शनिवार, 30 नवंबर 2013

नवम्‍बर 2013 से जनवरी 2014

पाठको का विचार
छत्‍तीसगढ़ी भाषा हेतु बिस्‍मार्क जैसे नायक की जरुरत / यशवंत मेश्राम                                
कापीराइट के संबंध में  
कहानी प्रतियोगिता
सम्पादकीय            
कहानी
जिंदगी की  कतरन  / गजानन माधव मुक्तिबोध      
अपना घर / ज्योतिर्मयी पन्त                
अनुवाद
विष्णु भगवान के पदचिन्ह / कुबेर          
जीत / डॉ. विजय शिन्दे               
व्यंग्य
धरती सुराज अभियान / वीरेन्द्र '' सरल ''            
लघुकथाएं
श्‍वान धर्म  / कुमार शर्मा '' अनिल ''            
आईना / सुभाष चंदर                
सीला बरहिन / सत्यभामा आडिल       
गीत / गज़ल / कविता
वफा प्‍यार से दूर  / मनोज आजिज        
सपनों का  गाँव / इब्राहीम कुरैशी           
आजादी की नई रोशनी / डॉ. गार्गीशरण मराल       
केशव शरण की दो गज़लें                 
जिन्दगी एक कशिश  / डॉ. मणी मनेश्वर साहू '' ध्येय ''    
साक्षात रुप को  / डॉ. रामशंकर चंचल            
मो. कासिम खॉन तालिब की दो गज़ल़ें          
डॉ. सुशील गुरु के पांच छंद
व्यक्तित्व
कठिन जीवन के कुटिलकाल में / डॉ. जगन्नाथ '' विश्व ''    
पुस्तक समीक्षा
आनंद एवं प्रेरणा के स्त्रोत : बालगीत / डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन    
साहित्यिक -  सांस्‍कृतिक - गतिविधियाँ
आंचलिका का विमोचन एवं सम्मान समारोह        
सम्मान समरोह हेतु पुस्तके आमंत्रित           
ग्राम पंचायत भंडारपुर
ग्राम पंचायत करेला
ग्राम पंचायत गुमानपुर
वी ग्रुप आफ कम्‍पनीज

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सम्‍पादकीय

संस्‍कारधानी राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं को कोई नकार नहीं सकता। जो यह कहता है राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्‍य है उसे शायद यह नहीं मालूम की संस्‍कारधानी में आज भी साहित्‍य की वह धारा यथावत बह रही है जो डॉ पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी, डॉ बल्‍देव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध के समय बहती थी। मैं तो कहता हूं उन दिनों की अपेक्षा वर्तमान में साहित्यिक धारा कुछ अधिक ही वेग में बह रही है यही कारण है कि आज राजनांदगांव के  साहित्‍कारों के अनेक पुस्‍तकें छप कर आ रही है।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

वफ़ा प्‍यार से दूर

मनोज आजिज

वफ़ा प्यार से दूर ये शहर है
जवाँ पे कुछ, दिल पे कहर है

यूँ तो फरेबी की सफ़ेद धंधा है
फरिस्ते बनने की ढोंग शाम ओ सहर है

नि·लो सुब्ह जोश ओ उम्मीद लिए
हुयी रात लगती बेकार हर कसर है

गुजरो गर  जिन्दगी की तंग गलियों से
पाओगे फिर भी कुछ टेढ़ी नजऱ है

कत्ल ही तो होती है अरमानों की  यहाँ
मुर्झाया हुआ बेगुल सपनों का शजर है

हर शू अरबाबे दिल की कमी ' आजिज़'
जिओ खुद नहीं कोई शम्मे रहगुजर है
पता
इच्छापुर , ग्वालापारा
पोस्ट. आर. र्आई.  टी . जमशेदपुर. 14
( झारखण्ड )
फोन.0997368014

छत्तीसगढ़ी भाषा हेतु बिस्‍मार्क जैसे नायक की जरुरत


यशवंत मेश्राम
विचार वीथी के मई - जुलाई 13 का संपादकीय जमीनी साहित्य पर बेबाक बयान करता है। अनेक प्रश्र समाधान हेतु उठाए गए। पिछले तेरह वर्षों में विकास छ.ग. का हुआ वह पूर्व दृष्टिगोचर नहीं, सत्य है? जबकि असमानता शिक्षा विद्यमान है। बिजनी - पानी - सड़क को विकास मान ले क्योंकि सस्ता दर राशन खाने मनुष्य मजबूर है और इधर छत्तीसगढ़ी भाषी साहित्यकार बासी नून गुनगाण कर रहे हैं। '' जुरमिल सबो चढ़व रे।''  समर्थन संपादक का जायज है जबकि लक्ष्मण मस्तुरिया इसी गीत में कहते हैं - '' कहाँ जाहू बड़ दूर हे गंगा, पापी इहाँ तरव रे।'' पाप क्यों करना ? पापी को सजा क्यों नहीं? तरण - तारण क्यों ? इस पर सर्वेद जी चुप ? छत्तीसगढ़ी भाषा में राजकाज शुरू करें संविधान सूची में जगह बना लेगी, देर - सबेर। हम क्यों आग्रह करें। काम तो शुरू करें। छग के हाईस्‍कूल  तक के पाठ्यक्रम में संस्‍कृत  के  स्थान पर छत्तीसगढ़ी भाषा को क्यों नहीं ला पा रहे हैं ? छत्तीसगढ़ी भाषा हेतु बिस्मार्क  जैसे नायक की जरुरत है। परसाई पर व्यंग्य विश्लेषक सौ फीसदी सटीक - मैंने जाना कि जीवन की सबसे सही व्यवस्था कार्ल्‍समार्क्‍स ने की ( पृ. 12,) कार्लमार्क्‍सीय  भारतीय दलों में फूट क्यों ? तुलना करें।
अपने हुनर को आजमाने चला हूं, फिसलती रेत पर घर बनाने चला हूं मैं। राजेश जगने( पृ. 33)
 मार्क्‍सदृष्टिकोण भारत का चकनाचूर नहीं पर बेरास्ता हो चुका समझे। विपात्र मुक्तिबोध कहानी से इसे समझ सकते हैं। दो मजबूत पैर में पुरुष सोच बदले तो स्त्री - पुरुष विमर्श कहां रहेगा। जीवन के लिए श्रमाधारित शिक्षा तो चाहिए ही। इसे नेस्तानाबूत करते हैं, मतदाता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि। वे चाहे दबंग हो, पूंजीपति या अकेले  डोरी, उन्हें कसना - छोडऩा पड़ता है। चुनाव मेरे शहर  द नाइटिंगल एण्ड द रोज़ का छत्तीसगढ़ी अनुवाद प्रेमदर्शन अध्यात्म में घालमेल से पत्रिका की सुंदरता को सौंदर्यमय कर दिया।
समीक्षाएं और अन्य साहित्य सामग्री पठनीय और संग्रहणीय है। छत्तीसगढ़ी भाषा बोली की बीमारी दूर कैसे हो उदाहरण पत्रिका में मौजूद है -
'' बस्तर ले निकल
मुनगा ला चुचर
बमलाइ मा चढ़
इही ला कथे छत्तीसगढ़ ''
' चढ़ ' शब्द क्या कहता है ? कौन सा संकेत है। बस्तर डायमंड है, छत्तीसगढ़ का खजाना है। और छत्तीसगढ़ में माताओं पर कैसे चढ़ोगे, सुविधाभोगी साहित्यकार ऐसे बिंब गढ़ रहे हैं। जहाँ छत्तीसगढ़ी भाषा समृद्धि की ओर नहीं विपन्नता की तरफ जायेगी। आखिर माँग पत्रों पर विचार न कर अमाँग पत्र जो होता नहीं कार्यवाही चालू होने से सोने की चिडिय़ा वाले छ.ग. में व्यापक भ्रष्टाचार तो है ही।
अनेक आग्रह पर अंचल के साहित्यकारों की कलम जरा थम सी गई है। सर्वेद भाई को रचनाएं उत्‍कृष्‍ट स्वरुप नहीं मिल पा रही है। वर्तमान बदलाव की। साहित्यिक आयोजनों में जनप्रतिनिधि को बुलाना प्रचार - प्रसार के लिए आवश्यक है? साकेत साहित्य परिषद की वार्षिक  समारोह बिना जनप्रतिनिधियों के पूर्ण होता ही नहीं।
पत्रिका उत्तरोत्तर स्तरीय सामग्री दे रही है पर संपादक को अंचल के साहित्यकारों की रचनाओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
यशवंत मेश्राम
शंकरपुर, वार्ड नं. - 7, 
गली नं. - 4, राजनांदगांव( छ.ग.)

कापीराइट के संबंध में

साहित्य - कला - संस्‍कृति की त्रैमासिकी पत्रिका विचार वीथी पूर्णत: अव्यवसायिक पत्रिका है। इस पत्रिका उद्देश्य पाठक को साहित्य - कला - संस्‍कृति  से जोडऩा तथा अधिकाधिक साहित्यिक गतिविधियों को पाठको  मध्य पहुंचाना है। इसमें प्रकाशित रचनाएं लेखको के स्वयं के विचार होते हैं। विचार वीथी में प्रकाशित रचनाओं से प्रकाशक - संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
इस पत्रिका में प्रकाशित रचनाएं विभिन्न श्रोतों से प्राप्त होती हैं। इस पत्रिका में किसी भी रचनाकार के रचना प्रकाशन के साथ उनका नाम दिया जाता है तथा यह प्रयास रहता है कि जिन रचनाकारों की रचनाएं प्रकाशित हुई उन तक भी विचार वीथी पहुंच सके जिससे उस रचनाकार को उचित सम्मान मिल सके तथा उनकी रचना से वे पाठकवर्ग भी जुड़ सके जो अब तक वह रचना नहीं पढ़ पाये हैं जो कि इस पत्रिका में प्रकाशित की जा रही है।
विचार वीथी का उद्देश्य किसी भी रचनाकार या प्रकाशक को किसी भी तरह की आर्थिक हानि पहुँचाना नहीं है। अपितु अच्छी साहित्य को अधिकाधिक पाठको के मध्य पहुंचाना है। फिर भी यदि किसी रचनाकार - कॉपीराइटधारक को कोई आपत्ति है तो उनसे अनुरोध कि साहित्य के प्रचार - प्रसार को ध्यान में रखते हुए विचार वीथी द्वारा अनजाने में हुई भूल को क्षमा करें तथा कॉपीराइट धारक को कोई आपत्ति हो तो वे पत्र व्यवहार या अन्य माध्यम से सम्पादक  को सूचित करे ताकि ऐसी रचनाएं जो कॉपीराइट के दायरे में आते हैं के प्रकाशन के पूर्व रचनाकारों - प्रकाशकों से सहमति पत्र लिया जा सके। 
विचार वीथी में प्र्रकाशित सामाग्री के किसी भी प्रकार के उपयोग के पूर्व लेखक प्रकाशक  - संपादक की सहमति अनिवार्य है 0  किसी भी प्रकार के वाद - विवाद एवं वैधानिक प्रक्रिया केवल राजनांदगांव( छ.ग.) न्यायालयीन क्षेत्र के अंर्तगत मान्य।

संपादक
विचार वीथी
17/297, पूनम कोलोनी, वर्धमान नगर
शिव मंदिर के पास, राजनांदगांव ( छ.ग.)
मोबाईल : 94241 - 11060
ई मेल : vicharvithi@gmail.com,editor.vicharvithi@gmail.com
web: www.vicharvithi.com 

मो. कासिम खॉन '' तालिब '' की दो ग़ज़लें


1
मक्रो, फऱेब, झूठ से जो बाज़ रहा है।
वो शख़्स खुदा के लिए मुमताज रहा है।
हर शाम को मग़रिब से ये कहता है आफ़ताब,
कायम हमेशां कब किसी का नाज़ रहा है
ये  इश्‍क क्या बला है, ये होता है क्यॅू भला
मुद्दत हुई के आज भी इक राज रहा है
बरबादियों का जश्न मनाने वो आ गए
अपनों की दिल्लगी का क्या अंदाज रहा है
सुनते ही अपने कान का रु़ख फेरने वालों
' तालिब ' तुम्हारे दिल की भी आवाज रहा है
2
इक जाम तहे - दिल से पिला क्यूँ नहीं देते।
दीवानगी को हद से बढ़ा क्यूँ नहीं देते।
ईमान हो नशा तो इबादत हो मयकशी,
ऐसा भी कोई दीन चला क्यूँ नहीं देते
चाहत है अगर उनकी तो ये भी मुझे कुबूल
जख़्मों के गुलिस्तान खिला क्यूँ नहीं देते
कुछ तो ग़म - फिऱाक के गौहर समेट लूं
अश्‍कों के समंदर में डुबा क्यूँ नहीं देते
झूलों के  इंतजार में पेड़ों की शाख है
सावन की घटाओं को बता क्यूँ नहीं देते
झोंके हो हवा के जो अगर आप तो मैं भी
जलती हुई शम्‍़आ हूँ बुझा क्यों नहीे देते
लेना है अगर आप को ' तालिब ' का इम्तेहाँ
पर्दे को दर्मियाँ से उठा क्यूँ नहीं देते
पता
14, अमीरकम्‍पाउण्‍ड
बी एन पी रोड, देवास ( म.प्र.)
मोबाईल : 97540383864

साक्षात रूप को


- डॉ. रामशंकर चंचल -
धनी जुल्‍फ़ोंके
बीच
झांकते
बेहद खुशनुमा
रंगीन
सुकोमल / नाजुक
मन को छु लेने वाले
अजीब कसक भरे
चेहरे को
मैंने कई बार
तस्वीरों में देखा
याद है
मैं तब उसे
अकसर
निहारता / उससे
बाते करता
सोचता
सचमुच यह चेहरा
दुनिया में है भी
या किसी कलाकार की
कल्पना है
पर आज जब
तुम्हारी कज़रारी
रेशमी घनी जुल्‍फ़ों के
बीच तुम्हारा
चेहरा देखा तो
देखता रह गया
मन नहीं माना
मैंने उसे अपनी
आँखों के साथ
अपने कैमरे में भी
कैद कर लिया
और मन ही मन
नमन करता रहा
उस ईश्वर को
जिसने कितनी
अद्वितीय कृति का
निर्माण किया
तुम्हारे रुप में
जो चाह रहा था
मैं
अपने दोनों हाथों में
थाम लूं
ईश्वर के इस
साक्षात रुप को।

पता 
माँ, 145, गोपाल कालोनी
झाबुआ - 457661 ( म.प्र.)

