को जितना भी धर्म यात्रा कराया सभी एक से एक महँगी थी। मगर मैंने कराया। मैंने जितने भी लड़कों को पी.एच.डी कराई। वे ही मेरे परिवार की धार्मिक यात्राओं के प्रायोजक रहे हैं। मैं इन छात्रों से ही जीवन की धार्मिक विलासिता पूरी करता हूँ। बदले में उनकी डिग्री। इस प्रकार धर्म और अर्थ जुड़ा हुआ है। वहीं काम की बात करूं यानी वासना की तो मैं सच - सच बता दूँ कि मैं छात्राओं से लेकर युवती शिक्षिकाओं, युवती लेखिकाओं तक तकरीबन एक सौ आठ रमणियों को भोग कर सिद्धावस्था को प्राप्त कर चुका हूँ। वैसे यहाँ बताना लाजमी है कि नए लेखकों की आलोचना लिखने के लिए मैं उन्हें फोन पर बता देता हूँ कि समीक्षा के लिए किताब भेजने के साथ ही एक चेक भेज देना। चेक पर जितना अधिक जीरो होगा तुमको उतना बड़ा हीरो बना दूंगा। मगर लेखिकाओं का क्या है। पहले उसकी सर्वांग की आलोचना फिर उसकी पुस्तक को तो बिना पढ़े ही बेस्ट सेलर बनने लायक समीक्षा लिख देता हूँ।
इस प्रकार आप देखते हैं कि किस प्रकार आलोचना से ही मैं धर्म, अर्थ, काम और इन सब के सहारे मोक्ष यानी आत्मा की मुक्ति के सारे द्वार खोल लेता हूँ। और किसकी आत्मा कैसी है मुझे नहीं पता पर अपनी आत्मा तो कमबख्त ऐसी है कि तब तक नहीं खुलती जब तक किसी रमणी की आत्मा न खोलूं! अगर मैं पिताजी की बात मान लेता और बचपन की आलोचना की आदत छोड़ देता तो क्या मैं आलोचना का ऐसा सुख कभी भोग पाता!!!
कलकत्‍ता गर्ल्‍स कालेज, कोलकाता - 700013
मोबाईल : 9088585841 मेल : brajkphd@gmail.com

