सोमवार, 16 सितंबर 2013

अगस्‍त 2013 से अक्‍टूबर 2013

सम्पादकीय -
अपनी प्रतिभा को कब पहचानेगी छत्‍तीसगढ़ सरकार
उपेक्षा और अनादर का दंश झेलती प्रतिभाएं
पाठकों के पत्र -
निबंध
हिन्दी का आख्यायिका साहित्य / पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
आलेख
स्वतंत्रता आंदोलन में छुईखदान का योगदान / वीरेन्द्र बहादुर सिंह
शोध लेख
जनगीतों का लोक महत्व / यशवंत मेश्राम
कहानी
मेरा वतन / विष्णु प्रभाकर       
नियॉव के जीत / सुरेश सर्वेद
औरत के खिलाफ औरत  / अर्पणा शाह
व्यंग्य
मास्टर चोखेलाल भिड़ाऊ चॉंद पर / कुबेर
साक्षात्‍कार
छत्तीसगढ़ का आइना है '' चंदैनी गोंदा '' / वीरेन्द्र बहादुर सिंह
कविता
तुम या मैं - शिखा वाष्णेय बस औरत हूं और कुछ नहीं - शीला डोंगरे
ग़ज़ल 
सारे बेदर्द ख्‍यालत : चांदनी पांडे
अशोक अंजुम की दो ग़ज़लें
नवगीत 
रजनी मोरवाल के दो नवगीत
गीत
उलझा हुआ सबेरा है - जितेन्द्र जौहर दिल पे मगर हिन्दुस्तान लिखना - श्याम सखा ' श्याम'
छत्‍तीसगढ़ी गीत
गरजत बरसत - रामकुमार साहू ' मयारु ' चंदन हे मोर देस के माटी - डॉ. मदन देवांगन
पुस्तक समीक्षा
इसे छत्तीसगढ़ के हर व्यक्ति के हाथों में जाना चाहिए 
समीक्षक - मिलिंद साव
साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियाँ
साकेत का वार्षिक साहित्यिक समारोह एवं वैचारिक गोष्ठी संपन्न
छत्‍तीसगढ़ उच्‍च शिक्षा का नया शिखर
स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं पाठय पुस्‍तक निगम
स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं वीग्रुप ऑफ कम्‍पनीज़

उपेक्षा और अनादर का दंत झेलती प्रतिभाएं

अपनी प्रतिभाओं को कब पहचानेगी छत्‍तीसगढ़ सरकार

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के  बाद ऐसा प्रतीत होने लगा था कि वर्षों से दबी कुचली छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएँ मुखरित होंगी और मान-सम्मान पाने में उनक  लिए कहीं कोई रूकावट पैदा नहीं होंगी। मैं छत्तीसगढ़ी लोकसंस्‍कृति, कला और साहित्य के क्षेत्र में नि:स्वार्थ भाव से सृजनरत विभूतियों की ओर छत्तीसगढ शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा। इन क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएँ पहले भी मुखरित होती रही हैं परन्तु पृथक राज्य बनने के बाद तो इन्होंने अपनी प्रमिभा का पुन: पूरे दमखम के साथ लोहा मनवाया है। छत्तीसगढ़ में ऐसी-ऐसी प्रतिभाएँ हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पूर्व से ही छत्तीसगढ़ी लोक संस्‍कृति, कला और साहित्य के उत्थान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी लोक संस्‍कृति,कला और साहित्य के इन प्रतिभाओं का सम्मान न हो पाना हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है? विद्वानों ने कहा है - जो राज्य अपनी प्रतिभाओं का सम्मान करना नहीं जानती, उसका पतन अवश्यंभावी है।
’ विचार वीथी ’ के पिछले कई अंकों में मैंने इस मसले को उठाया है, पर चाटुकारों से घिरी सरकार के कानों में जूँ तक नहीं रेंगी। इस विषय पर पुन: कलम चलाने के पीछे मेरा उद्देश्य सही प्रतिभाओं को सामने लाने का है ताकि स्मृतिहीनता तथा दृष्टिहीनता की शिकार शासन का ध्यान इन प्रतिभाओं की ओर जा सके।
छत्तीसगढ़ का ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो छत्तीसगढ़ी लोक संस्‍कृति , लोक साहित्य तथा इनसे जुड़ी प्रतिभाओं को भव्य मंच प्रदान कर  इसकी  चमक और आभा को राज्य ही नहीं देश के कोने कोने में बगराने वाली संस्था ’चंदैनी गोंदा’ के बारे में न जानता हो ? छत्तीसगढ़ का बच्चा-बच्चा इसके बारे में जानता है, नहीं जानती है तो केवल यहाँ की सरकार, और सरकार  चलाने वाले लोग। इस संस्था के अमर शिल्पी दाऊ रामचंद्र देशमुख को शासन की ओर से क्या वह सम्मान मिल पाया जिसका कि वे हकदार हैं। छत्तीसगढ़ी नाचा के मदन निषाद, फिदाबाई जैसे अनेक अमर कलाकार जिनकी प्रतिभाओं के आगे बॉलीवुड के भी बड़े-बड़े अभिनेता और निर्देशक नतमस्तक होते थे, क्या उन्हें अब तक वह सम्मान मिल पाया है जिनका कि वे हकदार हैं? नाचा में जब खड़े साज का युग था तब से कमर में हारमोनियम बांधकर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को मधुर स्वर देने वाले खुमान साव आज भी संगीत साधना में लीन हैं, उन्हें आज कौन नहीं जानता। अब तक छत्तीसगढ़ शासन उन्हें सम्मानित क्यों नहीं कर सकी है ? पच्यासी वर्ष की अवस्था में भी संगीत-साधना में रत तथा दाऊ रामचंद्र देशमुख की अमर कृति ’चंदैनी गोदा’ को जीवित रखने वाला संगीत का यह महान साधक अपने आत्मस्वाभिमान को ताक में रखकर शासन से सम्मान की याचना करे, छत्तीसगढ़ शासन क्या यही चाहती है? छत्तीसगढ़ी लोक संस्‍कृति कला और साहित्य को शिखर तक पहुँचने वाले खुमानलाल साव की प्रतिभा आखिर और कब तक तिरस्‍कृति, उपेक्षित और अनादरित होती रहेगी?
छत्तीसगढ़ में तिरस्‍कृत, उपेक्षित और अनादरित होने वाली प्रतिभाओं में छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार भी शामिल हैं। जब पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का मानचित्र भी परिकल्पना में नहीं आया था, जब यहाँ के तथाकथित शिष्ट लोग छत्तीसगढ़ी को भाषा तो क्या बोली मानने और बोलने में भी अपमानित महसूस करते थे, उस समय छत्तीसगढ़ी संस्‍कृति और सभ्यता को छत्तीसगढ़ी भाषा में ही सहेज कर रखने के प्रयास में और छत्तीसगढ़ी भाषा की अस्मिता के लिये संघर्ष के आह्वान में, छत्तीसगढ़ी भाषा में ’गरीबा’ महाकाव्य की रचना करने वाले राजनांदगाँव जिला के ग्राम भंडारपुर करेला के निवासी पं. नूतन प्रसाद शर्मा आज भी साहित्य साधना में रत हैं, पर ऐसी प्रतिभा को पूछने वाला आज यहाँ कौन है?
टेलिविजन आज सामाजिक जीवन का आवश्यक और अभिन्न अंग बन चुका है। भारत के हर क्षेत्रीय भाषा का अपना कम से कम एक चैनल तो अवश्य है, परंतु बड़े खेद का विषय है कि छत्तीसगढ़ी भाषा का अपना कोई भी चैनल टेलिविजन पर मौजूद नहीं है। ऐसे में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित इंटरनेट की पत्रिका ’गुरतुरगोठ’ के संपादक संजीव तिवारी का हमें आभारी होना चहिये। विगत पाँच वर्षों से वे अपने अभियान में समर्पित भाव से जुटे हुए हैं। इस कार्य हेतु 14 - 15 सितंबर 2013 को वे नेपाल की राजधानी काठमांडु में वहाँ के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित होने जा रहे हैं, हमें संजीव तिवारी पर गर्व है, उन्हें कोटिश: बधाइयाँ। हमें उस दिन और अधिक गर्व महसूस होगा जिस दिन छत्तीसगढ़ की सरकार उन्हें सम्मानित करेगी। पता नहीं हमारी प्रतिभाओं के लिए ऐसा दिन आयेगा भी या नहीं ।
राज्योत्सव के अवसर पर बालीवुड के सितारों को चंद घंटे की  प्रस्तुतिकरण के लिए राजकोष से करोड़ों रूपये बाँटने वाली छत्तीसगढ़ की सरकार पता नहीं कब अपनी प्रतिभाओं को पहचान पायेगी, सम्मानित कर पायेगी। सम्‍पादक
अगस्‍त 2013

पाठकों के पत्र अगस्‍त 2013


बहुत ही स्तरीय पत्रिका है विचार वीथी

विचार वीथी का मई - जुलाई अंक मिला। अंक अच्छा है। मुख्यपृष्ट ही आपके लोक को उभारता है और अंदर की सामग्री पढ़ने को आमंत्रित करता है। छत्तीसगढ़ी भाषा भोजपुरी के कितना निकट है, जिस क्षेत्र का मैं रहवासी हूं यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई। इसमें आस्कर वाईल्ड की कृति द नाइटिंगल एण्ड द रोज का अनुवाद पढ़कर एक अलग आस्वाद मिला। कुबेर जी बधाई के पात्र है। रचनाओं का चयन पठनीयता के आधार पर कर रहें हैं यह आश्वस्ति की बात है। विचार वीथी बहुत ही स्तरीय पत्रिका है इसमें संदेह नहीं। शुभकामनाओं के साथ।
                    केशव शरण, वाराणसी

संपादकीय अउ कुबेर के छत्तीसगढ़ी अनुवाद मन ल भा गे, बधाई

विचार वीथी मिलिस। संपादकीय पढ़ेंव। छत्तीसगढ़ी भाषा के हो हल्ला के खिलाफ अपन विचार व्यक्त करे हव। सही म आज के जुग म मानकीकरण के बात फिजूल हे। कोन भाषा आज निमगा रही गे हे अउ भाषा ल निमगा रख के कोन तीर मार सके हे?  भाषा बेवहार से स्वरुप धारण करथे। जउन सब्द बोले समझे में सरल होथे वो ह जबान म चढ़ जथे। बोलने वाला कोनो भी भासा के बोलइया राहय। दूसर दूसर भासा ल मिंझारबे त निमगावादी मन खिचाड़ी कहि के हंसी उड़ाथे। उंखरे मन से सवाल हे के बेवहार म का उन खिचड़ी खाय ले अपन आप ल बचा पाथे? खिचड़ी म अगर सुवाद हे त खाय म का के परहेज? एक गुस्ताखी करे के हिम्मत करत हौं काबर के सलाह पठोय के आमंत्रण आपे कोती ले मिले हे। पत्रिका के मंय सुरूच ले प्रसंसक हंव। छत्तीसगढ़ में प्रकाशित हिन्दी के स्तरीय पत्रिका म विचार वीथी के नाव ल कोनो नई भुला सकय। कुबेरके छत्‍तीसगढ़ी अनुवाद मन ल छु दीस। भाई ल बधाई.....।

                    दिनेश चौहान, नवापारा, राजिम

विचार वीथी पढ़कर मन गदगद हो गया

विचार वीथी पढ़कर मन गदगद हो गया। मुझे यह नहीं मालूम था कि छत्तीसगढ़ से इतनी स्तरीय पत्रिका निकलती है। वास्तव में छत्तीसगढ़ विभिन्न मामलों में संपन्न राज्य है। वन सम्पदा, खनिज सम्पदा के साथ ही प्रतिभा संपन्न इस राज्य को किसी की नजर न लगे यही कामना करता हूं। विचार वीथी छत्तीसगढ़ के जनजीवन, संस्कृति के अनुरुप सदैव निकलती रहे यह दिली तमन्ना है।

                    अशोक बजाज, अंधेरी, मुंबई

क्रमश : हिन्दी का आख्यायिका साहित्य


भूल सुधार
'' विचार वीथी  ''  के मई अंक में पृष्ट क्रमांक - 6 में डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म स्‍थान '' राजनांदगांव ''  छप गया है जबकि उनका जन्म छत्‍तीसगढ़ के  राजनांदगांव जिले के ''  खैरागढ़राज '' में हुआ था  इसे सुधार कर पढ़ने का कष्ट करें। प्रस्तुत है गतांक से आगे ....।
                                                                                                                             सम्पादक

डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
हिन्दी के आधुनिक आख्यायिका लेखकों में तीन लेखकों ने विशेष प्रसिद्धि पाई - एक जैनेन्द्र कुमार, दूसरे बेचन शर्मा उग्र ओर तीसरे प्रसाद जी। प्रसाद जी काव्य के क्षेत्र में जितने प्रसिद्ध हैं, उतने ही आख्यायिका के क्षेत्र में भी। दोनों में भावों की नवीनता के साथ शैली की नवीनता है। उग्र जी ने कुछ समय तक अपनी शैली की उग्रता से हिन्दी साहित्य में एक धूम-सी मचा दी। वे लोकप्रिय भी खूब हुए। कथा का विषय चाहे जो हो, कथाकार यदि निपुण है तो वह सभी विषयों में एक हृदयग्राहिकता ला देता है। हम लोगों के नगर में भी दो-एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कहानियों को सुनने के लिए उन्हें घेरे रहते हैं। मैंने भी ऐसे लोगों की कहानियाँ सुनी है। साधारण जीवन की साधारण बातों को भी वे ऐसे अच्छे ढंग से बतलाते हैं कि श्रोताओं को उन्हें सुनकर एक उल्लास होता है। बात सब यथार्थ जगत की रहती हैं। उग्र जी की कहानियों में भी कला की यही विशेषता है। वे ऐहिक जगत ही यथार्थ बातों का वर्णन करते हैं। उनके वर्णन में स्पष्टता है। वे जो चाहते हैं, निस्संकोच कह देते हैं। उन्होंने संसार को जैसा देखा है, समझा है, उसको उसी रूप में कहने में उन्हें कोई झिझक नहीं है। उनमें भावुकता की कृत्रिमता नहीं है। वे मनुष्य की वासनाओं को प्रेम का आवरण देकर उज्जवल नहीं बनाते। जो वासना है, वह वासना ही है। उसकी उग्रता भी जीवन में प्रगट होती है। मनुष्य यदि अपने अंतस्तल की सच्ची परीक्षा करने बैठे तो वहाँ वह वासनाओं की संचित पंक-राशि ही देखेगा। उच्च या नीच, उत्कृष्ट या निकृष्ट सभी भावों के भीतर एक गुप्त लोलुपता बनी रहती है। हम लोगों का गर्व, माहात्मय, वैभव, सभी के भीतर वह लोलुपता विद्यमान रहती है। उग्र जी ने विषयों की महत्ता या हीनता की ओर ध्यान न देकर जीवन की कोई भी बात लेकर उसको रसमय बनाने का प्रयत्न किया है और इसमें संदेह नहीं कि उनके वर्णन में कथा का रस अच्छी तरह विद्यमान है। उसी के साथ उग्र जी के व्यंग्य, तिरस्कार, विषाद, आक्षेप और उपहास ने उनकी सभी रचनाओं में एक ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दिया है कि पाठक उनकी ओर आप से आप आकृष्ट हो जाते हैं। उग्र जी में कवि की भावुकता नहीं है और न दार्शनिक की गंभीर समीक्षा है; उनमें गुरू का उपदेश नहीं है और न नेता का सन्मार्ग प्रदर्शन है। उन्होंने एक दर्शक की तरह उस संसार का वर्णन किया है, जिससे वे अच्छी तरह परिचित हैं और जिसकी सभी लीलाओं में उन्होंने मनुष्यों की दुर्बलता, अक्षमता नीचता देखी है। जीवन की सभी लीलाओं को देखकर कभी उनको विरक्ति होती है और कभी आश्चर्य, कभी उन्हें विषाद होता है और कभी ग्लानि, कभी वे तिरस्कार करते हैं और कभी उनका उपहास करते हैं। पर वे निरपेक्ष समीक्षक की तरह उन लीलाओं में तटस्थ नहीं रहते। वे सभी स्थितियों में प्रविष्ट होकर जीवन के एक रस का भी अनुभव करते हैं। उनकी यह रसानुभूति उनके सभी आक्षेपों, तिरस्कारों और उपहासों के भीतर विद्यमान है।
प्रसाद जी हिन्दी के प्रसिद्ध आख्यायिका लेखक हैं। उनके सभी पात्र असाधारण हैं, क्योंकि असाधारण भावों से ही वे युक्त हैं। उनका बूढ़ा साईं साधारण बैरागी नहीं है, उसमें माया नहीं है, मोह नहीं है और न ही क्षुधा और तृष्णा। उसकी इच्छा असाधारण है, उसे तृप्ति तभी होती है जब दस वर्ष का एक बालक उसे रोटी देता है। वह बालकों से अपना गूदड़ छिनवाने में और फिर उनसे गूदड़ छीनने में ही आनंद लाभ करता है। इसी प्रकार उनका बंजारा उतना ही भावुक नवयुवक है जितनी भावमयी उसकी प्रियतमा मौनी। बंजारा अपना लादने का व्यवसाय मौनी के लिए ही छोड़ देना चाहता है और मौनी भी लादने के लिए बोझ इक_ा करना छोड़ देती है। दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं में प्रेम होने पर भी अनन्त वियोगी हैं। मौनी आशा में अनमनी बैठी रह जाती है और नन्दू हताश होकर घर लौट आता है। उनके इस वियोग का एकमात्र कारण यह है कि नन्दू भावुक है और मौनी भावमयी।
हिन्दी के एक दूसरे लब्धप्रतिष्ठ लेखक जैनेन्द्र जी की सभी कहानियों में विलक्षण भावुकता है। उसके सभी पात्र भाव जगत के हैं। लौकिक व्यापारों से उनका कोई प्रयोजन ही नहीं है। लौकिक बंधनों से वे सभी मुक्त हैं। उच्छृँखलता ही उनके लिए नियम हैं स्वच्छन्दता ही उनकी नीति है। उनके सभी कार्यों में एक विचित्रता है, एक अपूर्वता है। उनमें अल्हड़पन है, हठ है और प्रेमोन्माद है। भाव के आवेश में आकर वे सभी कुछ का कुछ कर बैठते हैं। ओले उन्हें नहीं रोक सकते, इन्सान उन्हें नहीं रोक सकता। बादल गरजे, अथवा बिजली चमके, उनकी नायिका काली दुनिया में ही जायेगी। ऊपर आसमान होगा और नीचे धरती और वह निश्चिन्त होकर अपने प्रियतम के पास चली जाएगी। उनके सभी पात्र मानों यही कहते हैं कि हम तो वही करेंगे जो हम चाहेंगे। परिणाम की उन्हें चिंता नहीं, लोकनिन्दा की उन्हें आशंका नहीं। यह उन्हीं की कहानियों में संभव है कि रेल कम्पार्टमेंट में भेट हो जाने पर एक अपरिचित व्यक्ति से एक युवती का इतना घनिष्ठ संबंध हो जाय कि वह घर में जहर खाकर और फिर बाद में उसी युवक से फोटो खिंचवाकर उसी के सामने मर जाय।
एक पाश्चात्य लेखक ने एक विज्ञान विशारद् अध्यापक की कथा लिखी है। उसने वृद्धावस्था में एक सुंदरी से विवाह किया। उसी के घर में उसका एक प्रिय छात्र आया करता था। उस प्रिय छात्र से उसकी स्त्री का प्रेम-संबंध हो गया। कुछ दिनों के बाद अपने उस छात्र के व्यवहार से कुछ रूष्ट होकर अध्यापक ने उसे अपने घर से अलग कर दिया। परन्तु उस छात्र के चले जाने पर उस स्त्री की अवस्था दयनीय हो गई। तब उसने उस छात्र को फिर अपने घर में आश्रय दिया। इसके बाद उस स्त्री को एक पुत्र उत्पन्न हुआ। तब अपने को उस पुत्र का पितामह मानकर एक उल्लास का अनुभव किया।
इसी प्रकार जैनेन्द्र जी के ' मास्टर साहब ' अपनी दुश्चरित्र स्त्री की सभी प्रेम-लीलाओं को चुपचाप सहन कर लिया और जब वह स्त्री अपने नवयुवक नौकर के साथ घर से भाग कर चली गई तब उन्होंने यह समझकर संतोष कर लिया कि वह भाग कर नहीं गई है। इसके बाद अपने तरूण प्रेमी से परितृप्त होकर और तरह-तरह के कष्ट सह कर जब वह स्त्री फिर मास्टर साहब के घर में लौट आई तब उन्होंने सानंद उसको लक्ष्मी कहकर उसका स्वागत किया।
यह सच है कि भगवान क्राइस्ट की तरह किसी भी दुष्ट-चरित्र पुरूष और स्त्री को कठोर दण्ड देने के समय हम सभी लोगों को यह सोच लेना चाहिए कि जिसने कभी कोई दुराचार नहीं किया है वह उस कठोर दण्ड की व्यवस्था करे और तब ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं निकला जिसने किसी न किसी स्थिति में पड़कर कोई न कोई पाप नहीं किया है। तब हम सभी में दुराचारियों के प्रति एक सहानुभूति का भाव उत्पन्न हो जाता है। पर पाप या दुराचार स्वयमेव पुण्य या सदाचार तो नहीं हो सकता। नीति का कोई भी तो विचार जीवन में काम करता ही है। यदि कोई स्त्री अपनी युवावस्था में किसी से प्रेम करने लगे तो यह उसकी दुर्बलता अवश्य है, पर समझाने पर भी, दण्डित होने पर भी, विवाहित होने पर भी यदि वह कुपथगामिनी बनी रहे तो उसकी उस दुर्बलता में भी एक दृढ़ता आ जाती है, उसके कारण उसके चरित्र का उत्कर्ष नही होता, उसका पतन ही हो जाता है। यही कारण है कि वह एक को छोड़कर दूसरे की अनुचरी बन जाती है और दूसरे से परित्यक्त हो जाने पर वह तीसरे की भी सहचरी हो सकती है। उसकी इस स्थिति में एकमात्र आर्थिक व्यवस्था ही काम नहीं करती। उसमें तो वासना प्रेरित करती है, वह अध:पतन की ओर ले जाती है। यही कारण है कि त्याग-पथ की नायिका पाठकों के लिए सहानुभूति अथवा क्षमा की पात्र नहीं होती। जगत को कठोर कह देने से, माँ को कठोर मान लेने से, मति को मूर्ख और हृदयहीन बना देने से उसके चरित्र में उज्ज्वलता नहीं आती। वह शरद् बाबू की पतिता नायिका नहीं है जिसका अंतस्तल सदैव पवित्र रहता है और जो निरपराध होकर भी दण्डित हो जाती है। समाज के विरूद्ध भी वह किसी प्रकार का दोषारोपण नहीं कर सकती। उसने समाज के प्रति विद्रोह करने का कभी साहस भी नहीं किया। उसने जो कुछ भी किया स्वयं अपनी इच्छा से प्रेरित होकर ही किया। अतएव किस न्यायबुद्धि से प्रेरित होकर न्यायाधीश ने अपना पद छोड़ दिया यह तो लेखक ही जानें, पर इसमें संदेह नहीं कि उसके आचरण के प्रति मनुष्यों की सहानुभूति नहीं होती है। उसमें मेडम बोमेरी की तरह वह वासना की उग्रता भी नहीं है जो उसको विपथ की ओर सहसा खींच ले जाती है।
जैनेन्द्र जी ने मनुष्यों के भावजगत को लेकर अपने कथा-साहित्य की सृष्टि की है। अनन्त समुद्र की तरह वह भावसागर भी असीम है। उसका कोई अन्त नहीं है। उसमें जो प्रचण्ड लहरें उठती हैं वे लक्ष्यहीन हैं और बाधाहीन हैं। यह कोई नहीं कह सकता कि कब उनकी गति किधर जाय। किसी भी कारण से क्षुब्ध होकर वे किसी भी समय पंचण्ड होकर किसी ओर बह सकती है। मेरे लिए कथा-साहत्य में जैनेन्द्र जी का वही स्थान है जो काव्य साहित्य में महादेवी वर्मा का है।
साधारण मनुष्य के साधारण जीवन में जो साधारण बातें होती रहती हैं उनकी ओर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती। वे मनुष्य के अत्यंत रहस्यमय हृदयजगत में प्रविष्ट होर भावों की जो लहलाएँ देखते हैं उससे उसे स्वयं विश्मय होता है। वहाँ जीवन की वेदनाएँ मेघों की श्याम घटाओं की तरह उनके चित्त को अन्यथा तृप्त कर देती है। वे कुछ देखते हैं, कुछ समझते हैं और कुछ कहते हंै। उनके भावों में जो सौन्दर्यमय स्पष्टता है उसका कारण यह है कि जीवन की यथार्थता को उनकी कल्पना ने श्यामघटा से आच्छन्न कर लिया है।
साधारण लोगों के लिए जीवन पहेली नहीं है, वह छायामय नहीं है, उसमें सत्य की कठोरता है, उसमें शुष्कता है, कष्ट है, प्रयास है, चिंता है और व्यग्रता है। हम यदि अपने को धोखा देना न चाहें तो सत्य के उज्ज्वल प्रकाश में हमारे लिए जीवन का यथार्थ रूप प्रगट हो जायेगा।               समाप्त .....