जिन्दगी एक कशिश

- डॉ. मणी मनेश्वर साहू '  ध्येय '  -
जिन्दगी एक कशिश है
है जीने की, एक तमन्ना
उद्धेलित भावनाएं
सिमटी - सी बैठी
दिल के एक कोने में
फिर अरमानों के उजालों में
रौशनी भरी
अचानक जगमगा उठी है - जिन्दगी
खुला आकाश
बहुत कुछ पाने की एक चाह लिये
परन्तु ... फिर ये क्या ?
सहमी - सी
फीकी पड़ी, मुरझा गई।
जरा सोच,
बैर को भगाना, बैर से बचना, बचाना
हाँ, यही तो है
सावधानी हमारी आपकी
जिन्दगी की।

पता 
पिताम्बर कुंज, गीतांजली चौक
नवागाँव खिसोरा, पो. - धौराभाठा
व्हाया - पाण्डुका, जिला - धमतरी ( छ.ग.)

डॉ. सुशील गुरू के पाँच छंद


कथन
 
तुमने कहा था कि नयनों से चला आना तुम,
नयनों से आया तो पलकों में बंद हो गया ।
अंतर छुआ तो चित चातक सा प्यासा हुआ,
प्राणों को छुआ तो प्राणों की सुगंध हो गया।
बाइबिल और कुरान की आयतों को छुआ,
तो मन रामचरितमानस का एक छंद हो गया ।
अधरों पे आया तो थोड़ा सा थरथराया,
कुछ और गुनगुनाया तो मन गुरुग्रन्थ हो गया।

स्पर्श
 
तुमने छुआ तो मुझे  जाने क्या हुआ है,
हुए प्रज्वलित दीपक अनेक रोम रोम में ।
महासिन्धु रोशनी के झिलमिलाने से लगे हैं,
चाँदनी के पुष्प खिले अंतस के व्योम में ।
तन में प्रवाहित हुई गंगा की पवित्रधारा,
स्वांति नेह झलका नैनों के दृष्टिकोण में।
पलकों के पोरों पर, अधरों के कोरों पर,
आमन्त्रण स्वत: मुखर हुआ मौन में ।

दृष्टि
तुमने देखा तो मानो सुधियों के फूल खिले,
सतरंगी रंग गई धूप की चुनरिया ।
चन्दन सा तन हुआ, चांदनी सा मन हुआ,
रोशनी में नहा गयी जलभरी बदरिया ।
नयनों से नयनों ने बोले अनबोले बोल,
कानों पे रख के कचनार की भुजरिया।
नेह के बुलउआ मिले, गले मिले बिना मिले,
गुपचुप बातें हो गईं बीच बजरिया।

श्रवण
तुमने सूना है सही काले अक्षर कागज़ पै,
गोरे गोरे जीवन का चित्र खींच जाते हैं ।
नेह के सम्बन्ध अनोखा स्नेह पैदा करते हैं, 
चाँदनी उगाते हैं, चकोर रीझ  जाते हैं ।
लिख दिया रख दिया जैसे दिया आरती का,
कागज़ के संग उड़ जाना सीख जाते हैं ।
बांहों में झुलाते कभी, कांधे पै उठाते कभी,
बड़ी बड़ी  आँखों वाले नैना रीझ जाते हैं ।

सुगन्ध
 
तुमने सुगंध मली चन्दन के गंध वाली,
उबटन मला कचनार काए संदल का ।
ऊषा का वरण मला, चन्दा का तरल मला,
सुकुमार अंगराग मला  गंगाजल का।
केसरी बदन ने जो नदिया का जल छुआ,
पल में ही हो गया गुलाबी रंग जल का ।
फूलों जैसी रसवाली  हुई है तुम्हारी देह,
पैंजनी जो छनकी  गुलाबी रंग छलका ।

पता 
53- बी, इन्‍द्रपुरी, भोपाल - 426 021 
मोबाईल : 94250 25430

केशव शरण की दो ग़ज़लें

1
मुद्दतों बाद ये हुआ भी है
हम मिले चांदनी हवा भी है
घूमते बातचीत करते हैं।
दृश्य भी शांत रास्ता भी है।
साज़ पत्तों के बज रहे सुन लो,
देख लो पेड़ नाचता भी है।
उसका बहना बहा रहा हमको,
जिसके बहने में एक अदा भी है।
क्या छुपाना है इस खुले में अब,
हाल दिल का तुम्हें पता भी है।
इक अजब प्यास है किये बेकल,
बिन पीये सोमजल नशा भी है।
आता - जाता नहीं इधर कोई,
एकदम प्राकृतिक  जगह भी है।
2
मिलन सुख याद आयेगा जि़यादा।
अकेलापन सतायेगा जि़यादा।
खयाल आयेगा जब भी गुलबदन का,
चुभन दिल में बढ़ायेगा जि़यादा।
हक़ीक़त  में गंवायेगा उसे तू,
मगर ख़्वाबो में पायेगा जि़यादा।
कलपकर और भी रोया करेगा,
फिर आंसू पोंछ गायेगा जि़यादा।
मुहब्बत इकतरफा रह गयी है,
ये भी अइसास छायेगा जि़यादा।
सुहाना जब कभी मौसम बनेगा,
वियोगी छटपायेगा जि़यादा।
भरी दुनिया में दिलबर के अलावा,
अलग रहना ही भायेगा जि़यादा।
पता 
एस 2/ 564, सिकरौल 
वाराणसी - 221 002 
मोबाईल : 094152 95137

आजादी की नई रोशनी


- डॉ. गार्गीशरण मिश्र '  मराल ' -

आज़ादी की नई रोशनी दिखा रही है दुनिया काली।
आज सिनेमा के स्वर में ही
गाती है हर एक अटारी,
आँख लगाना नहीं किसी से
मर जाना तुम मार कटारी।
सुन सुनकर संगीत मरण का जीती है जनता मतवाली।
नर का चरम विकास रह गया
खाना पीना मौज उड़ाना,
नारी के विकास की सीमा
नंदन की तितली बन जाना,
विद्युत के दीपों दिखती नवभारत की ज्योति निराली।
सत्य अहिंसा के मंदिर का
भूल रही है पथ आज़ादी,
खाकी के धागे से लटका
झूल रहा है गाँधीवादी,
मूल रही है सूख विटप की फूल रही है डाली - डाली।
आजादी की चमक कि  जिसमें
राम कृष्ण खो गये हमारे,
नानक, बुद्ध, मुहम्मद, ईसा
महावीर हैं हमसे न्यारे,
दिव्य ज्योतियाँ निगल विश्व में रात चली करने उजियाली।
पता 
1436 /बी सरस्वती कॉलोनी, 
चेरीताल वार्ड, जबलपुर - 482002  ( म.प्र.)

सपनों का गाँव

- इब्राहीम कुरैशी -

पर्वतों के साये में वादियों की बाहों में।
छोटा सा प्यारा सा एक मेरा गाँव था।।
अल सुबह गूंजती चिडिय़ों की बोलियां
मस्ती में घूमती हिरणों की टोलियां
इठलाती फिरती थी नाजुक जवानियां
गीत - ग़ज़ल सी लगे उनकी नादानियां
झरनों के झर - झर में हवाओं के सर - सर में
मदहोश धुन सा उतार और चढ़ाव था।
थी घाटियों में फूलों की सुंदर छटायें,
पर्वतों की चोटियों को चूमती घटाये,
लगता था रोज जहां बादलों का मेला,
सूरज ठुमकता बन छैला अलबेला,
नदियों के लहरों में सांझ और दुपहरों में,
मदमाता यौवन सा झूमता बहाव था।।
जाने कहां से एक जलजला सा आ गया
जो वादियों की धरती और आसमां पे छा गया,
समां गई थी बारुदी गंध अब बागो में,
बस धूऑ - धूऑ ही बाकी  था घर के चिरागों में,
तब रोशनी भी लूट गई जिंदगी बिखर गई,
बेवक्त बचपन में आ गया भटकाव था।
आस की  एक किरण न जाने कब आयेगी,
जो धरती और अंबर में दूर तलक छायेगी,
जीवन के आंगन में रंग उभर आएगा,
हर कोई  झूम - झूम गीत गुनगुनायेगा,
याद जो कभी करें तो बात हम यही कहें,
सपनों में आया वो कोई धूप छांव था।
पर्वतों के साये में वादियों की बाहों में,
छोटा सा प्यारा सा एक मेरा गाँव था।

पता
स्टेशन रोड, महासमुंद (छ.ग.) 493 445 
मोबाईल : 089827 33227

जिन्दगी की कतरन


- गजानन माधव मुक्तिबोध  -


 नीचे जल के तालाब का नज़ारा कुछ और ही है। उसके आस पास सीमेण्ट और कोलतार की सड़क और बँगले। किन्तु एक कोने में सूती मिल के गेरुए, सफ़ेद और नीले स्तम्भ के पोंगे उस दृश्य पर आधुनिक औद्योगिक नगर की छाप लगाते हैं। रात में तालाब के रुँधे बुरे बासते पानी की गहराई सियाह हो उठती है और ऊपरी सतह पर बिजली की पीली रोशनी के बल्बों का रेखाबद्ध निष्‍कम्‍प  प्रतिबिम्‍ब वर्तमान मानवी सभ्यता के सूखेपन और वीरानी का ही इज़हार करते से प्रतीत होते हैं। सियाह गहराई के विस्तार पर ताराओं के धुँधले प्रतिबिम्बों की  विपरित बिन्दियाँ भी उस कृष्ण गहनता से आतंकित मन को सन्तोष नहीं दे पातीं वरन् उसे उघार देती हैं।
तालाब के इस श्याम दृश्य का विस्तार इतनी अजीब - सी भावना भर देता है कि उसके किनारे बैठकर मुझे उदास,  मलिन भाव ही व्यक्त करने की इच्छा होती आयी है। उस रात्रि.श्याम जल की प्रतीक - विकरालता से स्फुट होकर मैंने अपने जीवन में सूनी उदास कथाएँ अपने साथियों के संवेदना - ग्रहणशील मित्रों को सुनायी हैं। यह तालाब नगर के बीचोंबीच है। चारों ओर सड़के और रौनक होते हुए भी उसकी रोशनी और खानगी उस सियाह पानी के भयानक विस्तार को छू नहीं पाती है। आधुनिक नगर की सभ्यता की दुखान्त कहानियों का वातारवण अपने पक्ष पर तैरती हुई वीरान हवा में उपस्थित करता हुआ यह तालाब बहुत ही अजीब भाव में डूबा रहता है।
फिर इस गन्दे, टूटे घाटवाले, वुरे - बासते तालाब के उखड़े पत्थरों - ढके  किनारे पर निम्न मध्यवर्गीय पढ़े - लिखे अहलकारों और मुंशियों का जमघट चुपचाप बैठा रहता है और आपस में फुसफुसाता रहता है। पैण्ट - पज़ामों और धोतियों में ढके असन्तुष्ट प्राणमन सई. साँझ यहाँ आ जाते हैं, और बासी घरेलू गप्पों या ताजी राजनीतिक वार्ताओं की चर्चाएँ घण्टा,आधा घण्टा छिड़कर फिर लुप्त हो जाती हैं और रात के साढ़े आठ बजे सड़के सुनसान, तालाब का किनारा सुनसान हो जाता है। एक दिन मैं रात के नौ बजे बर्माशेल में काम करने वाले नये दोस्त के साथ जा पहुँचा था। हमारी बातचीत महँगाई और अर्थाभाव पर छिड़ते ही हम दोनों के हृदय में उदास भावों का एक ऐसा झोंका आया जिसने हमें उस विषय से हटाकर तालाब की सियाह गहराइयों के अपार जल - विस्तार की ओर खींचा। उस पर ध्यान केन्द्रित करते ही हम दोनों के दिमाग में एक ही भाव का उदय हुआ।
मैंने अटकते - अटकते वाक्य के सम्पूर्ण विन्यास के लिए अपनी वाक्शक्ति करे जबरदस्ती उत्तेजित करते हुए उससे कहा-  '' क्यों भाई,आत्महत्या ... आत्महत्या के बारे में जानते हो। उसका मर्म क्या है। जवाब मिला, जैसे किसी गुहा में से आवाज आ रही हो।
-क्यों, क्यों पूछ रहे हो। स्वयं आत्हत्या के सम्बन्ध में कई बार सोचा था। आत्म - उद्घाटन के मूड में, और गहरे स्वर से साथी ने कहा-  मेरे चचा ने खुद आत्महत्या की मैनचेस्टर गन से। लेकिन ... उसके  इतने कहने पर ही मेरे अवरुद्ध भाव खुल - से गये। आत्महत्या के विषय में अस्वस्थ जिज्ञासा प्रकट करते हुए मैंने बात बढ़ायी। हरेक आदमी जोश में आकर आत्महत्या करने की कसम भी खा लेता है। अपनी उद्विग्न चिन्तातुर कल्पना की दुनिया में मर भी जाता है,पर आत्महत्या करने की हिम्मत करना आसान नहीं है। बायोलॉजिकल शक्ति बराबर जीवित रखे रहती है।
दोस्त का मन जैसे किसी भार से मुक्त हो गया था। उसने सच्चाई भरे स्वर में कहा- मैं तो हिम्मत भी कर चुका था, साहब! डूब मरने के लिए पूरी तौर से तैयार होकर मैं रात के दस बजे घर से निकला, पर इस सियाहपानी की भयानक विकरालता ने इतना डरा दिया था कि किनारे पर पहुँचने के साथ ही मेरा पहला खयाल मर गया और दूसरे खयाल ने जिन्दगी में आशा बाँधी। उस आशा की कल्पना को पलायन भी कहा जा सकता है। प्रथम भाव - धारा के विरुद्ध उज्ज्वल भाव - धारा चलने लगी। सियाहपानी के आतंक ने मुझे पीछे हटा दिया ... बन्दूक से मर जाना और है, वीरान जगह पर रात को तालाब में मर जाने की हिम्मत करना दूसरी चीज। मित्र ठठाकर हँस पड़ा। उसने कहा - आत्महत्या करनेवालों के निजी सवाल इतने उलझे हुए नहीं होते जितने उनके अन्दर के विरोधी तत्व। जिनके आधीन प्रवृत्तियों का आपसी झगड़ा इतना तेज हो जाता है कि नई ऊँचाई छू लेता है। जहाँ से एक रास्ता जाता है जिन्दगी की ओर, तो दूसरा जाता है मौत की तरफ जिसका एक रूप है आत्महत्या। मित्र के थोड़े उत्तेजित स्वर से ही मैं समझ गया कि उसके दिल में किसी कहानी की गोल - मोल घूमती भँवर है। उसके भावों की गूँज मेरी तरफ  ऐसे छा रही थी मानो एक वातावरण बना रही हो।
मैं उसके मूड से आक्रांत हो गया था। मेरे पैर अन्दर नसों में किसी ठण्डी संवेदना के करेण्ट का अनुभव कर रहे थे। उसके दिल के अन्दर छिपी कहानी को धीरे से अनजाने निकाल लेने की बुद्धि से प्रेरित होकर मैंने कहा - यहाँ भी तो आत्महत्याएँ हुई हैं। यह कहकर मैंने तालाब के पूरे सियाह फैलाव को देखा। उसकी अथाह वाली गहराई पर एक पल नजर गड़ायी। सूनी सड़कों और गुमसुम बँगलों की ओर दृष्टि फेरी और फिर अँधेरे में अर्ध - लुप्त किन्तु समीपस्थ मित्र की ओर निहारा और फिर किसी अज्ञेय संकेत को पाकर मैं किनारे से जरा हटकर एक  ओर बैठ गया। फिर सोचा कि दोस्त ने मेरी यह हलचल देख ली होगी। इसलिए उसकी ओर गहरी दृष्टि डालकर उसकी मुख - मुद्रा देखने की चेष्टा करने लगा।
दोस्त की भाव - मुद्रा अविचल थी। घुटनों को पैरों से समेटे वह बैठा हुआ था उसका चेहरा पाषाण - मूर्ति के मुख के अविचल भाव - सा प्रकट करता था। कुछ लम्बे और गोल कपोलों की मांसपेशियाँ बिलकुल स्थिर थीं। या तो वह आधा सो रहा था अथवा निश्चित रूप से भावहीन मस्तिष्‍क के साँवले धुँधलेपन में खो गया था। कि किसी घनीभूत चेतना के कारण निस्तब्धता - सा लगता था। मैं इसका कुछ निश्चय न कर सका। मेरी इस खोज - भरी दृष्टि से अस्थिर होकर उसने जवाब दिया।   क्यों, क्या बात है ? उसके प्रश्न के शान्त स्वर से सन्तुष्ट होकर मैंने दोहराया - इस तालाब में भी कइयों ने जानें दी हैं !
- हाँ, किन्तु उसमें भी एक विशेषता है।  उसके अर्थ भरे स्वर में हँसते हुए कहा। फिर वह कहता गया-  इस तालाब में जान देने आये हैं जिन्हें एक श्रेणी में रखा जा सकता है। जिन्दगी से उकताये और घबराये पर ग्लानि के लम्बे काल में उस व्यक्ति ने न मालूम क्या - क्या सोचा होगा ! अपनी जिन्दगी की ऊष्मा और आशय समाप्त होता जान,उसने अनजाने - अँधेरे पानी की गहराइयों में बाइज़्जत डूब मरने का हौसला किया और उसे पूरा कर डाला। तुम तो जानते हो,अधेड़ तो वह था ही, बाल - बच्चे भी न थे। कोई आगे न पीछे। उसकी लाश पानी में न मालूम कहाँ अटक गयी थी। तालाब से सड़ी बास आती थी। किन्तु जब लाश उठी तो उसकी तेलिया काली धोती दूर तक पानी में फैली हुई थी। उसी तरह तुम्हारा तिवारी। वह पुरे की तेलिन, पाराशर के घर की बहू। ये सब सामाजिक,पारिवारिक उत्पीडऩ के ही तो शिकार थे।
उसके इन शब्दों ने मुझमें अस्वस्थ कुतूहल को जगा दिया। मेरी कल्पना उद्दीप्त हो उठी। आँखों के सामने जलते हुए फॉसफोरसी रंग के भयानक चित्र तैरने लगे, और मैं किसी गुहा के अन्दर सिकुड़ी ठण्डी नलीदार मार्ग के अँधेरे में उस आग के प्रज्वलित स्थान की ओर जाता - सा प्रतीत हुआ जो उस गुहा किसी निभृतकोण में निरुद्ध होकर जल रही है ? जिस आग में मानो किन्हीं गुरूर आदिम निवासियों ने जो वहाँ दीखते नहीं लापता है। मांस के वे टुकड़े भूने जाने के लिए रखे हैं जो मुझे ज्ञात होते से लगते हैं कि वे किस प्राणी के हैं, किस व्यक्ति के हैं।