सुरा प्रेमियों का सम्‍मेलन

प्रभुदयाल श्रीवास्‍तव
देश में चारों तरफ  असंतोष है। देश में है तो प्रदेश कैसे अछूता रह सकता है ? जिला,शहर और गांव सब तरफ असंतोष की आग फैली है। आग शब्द का प्रयोग इसलिये कर रहा हूं क्योंकि इसके प्रयोग से असंतोष की भयानकता का स्पष्ट बोध होता है। असंतोष की दूसरी आगों की तरह सुरा प्रेमियों में भी यह आग राजनैतिक भ्रष्टाचार की तरह फैली हुई है। शासकीय नीतियां सुरा प्रेमियों के विरुद्ध हैं। सरकार ने देश के तमाम मुहकमों को उनके नेता मंत्री अफसर और कर्मचारियों को देश एवं स्वयं का विकास  करने के लिये भारी भरकम और भीमकाय सबसीडी देने की प्रथा आरंभ की थी। आम जनता को भी धड़ल्ले से सब्सीडी दी जा रही है। सब्सीडी को हिंदी में अनुदान कहते हैं। देश के सब्सीडी धारकों का तोंद निकल महल निर्माण विकास हुआ। किंतु हाय बेचारे सुरा प्रेमी ... उनकी तरफ ? सरकार ने अपनी नजऱें तक इनायत  नहीं कीं। हिंदुस्तान के किसी सुरा प्रेमी को आज तक सरकार अथवा किसी समाज सेवी संगठन ने सब्सीडी नहीं दी। यह भारतीय इतिहास में प्रजातंत्र के नाम पर काला धब्बा है।
बड़े उद्योगों को साठ प्रतिशत तक अनुदान दिया गया है। चालीस जेब से लगाओ और साठ सरकार से मुफ्त में पाओ। पर बेचारे सुरा प्रेमिओं को किसी ने फूटी आंखों से तक नहीं देखा। सरकार ने कभी नहीं कहा कि हे सुरा प्रेमी जी यदि आप चालीस रुपये की सुरा अपने पैसे से पियेंगे तो सरकार आपको साठ रुपये अनुदान के रूप पीने के लिये देगी ? कितना घोर अन्याय, जघन्य अपराध है इन सुरा प्रेमियों के साथ। बच्चनजी ने कितने कठोर परिश्रम से मधुशाला लिखी होगी किंतु सरकार उनके इन योग्य पात्रों को कैसे नकार रही है यह दुनियां देख रही है।
देश में आर्थिक तंगी है तो इन सुरा श्रेष्ठों को पच्चीस प्रतिशत तक का अनुदान तो मिलना ही चाहिये। उद्योग धँधों में सब्सीडी, खाद में सब्सीडी,पेट्रोल, गैस गल्ला व्यापार, फिल्म उद्योग, कृषि और महिला विकास जैसे कार्यों में जी तोड़ बैंक फोड़ सब्सीडी किंतु सुरा प्रेमियों को ठैंगा। कितना अनर्थ ,सुरा प्रेमियों की आह का कोई डर नहीं। ऊपर वाले का कोई भय नहीं। अल्लाहताला सब देख रहा है। उसकी लाठी में आवाज नही होती और वहा मार देता है अनीति करने वालों को। आखिरकार पिट रहा है न देश गरीबी मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से। यह सब सुराप्रेमियों की बददुआओं का असर है। सुरा को देसज भाषा में दारू कहते हैं। यह दारू शाश्वत सत्य है। हमारी परंपरा है। संस्कृति है और ऐतिहासिक धरोहर भी है। पुराणों,ऋचाओं, वैदिक ग्रंथों एवं प्राचीनतम किताबों में सुरा प्रेमियों की महिमा एवं स्तुति का वर्णन मिलता है। सतयुग से त्रेता तक, त्रेता  से  द्वापर तक और  द्वापर से आज कलयुग तक में सुरा ने अपना विजय अभियान जारी रखा है। मध्यकाल में तो सुरा प्रेमियों का विशेष सम्मान होता था। समाज में इज्जत थी और राजा के बिल्कुल बगल में राज्य के सबसे बड़े सुरा प्रेमी का आसन आरक्षित रहता था। वह खुद पीता था और राजा को पिलाता था और राजा को देश दुनियां की चिंता से मुक्त रखता था। राजतंत्र में यही तो मजे थे। न्याय बिल्कुल सही, दारू का दारू और पानी का पानी होता था। किंतु हाय रे प्रजातंत्र, जिस दारू के ठेकों की कमाई से सरकार करोड़ों को फायदा हो उन्हीं दारू भक्तों की यह दुर्दशा ? यह तो हम जैसे अंगुलियों पर गिनने लायक लोग ही बचे हैं जिससे देश में दारूखोरों का अस्तित्व कायम है। यदि सरकार ने अब भी आंख न खोली इन सुरा प्रेमियों की नस्ल ऐसे ही समाप्त हो जायेगी जैसे कि डायनासोर की नस्ल समाप्त हो गई हैं।
खान गफ्फार खान हमारे मोहकमे के दारू प्रेमी ड्राइवर थे सुबह से शाम तक? और शाम से सुबह तक राउंड दी क्लाक दारू पीते थे। यदि गालिब आज जिंदा होते तो अवश्य ही दो चार सौ शेर उनके ऊपर लिख डालते। कुछ दिनों पूर्व गफ्फार भाई साठ पार कर गये और सेवा निवृत हो गये। हमने उनका बिदाई सम्मान बड़े धूम धाम से किया। वे दारू पीकर खटिया पर पड़े थे। हमने उन्हें ससम्मान उठाया और माला पहनाकर उसी सम्मान से दारू पिलाकर खटिया पर लिटा दिया। हमने दारू के साथ पूरी इंसाफी की।
हां तो बात असंतोष की हो रही थी। प्रांत के सभी सुरा प्रेमियों ने अपने खिलाफ होते अन्याय के विरोध में एक प्रांतीय अधिवेशन आयोजित कर डाला। प्रांत के धुरंधर एवं प्रसिद्धि को प्राप्त बड़े बड़े दारूखोर एकत्रित हुये।  मंच पर दारू श्रेष्ठ, दारू शिरोमणि ,दारू नवाज,दारू नवीस पियक्कड़ चंद और दारू किंग विराजमान थे। भीड़ तो कम थी किंतु मैदान में तिल रखने को जगह नहीं थी क्योंकि पिय्यकड़ श्रोता बैठने के बजाय जमीन पर लोटे पड़े थे। लाउडिस्पीकर में गाना बज रहा था -हम लाये हैं दूकान से दारू निकाल के, रखना मेरे बच्चो तुम्हीं बोतल सम्हाल के।
आयोजक सभा को संबोधित करने लगा - प्रदेश के प्यारे प्यारे दारूखोरों, दारू श्रेष्ठों और दारू नवाजों। सरकार द्वारा हमारे ऊपर किया जाने वाले अत्याचारों के विरोध में यह सम्मेलन आयोजित किया गया है। मंच पर सभी गणमान्य दारूखोर विराजे हैं। आज के सम्मेलन का अध्यक्ष हमने प्रांत के सबसे बड़े शराबी लोटन लाल को चुना है। वे मंच पर ही लोटे पड़े हैं। वह देखिये मंच के बीचों बीच लोटे दिखाई पड़ रहे हैं। तालियां  और तालियों की आवाज सुनाई पड़ती है। अब मैं प्रांत के दूसरे बिग गन अर्थात दारूखोरी के रजत पदक विजेता अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त माननीय लुड़कनलालजी ठर्रेवाला से निवेदन करूंगा कि वे माननीय ओटनलाल का पुष्पहारों से स्वागत करें। लुड़कन लालजी मंच पर ही लुड़के पड़े थे। लोटन लाल को हिलाया डुलाया गया। लोटनभाई उठो तुम्हें माला पहनाई जाना है और लुड़कन दादा आप भी उठिये माला पहनाइये लोटन को। आयोजक ने लुड़कन का सिर पकड़कर हिलाया। लोटन और लुड़कन दोनों ने उठने में असमर्थता व्यक्त की। लुड़कनजी क्रोध में बड़ बड़ाने लगे - अरे इस निकम्मी सरकार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। उठने लायक कहां छोड़ा है हमें  हिच्च ... कलेजा जलाया है अपना ... अपने पैसों की दारू पी है, घर फूंक तमाशा देखा है हमने। सरकार ने एक पैसा भी नहीं दिया है हमें दारू पीने को।  सब्सीडी मिलती तो हम भी खड़े होने लायक रहते। दूसरे लोग सब्सीडी के बल पर ही तो खड़े हैं। बंगलों में रहते हैं कारों में घूमते हैं। अच्छा आप माला तो पहना दीजिये। लुड़के लुड़के ही पहना दीजिये।् आयोजक बोला अच्छा कहां है , माला कहां है। लोटन का गला यहीं ले आओ।
यह है रे लुड़कन मेरा गला। किंतु कटा हुआ है। सरकार ने पहले ही काट लिया है। ये तो मेरे मित्र हैं जो मेरा मकान बेचकर मुझे दारू पिलाकर जिंदा रखे हैं। लोटन ने अपना गला हिलाया। आयोजक की मदद से माला धारण कार्यक्रम सम्पन्न हो गया।  इतने में आठ दस बोतलें ट्रे में रखकर एक नौकर मंच पर ले आया। आयोजक लोटन लुड़कन और मंच पर लुड़के सभी दारू खोर बोतलों पर झपट पड़े। फिर गाना बजने लगा - हम लाये हैं दूकान से .....
सम्मेलन अभी जारी है। कब समाप्त होगा नहीं मालूम। हां, सरकार सब्सीडी दे दे तो तुरंत समाप्त हो सकता है।
pdayal_shrivastava@yahoo.com  

