गुरुवार, 23 मई 2013

उखड़ी सिलाई



  • नरेन्द्र कुमार
शाम को जब मेरी पत्नी स्कूल से आई और आते ही नजरें चुरा बिस्तर पर लेट गई तो मैं समझ गया हो न हो उसे ऋण मंजूर नहीं हुआ है। मैंने उसे चाय बना कर दी और कहा - च्च् उदास मत हो, हो जायेंगे तीस हजार का इन्तजाम। जहाँ तीन लाख खर्च किये वैसे ये भी मिल जायेगें। रात को दिनेश से मिलता हूं। व्यापारी है करवा देगा इन्तजाम। परन्तु पत्नी की काली स्याह आँखें प्रश्र पूछती रही - मैंने कब कहा था घर बनाओ। क्या हमारी हैसियत भी थी कि हम घर बना सकें, लोग क्या कहेंगे दोनों स्कूल टीचर और तीन कमरों का अपना मकान आज अंश याद आ रहा है।
मैं अंश को भूला नहीं पाता था, लावारिस लड़का जो मेरे सामने ही प्रायमरी मिडिल और इन्जिनियरिंग कर सका। मुझे बाबू जी व पत्नी को माई कहकर पुकारता। कभी कुछ खना है, कुछ कमी है तो बेझिझक माँग लेता और कहता - एक दिन ब्याज सहित लौटा दूँगा, और जो मेरा होगा वह आपका तो होगा ही आज आपका सब कुछ मेरा है। माई और मेरे माँ - बाप नहीं हुए तो क्या हुआ, उन्होंने मेरी नरम उंगलियाँ नहीं पकड़ी तो क्या हुआ, उन्होंने मेरे बालों पर प्यार का हाथ नहीं रखा तो क्या हुआ, उन्होंने मुझे नाम देने में हिम्मत नहीं की तो क्या हुआ। आपने तो सब दिया। बाबूजी ने मुझे इस काबिल बना दिया कि मैं स्वतंत्र उड़ जाऊँ कहीं दूर। परन्तु कितने अजीब होते हैं रिश्ते जिस धरा पर खड़े होकर वस्तु में मुझे लावारिस होने का भास होता है, दिल फटता है, मन रोता है वहीं आपकी छवि उभरकर आ जाती है। वात्सल्य की, जिद के सामने झुकती बूढ़ी चरमराती हड्डियों की, प्यार भरी माई की झिड़की की। यही सब कहता जो आज याद आ रहा था। मैं सोच रहा था आज काश अंश होता तो उधारी मिल ही जाती, परन्तु नियति की रचना दो साल पहले मेरी आँखों के सामने सनकी आतंकवादियों के लावारिस बम्ब से वह लावारिस मौत की गोद में कई टुकड़ों में बिखर गया। मैंने ही तो उसे अग्रि दी थी।
वह कई जेबों वाली एक पेंट और शर्ट उस बार मेरे लिये लाया और मुझे जबरदस्ती जोकर बना हंसता रहा। बस यही कहता बाबूजी, इसे पहनो या न पहनो। कभी दुखी हो जाओ या मेरी याद आये तो बस इसे निहारना मैं आपके सामने आ जाऊँगा। दुनिया बहुत छोटी है। बाबूजी, आप चलो छोड़ो नौकरी और मेरे पास बंगलौर चलो। परन्तु हम कहाँ जाते आज याद आई तो उस पेंट शर्ट को निकाल निहारता रहा और दुख हलका करने के लिए उसे पहन पत्नी वंदना के सामने आया जिससे वह भी अपना दिल अंश में डूबो दे।
मेरी पत्नी मुझे देख हंसने लगी, अंश की याद यादें निकाल न जाने कब तक बतियाती अगर उसकी नजर एक जेब की उखड़ी सिलाई पर न जाती उसने सिलने  के लिए खड़े - खड़े हाथ बढ़ाया और सिलने लगी तो, उस जेब मे एक मुड़ा व सलीके से पिन अप किया छोटा लिफाफा निकला। उसे खोला तो दो बरस पहले अंश की चिट्ठी तथा एक दो तोले की चेन, तीन तोले सुन्दर नाजुक सोने की हार कान के बाले निकले और चिट्ठी में लिखा था - माई बाबूजी, अगर मैं बताकर कुछ दूंगा आपको तो आप लोगे नहीं, आपको लगेगा मैं एहसान चुका रहा हूं। पर माई आपका बेटा अंश कमाई कर रहा है। और अपने माँ - बाप के चरणों में कुछ दे रहा है, नहीं मत कहना। बेंगलोर पहुंचकर मैं आपको फोन कर दूंगा। बेटा हूं मैं आपका यह अहसास मत भूलना वरना लावारिस ही रह जाऊंगा। माफ करना आपका अंश अपना आप पर हक जताता हुआ।
हमारी आँखों में आँसू छलछला गये। काश वह मिलने आता, तो मरता नहीं। आज हम पोती - पोते वाले हो जाते, उन्हें खिलाते। तब मैंने और पत्नी ने उस नजराने को गिरवी रख घर का काम पूरा करने का विचार किया और उसकी याद को नजराने को ता - उम्र सीने से लगाने का प्रण किया। यह समझ दिनेश ने हमारी मानसिक स्थिति का जायजा ले एक स्टेम्प पेपर पर हमारी रजामंदी ले वे सब नजराने हमारे पास रहने दिये। सच इंसानियत, इंसान को भावुक बनाकर रिश्ते बनाती है वरना कौन, कहाँ से आया किसके साथ रहा क्या मायने है। उखड़ी  सिलाई ने पेंट से जो दिया एक अनाम रिश्ता था।
  • सी 004, उत्कर्ष अनुराधा, सिविल लाइन्स,नागपुर (महाराष्ट्र)

रोटी



  • राजेश जगने ' राज' 
एक रिक्शे चालक युवक को पेट में भूख लिए शहर की गलियों में चक्कर लगाते सुबह से शाम हो गई। खाली मेहनत से युवक थक गया था। सोचने लगा - खाली शहर के चक्कर लगाते लगाते सारा दिन निकल गया मगर एक भी ग्राहक नहीं मिला। खाली हाथ घर जाकर भला क्या करूंगा ? घर में खाने को एक दाना भी नहीं है ... वह विचार में मग्‍न था कि एक ग्राहक आया और उससे रेल्वे स्टेशन छोड़ने कहा। सौदा हुई और वह उस ग्राहक को पंद्रह रूपए में रेल्वे स्टेशन छोड़ने तैयार हो गया। रिक्शे चालक ने विचार किया - मालिक के घर देर है, अंधेर नहीं। अब मैं इस पन्द्रह रूपए से आटा खरीदूंगा और घर जाऊंगा। रूखा - सूखा खाकर रात काट लेंगे। फिर कल नई सुबह आयेगी।
ग्राहक को उसने रेल्वे स्टेशन पर घर छोड़ा। उससे पन्द्रह रूपए लेकर दुकान गया और उस पन्द्रह रूपए से आटा लेकर अपने घर के पास पहुंचा। दरवाजा खटखटाने पर उसकी पत्नी ने दरवाजा खोली। बोली - आज तो बहुत देर लगा दिए। पति ने पत्नी से सारा हाल सुनाते हुए लाए आटा को उसे सौंप दिया। घर भीतर प्रवेश करती पत्नी ने कहा - आटा भर से क्या होगा ? इसे पकाने के लिए आग भी तो चाहिए। घर में एक भी लकड़ी नहीं है। बच्चे दिन भर से कुछ खाए नहीं है।
बच्चों का विलाप पिता से देखा नहीं गया। उसने आलमारी से कापियों का बंडल निकाला और पत्नी से कहा - लो, इन कापियों के पन्ने फाड़कर चूल्हा जला लो। इसकी आंच से रोटियाँ बन जायेगी।
पत्नी ने विनम्र भाव से कहा - मैं इसे नहीं जला सकती। ये तो आपकी अमूल्य धरोहर है। इन कापियों में आपकी कविताएं लिखी हुई है।
रिक्शे वाला कवि ने कहा - भूख की आग और कागज पर लिखे आग में जमीन -  आसमान का अंतर है। ये मेरी लिखी हुई कविता किसी की भूख नहीं मिटा सकती, पर चूल्हे में जल कर कविता रोटी जरूर बना भूख की आग बूझा सकती है।
पत्नी पन्ने फाड़कर चूल्हा जलाने लगी। कविता की आंच पर रोटियां बनाने लगी। रोटी के बनते तक बच्चे भूख से तड़प रहे थे और कविता के लिए कवि।
  • सोला खोली, स्टेशन रोड,  नागपुरे सॉ मिल के पास, राजनांदगांव ( छग.)

छत्‍तीसगढ़ी कहानी

 
नोनी
  • रूपेन्द्र पटेल
घाते च सुघ्घर हावय न ये दुनिया ह, झुमुक ले लहरावत अंगना म मां तुलसी के बिरवा जेकर छंइहा म बिराजे महादेव। घर - कुरिया, गाँव - गली, लीम तरी गुड़ी बइठका। नान्हें सहर पों - पों करत मोटर -  गाड़ी। भुंइया के सिंगार रूख राई, बन पहार महमही बगरावत फूल - फूलवारी के बगइचा। चींव - चांव करत कुहकत, हुंकरत पसु पंछी मन के डेरा छल - छल - छल छमकत बोहावत नदिया - नरवा अउ पोरिस ले भरे बांधा के पानी। खेत - खार म पवन के संगे संग झुमरत गावत आनी बानी के जिनिस, धान - सरसो - चना का ... का ....। मेला मड़ई रिकिम - रिकिम के तिहार खाई - खजेना। कहूँ किसान कमावत ददरिया गावत त कोनों मेरन बंसरी बजा - बजा गरूवा चरावत गहिरा। त कहूं लइका मन बाँटी - भंवरा, फुगड़ी खेलत। नल कुआँ म पानी भरत पनिहारिन। बिहिनिया के बेरा हाँसत कुलकत इसकुल जावत लइका मन ल देख चोला जुड़ाथे। हमरो दाई बाबू मोर गोठियात रहिस के महूं ल दीदी के संगे - संग पढ़े बर भेजबो कहिके। मैं अब्बड़ पढ़िहंव, अब्बड़ ....।
फेर डोकरी दाई ओदिन बाबू ल कहय - एको दिन बहू ल सहर ले जा बेटा अउ सोनोगराफी कराके ले आनते। बहू ल गरू होय चार महीना पूरथे। एक ठन नोनी त होगे हे। ए दरी बेटा हो जातिस त मोर सरधा पूर जातिस। तोर बड़े भइया के तो तीन ठन नोनि च नोनी हावय। कतेक ल काय करबो। तउने दिन ले दाई - बाबू दुनों झन बड़ संसों करत रइथें, सोनोगराफी म सफ्फा पेट भीतर ह दिखथे कहिथे - महूं ल धुकुर - धुकुर लागत रहिथे।
हमर बबा बड़ मया वाला गियान म, नियाव म उंकर सही कोनो नइ रहिन कहिथें। चालिस कोस ले ऊपर बबा के सोर रहिस कहिथें। बड़े दाऊ कहत लागय, सब के सब ओकर सनमान करय कथें। ऊंच पुर जबर मेछावाले, गोल मुँह मुंड़ म चार किलो के पागा धोती बंगाली पहिरे, गोरा नारा हाथ म अटियावत लाठी धरे, मुसकियावत गली म रेंगय त जुन्नेट जवान टूरा मन घला लजा जावंय। हमार बबा दाऊ अंव दाऊ कहिके गरब करने वाला घला नइ रहिन। बेरा भर खेती माटी के बुता करबे च करंय। नवरात म जंवारा गीत, रमायेन म भजन, फागुन म फाग, करमा - ददरिया हमर बबा मन भर गावय कहिथें, अउ गुरतुर के सुनइया के पियास बाढ़ते जाय। बबा के बीते ले घर के जम्मों हाथ - बात डोकरी दाई के हावय। बबा के रहत ले, डोकरी दाई के चिटको टिकी नइ चलत रहिस। फेर अब त निचट खसुटहीन अउ चमगेदरीन होगे हावय। आज फेर दाई - बाबू ल होत बिहान भसेढ़िस - तुंहला जाए ल कथंव त जावा नहीं, का करिहा ? का धरिहा तुंही जाना ? बाबू दाई मन घला एदे सुनता बांधथें के बिलासपुर जाथन कहिके जाबो अउ रतनपुर म दु - चार दिन रहिके आ जाबो क हथें। रतनपुर मोर ममा गाँव आवय।
दाई - बाबू आज घर म आ के खड़ा होइन हें तहाँ ले डोकरी दाई के तीर बान चले लागिस - का होइस बेटा सब बनें - बनें गा ? सब बनें - बनें बहू। का पता चलिस असपताल म ?
दाई परछी के मचिया म चुपे थिरावत बइठे हावय अउ बाबू अंगना म सब लइका मन ला खई - खजेना बाँटई म बिवतियाय हे। सुरूज नरायेन दिन भर मिहनत के बाद सुरताए ल बूड़ती म समावत हे ...। डोकरी दाई आलू अउ भाटा ल साग बर पउलत परछी म बइठे हावय अऊ दाई लंग वोहि - वोहि बात ल छय - सात बेर होगय चेंघत - चेंघत। दाई बने च चिल्ला - चिल्ला कहे लागथे - नोनी ताय दाई नोनी, नोनी हो जाहि ता तुंहर घर के सब धन - दोगानी पथरा बन जाही ...हांत के कौंरा लुटा जाहि का ? के बेटा के होय ले घर के आंन्टा - कोन्टा ह सोना - चांदी, हीरा - मोती ले भर जाहि ? सोनोगराफी नइ करान, भगवान हमला जइसे असीसय जिनगानी पहाबो। तहूँ तावस दाई बेटी के जात, फेर बेटी च मन बर बैरी काबर बनथस ? कोनो बेटी च के गरभ ले तो तहूँ जनम लके ए जिनगानी ल पाय हावस। बेटी च मन त संसार के आधार अउ रखवार आवय दाई। फेर बात बेटी अउ बेटा के नइ रहय, बात होथे करम के, मिहनत के, आज ले अब तैं अइसन गोठ झन गोठियाबे। कहिके दाई घर भीतर चल देथे। डोकरी दाई टक लगाए ओखरे डहर ल देखते रहिथे ...। अंगना म बइठे बाबू धीरे - धीरे मुसकियात हावय। लइकन मन हांसत - नाचत, खेलत - कूदत बिधुन हावंय। सुघर फुरूर - फुरूर पवन चलथे।
  • मुकाम - लोहारा, पण्डरिया , जिला - कबीरधाम( छग.)