अपना घर

- ज्योतिर्मयी पन्त -

नंदिनी आज अजीब ऊहापोह में थी। प्रिया उसे अपने साथ ले जाने की जिद पर अड़ी हुई थी। पिछले कई वर्षों से वह अपने मायके । यानी भाई के साथ रह रही थी। यहाँ वह बहुत खुश थी या अपनी मजबूरी से रहने आई थी ऐसी बात नहीं थी। एक तरह से नजरबंद कैदी सी हालत थी। पर करे तो क्या करे क्‍या ।  लाज निभानी ही थी। भैया ही उसे कौन अपनी ख़ुशी से लिवा लाये थे। भाई होने का फर्ज ही तो निभा रहे थे। मालूम तो था उन्हें कि उन्हें साथ ले आने से पत्नी भी नाराज होगी और उन पर जिम्मेदारी का बोझ भी बढेगा। । लेकिन उस समय के हालात में और कोई रास्ता भी नहीं था। नंदिनी के पति सुभाष का अचानक निधन हो गया था। अपनी कोई औलाद तो थी नहीं। भाई भतीजे भी अब अपनी मजबूरियों का आलाप करने लगे।
असल बात भी यही थी कि नंदिनी दो तीन बार माँ बनते -  बनते रह गई। हर बार तीन चार माँह में ही गर्भपात हो जाता। बड़े परिवार की जिम्मेदारियों को निभानें में व्यस्त पति न तो उनका  ध्यान रख पाया न इलाज कराने किसी अस्पताल ही ले जा पाया। घरेलू इलाज और वैद्यों और दाइयों के बताये रास्तों पर चलती गयी। बाद में डाक्टरों ने बता दिया कि वह अब माँ नहीं बन पायेगी।
सास ससुर के पास इस समस्या का आसान उपाय था ही। सुभाष का दूजा व्याह रच दिया जाय। नंदिनी या तो इसी घर में पड़ी रहे। खाने पीने की कमी तो थी नहीं या फिर मायके चली जाएगी। लेकिन सुभाष को ये बात ठीक न लगी। इसमें पत्नी का क्या दोष घर में इतने बच्चे हैं उन्ही से दिल जुड़ा लेंगे। पर माँ पिता जी न माने। कहते ' अरे !अभी ये कहना आसान है। बाद में सब अपने - अपने बच्चों को लेकर इधर - उधर रहने लगेंगे। अपना खून अपना ही होता है। बुढ़ापे का सहारा तो अपनी ही संतान होगी न ? कई वर्षों की जिद्दोज़हद और मान - मनौवल के बाद तय हुआ कि वे बच्चा गोद ले लेंगे।
नंदिनी की दूर के रिश्ते की चचेरी बहन कई लड़कियों को जन्म देने की सजा भुगत रही थी। इस बार भी पता चला था कि गर्भ में न्या भ्रूण ही पल रहा है और उसे मार गिराने की कोशिशें चल रही हैं। इसीलिए वे शहर आये थे और नंदिनी से मिलने पर उसे ये बात पता चली थी। उधर डाक्टरों ने गर्भ गिराने से मना कर दिया। देरी हो चुकी थी माँ की जान को भी खतरा हो सकता है, चचेरी बहन का कहना था कि जान जाने का खतरा इतना नहीं जितना परिवार की प्रताडऩा और अवहेलना का । तीन बेटियाँ हैं और चौथी अगर पैदा हुई भी तो जी न पायेगी। उसकी दुखभरी व्यथा - कथा में सुभाष और नंदिनी को एक किरण दिखाई दी। तभी तय हुआ था कि नंदिनी की चचेरी बहन हिमानी की संतान को नंदिनी और सुभाष गोद ले लेंगे। इस बात के लिए दोनों घरों में कई - कई दिनों तक विचार विमर्श भी चलते रहे। जब तक काम संपन्न न हो कुछ कहा भी तो नहीं जा सकता था। अगर हिमानी ही बाद में मना कर दे तो ?  हिमानी के घरवाले या खुद सुभाष और नंदिनी के घर के लोग तो ,खैर।
अब सिर्फ  प्रतीक्षा ही कर सकते थे। समय आने पर बात बन गयी। हिमानी अश्रुपूरित नयनों से नन्हीं सी बेटी को नंदिनी की गोद में डाल गयी । अन्य बेटियों की तुलना में कम से कम एक को तो हर समय बेटी के रूप में जन्म लेने का अहसास बार बार नहीं कराया जायेगा। और इसे तो अपने से दूर करवाने का सोचकर ही वह यहाँ आई थी। अब वह जीवित रह सकेगी। उसके घर में अगर बेटी का इतना मान होता तो क्या मरवाने भेजते। चलो इस पाप कर्म से मुक्ति तो मिली नंदिनी की सहायता से।
नन्हीं प्रिया के आने से नंदिनी की दुनिया ही बदल गयी थी । कई वर्षों के बाद नंदिनी और सुभाष ने प्रिया प्रिया सारी सच्चाई बता भी दी थी। कोई बाहर के लोग बताएँ और बिटिया को दु:ख पहुँचे ,ऐसा वे कतई नहीं चाहते थे। हिमानी से भी उसे मिलाया और बहनों से भी। दोनों ही परिवार आपस के इस रिश्ते को निभा रहे थे।
प्रिया को दोनों ही घरों में स्नेह मिलता। सभी कुछ तो ठीक ही चल रहा था। पर घर के अन्य सदस्य जब प्रिया की खुशियों भरी जिंदगी देखते तो उन्हें यह सहन नहीं होता। वे चाहते क्या नंदिनी उनकी संतान को नहीं अपना सकती थी ? कभी कभी वे प्रिया को भी ये जाता देते कि वह इस घर की बेटी नहीं है। कभी कभी नंदिनी को भी उकसा देते पराई संतान तो पराई ही होती है उस पर भी ये तो लड़की है उसे तो ससुराल जाना ही होगा शादी के बाद। । यहीं तो नहीं रहेगी न। कभी अपने घर ही लौट जाये तो भविष्य किसने देखा है चलो जो भी हो ।
सुभाष के रहते उससे कभी किसी ने कुछ न कहा। नंदिनी को भी सुभाष दूसरों की बात पर ध्यान न देने को कहता। उसे समझाता , तुम्हें अपने काम से मतलब रखना चाहिए। लोग तो ऐसे ही कुछ न कुछ कहते ही रहेंगे।
प्रिया पढऩे लिखने में बहुत होशियार थी और व्यवहार में भी बहुत अच्छी थी। अभी वह बारहवीं कक्षा में थी और उसकी  इच्छा थी कि वह इंजीनियर बने। पर सुभाष के अचानक स्वर्ग सिधार जाने से घर और उसमें रहने वाले लोगों की जिंदगी में तूफान सा आ गया। प्रिया को तो नंदिनी और सुभाष ने ख़ुशी से अपना लिया था। मानवीय संबंधों के आधार पर वह उनकी हो गयी थी पर उन्हने कोई कागजी कार्यवाही नहीं की थी अर्थात उसे कानूनी तौर पर गोद नहीं लिया गया था। परिवार के लोग चाहते भी नहीं थे कि घर में उसकी हिस्सेदारी भी हो। यहाँ तक तो ठीक मान भी लिया जाता पर हद तब हो गई जब वे नंदिनी को भी सहारा देने में आनाकानी करने लगे। जब कि घर और जमीन में सुभाष का भी हिस्सा था और वह अच्छा बैंक बैलेंस भी छोड़ गया था। बेटी को इंजीनियर बनाने की चाहत थी उसकी शादी के सपने संजोये थे।
सुभाष के चले जाने के बाद दो तीन महीने ही मुश्किल से बीते थे कि घर की हालत दिन पर दिन खराब होती गई। रोज ही किसी न किसी बात पर तनाव,कहा सुनी,मनमुटाव बढऩे लगे। इसी बीच नंदिनी के भाई राकेश अपनी बहन से मिलने आये थे। सारी बातें जानने के बाद उन्हें लगा कि बहन को साथ ले जाना ठीक होगा। यहाँ तो उसका जीना मुश्किल हो रहा है। पर प्रिया का क्या करें एक तो उसका कॉलेज में फाइनल वर्ष है और उसको भी साथ ले जाने का अर्थ है अपने ऊपर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ाना कई साल पहले उसने भी तो नंदिनी को कहा था कि उसी का बच्चा गोद ले लेती।
नंदिनी जाना ही नहीं चाहती थी। जैसा भी हो यही तो उसका घर है। यहीं तो डोली में आई थी और अब अर्थी में ही यहाँ से जाना चाहिए न प्रिया को छोड़कर वह रह भी नहीं पाएगी क्या यही प्रेम और वात्सल्य है जब खुद को जरुरत थी तो अपना लिया अब किसी मजबूरी में छोडऩे की । बात यानि कि अपनी बेटी और अपनी बेटी जैसी में। इतना फर्क  कर देना स्वार्थ की परिकाष्ठा होगी। वह बहुत दुखी थी। तभी प्रिया ने ही माँ को समझाया वह परीक्षा तक घर पर रह लेगी। बाद में उसे किसी होस्टल में प्रवेश दिला देना बस कुछ ही साल गुजारने पड़ेंगे फिर उन्हें कोई दूर नहीं कर सकेगा ।
इसी बीच हिमानी भी मिलने आई। उसने नंदिनी से कहा कि वह चिंता न करे अगर उचित लगे तो प्रिया को लेकर वह उसके घर चले। प्रिया के स्वावलंबी बनने तक पर नंदिनी उसका प्रस्ताव न मान सकी। इससे उसके अपने घर और भाई की इज्जत पर लोग ऊँगली उठाते। पर ये बात तय हो गयी कि प्रिया की चिंता कम हो गयी अब वह अपने घर में या माँ के घर में रह सकती थी। बाद में होस्टल या जो भी हो । 
नंदिनी अपने भाई के घर पहुँच गयी। कुछ दिन बड़ा आराम मिला,आव भगत भी हुई। लेकिन धीरे धीरे स्नेह के स्रोत रीतने से लगे। भाभी भी रूखा व्यवहार करने लगी। अनचाहा बोझ पड़ गया था। नंदिनी को महसूस होने लगा कि मायका माँ पिता के साथ ही होता है । अब यह घर भी उसके लिए पराया ही है। लेकिन करे तो क्या करे ? जाये तो कहाँ जाये ? सारा जीवन एक यात्रा जैसा ही है सभी घर । जिसे अपना समझ के रहने योग्य बनाने के प्रयास में एक स्त्री की जिंदगी बीत जाती है वह अपना होता ही नहीं।  पिता का घर ,पति का घर भाई का घर या बेटे का घर। पर अपना नहीं। शायद इसी कारण आज वह भाई के घर पर है। यहाँ दिन भर घर के कामों में सहायता करती है पति की पेंशन भी उनके हाथों सौंप देती है। जिन्दगी जीने का अंदाज ही बदल गया अब दिनों की गिनती ही सबसे बड़ा काम है। आज बीता अब कल फिर कल। कभी बीमार भी होती तो चुप लगा लेती। भाभी सोचती बहाना है बस।
अवसाद के क्षणों में उसे पुरानी बातें याद आती काश बेटा होता तो ये दिन न देखने पड़ते। प्रिया का सहारा भी नहीं है। पता नहीं पढाई पूरी करने के बाद क्या होगा। उसके सपने पूरे करने की जिम्मेदारी मेरी थी पर मैं ही क्यों कमजोर पड़ गयी। अपने हक के लिए तो मुझे प्रयास करना चाहिए था क्यों दोनों के जीवन को दाँव पे लगा दिया,और अब क्या कर सकती है ? भाई के बच्चे कभी कभार बात कर लेते तो ख़ुशी से निहाल हो जाती वर्ना तो भीड़ में भी अकेली सी मायूस रहती।
इस बीच प्रिया इंजीनियर का कोर्स कर चुकी थी और अब नौकरी की तलाश में थी। एक दो बार आरम्भ में मिलने आई थी तो किसी ने ख़ुशी जाहिर नहीं कि बल्कि कुछ न कुछ तानें देकर दोनों का दिल दुखाया था नंदिनी ने तब उसे आने से मनाकर दिया था।
अब आज नंदिनी आई थी। जिद पर अड़ी थी कि अब कुछ कहना सुनना नहीं। बस साथ चलना है। अगर कपड़े लत्ते समेटने हैं तो ठीक वर्ना उसकी भी आवश्यकता नहीं । उसे बेंगलुरु में बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है बड़ी कंपनी में घर भी मिला है । उसे पढाई के लिए स्‍कालरशिप मिलती रही अत: सुभाष ने जो पैसे उसकी पढाई और शादी के लिए रखे थे वे सुरक्षित हैं। उससे अब वे एक घर खरीद सकते हैं। कम्पनी और बैंक से लोन मिल सकता है। अब नंदिनी की पसंद से वे एक फ़्लैट खरीद लेंगे। अब चिंता और दु:ख भरे दिन बीत गए माँ। अब तुम अपने घर में रहोगी अपनी बेटी के साथ। आज शाम को ही चलना होगा। नंदिनी उसको आश्चर्य से अपलक निहारती रह गई। सोचने लगी खुद के लिए न सही पर प्रिया के भविष्य और उसकी इस आत्मनिर्भर रहने की सोच का साथ उसे देना ही चाहिए। वह उसकी तरह किसी सहारे की मोहताज नहीं थी।
नंदिनी दुविधा में पड़ गयी क्या जाना ठीक होगा। बात सभी के सामने हो रही थी नंदिनी को फिर भी उम्मीद थी कि भाई भाभी उसे रोकेंगे और यहीं रहने का आग्रह करेंगे। लेकिन एक चुप्पी सी छाई हुई थी सुबह प्रिया के आने से सभी असमंजस में थे । पर अब भाभी के चेहरे पर एक चमक सी दिखाई दी। बड़ी बेटी डौली से बोली - अरे। । बैठी क्या है। प्रिया के लिए चाय तो ले आए, फिर जल्दी से खाना बनाना है प्रिया अपनी माँ को लेने आई है। आज नंदिनी बुआ अपनी बेटी के साथ जा रही हैं। नंदिनी जैसे मूर्छा से जागी। हाँ भाभी! ठीक कहा आपने। मैं भी तैयार हो जाऊँ।। समय बहुत कम है, कह कर उठ गई
लगभग दो घंटे में नंदिनी तैयार हो गई । उसे सुभाष की बहुत याद आ रही थी। कितना भरोसा था उन्हें अपनी परवरिश पर और बेटी पर । तीसरे दिन नंदिनी अपनी बेटी के साथ उसकी कंपनी वाले घर पहुँच गई थी शाम को प्रिया उसे फ़्लैट दिखाने ले गई ।  उसे वह पसंद आ गया कुछ ही दिनों में रहने के लिए तैयार हो जायेगा दोनों माँ बेटी कितने वर्षों की बातें याद कर रही थी आज प्रिया को अपनी माँ और नंदिनी को बेटी और अपना घर मिल गया था सपनों में बसे अपने घर की कल्पना में वह खो सी गई।