स्वतंत्रता आंदोलन में छुईखदान का योगदान

  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह
छुईखदान के घोषित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
श्री दामोदर प्रसाद त्रिपाठी, पूनमचंद साखंला, नत्थूलाल बरई, अमृतलाल महोबिया, बाबूलाल चौबे, दुखूराम उर्फ भोलाराम महोबिया, समारूराम महोबिया, रामगुलाम पोद्दार, गोवर्धनराम वर्मा, बुधराम पोद्दार, दामोदरलाल ददरिया, पदमाकर त्रिपाठी, लक्ष्मीचंद, झाडूराम महोबिया, झुमुकलाल महोबिया,झाडूराम बरई, अमरलाल महोबिया, शरदचंद सिंघल, उदयराम बरई, सुकान लोधी, गोपालदास, मेलाराम, बीरबल लोधी, गयाराम तेली, हरी तेली, शत्रुघन प्रसाद, मकरू केंवट, सुमेरू गोड़, हृदय गोंड़, पदम केंवट, थनवार केंवट, लतेल केंवट, सांवत गोड़, झल्लू गहिरा, सुकालू लोधी, धनश्याम केंवट, रामेश्वर मरार, मुकुंद गोंड़, बंशी तेली, सजना गहिरा, बतली गोड़, सगरी कंवर, दौलत चमार, सुखराम मरार, कन्हैयालाल बख्शी, बल्ले लोधी, हरदेव लोधी, राजाराम गहिरा, धनश्याम कंवर, गौकरण गोंड़, सुखराम, कन्हैयालाल, पूरनलाल, भुखऊ, माजून गोड़, भागचंद, गठरूलाल, अमरलाल महोबिया एवं  श्री गुलाबदास वैष्णव।
छत्तीसगढ़ के 14 रियासतों में से एक छुईखदान रियासत का राजनैतिक, सांस्कृतिक, साहित्यक एवं धार्मिक गतिविधियों में सदैव अग्रणी स्थान रहा है। भारतवर्ष में जिन कारणों से राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ उनसे छुईखदान भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। यहां भी मातृभूमि को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए असंतोष के स्वर मुखरित हुए।
छुईखदान के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं पत्रकार स्व. डॉ. रतन जैन के अनुसार तत्कालीन छुईखदान रियासत में आजादी के आंदोलन का सूत्रपात सन् 1920 के आसपास हुआ। उस समय राजनांदगांव, छुईखदान, छुरिया, बादराटोला, कौड़ीकसा, घोघरे और कवर्धा भी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख केन्द्र थे। अप्रैल 1920 में राजनांदगांव में मजदूरों की 36 दिनों की ऐतिहासिक हड़ताल और 21 दिसम्बर 1920 को महात्मा गांधी के प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन ने यहां के लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उस समय अनेक अनाम सेनानियों ने आजादी की मशाल अपने हाथों में थामीं। संभवत: यही कारण है कि जब 26 दिसम्बर 1920 को नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो छुईखदान का एक शिष्टमंडल इसमें सक्रिय रूप से सम्मलित हुआ।
 1920 में ही गांधीजी के आव्हान पर देशव्यापी असहयोग आंदोलन शुरू हुआ इसमें ठाकुर प्यारेलाल सिंह के भाग लेने के कारण राजनांदगांव रियासत में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी थी। गांधीजी ने अपने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान लोगों से कांग्रेस के कार्यक्रमों में सक्रियता से भाग लेने की अपील की थी जिसका असर  व्यापक रूप से जनमानस पर पड़ा था। कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के बाद ही छुईखदान में  'गौ सेवा संघ' के माध्यम से रियासती आंदोलन का आगाज हुआ। यह कालखण्ड छुईखदान रियासत में आजादी के आंदोलन का शैशवकाल था।
सन् 1920 से शुरू हुआ आजादी का आंदोलन छुईखदान में 1929 तक असंगठित रूप से छिटपुट ढ़ग से चलता रहा। सन् 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में रावी के तट पर तिरंगा झण्डा फहराकर पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास किया। सन् 1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया तथा 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने प्रसिद्ध डाण्डी यात्रा प्रारंभ कर इस आंदोलन का श्रीगणेश किया। जिसके परिणाम स्वरूप समूचे देश में आंदोलन प्रारंभ हो गया जिससे सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ भी आंदोलित हो उठा था। सन् 1930 में कांग्रेस के विदेशी वस्त्रों की होली जलाने एवं विदेशी मिल के कपड़ों के बहिष्कार के अखिल भारतीय आह्वान का क्रियान्वयन भी छुईखदान के तत्कालीन स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किया गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि सन् 1931-32 में छुईखदान के प्रमुख सेनानियों का ठाकुर प्यारेलाल सिंह से घनिष्ठ संपर्क स्थापित हो चुका था। जब उन्होंने छत्तीसगढ़ की रियासतों में कांग्रेस संगठन एवं संघर्ष मोर्चा बनाने का कार्य प्रारंभ किया तो छुईखदान के लोगों की जागरूकता पर प्रसन्न होकर उन्होंने छुईखदान में अपना अस्थाई मुख्यालय भी बनाया था। यहां के कार्यकर्ताओं के विशेष सहयोग से अन्य रियासतों में भी कांग्रेस संगठन का निर्माण करने की योजना फलीभूत हुई।
सन् 1931-32 से 1938 तक रियासती जनता संगठन द्वारा तत्कालीन शासन के विरूद्ध  उग्र आंदोलन से रियासती आंदोलन चलता रहा, जिसे पूज्य बापू महात्मा गांधी का आशीर्वाद भी प्राप्त था। इस आंदोलन में सन् 1932 में श्री गोवर्धन राम वर्मा एवं अन्य सेनानी राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किये गये। उस समय स्थानीय जेल आंदोलनकारियों से ठसाठस भर चुका था। जिसे नागपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र   'लोकमत'  ने  'छुईखदान की जेल सत्याग्रहियों से ठसाठस' शीर्षक से प्रथम पृष्ठ पर प्रमुख रूप से प्रकाशित किया था। इस आंदोलन में शामिल लोगों को जेल में अनेक यातनाएं सहनी पड़ी। 22 नवम्बर 1938 में छुईखदान स्टेट कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई, जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री गोवर्धनराम वर्मा चुने गये। यहीं से कांग्रेस ने नेतृत्व में संगठित रूप से आजादी का आंदोलन प्रारंभ हुआ।
सन् 1938 में गांधी जी ने यह आह्वान किया कि अंग्रेजी सरकार की गुलामी से मुक्त होने के लिए स्थानीय समस्याओं को आधार बनाकर असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया जाये। उस समय रियासतों की दमनकारी नीति, बेगारी प्रथा और निस्तारी की समस्या के कारण आये दिन रियासतों में राजा और प्रजा के बीच तनाव बना रहता था। गांधीजी के आह्वान पर 1939 में  'रिस्पान्सिबल गवर्नमेंट '  की मांग को लेकर छुईखदान स्टेट कांग्रेस कमेटी द्वारा श्री गोवर्धनराम वर्मा के नेतृत्व में प्रथम आंदोलन का श्रीगणेश किया गया। इसी साल लोगों ने जंगल सत्याग्रह भी शुरू किया। सत्याग्रहियों ने गण्डई की ओर प्रस्थान किया पर उन्हें गिरफ्तार कर छुईखदान लाया गया इसमें श्री समारूराम महोबिया का नाम उल्लेखनीय है।
सन् 1939 में रियासती शासन के खिलाफ उत्तरदायी शासन प्राप्त करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री गोवर्धनराम वर्मा के नेतृत्व में पुन: आंदोलन शुरू किया गया। इस आंदोलन को त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह, डॉ. बल्देव प्रसाद एवं हर्षुल मिर का मार्गदर्शन प्राप्त था। छुईखदान की जनता ने कर न पटाओ आंदोलन किया। सरकार ने इस आंदोलन के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की। संपूर्ण छुईखदान रियासती क्षेत्र में प्रतिबंधात्मक धारा 144 लागू कर दी गयी। सत्याग्रही लगातार गिरफ्तार होते रहे लेकिन छुईखदान की जनता ने शासन का विरोध जारी रखा। सन् 1938-39 के आंदोलन में भाग लेने के कारण श्री रामगुलाम पोद्दार को सात माह, भोलानाथ महोबिया को 7 माह, समारू राम महोबिया को एक वर्ष और झाडूराम महोबिया को एक माह की सजा सुनाई गयी। इस आंदोलन में श्री अमरलाल महोबिया ने भी सक्रिय सहभागिता निभाई। स्वतंत्रता सेनानी श्री अमृतलाल महोबिया को क्रमश: सवा माह एवं छह माह की सजा सुनाई गयी।
40 के दशक में पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ जोरदार आंदोलन की शुरूआत हुई। सन् 1941 में श्री अमृतलाल महोबिया छुईखदान स्टेट कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष चुने गये। सन् 1942 में कांग्रेस ने बम्बई अधिवेशन में ऐतिहासिक 'भारत छोड़ों ' प्रस्ताव पारित किया। गांधी जी ने इसी दिन लोगों को 'करो या मरो ' का नारा दिया। इस आंदोलन की अनुगूंज छुईखदान तक भी पहुंची और यहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांधी जी के 'करो या मरो '  के नारे को मूल मंत्र मानकर आजादी के इस आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेस शासन ने इस आंदोलन में शामिल होने वाले अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी गोवर्धन राम वर्मा, समारूराम माहेबिया, पूनमचंद सांखला, बाबूलाल चौबे, गुलाबदास वैष्णव, बुधराम पोद्दार, सियाराम पोद्दार, दामोदरलाल ददरिया एवं उदयराम महोबिया समेत सैकड़ों आंदोलनकारियों को हिरासत में ले लिया। इसमें अमृतलाल महोबिया को सर्वाधिक तीन वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी। अन्य आंदोलनकारियों में गावेर्धनराम वर्मा को 10 माह, दामोदार लाल ददरिया को एक वर्ष एक माह, पूनमचंद सांखला को एक साल, बाबूलाल चौबे को एक साल, बुधराम पोद्दार को एक वर्ष एक माह और समारूराम महोबिया को एक वर्ष की सजा सुनाई गयी। इस आंदोलन में 09 आंदोलनकारी एक साथ गिरफ्तार हुए थे। इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह वर्मा के अनुसार  'भारत छोड़ो आंदोलन भारतीयों द्वारा स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए किया गया महत्तम प्रयास था। यद्यपि वह तत्कालिक रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर सका तथापि इसने लोगों में अपूर्ण उत्साह का संचार किया।
एक तरफ जहां छुईखदान के अनेक स्वतंत्रता सेनानी भारत माता को आजादी दिलाने के लिए अपनी जन्मभूमि में ही रहकर संघर्ष कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ छुईखदान के ही दो सूपत पं. दामोदर प्रसाद त्रिपाठी और पद्माकर प्रसाद त्रिपाठी अपने गृहनगर से दूर रायपुर में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का नारा बुलंद कर रहे थे। पं. दामोदर  प्रसाद त्रिपाठी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सन् 1937 से 1949 तक रायपुर के रामचन्द्र संस्कृत पाठशाला के विद्यार्थी थे। शाला के आचार्य पं. विश्वनाथ पाण्डेय की प्रेरणा से वे भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े।
अंग्रेजों के दमन एवं राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में 02 अक्टूबर 1942 को सत्ती बाजार चौक रायपुर में श्री मोतीलाल त्रिपाठी के नेतृत्व में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नारेबाजी करते हुए तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री श्री चर्चिल का जनाजा निकाला गया और उसके पुतले का दहन किया गया। पुतला दहन करने के दौरान ही पं. दामोदर प्रसाद त्रिपाठी, पं. पद्माकर त्रिपाठी, मोतीलाल त्रिपाठी, पूरनलाल तिरोड़े, काकेश्वर एवं लूनकरण गिरफ्तार कर लिये गये। इन सभी को 05 अक्टूबर 1942 को सजा सुनाई गयी। पं. दामोदर प्रसाद त्रिपाठी को 6 माह एवं पं. पद्माकर त्रिपाठी को पांच माह की सजा सुनाई गई। जेल का नियम तोड़ने के कारण पं. दामोदर प्रसाद त्रिपाठी को एक माह तक गुनाहखाने में रखा गया। जेल की वर्दी नहीं पहनने के कारण वे एक माह तक कंबल लपेटे रहे।
देश के स्वनामधन्य नेता सेठ गोविंदराम, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभादेवी सिंह पाटिल, मध्यप्रदेश एंव छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के हाथों अनेक बार सम्मानित हो चुके पं. दामोदर प्रसाद  त्रिपाठी को अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर विगत 09 अगस्त 2012 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सम्मानित किया। इस समारोह में सम्मानित होने वाले सेनानियों में रायपुर जिले के डॉ.महादेव पाण्डेय एवं श्री रामाधार तिवारी, राजनांदगांव जिले के पं. दामोदर प्रसाद त्रिपाठी एवं दामोदर दास टावरी (डोंगरगांव) तथा जांजगीर-चांपा जिले के भागवत शर्मा शामिल थे। यह सुखद संयोग है कि 15 अगस्त पं. दामोदर त्रिपाठी का जन्मदिन भी है।
स्वतंत्रता आंदोलन में छुईखदान अंचल की सक्रिय सहभागिता स्वयं प्रमाणित है। छुईखदान नगर स्वतंत्रता आंदोलन के समय एक प्रमुख केंद्र रहा है। बुजुर्गों की मानें तो इस अंचल में कुल स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या 300 से कुछ अधिक ही है। मध्यप्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सैनिक राज्य सम्मान निधि नियम 1972 के नियम-2 के अंतर्गत राजनांदगांव जिले के घोषित 221 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में 59 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अकेले छुईखदान अंचल के हैं जो संभवत: जिले में सर्वाधिक हैं।
छुईखदान की जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यशाही तथा स्थानीय राजशाही के विरूद्ध दो स्तरों पर संघर्ष किया और अन्तत: पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर भारत जैसे महान गणतंत्र के नक्शे में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वस्तुत: आज हम आजादी की जिस स्वच्छंद हवा में सांस ले रहे है उनके पीछे उन ज्ञात अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की त्याग, तपस्या एवं संघर्ष का प्रतिफल है।

पता :
बल्देव बाग (बाल भारती स्कूल के पीछे)  राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
मो. 9407760700