लोक स्वप्न का सत्य, बच्‍चों की पत्रिका - बालमन, भ्रष्‍टाचार के शलाखा पुरुष

  • समीक्षक - कुबेर
छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास में लोकस्वप्र में लिलिहंसा का प्रकाशन एक सुखद और गौरव प्रदान करने वाली घटना है। इसमें बारह संदर्भ संग्रहीत है, जिसमें कुछ शोध आलेख और शेष निबंध हैं। पुस्तक में लोक वर्ग का, लोकविधाओं एवं लोकोत्तर विषयों के साथ अंतर्सबंधों, प्रभावों, आंतरिक एवं बाहा्र बुनावटों के तानों - बानों का विशद् तर्कपूर्ण और प्रमाणिक विवेचन किया गया है। मानव - समाज, चाहे लोकवर्ग हो अथवा शिष्टï वर्ग सभी के पक्षों पर आज पूँजी और व्यापार का निरंकुश हस्तक्षेप होने के कारण समाज का पूर्णरूपेण बाजारीकरण हो चुका है और आज समाज उत्तर आधुनिकता के युग में प्रवेश कर विचार - शून्यता तथा संवेदनहीनता की स्थिति में पहुँच चुका है। लोक पर प्रभुवर्ग तथा बाजार के प्रभावो की विशद् व्याख्या विवाह बाजार = लिलिहंसा घोड़े का स्वप्र तथा लोक में बाजार का प्रवेश नामक प्रकरण में किया गया है।
बाजार के विषय में कहा गया है कि यह पूर्णरूप से अमानवीय होता है, मानवीय संवेदनाओं से इसका कोई सरोकार नहीं होता। आज मुनष्य पूर्णत: निर्दयी बाजार के शिकंजे में कंसता चला जा रहा है। वह हमेशा बाजार में ही रहने लगा है- खरीदता हुआ, बेचता हुआ अथवा बिकता हुआ। बाजार की निर्दयता और अमानवीयता के चलते आज मनुष्य एक जिंस मात्र बन कर रह गया है। बाजार के इसी अमानवीयकरण के कारण आज नरभक्षी संस्कृति का भूमंडलीयकरण हो चुका है। पाँच सितारा होटलों में मनुष्य के माँस की माँग आज सर्वाधिक हो रही है।
प्रकरण में आगे कहा गया है कि बाजार का लोक प्रवेश परंपराओं के माध्यम से होता है। लोक परम्पराओं को बाजार कच्चे माल के रूप में प्रयोग करता है। अंत में ग्राहकों के मध्या ही प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न कर स्वयं लोकनियंता बन जाता है। आज बाजार एक विचार के रूप में परिवर्तित हो चुका है। भविष्य की संस्कृति,बाजार की संस्कृति होगी।
अभी कुछ दिन पूर्व किसी म्यूजिक चैनल पर एक अंग्रेजी गाना दिखाया जा रहा था। सभी नर्तक पिशाचों की वेशभूषा में थे। और कुछ बच्चों को घेर कर पैशाचिक नृत्य कर रहे थे। न सिर्फ वे पैशाचिक नृत्य कर रहे थे बच्चे के रक्त और माँस का भक्षण भी कर रहे थे। एक - एक कर बच्चों को मार और खा रहे थे। अंत में बचे हुए एक बच्चे पर सभी एक साथ टूट पड़ते हैं। बच्चों का क्रन्दन सुनकर वे आह्रïलादित हो रहे थे।
इस प्रकार के नृत्य की परिकल्पना प्रस्तुतिकरण और अवलोकन किस तरह की मानसिकता को प्रगट करता है ? क्या ऐसे लोगों की अमानवीयता को दण्डित करने वाला आज कोई नहीं है ?
पुस्तक के प्रथम सर्ग में लोक का अभिप्राय व्यक्त करते हुए लोक साहित्य व शिष्ट साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। लोक साहित्य, लोकगीतों में मुखर होता है। लोकगीतों में लोक व नारी की वेदना और असहायता का मार्मिक चित्रण होता है।
बदलती हुई भाषा और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में भाषा पर प्रभाव डालने वाले तत्वों को रेखांकित किया गया है। भाषा पर लोक संस्कृति और औद्योगीकरण का ही सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है।
लोक नाट्य नाचा के संदर्भ में लोक और शिष्टï के अंतर्सबंधों की विवेचना करते हुए लोक नाट्य की उत्पत्ति के संबंध में कहा गया है कि शिष्टï साहित्य वेद शूद्रों के लिए बर्ज्य होने के कारण भरत मुनि का नाट्य शास्त्र जिसे पंचम वेद के रूप गृहीत किया गया है, शूद्रों के लिए स्पृहा्र हुआ।
लोक गीतों के आंतरिक और बाह्य बुनावट के संदर्भ में लोकाचार, संस्कार, सामाजिक असमानता, जीवन की बारीकियाँ और व्यवस्था के प्रभावों की लोकगीतों में अभिव्यक्ति की चर्चा की गई है।
लाकोत्सवों के प्रति हमारे नये सरोकार प्रकरण में लोक पर्वों की लोक उत्सवों में रूपान्तरण के कारणों पर प्रकाश डालते हुए उत्पादन के साधनों को प्रमुख कारण बताया गया है, परन्तु इस परिवर्तन के पीछे आधुनिक मीडिया के प्र्रभावों का उल्लेख किया गया है।
मातृकाओं की कल्पना का लोकालंब में लोक में मान्य मातृशक्तियों के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है। जबकि छत्तीसगढ़ में वानस्पतिक पर्व और लोक चिंता नामक प्रकरण में छत्तीसगढ़ में प्रचलित भोजली और जंवारा पर्वों का उल्लेख करते हुए समाज के लोकवर्ग को प्रकृति के निकट और शिष्ट वर्ग को प्रकृति से दूर जाते हुए बताया गया है।
हरियाली पर्व और टोनही अंधविश्वास संदर्भ में हरियाली पर्व में टोनही और तांत्रिक साधना की परंपरा पर प्रकाश डाला गया है। टोनही अंधविश्वास के मूल पर प्रहार भी किया गया है लेकिन यह तो हरियाली पर्व के उप ध्येय है। हरियाली पर्व का मुख्य ध्येय कृषि और पशुपालन संस्कृति से संबंधित है जिस पर चर्चा न होना आश्चर्यजनक है।
गाथा और इतिहास : कुछ अनुत्तरित प्रश्र संदर्भ दशमत कैना नामक संदर्भ में विभिन्न अंचलों में प्रचलित लोक गाथाओं के स्वरूपों की एकरूपता सिद्ध करते हुए जसमा ओड़न, दसमत कैना, राजा माध्यदेव भोज देव और देवार जाति के ऐतिहासिकता की प्रमाणिक व्याख्या प्रस्तुत किया गया है।
लोक में मनु की शेष परछाइयाँ में मनुस्मृति की वर्ण व्यवस्था, दण्ड विधान, दान विधान, बलिप्रथा नारी विषयक अवधाणाओं की विशद् चर्चा की गई है और बताया गया है कि मनुस्मृति किस प्रकार ब्राम्‍हण और क्षत्रियवर्णों का हित साधक तथा शूद्रों के शोषण के विभिन्न उपादानों को उचित ठहराने वाला निंदनीय ग्रन्थ है।
संग्रह में संग्रहीत संदर्भों की भाषा साहित्य के उच्च मापदण्डों के अनुरूप एवं शैली विवेचनात्मक समीक्षात्मक है। चिंतन की अंर्तधारा से पाठक के विचारों का तादाम्मय होता है। विषय की व्यापकता और चिंतन की गहराई के कारण यह पुस्तक लोक कला व लोक साहित्य में विद्यार्थियों - शोधार्थियों के लिए लोक कला व लोक साहित्य के विद्यार्थियों - शोधार्थियों के लिए संदर्भग्रन्थ साबित होगी। पुस्तक पठनीय और संग्रह योग्य है।
बच्चों की पत्रिका - बालमन
  • समीक्षक - ज्ञानेन्द्र साज
इतिहास बनता तो बाद में है पहले बनाये जाने की चेष्टा की जाती है। बालमन पत्रिकाओं के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुकी है। देश भर में यह ऐसा वार्षिक प्रयास है जो बच्चों का, बच्चों द्वारा, बच्चों के लिए के आधार पर विकसित हुआ है। बच्चों को तीन वर्ष से राह दिखा कर प्रेरणा दे रहे हैं श्री निश्चल। यह पहला प्रयास ही सही रंग - बिरंगी व्यावसायिक पत्र - पत्रिकाओं से अलग सादगी के साथ अपना अस्तित्व बनाये रखने में सफल रही है।
जहाँ तक बात रचनाओं की है तो ऐसी रचनाएँ हैं जो बाल साहित्य में जड़ जमाये रचनाकारों पर भी भारी पड़ती हैं। जबकि अन्य रचनाएं भी सादगी से अपनी बात कहने में सक्षम रही है। पत्रिका की एक सबसे बड़ी खूबी यह है कि बच्चों द्वारा देश के प्रख्यात नामवर शायर और कवियों के साक्षात्कार लिये गये हैं। यह भी अपने आप में देश में प्रथम बार अनूठा कारनामा है। हल्के हरे कागज पर मुद्रण पाक - साफ है। अशुद्धियाँ न के बराबर हैं। साक्षात्कार तथा अलीगढ़ के ही साहित्य से जुड़े अनेक लोगों ज्ञानेन्द्र साज, अशोक अंजुम, प्रेमकिशोर पटाखा, डाँ. नमिता सिंह, सुरेन्द्र सुकुमार के आशीष वचन के फलस्वरूप पत्रिका खूब निखरी और संवरी है।
ऐसी पुस्तक के प्रकाशन का दायित्व लेकर बच्चों ने एक नायाब नाम कर दिया है। रचनाएँ तो सभी बाल सुलभ हैं ही मगर हर पृष्ठï की सज्जा पाठक का मन मोहने को काफी है। मैं सभी सम्पादकों को उनके इस उत्कृष्टï प्रयास हेतु ढेरों बधाइयाँ देना चाहता हूं। पुस्तक तथा रचनाओं का आनंद 20 रूपये में खरीदकर उठाना एक सस्ता ही नहीं बहुत फायदे का सौदा है।
 भ्रष्‍ट्राचार के शलाका पुरूष
  • कुबेर
व्यंग्य को परिभाषित करने का प्रयास किया जाता रहा है परन्तु इसकी कोई निर्विवाद और मान्य परिभाषा अब तक नजीं बन पाई है। व्यंग्य के पितामह परसाई भी इस प्रतीत कार्य में असमर्थ रहे परन्तु व्यंग्य के पितामह परसाई भी इस पुनीत कार्य में असमर्थ रहे, परन्तु व्यंग्य के लक्षण अथवा गुण अवश्य बता गये हैं। वे कहते हैं - व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है। जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्ड का पर्दाफाश करता है। व्यंग्य एक माध्यम है, कोई राजनीतिक पार्टी नहीं। व्यंग्य उजागर और सचेत करता है। सही व्यंग्य व्यापक जीवन परिवेश को समझने से आता है। आदि।
अन्य समीक्षकों ने व्यंग्य के और भी लक्षण बताते हैं। जैसे - व्यंग्य में बेधक व मारक क्षमता होती है। विचारों की गहनता और करूणा की गहराई होती है। व्यंग्य आक्रोश का बौद्धिक रूप है। यह न सिर्फ पाठक की संवेदनाओं को जगाता है अपितु कुछ करने के लिए प्रेरित भी करता है।
रमेशचन्द्र मेहरोत्रा के अनुसार - कुछ यह साहित्य का ऐसा आवरण मंडित सत्य होता है जो गूढ़ार्थ होने के कारण शब्दकोश और व्याकरण की सहायता से पकड़ में नहीं आता।
आखिर व्यंग्य का यह सत्य क्या है ? व्यंग्य यदि विधा है तो यह सर्वव्यापी कहानी लघुकथा, उपन्यास, निबंध, नाटक, प्रहसन, एकांकी, स्तंभ तथा कविता आदि विद्यमान क्यों है ? कहानी से व्यंग्य कहानी, उपन्यास से व्यंग्य उपन्यास, और कविता से व्यंग्य कविता में कायान्तरण कब, कैसे और क्यों होता है ? स्पष्ट है कि अपने शिल्पगत विशेषताओं लेखकीय कौशल के कारण व्यंग्य गद्य में भी काव्यात्मकता की अंतर्धारा प्रवाहित करने की क्षमता रखता है तथा बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से कथ्य को उजागर करता है। अंतर्कथाओं के माध्यम से रमणीयता और लालित्य का सृजन करता है। सूत्र वाक्यों के माध्यम से पाठक के ह्रïदय और मस्तिष्क पर प्रहार करता है। ये सूत्र वाक्य, सूक्ति वाक्यों अथवा अनमोल वचनों की तरह उपदेशात्मक नहीं होते, अपितु अचूक मारक क्षमताओं से युक्त होते हैं, जो पाठक को हँसाता भी है और उसके अंतर्मन को घायल भी करता है। इस प्रकार व्यंग्य का स्वरूप द्विविमीय और चरित्र द्विगुणीय होता है।
व्यंग्य के क्षेत्र में कांशीपुरी कुन्दन सुपरिचित नाम है। भ्रष्‍ट्राचार के शलाका पुरूष उनका तीसरा व्यंग्य संग्रह है। इस संग्रह में पच्चीस व्यंग्य संग्रहीत है। मुझ पर करो पी.एच.डी. मुफ्त सलाहखोर, पुरानी चीजों को टिकाने की कला, भूखों नहीं मरने के मान्य सिद्धान्त एवं परोपकारी जीव जैसी कुछ रचनाओं को अलग कर देने से बांकी सभी रचनाएं कथ्य की दृष्टि से एक ही व्यंग्य विषय का विस्तार प्रतीत होते हैं जिनके मूल स्वर राजनेताओं, अपराधियों, पुलिस और अधिकारियों के द्वारा नैतिक पतन की गर्वीली स्वीकारोक्ति है। व्यंग्यकार की व्यापक जीवन परिवेश की समझ पाठकों के समझ से अधिक होनी चाहिए जो इस संग्रह में कहीं नजर नहीं आती। आज बच्चा - बच्चा जानता है कि नेता ही भ्रष्टïाचार के शलाका पुरूष हैं। पुलिस और अपराधी चोर - चोर मौसेरे भाई है। अधिकारी गबन करने में व्यस्त हैं। नेता सरकार से भले ही फिफ्टी परसेंट में बात तय होगी, बांध पुन: बनवाने आर्डर आयेगा। व्यापारी लोग मिलावट का गर्भधारण करवाने की कला में कब से पारंगत हो चुके हैं। पुलिस वाले थाने में सद्भावना पूर्वक सामूहिक बलात्कार कार्यक्रम संपन्न करके ही जनसेवा का कर्तव्य निभाते हैं। अधिकारी भंग के साथ घूंस भी मिलाकर खाने में माहिर हो गये है। मूर्ख जब तक जिन्दा है बुद्धिमान भूखा नहीं मर सकता आदि ये सारे कृत्य आज आम हैं। इसमें रहस्य अथवा गूढ़ार्थ के आवरण का अब निशा भी बाकी नहीं रह गया है। पाठक के जानने के लिए यहाँ कुछ भी नया नहीं हैगूढ़ यही रहा। फिर भी, इस संग्रह में इन्हीं वाक्यों की बार - बार पुनरावृत्ति होने से पाठक के अंदर बौद्धिक आक्रोश के स्थान पर ऊब ही पैदा होती है। आलोच्य संग्रह की रचनाओं में नैतिक पतन, की स्वीकारोक्ति स्वत: सहज और गरिमापूर्ण ढंग से हुई अत: किसी मिथ्याचार, किसी पाखण्ड अथवा किसी विसंगति से पर्दाफाश जैसा कहीं कोई दृष्य नहीं बनता।
आजकल कविताओं में सपाटबयानी का चलन है। इस संग्रह में भी इसी रोग का संक्रमण फैला हुआ प्रतीत होता है। संग्रह में यद्यपि अनेक गिरावटों पर व्यंग्य संधान हुआ है पर तीर  लक्ष्य भेदन से चूक गया है। रचनाएँ पाठकों की संवेदनाओं को जगाती जरूर है पर उन्हें उद्ववेलित नहीं कर पाती। फलत: किसी भी रचना में न तो कहीं विचारों की गहनता है और न करूणा की गहराई है।
जिस प्रकार शब्द और अर्थ के चमत्कार से अलंकार की सर्जना होती है उसी प्रकार शब्द और अर्थ के ही व्यंग्जनात्मक भायाभिव्यक्ति से, व्यंग्य का निष्पत्ति होती है। मात्र वक्रोक्ति कथ्सन से ही सार्थक व्यंग्य की सर्जना संभव नहीं है।
संग्रह में कुछ स्थानों पर भ्रष्ट्राचार रूपी सांड की पूंछ पकड़ लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ईमानदारी जैसी जानलेवा बीमारी के बहकावें में कभी न आइयेगा तथा मिल बाँटकर खाना ही सच्चा समाजवाद है जैसे सूत्र वाक्यों की भी सर्जना हुई है। इन स्थलों पर व्यंग्य का पैनापन उजागर हुआ है।
इस संग्रह की रचनाओं में व्याकरण की लड़खड़ाहट भी है। विराम चिन्हों, उद्धहरण चिन्हों आदि की सर्वत्र उपेक्षा की गई है, जिससे पाठक को अर्थ व भाव ग्रहण करने में कठिनाई होती है। रचनाएँ अखबार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखी गई प्रतीत होती है, जिससे न कहीं हास्य है और न कहीं व्यंग्य, केवल सपाट बयानी है, और कथ्य की एक रूपता है।
व्‍याख्‍याता, कन्‍हारपुरी, जिला - राजनांदगांव (छग)