खोल दो

सआदत हसन मन्‍टो 

अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए।
सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ  मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं। वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं तो कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था। उसके होशो-हवास गायब थे। उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था।
गंदले आसमान की तरफ  बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं। तेज रोशनी उसके अस्तित्व के रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा। ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं- लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना। सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इन्सानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया।
पूरे तीन घंटे बाद वह 'सकीना-सकीनाÓ पुकारता कैंप की खाक छानता रहा, मगर उसे अपनी जवान इकलौती बेटी का कोई पता न मिला। चारों तरफ  एक धांधली-सी मची थी। कोई अपना बच्चा ढूंढ रहा था, कोई मां, कोई बीबी और कोई बेटी। सिराजुद्दीन थक-हारकर एक तरफ बैठ गया और मस्तिष्क पर जोर देकर सोचने लगा कि सकीना उससे कब और कहां अलग हुई, लेकिन सोचते-सोचते उसका दिमाग सकीना की मां की लाश पर जम जाता, जिसकी सारी अंतडिय़ां बाहर निकली हुईं थीं। उससे आगे वह और कुछ न सोच सका।
सकीना की मां मर चुकी थी। उसने सिराजुद्दीन की आंखों के सामने दम तोड़ा था, लेकिन सकीना कहां थी, जिसके विषय में मां ने मरते हुए कहा था -  मुझे छोड़ दो और सकीना को लेकर जल्दी से यहां से भाग जाओ।
सकीना उसके साथ ही थी। दोनों नंगे पांव भाग रहे थे। सकीना का दुपट्टा गिर पड़ा था। उसे उठाने के लिए उसने रुकना चाहा था। सकीना ने चिल्लाकर कहा था - अब्बाजी छोडि़ए!  लेकिन उसने दुपट्टा उठा लिया था। यह सोचते-सोचते उसने अपने कोट की उभरी हुई जेब की तरफ देखा और उसमें हाथ डालकर एक कपड़ा निकाला, सकीना का वही दुपट्टा था, लेकिन सकीना कहां थी?
सिराजुद्दीन ने अपने थके हुए दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर वह किसी नतीजे पर न पहुंच सका। क्या वह सकीना को अपने साथ स्टेशन तक ले आया था?- क्या वह उसके साथ ही गाड़ी में सवार थी?- रास्ते में जब गाड़ी रोकी गई थी और बलवाई अंदर घुस आए थे तो क्या वह बेहोश हो गया था, जो वे सकीना को उठा कर ले गए?
सिराजुद्दीन के दिमाग में सवाल ही सवाल थे, जवाब कोई भी नहीं था। उसको हमदर्दी की जरूरत थी, लेकिन चारों तरफ   जितने भी इन्सान फंसे हुए थे, सबको हमदर्दी की जरूरत थी। सिराजुद्दीन ने रोना चाहा, मगर आंखों ने उसकी मदद न की। आंसू न जाने कहां गायब हो गए थे।
छह रोज बाद जब होश-व-हवास किसी कदर दुरुस्त हुए तो सिराजुद्दीन उन लोगों से मिला जो उसकी मदद करने को तैयार थे। आठ नौजवान थे, जिनके पास लाठियां थीं, बंदूकें थीं। सिराजुद्दीन ने उनको लाख-लाख दुआएँ दीं और सकीना का हुलिया बताया, गोरा रंग है और बहुत खूबसूरत है, मुझ पर नहीं अपनी मां पर थी। उम्र सत्रह वर्ष के करीब है। आंखें बड़ी-बड़ी, बाल स्याह, दाहिने गाल पर मोटा सा तिल, मेरी इकलौती लड़की है। ढूंढ लाओ, खुदा तुम्हारा भला करेगा।
रजाकार नौजवानों ने बड़े जज्बे के साथ बूढ़े सिराजुद्दीन को यकीन दिलाया कि अगर उसकी बेटी जिंदा हुई तो चंद ही दिनों में उसके पास होगी।
आठों नौजवानों ने कोशिश की। जान हथेली पर रखकर वे अमृतसर गए। कई मर्दों और कई बच्चों को निकाल-निकालकर उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। दस रोज गुजर गए, मगर उन्हें सकीना न मिली।
एक रोज इसी सेवा के लिए लारी पर अमृतसर जा रहे थे कि छहररा के पास सड़क पर उन्हें एक लड़की दिखाई दी। लारी की आवाज सुनकर वह बिदकी और भागना शुरू कर दिया। रजाकारों ने मोटर रोकी और सबके-सब उसके पीछे भागे। एक खेत में उन्होंने लड़की को पकड़ लिया। देखा, तो बहुत खूबसूरत थी। दाहिने गाल पर मोटा तिल था। एक लड़के ने उससे कहा, घबराओ नहीं-क्या तुम्हारा नाम सकीना है?
लड़की का रंग और भी जर्द हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जब तमाम लड़कों ने उसे दम-दिलासा दिया तो उसकी दहशत दूर हुई और उसने मान लिया कि वो सराजुद्दीन की बेटी सकीना है।
आठ रजाकार नौजवानों ने हर तरह से सकीना की दिलजोई की। उसे खाना खिलाया, दूध पिलाया और लारी में बैठा दिया। एक ने अपना कोट उतारकर उसे दे दिया, क्योंकि दुपट्टा न होने के कारण वह बहुत उलझन महसूस कर रही थी और बार-बार बांहों से अपने सीने को ढकने की कोशिश में लगी हुई थी।
कई दिन गुजर गए- सिराजुद्दीन को सकीना की कोई खबर न मिली। वह दिन-भर विभिन्न कैंपों और दफ्तरों के चक्कर काटता रहता, लेकिन कहीं भी उसकी बेटी का पता न चला। रात को वह बहुत देर तक उन रजाकार नौजवानों की कामयाबी के लिए दुआएं मांगता रहता, जिन्होंने उसे यकीन दिलाया था कि अगर सकीना जिंदा हुई तो चंद दिनों में ही उसे ढूंढ निकालेंगे।
एक रोज सिराजुद्दीन ने कैंप में उन नौजवान रजाकारों को देखा। लारी में बैठे थे। सिराजुद्दीन भागा-भागा उनके पास गया। लारी चलने ही वाली थी कि उसने पूछा-बेटा, मेरी सकीना का पता चला?
सबने एक जवाब होकर कहा, चल जाएगा, चल जाएगा। और लारी चला दी। सिराजुद्दीन ने एक बार फिर उन नौजवानों की कामयाबी की दुआ मांगी और उसका जी किसी कदर हलका हो गया।
शाम को करीब कैंप में जहां सिराजुद्दीन बैठा था, उसके पास ही कुछ गड़बड़-सी हुई। चार आदमी कुछ उठाकर ला रहे थे। उसने मालूम किया तो पता चला कि एक लड़की रेलवे लाइन के पास बेहोश पड़ी थी। लोग उसे उठाकर लाए हैं। सिराजुद्दीन उनके पीछे हो लिया। लोगों ने लड़की को अस्पताल वालों के सुपुर्द किया और चले गए।
कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया। कमरे में कोई नहीं था। एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी। सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा। कमरे में अचानक रोशनी हुई। सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया - सकीना ...।
डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा - क्या है?
सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं जी मैं इसका बाप हूं।
डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा -  खिड़की खोल दो।
सकीना के मुर्दा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इजारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी। बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है?
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अपराधी आंकड़े

अंकुश्री

राज्य की जनता डकैती, लूट-मार, राहजनी, हत्या आदि के कारण तबाह थी. प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार के कारण राज्य में अराजकता की स्थिति पैदा हो गयी थी.
तबाह हो रही जनता के लिये सरकार अपनी चिन्ता प्रदर्शित करने लगी. जनता के संतोष के लिये पुलिस और प्रशासन की गतिशीलता को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित किया जाने लगा. राज्य का रेडियो और जन सम्पर्क विभाग अपनी कार्यशीलता का ढि़ंढ़ोरा पीट रहा था. किसी दिन राज्य भर में पांच सौ अपराधी पकड़े जाने की सूचना प्रचाारित होती थी तो किसी दिन आठ सौ की.
अपराधियों की गिरफ्तारी का आंकड़ा रोज-रोज बढ़ता ही जा रहा था. कुछ ही दिनों में राज्य में गिरफ्तार कुल अपराधियों का आंकड़ा राज्य की कुल जनसंख्या से भी ऊपर पहुंच गया. लेकिन राज्य की जनता का भय कम नहीं हुआ. जनता का भय भी सरकारी आंकड़ों की तरह बढ़ता जा रहा था. क्योंकि जनता, जो पहले रात में भय खा रही थी, अब दिन में  लूटी जाने लगी थी.
पता -
सिदरौल, प्रेस कॉलोनी, पोस्ट बॉक्स 28, नामकुम, रांची-834 010