जनगीतों का लोक महत्व

यशवंत मेश्राम
यशवंत मेश्राम

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा था - ''लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम नहीं है, बल्कि नगरों और गांवों में फैली हुई समस्त जनता है, जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं है।'' पोथियां मात्र सैद्धांतिक हैं, जिन्हें जबरदस्ती से लागू किया जाता है। परंपरा में पोथियां विप्रों के संग थी? समर्थ पोथियां व्यवहारिक ज्ञान केंद्र नहीं है। लिखित साहित्य से व्यवहारिक ज्ञानबोध हो, निश्चित वह लोकसाहित्य होगा। कदाचित का सवाल ही पैदा नहीं होता। संस्कृत ग्रंथों मे व्यवहारिकता नहीं, कारण जनता के व्यवहार में नहीं, तो संस्कृत ग्रंथ पांडित्य का है जब तक व्याख्याकर्ता उपलब्ध न हों, फलत: लोकलाभ नहीं, लोक व्यवहारिकता जन-जन तक शीघ्रताशीघ्र पहुचती है। परंपरा में संस्कृत ग्रंथन द्विज हाथों रहा। यों कहें, उनके लिए ही शिष्ट रहा। जाहिर है, अद्विजों के विरोध में न होकर अव्यवहार में तो रहा ही! महत्वपूर्ण तथ्य यह कि यादव कुल के कृष्ण ने '' गीता '' रची। परंपरागत आर्थों में वह शूद्रों में शामिल था और है। शूद्रों को पढ़ने लिखने का अधिकार नहीं था, तब भी '' गीता '' को द्विज स्वीकार तो करते ही हैं। क्यों करते हैं?
परतंत्र भारत से अपढ़-पढ़न्तुओं में निम्न शेर आज तक प्रसिद्ध है -
सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है।
लोक इसका इस्तेमाल इन्कलाब में करता ही है। जनता के कवि जनकवि होते हैं। छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध लोकगीत '' छत्तीसगढ़ ल कहिथे भैया  धान के कटोरा.......'' किस जनकवि का है, लोक में अनेकजन को मालूम नहीं, पर छत्तीसगढ़ीयों की जबान पर रच बस गया है। छाया हुआ है। डॉ. जीवन यदु का उक्त जनगीत अब लोकगीत स्वरूप जनमानस में समा गया है। लिखित साहित्यि के गीत फनकारों की कला द्वारा आधुनिक इलेक्ट्रानिक साधनों से जनता तक पहुँचकर लोकगीत  का निर्माण कर लेते हैं, जैसे लक्ष्मण मस्तुरिहा का गीत ''मोर संग चलत रे, मोर संग चलत गा.....'' इलेक्ट्रानिक साधनों में सिमटकर साहित्यिक परंपरा में आ चुका है। गांवों-कस्बों-नगरों में छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोकगीत, पर्वों में आधुनिक साधनों से सुने जाते हैं, तात्कालिक गायन नहीं होता। शिक्षित-युवक युवतियां पूर्वजों की धरोहर ग्रहण करने तैयार नहीं? फिर भी, शोषण-अन्याय विरोध में पुन: जनगीत फूट पड़ते हैं, राग-रंग अलग होकर रहता है, परंतु जन-मुख पर विराजमान होता जाता है। यदि लिखित साहित्य में जनभावना के गीत आए तो उसे लोकहित-लोकगीत स्वीकारने में क्या हर्ज होगा ? -
    भाग्य इंग्लिश से बंधा है,
    लो नहीं इंग्लिश पढ़ा है,
    लोग कहते है गधा है ........ ।
    गांव-गांव अंग्रेजी स्कूल इसी कारण खुल गए! देशभक्ति में लोकहित छुपा रहता है, यह सर्वोपरि होता है।
भेद बढ़ाते मंदिर मस्जिद, मेल बढ़ाते विद्यालय
ध्याान कराते मंदिर मस्जिद, ज्ञान कराते विद्यालय
धर्म जाति से ऊपर उठकर, देश बनाते विद्यालय।
लिखित साहित्य में लोक विद्यमान है तो वह लोकसाहित्य नहीं है? लोक-रेखांकन, लोकहित करे वहीं लोकसाहित्य है चाहे वह वाचिक, मौखिक, श्रुति परंपरा में हो अथवा लिखित पन्नों के समुदाय में बंधा हो! ''श्रेष्ठ साहित्य वहीं होता है, जो साहित्यकार की सच्ची अनुभूति से उपजे और रचनाकार के साथ जन-मन में गहरे पैठ जाए।''
बहिष्कृत जनसमुदाय को अब हिष्कृतों का साहित्य ''जन-मन '' जैसा गहरा पैठ नहीं कर पाता, फलत: उसका विरोध करते हैं, सवाल खड़ा करते हैं। अभावबोध को भावबोध में बदलने वाला समूह ही वास्तविक लोक है।  भावबोध में तर्क, वैज्ञानिक सोच बहस कार्यरत रहते हैं, और संघर्ष की पृष्ठभूमि का आधारशिला तैयार होता है। उत्पादनकर्ता की भावबोध चेतना निरन्तर चलती है। इन्हें दबाने की भरपूर कोशिशें लगातार जारी रखते हैं। पूंजीपति फिर ज्वाला फूटता है। यह ज्वाला लोक बचाव पक्ष में प्रकाशित होती है-
क्षण-क्षण उलट-पलट करने से
जनता के सचेत रहने से
जनता अंध न्याय भी करता
प्रबल विरोधी दल बनने से।
40 प्रतिशत किसानी छोड़ने मजबूर हैं। कौन कर रहा है इन्हें मजबूर ? मजबूरी का नाम शोषणवादी या क्रांतिवादी? इसे करने या दफा होने का ऐलान किनके द्वारा हो रहा है ? जबकि 65 प्रतिशत अन्न राजस्व देश में बरकरार है। लघु किसान किसी भी काल में सुखी नहीं रहे। इसी कारण जनकविता धुआं उठाती है। फिर तो आग एक दिन फैलेगा ही?
जमींदार कतुआ, अस नोंचे देह की बोटी-बोटी
नौकर, प्यादा, औररू कारिंदा ताकै रहै लंगोटी
पटवारी खुश्चाल चलातै बेदखली इस्तीफा
राजै छुड़की और जुर्माना छिन छिन वहै लतीफा।
उक्त जनगीत (लोकगीत) जैसे उपनिवेश शासन में भी बने। अंग्रेजी शासनकाल में जाल-फरेब, अत्याचार का फांसीवाद '' फीजी हिंदी '' में उल्लेखित हुआ ' फीजी ' लोकगीत है -
फरंगिया के राजुआ मां छूटा मोर देसुआ हो,
गोरी सरकार चली चाल रे बिदेसिया।
भोली हमें देख आरकाटी भरमाया हो,
कलकत्ता पा जाओ पांच साल रे बिदेसिया।
डीपुआ मां लाए पकरायों कागदुआ हों,
अंगूठा आ लगाए दीना हार रे बिदेसिया।
पाल के जहाजुआ मां रोय धोय बैठी हो,
जीअरा डराय घाट क्यों नहीं आए हो,
बीते दिन कई भये मास रे बिदेसिया।
आई घाट देखा जब फीजी आके टापुओ हो,
भया मन हमरा उदास रे बिदेसिया।
कुदारी कुखाल दीना हाथुआ मा हमरे हो,
घाम मा पसीनुआ बहाए रे बिदेसिया।
स्वेनुआ मा तास जब देवे कुलम्बरा हो,
मार-मार हुकुम चलाये रे बिदेसिया।
काली कोठरिया मां बीते नाहि रतिया हो,
किस के बताई हम पीर रे बिदेसिया।
दिन रात बीति हमरी दुख में उमरिया हो,
सूखा सब जैनुआ के नीर रे बिदेसिया।
हिंदी अनुवाद - 'फिरंगियों के शासन में हमारा देश छूट गया। गोरी सरकार ने चाल चली। हमें विदेशी बनाया। खूब कमाओं। कलकत्ता में हमको डिपों में ले जाया गया। हाथ में कागज धराया गया, उसमें हमारा अंगूठा लगाकर हमें गुलाम बना दिया गया। हम विदेषी हों गये, गरीब हो गये, हमारा देश छूट गया। पालनुमा जहाज में हम रो-धो कर बैठ गए। जीव भय से कांप रहा था, सोचते थे कि घाट क्यों नहीं आ रहा है। कई दिन बीत गए। अनेक माह बीतते चले। इस तरह विदेशी हो गये। जहाज किनारे लगा तो देखा कि वह फिजी का घाट था। मन में भय उत्पन्न हुआ, जी उदास हो गया, पर क्या करते? हम जो विदेषी हो गए थे। हमारे हाथों में कुदाली-रापा दे दिया गया। पसीना छूटने पर भी धूप में कार्य करते-करते विदेषी हो गए। गोरे हमें त्रास कर देते थे। मार, खा-खाकर कार्य करते हुए हम विदेशी हुए। अंधियारीयुक्त धरौंदों में रखा जाता था। रात नहीं गुजर पाती। हम अपना दुख किसे बताएं। परदेश में, कश्टों में हमारा दिन-रात व्यतीत होता रहा। इसी तरह पूरी उम्र गुजर गई, रो-रो के नैन सुख गए। आंखों में आंसू कैसे रहते, जब शरीर में पानी नहीं रहा, इस तरह हम परदेशी हो गए।''
भारतीय बिदेसिया नाटक में पति कमाने जाता है। पत्नी रोकती है, पर अंग्रेज स्त्री-पुरूशों को आर्थिक लालच देकर परदेश में (फीजी) दाखिला करवाते हैं। लोक नहीं लौटता अपनी मातृभूमि में। वहीं के होकर रह जाते हैं। मधुमक्खी छाते की तरह अपनी कड़वी यादों का कड़वा मिठास देकर उक्त लोकगीत की सृष्टि कर लेते हैं, जिसमें पूर्व-वर्तमान-भविष्य की दूर-दृष्टि झलक पड़ती है। आजाद प्रशासनिक देशों में हालात आज और भी बदत्तर है। सस्तेदर से मौलिक उर्जा नष्ट हो रहीं है। मंहगादर जीवन नश्ट कर रहा है। सस्ता दर अनाज जल-जंगल जमीन बचा पायेगा? जमीन-जल-जंगल अंधिकारों के प्रयोजन में जनसंघर्ष कायम हो गया। एक स्वयं से, दूसरा कंपनियों से, तीसरा प्रशासनिक रियासतों से हक हेतु संघर्श नाजायज है? झारग्राम (पं. बंगाल) की सभा में सिलादस्य चौधरी के प्रश्न पूछने पर (बेलपहाड़ी में 8 अगस्त 2012) मंत्री ने चौधरी को तथाकथित माओवादी बताते हुए उसे पुलिस को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया। लोककवि का हृदय ऐसे ही माहौल से उमड़-घुमड़ कर शब्दों की झड़ी लगाता है -
चारों ओर से घेरने बा पापी दुश्मनता, जाग भइया, अब कइसे बांची जनता, जाग भइया।
हमनी का रोटी-बेटी भइल सब निलामता, जाग भइया, अब कइसे बांची जनता, जाग भइया।
सुतले सुतल बीतल पुरूखन के उमरिया, जाग भइया, अब तोहरे कान्हीं भखा जाग भइया।
कहिए से घेरने बिआ कारी ई बदरिया, जाग भइया, फार जुलुम के अन्हरिया, जाग भइया।
हिंदी अर्थ - 'कमजोर तबके के लोगों को चारों ओर से जमींदार सामंत रूपी दुश्मन घेर लिए हैं। ऐसे में अपनी जान बचाना भी मुश्किल है, इसलिए सभी शोषित भाई लोग जाग जाएं। हम लोगों का धन और धर्म दोनों निलाम हो चुका है। रोटी भोजन का और बेटी इज्जत का प्रतीक है। दोनों दांव पर लगी है। इसलिए अब जाग जाना है। हम लोगों के पूर्वज सोए रहे, उन लोगों पर बेइंतिहा अत्याचार सामंतों का होता रहा। अब पूर्व में हुए जुल्म और अत्याचार समाप्त करने की जिम्मेदारी हम लोगों के कंधों पर है। इसलिए अब जाग जाना है। यह संकट और विपत्ति का बादल बहुत दिनों से दलित वर्ग के लोगों को घेरे हुए है। अब इस जुल्म के घोर अंधकार को फाड़ देना है। हे समाज के शोषित भाइयों जाग जाओ।'
''लोक में जनजागरण होना, परलोक-जीवियों को रास नहीं आता। शोषणवादियों की छबि धूमिल होने लगती है। लोकपथ के प्रति तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। मंडलाधिकार विरोध में राम-बावरी मस्जिद ढहा दी जाती है। धर्म-उन्माद फैलाया जाता है। झूठे केस में लोक संतप्त होता है। जनजागरणकर्ता शहादत में तब्दील भी होते हैं। दलाल पक्ष अपनी समानांतर सियासतें अपनी व्यवस्था के तहत स्थापित करते रहते हैं। दोनों पक्षों में आम नागरिक पिसता जाता है। इन्हीं के बदलाव हेतु षब्द, परिवर्तन हेतु अर्थ, जन-सम्मुख में छा जाते हैं। गरीब गुरबों किसानों-दलितों-मजदूरों के जनकवि नारायण महतो नाचपार्टी के गवैया थे। उनके जनगीत उभरकर भोजपुरी क्षेत्र में संघर्ष प्रेरणा बन गए। महतो के शब्द जन-जन के मुख में छा गए -
हमनी के ले ले जाला पापी दुसमनता, जेहलखानता
झूठों के बताके शैतनता, जेहलखानता।। हमनी ।।
    हमनी के नान्ह जात।
    कसहूं कमात खात।
झूठों के बना के बंईमानता, जेहलखानता।। हमनी ।।
    साधु के बनाई भेस।
    कि अली जाली लड़ी केस।
सांसत में परल बा परानता जेहल खानता।। हमनी ।।
    जोती बोई काटी दाना।
हाथ में धरा के हथियरवा, जेहल खानता।। हमनी ।।
    कहेलन नारायण गाई।
    सुनी अब गरीब भाई।
पुलिस से अब कइसे बांची जानता, जेहल खानता।। हमनी ।।
हिंदी अर्थ - 'उक्त गीत नारायण महतो ने तब लिखा होगा जब पुलिस ने उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर तथाकथित नक्सली घोशित कर दिया होगा। भाव यह है- हम जैसे निर्दोशों को पुलिस फर्जी मुकदमों में फसाकर जेल ले जाती है। हम लोग छोटी जाति से आते हैं। किसी तरह कमाते खाते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं। परंतु पुलिस झूठ-मुठ का बेइमान बताकर हम लोगों को जेल में ठंूस देती है। हम लोग ऐसी विकट परिस्थितियों में क्या करें, कुछ पता नहीं चलता। कभी मन करता है कि घर द्वार छोड़कर साधु हो जाएं। कभी मन करता है, आखिर भरा-पूरा परिवार छोड़कर कहां भाग जाएं? बेहतर तो यह होगा कि झूठे मुकदमों को भी लड़ा जाए।  हम लोगों के प्राण पशोपेश में पड़े हैं, हम लोग खेत जोतते हैं उसमें फसल बोते हैं। फसल का कार्य करते हैं। बावजूद इसके हमें पकड़ कर थाने में ले जाया जाता है। कारण कि पुलिस हामरे हाथों से हंसिया छीनकर बंदूक थमा देती है और तथाकथित नक्सली घोषित कर देती है। कवि नारायण सभी गरीब भाइयों को सुना कर गाते हैं कि, आखिर हम लोगों की जान पुलिस की ऐसी तिकड़मबाजी से कैसे बचेगी।'
इज्जत, रोटी के लिए संघर्ष अपराध की श्रेणी में आता है? नारायण महतो की चर्चा महाश्वेता देवी ने मास्टर-साहब उपन्यास में किया है। मिथक है - नारायण महतों जनता बीच गा रहे रहे थे। पुलिस ने आक्रमण किया। गोली मार दी। जनकवि संघर्श-गीत गाते-गाते शहीद हो गए। जन-संघर्ष हकों हेतु ही उभरता है। कुचल कैसे दिया जाता है? लोकतंत्र में लोकाधिकार पर नियंत्रण कैसे? किसका है? शोषक लोक के जिंदा रहते जनकवि आयेंगे-जायेंगे। जन-जन मुखों से दुहराये जायेंगें। लिखित-अलिखित शब्दों को जन-जन द्वारा गाया जाना जनगीत-लोकगीत, लोक साहित्य तो होगा ही!
- संदर्भ -
1. कन्नौजी लोकसंस्कृति और लोकगीत, कृष्णकांत दुबे, आजकल, अगस्त 2012
2. मेरा बचपन मेरे कंधो पर (आत्मकथा) श्योराज सिंह बैचेन। वाक् अंक-11, 2012, पृष्ठ 24
3. वही पृष्ठ 21
4. मच्छकटिक में चित्रित सामाजिक राजनीतिक यथार्थ, किरण तिवारी, आजकल, अगस्त 2012, पृष्ठ 36
5. ये जिंदगी कौन की ....... दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' व, आजकल, अगस्त, 2012 पृष्ठ 29
6. वही
7. हिंदी में विदेशी शैलियां, विमलेश कांति वर्मा, हिंदुस्तानी जवान, (मुंबई) अप्रेल जून 2012, पृष्ठ 12,13
8. नई दुनिया रायपुर संस्करण, दिनांक 18.4.12
9. भोजपुरी के दो प्रमुख गीतकार - राजेन्द्र प्रसाद सिंह 2. भोजपूरी के तथाकथित नक्सली कवि नारायण महतों - लोकरंग- 2, 2011 पृ. 112
10. वहीं पृष्ठ 111
पता :
गली नं. 4, वार्ड नं. 7, शंकरपुर,
राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