बुधवार, 22 मई 2013

साहित्यकार नारायण सिंह ठाकुर का किया गया सम्मान व अन्‍य समाचार


राजनांदगांव। वयोवृद्ध साहित्यकार नारायण सिंह ठाकुर का सम्मान गत दिनों उनके निवास पर श्रीफल भेंट कर एवं शाल ओढ़ा कर किया गया। इस अवसर पर आर्चा सरोज द्विवेदी, आत्माराम कोशा,एच.एल.बोरकर, कुबेर साहू, गिरीश ठक्कर, सुरेश सर्वेद आदि उपस्थित थे।
 बसंत पंचमी के अवसर पर काव्य गोष्ठी आयोजित की गई
राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति राजनांदगांव जिला ईकाई के तत्वाधान में बसंत पंचमी के अवसर पर स्थानीय महेश्वरी भवन में कवि गोष्ठी का कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अध्यक्ष शशिकांत द्विवेदी थे तथा अध्यक्षता ज्योतिषाचार्य एवं वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य सरोज द्विवेदी ने की।
कार्यक्रम के प्रारंभ में  कार्यक्रम के मुख्यअतिथि  शशिकांत द्विवेदी, अध्यक्ष आचार्य सरोज द्विवेदी, छत्तीसगढ़ साहित्य समिति जिला ईकाई राजनांदगांव के अध्यक्ष आत्माराम कोशा अमात्य एवं अन्य रचनाधर्मिर्यो द्वारा मां सरस्वती के तैलचित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्जवलित की गई तत्पश्चात आत्माराम कोशा ने मां सरस्वती वंदना कर कवि गोष्ठी का शुभारंभ किया।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षक शत्रुघन सिंह राजपूत द्वारा प्रस्तुत बानगी देखिए :-
हर क्षण अपना बीते,
हंसी - ठिठोली , अमृत बोली।
हर दिन फागुन हो,
हर दिन हो होली॥
साहित्यकार दादूलाल जोशी फरहद ने छत्तीसगढ़ी में अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि :-
कंस के बंधाए बंधना ला टोरिक टोरा देखेंव जी।
भरे सभा म एक दूसरा के पागी छोरिक - छोरा देखेव जी॥
मोर कटोरा खाली रहिगे, कहाँ ले मिलतीस भीख,
गली - गली म दानी मन ल धरे कटोरा देखेव जी॥
छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के अध्यक्ष आत्माराम कोशा अमात्य ने अपनी रचना के माध्यम से कहा :-
तोर मया ...
जड़कल्ला में गोरसी के आगी कस
पण्डवानी के रगधरी रागी कस
जोर - जुलुम में विद्रोही - बागी कस
बड़े - बुजरूक में नवत पैलागी कस
रूस - रूस लागथे  ... तोर मया ...
कविता के क्षेत्र में ख्यातिनाम बहलसिंह पवार ने अपनी रचना के माध्यम से अपनी भावना इस प्रकार व्यक्त किये :-
जम्मों डहर मधुगंध, हवा करत हे बीर
छोरत हे मन बसिया के, फेर सुरता के गांठ
रात होगे राज रानी, दिन होगे केशर गंध
डोहड़ी - डोहरी ल सुनावत, भौंरा मयारू छंद
गीत के क्षेत्र में एक समय तहलता मचा चुके सनत कुमार मिश्रा ने अपनी गीत को अमर एवं शश्वत होने का आव्हान करते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की :-
मेरे गीत अमर होकर तुम
ह्रदय में मेरे बस जाना।
गा न सकूं तुझे जन स्वर में
कानों में सदा गुनगुनाना॥
अपने शहर बखान इन पंक्तियों के साथ करते हुए मोहन सिंह मोहन ने कहा :-
मेरा शहर
जिसकी प्यास बुझाती
शिवनाथ की लहर।
भ.ला. श्रीवास्तव भारतीय ने अपनी बसंत गीत प्रस्तुत करते हुए कहा :-
धरती ने पहन लिया, टेसू का गहना,
मन पांखी मान लिया, कंगना का कहना।
फागुन के अंचरा में , डूब हर गाँव रे,
सहजन की डाल पर, उतर आई छाँव रे
गोरैय्या डोल रही प्रियतम के गाँव रे ...।
वरिष्ठ साहित्यकार एच.एल. बोरकर द्वारा बसंत आगमन को लेकर प्रस्तुत रचना का अंश :-
देता दस्त द्वार - द्वार फिजा में,
धीरे - धीरे आया रितु राज बसंत धरा में।
तुंक शिखर में चटकी कलियां तोमर की
लाल - लाल ओढ़ी चुनर लहरा रही अवनि अम्बर में
काली - काली कलियाँ खिली पलाश की।
पत्रकार एवं साहित्यकार सुरेश सर्वेद द्वारा प्रस्तुत कविता के अंश :-
पहली बारिस जब पड़ती धरा पर
मिटटी की सौंधी सुगंध से
तन - मन पुलकित हो उठता
अब होती है बारिस तो
क्रांकीट और तारकोल की सुगंध से
तन - मन विचलित हो उठता है ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि तथा वरिष्ठ कवि शशिकांत द्विवेदी ने वर्तमान में देश की जो दशा हो चुका है इस पर अपनी रचना प्रस्तुत की :-
फुटपाथ जिंदगी भूख कथा
सड़कों पर कुचले जाते हैं
नैतिकता की हत्या संसद के
गलियारे करवातें हैं
सत्यं - शिवम - सुन्दरम का
होता है कत्लेआम जहाँ
मिथ्या को सत्य वचन कहने
गीता पर हाथ रखवाते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य सरोज द्विवेदी ने शबरी को स्मरण करते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की :-
दंडकवन छत्तीसगढ़ के शबरी के धाम।
तोर दया बरसे सदा हे शबरी के राम॥
नवोदित साहित्यकार पवन यादव पहुना द्वारा प्रस्तुत रचना :-
मन ले मन के हो जावे मिलान
मिल जुल के खुशी मनावे किसान।
मोर गाँव मड़ई मेला रे संगी
भाई चारा के करे पहिचान॥
इस गोष्ठी में अन्य रचनाधर्मियों ने भी अपनी रचना प्रस्तुत की।
कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठï साहित्यकार दादूलाल जोशी फरहद एवं आभार व्यक्त शत्रुघन सिंह राजपूत द्वारा किया गया।
डॉ. पल्लव को राष्ट्रय पुरस्कार
चित्तौड़गढ़। स्थानीय युवा लेखक और साहित्य संस्कृति की विशिष्टï पत्रिका बनास के संपादक डॉ. पल्ïलव कोभारतीय भाषा परिषद कोलकाता का प्रतिष्ठिïत युवा साहित्य पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। पल्लव को यह राष्ट्रीय पुरस्कार संस्मरण लेखन के लिए मिला है। परिषद की मासिक पत्रिका वागर्थ में यह संस्मरण प्रकाशित हुआ है।
सम्भावना के अध्यक्ष डॉ. के. सी. शर्मा ने बताया कि वर्तमान में जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिन्दी विभाग में कार्यरत पल्लव समकालीन रचना परिदृश्य में अपनी पहचान बना चुके हैं। उनकी पुस्तक मीरा : एक पुनर्मूल्यांकन नयी आलोचना दृष्टि के कारण चर्चा में रही है। भारतीय भाषा परिषद के इस सम्मान के अतिरिक्त उनकी रचनाएं हंस, कथादेश, समयान्तर, इंडिया टुडे, समकालीन भारतीय साहित्य, वसुधा, समकालीन जनमत सहित अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने बताया कि राष्‍ट्रीय स्‍तर के इस पुरस्कार द्वारा पल्लव ने चित्तौड़गढ़ जिले का गौरव बढ़ाया