पता - ए 45, रीजेंसी पार्क 1, डी एल एफ फेस 4,
गुडगाँव हरियाणा- 112002

विष्णु भगवान के पदचिन्ह

कुबेर
मूल कथा : Marks of Vishnu 
छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद- विष्‍णु भगवान के पदचिन्‍ह
मूल कथाकार - खुशवंत सिंह
अनुवाद - कुबेर

’’ये ह कालिया नाग खातिर’’ सासर म दूध ल ढारत-ढारत गंगा राम ह किहिस - ’’रोज संझा कुन कोठ तीर के बिला मेर मंय ह येला मढ़ाथंव अउ बिहिनिया के होवत ले दूध ह सफाचट हो जाथे।’’
’’का पता, बिलई ह पीयत होही।’’ हम नवजवान मन वोला सुझाव देयेन।
’’बिलई!’’ गंगा राम ह हमन के घोर निंदा करिस अउ किहिस - ’’ये बिला के नजीक कोनो इलई-बिलई नइ जा सकय। इहाँ कालिया नाग ह रहिथे। मंय ह वोला जब ले दूध पिलावत हंव, घर के कोनों ल वो ह डसे नइ हे। तुमन बिना पनही-चप्पल के चल सकथव, बेधड़क जिहाँ चाहव खेल सकथव।’’
हमला गंगा राम के संरक्षण के कोनों जरूरत नइ रिहिस।
’’डोकरा पंडित, तंय ह मूरख हस।’’ मंय ह केहेंव - ’’साँप ह दूध नइ पियय, का तंय नइ जानस ? कोनों सांप ह एक सासर दूध ल नइ पी सकय। हमर गुरूजी ह बताथे कि साँप ल गजब दिन के बाद म भूख लगथे। कतरो दिन म वो ह कुछू खाथे। एक घांव कांदी म हमन एक ठन सांप देखे रेहेन जउन ह मेचका ल लीलत रहय। मेचका ह वोकर टोंटा म गांठ बरोबर अटके रहय। मेचका के पचे म अउ पुछी तक जाय म कतरो दिन लगथे। हमर स्‍कूल के प्रयोगशाला म स्पिरिट (मेथिलेटेड स्प्रिट) म डूबे दर्जनों साँप हे। पीछू महीना हमर गुरूजी ह नकडेवन बजइया मन कना ले एक ठन सांप लेय रिहिस जउन ह दुनों डहर ले रेंगय। वोकर पुछी डहर घला मुड़ी अउ आँखी रिहिस हे। कांच के जार म जब वोला ओइलाइस, वोकर हालत ह देखे के लाइक रिहिस। प्रयोगशाला म अउ दूसर जार नइ रिहिस तउने पाय के गुरूजी ह विही एके ठन ल लेइस। वो ह करैत साँप रिहिस। वोकर मुड़ी-पुछी दुनों डहर ल धर के कांच के जार म ओइला दिस अउ जार के डंकना ल धरारपटा ढांक दिस। भीतर वो ह गोल-गोल गुरमुटा गे अउ अब तो वो सड़-गल गिस हे।
ये बात ल सुन के गंगा राम ल अबड़ दुख होइस अउ अपन दुनों आँखीं मन ल मूंद के वो ह भगवान के नाव जपे लगिस।
’’तुंहला अपन करनी के फल एक न एक दिन भेगे बर पड़ही। हाँ, जरूर भोगे बर पड़ही।’’
गंगा राम संग बहस करे म कोनों फायदा नइ रिहिस। वो ह एक कट्टर हिन्दू रिहिस हे जउन ल दुनिया के रचयिता ब्रह्मा, पालनहार भगवान विष्णु, अउ संघार करने वाला भगवान शिव के ऊपर पक्का विश्वास रिहिस हे, सब ले जादा भगवान विष्णु के वो ह भक्त रिहिस हे। रोज बिहिनिया वो ह पूजा-पाठ करतिस अउ माथा म चंदन ' v ' आकार के भगवान विष्णु के टीका लगातिस। हालाकि वो ह ब्राह्मण रिहिस, अनपढ़़ अउ अंध विश्वासी रिहिस। वोकर अनुसार दुनिया म सब जीव ह पवित्र हे, चाहे वो ह साँप होय,  बिच्छू होय, कनखजूरा होय। जब वो ह कोनों साँप बिच्छू ल देखतिस, वोला तुरते दुरिहा खेदार देतिस ताकि वोला कम से कम हमन झन मार सकन। कोनों दतैया ल जब हमन अपन बेडमिंटन रैकिट म फांसे के कोशिश करतेन तब वो ह वोला तुरते बचाय के कोशिश करतिस। वोकर नुकसान होवल पंख मन के देख-भाल करे के कोशिश करतिस। ये कोशिश म कभू-कभू वोला डंक खाय बर घला पड़ जाय। सांप ह वोकर ये विश्वास ल डिगा नइ सकय। सब ले जादा खतरनाक जानवर सांप ह होथे फेर वोकर बर इही ह सब ले जादा पूजनीय रिहिस। वहू म डोमी, कालिया नाग ह वोकर खातिर सबले जादा पूजनीय रिहिस।
’’तोर कालिया नाग ह हमला दिख गे तब हम वोला मार देबोन।’’
’’अइसन भूल के झन करना। वो ह सैंकड़ों गार पारे हे। तुम यदि वोला मारेय तब वो सब्बो गार मन ले एक - एक ठन कालिया नाग निकलही अउ वो मन ह तुँहर घर भर म छाप जाहीं। तब तुमन का करहू ?’’
’’हम वोला जिंदा धर-धर के मुंबई भेज देबोन। उहाँ वोला दुहहीं, वोकर बिख ल निकाल के साँप डसे के बिख उतारे के दवाई बनाहीं। एक ठन जिंदा साँप के दू रूपिया देथें। तब तो सीधा-सीधा दू सौ रूपिया के कमाई हो जाही।’’
’’तुँहर डॉक्टर मन के थन होवत होही। साँप के थन मंय ह कभू नइ देखे हंव। फेर कहि देथंव! वोला छुए के कोशिश कभू झन करना। वो ह फनियार नाग हरे, वोकर कतरो अकन फन हे। मंय ह वोला देख डरे हंव। वो ह तीन हाथ लंबा हे। वोकर फन ह अइसन हे,’’ गंगा राम ह अपन हाथ के हथेली ल खोल के फन सरीख बना के बताइस अउ अपन मुड़ी ल डेरी-जेवनी डोलाय लगिस। ’’तुम वोला आँगन (लॉन) म घाम तापत देख सकथव।’’
’’तोर ये बात ले साबित हो गे कि तंय ह झुठल्ला हस। फनियार साँप ह नर होथे, तब वो ह सौ-सौ ठन गार पारिच् नइ सकय। तब तो वो गार मन ल जरूर तहिंच ह पारत होबे।’’
हमर दल म सब झन जोरदार ठठा हे हाँस दिन।
’’जरूर गंगराम के गार होही, तब तो एके संघरा सौ-सौ झन गंगा राम देखे बर मिलही।’’
गंगा राम ह चुरमुरा के रहिगे। बहुँत झन नौकर रहंय फेर लइका मन गंगा राम संग जादा मस्ती करंय। वो मन वोला रोज नवा-नवा तरीका ले सतातिन। येमा कोनों मन धरम ग्रंथ नइ पढंय। महात्मा के अहिंसा संबंधी बिचार ल घला नइ जानंय। इंकर तीर चिड़ीमार बंदूक हे जउन म चिराई मन ल मारथंय, अउ जार हे स्पिरिट के, साँप मन ल धरे बर।
गंगा राम ह अपन बिचार ल जीवन के पवित्रता संग जोड़ के देखय। वो ह साँप ल दूध पियाय, वोकर रक्षा करय, काबर कि दुनिया म साँप ह भगवान के  सब ले जादा क्रोधी रचना आय। वोला मारे के बजाय वोकर संग प्रेम करव, तब तुमन अपन आप ल साबित कर सकथव।
गंगाराम ह अपन आप ल सिद्ध करना चाहत रिहिस। वोकर बिचार ह भले साफ-साफ समझ म नइ आय फेर वो ह खुद ल साबित करेच् बर रोज सांझकुन साँप के बिला तीर म सासर भर दूध मढ़ातिस जउन ह बिहिनिया के होवत ले सफाचट हो जाय रहितिस। 0
एक दिन हमन एक ठन कालिया नाग देखेन। अषाड़ लग गे रिहिस (मानसून ह सक्रिय हो गे रिहिस) अउ वो दिन रातभर पानी गिरे रिहिस। धरती, जउन ह सूरज के तपन के मारे हलाकान हो गे रिहिस, जीव-जंतु अउ आनंद ले फेर भर गे रिहिस। नान-नान डबरा मन म मेचका मन ह टोरटोरावत रिहिन। चारों मुड़ा चिखलच् चिखला हो गे रिहिस जउन म गेंगड़ुवा, कनखजूरा अउ मखमली बीरबहूटी मन  रेंगत रहंय। केला के पाना मन घला हरियर-हरियर छितराय रहंय। कालिया नाग के बिला म पानी भर गे रिहिस होही अउ वो ह आंगन म एक ठन सुक्खा असन जघा म मेंडऱी मारे बइठे रहय। सूरज के अंजोर म वोकर करिया, चमकदार फन ह चमकत रहय। वो ह बड़े जबर रिहिस, कम से कम छै फुट के रिहिसेच् होही अउ मरूवा कस मोट्ठा रिहिस होही।
’’वो देख, डोमी साँप। चलो वोला पकड़बोन।’’
कालिया नाग ल पकडऩा सरल नइ होवय। जमीन ह चिखलहूँ हो गे रिहिस। बिला अउ नाली मन म पानी भर गे रिहिस। गंगा राम ह घर म नइ रिहिस।
कालिया नाग ह कुछू खतरा भांप पातिस वोकर पहिलिच हमन वोला घेर लेयेन। हमन के हाँथ म बाँस के लउठी रिहिस हे। कालिया नाग ह हमन ल देख के जोर-जोर से फुफंकारे लगिस। वोकर आँखी मन अंगारा कस बरे लगिस अउ लुकाय बर वो ह केरा पेड़ डहर रेंगे लगिस।
जमीन ह एकदम दलदली हो गे रिहिस जउन म वो ह घिसटत रिहिस। मुश्किल से पाँच गज सरके रिहिस होही जब एक ठन लउठी ह वोकर पीठ म बीचों बीच दनाक ले परिस अउ वोकर कनिहा ह टूट गे। रकत संग वोकर लादी-पोटा ह निकल गे अउ चिखला म सना गे। वोकर मुड़ी ह कुछू नइ होय रिहिस हे।
’’वोकर मुड़ी ल झन कुचरो,’’ एक झन संगवारी ह चिल्ला के किहिस - ’’कालिया नाग ल पकड़ के हमन अपन स्‍कूल म लेगबोन।’’
वोकर पेट खाल्हे लउठी डार के वोला हमन उठायेन अउ बिस्‍कुट के एक ठन टीपा म भर के टीपा ल डोरी म कस के बाँध देयेन। टीपा ल खटिया खाल्हे लुका देयेन। रात म गंगा राम ह मोरे तीर रिहिस। मंय ह सांप खातिर सासर म दूध मड़ाय के वोकर अगोर करत रेहेंव। ’’आज रात तंय ह अपन कालिया नाग बर दूध नइ मड़ास?’’
’’हाँ।’’ गंगा राम ह किहिस - ’’जा, तंय ह सुत।’’
वो ह ये बारे म जादा बात नइ करना चाहत रिहिस।
’’अब वोला दूध पियाय के कोनों जरूरत नइ हे।’’
गंगा राम ह ठहर गे।
’’काबर ?’’
’’ओह! कुछू नहीं। अब तो बिकट मेचका हो गे हें। वोला दूध ले जादा सुवाद मेचका म आथे। आज तक तंय दूध म कभू शक्कर नइ मिलायेस।’’
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बिहिनिया गंगा  राम ह सासर ल धर के आइस। वोमा रात के दूध ह जस के तस बाँचेच् रहय। वोह बेहद उदास अउ संसो-फिकर म दिखत रहय।
’’मंय ह तोला केहेंव न कि वो ह दूध ले जादा मेचका खाना पसंद करथे।’’
जब तक हमन नाश्ता नइ कर लेयेन, कपड़ा नइ बदल लेयेन, गंगाराम ह हमर तीर ले टरिस नहीं। स्‍कूल  बस आइस। हमन वो टीपा सहित स्‍कूल बस म चड़ गेन। बस ह जब रेंगे लगिस, टीपा ल बाहिर खींच के गंगा राम ल देखायेन, केहेन - ’’तोर कालिया नाग ह इहाँ हे एकदम सुरक्षित। येला हमन ह स्पिरिट म रखे बर लेगत हन।’’
गंगा राम ल अवाक अउ बेहद दुखी खड़े छोड़ के हमन बस म चढ़ के निकल गेन।
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स्‍कूल म हो हल्ला हो गे। हमन चार भाई हन। चारों झन मन बहादुर माने जाथन। ये बात ल एक घांव हमन फेर साबित कर देयेन।
’’डोमी ( किंग कोबरा)। ’’
’’छै फुट लंबा।’’
’’फनियार।’’
टीपा ल विज्ञान के शिक्षक ल सौंपे गिस। अब वो ह गुरूजी के टेबल ऊपर माड़े रिहिस। सांस रोक के हम टीपा खुले के अगोरा करत रेहेन। गुरूजी ह अलग तरीका अपनाइय। वोला काम करे म थोकुन अड़चन होवत रिहिस। वो ह सांप धरे के चिमटा ल मंगाइस। गंदलहा स्पिरिट म सरत करैत के जार ल मंगाइस। वो ह गुनगुनावत टीपा के डोरी ल खोले लगिस।
डोरी ह जइसने ढीला होइस, टीपा के ढकना ह सांय ले हवा म उड़ाइस। गुरूजी के नाक ह मुश्किल  से बाँचिस। उहाँ अब कालिया नाग ह फन काढ़े खड़े रहय। वोकर आँखी मन अंगारा के समान दहकत रहय। वोकर साबुत फन ह कसाय रहय। वो ह गुरूजी के मुँहू डहर फुफकारिस। खुद ल बचाय बर गुरूजी ह पीछू कोती झूलिस अउ कुरसी समेत गिर गिस। फर्रस म गिरे-गिरे वो ह टकटकी लगा के साँप कोती देखत रहय अउ डर के मारे लदलद - लदलद कांपत रहय। वोकर डेस्‍क के चारों मुड़ा खड़े पढ़इया लइका मन जोर-जोर से चिल्लाय लगिन।
कालिया नाग ह अपन बरत आँखी म चारों मुड़ा घूम के देखिस। वोकर दुफंकिया जीभ ह उत्ताधुर्रा मुँहू के भीतर-बाहिर होवत रहय। वो ह विकराल दिखत रहय अउ भागे के कोशिश करत रहय। वो ह टीपा सुद्धा भद् ले फर्रस ऊपर गिरिस। वोकर कनिहा ह कतरो जघा ले टूटे रहय। बड़ तकलीफ म वो ह फर्रस म घसीटत मुहाटी कोती रेंगिस। जब वो ह मुहाटी म पहुँचिस, फन काढ़ के खतरा भांपे के फेर कोशिश करिस।
कक्षा के बाहिर सासर अउ मग्गा म दूध धर के गंगा राम ह खड़े रहय। जइसने वो ह कालिया नाग ल आवत देखिस, मडिय़ा के बइठ गे। सासर म दूध ल ढारिस अउ वोला मुहाटी तीर मढ़ा दिस। वो ह प्रार्थना म अपन दुनों हाथ ल जोड़ लिस अउ क्षमा मांगत-मांगत अपन मुड़ी ल भुँइया म मढ़ा दिस।
साँप ह भयंकर फुफकार मारिस अउ गंगा राम के मुड़ी ल डस लिस। अउ बड़ जोरदार ताकत लगा के नाली म कूदिस अउ आँखी ले ओझल हो गिस।
अपन चेहरा ल अपन हथेली म तोप के गंगा राम हा भुँइया म गिर गे। वो ह दरद के मारे कराहे लगिस। बिख ह बड़ जल्दी वोकर शरीर ल जकड़ लिस। कुछेक  मिनट के भीतर वोकर शरीर ह पीला अउ नीला पड़ गे। वोकर मुँहू डहर ले गजरा निकले लगिस। वोकर माथा म रकत के कुछ बूँद दिखत रहय। गुुरूजी ह रूमाल म वोला पोंछ दिस। माथा म, जिहाँ वो ह ' v ' आकार टीका लगाय रहय, वोकरे खाल्हे साँप ह वोला डसे रहय।