रविवार, 15 सितंबर 2013

नियाव के जीत

सुरेश सर्वेद

बात - बात म लड़े बर तियार, अरे हमला का करना हे? परदेशिया हर मंगलू के बारी ल टोरे के कोठार म कब्जा करे।
गुणवंती के ताना ल सुन के सुमेर तरमरागे। किहिस - तुम्हरे मन के अइसनेच सोच- बिचार हमला जिंहा के तिंहा ठाढ़े रखे हवै। परदेस ले आथे अउ जम्मों गाँव म अपन राज चलावन लागथे।
- तुम्हर एक अकेला के करय ले कुछू होना जाना नहीं। फोकट म अपन लहू ल जरावत रहिथौ। जम्मों गाँव के मुँहू सियाये हे तब तुम काबर अपन मुंहॅू ल उलाथौ?
- अन्याय - अनीति मोर देखे नइ सहाय। - त देखे सुने ल काबर जाथौ
- तोर कहना हे, दिगर जइसे महूं आँखी- कान ल मूंद के रेंगव। मुँहूं ल घर म डार के रहवं।
- अइसनेच मन के समे हे।
- तोर गोठ बात मोला नइ जमे।
कहत सुमेर अपन घर ले निकले लगीस। गुणवंती किहिस - जेवन चूर गे हे। खा - पी लौ फेर जावत रहिना बइटका म।
लाजवंती के ताना ल सुनके सुमेर के पेट भर गे रिहीस। सोचे रिहीस ओकर बाई लाजवंती ओकर पक्ष लेही। पर इहां तो पासा उल्टा पर गे रिहीस। अब डउकी परानी के मेर मुँह बजाना ओला ठीक नई लगीस। किहिस - तंय खा - खुवाके सो जबे। मोर रद्दा झन देखबे ।
- हव - हव, गुड़ीचउरा म सकलाय बइठका तुम्हर बिना न सुुरु होवय न उसले।
लाजवंती मुंह बजाते रहीस। सुमेर गुड़ीचउरा तिर पहुंचगे। उहां गाँव भर के लोगन जुरियाये रहय। कोनो आधा बीड़ी ल मुँहू म हुरसे जलावत रहय त कोनो कस खींच के धुंगिया के लच्छा ल बादर कोती फूंकत रहय। सुमेर सीधा मंगलू के तीर जा के बइठगे। धीरे कुन मंगलू ल कोचकिस अउ जानना चाहीस के बइठका म अब तक का होय हे ? मंगलू चुप रहिस। सुमेर समझगे - बइठका अभी सुुरू नई होय हे। मंगलू के कंधा ल सहलइस अउ जताय के परयास करिस - तंय फिकर झन कर। कोनो तोर संग नइ हे त का होगे मंय तोर संग हंव।
मंगलू के हाव - भाव म थोरकिन परिवर्तन अइस। ओकर हाव - भाव स्पष्ट करे लगीस कि ओहर अकेल्ला नई हे। कोनो ओकरो संग देवइया हे।
गुड़ीचउरा म बइठका परदेसिया अउ मंगलू के विवाद ल ले के जुरयाये रहय। गाँव पटेल अइसनेच दिन के फिराक म रहय। जेन जतका ओकर सेवा - चाकरी करय ओकरे कोती हो जाये। ये बात ल परदेसिया घलोक जानै। इही कारन ये के ओला गाँव म आये जुम्मा - जुम्मा तीन - चार बरिस होय होही अउ गाँव म अपन मनमानी चलाना सुरु कर दे रिहीस। पटेल किहिस - कस ग मंगलू, तोर का शिकायत हे ?
- मंय हर बरिस खइड़का डांर म अपन कोठार बनात रहेेंव। गेे साल मोला परदेशिया अपन धान मिंजे बर मांगिस अउ ये साल खुदे रुंधे लगे हे।
- कहसे परदेशिया ?
- पटेल साहेब, पर साल मंय खुद रुंधाय रहेंव। जब रुंधवायेंव त ओ जगह ह परिया परे रिहीस।
जम्मों गाँव जानत रहय - मंगलू हर साल उही जघा म कोठार बनात आवत हे। पर परदेशिया के गोठ ल सुनके कोनो विरोध करे बर तियार नई होइस त पटेल किहिस - कइसे मंगलू, अब तोर क कहिना हे ?
सुन के सुमेर के तन - बदन म आगी फूंकगे। उठीस। कहिस - पटेल साहब,ये गाँव म जनम ले तहूं रहत आवत हस अउ महूं। जेन बात ल मंय जानत हंव तहूं जानत हस। मंगलू च काबर ओकर ददा घलोक  उही ठीहा म कोठार बनावत रिहीस हे।
पटेल चुप रिहीस। गाँव के परलोखिय उठिस। किहिस - समेर, तंय लुप ले काबर गोठियाये ल उठे हस जी। पटेल हर तो मंगलू ले जुवाप मांगे हे। ओला बोलन दे।
- परलोखिया तंय झन भुला, तोरो ऊपर इही परदेशिया काली राज कर सकत हे।
बइठका जघा म बहस बढ़ते गीस। सुमर ल दबाये के प्रयास पूरा गाँव भर करे लगीस पर आज तो सुमेर घर ले पागी बांध के निकले रिहीस के मंगलू ल नियावं देवा के रहही। संगे - संगे गाँव भर के बंद आँखी ल खोलही। ् किहिस - आज तुम पूरा गाँव जेन परदेशिया के संग देवत हव कल तुहीं मन रोहू अउ मोर बात ल सुरता करहू।
मंगलू ल लगीस। सुमेर के कहे से गाँव के सियान मन बुरा मानही। ओकर बनत काम बिगड़ जाही। ओहर सभा म उठगे। हाथ जोड़ कहिस - समेर से कहे म कुछू गलती हो गीस होही त मंय माफी मांगत हंव। पर सच इही ये - मोर कोठार म जबरवाली परदेशिया रुंधना रुंधत हे।
सुमेर ल मंगलू पर गुस्सा अइस। किहिस - मंगलू इंहा मंय सच बात कहत हंव अउ तंय माफी मांगत हस। हमर इही नम्रता,सादगी अउ समरपन के कारण बाहरी व्यक्ति हमर ऊपर हावी होथे। अंगरी धर के मुड़ म चढ़ जाथे। अब समे वो नई कि सच बर नियाव हो। अन्यायी राज अउ न्यायी सजा भोगथे। तोर नम्रता,सादगी अउ समरपन तोला न्याय नइ देवा सके। परलोखिया डहर मुंहू करके समारु किहिस - अउ तंय बिसरगे रे परलोखिया, जब दू हजार दे के तोर से इही परदेशिया पांच हजार वसूल लीस। रोवत - गावत तंय मोर कर आय रेहेस।
गाँव वाले मन के अब आँखी खुले लगीस। मदन बड़ हिम्मत कर के उठीस किहिस-  समारु सच कहत हे। ये परदेशिया धीरे - धीरे सब ल मुड़त हवय।
ये वो मदन रिहीस जउन ल एक थपरा कोनो दे दे  त दूसरा गाल ल घलोक आगू कर दे पर गाल बजाना उचित नइ समझे। मुंहू लुकवा के सभा म बोलई का होइस, बइठका म जुरायाये गाँव वाले मन के मुंहू खुले लगीस। परदेशिया ल अब समझत देरी नई लगीस कि पासा उल्टा परत हे। अपन बात जोंगे बर कहे लगीस - पर साल जइसे मंय कोठार रुंधे रहेंव यहू साल रुंधात भर हंव। मंय मंगलू ल उहां फसल मिंजे - ओसाये बर मना थोरे करत हंव।
- पर के जघा म तंय कोन अधिकार से रुंधना - बंधना करबे। मंगलू के जघा ये मंगलू ओमा रुंधे चाहे परिया छोड़े तोला का ।
गाँव के लोगन जाग चुके रिहीस। बइठका म खुसूर - पुसूर होइस अउ ये बात कोनो गाँव वाले कहि दिस। अब जम्मों गाँव परदेशिया से खतरा महसूस करे लगीस। सब ओकर विरोध म होय लगीस। परदेशिया के दू हजार खा के भी पटेल ल निरनय देय ल परीस - परदेशिया, तंय अपन हद म रह। हमन इहां पले - बढ़े हन। देखत आवत हन नानपन ले। जउन ठीहा ल तंय हथियाना चाहत हस उहां मंगलू के ददा,बबा कोठार रुंधत आवत हे। कोठार ल मंगलू रुंधही अउ ऐकर निर्णय उही लिही कि ओहर तोला उहां तोर फसल ल रखन देही या नहीं ।
- पर पटेल ।
परदेशिया कुछू कहना चाहीस पर गाँव के चिहुर म ओकर बोली बचन समागे। जउन परदेशिया सोचे रिहीस - धीरे धीरे गाँव भर राज करे के ओकर ठिकाना नई रहिगे।
ये जीत सिर्फ  मंगलू के जीत नई रिहीस। गाँव भर के जीत रिहीस। सुमेर अपन मुंछ ल अइठत अपन घर अइस। ओकर मुस्कात चेहरा ल देखके ओकर बाई किहिस - अइसे लगत हे जानो तुम रण ले बाजी मार के अवात हो
सुमेर कुछू नइ किहिस। ठाड़े खटिया ल धम्म ले गिरइस अउ ओमा बइठगे। एक हाथ म मूंछा अइठत अउ दूसर हाथ म जांघा ल ठठावत। गुणवंती ल किहिस - चल, मोर बर जेवन निकाल।
पता : 17/ 297, पूनम कालोनी, वर्धमान नगर, 
शिव मंदिर के पास, राजनांदगांव ( छ.ग. )