अब भी नाचने की चाहत है गोपाल में

शरीरिक दुर्बलता साथ नहीं देती
  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह
गोपाल दास साहू
कला के प्रति रूझान ने राजनांदगांव जिला विकास खंड खैरागढ़ ग्राम भंडारपुर करेला निवासी गोपालदास साहू को नाचा पार्टी से जुड़ने विवश कर दिया। जहां बर - बिहाव में छत्तीसगढ़ के आसपास क्षेत्र ही नहीं अपितु सीमावर्ती राज्य महाराष्‍ट्र में भी उनकी मोहरी की धुन से वातावरण माधुर्य हो उठता। गाँव में जब बर - बिहाव होता तो वह बर - बिहाव गोपाल साहू की मोहरी के बगैर अधूरा सा महसूस होता। वहीं नाचा में उनकी गम्मत को देखने की चाहत में दर्शक रात भर डंटे रहते थे। जब वे अपने सहयोगी कलाकार दीनदयाल विश्वकर्मा के साथ पैर थिरकाते थे तो दोनों की जोड़ी देखते बनती थी। नाचा स्थल धूल - धुसरित हो उठता मगर न उनके पैर रूकते और न ही उनका मन ही भरता था। गम्मत में दर्शक उनकी प्रस्तुत जीवंत तस्वीर को देखते। जहां हास्य के गम्मत पर हंस - हंस कर लोग लोटपोट हो उठते वहीं समस्या प्रधान गम्मत पर लोग प्रस्तुत गम्मत की कहानी को अपनी कहानी महसूस करते थे। दुर्भाग्य ही कहा जाए कि एक समय अपने कला का जौहर दिखा चुके गोपालदास साहू वर्तमान में जहां शारीरिक दुर्बलता के शिकार हो गए हैं वहीं गरीबी उन्हें दाना - दाना के लिए मोहताज कर रखी है। उम्र के साठ से अधिक पड़ाव पार करने के बावजूद वह आज भी एक बार फिर खड़े साज में नाचने की इच्छा रखते हैं।
पिता स्वर्गीय भगवानदीन साहू साहू व माताश्रीमती पुनियाबाई साहू की पुत्र गोपालदास साहू को सही मायने में कहा जाए तो पूरा जीवन कला के लिए जिया हैं। जहां वह खड़े साज में जोकर की भूमिका अदा करते थे वहीं स्वयं नाटक तैयार करते और गीत भी स्वयं लिखा करते थे। आज भी वे गीत लिखते हैं जिसमें लोक साहित्य का स्पष्ट दर्शन होता है। नाचा परंपरा को जीवंत बनाये रखने गोपाल दास साहू ने महज दस बारह वर्ष की उम्र में नाचा पार्टी से जुड़ गया और उसने रिंगनी की नाच पार्टी में शामिल होकर नाचना शुरू किया बाद में उसने भंडारपुर नाच पार्टी का गठन किया। इस नाच पार्टी में जोकर की भूमिका में उनके सहयोग जोकर दीनदयाल विश्वकर्मा, ठाकुरराम ,  रूपसिंग यादव हुआ करते थे वहीं पारी की भूमिका पीलू ठाकुर, कवल निषाद निभाया करते थे। गोपालदास साहू और दीनदयाल विश्वकर्मा की जोंड़ी खूब जमती। पॉव में पैजना बांधकर झूम झूमकर नाचते। अपनी भाव - भंगिमा से सबको हंसाते। अपनी बातों से हंसी की फूलझड़ी छोड़ते। वादक पक्ष में गैंदसिंग, रंजीत, मेहरू और शेरसिंह रहते थे। नाचा जब शुरू होती और वादक पक्ष अपने में मस्त हो जाते थे तो रंजीत के ढोलक पर ऊंगलियां इस कदर चलती की ढोलक फुट जाया करता था। वहीं स्वर्गीय शेरसिंह की ऊंगलियाँ हारमोनियम की रीड पर चल कर माधुर्य उपस्थित करती थी। मेहरू निषाद तबला वादन करते और तिलक साहू कभी मंजीरा तो कभी ढोलक पीटा करते थे। नाचा शुरू होने से अंत तक जो समा बंधता की दर्शक सुबह तक उठने का नाम नहीं लेते थे। नाच पार्टी मधुर संगीत, आकर्षक नृत्य व हास्य से परिपूण्र गम्मत के कारण इतनी प्रसिद्ध हुई कि  इनकी पुछ परख राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़, खैरागढ़, चौकी, मोहला, कवर्धा एवं दुर्ग जिले तक भी होने लगी। बाद में महाराष्टï और मध्यप्रदेश के कई शहरों और गांवों में इनकी नाचा पार्टी को बराबर प्रोत्साहन मिला।
छत्तीसगढ़ में वैसे तो सभी पर्वों का अपना अलग महत्व है मगर प्रमुख पर्व दीवाली और होली को माना जाता है। गोपालदास साहू द्वारा प्रस्तुत बारहमासी गीत की पंक्तियाँ :-
देवारी तंय आवत होबे, दीया मन ल संग म लावत होबे।
हरेली अइस धान बर हरियर लुगरा लइस, 
गहिरा मन बर लीम डारा दसमुर डोंटों कांदा लाइस
हंस - हंस के घर कुरिया म लीम डारा,
 दसमुर खोंचिस, नांगर बसुला टंगिया धोइन,
लइका मन बर गेड़ी फांदिन,
गेड़ी चढ़ा के लइका मन ल खेलावत होबे । देवारी तंय ...........
थोरके दिन म अइस पोरा बिचारा मुरहा,
 ठेठरी खुरमी भजिया लाइस अंगाकर गुरहा
तीज के दिन पारबती अइस, पूजा करिन तिजहारिन,
चउत के दिन गनपति अइस नाचिन गाहन बनिहारिन ।
नंदिया बइला चढ़के रेंगावत होबे,देवारी तंय ....................
कुंवार अइस पुरखा मन ल संग म लइस,
पुरखा बनके कउवा पनदरा दिन बरा भजिया खइस
नवमी अइस धान बर पियर लुगरा लइस,
दसेरा म रावन मरिस, धान के छठ्ठïी निपटइस
तलवार धर दसेरा तंय आवत होबे।  देवारी तंय ...............
गाय बर सोहई धर के अइस देवारी
कोहड़ा कोचइ लइस दीया बारे नरनारी
गहिरा सोहई बांधिन साजू अउ फूलेता साजिन,
दफड़ा - दमउ बजाइन झुमर के नाचिन
आज गोपाल तंय गोवर्धन खुंदावत होबे, देवारी तंय ...................
जहां गोपालदास साहू की  कला अदायगी अदभूत रही। वहीं ठेठ पारम्परिक ढंग से नाचा की प्रस्तुति इनकी अपनी विशेषता है । किसान के प्रति इन्होंने अपनी भावना को कलबद्ध कुछ इस तरह किये हैं -
मोर धरती के एके झन दिखते गा पूजा करइया।
बाकी मोला लागथे कुर्सी के तोड़इया॥
नांगर बइला लथपथ होथे,
बइला भइया सदबद होथे, गोबर खातू राख गिल्ला,
किसान कमाथे माई पिल्ला।
भरे बरसात म बासी खाके, आगी के तपइया॥
फागुन तिहार पर उनकी रचना शैली देखिए :-
देखो देखो जी महिमा गुलाल के।
मजा ले लो संगी फागुन तिहार के॥
गोपालदास साहू ने जहां नाचा के माध्यम से सामाजिक बुराईयों, कुरीतियों और विसंगतियों पर चोट करते रहे वहीं अपने गीत के माध्यम से नशा, दहेज, अंधविश्वास, छुआछूत, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों को केन्द्र में रखकर रचनाएं की।
1 . रात दिन खुल रहिथे बैरी मधुशाला,
तोर मंदिर राम लगे रहिथे तारा
मस्ती म झुमत रहिथे सब मतवाला॥
2 . खेती ल कमाबे कइसे,
इही बुध मं, गली - गली किंजरत रहिथस
चोंगी माखूर पीयत रहिथस,
कमइया लइका मन ल बिड़ोरत रहिथस
जिनगी चलाबे कइसे इही बुध म ...।
3 . काकर करा हम जान, कोन ला हम गोहरान,
ऐ डहर ओ डहर सबो डहर भंइसा अंधियार
जान डरिन सुन डरिन , कहूं कहे नई दीया ल बार॥
जीवन भर दर्जी का काम कर कला को जीवित रखने वाले गोपालदास साहू आज उन दिनों को याद कर रोमांचित हो उठता है और एक बार फिर  नाचने व मोहरी वादन का मन बना लेते हैं मगर शारीरिक शिथिलता उन्हें ऐसा कुछ करने का इज्जात नहीं देती। अभावग्रस्त होने के कारण आज वे अपने स्वस्थ का सही उपचार कराने का भी साहस नहीं कर पाते। जीवन भर जिन्होंने अपने कला के माध्यम से न सिर्फ अपने गांव अपितु पूरे प्रदेश का नाम रोशन किये आज खुद अंधकार में जीवन व्यतित करने बाध्य है ....।
सबेरा संकेत बल्‍देवबाग, राजनांदगांव (छग)