पता
व्‍याख्‍याता 
शासकीय उच्‍च्‍तर माध्‍यमिक शाला कन्‍हारपुरी 
वार्ड - 28, राजनांदगांव ( छ.ग.) 
मोबाईल : 94076 - 85557 
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बुधवार, 27 नवंबर 2013

धरती सुराज अभियान

- वीरेन्द्र सरल  -
एक दिन अचानक  भगवान ने मन मे विचार किया कि क्यों ना मै भी ग्राम सुराज या नगर सुराज के तर्ज पर धरती सुराज अभियान चलाऊँ। वैसे भी मेरे अधीन तैंतीस करोड़ देवता है। जो इस समय स्वर्ग के सभी सुखो का उपभोग करते हुये बिल्‍कुल  खाली बैठे आराम फरमा रहे है। उनमे से यदि एक को मै दल प्रभारी और दूसरे को सहायक नियुक्त कर दूँ तो साढ़े सोलह करोड़ दल का गठन हो सकता है।ये दल विश्व के सभी गाँवो एवं शहरो मे पैदल भ्रमण करेंगें। लोगो से मिलकर उनकी समस्याओ को सुनेंगें और उनसे आवेदन प्राप्त करेंगें। इससे मुझे ताे पता चलेगा कि लोग कितने सुखी है या दु:खी। स्वर्ग से संचालित योजनाओ का धरती पर सही ढंग से संचालन हो रहा है या नही । योजनाओ का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहा है या नहीं ।इन सभी बातों की जानकारी के लिये मुझे यह अभियान चलाना बहुत जरूरी लग रहा हैं।
मन मे यह विचार आते ही भगवान ने देवताओं की  एक अर्जेन्ट मीटिग बुलवाईं सारे देवता निर्धारित जगह पर एकत्रित हो गये । सबको बड़ी हैरानी हो रही थी ,सभी सोच रहे थे कि अचानक मीटिंग रखने की ऐसी कौन सी आवश्‍यकता आ पड़ी। सभी देवता भगवान की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगे।
भगवान ने सबको संबोधित करते हुये सबसे पहले मींटिंग का उद्देश्‍य बतलाया । सबकी जिज्ञासा शांत हो गई। जो देवता अखबारो  मे सुराज दल को बंधक बना लिये जाने या सुराज अभियान का बहिष्‍कार करने का समाचार पढ़ चुके थे या न्यूज चैनलो मे सुन चुके थे,वे एकदम घबरा गये । लेकिन अपनी घबराहट छिपाकर चुपचाप बैठे रहे। उनकी चुप्पी भाँपकर भगवान ने उनसे ही पूछा-अब इस धरती सुराज अभियान का शुभारंभ हम धरती के किस कोने से करें इस संबध में मैं आप लोगो से ही राय चाहता हूँ। एक देवता ने तपाक से कहा-इस अभियान का शुभारंभ हम इंडिया से ही करेंगें भगवन। दुसरे देवता ने अपना हिन्दी प्रेम झाड़ते हुये कहा-सट अप। बकवास बंद करो और देवभूमि भारत कहो,समझे। झिड़की सुनकर इंडिया कहने वाला देवता सकपका गया। दूसरे देवता ने उसे समझाने वाले अंदाज मे कहा-डोन्ट मांइड प्लीज। मगर हमे अपनी भाषा का अपमान नही करना चाहिये । भले ही हम अपने बच्चों को कॉन्वेन्ट स्‍कूलों में पढ़ायें। घर पर अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप करें मगर सार्वजनिक मंचो पर अपनी भाषा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करें। यही अपनी भाषा के विकास का मूलमंत्र है। यह अपनी भाषा के प्रति हमारा प्रेम है,अंडरस्टेण्ड। निज भाषा उन्नति अहै, सभी उन्नति के मूल ,समझा। मैने अपनी सभी बातें शुद्ध हिन्दी मे कह दिया है । अब आप लोगो को अच्छा लगे या बुरा। थैक्यूं वैरी मच।''
उनकी बातें सुनकर भगवान ने ताली बजाते हुये कहा- सचमुच आप महान हैं। आपकी महानता और भाषा प्रेम को मेरा नमन । बलिहारी जाऊँ,आपकी इस अदा पर। अपनी आदत से मजबूर सारे देवता वहाँ फूल बरसाने एवं नगाड़ा पीटने लगे। भगवान ने कहा-अनावश्यक शोर गुल मत कीजिये। मेरी बातें ध्यान से सुनिये। मैं आपके विचारों का समर्थन करता हूँ। सचमुच धरती सुराज अभियान की शुरूआत वहीं से होना चाहिये जहाँ हमारे सबसे अधिक भक्त बसते है। हमारी पूजा जहाँ ज्यादा होती है। और जहाँ के लोग हम पर ज्यादा चढ़ोत्री चढ़ाते है। अब आप सब जी जान से जुटकर कमर कसकर इस अभियान को सफल बनाने मे जुट जायेें। ठीक पखवाड़े भर बाद यहीं पर इस अभियान की समीक्षा बैठक होगी । आप अपनी अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करें। लापारवाही कतई बर्दाश्त नही की जायेगी। मै अपने पुष्पक विमान से कहीं भी और कभी भी पहुँच सकता हूँ।अनुशासन हीनता पर कठोर दंडात्मक  कार्यवाही के लिये आप स्वयं जिम्मेदार होंगें,समझ गये ?''
दूसरे ही दिन इस अभियान की निर्धारित रूपरेखा तैयार कर ली गई। आवाश्यक दस्तावेज तैयार करवा लिये गये। तिथि भी निर्धारित हो गई। दलो का गठन भी कर लिया गया फिर निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार देवताओं को आदेश भी थमा दिया गया। आदेश मिलते ही अनिच्छा से ही सही  मगर ड्यूटी पर जाने के लिये तैयार हो गये। कुछ भगवान को कोसते हुये,कुछ कुनमुनाते हुये और कुछ अपने जीवन की अंतिम यात्रा समझकर अपने अपने दल के साथ अपने गंतब्य की ओर निकल पडें। घर से निकलते समय वे घर वालो से इस तरह बिदा ले रहे ले रहे थे जैसे सैनिक रणभूमि मे जाते समय लेते है। चेहरे का भाव ऐसा था,मानो कह रहे हों ,जिन्दा रहें तो वापस आयेंगें नहीं तो अगले जन्म में ही मुलाकात होगी। खुश रहो अहले वतन अब हम तो सफर करते हैं के अंदाज में सब देवता अपने अपने दल के साथ ड्यूटी पर निकल पड़े। देवता अपनी अपनी टोली के साथ गाँव गाँव,शहर शहर भ्रमण करने लगे। सुबह भ्रमण दोपहर चौपाल और रात्रि मे वहीं विश्राम। पखवाड़े भर से यही उनकी दिनचर्या थीं। इस बीच उन्हे विचित्र विचित्र अनुभव हो रहे थे। देवताओ का एक दल ग्रामवासियो के साथ ग्राम भ्रमण के लिये निकला था। वह एक बड़ा गाँव था। वहाँ के लोग शिक्षित और सपन्न लग रहे थे।बड़े -  बड़े आलीशान मकान थे पर वहाँ गंदगी बहुत अधिक थीं । नालियाँ बजबजा रही थी। घरो के आसपास कचरे के ढेर बिखरे पड़े थे । सड़कों के बीचोबीच गहरे गड्ढे थे। इन सबको देखकर देवताओ को बड़ी हैरानी हो रही थी । वे सोच रहे थे कि क्या ये वही देवभूमि है,जहाँ लोग कहते है कि यहाँ जन्म लेने के लिये देवता भी तरसते है। और क्या ये वही मनुष्य योनि है जिसके बारे मे कहा जाता है कि यह देवताओ के लिये भी दुर्लभ है? अच्छा हुआ जो हमने यहाँ जन्म लेने का शौक नही पाला । पता नही हमारे पूर्वज यहाँ कैसे रह लेते रहे होंगें?
उन्हें एकदम चुप देखकर गाँव के मुखिया ने पूछा- आखिर आप लोग एकदम चुप क्यों हैं , कुछ बोलते क्यों नहीं । क्या सोच रहे हैं आप लोग। दल प्रभारी देवता ने कहा -यहाँ इतनी गंदगी है । आप लोग साफ  सफाई क्यों नहीं करते ? सड़कों गड्ढे क्यो नही पाटते ? कूड़ें कचरा गाँव से बाहर क्यो नही फेंकते ? उसका इतना कहना ही था कि गाँव वाले चिल्लाने लगे। अरे! वाह यदि ये सब हम करेगें तो फिर भगवान क्या करेगें। हमारा बस चले तो हम गाँव की साफ सफाई को तो छोड़ो हम अपने शरीर की सफाई की व्यवस्था के लिये भी भगवान से ही माँग करेंगें। क्या हम गंदगी साफ करने के लिये उनकी पूजा पाठ करते हैं देवता उनके उत्‍तर सुनकर दंग रह गये । दल प्रभारी ने मुस्‍कुराते हुये कहा -सचमुच आप लोग महान है। अपने आप को पूर्णत: भगवान को समर्पित किये हुये है। और अजगर करे ना चाकरी पंछी करे  न काम ,दास मलूका कह गये सब के दाता राम के सिद्धांत को अपनायें हुये हे। आप लोगो की महानता को मै प्रणाम करता हूँ। भगवान से आप अपने शरीर की सफाई हेतु व्यवस्था की माँग नही करते ये आप लोगो की महानता है।
लोगो की मानसिकता से हैरान देवताओं को कहने के लिये और कुछ नही सूझ रहा था इसलिये चुप रहने मे ही उन्हे अपनी भलाई दिखी। वे नाक पर रूमाल रखकर चुपचाप ग्राम भ्रमण करने लगे । फिर दोपहर होते ही गाँव की चौापाल पर आकर बैठ गये ।
अब उनके पास आवेदन आने का सिलसिला शुरू हुआ। ज्यादातर आवेदन व्यक्तिगत लाभ के लिये ही थे । किसी को मुफ्त मे मकान चाहिये था तो किसी को दुकान । किसी सपन्न को गरीबी रेखा मे नाम जुड़वाना था तो किसी युवा को वृद्धावस्था पेंशन योजना का लाभ लेना था सार्वजनिक हित और ग्राम विकास संबंधी आवेदनो की संख्या एकदम नगण्य थी। ये सब देखकर देवता भैचक्के रह गये। इस तरह पखवाड़े भर से ग्राम सुराज अभियान चला और सफलता पूर्वक संपन्न हुआ । तब देवताओ ने राहत की सांसे ली ।
निर्धारित समय पर इस अभियान की समीक्षा बैठक आयोजित हुई।अपने खट्टे मीठे अनुभव के साथ सारे देवता वहाँ एकत्रित हुये । फिर प्राप्त माँग पत्रो पर वहाँ विचार किया जाने लगा। कुछ माँगे इतनी छोटी छोटी थी जिसे लोग स्वयं कर सकते थे। कुछ उल्टी सीधी अजीबोगरीब माँगे थी जैसे गाँव मे मदिरालय खोलने की माँग तथा दारू मे पानी मिलाने की शिकायतें।
इन माँगो को सुनकर भगवान ने ढंडी आहें भरते हुये कहा-क्या करोगे भाई! भगवत् पर बने रहना है तो इन माँगो को पूर्ण करना हमारी मजबूरी है। वरना कौन करेगा हमारी भक्ति और पूजा ? आज के लोग बिना स्वार्थ के कुछ भी नही करते। इस अभियान से अंतिम रूप से यही निष्‍कर्श  निकला कि दुनिया मे कोई सुखी नही है,सब दु:खी है बेचारे तभी तो रात दिन गाते रहते हैं कि दाता एक राम जी भिखारी सारी दुनिया । सर्वे भवन्तु सुखिन: के आदर्श वाक्य का अक्षरश: पालन करते हुये एवमस्तु कहकर सबकी माँगे पूरी कर दो ।
भगवान के इस आदेश को सुनकर सारे देवता हक्के बक्के रह गये । सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। वे सोचने लगे इस तरह की सभी माँगे पूरी कर देने पर तो लोग निठ्ल्‍ले कामचोर हो जायेंगें। फिर काैन  कहेगा परिश्रम ही पूजा है और कैसे बनेंगें लोग स्वावलंबी ?
उन्हें असमंजस मे देखकर भगवान ने कहा-मै आप लोगो के मनोभावों को समझ रहा हूँ। मगर आप समझते क्यों नही ,ये हमारी मजबूरी है ,आखिर आप लोगो को अपनी पूजा करानी है या नही ? इस ब्रह्मास्त्र से सारे देवता ढेर हो गये। सबके मुँह बंद हो गये। सबके मुँह से सभी माँगो के लिये एक साथ निकल पड़े  एवम्वस्तु। सबकी माँगे पूरी हो गई थी मगर अभी भी कोने में बैठे दो देवता असमंजस मे पड़े दिखार्द दे रहे थे। भगवान ने पूछा क्या हुआ ? आप दोनो एकदम चुप कैसे है ? निराश होने की बात नही है यदि आपको किसी की माँग पूरी करने मे कोई दिक्कत आ रही हो या आप असमर्थ हों तो मुझे बताइये। मेरे पास हर समस्या का समाधान है।
एक देवता ने डरते सहमते हुये कहा-भगवन, हमारे पास जो माँग है ,उसे पुरी करना हमारे बस की बात नहीं हैं,हम क्या करें?
भगवान ने कहा -यही तो बात है न अपने भक्तो की माँग पूरी नही कर सकते तो फिर क्यों देवता बने फिरते हो । स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर घर बैठो और आराम करो । लोग मुझे यूं ही भगवान नही कहते बच्चू। मै सभी समस्याओ का चुटकी बजाते हुये समाधान कर सकता हूँ। हर समस्या का समाधान है मेरे पास। भक्तो की माँग पूरी करना बाँये हाथ का खेल है मेरे लिये । इसीलिये मेरी पूजा सबसे अधिक होती है ,समझे। मैं चाहूँ तो क्या नही कर सकता । कहो तो कुबेर का खजाना अपने भक्तों में बटंवा दूँ। महासागरो का पानी पल भर मे सुखा दूँ। आसमान के तारे तोड़कर जमीन पर बिछवा दूँ। ब्रह्मांड को घड़े की तरह उंगली पर  उठाकर पटक दूँ। आखिर मैं क्या नही कर सकता ?
उस देवदास ने कहा-भगवन!ये सब तो ठीक है  मगर मेरे पास जो आवेदन उसमे माँग की गई है कि यथाशीघ्र जन लोकपाल विधेयक पास करा दो और देश को काला धन वापस दिला दो।
जनलोकपाल बिल और काला धन का नाम सुनकर भगवान के माथे पर पसीना छलक आया। रूमाल से पसीना पोंछते हुये भगवान धम्म से अपने सिहांसन पर बैठ गये और बेबस निगाहो से इधर उधर देखने लगे। हालात की गंभीरता को देख देवतागण अपने वैद्य को बुलाने के लिये दौड पड़े।