कुबेर की लघु व्‍यंग्‍य कथाएं

परंपरा
रात मरहाराम ने एक सपना देखा। एक व्यक्ति काफी दिनों से बीमार था। बचने की उम्मीद नहीं थी। संयोग से उसके घर एक सिद्ध पुरूष का आगमन हुआ। उन्होंने उसे एक औषधि दिया। उस औषधि के सेवन से वह स्वस्थ हो गया। औषधि की कृपा से उस समय उसने मौत को जीत लिया था। औषधि पर श्रद्धा हो जाना स्वाभाविक था। वह उसकी पूजा करने लगा।
मरते वक्त उसने अपने पुत्र से कहा कि इस औषधि को वह संभाल कर रखे, पता नहीं कब आवश्यकता पड़ जाय। पुत्र ने पिता की परंपरा का निर्वाह किया। वह जीवन भर उसकी श्रद्धा पूर्वक पूजा करता रहा। बीमार पडऩे पर भी उसने उस औषधि का सेवन नहीं किया। उनके बच्चों ने भी उसकी परंपरा का निर्वाह किया। अगली पीढ़ी को बस इतना ही पता था कि यह एक दिव्य वस्तु है। पूर्वज इसकी पूजा करते आये हैं इसलिये इसकी पूजा करन उनका भी धर्म बनता है। इससे पुण्य लाभ होता है।
एक बार उस परिवार का मुखिया उसी रोग से पीडि़त हो गया जिससे कभी उसका पूर्वज ग्रसित हुआ था। जिस दिव्य वस्तु की वह रोज पूजा करता था, उसके सेवन से वह रोग मुक्त हो सकता था, परंतु उसने ऐसा नहीं किया। दिव्य वस्तुएँ पूजा के लिए होती हैं, सेवन करने के लिए नहीं। वह कालकवलित हो गया।
उस औषधि का नाम था, ईश्वर।
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छठवाँ तत्व
उस दिन सतसंग में पंडित जी कह रहे थे - '' क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा ..  मनुष्य का शरीर पाँच तत्वों से बना होता है। यह शरीर नाशवान है। मृत्यु होने पर ये पाँचों तत्व अपने-अपने मूल में वापस समा जाते हैं।'' 
मरहा राम भी सतसंग लाभ ले रहा था। उसकी अड़हा बुद्धि के अनुसार पंडित जी के इस कथन में उसे कुछ घांच-पाँच लगा। उसने कहा- '' पंडित जी! हजारों साल पहले लिखी यह बात उस समय जरूर सत्य रही होगी। अब इसकी सत्यता पर मुझे संदेह होता है।''
पंडित जी ने कहा - '' हरे! हरे! घोर पाप! कैसा जमाना आ गया है। धर्मग्रंथों में लिखी बातों के ऊपर संदेह? ऐसी बातें कभी असत्य हो सकती हैं?''
'' मैं भी तो यही कह रहा हूँ पंडित जी'',
 मरहा राम ने कहा - '' अब तत्वों की संख्या बढ़ गई होगी, वरना पाप कहाँ से पैदा होता?''
'' अरे मूरख! पाप-पुण्य कब नहीं थे। उस समय भी थे अब भी हंै।''
'' लेकिन भ्रष्टाचार और अनाचार तो नहीं रहे होंगे न? ''
'' मरहा राम! ये सब भी पहले थे, फरक केवल मात्रा का है। अब कम का जादा और जादा का कम हो गया है।''
'' लेकिन पडित जी '' मरहा राम ने कहा - '' लोग कहते हैं, आज का आदमी जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं। और जैसा होता है, वैसा दिखता नहीं। मुझे लगता है, नहीं दिखने वाला यही तत्व पहले नहीं रहा होगा। नहीं दिखने वाला तत्व मतलब अदृश्य तत्व, डार्क मैटर। कहीं यही तो छठवाँ तत्व नहीं है।''
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संत
मरहा राम आजकल धार्मिक व्यक्ति हो गया है। गाँव में उत्तर वाले किसी पहुँचे हुए संत का प्रवचन चल रहा था। नियम-व्रत का पालन करते हुए पिछले पाँच दिनों से वह सत्संग-लाभ ले रहा है। वह संत जी के वचनों को हृदय में बसाता भी है और बुद्धि से तौलता भी है। खाली समय में वह संत जी के पास जाकर बैठ जाता है, अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त करने के लिए।
संतों का लक्षण बताते हुए प्रवचनकार संत जी आज ही  अपने प्रवचन में कह रहे थे -  '' संत वह है जो मीठा खाता है और मीठा बोलता है। मीठा खाने का मतलब मीठा सुनना। ''
संत जी की बातों ने मरहा राम के हृदय को छू लिया। उसने कहा -  '' भगवन! संतों के बारे में आप ठीक ही कहते हैं। नेता जी जब भी आते हैं, मीठा-मीठा ही बोलते हैं। ''
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माता पार्वती का देवभूमि की सैर
सब्र की एक सीमा होती है। आखिर कोई कब तक धीरज रखे? या फिर इस तरह की इच्छा जाहिर करने वाली दुनिया की वह पहली पत्नी है? देवी पार्वती ने मन ही मन सोचा; और किसी अज्ञात संकल्प के साथ उसके दोनों गाल कुप्पे की तरह फूल गये।
पत्नी हठ के सामने भोलेनाथ को आत्म समर्पण करना ही पड़ा। उसने अपने स्वचलित नंदी विमान को पृथ्वी भ्रमण पर जाने के लिए तैयारी करने का आदेश दिया। नंदी, देवी पार्वती का चहेता, पहले ही तैयार बैठा था। उसने देवी माता पार्वती को फौरन यह शुभ समाचार सुनाया। देवी पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा। वह तैयारी में जुट गई।
यह सुबह-सुबह की बात थी।
सूरज ढलने वाला था, जब भोले बाबा और देवी पार्वती का नंदी विमान कैलाश से उड़ान भरा।
विमान की दिशा देखकर देवी को आश्चर्य हुआ। उसने भोलेनाथ से पूछा - '' भगवन! हम किस द्वीप की ओर जा रहे हैं? ''
भोलेनाथ ने उत्तर दिया -'' देवी! आज हम आपको पाश्चात्य देशों की यात्रा पर लेकर जा रहे हैं। आपको प्रसन्नता नहीं हुई? ''
देवी पार्वती ने रूठने का अभिनय करते हुए कहा -  '' भगवन! आप कब से भोगवादी बन गए? मैंने तो तपस्वियों, योगियों और त्यगियों की भूमि आर्यावर्त की सैर पर जाने के लिये कहा था, भोगियों के देश की नहीं। ''
भोलेनाथ -'' देवी! आप उसी आर्यावर्त की बात कर रहीं है न जिसे आजकल कुछ लोग हिन्दुस्तान, पुरातनपंथी लोग भारत और पढ़े-लिखे लोग इंडिया कहते हैं?''
देवी पार्वती - '' हाँ देव! वही देवभूमि, जिसे लोग भारत वर्ष भी कहते हैं।''
भोलेनाथ - '' ठीक कहती हो देवी! पर वहाँ जाने का हठ न करो। ''
देवी पार्वती - '' क्यो देव ?''
भोलेनाथ - '' इसी में हमारी भलाई है। ''
देवी पार्वती - '' आखिर कैसे, देव ? ''
भोलेनाथ - '' देवी! अब आप मुझे इतना भी भोलाभाला न समझो। आप जैसी रूपवान और सोलहों श्रृँगार युक्त पत्नी साथ में हो तो ऐसी मूर्खता कोई कर सकता है? इस स्थिति में मूर्ख से मूर्ख आदमी भी वहाँ जाने का खतरा मोल नहीं लेगा जिसे आप देवभूमि कह रही हैं, समझीं देवी। ''
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विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव
उस दिन यमराज के पास और एक विचित्र केस आया। केस स्टडी करने के बाद यमराज को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि इस केस को ईश्वर की जानकारी में लाना जरूरी है। केस को लेकर वह दौड़ा-दौड़ा ईश्वर के पास गया। कहा - प्रभु! आज बेहद शुभ समाचार लेकर आया हूँ; सुनकर आपको भी सुखद आश्चर्य होगा।''
ईश्वर ने मुस्कुराकर कहा - तब तो बिलकुल भी विलंब न करो यमराज जी, सुना ही डालो।''
यमराज ने कहा - प्रभु! जिस भारतीय प्रजाति के मनुष्य को हम विलुप्त समझ लिये थे, वह अभी विलुप्त नहीं हुआ है। देखिये, सामने खड़े इस मनुष्य को। साथ ही साथ इसके बहीखाते को भी देखते चलिये।''
पहले तो ईश्वर ने उस अजूबे मनुष्य को निगाह भर कर देखा, फिर जल्दी-जल्दी उसके खाते के पन्नों को पलटने लगा। खाते में उस मनुष्य के सम्बंध में निम्न विवरण दर्ज थे -
नाम - दीनानाथ
पिता का नाम - गरीबदास
माता का नाम - मुरहिन बाई
(ईश्वर के बहीखाता में मनुष्य की जाति, वर्ग, वर्ण, देश आदि का उल्लेख नहीं होता।)
पता ठिकाना - जम्बूखण्ड उर्फ आर्यावर्त उर्फ भारतवर्ष उर्फ भारत उर्फ हिन्दुस्तान उर्फ इंडिया।
(एक ही स्थान के इतने सारे नामों को पढ़कर ईश्वर की बुद्धि चकराने लगी।) हिम्मत करके उसने आगे की प्रविष्टियाँ पढ़ी। बहीखाते के बाईं ओर के (आवक अर्थात पुण्य वाले) सारे पन्ने भरे पड़े थे परन्तु दाईं ओर के (जावक अर्थात पाप वाले) सारे पन्ने बिलकुल कोरे थे। ईश्वर को बड़ी हैरत हुई। अंत में बने गोशवारे को उन्होंने देखा जिसमें संक्षेप में निम्नलिखित बातें लिखी हुई थी -
झूठ बोलने की संख्या - शून्य
चोरी, धोखेबाजी अथवा ठगी करने की संख्या - शून्य
आजीविका के लिये भीख मांगने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए दूसरे प्राणियों को दुख देने, पीडि़त करने अथवा हत्या करने की संख्या - शून्य
अपने स्वार्थ, सुख अथवा स्वाद के लिए, धर्म के नाम पर शब्दों का प्रपंच रचकर, लोगों को ठगने, लूटने, दिग्भ्रमित करके उन्हें आपस में लड़वाने की संख्या - शून्य
ईश्वर और धर्म के नाम पर लोगों को देश, जाति अथवा संप्रदाय में बाँटने का काम करने की संख्या - शून्य
बहीखाता पढ़कर ईश्वर के मन की शंका और गहरी हो गई। उन्होंने यमराज से पुन: पूछा -  क्या यह मानव वाकई भारतीय है? ''
यमराज ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - मैंने इसके बारे में बहुत बारीकी से जांच किया है, प्रभु! यह भारतीय ही है। संभालिये इसे और मुझे आज्ञा दीजिये।''
- '' ठहरिये यमराज जी!'' ईश्वर ने कहा - इसके सम्बन्ध में हमारी योजना अलग है। इस विचित्र मानव को वापस पवित्र देवभूमि भारत भेज दीजिये। वहाँ किसी अजायब घर में इसे सुरक्षित रखवा दीजिये। इसके पिंजरे के बाहर सूचना-पट टंगवा दीजिये जिसमें लिखा हो - ' विलुप्त प्रजाति का भारतीय मानव '।