रविवार, 12 मई 2013

लोक कला साधक : सुखीराम निषाद

  • डां. पीसीलाल यादव
 छत्तीसगढ़ लोक कलाओं और लोक कलाकारों की धरती है। यहाँ के लोक कलाकारों ने अपनी लोक कला के माध्यम से विश्व के कोने - कोने में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव को प्रतिष्ठित किया है। छत्तीसगढ़ की लोक कलाओं में लोक नाटय नाचा का स्थान सर्वोपरि है। नाचा की परम्परा को समृद्ध करने व उसे जीवंत बनाये रखने में स्व. दुलारसिंह मंदराजी दाऊ, मदन निषाद, ठाकुरराम, भुलवाराम, झुमुकदास, नियामिक दास, गोविन्द निर्मलकर, मालाबाई, फिदाबाई जैसे राष्ट्ररीय स्तर के लोक कलाकारों का अविस्मरणीय योगदान है। इसी तरह आँचलिक स्तर पर ख्याति प्राप्त अनेक लोक कलाकारों ने भी नाचा के संरक्षण और संवर्धन में अपनी सक्रिय भूमिका निर्वहन किया है। ऐसे ही लोक कलाकारों में एक हैं लोक कला साधक, लोक कवि - सुखीराम निषाद।
सुखीराम निषाद का जन्म 17 जनवरी 1938 को इतिहास प्रसिद्ध सांस्कृतिक व बलिदानी नगरी छुईखदान के एक श्रमिक परिवार में हुआ। इनकी माता का नाम दुखदई और पिता का नाम गोकुलराम निषाद था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा छुईखदान में ही हुई। इन्होंने सातवीं तक शिक्षा प्राप्त की। तब सातवीं की पढ़ाई बहुत मायने रखती थी। इनके कई साथी सातवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर शासकीय नौकरी में आ गये। किन्तु सुखीराम जी का झुकाव बचपन से नाच - गाने की ओर था, इसलिए नौकरी की ओर ध्यान नहीं दिया। इस बात का मलाल इन्हें आज भी है। छुईखदान रियासत काल से ही संगीतकारों व साहित्यकारों की नगरी रही है। यहाँ शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत को बराबर का सम्मान मिलता रहा है। तब बालक सुखीराम निषाद पर इस संगीतिक व साहित्यिक  परिवेश का प्रभाव पड़ा। वे फाग गीतों, जंवारा गीतों की टोली व भजन मंडली में जाते, गाते - बजाते। इसी अभिरूचि ने इन्हें आज एक प्रतिष्ठिïत लोक कलाकार के रूप में पहचान दी है। सन 1953 में छुईखदान में ऐतिहासिक घटना घटी। जिसमें अनेक अधिकारों की लड़ाई लड़ते छुईखदान के सपूत पुलिस गोली से शहीद हुए। इस घटना ने किशोर सुखीराम के ह्रदय को आंदोलित और उद्वेलित किया। तब इनकी उम्र 15 की रही होगी। नाच - गान की ओर रूझान तो था ही, तब कलम भी थाम ली और उस गोलीकांड की कहानी को अपने टूटे - फूटे शब्दों में इस तरह व्यक्त किया -
सुनो गोली कांड के कहानी, सुनो गोल कांड के कहानी
छुईखदान तहसील था छोटा, जहां चपरासी फंदीराम छोटा
पहले होता था यहां दीवानी, सुनो गोली कांड की कहानी।
इस तरह नाचने = गाने के साथ ही सुखीराम निषाद ने गीत - कविता लिखना भी प्रारंभ किया। कुछ समय पश्चात अपने स्थानीय कलाकारों के सहयोग से इन्होंने नाचा पार्टी का गठन 1963 के आसपास किया। तब नाचा में मंदराजी दाऊ, मदन निषाद, ठाकुरराम, भुलवाराम जैसे कलाकारों का बड़ा नाम था। इन कलाकारों को अपना आदर्श मानकर सुखीराम ने अपना प्रयास प्रारंभ किया। दिन में मेहनत मजदूरी करते और रात में नाचा। प्रयास को सराहना और सफलता मिलनी शुरू हुई। साथियों का उत्साह बढ़ा। आर्थिक संबल मिला। तब छुईखदान - गण्डई अंचल में सुखीराम - पहेलो साज का डंका बजने लगा। गाँव - गाँव में गणेश दुर्गोत्‍सव तथा मेले मड़ई में जहाँ भी सुखीराम का नाचा होता देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती। पारम्परिक गीतों के साथ तत्कालीन फिल्मी गीतों की महक के साथ गम्मतों की प्रस्तुति में हँसी के फव्हारे फूट पड़ते। दर्शक आनंद विभोर हो जाते। सुखीराम का नाम दर्शकों के जुबान पर चढ़ने लगा। सुखीराम का सहयोगी जोक्कड़ था पहलोराम। दोनों की जोंड़ी खूब जमती। पॉव में पैजना बांधकर झूम झूमकर नाचते। अपनी भाव - भंगिमा से सबको हंसाते। अपनी बातों से हंसी की फूलझड़ी छोड़ते। तब इनके साथियों में वादक कलाकार के रूप में शोभा पांडे, पूरन पांडे, बाबूराम और सुप्रसिद्ध क्लार्नेट वादक दुखुराम कामड़े। नचकारिन के रूप में पंचम पांडे चंदा नाम से स्त्री पात्र की भूमिका निभाते। हीराराम देवांगन और लक्ष्मण पांडे परी की भूमिका निभाने वाले अन्य सहयोगी थे।
उस समय सुखीराम निषाद की नाच पार्टी मधुर संगीत, आकर्षक नृत्य व हास्य से परिपूण्र गम्मत के कारण इतनी प्रसिद्ध हुई कि इनके नाच का कार्यक्रम टिकटों में चैरिटी शो के रूप में होने लगा। इस बीच इनका कार्यक्रम डोंगरगढ़, राजनांदगांव, रायपुर, दुर्ग, खैरागढ़, बेमेतरा, मोहगाँव, बालाघाट जैसे शहरी क्षेत्रों में भी चर्चित हुआ। तब यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इन पंक्तियों के लेखक को 10 - 12 साल की उम्र से इनके नाच देखने का सौभाग्य मिल रहा है। सुखीराम की कला अदायगी अदï्भूत है। ठेठ पारम्परिक ढंग से नाचा की प्रस्तुति इनकी अपनी विशेषता है। साखी व नचौड़ी गीतों में तो इनका कोई शानी नहीं है। इनकी साखी की एक बानगी देखें -
बड़े फजर पर चारी करे, परे दुवारी जाय।
पर नारी से हेत करे, तो सीधा बैकुंठ जाय॥
सामान्य अर्थों में तो यह साखी बड़ी अटपटी लगती है। आश्चर्य होता है कि दूसरे की स्त्री से प्रेम करने वाला कैसे बैकुंठ जायेगा ? पर वाह, सुखीराम जी, नाचा के दौरान इसका अर्थ समझाते हैं तो लोग बिना हंसे नहीं रह सकते। ये इसका अर्थ इस तरह बताते हैं - जो सुबह - सुबह पर चारी अर्थात परमेश्वर का नाम लेता है वह बैकुंठ जाता है। पर दुवारी जाने का मतलब सुबह शौच क्रिया से जो निवृत्त होता है वह स्वस्थ रहता है और जो पर नारी से प्रेम करता है अर्थात तुलसी के पौधे में जल डालता है वह बैकुंठ को प्राप्त करता है। स्वस्थ रहना ही बैकुंठ को प्राप्त करना है। सुखीराम निषाद अपनी नाचा प्रस्तुति में जो गीत प्रस्तुत करते हैं वे लोक जीवन से जुड़े हुए बड़े अर्थवान और उद्देश्य परक होते हैं -
ये पवन बिन कलगी नई डोलय, ये पवन बिन कलगी नई डोलय
नई डोलय, नई डोलय भईया, ये पवन बिन कलगी नई डोलय।
नांगर डोलय, बईला डोलय, अऊ डोलय जोतईया।
अरे तरी डाहर आंतर छुटे, देखत हे निंदईया
ये दे नई डोलय .....
लोकगीतों में कितनी सहज अभिव्यक्ति होती है - पवन बिन कलगी नई डोलय का आशय यह कि बिना कारण कोई कार्य नहीं होता। बिना हवा चले धूल नहीं उड़ती हिन्दी के इस मुवाहरे का सौन्दर्य भी इसके सामने फीका लगता है। इस तरह सुखीराम जी ने नाचा को लोकप्रिय बनाने में परम्परा और अभिरूचि के अनुरूप गीतों और गम्मतों को अपने श्रम और कला से संवरा।
सुखीराम निषाद की यह भी विशेषता थी कि वे नाचा के माध्यम से सामाजिक बुराईयों, कुरीतियों और विसंगतियों पर चोट करते। नशा, दहेज, अंधविश्वास, छुआछूत, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों को केन्द्र में रखकर गम्मत की प्रस्तुति करते। आवश्यकतानुसार इन गम्मतों के लिए स्वयं गीतों की रचना करते। प्रेम, श्रृंगार और सामाजिक सरोकारों के गीत बड़े लोकप्रिय हुए। उस समय वे गीतों की पुस्तिका छपवाकर भी नाच प्रदर्शन के बाद बेचते। तब पुस्तिका की कीमत चार आने होती थी। आलसी बेटे - बहू पर उनका कटाक्ष देखें -
ये जुग भईगे अंधरा, मोला सूझत नई हे ग।
कलजुग के बेटा हा सोय, बाप ल नांगर जोताय।
दाई - ददा ल गेरवा बांधे, नारी ल मुड़ चढ़ाय।
मोला  सूझत नई हे ग ...
साजपरी की भूमिका निभाने वाले पंचराम पांडे जब सज - संवर कर मंच पर उतरते तो उर्वसी से कम नहीं लगते थे। वे अपने बालों में टार्च के बल्ब लगाये होते, कमर में बैटरी छिपाये रहते और जब मटकते तो बल्ब बुग - बुग जल उठते। दर्शक चमत्कृत हो जाते। उनके इस सौन्दर्य पर सुखीराम नाच कर गीत गाते। जिसे तब के लोग आज भी याद कर आनंदित होते हैं। यह गीत श्रृंगार का सुन्दर नमूना है -
धीरे रेंगबे तोर पातर कनिहा,
ठमकत - ठमकत होवथे मंझनिया,
पंड़की तोर पाँव हवय, कोदो सांवर कारी,
नागिन कस बेनी सपोटा, मुड़ म कुहकु लाली,
तोर कनिहा ले चुंदी, ते हा मोर आड़ी पूंजी,
पारम्परिक लोकगीतों के साथ पारम्परिक धुनों पर भी जैसे - सुवा, आल्हा, ददरिया, करमा, जस - जंवरा, फाग आदि पर रचे गीतों को नाचा के माध्यम से सुनकर लोगों का मन गदगद हो जाता। उन्हें लगता कि ये तो अपने ही गीत हैं, अपनी ही बात है। सुखीराम का बारामसी गीत भी बड़ा प्रसिद्ध हुआ -
पूस महिना म कोलिहा रोये, जाड़ - सीत सहि न जाय।
माघ महिना मोटियारी रोये, मोर कुंडा लगिन धराय॥
सुखीराम की नाचा पार्टी वर्षों चलती रही और लोकप्रिय बनी। पुराने साथी एक - एक कर परमेश्वर को प्रिय हाते गये। तब विवश होकर पार्टी बन्द करनी पड़ी। उसके पश्चात् सन् 1980 से गण्डई की सुप्रसिद्ध लोक कला मंच दूध मोंगरा से जुड़े। दूध मोंगरा के माध्यम से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के साथ - साथ मध्यप्रदेश, महाराष्‍ट्र , कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की माटी को गौरवान्वित किया है। '' दूध मोंगरा '' से आज भी जुड़े हुए हैं। 69 वर्ष की उम्र में स्वस्थ कभी - कभी जवाब दे जाता है पर आज भी इनका मार्ग दर्शन दूध मोंगरा के कलाकारों को मिलता रहता है। दूध मोंगरा की प्रगति देखकर सुखीराम भी सुख अनुभव करते हैं। वर्तमान में गायत्री शाक्तिपीठ छुईखदान में अपनी सेवा दे रहे हैं। स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हैं। प्रतिदिन सुबह - शाम स्नान व धार्मिक क्रिया, पूजा - पाठ, ईश्वर आराधना इनकी जीवन चर्या है। छुईखदान से गण्डई तक की 20 किलोमीटर की यात्रा साइकिल से करते हैं। यह सब संयम साधना का प्रतिफल है। अभाव में भी पल कर कला की जो सेवा इन्होंने की है वह और इनका संयमित जीवन तथा अनुशासन नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए अनुकरणीय है।
सुखीराम निषाद निराले लोक कलाकार हैं। ये अपनी कला से सबको सुखी कर रहे हैं। सबको आनंद बाँट रहे हैं। सुखीराम निषाद नाम का लोक कला का यह दैदिप्यमान नक्षत्र शताधिक वर्षों तक लोक कला जगत को आलोकित करता रहे ....।
गंडई पंडरिया, जिला- राजनांदगांव ( छ.ग.)