पता 
बोड़ला ( मगरलोड ) 
जिला - धमतरी ( छ.ग.) 
मोबाईल : 7828243377

श्वान धर्म

  • कुमार शर्मा अनिल --

भेडिय़े का वंशज श्वान उन जंगली जानवरों में से है जिसे मनुष्य ने सबसे पालतू बनाया था। आदि - काल से मनुष्य और श्वान की मित्रता वैसी की वैसी है। बदलते जीवन मूल्य और सामाजिक परिवेश का प्रभाव आज जहाँ हर रिश्ते पर पड़ा है वहीं मनुष्य और श्वान के बीच का रिश्ता इससे अब भी अछूता है। कुत्ते की वफादारी की हजारों कहानियाँ इतिहास के पृष्ठों पर अब भी दर्ज है जहाँ इस स्वामी भक्त जानवर ने  अपने प्राणें पर खेलकर अपने मालिक और उनके पारिवारिक सदस्यों की प्राण रक्षा तक की।
मेरी बरसों पुरानी आदत है कि मैं सुबह की चाय अखबार पढ़ते हुए बालकनी में बैठकर पीता हूं। इस कालोनी में जब से आया हूं लगभग रोज ही देखता हूं कि कई लोग अपने कुत्तों के साथ सुबह - शाम सैर को निकलते हैं। रल्हन साहब भी उनमें से एक थे। रल्हन साहब के बारे में मैं बस इतना जानता था कि वे पिछले वर्ष ही शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए है। पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और एक बेटी थी जो विवाह के पश्चात अपनी ससुराल में सुखी है। इस कालोनी में वे अकेले ही रहते थे। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उन्होंने अल्शेशियन नस्ल का एक स्वस्थ व सुंदर कुत्ता पाल रखा था - टाइगर। ये जब भी घर से निकलते टाइगर उनके साथ होता। वास्तविकता तो यह थी कि मैंने  कभी उन्हें टाइगर के बिना नहीं देखा था। टाइगर से उन्हें बेइंतहा प्यार था और टाइगर भी उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। ऐसा अक्सर वे अपने परिचितों में टाइगर की कहानियाँ सुनाते हुए बताते थे। साठ वर्ष की उनकी उम्र हो चुकी थी परन्तु उन्हें देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वे इतनी उम्र के होंगे। इसका राज भी उनकी जीवन शैली में ही छुपा था। वे बड़े ही खुशमिज़ाज, मिलनसार और व्यवहारिक थे। शाम को अक्सर उनके घर पर यार दोस्तों की महफिल जमती, जहाँ जामों में घोलकर जीवन के तमाम गमों और अवसादों को पी लिया जाता परन्तु कभी भी, किसी ने भी उन्हें शराब पीकर बहकते नहीं देखा था।
मेरे फ्लैट के भूतल पर शर्मा जी का परिवार था। दोनों पति - पत्नी एक ही कार्यालय में कार्यरत थे।  परिवार में उनकी चौदह वर्षीय बेटी सलोनी को मिलाकर कुल तीन सदस्य थे। सलोनी सुबह आठ बजे स्‍कूल लिए निकलती और दो बजे तक घर लौट आती। मुझे वह अक्सर सुबह स्‍कूल  जाते हुए नजर आ जाती थी। गोरा , तीखे नाक - नक्श और धीर - गंभीर स्वभाव की वह सुंदर- सी किशोरी जब सफेद यूनिफार्म में स्‍कूल  जाने के निकलती तो मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता कि कोई सफेद कबूतरी हौले- हौले हवा में तैर रही है।
उस दिन भी सुबह ऐसा कुछ अजीब नही घटा था। सभी लोगो ने अपनी दिनचर्या रोज की तरह ही प्रारंभ की थी। मैने भी सुबह बालकनी में चाय पीते हुए अखबार की खबरें टटोली थी और सलोनी भी ठीक आठ बजे स्‍कूल  जाने के लिए निकली थी। इसमें भी कुछ अजीब नही था कि मैं अपनी पत्नी, जो मेरे ही कार्यालय में कार्यरत है, के साथ लंच टाइम में घर लौट आया था क्योंकि एक टी.वी. कार्यक्रम की स्क्रिप्‍ट तैयार कर मुझे प्रोडयूसर को देनी थी।
पिछले कुछ दिनों से कालोनी में चोरी की वारदातें बहुत बढ़ गई थी। चोर विशेषकर उन घरों को निशाना बनाते जहाँ पति - पत्नी दोनों कार्यरत होते और घरों में या तो ताले लगे होते या छोटे बच्चे अकेले होते।
तीन बजे का वक्त होगा। जब मुझे नीचे वाली मंजिल से कुछ घुटी - घुटी चीखों की आवाज सुनाई दी। चूँकि आसपास के दोनों मकानों में भी नौकरीपेशा दम्पति रहते थे अत: दोपहर का वक्त यह पूरा ब्लॉक सुनसान रहता था। पहले मैं समझा कि शायद सलोनी स्‍कूल से लौट आई होगी और उसने टेलीविजन पर कोई विदेशी म्यूजिक चैनल लगा रखा होगा जहाँ गायक गाते कम चीखते ज्यादा है। लेकिन जब दरवाजा पीटने की आवाजें भी उन घुटी - घुटी चीखों में शामिल हो गई तो मेरी पत्नी एकदम से घबरा गई। निश्चित था कि नीचे शर्माजी के घर में कुछ अप्रत्याशित घट रहा था। हम दोनों ही सलोनी के लिए एकदम चिंतित हो उठे। मैं लगभग दौड़ता हुआ मदद के लिए नीचे पहुंचा। साथ में पत्नी भी थी। हमारे नीचे पहुंचने और दरवाजा पीटने के साथ एक झटके में से दरवाजा खुला और बदहवास सी सलोनी मेरी पत्नी को देखते ही उसके सीने से लिपटकर जोर - जोर से रोने लगी। उसकी यूनिफार्म जगह - जगह से फटी हुई थी और उसके चेहरे और शरीर पर किसी वहशियाना दरिंदगी के निशान खरोचों की शक्ल में स्पष्ट नजर आ रहे थे ।
कमरे के अंदर का दृश्य देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। अंदर रल्हन साहब लहूलुहान पड़े थे और उनके वफादार कुत्ते टाइगर ने उनकी टांग को लगभग चबा डाला था जो अब भी उसके मजबूत जबड़ों की गिरफ्त में थी। सलोनी को सुरक्षित देखकर टाइगर ने रल्हन साहब को छोड़ा और रोती हुई सलोनी के पास आकर खड़ा हो गया। घिसटते हुए रल्हन साहब जब बाहर निकले तो मैंने देखा टाइगर की आँखों में गुस्से और नफरत का मिला - जुला भाव था।
पता 
1192 - बी, सेक्टर - 41 - बी, चण्डीगढ़
मोबाईल : 099148 - 82239