पता -
व्याख्याता ,शास. उच्च. माध्य. शाला कन्हारपुरी, 
वार्ड नं. - 28, राजनांदगांव छ.ग.
E mail: kubersinghsahu@gmail.com, blog: storybykuber.blogspot.com

भाषणबाज

नूतन प्रसाद 

नेताजी आजकल स्वर्ग में ही निवासकर रहे थे.यद्यपि उन्हें सब प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थीं तो भी अनशन पर बैठ गये.इसकी खबर अधिकारियों को लगी तो वे दौड़े आये.उनने अनशन पर बैठने का कारण पूछा तो नेता जी बोले -हम यहां की व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं इसलिए व्यवस्था बदली जाय.''
अधिकारियों ने साश्चर्य कहा -आप भी बड़े विचित्र जीव हैं. आपको दूसरों के समान भोजन कपड़े अर्थात आवश्यकता की सारी वस्तुएं मिल रही है.आपसे भेदभाव भी नहीं किया जाता फिर आपकी असंतुष्टि का कारण समझ नहीं आता.''
- यही तो दुख है कि हमारे बराबर दूसरों को भी अधिकार दे दिया गया है जबकि हम विशिष्ट हैं. गरीबा को देखो - वह हमारा नौकर था. जूते साफ करता था.हम मलाई खाते थे तो वह दुत्‍कार  खाता था.लेकिन वही अब हमारे साथ बैठकर भोजन करता है.यही नहीं हमसे टक्कर भी लेता है जबकि ये बातें हमारी शान के खिलाफ है.''
- आपकी शान मिट्टी में मिल जाये पर हम व्यवस्था नहीं बदलेंगें.''
- तो हमें नर्क  भेजने का प्रबंध किया जाये.वहां के जीव जो बहुत दुखी हैं.उनकी सेवा करेंगे.
- झूठ क्यों बोलते हैं.आपने कब किसकी सेवा की.यदि सत्य बतायेंगे तो नर्क  भेजने के लिए विचार भी करेंगे.
नेताजी बहुत देर तक सोचते रहे फिर बोले-हकीकत यह है कि जब मैं यहां की व्यवस्था की आलोचना करता हूं तो दूसरे जीव मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते.यदि वहां नर्क चला जाऊंगा तो वहां की व्यवस्था के बारे में उल्टा सीधा आक्षेप करने का अवसर मिलेगा.
अधिकारियों ने पूछा - भाषण देना जरूरी है क्या ? मुंह पर ताला लगाकर रखेंगें तो काम नहीं बनेगा ?
नेता जी तुनके - मैं नेता हूं.भाषण दिये बगैर कैसे रह सकता हूं.
- आप कैसे भी रहें पर न तो व्यवस्था बदली जायेगी न तो आपको नर्क  में भेजा जायेगा.यहीं पर दूसरों के समान रहना पड़ेगा.
इतना कह अधिकारियों ने उनकी बोलती बन्द कर दी और  उन्हें काम पर ले गये.  
भंडारपुर ( करेला ) 
पो. - ढारा, व्‍हाया - डोंगरगढ़ 
जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.) 