गुरुवार, 9 मई 2013

बड़े आदमी


  •  सुशील भोले
गांव म जब कोनो काम - बुता के सुरूवात होवय त बड़े आदमी के हाथ ले होवय। तरिया म गोदी कोड़वाय के काम होवय,चाहे संगसी - कोलकी म मुरमी पटकाय के। बड़े आदमी आतीस, हूम - धूप देके नारियर फोरतीस तब जा के बुता करइया मन बुता धरयं। ए रिवाज ह तइहा - तइहा ले आवत हे। ऐकरे सेती आजो बड़े आदमी के अगोरा होवत हे। फेर आज बेरा बुलके ले धर लिस हे, सुरूज नरायन के कोंवर घाम ह चरमराए ले धर लिस हे, तभो ले कइसे बड़े आदमी के डोला ह मसान घाट म आबेच नइ करत हे।
मजूरी करइया मन आपस म फुसफुसावयं - कइसे मेहतरू, आज गौटिया ल का होगे हे ... आन बखत तो ठउका बेरा म आ जावत रिहिसे, आज कइसे बेरा ल बुलका डारिस ?''
- हौ भाई महूं उही ल गुनत हौं जी, झपकन आतीस त हमरो रोजी पक जातीस, नइते जानत तो हस ठेकेदार ल, एको घंटा बुलकिस ते आधा दिन के रोजी ल काट दिही।''
- ठउका केहेस भइया ... गौंटिया के बेरा - बखत म अवई जवई म हामर मन के कोनो हाथ बात नई हे, तभो ले रोजी हमरेच मन के कटही न ...।'' काहत बुधारू ह सलूखा के खीसा ले चोंगी हेर के मेहतरू करा माचिस मांगीस, तहां ले दूनो झन पेड़ के छइहां म बइठ के चोंगी चुहके लागिन।
गाँव के मरघट्टी म पक्का ईंटा - सिरमिट के चौंरा बनइया रिहिसे। बादर पानी के दिन म घलोक लास ल जलाए म सोहलियत होवय। कोतवाल बतावत रिहिसे सरकारी खजाना ले पइसा आए हे का मुक्तिधाम कहिथें तइसने योजना म तेकर नेंव कोड़े अउ तहां ले ईंटा रचे के काम के आज सुरूवात होवइया हे। बस बड़े आदमी के एकरे सेती अगोरा होवत हे, काबर ते वो हर गांव के सरपंच घलोक आय। कोन जनी कइसे ढंग के चुनाव जीतगे रिहिसे ते ? अइसे तो गांव के एको आदमी ल वोहर भावय नहीं, फेर बताथे के ठउकार चुनाव के दू दिन पहिली ले दारू - कुकरा अउ लुगरा - धोती के मोटरा ल वोहर घरों - घर बगरा दे रिहिसे।
जब पइसा कौड़ी अउ पद - पदवी के बाद चलथे त वोहर अपन छोड़ अउ कोनो ल न तो अपन ले बड़े मानय, न अपन जोड़ के। लोगन ल गारी - गुफ्तार देके वो पद म बइठे के जोंग जमा लेथे, फेर जब वोट बटोरे के खातिन लोगन के मुंहाटी म जाये के बेरा आथे, त वोकर ले बड़े समाजवादी अउ गरीब - गुरबा मन के हितु - पिरितु अउ कोनो नइ होवय। अइसन बेरा म कोनो तो कहि लेवय के वोहर दारू - कुकरा के बंटई म ककरो संग भेदभाव करे हे कहिके, या कोनो बैरी दुश्मन के घर घलोक नइ अमराय होही कहिके। राम राज के साक्षात दरसन होथें अइसन बेरा म।
बड़े आदमी अतेक करथे - धरथे तभो ले गांव के एक झन पढंता बाबू ह वोकर लंदी फंदी अउ दांत - खिसोरी के छोड़ काही गोठ ल नइ करय। वो दिन कहत रिहिसे - इही बड़े आदमी मन के सेती हमन आज तक बिगड़े हवन ग। ए मन ल बड़े आदमी हे कहिके पूरा समाज के नेतृत्व ल सौंप देथन अउ ए मन सिवाय जोजवा गिरी के अउ कुछु नइ करयं। चाहे इहां के छोटे सभा म भेज दे चाहे दिल्ली के बड़े सभा म। ऐमन सिवाय दूसर के पाछू किंजरे अउ हथउटठा बरोबर बिना कुछु सोचे - गुने सिरिफ हाथ उठाए के अउ कुछु नइ करय।
अब तो जमों समाज के मनखे मन ला बड़े आदमी बने अउ बनाए के मापदण्ड ल बदलना परही। सिरिफ धन भर के रेहे ले कोनो बड़े नइ हो जाय, ज्ञान कर्म अउ ईमानदारी घलोक होना चाही, अपन अस्मिता के समझ अउ ओकर बढ़वार खातिर समरपन के भाव होना चाही। आज बाहिर ले आय आदमी हमर मन के छाती म चढ़त जावत हें त वोहर अइसने जोजवा मन के सेती आय, जे मन ल किंजर - किंजर के पतरी चांटे के छोड़ अउ कुछु नइ आवय। जेकर मन के न कोनो आदर्श होवय, न सिद्धांत , न दरसन बस सुवारथ अउ सिरिफ सुवारथ होथे अइसन मन के भरोसा न तो हम अपन गौरव के रकछा कर सकन न आगू बढ़ सकन, जनम - जनम तक सिरिफ पिछड़ा के पिछड़ा रहि जाबो।
गांव के दू चार झन टूरा मन पढंता बाबू के हाँ घलो मिलाथे वो मन जघा - जघा पढंतच ल अवइया बेरा म गाँव के सरपंच बनाए के गोठ घलो करयं। फेर जीवन भर बड़े आदमी के गुलामी भोगत बुढुवा मन उंकर मन के बात ल बेलबेली ले जादा अउ कुछु नइ मानयं, उल्टा टूरा मन ला फटकार देवयं - अरे, जावव न परलोखिहा हो। सइकिल म किंजर - किंजर के लोगन ल कविता - कहिनी सुनावत रहिथे तेला गाँव के सरपंच बनाबो रे ... ? जब देखबे तब का - का लिख के कागज ल करियावत रहिथे अउ गजट - सजट म का अंते - तंते छपवावत रहिथे। ओकर घर म देखबे त लोग लइका मन दाना - दाना बर लुलुवावत रहिथे अउ ए पढंता बाबू ह सिरिफ क्रांति, न्याय अउ धरम युद्ध के बात करथे, अइसने बइहा - भूतहा ल गाँव के सरपंच बनाबो रे ... ?
पढंता बाबू के अइसनहा चारी करइया मन म मेहतरू अउ बुधारू घलो हे, जेमन बड़े आदमी के अगोरा करत आज के अपन रोजी कटे के गोठ गोठियावत हें। दूनो के चोंगी चुहकागे रिहिसे। बर पान के सेंध  मन ले झांकत घाम के चरमरई ले बांचे बर ऐती - तेती के पेड़ मन के छांव म जाके बइठगे रिहिन हे। सबो के चेहरा म आज रोजी चुके के भाव झांकत रिहिसे फेर कोन जनी बड़े आदमी के संवागा ह अभी ले कइसे नइ पूरे रिहिसे ते ?
मेहतरू मन गोठियातेच रिहिन हे। वतके बेर कोतवाल ह बस्ती मुड़ा ले माखुर झर्रावत आवत रिहिसे। खखौरी म एक ठन चार हाथ के लउड़ी ल चपके अल्लर बानी के रेंगत रिहिसे। वोला देखके मेहतरू गोठिया परिस - का बात हे कोतवाल साहेब, अकेल्ला आवत हस। सरपंच कहां हे गा ...?
बुधारू  - अरे हां भई, अइसे में तो हमर मन के रोजीच बुलक जाही ग ?''
कोतवाल - अरे देखना भई, मैं तो अबड़ केहेंव गरीब मन के आज के दिन अकारथ हो जाही कहिके फेर घर ले निकलबेच नइ करिस।''
मेहतरू - आखिर बात का आय तेमा ?''
कोतवाल - कोन जनी, ठेकेदार के संग का पइसा - पइसा कहिके गोठियावत रिहिसे।''
बुधारू - कहूं लेन - देन के बात तो नइ होही ?''
मेहतरू - हां, पढंता बाबू कहिथे तेने तो सिरतोन तो नइ होही ?''
कोतवाल - का कहिथे पढंता बाबू ह ?''
बुधारू - वो तो जघा - जघा एके ठन बात ल कहिथे ग ... ए बड़े आदमी ह नीयत के एकदम छोटे हे। तुमन आज तक गरीब - गुरबां अउ पिछड़े हौ तेकर असली कारन इही आय। तुंहर मन जगा तो मोहलो - मोहलो गोठियाथे फेर पेट ल घलोक तुहंर इहीच हर काटथे। तुमन ल कभू बने पढ़न - लिखन नइ दय, कभू पेट भर खावन नई देवय, न बने गतर के कपड़ा - लत्ता ल पहिरन देवय, ये सबके दोसी इही बड़े आदमी आय ...?''
कोतवाल - अच्छा ... अइसे कहिथे।''
मेहतरू - अतके भर ... अरे अउ अड़बड़ अकन गोठियाथे।''
कोतवाल - अच्छा, का का गोठियाथे ? ''
मेहतरू - एक दिन कहत रिहिस हे - सरकारी खजाना ले जतका रूपिया - पइसा आथे तेकर आधा हर तो इही बड़े आदमी के खजाना म समा जाथे, ओकर बाद ठेकेदार के कोठी म हमाथे अउ जेन थोक - बहुत बांच जाथे, तेमा नेंग छूटे असन अल्लर - सट्टा काम - बूता ल करवा देथे।''
कोतवाल - अच्छा, त पइसच के बंटवारा के सेती दूनों के बीच रूपिया - पइसा के गोठ होवत रिहिसे का जी ? ठेकेदार ह अबड़ जोजियावत रिहिसे ... तभो ले बड़े आदमी के घेक्खरई ह देखते बनत रिहिसे ... अब तो तुहंर मन के मनसा - भरम ह महूं ल सिरतोन असन लागत हे जी ...।''
पढ़ंता बाबू ह साहित्यकार के संगे - संगे पत्रकार घलो हे। तेकर सेती वो हा लोगन ल किस्सा - कहिनी अउ कविता तो सुनाबेच करथे, पेपर मन म गाँव - गंवई के समस्या अउ बड़े आदमी सही मनखे मन के गलत काम के खुलासा ल घलोक करत रहिथे। एकरे सेती भस्टाचार म बूड़े मन ओकर संग ततेरे असन गोठियावयं। फेर जे मन समझदार के संगे - संग ईमानदार अउ सिद्धांतवादी राहयं ते मन वोकर संग मया करयं। भले वोहर गरीब घर म जनमे हे फेर वोकर जीवन - दरसन ह कोनेा योगी पुरूष अउ उच्च कोटि गियानी - धियानी ले कम नइये। वो घर परिवार में रहिके घलोक उच्च कोटि के  संत मन कस जिनगी जीथे। संझा - बिहनिया एक - एक घंटा पूजा - पाठ करथे। एकदम सादा - सरबदा जीथे। वोकर हाथ म अतका कला अउ योग्यता हे कि वो कहूं लंदी - फंदी करके पइसा कमइया मन संग छिन भर ठाड़ हो जाय त लखपति - करोड़पति बने बर दू - चार दिन ले जादा नइ लागय,फेर वोला सुवारथ, लालच अउ नीयत खोरी के छइहां तक ह नइ छू सकत रिहिसे। एकरे सेती बड़े आदमी सही लंदी - फंदी मन वोकर खिलाफ म गलत - सलत बात परचार करयं।
फेर पढ़ंता बाबू ए सबके बिना चिंता - फिकर करे अपन ईमान अउ सत् धरम के रद्दा मं रेंगते राहय। वोकर एके मिसन राहय - अपन गाँव ल सरग जइसे बनाना, नीति नियाव अउ आपसी मेल - जोल के माध्यम से, सही मायने म रामराज के स्थापना करना अउ अइसन तभे हो सकत रिहिसे जब बड़े आदमी जइसन पाखण्डी समाज सेवक मन के हाथ ले सत्ता ल नंगा के जे मन सही सेवा - चाकरी करथे, अपन मेहनत अउ ईमानदारी ले आगू बढ़े रहिथे, अउ जेमन सिरिफ पद - पइसा अउ पदवी के घमंड म बूड़े दूसर संग हमेसा घेक्खरई अउ अपमान करे कस गोठ करथें ते मन कभू ककरो सेवा नई करे सकयं, अइसन मन सेवा के नांव म सिरिफ पाखण्ड करथें ते मन कभू ककरो सेवा नई कर सकयं। अइसन मन सेवा के नांव म सिरिफ पाखण्ड कर सकथें, ऐकर ले जादा कुछु नहीं। तुमन राजनीति अउ सासन - सत्ता ल सेवा के माध्यम बनाना चाहथौ त सिरिफ उही आदमी मन ला सत्ता म बइठारौ जे मन सेवा - चाकरी करत आगू बढ़े हें।
पढ़ंता बाबू गाँव म कोनो किसम के काम - बुता होथे तिहां अवस के जाथे, पत्रकार होए के सेती पेपर म खभर भेजे के बुता ह घलो सिध पर जाय, फेर गाँव वाले मन संग मेल- जोल के कारज घलो पूरा हो जाय। वोला जानबा रिहिसे के आज मसानघाट म मुक्तिधाम के बुता चालू होवइया रिहिसे ऐकरे सेती बिहिनिया ले पूजा - पाठ करे के बाद सइकमा भर बासी झड़किस तहां ले मसानघाट आगे। इहां देखिस त काम - बुता चालू नइ होय राहय। बुता करहया मन ऐती - तेती रूख राई के छंइहा म बइठे राहयं। कोतवाल ल देख के वोहर मेहतरू अउ बुधारू खड़े राहय तेने कोती आइस, तहां ले पूछिस - कइसे कोतवाल, मुक्तिधाम के काम अभी ले कइसे चालू नई होए हे, काल तो तंय हंाका पारे रेहे हस आज बिहनिया ले काम चालू हो जाही कहिके ?
- काला बताबे बाबू, देखना सरपंच अभी ले आय नईये।''
- कइसे आय नईये, वोला जुड़ - खांसी धर ले हे का ?''
- नहीं, अइसन नोहय।''
- त अउ कइसन ये ... सरकारी पइसा के अनपचक धर लेहे का ?''
- टार बाबू तंय अतेक पढ़े - लिखे होके कइसे - कइसे गोठियाथस ग ...।''
- मंय बने ल गोठियाथौं कोतवाल ... अपन के मेहनत अउ सत ईमान के पइसा ह पचथे ... ऐती - तेती के पइसा म अनपचक होबे करथे, चाहे वोमा पेट - पीठ पिरावय चाहे मती छरियावय ... लड़ई - झगरा अउ देखिक - देखा के रस्ता निकली जाथे।''
पढंता बाबू के गोठ म धंधमंदाय कोतवाल ल आखिर कहना परिस - हां, ठेकेदार संग वइसने उंचहा भाखा व गोठ तो होवत रिहिसे ...।''
- देख मंय केहेव न, जरूर चार सौ बीसी के खेल होवत हे ... भगवान जानय अइसन मनखे मन ला तुमन कब तक मुड़ी म लादे रइहौ ते ... आज देस ल अजाद होए तीन कोरी बछर ले जादा होगे हे, सरकार ह साल के साल तुंहरे जइसन गरीब - गुरबा मन के बिकास खातिर सउहंत खजाना ल खोल देथे, फेर आज तक वो खजाना के सुख समरिधि ह तुंहर मन के घर - कुरिया म नइ हमा पाए हे ... आखिर कब चेत चघही तुंहर ... अरे तुंहर नही ते तुंहर लोग लइका मन के भविस ल तो सोचौ ...।''
रोजी के चुकई अउ घाम के तपई म बुधारू के मति थोकिन तीपे सहीं होगे रिहिसे, वो कहिस - सहीं काहत हस बाबू ... अइसने आदमी मन के सेती हमन आज तक पिछड़े अउ गरीब - गुरबा बने हावन, तोर कहे एकक बात ह सत ये। अब अवइया बेरा म तोरे असन मनखे के हाथ मं गाँव के मरजाद अउ विकास के रस्ता ल सौंपबो।''
मेहतरू घलो वोकर संग हां म हां मिलाइस, तहां ले कोतवाल घलो वोकरे कोती संघरगे, फेर तो मसानघाट म जुरियाए जम्मों मनखे देखते - देखत पढ़ंता बाबू के रंग म रंगगे।
  • रिक्‍शा स्‍टेण्‍ड, रायपुर (छग)