आईना

- सुभाष चंदर  -
आज फिर वैसा ही हुआ । बच्चों के सो जाने के बाद उसने उसे बिस्तर पर बुलाया। पर वह पहले की तरह आज भी बहाना बना गयी नहीं उठी। मैं देख रहा हूँ। तुममें ठंडापन बढ़ता ही जा रहा है। इलाज कराने को कहता हूँ, तो बिदकती हो। जानती हो, आज हमें हम - बिस्तर हुए पूरे बीस दिन हो गये हैं।
उसे मुस्‍कराते  देखकर वह और भड़क गया । फिर टेलीफोन की ओर बढ़ते हुए बोला - तुम क्या समझती हो, मुझमें कोई कमी है। मैं अभी मिसेज वर्मा का नम्बर डायल करता हूँ  वह वैसे भी काफी दिनों से मेरे पीछे पड़ी है। कहकर उसने उसकी ओर देखा । किन्तु कटकर रह गया, क्योंकि वह दूसरी औरत के नाम पर तड़प उठने की जगह व्यंग्य से मुस्‍करा रही थी। उसका  मन और कड़वा हो गया । वह बिफर उठा। देखना, तुम्हारा यह ठंडापन तुम्हें और मुझे ले डूबेगा। कहकर वह फोन के नम्बर घुमाने लगा।
तभी वह फोन के पास गई। उसके हाथ से रिसीवर लेकर रख दिया । फिर रहस्यमयी मुस्‍कुराहट के साथ बोली - अच्छा है कि मुझमें यह ठंडापन है। वरना तुम्हारी जगह मैं होती और टेलीफोन पर मिसेज वर्मा की जगह, मेरे बॉस या कलीग का नम्बर । फिर गहरी सांस लेकर बोली- ठंडापन ही इस घर को बचा रहा है। क्योंकि तुम तो तृप्त होने के बाद आराम से मुँह फेरकर सो जाते हो और मैं रात भर अतृप्ति की आग में ....। अपने शरीर की माँग को मैं इस ठंडेपन के आवरण में ही छिपाती हूँ। अपने आप से पूछकर देखो कि इस घर को यह ठंड़ापन कितना बचा रहा है। कहकर वह बच्चों के कमरे में सोने के लिए चल दी।
वह हतप्रभ सा खड़ा, आइने में खुद को गौर से देखने लगा।

सीला बरहिन

- सत्यभामा आडि़ल -

सीला गांव ले आय रिहिस। त सब ओला सीला बरहिन कहाय। अपन बूढ़त काल के एक बेटा ल घी - गुड़ खवावय त देवर बेटा मन ल चाऊर पिसान ल सक्कर म कहि के पानी मं घोर देवंय। देवरानी जल्दी खतम होगे देवर तो पहिलिच खतम होगे रिहिस। नान - नान लईका  देवर के फेर सीला बरहिन के बेटा ह सबले छोटे रिहिस।
देवर के बड़े दूनों बेटा मास्टर होगें मेट्रिक पढ़े के बाद। सीला बरहिन अपन बेटा ल देवर बेटा घर पहुंचईस पढ़े बर। हर आठ दिन मं घी, चाऊंर ले के आवय। सांझ होवत चल दय। रंग - रंग के खाय - पिए के कलेवा बना के लानय। अपने बेटा ल बईठार के खवावय - पिलावय अऊ चल दय। दू झन देवर बेटा मन छोट  रहिन। फेर ओ मन ल तीर मं नई ओधन दय। घर के सियान ए, बड़े दाई के हुकुम चलय दूनों बड़े देवर बेटा के बिहाव करिस त बहूमन के दाईज - डोर के गाहना - गुरिया ल तिजोरी मं भर के राखे रहाय। देवर बेटा मन नई बोले संकय, न पूछे सकय। बहू मन के बोले तो बातेच दूरिहा हे।
दिन बीतस गिस। दूनों छोटे देवर बेटा मन अऊ सीला बरहिन के बेटा ह मेट्रिक पढ़ के निकलिस तहां ले खेती के काम देखे लगिस। बड़े देवर बेटा कोसिस करके सीला बरहिन के बेटा ल घलो मास्टरी मं लगा दिस। काम
बिहाव होईस तीनों झन के। तहां ले सीला बरहिन बंटवारा कराय बर पंचमन के बईठक बलईस। ओखर बहू के गहना - गुरिया जादा नई आय रहिस। देवर बेटा मन के बिहाव म चारों बहू के गाहना - गुरिया मं तिजोरी भर गे। सीला बहरिन के खोट नियत मं सबो गाहना दू भाग मं बांटिस। पंचमन करा सबो जायदाद अउ गाहना बरतन ल दू भाग मं बंटवईस। एक बांटा में चार देवर बेटा, दूसर बांटा मं ओखर एक बेटा। चारों देवर - बेटा बहू मन के गाहना - गुरिया बंटागे। धार - मार के रोईन बहू मन। बड़े - बड़े घर के बेटी दू - दू तीन - तीन परत के गाहना - गुरिया आय रहिस कदराही झुमका, चारों झन के। सीला बरहिन अपन डाहर ले लिस। काहीं नई बोलिन देवर बेटा मन। अपन - अपन घरवाली के मुंह बंद कर के राखिन ओमन। होगे बंटवारा। खंडग़े अंगना। ए पार चार भाई, ओ पार एक भाई।
चार भाई के बेटा - बेटी होईन। पढ़ - लिख के कालेज पहुंचिन। चारों के चार बेटा इंजीनियर बनगे। बेटी मन घलो कॉलेज पढ़के , घर बसईन। पढ़े - लिखे नौकरिहा दमाद मिलिस। सबो झन खुसी - खुसी अपन दिन बितईन। सहर मं रिहिन। गांव मं तीसरा नंबर के बेटा भर रिहिस।
सीला बरहिन के बेटा गांव के स्‍कूल मं मास्टर रहिस। एक झन के छह बेटी - बेटा होगे। पालत - पोसत, पढ़ावत - लिखावत थकगे सीला बरहिन के बेटा ह। चार बेटा मन ले दे के मेट्रिक पास होईन। बेटी मन के घलो तीर - तखार के गांव मं बिहाव होईस। सीला बरहिन छहों नाती - पोता देख के मरिस। ओखर बांटा मं मिले सबो जेवरात - गाहना गुरिया सीरागे,खेती कमतियागे, आधा खेत मन बेचागे।
दू झन बेटा बिमरिहा होगे। तीसर बेटा खटिया धर लिस। एक झन बेटी खाली हाथ होगे। दूसरे बेटी निरबंसी होगे। गांव वाले मन देखयं अउ लीला चौरा मं बईठ के बतियावंय- देखव, का होथे दुनिया मं। ऊपर वाला ह नियाव करथे। सीला बरहिन अब्बड़ तपिस अपन देवर बेटा मन बर। ओखर देवर बेटा मनए गरीब - गुजारा खा - पी के, सादा - सरबदा रहि के पढ़ - लिख लीन। अऊ सीला बरहिन के बेटा ह बने खात - पियत घलो बिमरहा होगे। नाती - पोता मन तो अउ गय। मनखे के करम के सजा भगवान ह लईका  मन ल देथे। दुनिया में इही देखथन। करम - करय कोनो, अउ सजा भुगतय बंस मन। वाह! भगवान! कईसन नियाव करथस। मनखे मन,सब देखके घलो नई सीखय। बने करम के बने फल मिलथे। 

पता 
शंकरनगर, रायपुर , ( छ .ग.)

कठिन जीवन के कुटिलकाल में मध्यांतर का गीतकार : डॉ विष्णु सक्सेना

जगन्‍नाथ ' विश्‍व '
-जगन्‍नाथ ' विश्व '  -
नवगीत तो अस्तित्व का नवनीत है। विषय पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए पद्मश्री गोपालदास नीरज ने ग्रेसिम बिरलाग्राम नागदा की साहित्यिक संस्था वातायन में लोकप्रिय गीतकार कवि डॉ विष्णु सक्सैना के लिए एक दशक पूर्व कहा था -  डा विष्णु सक्सैना एक ऐसा कवि गीतकार है जो कुछ बरसों पहले सावन के बादलों की तरह उमड़ा और पूरे देश पर कुछ इस कदर बरसा कि हर काव्य प्रेमी का मन सदा सदा के लिए उसकी रसधारा में डूब गया। विष्णु की भाषा का प्रवाह तथा स्वर संयोजन एक झरने के समान है। जिसमें बड़े - बड़े तैराको के पांव उखड़ जाते है और वे उसमें डूबने के लिए विवश हो जाते हैं।
सर्वप्रिय विष्णुभाई का हर गीत एक  पुष्प है। आइये उनके गीत पुष्पों की माला संजोकर मां वीणापाणी के गले में डालते हुए श्रवणीयता की नई सरगम आत्मसात करें.
आओं एक बार फिर से तुम्हें देख लूं, क्या पता फिर ये दरपन मिले ना मिले,
पास आ तन की गंधों को दे दो मुझे, क्या पता फिर ये चंदन मिले ना मिले,
इस निवेदन के साथ गीतकार मीठे निर्णय के लिए भी प्रेरित करता है.एक हैं अंक हम एक हो अंक तुम आओ दोनों को अब जोड़ दें। तुम हमारी कसम तोड़ दोड़ हम तुम्हारी कसम तोड़ दें।
इस अहसास के समर्थन में  विश्व व्यापी ख्याति प्राप्त हिन्दी मालवी के महारथ हासिल वरिष्ठ कवि पूर्व सांसद श्री बालकवि बैरागी का यह कथन भी सत्य है -  बसंत ने किसे संत रहने दिया है। याद आया बात आठ वर्ष पुरानी है। नागदा में रंगपंचमी पर प्यारेलालजी पोरवाल द्वारा आयोजित टेपा हास्य कवि सम्मेलन के प्रमुख मंच संचालक बैरागीजी ने कवि विष्णु सक्सैना को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित करते हुए जो टिप्पणी प्रस्तुत की उसे सुनकर श्रोतागण हंसते - हंसते लोट पोट हो गए। टिप्पणी के बोल थे - आज हमारे आंगन में कई अर्थों में ये अकेला अलबेला कवि डॉ विष्णु सक्सैना पता नहीं अपने चिकित्सा शास्त्र के शिक्षण प्रशिक्षण के बाद अपने मरीजों के साथ कैसा भी उपचारी डाक्टर हो, परन्तु हिन्दी की आज वाली पीढ़ी में विष्णु अकेला ऐसा गीतकार है जिसे अगर किसी ने एक बार भी अपनी समग्रता एकाग्रता के साथ सुन लिया तो फिर या तो वह रोगी होकर ही रहेगा या उसका कोई प्राचीन अर्वाचीन प्रेमरोग नये सिरे से जाग उठेगा। बस फिर क्या था, श्रोतागण गीत सुनते रहे और विष्णु सक्सैना गीत सुनाते रहे।
थाल पूजा का लेकर चले आइये, मंदिरों की बनावट सा घर है मेरा
मैंने काट दिये दिन - दिन उँगलियों पे गिन
हथेली पर तुम्हारी आज मैं मेंहदी रख दूंगा
क्‍वॉंरी मांग सिन्दूरी सितारों से सजा दूंगा
तदुपरांत माईक पर आई एक प्रसिद्ध कवियित्री ने अपनी भूमिका बनाते हुए कहा -  कवि डॉ सरोज कुमार, पं. सत्यनारायण सत्तन की तरह डॉ विष्णु सक्सैना को भी प्रकृति ने सुदर्शन रूप सम्पदा दी है। कविता पढ़ते हुए इनका रूप और भी मनमोहक बालकवि जी जैसा निखरा - निखरा अच्छा लगता है। तत्‍काल  बैरागी जी चुटकी लेते हुए बोले -  सच कहूँ ये विष्णु उतना अबोध और मासूम भी नहीं है जितना कि ये लगता या दिखाई देता है।
धोखा खाने का मन हो तो खालो।
फिर भी यह बात सत्य है कई बार विष्णु मरूस्थल में मारूउधान और महासागर में द्वीप साबित हुआ है। जहाँ था हारा प्राण पंछी घड़ी अधघड़ी विश्राम पाकर अपनी सामान्य चह - चहाहट फिर से प्राप्त कर सके। उसी प्रकार  हमारे मानवीय कठिन जीवन के कुटिलकाल में डॉ विष्णु सक्सैना मध्यांतर का विशेष गायक गीतकार कचन कवि है।
ज्ञातव्य है इन दिनों कवि सम्मेलनों में डॉ विष्णु सक्सैना अपनी काव्य प्रस्तुति में स्वराघात् और शब्दाघात् का ऐसा सधा हुआ संधान करते हैं कि हर कोई उन पर फिदा हो जाता है। उदाहरण के लिए देखिए इन पंक्तियों को जिसे सुनकर कौन कुरबान नहीं होगा।
 बस एक ही ग्राहक बचा दिल की दुकान में, सोचा था साथ दोगे तुम ऊँची उड़ान में।
जब यूँ झटक के डाली तोड़ दोगे घोंसला, पंछी रहेगा फिर कहो किस  मकान में।
डॉ विष्णु सक्सैना के  कई गीत देह - गंध से प्रवाहित होकर मन के गमले में सदा बहार के पौधों की तरह खिलने के लिए आतुर दिखते हैं। इस प्रतिबिम्ब में वियोग के अतिरिक्त संयोग की भी झलक स्पष्ट दिखलाई देती है.
कितना मिलता था सुख,कुछ खिलाते समय काट लेते थे आपस में हम उँगलियाँ
पहले लिखते थे करते थे फिर रेत पर एक दूजे के नामों से अठखेलियाँ
सीप मैं चूम लूं, शंख तुम चूम लो क्या पता फिर ये चुंबन मिले न मिले
आज आतं·, हिंसा, लूट, बलात्‍कार दंगे जैसे रोग मानवता का कत्ल करने में लगे हुए हैं। इन तमाम रोगों की  एक दवा और उपचार है - प्रेम। प्रेम आदमी की रागात्मक संवेदना की  कुंजी  है। प्रेम ही आनंद से परमानंद की प्राप्ति है। अत : प्रेम से दूर रहना विधाता की व्यवस्था का विरोध करना है। यही बात विष्णु सक्सैना की इन पंक्तियों में सलीके से यूँ अंदाजे - बयां है -
मस्जिद हो तुम अगर मुझे मंदिर ही मान लो।
हो आयतों में गर मुझे श्लोक ही जान लो।
कब  तक  सहेंगे और  रहेंगे अलग  अलग ।
पूजूं  तुम्हें  तुम  मेरे दिल में अजान दो।
कुछ समय से हिन्दी काव्य मंचों की निरंतर गिरावट जग जाहिर है। ऐसी स्थिति में अकवियों की भीड़ में जब किसी कवि सम्मेलन में डॉ विष्णु सक्सैना अपने शालीन श्रृंगार गीत पढ़ते और खूब सुने - सराहे जाते हैं तो हमारी यह आस्था फिर से बलवती हो जाती कि काव्य प्रेमी आज भी अच्छा सुनना चाहते हैं यही समय का शाश्वत् सत्य है।
गीत तो अस्तित्व का नवनीत है, इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि जब तक मनुष्य के सीने में हृदय जैसी कोई चीज धड़कती रहेगी तब तक डॉ विष्णु सक्सैना और उनके जैसे अनेकानेक समर्थ गीतकार कविगण काव्य मंचों पर सर्वप्रिय बनकर हमेशा जन - जन का प्यार और सम्मान पाते रहेंगे।
वाकई, डॉ विष्णु सक्सैना भाग्यशाली व्यक्ति हैं। ईश्वर उनकी हर इच्छा पूरी कर रहा है। इसलिए विष्णुभाई भी सावधानी रखते हुए मर्यादाओं में रहकर उजले मन से प्रभू से अच्छाई का कल्पवृक्ष अपना कर सभी को आजीवन प्रसन्नता के फूल बांटते रहे, ताकि प्रत्येक जगत का प्राणी उनसे ऐसा जुड़ा रहे. जितना के पेड़ों से परिन्दे और फूलों से तितलियाँ। इसी हार्दिकता की हवन - खुशबू में नहाई हुई मस्तुरिया सुगंध सहित दिली - दुआएँ हैं।