चरित्र का जामुन

मिलिन्‍द साव
- '' देखो भाई, मगर! तुम तो जानते ही हो, इस समय मैं जनता के सामने भाषण देने जा रहा हूं। इसलिए, ऐसी जगहों में भला चरित्र का क्या काम ?''
बन्दर और मगरमच्छ की वह पुरानी कहानी तो आप सबने सुनी ही हो होगी। जिसमें नदी किनारे पेड़ पर रहने वाला बन्दर नदी के एक मगर को नित्य पेड़ के मीठे जामुन खिलाया करता था और जब एक  दिन मगर को बंदर के मीठे दिल को खाने की इच्छा हुई ,तो वह उसे नदी के बीच ले गया और बंदर से उसके दिल को खाने की इच्छा प्रकट की। तब फिर बन्दर ने चतुराई से यह कह कर कि उसने तो अपना दिल नदी किनारे पेड़ पर रख छोड़ा है , मगर से अपनी जान बचाई थी।
यह कहानी भी ,जो हम आपको सुनाने जा रहे हैं  उसी बन्दर और मगरमच्छ के वंशजों की है। अब उनमें फिर से मित्रता कायम हो चुकी थी। बन्दर जंगल के लोकतंत्रीय शासन में जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि यानी नेता था। वह मगर रुपी जनता को नित्य प्रति अपने आश्वासनों के मीठे जामुन खिलाया करता था। इससे मगर भी बड़ा प्रसन्न था। तभी,एक दिन मगर के मन में विचार आया कि जिस बन्दर के आश्वासनों के जामुन इतने मीठे हैं , उसके चरित्र का जामुन कितना मीठा होगा! उसने तय किया कि बंदर के चरित्र का स्वाद जरुर चखा जाए। वह मौके की तलाश में लग गया।
एक दिन बन्दर बोला - ‘‘मित्र ! मुझे नदी-पार एक जनसभा को सम्बोधित करने जाना है और मेरा हेलीकाप्टर खराब है। क्या तुम मुझे वहॉं ले चलोगे ? ‘‘ मगरमच्छ तो अवसर की तलाश में ही था। अत: वह झट तैयार हो गया।
बन्दर उसकी पीठ पर सवार हो गया और दोनों नदी पर चल पड़े। बीच नदी पर पहुँचने पर मगर ने अपने दिल की इच्छा बन्दर को सुनाई कि वह उसके चरित्र का स्वाद चखना चाहता है। यदि बन्दर ने उसे अपने चरित्र का जामुन खाने नहीं दिया तो वह उसे नदी में डुबा देगा। अब बंदर ने फिर वही पुरानी ट्रिक आजमानी चाही कि वह तो अपना चरित्र नदी के किनारे पेड़ पर छोड़ आया है! पर ,इस बार मगर ने साफ कह दिया कि वह उस पहले वाले मगर जैसा मूर्ख नहीं जो उसके झांसे में आ जाए। अब तो बंदर कुछ घबराया , फिर शीघ्र ही संयत स्वरों में कहने लगा-‘‘ देखो भाई, मगर! तुम तो जानते ही हो, इस समय मैं जनता के सामने भाषण देने जा रहा हूं। इसलिए, ऐसी जगहों में भला चरित्र का क्या काम ? अत: तुम विश्वास करो, मैंने वास्तव में अपने चरित्र को जामुन के उस पेड़ पर टांग रखा है। किनारे पहुँचते ही मैं उसे तुम्हे अवश्य ही दे दूंगा। और फिर राजनीति की इस लाइन में मुझे चरित्र जैसी फालतू चीज की जरुरत भी नहीं पड़ती।
आखिर मगर, बन्दर की बातों में आ ही गया। दोनों वापस लौटे। किनारे पहुंचते ही बन्दर कूद कर पेड़ पर चढ़ गया और मगर से कहने लगा -‘‘ अरे मगरमच्छ! तू सदा मूर्ख ही रहेगा। बेवकूफ ! मैंने तो अपना चरित्र उसी दिन बेच दिया था,जिस दिन मैंने राजनीति में अपने कदम रखे। ‘‘ निराश मगर मुंह लटका कर नदी में वापस लौट आया।
पता 
विवेकानंद नगर, राजनांदगांव ( छ. ग.)