जीवन एक परीक्षा

 कहानी

  • रमेश कुमार सोनी
इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय, स्वतंत्रता दिवस अमर हो के नारे एवं टूटी घंटी की आवाज ने तो आज आधी रात ही सबकी नींद उड़ा दी। उसका चीखना - चिल्लाना कभी भी, कहीं भी प्रारंभ हो जाता है। मानो यही उसकी जिंदगी बन गई हो, पहले वह स्कूल में चिल्लाया करता था। विद्यालय ही उसकी जिंदगी और जीवन के सब कुछ थे। शासन के निजीकरण और उदारीकरण की चक्र में गांव का एकमात्र सरकारी स्कूल भी भेंट चढ़ गया था। तब से वहां शाला नहीं लगती, मगर राममिलन अब भी वहां पढ़ाते थे - मूक पक्षियों को। उनके साथ हँसते, खिलखिलाते, नारे लगाते और उनका दुख दर्द बाँटते रहता। वर्षों से वह उस विद्यालय का एकमात्र व्यक्ति था। घंटी बजाने से पढ़ाने तक पूरा काम वही करता था। माता की तरह वह अपने सपनों के विद्यालय को गर्भ में रखकर आने परिश्रम से सुंदर रूप देता, संवारता और जब वाह - वाही की बारी आती तो उसे उसके पितृत्व, ममत्व के हक से वंचित कर दिया जाता। उसका जीवन हर कदम पर एक परीक्षा से गुजरता था। कितनी संजीदगी से वह अपना श्रेय दूसरों को लेता हुआ देखता था। उसमें सहनशीलता पृथ्वी सी सहनशीलता थी।
गांव के समीप खड़ी संगमरमरी चमचमाती विशाल अट्टालिका को देखकर लगता है कि कुबेर ने यहाँ सारे कोष खाली कर दिए हो। विश्वकर्मा को भी दाँतों तले उंगली दबानी पड़ेगी, स्वर्ग का राजप्रसाद जिसे लोग अंग्रेजी स्कूल कहते थे। यहाँ प्रवेश से निर्गम तक हर बात का पैसा लगता था। ये रईसों की दुनिया थी, यहाँ बिना पैसे वाले अस्पृश्य ...। पहले इन्होंने हमें व्यापारी बनकर लूटा अब शिक्षा द्वारा समाज सेवा का कथित ढोंग करने वालों की श्रद्धा और भक्ति अब भी विदेशी भक्ति एवं संस्कृति को समर्पित है। देश की संपदा पढ़ कर विदेश सेवा करने पलायन कर जाएगे। खतरनाक साजिश है इन बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों का जो भारत को खुलेआम लाखों हाथों से लूट रही है। सब कुछ जानते हुए भी तुम मूक पशु की भाँति घर में सोये हो। जागो, वरना तुम्हारे जैसे मूक प्राणियों की ही बलि चढ़ती है? इस भाषण से क्रोधित विदेशी धन के देशी चौकीदार ने उसे डंडे से हकाला। लाठी में सबको अपना गुलाम बनाने का दम होता है। आखिर इन हवेलियों तक आवाजें कहाँ पहुचती है। अंग्रेजों भारत छोड़ो का स्वर और प्रबल हो गया। इस देश की माटी पुन: पदाक्रांत हो रही है। अरे, यह देश ही नहीं रहेगा तो तुम कहाँ रहोगे ? अब तुम्हें ही गांधी, तिलक, सुभाष, भगत बनना है। वे फिर से नहीं आएंगे। आओ, मेरे साथ बोलो - जय हिन्द, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है ....।
अल सुबह मासूम बच्चे फिर उसके पीछे हो चले कुछ अधनंगे, कुछ हाथ में पत्थर लिए कभी उनके साथ खेलते, नारे लगाते तो कभी पत्थर मारकर भाग जाते। भला उन्हें क्या पता कौन है- षड्यंत्रकारी ? कभी दुनियां के भारत विरूद्ध षड्यंत्र के समक्ष वह पर्वत की भांति अकेला खड़ा था। घटनाएँ, नीतियाँ शासन ऋतुओं की तरह गरजते - बरसते गुजर गई। वह अब भी वहीं उत्थान और पतन से ऊँचा उठा हुआ। भारतीय ऐश्वर्य को विकृत करने वाले लोगों के विरूद्ध संघर्ष करते अकेले सेनानी ने अपनी नींद, शांति, चैन, आराम, सुख सब कुछ खो दिया था। गंभीर, स्नेहमयी, ओजयुक्त वाणी की अजीब सी कशिश की, न चाह कर भी कुछ समय तक उसे सुनने को जी चाहता था परन्तु लोग तो उसे पागल कहते थे।
वह मास्टर राममिलन था। जिसे इज्जत और सम्मान से लोग रामू गुरूजी कहते थे। श्रद्धा, स्नेह, विश्वास और प्यार का वह छलकता सागर थे। गाँव के हर छोटे - बड़े को कुशलक्षेम पूछना, सलाह मश्विरा देना उनकी आदत थी। माटी के लोंदे में जीवन डालने की अदभूत कला कौशल के वे सृष्टा थे। माटी उनकी हाथों में साँसें लेकर जीवन पाता और वे स्वयं प्रतिमा को सजीव करते हुए बेजान से निर्जीव हो चले थे। निश्चित ही बिना गढ़े माटी की कोई कीमत नहीं, गढ़कर, वह प्रतिमा बनती है। आराध्य वस्तु हो जाती है। उनकी कीर्ति उनके शिष्यों में दमकती थी वे एक स्वर्णिम युग के जीवाश्म थे। मानव जीवन में सुख - दुख, आशा - निराशा, पीड़ा - आनंद,बहुत पास - पास रहते हैं। हम सभी ऊपर वाले की कठपुतली हैं और इस दुनिया के रंगमंच पर अपनी - अपनी भूमिकाएं निभाकर पर्दे के पीछे चले जाएंगे। नियति ने उसके ऊपर भी परीक्षाओं का ऐसा जाल फेंका कि उनका जीवन स्वयं एक परीक्षा बनकर रह गया था। ये तो रामू गुरूजी ही थे, जिन्होंने प्रकृति के इन झंझावतों के बीच अपने पैर अंगद की तरह जमाए हुए हर बार पास होते रहे। सरस्वती को जन्म देते उनकी पत्नी ने उसका साथ छोड़ दिया। गाँव में चिकित्सा सुविधा नहीं थी। गाँव में तो डाक्टर आना ही नहीं चाहते, ये तो शिक्षक ही हैं जो गाँव में रहते हैं। अस्पताल बनाने की उनकी हर कोशिश नाकाम हो गई थी। सीने पर पत्थर रखकर उन्होंने सरस्वती और विकास दोनों को माँ बनकर पाला, बाप बनकर दुलारा। अब विकास बड़ा हो गया था। विश्वविद्यालय में डांक्टरेट कर रहा था। कुछ माह से पैसे की बढ़ती माँग ने चिंता की लकीरें माथे पर उभार दी थीं। वह शहर जाने को तैयार हुए ही थे कि दूरभाष से खबर आई कि विकास नहीं रहा। नशे के सौदागरों ने उसे लील लिया था। पहली बार गाँव वालों ने उनकी आँखों में क्रोध और नफरत का सैलाब देखा था। प्रकृति की इस परीक्षा से निपटकर उसकी सारी आशाएँ सरस्वती पर टिक गई थी। बदलते समय में अब वह बड़ी हो चली थी, विवाह के प्रस्ताव आने लगे। उनकी बड़ी - बड़ी खूबसूरत हिरनी सी आँखों में ब्रम्हांड समाया था। बोलती तो शहद टपकते। उसकी खूबसूरती पर कामदेव भी न्यौछावर हो जाये। उस पर सारे गाँव को गर्व था।
एक कम्प्यूटर व्यापारी के साथ दूर शहर में विवाह तय हो गया। अपनी बेटी की शादी का निमंत्रण बाँटते, चाँवल - हल्दी - सुपारी व पत्रिका देते हुए आज रामू गुरूजी बहुत खुश थे। मित्र शिवपाल पोष्ट मास्टर को पत्रिकाओं का एक पुलिन्दा जल्दी पोष्ट करने को कहता हुआ दिया - दूर के रिश्तेदारों के लिए। वे छोटे - बड़े सभी को, चौधरी, पटेल, गौटिया, मजदूर, किसान, चरवाहा, दर्जी, साहूकार को आमंत्रित करता, कहता कि अपनी बेटी की शादी में अवश्य आना, रविवार को बारात आ रही है। सारी व्यवस्था आपको करनी है। बड़ी सुन्दर जोड़ी है। मैं अकेला क्या - क्या करूंगा ? सभी ने सहमति जताई, पूरा गाँव प्रसन्न था। मिठाईयाँ की महक आ रही थी। गाँव में पहली बार बैंड बाजा बजेगा, आर्केस्ट्रा भी है। सारी तैयारियाँ हो गई थीं। दाऊ महाराज भी अपने पूजन सामाग्री सहित दो दिन से व्यवस्था में दिख रहे थे। कोटवार ने मुनादी कर दी थी कि रविवार को किसी के घर चूल्हा नहीं जलेगा।
इस हर्ष के बीच शोक भी किनारे से ही निहार रही थी, फिर एक परीक्षा होने वाली थी। टेलीफोन की घंटी के घनघनाने से सब चौंके, गुरूजी ने सुना तो चीख मारकर बेहोश हो गया। पानी छींटा मारने पर वह होश में आया। उन्होंने होश में आने के बाद रूंधे गले से बताया कि बारात ट्रेन से आ रही थी। आतंकवादियों के समूह ने ट्रेन को बम से उड़ा दिया, सारे बाराती... सब कुछ खत्म .... कोहराम मच गया। परिजनों ढांढस बंधाया। गुरूजी खामोश ईश्वर को याद करने लगे कि तुम किस जन्म के पाप की सजा दे रहे हो, मुझे। ये कैसी परीक्षाएँ मेरी लेते हो बार - बार ? क्या परीक्षा लेना - देना मेरी ही ठेका है ? कभी उनकी भी ले जो लूटकर भी ऐश कर रहे हैं। चित्कार के बीच खामोश अपराधी की भाँति ईश्वर के फैसले को स्वीकार करते हुए किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हुए थे गुरूजी। कहीं कोई इसके लिए अपील भी तो नहीं की जा सकती थी। उसके दरबार में हर किसी को पुनर्मूल्यांकन हेतु आवेदन का हक भी नहीं। वह भक्तों को जल्दी पास बुला लेता है। लाशों के ढेर में उन्होंने अपने होने वाले दामाद को पहचान कर जो दहाड़ लगाई फिर खामोश हो गये। लोग कहते हैं वे पागल हो गये। इस बार जीवन की परीक्षा में उन्हें पूरक मिला था। चिकित्सा विज्ञान उन्हें ठीक करने में नाकाम रहा। सरस्वती ने बेटे की तरह फर्ज निभाया। शहर में इलाज कराते वह नौकरी करने लगी। उसकी शिक्षा के बूते एक निजी बैंक में कम्प्यूटर चलाने का काम मिला था , इसी से गुजारा होने लगा। एक नई खोज की दवा ने कुछ उम्मीदें बाँधी वे कुछ शांत रहते खाना भी खा लेते थे। मानों बुझने के लिए दीपक भभक रहा हो। एक और वज्रपात होने को था। बैंक में डकैती हो गई, सुरक्षा स्वीच दबाते सरस्वती वहीं शहीद हो गई, आखिर स्वतंत्रता सेनानी का खून रंग लाया। बैंक लूटने से बचा। मरणोपरांत सेनानी के लिए पुरस्कार स्वरूप एक मेडल गुरूजी के धड़कते सीने पर टाँग दिया गया। बेटी की यादों को दिल में संजाये , विदेशी मेडल को गुरूजी ने मुट्ठी में भींच लिया फिर जोर से चीखा - जयहिन्द ...। मानो क्रोध को पी जाना चाहते हो। नपुंसकों की ताली बजाती गुलाम भीड़ की आवाज में उनकी आवाज दब गई। वे बोझिल मन से सभास्थल से निकलकर सीधे गाँव पहुंचे। विद्यालय पहुंचकर उन्होंने फिर चीखकर भाषण दिया, नारे लगाये, जन - जागरण का कार्य किया। महान विपत्तियों में भी वे अपने धर्म का निर्वाह करते रहे, सत्यवादी हरिश्चन्द्र की तरह। हम सब एक हैं, भारत माता की जय और मेरा भारत महान फिर खामोशी छा गई। गाय, कुत्तों ने उन्हें उठाने की भरपूर कोशिश की न उठने पर उनका कर्ण भेदी स्वर सबको सचेत कर गया कि रामू गुरूजी अब अपने जीवन की अंतिम परीक्षा में भी पास हो गए, वह भी मेरिट लिस्ट मे ....
  • पता - जे.पी.रोड, बसना (छग.)

ग़ज़ल


  • महेन्द्र राठौर
तस्वीर देख लेते, हमसे जो प्यार होता।
जख्‍मों को सेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

महफिल में सबको देखा हम पर न डाली नज़रें।
चोरी से देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

दरिया में डाल कर ये क्यूँ आग लगा दी।
चिट्ठी को देख लेते, हमसे जो प्यार होता॥

फूलों में फेंकना तो तौहीन है हमारी।
कांटों में फेंक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

मेले की भीड़ में भी डरते हो ज़माने से।
रस्ते में रोक लेते, हमसे जो प्यार होता॥

भेजा था फूल हमने खुश्बू ये दिल बसाकर।
बोसे अनेक लेते, हमसे जो प्यार होता॥
  • पता - न्यू चंदनिया पारा, जांजगीर (छग.)