मास्टर चोखे लाल भिड़ाऊ चांद पर

कुबेर
चांद देश की संसद की आपात बैठक चल रही थी। प्रधान मंत्री ही नहीं, सबके माथे पर बल पड़ा हुआ था। वे गहरी चिंता में जान पड़ते थे, मानो राष्ट्रीय शोक का समय हो। हो भी क्यों नहीं। पृथ्वी नामक ग्रह के इकलौते सुपर पावर देश की सरकार की ओर से आज एक सुझाव पत्र आया है। सुझाव पत्र क्या, खुल्लमखुल्ला चेतावनी है, फरमान है। पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि यदि चांद सरकार ने अपने देश में साक्षरता का स्तर नहीं बढ़ाया तो उन्हें दी जा रही सारी आर्थिक और सैन्य सहायता बंद कर दी जायेगी। इतना ही नहीं युनाइटेड नेशन्स द्वारा आर्थिक नाकेबंदी की भी घोषणा की जा सकती है।
चांद देश की सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक था। उनका मानना था कि उनके देश में साक्षरता की दर शत-प्रतिशत है। उन्हें अपनी साक्षरता पर बड़ा घमंड था। इसी के दम पर वह सुपर पावर की बराबरी करना चाहता था। सुपर पावर को यह टुच्चापन कब भाने वाला था। भुगतो अब। उन्होंने जो कह दिया कि सालों, तुम सब निरक्षर हो, तो हो। कह दिया सो कह दिया।  तुम सब निरक्षर ही हो। सुपर पावर की बादशाहत को चुनौती देने वाला निरक्षर और मूर्ख नहीं होगा तो और क्या होगा भला।
बिना आइना देखे अपना चेहरा सबको सुंदर लगता है। सुपर पावर ने उन्हें आइना दिखा दिया था। निकल गई सारी हेकड़ी।
सुपर पावर आईने का रूख सदैव दूसरों की ओर ही रखता है। चाहे कोई कितना ही खूबसूरत क्यों न हो, उसकी मेकप में कोई न कोई मीन-मेख निकाल ही देता है। इसीलिये दुनिया की अधिकतर सरकारें अपनी जनता के लिये प्रसाधन सामग्री सुपर पावर के यहाँ से ही आयात करती रहती हैं। प्रसाधन सामग्री ही क्यों, हथियार, व्यवहार और विचार भी ये सुपर पावर के यहाँ से ही आयात करना पसंद करते हैं। देसी विचार अपना कर भला वे सुपर पावर को नाराज क्यों करे।
चांद देश की संसद को इस संतोष के साथ स्थगित किया गया कि - ' गनीमत है, कि साक्षरता के ही चाबुक से मारा गया है;    मानवाधिकार के ब्रह्मास्त्र का उपयोग नहीं किया गया है।'
तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना, की तर्ज पर चांद देश की सरकार ने सुपर पावर को फौरन एक अनुरोध पत्र लिखा कि - ' हे महाबली, हम सब निहायत ही मूर्ख व अज्ञानी हैं। आपकी कृपा हम पर सदा बनी रहे।' हमारे यहाँ साक्षरता जैसे महायज्ञ संपन्न कराने लायक ऋषि-मुनियों का नितांत अभाव है। एक महान कृपा और करें। आप तो जगत गुरू हैं। इस कार्य में आपके यहाँ के विशेषज्ञ ऋषियों का एक दल हमारे यहाँ भेज दें। वे हमारे यहाँ के अज्ञानियों के एक दल को चाहे कान पकड़ाकर, चाहे उठक-बैठक कराकर, प्रशिक्षित करें। वे हमारे लिये ईश्वर तुल्य होंगे।'
पत्र की भाषा अत्यंत शालीन और विनय-पत्रिका की भाषा के अनुरूप दासत्व-भाव लिये हुए थी। चांद देश की सरकार को यकीन था कि इसे पढ़कर सुपर पावर खुश हो जायेगा। पर जल्द ही उनका यह भ्रम टूट गया। सुपर पावर का जवाब आया। जवाब क्या घुड़की था। लिखा था - '' आपने पत्र में जिस भाषा का प्रयोग किया है वह नितांत ही अपमानजनक और आपत्तिजनक है। न हम जगत गुरू हैं और न ही हमारे यहाँ कोई ऋषि-मुनि पाए जाते हैं। इसके लिये आपको आर्यावर्त्त नामक देश से संपर्क करना चाहिये। लेकिन आपको इसकी सजा जरूर मिलेगी। अरे मूर्खों, तुम्हें इतना भी पता नहीं कि हम तो केवल मिसाइल और लड़ाकू विमान ही भेजते हैं।''
चांद सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ। नादानी में सांप के बिल में हाथ डालने का फल उसे मिल रहा था। उसने तत्काल आर्यावर्त्त के दूतावास से संपर्क कर अपनी समस्या रखी।
चांद सरकार का अनुरोध-पत्र पाकर आर्यावर्त्त की सरकार अतीव प्रसन्न हुई। उसे अपनी ऋषि परंपरा पर गर्व हुआ। जिस देश से अब तक मनोरंजन सामग्री के रूप में केवल बच्चों और महिलाओं का ही निर्यात किया जाता रहा हो, उससे मास्टर आफ मास्टर की मांग सचमुच गर्व की बात थी। उसने चांद सरकार को आश्वस्त किया कि जल्द ही यहाँ के योग्यतम शिक्षक को चांद पर भेज दिया जायेगा। आपकी सारी समस्याओं को सुलझा लिया जायेगा। सुपर पावर को भी मना लिया जायेगा।
आर्यावर्त्त की सरकार ने तत्काल एक कर्मठ व समर्पित शिक्षक का सर्वेक्षण करने का आदेश अपने मानव संसाधन विभाग को दिया, जिसे मास्टर आफ मास्टर के रूप में चाद देश भेजा जा सके।
उचित माध्यम और नियमानुसार सर्वेक्षण का मार्ग काफी लंबा और अव्यवहारिक होता। इसमें कम से कम दो साल लगने की संभावना थी, अधिक भी लग सकता था, अत: मंत्रालय ने नियमों को शिथिल करते हुए अत्यंत व्यवहारिक और लघु मार्ग अपनाया। देश की इज्जत का सवाल जो था। राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित देश के समस्त शिक्षकों की सूची निकाल कर उनके अभिलेखों का, जिनके आधार पर उन्हें सम्मानित किया गया था, अति सूक्ष्मता पूर्वक अवलोकन करने का निर्णय लिया गया ताकि इन्हीं लोगों में से किसी एक का चयन किया जा सके। इस हेतु एक उच्चाधिकार प्राप्त खोजी आयोग का गठन किया गया। नाम रखा गया - शिक्षक अन्वेषण आयोग। देश के एक सेवानिवृत्त महान् छिद्रान्वेषी महोदय को इस आयोग का कर्ताधर्ता नियुक्त किया गया। एक महीने के अंदर काम पूरा करने कहा गया।
पहले छिद्रान्वेषी महोदय की खोजबीन शुरू हुई ताकि उन्हें उनका नियुक्ति पत्र दिया जा सके। पता चला कि सेवानिवृत्ति के बाद कोई काम न मिलने से निराश होकर वे विदेश चले गये हैं, जहाँ उनका बेटा नौकरी करता है।
उनके विदेश से वापस आने और कार्यभार ग्रहण करने में ही एक माह का नियत समय समाप्त हो गया।
कार्यभार ग्रहण करते ही उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने सरकार को पत्र लिखा। पत्र में सरकार से आग्रह किया गया था कि आयोग का कार्यकाल एक महीने के लिये बढ़ाया जाय। पत्र में सरकार को पूर्ण आश्वस्त किया गया था कि एक माह में आयोग अपना काम पूरा कर लेगी।
काम शुरू हुआ। बढ़ाया गया महीना फाइलों को ढूंढने में ही समाप्त हो गया। अब तो पत्र लिखने और आश्वासान देने का जैसे सिलसिला ही चल पड़ा। बार-बार एक ही काम में माथा क्यों खपाया जाय। विभाग को समझ आ गया था कि यह काम इतना सरल नहीं है। उन्होंने आयोग का कार्यकाल एकमुस्त छ: महीनों के लिये बढ़ा दिया।
एक महीना फाइलों की धूल झाड़ने में लगा। एक महीना फाइलों को व्यवस्थित करने में लगा। इस बीच पता चला कि कुछ फाइलें गायब हो गई हैं। गायब फाइलों के मिले बगैर आयोग का काम आगे कैसे बढ़े? क्या पता, देश का सर्वश्रेष्ठ शिक्षक उन्हीं फाइलों में दबा पड़ा हो। लेकिन सवाल यह नहीं था कि उस फाइल में कौन दबा पड़ा होगा। सवाल यह था कि फाइल गायब कैसे हुई। प्रजातंत्र में फाइलों के गायब होने से बड़ा अपराध और कुछ नहीं हो सकता। प्रजातंत्र में फाइलों से बड़ी भी कोई चीज होती है क्या ? फाइल आखिर फाइल है। फाइल के चलने से ही तो सरकार चलती है, देश चलता है।
अब तो युद्ध स्तर पर फाइलों को ढूंढने का काम शुरू हो गया।
छिद्रान्वेषी महोदय जी को बड़ा सुकून मिला। यह कह कर कि फाइल मिलने पर उन्हें सूचित कर दिया जाय, वे पुन: अपने बेटे के पास चले गये।
छ: महीने बीत गए। फाइल नहीं मिली।
उधर छिद्रान्वेषी महोदय विदेश में सरकारी या़त्रा-भत्ता का जी भर कर उपभोग कर रहे थे और इधर फाइल ढूंढ़ने वाले यह भी भूल चुके थे कि वे क्या ढूंढ़ रहे हैं। विभाग वाले भी भूल चुके थे कि उन्होंने शिक्षक अन्वेषण नामक आयोग भी कभी गठित किया था।
इस बीच चांद देश की सरकार हर महीना स्मरण पत्र भेजती रही। यहाँ वाले पत्र पढ़-पढ़ कर खुश होते रहे। अंत में वहाँ का विशेष दूत पत्र लेकर आया। पत्र बड़ा मार्मिक था। लिखा था -  '' हे जगत गुरू ! हमारी दशा को समझें, रहम करें। मिल गया हो तो अपने महान ऋषि पुत्र को जल्द से जल्द भेजने की कृपा करें। पता नहीं सुपर पावर कब यहाँ अपनी फौज उतार दे। सोंच-सोंच कर हम और हमारी सारी जनता अनिद्रा के रोगी हो गए हैं। सबकी बी. पी. खतरे की निशान तक बढ़ चुका है। देश पक्षाघात के मुहाने पर खड़ा है। हे कृपानिधान हमें तार लीजिये। आपके आश्वासन सुन-सुनकर हमारा  धीरज समाप्त हुआ जा रहा है।''
पत्र की भाषा मार्मिक ही नहीं अत्यन्त गूढ़ भी थी, किसी की समझ में नहीं आई। लिहाजा पत्र की भाषा और तथ्यों को समझने के लिए भाषा शास्त्रियों और कूटनीतिज्ञों का एक विशेष दल गठित किया गया। सबने कई-कई बार पत्र का पठन किया। एक-एक अक्षर और विराम चिन्हों का विश्लेषण किया गया। अंत में निम्न निष्कर्ष निकाले गये।
चांद देश के विशेष दूत से प्राप्त पत्र का विश्लेषण करने पर निम्न तथ्य स्पष्ट होते हैं -
- चांद देश की सरकार में आत्मबल की कमीं है। वह और उनकी जनता फौज-फोबिया नामक एक विशेष मानसिक रोग से ग्रसित प्रतीत होती है। यह रोग असुरक्षा की भावना के कारण पैदा होती है।'
- उनमें न तो धीरज है और न ही आत्मविश्वास। उन्हें मित्रों पर भी विश्वास नहीं है।'
-  वे घोर निराशावादी हैं।'
-  वे अनिद्रा के रोगी हैं।'
(ये सभी लक्षण मानसिक रोग के हैं।)
-  वे आश्वासन की शक्तियों से परिचित नहीं हैं। न तो वे आश्वस्त होना जानते हैं और न ही आश्वासन देना। सुपर पावर का आरोप पूर्णत: सत्य है। आश्वासन का महत्व जो न समझे उससे बड़ा मूर्ख और निरक्षर प्रजातंत्र में भला और कौन होगा? प्रजातांत्रिक सरकार आश्वासनों के भरोसे ही चलती है। प्रजातंत्र में आश्वासन ही जनता का संतुलित आहार होती है। इसी से लोगों के पेट भरे जाते हैं।'
-  वे बी. पी. के मरीज हैं और पक्षाघात के मुहाने पर खड़े हैं।'
उपरोक्त बातों से पता चलता है कि उन्हें न सिर्फ  शिक्षक, बल्कि मनोचिकित्सक, हृदय रोग विशेषज्ञ और योग शिक्षक की भी जरूरत है। उन्हें इन रोगों में काम आने वाली दवाइयों की भी सख्त जरूरत है।
उपरोक्त रिपोर्ट सुनते ही चांद देश का विशेष दूत गश खाकर गिर गया।
व्यापक खोजबीन के बाद दो नामों की संक्षिप्त सूची सरकार के पास चयनार्थ भेजी गई।
पहले नंबर पर मास्टर दीनानाथ जी सुशोभित थे। मास्टर दीनानाथ शिक्षा-जगत ही नहीं फिल्मों, रंगमंचों और कहानियों में भी एक चर्चित नाम हैं। शिक्षकीय कार्य इनके लिये तप के समान है। धोती-कुरता और हर मौसम में छाता धारण करने वाले दीनानाथ जी सिद्धान्त और नियम के पक्के हैं। इनके अनेक विद्यार्थी देश-विदेश में उच्च प्रशासनिक पदों पर कार्यरत हैं। सादा जीवन, उच्च विचार को अपने जीवन में अपनाने वाले और ताउम्र पैसों के लिये तरसने वाले इस शिष्ट और शालीन शिक्षक की काया को देखकर किसी परग्रही प्राणी का भ्रम होता है। राष्ट्रीय पुरस्कार तो क्या इन्हें आज तक पंचायत स्तर का भी पुरस्कार नहीं मिला है।
ऐसे दीन-हीन प्राणी को भेजने से राष्ट्र की छवि खराब होने की संभावना थी। और फिर केवल राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त शिक्षक का ही प्रस्ताव मांगा गया था।
दूसरे नंबर पर कु्रण्डली मारे बैठे थे मास्टर चोखेलाल भिड़ाऊ। आपकी महिमा अपरंपार है। बच्चों, विशेष रूप से छात्राओं से आप विशेष लगाव रखते हैं। आप ही सच्चे अर्थों में गुरू हैं क्योंकि गुरूमंत्र जो आपके पास है, और किसी के पास नहीं है। साल भर पाठ्यपुस्तकों में माथापच्ची करना आपकी शिक्षा नीति के विरूद्ध है। जिस दिन शाला में आपका पदार्पण होता है, वह दिन शाला के इतिहास में अमर हो जाता है। अध्यापन कार्य छोड़कर बाकी सभी काम आप पूरे मनोयोग से करते है। सत्तापक्ष के नेताओं के साथ आपके बड़े मधुर और पारदर्शी संबंध हैं। स्थानीय विधायक से लेकर मुख्यमंत्री तक के आप चहेते हैं। आपकी कक्षा का कोई भी विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण नहीं होता। (यह बात और है कि आगे की कक्षाओं में इनमें से कोई कभी उत्तीर्ण भी नहीं होता।)
खेलों में भी '' जीतना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं जीतकर ही रहूँगा '' के गुरूमंत्र का पालन करने वाले आपके छात्र कभी असफल नहीं होते। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिये अक्सर आप प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों के हाथ-पाँव तुड़वाने में भी संकोच नहीं करते हैं।
आप वर्तमान शिक्षा प्रणाली के सख्त विरोधी हैं। प्राचीन, गुरूकुल शिक्षा प्रणाली को आप सर्वोत्तम शिक्षा प्रणाली मानते हैं। साथ ही व्यवहारिक शिक्षा पर आप अधिक जोर देते हैं, फलस्वरूप आपकी कक्षाएँ शाला-भवन की बजाय आपके फार्म हाऊस पर ही लगती है। ऐसा आप ' लर्निंग बाय डूईंग ' सिद्धांत के तहत करते हैं। सर्वशिक्षा अभियान और संजीव गांधी शिक्षा मिशन जैसे साक्षरता कार्यक्रमों को सफल बनाने हेतु आप तब तक पसीना बहाते रहते हैं, जब तक इसकी आबंटित राशि समाप्त नहीं हो जाती। इन कार्यक्रमों को सफल बनाने हेतु आपकी धर्मपत्नी भी जी जान से जुटी रहती हैं। कलेक्टर महोदय की विशेष संरक्षण में आपकी पत्नी एक एन. जी. ओ. का भी संचालन करती हैं। आपकी इन्हीं उपलब्धियों के लिए आपको राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तर के शिक्षक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।
मास्टर आफ मास्टर के लिये आपसे अधिक योग्य शिक्षक और कहाँ मिलता?
चांद देश की धरती पर कदम रखते ही मास्टर चोखे लाल जी ने अपना काम शुरू कर दिया। छ: महीनें तक एयरकंडीशंड सरकारी कार में गाँव-गाँव घूमकर वहाँ की शालाओं का निरीक्षण किया। ग्रामीणों से मुलाकात कर वहाँ की साक्षरता दर का जायजा लिया। उन्होंने पाया, वहाँ पर प्रत्येक शाला की अपनी पक्की, मजबूत और खूबसूरत इमारतें हैं। इमारतों में बिजली, पानी और शौचालयों की समुचित व्यवस्था है। सभी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हैं। सभी जगह सभी बच्चे बराबर स्कूल जाते हैं। सभी बड़े-बूढ़े और औरतें अच्छी तरह पढ़ना-लिखना जानती हैं। स्कूल समय पर खुलते और बंद होते हैं। शिक्षक मन लगाकर पढ़ाते हैं।
मास्टर चोखे लाल जी को वहाँ पर न तो एक भी शाला भवन भारतीय शाला भवन-सा मिला और न ही कोई अपने जैसा गुरू। उन्हें स्थिति भंापते देर न लगी। उन्हें चांद सरकार की शिक्षा नीति पर रोना आया। निष्ठा, ईमानदारी, और नैतिकता जैसे पुरातन, दकियानूसी विचारों को पकड़ कर चलने का केवल यही अंजाम होना था। उन्हें वहाँ का शिक्षा विभाग और शिक्षा प्रणाली यहाँ की तुलना में एकदम तुच्छ नजर आई।
छ: महीने उन्हें अपना निरीक्षण प्रतिवेदन तैयार करने में लग गए। पूरे दो शिक्षा सत्र गुजर जाने के बाद ' भिड़ाऊ प्रस्ताव ' चांद देश की संसद के पटल पर रखी गई। इस बीच आश्वासनों की खुराक का भरपूर उपयोग होता रहा।
प्रस्ताव इस प्रकार था।
'' सुपर पावर को खुश करने का ' भिडा़ऊ प्रस्ताव ।''
प्रस्ताव क्र.1:-  शिक्षा विभाग को दी जा रही सारी सरकारी वित्तीय सहायता बंद कर दी जाय। भवन निर्माण और शिक्षण सहायक सामग्रियों की खरीदी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी जाय। इस मद से बची राशि से सुपर पावर के यहाँ से युद्धक विमान और मिसाइलें खरीद ली जाय।''
प्रस्ताव पर संसद ने एक स्वर से आपत्ति की -  यह तो घुमाने वाली बात है। मामला साक्षरता का है, रक्षा का नहीं।''
मास्टर चोखे लाल ने वहाँ के मूढ़ सांसदों को समझाया - '' साहबानों, मामला न साक्षरता का है, और न रक्षा का। मामला केवल सुपर पावर को खुश करने का है।''  
प्रस्ताव का निहितार्थ समझ में आते ही संसद में चुप्पी छा गई। मास्टर चोखे लाल भिड़ाऊ अपनी कामयाबी पर मुस्कुराने लगे। उसने दूसरा प्रस्ताव पेश किया।
प्रस्ताव क्र.2:- औपचारिकेत्तर शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षण केन्द्रों की स्थापना की जाय। संजीव गांधी शिक्षा मिशन की स्थापना करके सर्वशिक्षा अभियान प्रारंभ किया जाय। हर तीन महीने के अंतराल पर समतुल्यता परीक्षा आयोजित किए जाए। समस्त शाला त्यागी बच्चों को उसमें सम्मिलित करके मुफ्त में प्रमाण-पत्र बांटे जाए।'
कुछ सांसदों ने फिर आपत्ति की। मास्टर चोखे लाल ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए फिर कहा - आपकी समस्याएँ मैं अच्छी तरह जानता हूँ। ईमानदारी के साथ प्रयास करने पर सारी समस्याएँ हल हो जायेगी। औपचारिकेत्तर शिक्षा केन्द्रों के लिये बच्चे कहाँ से आएँगे? भेरी सिम्पल; शालाओं के पच्चीस प्रतिशत नियमित बच्चों के नाम यहाँ दर्ज कर लिये जाए; पचीस प्रतिशत को समतुल्यता की परीक्षा में बिठा लिए जाए। चालीस साल से अधिक अवस्था के सभी स्त्री-पुरूषों के नाम प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों में अनिवार्य रूप से लिख लिए जाए। इन सभी योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिये सुपर पावर के यहाँ से आर्थिक सहायता लेना हरगिज न भूलें। इसके दो फायदे होंगे - बेरोजगारों को रोजगार मिलेगी और साक्षरता के लिये किये जा रहे प्रयासों का ब्यौरा सुपर पावर को देने में आसानी होगी।''
उपरोक्त दोनों प्रस्ताव सुनकर सांसदों को चक्कर आने लगा। अब बारी थी तीसरे और चौथे प्रस्ताव की।
प्रस्ताव क्र.3:-  यहाँ के शिक्षकों को गुरूमंत्रों का ज्ञान नहीं है। इसके लिये उन्हें बारी-बारी से आर्यावर्त्त की शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षण हेतु भेजे जाए।'
सुनकर सांसदों ने दिल थाम लिए।
प्रस्ताव क्र.4:-  यहाँ के शिक्षा मंडलों और विश्वविद्यालयों को न तो आधुनिक शिक्षा प्रणालियों का ज्ञान है और न उन्हें पाठ्यक्रम बनाना ही आता है। इन्हें भंग करके इन संस्थानों को कम से कम तीन वर्षों के लिये आर्यावर्त्त की शिक्षा विभाग के हवाले कर दिए जाए।'
इन चारों प्रस्तावों को सुनकर सारे सांसद गश खाकर गिर गये। कुछ लोगों को दिल का दौरा भी पड़ गया।
तीन साल बाद बड़े सुखद परिणाम आने लगे। सुपर पावर अब चांद देश की सरकार पर दिल खोलकर मेहरबान रहने लगे क्योंकि उनके एक्सपायर हो रहे सारे युद्धक विमान और अन्य साजो सामान बिक गये थे।
चांद देश की शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प हो गया था। सरकारी स्कूलों की पक्की इमारतें अब खंडहर लगने लगी थीं। शिक्षकों की मौज हो गई थी। कइयों ने अपनी निजी शिक्षण संस्थाएँ खोल ली थी। कुछ लोग फर्जी डिग्री के कारखाने खोलकर बैठ गए थे। छात्राओं के साथ शिक्षकों द्वारा बलात्कार के भी दिलचस्प समाचार आने लगे थे। व्यापारी भी खुश थे। अपने पारंपरिक व्यवसायों को छोड़कर वे अब शिक्षा के व्यवसाय में आ गये थे।
शिक्षा अधिकारी भी बेहद खुश थे। संजीव गांधी शिक्षा मिशन में नियुक्ति पाने के लिये लाखों के सौदे होने लगे थे। औपचारिकेत्तर शिक्षा केन्द्र, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, और समतुल्यता परीक्षाओं के दस्तावेजों से कार्यालय की अलमारियाँ अटी पड़ी थी।
मास्टर चोखे लाल चांद देश के शिक्षा विभाग में दिव्य पुरुषों में शुमार कर लिये गए थे। सभी शैक्षणिक संस्थाओं में उनकी प्रतिमाएँ स्थापित हो गई थी। वे अभी पाँच साल और यहाँ रहकर अपना चार सूत्रीय सुधार कार्य चलाना चाहते थे, परंतु चांद देश की सरकार ने उनके पाँव पकड़ लिये। अत्यंत करुण स्वर में बोली - '' हे गुरूर्देवो महेश्वर:, आपके इतने ही उपकार के बोझ से हमारा देश कृत-कृत्य हो चुका है। अब अधिक उपकृत होने की हममें शक्ति बाकी नहीं रही। प्रस्थान की बेला आ चुकी है, सादर विदाई स्वीकार करें।आर्यावर्त्त सरकार के प्रति कृतज्ञता प्रगट करते हुए, अनेक प्रशस्तियों के साथ मास्टर चोखे लाल भिड़ाऊ जी को एयर आर्यावर्त्त के विशेष पुष्पक विमान में बिठा दिया गया। इस विदाई के दुख को चांद देश की शिक्षा विभाग सह नहीं पाई। बिदा करने आये सभी शिक्षा अधिकारी बेहोश होकर गिर पड़े।
पता : व्याख्याता,
शास.उच्च. माध्य. शाला  कन्हारपुरी ,
जिला - राजनांदगांव (छ. ग. )
मोबाईल - 094076 - 85557
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छत्तीसगढ़ का आईना हैं 'चंदैनी गोंदा '