अव्दितीय क्रांतिकारी कवि - कुंज बिहारी चौबे

आचार्य सरोज व्दिवेदी
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में छत्तीसगढ़ के जिन महापुरुषों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और सामाजिक क्राति के बीज बोए उनमें स्वर्गीय कुंजबिहारी चौबे का नाम सम्मान पूर्वक लिया जाएगा। स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे स्वतंत्रता और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थे मात्र 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता और समाज सुधार का  इतना काम किया कि छत्तीसगढ़ तथा राजनांदगांव के लिए वह गौरव की बात है।
स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन दौर में श्री कुंज बिहारी का जन्म 16 जुलाई 1916 को राजनांदगांव के निकट बजरंगपुर - नवागांव में सभ्रांत ब्राम्हा्रण परिवार में हुआ। छह पुत्रियों के बाद जन्में इस बालक को पिता छबिराम चौबे ने बहुत लाड़ प्यार दिया। परिवार के इस स्नेह ने उन्हें क्रोधी और जिद्दी तो बनाया साथ ही कुछ कर गुजरने की अद्भुत प्रेणना भी दी। प्रखर प्रतिभा के धनी श्री चौबे अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के प्रबल  प्रवाह में बहते चले। इस प्रवाह ने उन्हें महात्मा गाँधी और ठाकुर प्यारेलाल सिंह जैसे क्रांतिकारी  लोगों के साथ ही डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे साहित्यकार का चहेता बना दिया। साथ ही अनेक महापुरूषों के क्रांतिकारी  विचारों से प्रभावित श्री चौबे जीवन में ऐसा कुछ कर गये जो हमारे लिये अनुकरणीय है।
छात्र जीवन में ही श्री चौबे ने स्टेट हाईस्‍कूल के विद्यार्थी के रूप में ऐसा कर दिखाया जो बड़े क्रांतिकारियों के लिए ही संभव था। उन्होंने स्‍कूल पर लगा यूनियन जैक उतार कर जला दिया तथा उसके बदले तिरंगा फहरा दिया और हेडमास्टर के पूछने पर साहसपूर्वक अपना यह अपराध स्वीकार लिया। इसके लिए उन्हें इतनी बेंते खानी पड़ी थी कि मारने वाला भी थक गया।  इस घटना से पूरे नगर में सनसनी फैल गई और वह अंग्रेजों की नजर  में चढ़ गये। उन पर निगरानी रखी जाने लगी।
इस घटना ने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। और वह राष्ट्रीय आंदोलन और समाज सुधार के गीत गाने लगे। उन्होंने कालेज में प्रवेश तो लिया किन्तु पढ़ाई छोड़कर क्रांति के गीत गाने लगे। उन्हें रियासत से निकाल दिया गया तब वह कुछ समय के लिए गाँधी जी के पास सेवाग्राम चले गए। बाद में वापस आकर उन्होंने गृहस्थी बसाई। साथ ही प्रखर लेखनी से देशभक्ति और समाज सेवा की कविताएं लिखते रहे, उन्होंने अंग्रेजों को ललकारा  -
तैंहर ठग डारे हमला रे गोरा,
आँखी में हमर धुर्रा झोंक दिये
मुड़ म थोप दिये मोहनी,
अरे बैरी जान तोला हितवा
गंवाएन हम दूधो - दोहनी,
अंग्रेज तैं हमला बनाए कंगला
सात समुंदर विलायत ले आ के,
हमला बना दे भिखारी जी
हमला नचाए तैं बेंदरा बरोबर,
बन गए तैंहा मदारी जी
साथ ही उन्होंने नवयुवको को देशभक्ति और समाज सेवा के लिए प्रेरित किया -
नवयुवक उठ, बंधनों को तोड़
बहस औ मुबाहिसे कर बंद
ले न वाद - विवाद में आनंद
व्यर्थ बातों का बतंग्गड़ त्याग
बंधनों को काट हों स्वच्छंद
उन्होंने शराब की बुराइयों के प्रति आगाह करते हुए अनेक कविताएं लिखी। जिनमें एक कविता बड़ी प्रसिद्ध है जो उन्होंने मध्य प्रांतीय कवि सम्मेलन रायपुर में पढ़ी -
मदिरा विष है इससे बढ़कर,
इस दुनिया में कोई पाप नहीं
स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे को किसानों के प्रति अत्यधिक हमदर्दी थी। किसान की दशा पर उन्होंनें अनेक कविताएं लिखीं जिनमें प्रसिद्ध है -
चल मोर भैया बियासी के नागर
अरे, कैसे मजा के बियासी के नागर
बोये हो ऐ दारी खांड़ी जी,
दू खांड़ी के लाने हौं बाढ़ी जी
बुढ़वा हों गे हे मोर बइला के जोड़ी
औ अतरो में छूटे ला है लागा बोड़ी
मुड़ ले हो गे हे करजा ह आगर
चल मोर भैया बियासी के नागर
उन्होंने कुछ चिंतनशील और आध्यात्मिक कविताएं भी लिखी जिसमें एक है मृत्यु भय -
मेरे मन में क्यों बार - बार
उठता है भय का मौन ज्वार ?
यों लगता है तन का अन्तिम
उच्छवास निकलने वाला है
छग - दीप बुझ रहे मेरे
मेरे जग का मिट रहा उजाला है
इस तरह उन्होंने अनगिनत कविताएं लिखी। उनका जीवन असाधारण था और कविताएं विलक्षण थी। वह सभी काम समाज के ढर्रे से हटकर करते थे और सभी बातों पर अपनी प्रखर विचारधारा से विलक्षण तर्क प्रस्तुत करते थे। जिसे देख - सुनकर सभी लोग अचंभित होते थे। यह विलक्षण जीवन जीकर विलक्षण और आकस्मिक ढंग से 5 जनवरी 1944 को काल के गाल में समा गए।
स्वर्गीय कुंज बिहारी चौबे की मृत्यु पर डॉ. नंदूलाल चोटिया ने लिखा -
ह्दय वेदना, शब्द समूहों को
धरती पर मेल रही है
अब भी उसके आँगन पर
उसकी कविता खेल रही है
अब भी अश्रु  ढलक पड़ते है
सिहरे, कर्मठ ज्ञान विचारी
मेरा कवि था, कुंज बिहारी
उनके निधन पर डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, नर्मदा प्रसाद खरे, अवतार श्री मेहर बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के अनेक महापुरूषों ने उनकी भूरि - भूरि प्रशंसा करते हुए अविस्मरणीय और उल्लेखनीय संस्मरण लिखे हैं।
राजनांदगांव की धरती संस्‍कारधानी कहलाती है क्योंकि यहां उपजे अनेक महापुरूषों ने पुराने संस्‍कारों में परि किया है तथा नये संस्‍कारों को जन्म दिया है, स्व.कुंज बिहारी चौबे ने नांदगांव की माटी को सुगंधि दी है। उनसे हमारा मस्तक जनप्रतिनिधि छत्तीसगढ़ के कर्णधार बने हैं तब हम आशा करते हैं कि महान स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर क्रांतिकारी कवि स्व.कुंज बिहारी चौबे पर कुछ रचनात्मक कार्य अवश्य ही होंगे।
स्वर्गीय चौबे की कुछ कविताओं का संकलन कुछ महान व्यक्तियों के संस्मरणों के साथ उनके  सुपुत्र श्री अविकल चौबे ने अवशेष नाम से प्रकाशित किया है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अभी बहुत काम बाकी है।
मेरा सुझाव है कि स्व.कुंज बिहारी चौबे पर राजनांदगांव में एक शोध पीठ की स्थापना होनी चाहिए और इस महान कवि की रचना पर काम करके छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाना चाहिए।  
पता 
ज्‍योतिष कार्यालय, मेन रोड,
 तुलसीपुर, राजनांदगांव ( छ.ग.)