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जीत

शंकर पाटिल की मराठी कहानी - जीत
अनुवादक - डॉ. विजय शिंदे


मैदान में चारों ओर भीड़ उमड़ पड़ी थी। चारों तरफ  लोग ही लोग दिखाई दे रहे थे। पास - पड़ोस के गांवों के सारे लोग मुकाबला देखने के लिए मैदान में इकठ्ठा हो रहे थे।
जैसे ही समय नजदीक आने लगा। एक - एक बैलगाड़ी मुकाबले के स्थान पर आकर खड़ी होने लगी। गांव के तुका पाटिल की भी गाड़ी वहां आकर खड़ी हो गई। जैसे ही उसकी गाड़ी आ गई लोगों का हुजूम उसकी ओर उमड़ पड़ा। गाड़ी के चारों तरफ घेरा करके खड़े हो गए। उसकी ओर दर्शक पागलों की तरह देखने लगे।
तुका पाटिल ने गाड़ी को अपना बूढा हर्ण्‍या बैल जुतवाया था। हर्ण्‍या अपने साथी जवान खिलारी गाय और बैलों की  एक अच्छी नस्ल जो केवल पश्चिम महाराष्ट्र में पाई जाती है। सांड़ के साथ खड़ा था और लोग उसकी ओर आश्चर्य से बिना पलक झपकाएं देख रहे थे। असल में लोगों को मालूम भी था कि जवानी में हर्ण्‍या  ने कई मुकाबले जीते थे। उसकी दौड़ ताकत और खासियतें किसी से छिपी नहीं थी। यह सच था कि सारे इलाके में नाम कमाने वाला वह अकेला बैल था। लेकिन अब वह बूढा हो चुका था। उसकी पसलियां निकली थी। वह पूरी तरह थक चुका  था। चेहरे और शरीर पर अब तेज नहीं था। अपने साथी खिलारी जवान बैल के साथ कैसे दौड़ सकगा लोग चकित थे चिंतित भी हो रहे थे और तुका पाटिल को मन ही मन कोस रहे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पागल ने बूढे बैल को क्यों जोता है ?
धीरे - धीरे गाडिय़ों की संख्या बढऩे लगी और मुकाबले की  कतार में खड़ी होने लगी। कुछ बैल फूर - फूराने लगे। किसी के जवान सांड़ जैसे बैल डरकने लगे। कोई गर्दन झुका कर सींग हिला रहा था, और कोई खुरों से जमीन खुरच रहा था। हर्ण्‍या का साथी भी मचल रहा था। सारे लोगों की नजरें हर्ण्‍या पर टिकी थी। वे उसे टकटकी लगा देख रहे थे। हर्ण्‍या  की गति और दौडऩा उन्हें मालूम था। उसकी तेज रफ्तार से सभी परिचित थे। एक जगह पर ठहरी हुई बैलगाड़ी के साथ वह कभी भी शरारतें नहीं करता था। डरकता नहीं। सींग हिलाता नहीं। लेकिन एक बार दौडऩा शुरू हुआ और पहियों की खडख़ड़ाहट कानों पर पड़ी कि उसके पांव हवा से बातें करने लगते थे। पहियों की आवाज के साथ वह छलांगे भरने लगता था। उसे कभी भी हांकने की जरूरत नहीं पड़ती थी। समय आ भी गया तो वह अपने साथी बैल को भी खिंचते हुए दौडऩे लगता था!
हर्ण्‍या की दौड़ के बारे में किसी को शक नहीं था,  लेकिन अब उसकी उम्र हो गई थी। बाजार या मेले जाते वक्त एकाध झलक दिखाना अलग बात होती है और मैदान में उतर कर दौडऩा अलग। यह जिम्मेदारी वह कैसे निभाएगा,  इसकी चिंता दर्शकों को सता रही थी। और इधर तुका बेफिक्र था। हर्ण्‍या  भले ही बूढा हो पर उसका उस पर भरोसा था। लोग चिंतातुर होकर उसकी गाड़ी की ओर देख रहे थे और तुका बेफिक्री से चेहरे पर हंसी बिखराते उनकी ओर देख रहा था।
इशारा हो गया। बैलगाडिय़ां दौडऩे लगी,  पहियों की खडख़ड़ाहट शुरू हो गई। हर्ण्‍या के अंग - अंग में फूर्ति आने लगी। सभी को चिंतित करने वाला बूढा बैल जवान घोड़े के समान लंबी - लंबी छंलागे भरने लगा। उसके पांव जमीन पर ठहरने का नाम नहीं ले रहे थे। साथ वाले दूसरे खिलारी जवान बैल की बाजू पीछे पडऩे लगी। देखते ही देखते बाकी बैलगाडिय़ों को पीछे छोड़ते हुए बूढे बैल की गाड़ी आगे निकलने लगी। तूफानी रफ्तार से हर्ण्‍या अंतर कम करने लगा। दूसरे गाड़ीवान औंधे हो - होकर बैलों पर कोड़े बरसाने लगे। सभी लोग पागलों की तरह आंखें फाड़ कर देख रहे थे।
बैलगाडिय़ां दूर - दूर गई, आंखों से ओंझल हो गई। इधर लोगों की जबान पर हर्ण्‍या की बातचीत शुरू हो गई। जैसे - जैसे बैलगाडिय़ां वापस लौटने का समय हो गया वैसे - वैसे दर्शक गर्दन उठा - उठा कर देखने लगे। आस पास के सारे पेड़ दर्शकों से लदा - लद भर गए। दूर से ही गाड़ीवानों का शोर और पहियों की आवाज कानों पर पड़ रही थी। वैसे ही दर्शकों का मन मचलने लगा यह जानने  के लिए कि किसकी गाड़ी आगे है ? लोग टीलों पर, पेड़ों पर चढ़ - चढ़कर देखने लगे। उसी समय एक पेड़ से कोई जोर से चिल्लाया - बैलगाड़ी आ गई, बैलगाड़ी आ गई। बूढे बैल की ही!
दर्शकों की उत्सुकता चरम पर थी। वे मैदान में इधर - उधर दौड़ कर अपनी जगह पक्की करने लगे ताकि बैलगाडिय़ों को साफ  देख सके। मानो उनकी आंखों मे जान आ गई थी। हर्ण्‍या  को देखने के लिए लोग रास्ते पर दोतरफा खड़े हो गए थे। इतने में तुका पाटिल की बैलगाड़ी नजदीक आ गई। दो - तीन बैलगाडिय़ां उसके पीछे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थी। कांटे का मुकाबला शुरू था। बैलों के नथुनों और मुंह से झाग टपकने लगा था। पहियों की खडख़ड़ाहट कानों में गुंजने लगी थी और हर्ण्‍या का ताकत लगा कर दौडऩा जारी था। पीछे से आ रही किसी भी बैलगाड़ी को वह आगे निकलने नहीं दे रहा था। मुकाबले का अंतिम लक्ष्य नजदीक आने लगा था। हर्ण्‍या के मुंह से निकलने वाली झाग सामने वाले दोनों पैरों पर गिरने लगी थी। उसे अपनी जान की भी परवाह नहीं थी। लक्ष्य था केवल जीत हासिल करना। पीछे से आने वाली बैलगाड़ी के पहियों की जैसे ही आवाज आती वैसे ही वह और अधिक छलांगे भरने लगता था। इसी जोश में तुका पटिल की गाड़ी लक्ष्य को लांघकर थोड़ा आगे जाकर रूक गई। वैसे ही लोगों के हुजूम ने हर्ण्‍या को घेर लिया। दर्शक गर्दन उठा - उठा कर हर्ण्‍या को देख रहे थे।
लेकिन हर्ण्‍या  अपनी ओर उमड़ी भीड़ से मोहित नहीं था, शांत था। उसने प्रतिक्रिया स्वरूप कान नहीं उठा। सींग नहीं हिलाए। गर्दन से जुआ हटाते ही वह धम से नीचे बैठ गया और एकाएक उसकी गुदा से खून की धार बहने लगी। हर्ण्‍या ने गर्दन लुढ़काई और अपने चारों पांवों को फैला कर करवट बदली। उसके  पिछले दोनों पैरों की  एडि़य़ा जमीन पर घिसने लगी। मिट्टी उछल कर ऊपर उठने लगी और गढ्ढा पडऩे लगा।

पता
देवगिरी महाविद्यालय, 
औरंगाबाद

आनन्द एवं प्रेरणा के स्त्रोत : बाल गीत

- समीक्षक -  डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन -
समीक्ष्य कृति  धूल भरे हीरे आनन्द बाल मनो विज्ञानी कवि डा. जयजयराम आनन्द कृत बालोपयोगी काव्‍यकृति है जिसे पढ़कर बालक बालिकायें अति आनन्द की अनुभूति करते है। जैसा कि आप सब जानते है कि आजकल बचपन छीना जा रहा है माता- पिता परिजन भी उनके शत्रु जैसे बने हुए है उन्हे अपने व्यक्तित्व सुख के आगे अपने बच्चों का हित भी नही दिखता। उनके पास संस्‍कार के नाम पर मात्र टी.वी.कार्टून है, डरावनी हारर फिल्में है या आयाघरों में प्रेम अपनत्व से दूर बासी भोजन, डांट- फटकार। ऐसे में जरूरी है बाल साहित्य। डा. जयजयराम आनन्द की यह कृति बच्चों को  उनका बचपन सौंपती है और सहज ही अपनत्व की मिठास, प्यार और संस्‍कार  देती है। वे अपनी पहली कविता- विनती में ही सच्चाई का पाठ पढ़ाते है-
माँ वरदान मुझे दे दो।
जो कुछ बोलूं सच सच बोलूं
सोच समझकर रूक रूक बोलूं
बचपन कविता में उनकी प्रेरणा है कि
पढ़े लिखे हम सब बचपन में,
खेले कूदे मगन रहें
संगी साथी सब अच्छे हों
जीवन पथ में सफल रहें।
कविताओं में आगत महापुरूषों के नामों यथा भामाशाह, ध्यानचंद्र, विन्द्रा, ·पिलदेव, सानिया मिर्जा, विवेकानन्द, सीता, सत्यवती आदि बाल पाठको के मन में जिज्ञासा जगाते है और वे उनके चरित्र को जानने का प्रयास करेंगे, ऐसा मेरे विश्वास है।
  डा. आनन्द आधार शिला कविता में लिखते है कि-
  बचपन कोरा कागज जैसा
  जो चाहो सो लिख दो।
  लेकर रंग- बिरंगी ची
  मनमाने रंग भर दो।।
यदि इसी सोच पर स्‍कूल  शिक्षा मिले तो बच्चों की आधारशिला मजबूत हो सकती है। कवि अब पुरातन पंथी नही है वह आधुनिक तकनीक  से भी बच्चों को जोडऩा चाहता है तभी तो दिशा कविता में वह चिठिया लिखने के स्थान पर दूरभाष करने की सलाह देता है जो क्यों न परिचित करवाया जाये। बच्चों माता- पिता के प्रति आदर भाव से जुड़े रहे उनकी अच्छाइयों को ग्रहण करें इसलिए अम्मा की पहचान कवि इस रूप में कराते है-
हार- खेत का हिसाब रखना
खाद- बीज की किताब रखना
लाभ हानि की चिन्ता करना
बापू के संग जीना मरना
कौन बीज किस खेत उगेगा
कौन कहाँ या नकद मिलेगा
अम्मा को है ज्ञान
आज टूटते परिवारों को बचाना समय एवं समाज की जरूरत है। आज के बच्चे बड़े  होकर कल का भविष्य बनते है और जब वे देखे कवि उनके माता- पिता की उपेक्षा कर रहे हैं तो कल वे भी उनका अनुसरण करेंगे। यह स्थिति न बने इसलिए पुश्तैनी घर कविता में आनन्द कहते है कि -
घर के मुखिया दादा- दादी
सबकी चिन्ता दादा- दादी
चूल्हा- चौंका सबका ए·
सबके पीछे दादा- दादी।
कभी किसी का कौर बंटा न किश्तों में।।
डा. जयजयराम आनन्द मात्र बच्चों की पसंद का ही विचार नही करते अपितु वह बच्चों को यह भी देना चाहते है जिससे वे अपना मानस बना सके कि उन्हे कैसा समाज चाहिए और उन्हे स्वयं कैसा बनना है। वे विज्ञापन में औरत के उथरे तन- मन पर यह कहकर प्रश्न उठाते है कि विज्ञापन में औरत नाचे उथरे तन मन लिखती देह निबन्ध पैसों से अनुबन्ध बंधुआ मजदूरी आओ हम सब दीप जलाएं आदि प्रसंग उठाकर वे अनेक प्रश्नों के समाधान प्रस्तुत करते है- अच्छी बात सिखाई होती जीवन में सुखदायी होती। इस तरह धूल भरे हीरे आनन्द कर सभी कविताएं सरस, सहज, भावना प्रधान, प्रेरणास्पद एवं उपयोगी है। कृति का  कवर पृष्ठ बच्चों के हंसते, मुस्‍कुराते, गंभीर, जिज्ञासा भरी आंखो युक्त चेहरों से बाल आनन्द की सृष्टि कर रहा है। मैं समझता हूँ कि ऐसा बचपन बना रहें तो कृतिकार डा. जयजयराम आनन्द का श्रम सफल होगा। मेरी हार्दिक बधाई।

पता 
सहायक प्राध्‍यापक 
प्रवर : हिन्‍दी विभाग 
सेवा सदन महाविद्यालय, बुरहानपुर ( म़ध्‍यप्रदेश )