खुमान साव
संगीतकार खुमानलाल साव के 05 सितंबर 2013 , 
को 85 वें जन्मदिन पर से विशेष बातचीत
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के क्षेत्र में श्री खुमानलाल साव एक जाना-पहचाना नाम है। लगभग सात दशक से संगीत साधना में रत श्री साव वर्तमान में छत्तीसगढ़ की भव्य एवं युगान्तरकारी प्रस्तुति 'चंदैनी गोंदा '  के निर्देशक हैं। पांच सौ से ज्यादा गीतों को संगीतबद्ध करने वाले श्री साव के संगीत का जादू आज भी सिर चढ़कर बोलता है। अपने समय की किवदंती बन चुके छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के 'जिंदा इतिहास ' श्री साव से गत दिनों उनके गृह ग्राम ठेकवा (राजनांदगांव)में वरिष्ट साहित्यकार वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने   लंबी बातचीत की। उनके साथ हुई बातचीत के प्रमुख अंश-


-  वीरेन्द्र बहादुर सिंह  -
संगीत की ओर आपका रूझान कैसे हुआ?
संगीत वस्तुत: मुझे  विरासत के रूप में मिला। मेरे चाचा श्री राम रतन साव एवं फूफा श्री तीजूराम अच्छे लोकनर्तक थे। नाचा के पुरोधा स्व. दाऊ दुलार सिंह मंदराजी मेरे मौसेरे भाई थे। जो रवेली नाच पार्टी के नाम से कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। उनकी प्रस्तुतियों को देखकर मेरा रूझान लोककला एवं संगीत की ओर हुआ।
संगीत की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
प्रकृति स्वयं संगीत की जननी है। चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की सुरीली तान और खेतों में काम करने वाले श्रमिकों के सुरीले स्वर ने ही मुझे संगीत की ओर प्रेरित किया। घर में रखे हारमोनियम पर बचपन से ही ऊंगलियां फिराने का परिणाम है कि मैं आज संगीतकार के रूप में आपके सामने मौजूद हूं।
आपकी संगीत यात्रा की शुरूआत कैसे हुई।
संगीत के प्रति बचपन से ही मेरा रूझान था। घर में पिताजी की हारमोनियम में बचपन से ही ऊंगलिया चलाने की आदत पड़ी। हारमोनियम के मधुर स्वर से मैं सम्मोहित हो गया और बचपन से हारमोनियम पर ऊंगलियॉं फिराने की आदत आज 84 वर्ष की उम्र में भी जारी है।
क्या आपने नाचा पार्टियों में भी संगीत दिया है?
प्रारंभ में मैं नाचा पार्टियों से ही जुड़ा। मैंने 1944 में पहली बार बसंतपुर तथा माटेकसा के बुजुर्ग नाचा कलाकारों के साथ गले में हारमोनियम बांधकर रात भर उसे बजाया। तब खड़े साज का प्रचलन था और नाचा के कलाकार खड़े होकर कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे और साजिन्दे अपने वाद्य यंत्रों को अपने कमर में बांधकर बजाते थे। इसके अलावा मैंने 1949 में जीवनलाल चंद्राकर एवं बंशीलाल देवदास के निर्देशन में कुरूद नाचा मंडली, धरमलाल कश्यप के निर्देशन में जांजगीर नाचा मंडली, 1944 से 50 के बीच भरोसा एवं सीताराम के निर्देशन में बसंतपुर नाचा मंडली, 1948, 52 एवं 53 में लाला फूलचंद श्रीवास्तव के निर्देशन में रायगढ़ नाचा मंडली तथा 1944 से 1955 तक स्व. दाऊ दुलारसिंह मंदराजी के निर्देशन में रवेली नाचा पार्टी में हारमोनियम वादक के रूप में काम किया। इसके अलावा 40 एवं 50 के दशक में मंैने रायपुर एवं बिलासपुर संभाग के अनेक छोटी - बड़ी नाचा मंडलियों में छिटपुट काम किया।
नाचा में काफी समय तक जुड़े रहने पर उसमें सुधार के लिए आपने क्या प्रयास किया?
मैं जिस समय नाचा से जुड़ा वह खड़े साज का युग था। धीरे-धीरे बैठकर बजाने की परम्परा शुरू हुई। उस समय नाचा प्राय: अनगढ़ हुआ करते थे। मंैने नाचा के कथानक, भाषा एवं शिल्प में सुधार की जरूरत महसूस की।  इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मंैने 1950 और 1951 में अपने गृहग्राम खुर्सीटिकुल में आठ-आठ दिनों की नाचा पार्टियों का शिविर लगाया, जिसमें पांच छह नाचा मंडलियों ने भाग लिया। इस शिविर में छह दिनों तक नाचा कलाकार नाचा की विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करते थे। नाचा मंडलियों में इस शिविर का बेहतर नतीजा सामने आया। शिविर के माध्यम से नाचा में मैंने गाये जाने वाले गीतों को अपने संगीत से व्यवस्थित किया। साथ ही नाचा के कथानकों को भाषागत रूप से सुधारा। इसके अलावा नाचा के शिल्प में सुधार के लिए मैंने दस-बारह वर्षों तक लोक सहज अनुशासन विकसित करने का अभियान चलाया और नाचा की विकृतियों को दूर करने का प्रयास किया।
नाचा से आप आर्केस्ट्रा की ओर कैसे मुड़े?
सन् 1948 के आसपास मैं अपने जन्म स्थान खुर्सीटिकुल को छोड़कर राजनांदगांव आ गया था। शहरी परिवेश में फिल्मी गीतों के प्रति लोगों की रूझान को देखते हुए सन् 1949-50 में मैंने राजनांदगांव  की प्रथम आर्केस्ट्रा खुमान एंड पार्टी का गठन किया। 1952 में शारदा संगीत समिति एवं 1957 में सरस्वती कला संगीत समिति तथा कालान्तर में राजभारती आर्केस्ट्रा का गठन आगे की कड़ी थी।
क्या प्रारंभ में आपकी इच्छा फिल्म संगीतकार बनने की थी?
हां, इस दिशा में मैंने सिर्फ एक बार प्रयास किया था। 1957-58 में फिल्म फेयर की ओर से मुंबई में फिल्म फेयर टैलेंट कांटेस्ट के साक्षात्कार हेतु मैं गया था। इसके निर्णायक मशहूर फिल्मकार स्व. गुरूदत्त, स्व. विमल राय और स्व. के. अब्बास थे लेकिन वहां अभिनय की प्रतियोगिता होने के कारण मैं मुंबई से वापस लौट आया और फिर दोबारा प्रयास नहीं किया।
आर्केस्ट्रा चलाने के कारण जब आपकी रूचि फिल्म संगीत की ओर थी तब अचानक आपका रूझान लोक संगीत की ओर कैसे हुआ?
एक बार मैं अपने खेतों की ओर जा रहा था। वहां खेत में काम कर रही एक श्रमिक महिला को मंैने एक फिल्मी गीत को तन्मयता के साथ गुनगुनाते हृुए सुना। इस घटना से मेरा मन विचलित हो गया। मैने सोचा कि जहां ददरिया के स्वर गूंजने चाहिए वहां फिल्मी गीतों के प्रवेश से हमारी संस्कृति लुप्त हो जाएगी। तभी से मैंने लोक संगीत के क्षेत्र में काम करने का मन बनाया और छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को संगीतबद्ध करने की दिशा में जुट गया।
अभी तक आपने कितने गीतों को स्वरबद्ध किया है?
अब तक मंैने पांच सौ से ज्यादा छत्तीसगढ़ी गीतों को संगीतबद्ध किया गया है। इसके अलावा पंजाबी, मराठी और रविन्द्र संगीत के तहत बंगला गीतों को भी संगीतबद्ध किया गया है।
आपने संगीत रचना कब से शुरू की?
लगभग आठ वर्ष की उम्र से मैं संगीत साधना में जुटा हुआ हूं। 14 वर्ष की उम्र में मंैने पहली बार एक गीत को संगीतबद्ध किया।
क्या आपने आकाशवाणी के लिए छत्तीसगढ़ी गीत तैयार किया है?
जी हां, सन् 1969 में मैंने पहली बार आकाशवाणी रायपुर के लिए छह छत्तीसगढ़ी गीतों की रिकार्डिंग करायी थी जो काफी लोकप्रिय हुए। इसके पूर्व आकाशवाणी रायपुर के चौपाल कार्यक्रम में सिर्फ बांसगीत बजता था। बाद में बरसाती भइया के दो गीत आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित होते थे। कालान्तर में आकाशवाणी रायपुर से सुर श्रृंगार कार्यक्रम प्रारंभ होने पर मैंने 1972 में 27 छत्तीसगढ़ी गीतों की रिकार्डिंग करायी जो आकाशवाणी से प्रसारित हुए और उसे श्रोताओं ने काफी पसंद किया। बाद में आकाशवाणी में गीतों की रिकार्डिंग कराने का सिलसिला प्रारंभ हो गया।
आपने रायपुर दूरदर्शन में कितने बार कार्यक्रम प्रस्तुत किया?
रायपुर दूरदर्शन के शिलान्यास एवं उद्घाटन के अवसर पर मैंने क्रमश: आधे-आधे घंटे का दो बार कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसके बावजूद दूरदर्शन केन्द्र रायपुर ने कभी भी मुझे कार्यक्रम प्रस्तुत करने का आमंत्रण नहीं दिया। विधिवत आमंत्रण नहीं मिलने के कारण मैंने भी अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं किया।
क्या आपको दिल्ली दूरदर्शन पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर मिला?
मेरे निर्देशन में अब तक सन् 1977, 1982, 1984 एवं 1999 में चार बार दिल्ली दूरदर्शन में छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया गया है।
क्या आपने शास्त्रीय संगीत भी सीखी है?
प्रारंभ में मैंने संबलपुर (उड़ीसा) के संगीत शिक्षक रामसुमरन से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने मुझे सुर और ताल से अवगत कराया। बाद में मैने छुईखदान वाले सियारामदास वैष्णव से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। राजनांदगंाव के ठाकुर हीरासिंह गौतम और रामरतन सारथी के सानिध्य का लाभ भी मुझे मिला।
चंदैनी गोंदा से आप कैसे जुड़े?
सन् 70 के शुरूआती दशक में ग्राम बघेरा निवासी दाऊ रामचंद देशमुख एक कालजयी सांस्कृतिक कार्यक्रम 'चंदैनी गोंदा ' की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए समूचे छत्तीसगढ़ में कलाकारों की खोज कर रहे थे। उन्हें एक ऐसे संगीतकार की तलाश थी जो  उनकी परिकल्पना को साकार कर सके। उस समय मैं राजभारती आर्केस्ट्रा का संचालन कर रहा था, दाऊजी आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित भैयालाल हेड़ाऊ के स्वर में प्रसारित गीत से काफी प्रभावित थे। चंदैनी गोंदा का बैनर बनवाने के लिए वे राजनांदगांव  में प्रसिद्ध चित्रकार ठाकुर हीरासिंग गौतम के पास आये थे। चर्चा के दौरान उन्होंने ठाकुर साहब को अपने मन की बात बतायी। ठाकुर साहब ने दाऊजी को मेरा नाम सुझाया। इसी के चलते उन्होंने मुझसे भी संपर्क किया तथा चंदैनी गोंदा में संगीतकार के रूप में शामिल होने का प्रस्ताव रखा। चूंकि उनकी परिकल्पना में छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति एवं लोकसंस्कारों को एक साथ कथानक में जोड़ा गया था इसलिए मैंने श्री देशमुख के प्रस्ताव पर हामी भर दी और संगीतकार के रूप में 'चंदैनी गोंदा' में शामिल हो गया।
चंदैनी गोंदा का संदेश क्या है?
चंदैनी गोंदा में एक ऐसे कथानक को प्रस्तुत किया गया है जो देश की एकता और अखंडता को केन्द्र में रखकर छत्तीसगढ़ के दुख दर्द को उकेर सके। छत्तीसगढ़ अंचल के सुख-दुख को अपने में समोकर उसे  मार्मिकता से अभिव्यक्त करने का युगान्तरकारी परिणाम है 'चंदैनी गोंदा'। चैंदैनी गोंदा न तो नाटक है न गम्मत और न ही नाच बल्कि यह समग्र छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का मंच पर प्रस्फूटन है।
चंदैनी गोंदा की शुरूआती दौर में कैसा प्रसाद मिला?
किसानी जीवन की व्यथा-कथा को प्रस्तुत करने वाला चंदैनी गोंदा रातभर चलने वाला एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है। इसके माध्यम से लोकमंच, जनभाषा एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति को परिष्कृत एवं परिमार्जित किया गया है। चंदैनी गोंदा की प्रारंभिक प्रस्तुतियों में ही इसे हजारों लोगों ने देखा और सराहा। चंदैनी गोदा के जन्म ने लोकरंग कर्म आंदोलन को एक नया रूप दिया। दिल्ली के अशोका होटल एवं यूरेस्को भोपाल में आयोजित अखिल  भारतीय लोककला महोतव में चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति ने देश विदेश के कला पारखियों से प्रशंसा प्राप्त की एवं छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का परचम लहराया।
चंदैनी गोंदा में प्रारंभ में कुल कितने कलाकार थे?
07 नवम्बर 1971 को बघेरा (दुर्ग) में जब चंदैनी गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ उस समय 63 कलाकारों ने सहभागिता निभायी थी। चंदैनी की सफलता वस्तुत: उन 63 कलाकारों के सम्मलित प्रयास पर परिणाम है। चंदैनी गोंदा का प्रथम व्यवसायिक प्रदर्शन 1972 के आखिर में गुंडरदेही के समीप ग्राम पैरी में हुआ था जिसमें हजारों की संख्या में दर्शक जुटे थे। इसके पूर्व 1972 में ही राजनांदगांव  के म्युनिस्पिल स्कूल मैदान में आयोजित तीन दिवसीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के समापन अवसर पर चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन किया गया था जिसे देखने बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। इस प्रदर्शन  को साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने काफी सराहा।
चंदैनी गोंदा में वर्तमान में कितने कलाकार है तथा दर्शकों का सहयोग कैसा मिलता है।
चंदैनी गोंदा में वर्तमान में 40 से 50 कलाकारों की टीम है। चंदैनी गोंदा एक ऐसी अनूठी प्रस्तुति है जिसने पिछले तीन दशकों से छत्तीसगढ़ अंचल  के सांस्कृतिक परिवेश को अपने प्रभात में समेट लिया है। चंदैनी गोंदा ने छत्तीसगढ़ के जनमानस को अपने इन्द्रजाल में बांध रखा है यही कारण है कि चंदैनी गोंदा की प्रासंगिकता आज भी निर्विवाद है तथा उसके प्रदर्शन पर हजारों की भीड़ अब भी उमड़ती है।
चंदैनी गोंदा की अब तक कितनी प्रस्तुतियां हो चुकी है?
07  नवम्बर 1971 को चंदैनी गोंदा रूपी जिस पौधे का रोपण किया गया था वह आज विशाल वृक्ष के रूप में आपके सामने है। दाऊ रामचन्द्र देशमुख के निर्देशन में 1981 तक चंदैनी गोंदा की कुल 99 प्रस्तुतियां हुई थी। उसके बाद 1982 से मैं स्वतंत्र रूप से चंदैनी गोंदा का संचालन कर रहा हूं। अब तक चंदैनी गोंदा की हजारों प्रस्तुतियां हो चुकी है।
कुछ वर्ष पूर्व चंदैनी गोंदा के विसर्जन  की भी खबर उड़ी थी, इस पर आपका क्या कहना है।
यह खबर कुछ विघ्न संतोषियों द्वारा उड़ायी गयी थी। 'चंदैनी गोंदा' कोई देव प्रतिमा नहीं है जिसका पूजन के बाद विसर्जन कर दिया जाए। जब तक छत्तीसगढ़ के लोगों का स्नेह मिलता रहेगा, चंदैनी गोंदा की अविराम यात्रा जारी रहेगी।
चंदैनी गोंदा के प्रदर्शन को बेहद खर्चीला कहा जाता है? एक गरीब प्रदेश के लिए यह कहां तक उचित है?
छत्तीसगढ़ में आज जितनी भी प्रमुख चर्चित सांस्कृतिक मंडलिया हैं उनके प्रदर्शन का खर्च लगभग एक समान है। अत: चंदैनी गोंदा पर यह आरोप सरासर गलत है। वैसे भी अगर देखा जाए तो कवि सम्मेलन जैसे आयोजनों की तुलना में चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन काफी सस्ता है। क्योंकि ऐसे सुनता हूं कि कवि सम्मेलनों में अखिल भारतीय स्तर का एक ही कवि 40 से 50 हजार रूपये ले लेता है और उसकी एवज में दस कविताएं भी नहीं सुना पाता। जबकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में 40 से 50 लोगों की टीम रहती है जो रात भर दर्शकों का मनोरंजन करती है। इस दृष्टि से चंदैनी गोंदा का आयोजन सस्ता है।
चंदैनी गोंदा का संगीत इसकी जान है। इसका श्रेय किसे जाता हैं?
चंदैनी गोंदा में पारम्परिक गीतों के अलावा अनेक साहित्यकारों के गीतों का समावेश किया गया है। मैंने अपनी परिकल्पना से उन गीतों को संगीतबद्ध किया है। मेरी संगीत परिकल्पना में साजिन्दों ने भी अहम भूमिका निभायी है। गीतों के शब्द और मधुर संगीत का संयोजन अगर लोगों को पसंद आता है तो मैं सभी कलाकारों की टीम भावना और अपने प्रयास को सफल मानता हूँ तथा सुधी श्रोताओं के प्रति आभार ही व्यक्त कर सकता हूँ।
चंदैनी गोंदा के गीतों को कंपोज करने  में आपको कितना समय लगा?
मैंने चंदैनी गोंदा के सभी गीतों को कंपोज करने में लगभग दो माह का समय लिया। सभी गीतों की कम्पोजिंग मैंने दाऊ रामचंद देशमुख के बघेरा स्थित निवास में रहकर किया। इस दौरान सुप्रसिद्ध  गायक केदार यादव ने मुझे काफी सहयोग दिया। कलाकारों के दो माह की दिन रात की मेहनत और अथक प्रयास के बाद ही चंदैनी गोंदा मंच पर प्रस्तुत हुआ।
आपने अब तक कितनी छत्तीसगढ़ी फिल्मों में संगीत दिया है?
मैंने अब तक कुल सात छत्तीसगढ़ी फिल्मों में संगीत दिया है जिसमें मंैना, पिंजरा के मैना, मया के बंधना, पुन्नी के चंदा, जय बम्लेश्वरी मईया और डांड़ शामिल है।
आपके संगीत संयोजन में अब तक कितने आडियों कैसेट निकले हैं?
मेरे संगीत निर्देशन में अब तक सैकड़ों आडियों कैसेट एवं ग्रामोफोन रिकार्ड जारी हो चुके हैं।
चंदैनी गोंदा के किस गीत को संगीतबद्ध करते हुए आपको सर्वाधिक संतुष्टि मिली?
रविशंकर शुक्ल द्वारा लिखित चंदैनी गोंदा का शीर्षक गीत 'चंदैनी गोंदा फूलगे' का संगीत मैंने एक रात में तैयार किया। इससे मुझे सर्वाधिक संतुष्टि मिली।
किसी कलाकार के सम्मान में आपने कोई आयोजन का दायित्व उठाया है?
सन् 1988 में मैंने लखोली (राजनांदगांव) में तीन दिवसीय लोकोत्सव का आयोजन किया था। इसके अलावा विगत बीस वर्षों से मैं दाऊ मंदराजी के जन्मस्थान रवेली (राजनांदगांव) में ग्रामवासियों के सहयोग से उनकी जयंती पर एक अप्रैल को सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन कर रहा हूँ। 1992 में मैंने रवेली में दाऊ मंदराजी की प्रतिमा स्थापित करने में योगदान दिया।
क्या आपको कोई पुरस्कार सम्मान मिला है?
मेरी पचास वर्षों की संगीत साधना के दौरान अनेक संस्थाओं ने मेरी साधना का सम्मान नागरिक अभिनंदन के साथ किया है। शासन स्तर पर पुरस्कार सम्मान के लिए मैंने अब तक अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं किया और न ही भविष्य में करूंगा।
कोई और बात जो आप कहना चाहते हों?
मेरी इच्छा है कि छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की सुरभि समूचे देश में बिखरती रहे तथा कलाकार अपने प्रदर्शन के द्वारा छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का प्रचार प्रसार करते रहें।
पता : बल्देव बाग (बाल भारती स्कूल के पीछे)
राजनांदगांव  (छत्तीसगढ़)
मो. 9407760700