उपदेशात्‍मक काव्‍य संग्रह - पीरा

राजेन्द्र प्रसाद सिन्हा काव्‍य संग्रह ’पीरा’ महिमामण्डनात्मक, उपदेशात्मक और इतिवृत्तात्मक है। गाँव अनेकानेक कारणों से सुग्घर है। वैसे गाँवों में अनेकानेक कमियाँ भी हैं। असमानता पर कहा गया सच है - ’गाँव अत्याचार की प्रथम पाठशाला है?’
ऊँच-नीच के खोचका ल पाटके
सुम्मत-सुनता के
सुग्घर बीज लगावौ। (पृ.19)
उज्जर सोच जरूरी है। छत्तीसगढ़ महतारी भारत-भूमि की महानता सभी को मालूम है। भारत में ही छत्तीसगढ है। महानतम् भूमि का बखान कब तक ? राजेन्द्र प्रसाद सिन्हा को इतिहास मालूम ही नहीं कि, आजाद हिन्द सेना का निर्माण रास बिहारी बोस ने जापान में किया था। मिलान करें पृ.18 से। गाँव को शहर बनाने (सुविधाजनक हेतु) में हर्ज क्‍या है ? पर्यावरण विशेष जंगल बचाने में मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कविता सर्वोत्तम शब्दों का उत्तम साधन है। शब्द शक्ति पर जिम शेहन का कथन याद आता है - ’’शब्द दो बड़े काम करते हैं, पहला तो यह कि दिमाग को भोजन देते हैं; और दूसरा वे समझ और जागरूकता के लिए प्रकाश देते हैं।  ’मनखे जम्मो डहन ले दुरिहा हो गे’ यहाँ सिन्हा जी दार्शनिक और रहस्यात्मक कविता करते हैं -
हमर जिनगी किराया के
कुरिया म पहावत हे
प्राणेश्वरी कुरिया किराया
सांस किराया, तन किराया
मचलत हे ........। (पृ.20)
कबीर, जायसी ने ईश्वर मिलन की बात की है। इन्होंने शाब्दिक क्रांति तो दी पर बहुउद्देशीय समाज निर्माण नहीं हुआ। मंहगाई का बादल बरसने के कारण सस्ता दर राशन है। संस्‍कृति , रीति-रिवाज का बखान करने वाले सिन्हा जी बताएँ - ’दहेज प्रथा’ छत्तीसगढ में किन लोगों में है ? जनहित प्रतिबद्धता की कमी ने ’दाइज’ कविता लिखी (पृ.26)। जंगल- कृषि भूमि पर उद्योग लगाना जरूरी नहीं। जंगल को नष्ट सामान्य जन ने नहीं किया। ऐसा होता तो धमतरी सहित छत्तीसगढ का जंगल नष्ट हो जाता। ये तो भेडिय़ों की चाल है। अप्रत्यक्ष कारण जंगल तो नक्सलाइटों ने बचाकर रखा भी है। फायदा किसे? प्रश्न महत्वपूर्ण है। काश जंगल काटने का उद्देश भेडिय़ों को दिया होता। (पृ.28) प्रदूषण उद्योग-उत्पादन से हुआ। पर राजेन्द्र जी औद्योगिक पूँजीपतियों से शब्द-अर्थ से टकराने से साफ बच जाते हैं। बेटी-नारी का महिमामण्डन किस लिए भाई ? ये एक प्रकार का भावनात्मक दुराचार नहीं ? नारी की प्रगतिशीलता पर सिन्हाजी चुप क्यों हैं?
जुलुम के मोटरा गठिया के
संकर कस जहर पियइया। (पृ.31)
जुलुम-मोटरा कब खुलेगा? किसानों की महानता के संग किसानों का दर्द और पीड़ा लिखना था। (पृ.34) गाँवों में अनेक असमानताएँ हैं। तब सिन्हाजी को गाँव क्यों ’तिरिथ’ लगता है? ’कोरा’ व ’पानी’ महत्वपूर्ण हैं। ’जवान’ में पीरा है ही नहीं। (पृ.40) वृक्ष पर ’परमारथ’ उपदेशात्मक  कविता है। पीरा कविता में भारत की लगभग सभी समस्याएँ हैं। स्वार्थ रास्ते से निर्मित हुई, तेज हुई, ’गुरू महिमा’ (पृ.48) संवेदनशील नहीं है। नहीं तो देश में असमानताएँ है ही। इसे ’जिनगी’ में उपमाओं के संग प्रस्तुत किया गया। यहीं पर पीरा दर्ज होती है।
संवर जाही जिनगी
इही आस म बाट जोहत हे।
किस उम्मीद में बाट जोह रहे हैं? रास्ता देखने से भला काम शुरू करें। संघर्ष करें। ’काल करै सो आज कर ’ वाली स्थिति हो। बेटा का कोई काम नहीं। यदि बेटी (नारी) के आधे काम में बेटा (नर) हाथ बटा दे तो जिन्दगी कितनी खुशहाल होगी? यहाँ स्त्री विमर्श दिखाई पड़ता है। ’भ्रष्टाचार’, गाँव-शहर होवथे’, ’धरती दाई के किसनहा बेटा’, ’टिकट बर लाइन म खड़े हे’ को मिलाकर अध्ययन करें तो किसान की जिन्दगी अर्थात् श्रमशीलता महान् नजर आती है, पर कृषक सुख-सुविधाओं से दूर है, दुख के आँसू की जिजीविषा उदात्त जिन्दगी नहीं कही जायेगी ? यहाँ ’पीरा’ में सिन्हाजी संवेदनात्मक शब्द देते हैं। कुरूक्षेत्र में अब महाभारत की नहीं अहिंसा की जरूरत है। कवि को जब लगता है - ’धरती दाई के हरियर लुगरा, महर-महर महकत हे!’ तो पीरा क्यों?
सुख के साथ दुख लगा रहता है। सिन्हाजी दोनों बातें रखते हैं। विडम्बना है, कवि को किसी एक पर नाज़ नहीं है। बस्तर की माटी पिछली शताब्दी से दम तोड़ रही है।
तिखुर, मडिय़ा, जिर्रा के गुण
देश भर म गज़ब सुहाथे। (पृ.60)
वर्तमान में पेप्सी, कोकाकोला , थम्सअप, मिरांडा, फ्रूटी चल रही है। कल्पना में ही खोए हैं सिन्हाजी। मुक्तिबोध सटीक लिखते हैं - चाँद का मुँह टेढ़ा है। कवि को देश का बसेरा अच्छा नहीं लगता तभी तो वे लिखते हैं -
भूखमरी ल मिटा के
मंगल म बसेरा करना हे। (पृ.70)
कवि भारतभूमि की महानता खूब बताते हैं। मंगल ग्रह में जाने से हताशा शांत हो जायेगी? 1971 से भूखमरी नहीं गिरी है। ’1997 में 50 प्रतिशत लोग भूखे थे। वे 2015 में बने रहेंगे।’ (सुरेन्द्र भटनागर) यदि छत्तीसगढ़ की माटी सरग है तो। 2 रू किलो में चाँवल दिया जा रहा है? कवि की पीरा है -
भूख कस दुख नहीं
करौ झन हिजगापारी। (पृ.92)
कवि की पर्यावरण चिंता मुखर है -
कतको रूखराई ल कांट के
गमला म बगीचा लगावत हें। (पृ.83)
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गमला म पेड़ लगा के
जंगल ल ठुठवा बनावत हें। (पृ.19)
गाँव में हो रहे परिवर्तन सिन्हा जी को शहर लगता है। स्वयं स्वीकारते हैं -
’परिवर्तन विधि के विधान हे’ (पृ.86)
मैं तब ये पूछथंव कि सिन्हा जी फेर आप अतका काबर परेसान हव ? मगर परेशानी का कारण है और वह है अशिक्षा -
हमरे पढ़ाये लइका
नेतागिरी हमला बतावत हे। (पृ.58)
इसके लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था बहुत हद् तक दोषी है।
हिन्दी विभाग में ’बेटा का आदर्श’ स्वीकारने की बात खूब जँचती है। बांकी कविताएँ प्रतिज्ञाबद्ध, उपदेशात्मक है।
कवि ने दो स्थानों पर मिथकों का उपयोग किया है। उस पर चिंतन पाठका को करना चाहिए -
तइहा के बात ल
बइहा ले गे। (पृ.822 और 27)
हम अपनी युद्ध परम्परा से कट रहे हैं और प्रदूषण परम्परा में जी रहे हैं। कुल मिलाकर काव्य संग्रह उपदेशात्मक है,  संवेदनात्मक की कमी है। आगे आने वाली सिन्हाजी की कविताएँ इतिवृत्तात्मक नहीं होगी, बेहतर होगी इन्हीं आशाओं के साथ कवि को शुभकामनाएँ।
पता - शकरपुर , वार्ड नं. - 4, राजनांदगांव 491441 ( छ.ग)