तुम या मैं

    शिखा वाष्णेय
मैं थी ही क्या तुम्हारे लिए
        एक चलती फिरती प्रतिमा
            या एक यंत्र भर
                जरूरतों की पूर्ति का
    जिसका अपना तो कुछ था ही नहीं
        ख़ुशी भी थी तुम्हारी हंसी में
            गमगीन भी थी तुम्हारी नमी में
                    पर तुम...
    तुम हमेशा रहे
        मेरे लिए सब कुछ
            मेरा दिल,जान, नींद,सपने
                मेरी सहर,धूप,छाँव,नगमें
    अब मेरी कविताओं में तुम
        कभी कभी मुस्कुरा भी देते हो तो
            यूँ लगता है जैसे
                तुम्हारे दिल ने मेरे वजूद को छुआ है।
पता : द्वारा - शिल वाष्णेय
3/214, विद्या नगर कालोनी
अलीगपताढ़ (उ . प्र . )

बस, औरत हूं और कुछ नहीं

शीला डोंगरे
बचपन में जब माँ समझाती
कदम सम्भलकर रखना बेटी
मर्दों की है दुनियां सारी
घर की नीव है, तेरी जिम्मेदारी
मन को पंख ना कभी लगाना
मर्दों से ना टक्कर लेना
माँ कह कह कर थक ही जाती
और मै हंस कर टाल भी देती
लेकिन कल ओ सामने आया
मुझकों उसने आइना दिखाया
मै फूल - कली हूँ भंवरें की जागीर
या हूँ तितली आवारा राहगीर
मै ठिटक गई ये सोंच के पल भर
झांक के देखूं खुद के अंदर
कुछ भी तो साबुत नहीं था
दिल टुकड़ों में बंटा पडा था
औकात मैं आपनी समझ चुकी थी
बस औरत हूँ और कुछ नही थी !!!
पता :अध्यक्ष , अखिल हिंदी साहित्य सभा (अहिसास )
फ्लैट न. डी 4, रोहण परिसर कोआपरेटिव हाऊसिंग सोसाइटी
राणे नगर नासिक पि. न. 422009

सारे बेदर्द ख़यालात : चांदनी पांडे

चांदनी पांडे
सारे बेदर्द ख़यालात रुके नहीं कब से।
सूने - सूने से ये हालात रुके नहीं कब से।

ये समंदर भी मेरी प्यास से कमतर निकला,
तिश्नगी के मेरे ज़ज्बात रुके हैं कब से।

आशियाने को बचाने में कसर क्या छोड़ी?
दिल के कोने में सवालत रुके हैं कब से।

यक - ब - यक तुमसे मुलाक़ात के दिलकश लम्हें,
बाद उसके सभी लम्हात रुकें हैं कब से।

चांदनी से है मिरासिम में अंधेरी रात,
और उजालों के ये सौगात रुके हैं कब से।
पता :
13 सी 3, चंद्रा नगर, जगईपुरा,
राजेन्द्र आटा चक्की के पास लाल बंगला , कानपुर  (उ.प्र.)  208007,
मोबाईल : 08896758559

रजनी मोरवाल के दो नवगीत

संयम - जाल
पंछी बन उड़ना मैं चाहूँ
संयम - जाल कसे रे !
इच्छाओं का सागर फैला
जीवन के घट - घट में,
प्यासा कैसे फर्क करेगा
पानी औश् पनघट में,
जल बिन मछली ज्यों तरसूँ मैं
सावन अंग डसे रे!
रूप निहारूँ दरपन में या
छबि देखूँ साजन की,
साथी मौन खड़ा है मेरा
बात करूँ क्या मन की,
नागफनी - सी चुभती रातें
बोझिल हुए सवेरे
शब्दों में कह डाली मैंने
व्यथा कथा क्षण - क्षण की,
हाथों की रेखाएँ बाँचूँ
या पोथी जीवन की,
छन्द - छन्द से गीत गूँजते
मन आँगन में मेरे,
झूमती बदली

सावन की रिमझिम में झूमती उमंग
बदली  भी झूम रही बूंदों के संग

खिड़की पर झूल रही जूही की बेल
प्रियतम की आँखों में प्रीति रही खेल
साजन का सजनी पर फैल गया रंग

पुरवाई  आँगन  में  झूम  रही मस्त
आतंकी  भँवरों से  कलियाँ  है त्रस्त
लहरा  के आँचल भी  करता है तंग

सागर  की लहरों पर चढ़ आया  ज्वार
रजनी  भी लूट  रही लहरों  का प्यार
शशि के सम्मोहन का ये कैसा ढंग

पता - सी. 204, संगाथ प्लेटीना साबरमती - गाँधीनगर हाईवे मोटेरा
अहमदबाद - 380 005। दूरभाष 079 - 27700729, मोबा. 09824160612
rajani_morwal@yahoo.com

उलझा हुआ सबेरा है

जितेन्द्र जौहर

आज निराशाओं ने डाला, द्वार - द्वार पर डेरा है।
देव! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
ख़ुद अपनी ही क़बर खोदता, खड़ा मनुज निज हाथों से।
फूलों का सीना ज़ख्मी है, निज कुल के ही काँटों से।
राजनीति ने कैनवास पर, कैसा चित्र उकेरा है?
देव! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
दिशाहीन यूँ देश कि जैसे तरणी तारणहार बिना।
चूल्हे मकड़ी के क्रीड़ांगन, प्रजा सुपालनहार बिना।
सर्दी - गर्मी - वर्षाऋ तु में, अम्बर तले बसेरा है।
देव! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
सच्चाई के पथ पर मानव, चलने में सकुचाता है।
अन्यायी के चंगुल में फँस, न्याय खड़ा अकुलाता है।
दुर्दिन की रजनी का चहुँ दिशा दिखता प्रसृत घेरा है।
देव! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
हिंसा, भ्रष्टाचार, लूट, घोटालों के अंधे युग में।
हंस खड़े आँसू टपकाएँ, काग लगे मोती चुगने।
अंधकार के कुटिल जाल में, उलझा हुआ सवेरा है।
देव! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है।
पता :
आई. आर. 13/ 6, रेणुसागर, सोनभद्र  (उ.प्र.)