फैसला

 कहानी

  • डां. नथमल झँवर
- कल एक तारीख है बाबूजी, और आप लोगों को महेश के यहाँ जाना है। याद है न ?
- हाँ , याद है बेटे, अच्छे से याद है। मुरझाये स्वर में दीनदयाल ने पुत्र रमेश से कहा।
- तो फिर आज रात में ही तैयारी कर लीजिए । इतना कहकर रमेश बिना प्रतीक्षा किए मुड़ गया। म्लान हो गया बाबू दीनदयाल का चेहरा। उसके लाड़ले बेटे के शब्द तब फिर आज रात में तैयारी कर लीजिए गूँज रहा था उनके मन - मस्तिष्क मे। सोच रहे थे वे - आखिर क्या तैयारी करना है, झोले में दोनों के कपड़े ही तो डालने हैं। कोई लाव - लश्कर तो है नहीं, जिसकी तैयारी पूर्व  से करनी पड़े। इस बात को सुबह भी तो बोला जा सकता था। वैसे भी एक माह में देख चुके थे दीनदयाल अपने बेटे - बहू की सेवा चाकरी। कितना सुख से रखा था अपनी माता - पिता को दिल जानता था उनका।
अमावस की रात ! अँधेरा घटाघोप !! घनघोर बारिस !!! पूरा सावन आज की बरस जायेगा ऐसा लग रहा था। बिजली की तड़क और बादल की कड़कडाहट सुन काँप उठता रोम - रोम। सुई की नोंक की तरह चुभती ठंडी हवायें। कहर ढा रहे थे सब के सब। बाबू दीनदयाल महसूस कर रहे थे सब, खाट में लेटे - लेटे। नींद बैरन बन गई थी आज। पीड़ाओं का समंदर लहरा रहा था तन - बदन में। सारी दुनियाँ नींद के आगोश में, लेकिन बाबू जी को नींद कहाँ। उन्हें प्रतीक्षा थी सुबह की। अस्सी बरस की उमर में जीवन के ये चार माह उन्हें चार सौ बरस जैसे लगे। कुशवाहा कांत की ये पंक्ति याद आ गई - एक हूक सी दिल में उठती है, एक दर्द सा दिल में होता है, मैं चुपके - चुपके रोता हूं, जब दुनिया सारी सोती है।
आज बाबूजी को सब कुछ याद आ रहा था। बाबूजी की गिनती जामनगर के बड़े - बड़े रईसों में थी। वैसे तो उनका पूरा नाम दीनदयाल शर्मा था लेकिन लोग उन्हें बाबूजी ही कहा करते थे। दो सौ एकड़ का फार्म हाउस, तीन - तीन शानदार मकान, शहर के मध्य चालीस हजार स्क्वेयर फीट का प्लाट, करोड़ों के मालिक थे वे। उन्हें अपनी सम्पत्ति से ज्यादा अपने पुत्रों पर नाज था। उनका सबसे बड़ा पुत्र रमेश एक्जीक्यूटिव इंजीनियर, दूसरा महेश एस.डी.ओ.पी. तीसरे नम्बर का सुरेश एक्साइज इस्पेक्टर तथा छोटा दिनेश सब इन्सपेक्टर पद पर। जब वे मित्र मंडली में बैठते तब उनके मित्र मजाक किया करते - दीनदयाल, तुम्हारा नाम दशरथ होना था। तुम तो जीते जी स्वर्ग का सुख भोग रहे हो। तब दीनदयाल भी ऐसा  ही महसूस करते थे। चारों बेटों के साथ संयुक्त परिवार था उनका। छुट्टिïयों में सब एक जगह एकत्रित हो जाते। बेटे लोग भी एक माह की छुट्टी लेकर आ जाते। उस एक माह का आनंद अनिवर्चनीय आनंद होता। बेटे सभी कहना मानते, बहुएँ भी एक पैर में खड़ी रहती। बच्चे तो बस मत पूछिए, दादाजी ... दादाजी का सिलसिला तब तक पीछा नहीं छोड़ता था जब तक दीनदयाल उन्हें कहानी नहीं सुना देते थे। उन्हें कई बार तो जोड़ - तोड़ कर कहानी सुनानी पड़ती। बच्चे एक दूसरे की शिकायत करने से भी नहीं चूकते थे । कोई कहता दादाजी मेरा खिलौना तोड़ दिया, कोई कहता मुझे चिकोटी काटी ...। दादाजी उनकी समस्याओं का निदान चुटकी बजाते ही कर देते थे। कोई उन्हें ताश खेलने के लिए निवेदन करता तो कोई लुका छिपी करने कहता। तब उनकी पत्नी भी बच्चों के साथ हो लेती और कहती - कोई बच्चों का भी दिल तोड़ता है। खेल लीजिए न। एक माह कैसे निकलता पता ही नहीं चलता था। जब बच्चों के लौटने का अवसर आता तो बच्चे कहते बाबूजी, आप मम्मी के साथ अवश्य आइये। वैसे तो आपको हमारे ही पास रहना चाहिए, उम्र भी तो हो गयी है। कब तक अपने हाथ से खाना बनाकर खाओगे। आपकी सेवा में किसी भी प्रकार की कमी नहीं होगी। बहुएँ भी मनुहार करने से नहीं थकती थी। तब दीनदयाल को लगता वास्तव में उनके पुत्र श्रवण से कम नहीं।
पुत्र एवं पुत्र वधुओं की बातें रखने बीच में कभी - कभार दीनदयाल पत्नी के साथ उनके पास चले जाते। तब उनकी खूब खातिरदारी की जाती थी। रोज कुछ न कुछ विशेष बनते रहते दीनदयाल मना भी करते। कहते - बहू हम मेहमान थोड़े ही हैं। सादा भोजन ही बनायी करो। बहुएं कहतीं - मम्मी - पापा , आप लोग तो भगवान के समान हो। माता - पिता भगवान ही होते हैं न ? और तब दीनदयाल व उसकी पत्नी चुप हो जाते। वे अपने आपको सबसे अधिक भाग्यवान समझने लगे थे।
एक दिन दीनदयाल अपने आपको कुछ अस्वस्थ महसूस करने लगे। उन्हें लगा कि अब बच्चों को बँटवारा दे ही देना चाहिए। जीवन का कोई भरोसा नहीं। बाद में विवाद न हो। उनने पुत्रों को बुलाया और वसीयतनामा कर दिये। पैतृक सम्पत्ति के नाम पर जो मकान था उसी में वे गुजर - बसर करने लगे। जिन सम्पत्तियों का उनने वसीयतनामा किए वे उनके द्वारा बनायी सम्पत्ति थी। वसीयतनामा बाद उनके परवरिश की बात आयी। उन्हें सदमा तो उस क्षण लगा जब कोई पुत्र उन्हें अपने पास रखने तैयार नहीं हुए। सबने कुछ न कुछ बहाना बना दिए। अंत में निर्णय हुआ कि वे दोनों प्राणी किसी एक पुत्र पर भार नहीं बनेंगे अपितु बारी - बारी,एक - एक माह सभी भाइयों के पास रहेंगे। दीनदयाल तैयार हो गए। उन्होंने अपने छोटे पुत्र दिनेश के यहां से शुरू करने का फैसला किया।
कालबेल बजा। नौकर ने दरवाजा खोला। उन्हें ड्राइंग रूम में ले जाकर बिठाया। कहाँ गये हैं सब लोग, कोई दिख नहीं रहा है ? दीनदयाल ने पूछा।
- साहब दौरे पर हैं। मैडम पार्टी में गयी हैं। बच्चे स्कूल गये हैं। नौकर का उत्तर था।
हाँलाकि दीनदयाल के आगमन की खबर पुत्र एवं पुत्रवधू को थी बावजूद वे घर से ऐसे लापता थे मानो उन्हें जानकारी ही न हो। दीनदयाल को एक धक्का सा लगा। नौकर उन्हें उनके लिए तैयार किये कमरे की ओर ले चला। कमरे को देखकर एक बार तो दीनदयाल के मन में आया कि अभी लौट जाएं पर लोक लाज के कारण वे ऐसा कदम नहीं उठा सके। शाम चार बजते - बजते बच्चे आये। बच्चों को भोजन आया ने दिया तब उन्हें भी चाय पीने मिली। शाम को लौटी पुत्रवधू। आते ही कहा - बाबूजी, आप लोग कब आये   ?
दीनदयाल के मन में तो भड़ास निकालने का आया मगर वे चुप रहे।
आठ दिन जैसे तैसे कट गए। तब तक उन्हें अपने लाड़ले इन्सपेक्टर का दर्शन नहीं हुआ था। हमेशा कह दिया जाता दौरे पर हैं। देर रात को आते हैं और सुबह से निकल जाते हैं। माह पूरा होने जा रहा था इस बीच एकाध बार ही पुत्र से भेंट हुई होगी। बातचीत भी ठीक से नहीं हो पायी थी। आज दिनेश कमरे में आया। कहा - क्या बताऊं बाबू जी, इंस्पेक्टरी की ड्यूटी ही ऐसी होती है। दिन रात चैन नहीं। अब देखों न, पूरे एक माह हो गये मगर हम दस मिनट बैठकर बात भी नहीं कर सके।
बाबूजी कोई निरा गंवार नहीं थे। वे पढ़े - लिखे, अनुभवी व्यक्ति थे। पुत्र की सारी बातें समझ रहे थे पर कहे कुछ नहीं।
एक - एक कर सभी पुत्रों के यहाँ रहकर उन्होंने देखा। पुत्र कोई एक दूसरे से कम नहीं थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि अथाह सम्पत्ति के मालिक को इस दरवाजे से उस दरवाजे दौड़ लगाना पड़ेगा। वे दिल तो उस समय और भी बैठ गया जब उनके पुत्र रमेश ने दिन गिनाकर कहा कि कल से आप लोगों को महेश के घर रहना हैं। पुत्र की ऐसी बातें सुनकर उनकी भृकुटि तन गई, मुठ्ठियाँ भिंज गई, रोम - रोम खड़े हो गये और उन्होंने एक अप्रत्याशित निर्णय ले लिए। पेशे से वे वकील थे और कभी उन्होंने अपने पक्षकार को हार का मुँह नहीं देखने दिये तो वे स्वयं अपना मुकदमा कैसे हार जाते।
सुबह उठते ही पत्नी के साथ तैयार होकर पुत्र रमेश के घर से निकल गये। उन्हें जाना तो महेश के घर था मगर वे अपने वकील सक्सेना के घर की ओर चल पड़े। उन्होंने आप बीती सारी बातें अपने मित्र को बता दिया। उनमें मंत्रणा हुई और जिस नतीजे पर वे पहुंचे उससे दीनदयाल के चेहरे पर प्रसन्नता की लकीरें देखी गयी। पिछले वसीयत को उन्होंने  निरस्त करते हुए नया वसीयतनामा तैयार किया जिसमें उल्लेख किया गया कि शहर के मध्य स्थित चालीस हजार स्क्वेयर फीट के प्लाट पर पार्वती अस्पताल का निर्माण, दो सौ एकड़ खेती की आमदनी से अस्पताल का मेंटनेंस किया जाए। तथा दो मकान मरीजों के साथ आये व्यक्तियों के आवास के लिए दिया जाए। एक मकान स्वयं रखा जिसके संबंध में कहा लिखा गया कि पति - पत्नी के मृत्यु बाद वह भी अस्पताल की सम्पत्ति होगी।
वसीयतनामा तैयार कर सभी पुत्रों को वसीयतनामें की कापी के साथ मकान खाली करने एवं खेत तथा प्लाट से कब्जा हटाने का नोटिस भेज दी गई।
  • झंवर निवास,मेन रोड सिमगा, जिला - रायपुर (छग.)

गंजत्व का वरदान

 व्यंग्य

  • मोह. मुइनुददीन '' अतहर ''
यदि आप गंजे हो रहे हैं तो इसमें परेशान होने या घबराने की कतई आवश्यकता नहीं। समझ लीजिये , आपके नाम लाटरी खुलने वाली है। अरे नहीं, लाटरी खुलने पर तो सरकार टेक्स काट लेती है। यूं समझ लो, आपका टेण्डर खुलने वाला है। फायदा ही फायदा।
अब आपको शीशे के सामने खड़े होकर अपने गिरते बालों का मातम मनाने की भी आवश्यकता नहीं, न ही अखबार अथवा पत्रिकाओं में छपे नीम - हकीमों, डाक्टरों के मुलायम घने बालों के विज्ञापनों के चक्कर में पड़ना है। एक बात अच्छी तरह समझ लीजिये, ये भ्रष्टïाचार की तरह गंजेपन की भीकोई दवा नहीं है। भ्रष्टïाचार की जड़े जितनी मजबूत होती हैं सिर के बालों की जड़ें उतनी ही कमजोर।
हमारे एक मित्र एक दिन मेरे पास आये और बोले - यार, मैं बहुत परेशान हूं। कोई उपाय बतला न।
मैंने कहा - तू तो हटटा कटटा, हेंडसम दिख रहा है। जा कारपोरेशन या कचहरी के किसी बाबू के साथ लग जा तेरी सारी परेशानी दूर हो जायेगी।
वह कहा - मत मजाक कीजिए यार, देख मेरे सिर के बाल कम होते जा रहे हैं। मैं गंजा हो रहा हूं। ढेरों दवा खा गया। सैकड़ों प्रकार के तेल, शैम्पू यहां तक कि आयुर्वेदिक लेप भी लगा चुका हूं परंतु कोई लाभ नहीं हुआ। सब बेकार सिद्ध हो गया।
मैंने कहा - तू अपने गिरते बालों के कारण हीन भावना से क्यों पीड़ित है ? इन्हें गिर जाने दो। ये तेरे लिए वरदान साबित होंगे। देख, मैं तूझे समझाता हूं। जो आदमी ज्यादा पढ़ता - लिखता है, या गंभीर सोच - विचार में डूबा रहता है वही गंजत्व को प्राप्त होता है। यह समृद्धिसूचक भी है। इसलिए मित्र मेरा कहना मानो और समझो तुम्हारे दिन फिरने वाले हैं। लक्ष्मीजी की तुम पर कृपा होने वाली है। एक राज की बात बतलाऊं, जब तुम पूर्ण रूप से गंजे हो जाओगे तो गंजेपन से तुम्हारे व्यक्तित्व में और निखार आ जायेगा। लोग तुम्हारी इज्जत करने लगेंगे। और अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचे तो गंजापन होने के कारणपोषक तत्व सीधे मस्तिष्क में पहुंचकर दिमाग और गर्दन दोनों को मजबूत करते हैं और चाँद भी चिकनी और चमकदार हो जाती है।
सिर में अधिक बाल रखने वालों के पोषक तत्व दिमाग तक नहीं पहुंच पाते, अत: उनके गर्दन और दिमाग दोनों कमजोर रहते हैं। कहा जाता है कि गंजा व्यक्ति तेज बुद्धिवाला होता है। तुमने भी देखा होगा कि प्राय: सभी आफिसों के बॉस, उच्चाधिकारी, लेखक, कवि नेता या अभिनेता सभी गंजे होते हैं।
गंजे व्यक्ति को उसके निजी जीवन में भी फायदे हैं। आफिस या किसी शादी विवाह की पार्टी अथवा किसी समारोह में जाना हो तो बस एक मिनट में ही सिर पर हाथ फेरकर तैयार हुआ जा सकता है। न तेल - शैम्पू की आवश्यकता न कंघी शीशे की, और न ही बाल संवारने की परेशानी।
गंजा आदमी कितनी ही परेशानी में हो उसके चेहरे पर चिंता के कोई भाव नहीं उभरते। गंजापन सब कुछ अपने में छुपा लेता है। गंजा व्यक्ति का कोई बाल बांका नहीं कर सकता।
मंहगाई के इस फैशन परस्त युग में जहां हर पल फैशन और हेयर स्टाइल बदल रहे हैं, जरा गंजापन से होने वाले फायदों का अंदाजा तो लगाइये। तेल, साबुन, कंघी, आइना, शैम्पू इन सबके खर्चे की बचत के साथ - साथ बाल सैट कराने और सफेद बालों को काला कराने के लिए खिजाब काली मेहंदी लगाने की चकल्लस से मुक्ति। दिन के समय यदि बच्चा चाँद देखने की जिद करें तो फौरन अपनी चिकनी चाँद उसकी ओर कर दो। दो - चार चपत लगाकर वह चुप हो जाएगा। तुम्हारी चम्पी मालिश हो जाएगी। पत्नी श्रृंगार करे बैठे तो अपनी चिकनी चाँद पर तेल चुपड़कर उसके सामने प्रस्तुत कर दो। तुम भी खुश ... वह भी खुश। न तुम्हें शीशे की आवश्यकता न तुम्हारी पत्नी को।
गंजेपन का एक और सबसे बड़ा लाभ यह है कि तुम्हारे सिर में कभी जूं नहीं पड़ेगी और तुम्हारे बाल कभी सफेद नहीं होंगे। मुख्य बात यह है कि तुम्हारी उम्र का कोई अंदाजा नहीं लगा पायेगा और तुम बुजुर्गों तथा नौजवानों के बीच सम्मानित व्यक्ति माने जाओगे।
युवा दिखने के लिए लोग बालों को खिजाब लगाकर काला करते हैं। बालों को नये स्टाइल में सजाते हैं। कई लोग विग भी लगाते हैं परन्तु गंजेपन के कारण तुम्हारी लोकप्रियता दोनों ओर बरकरार रहेगी। जब तुम गंजे हो जाओगे तो तुम्हें लोग दूर से ही पहचान लिया करेंगे। किसी अपरिचित को भी तुम्हारे पास पहुँचने या पहचानने में असुविधा नहीं होगी। गंजा व्यक्ति विशिष्ट होने का दर्जा पा जाता है। उसकी पहचान अलग हो जाती है। बिना नाम के भी वह नाम वाला हो जाता है जैसे कि बड़ी - बड़ी मूंछ वाला।
जो शादी - शुदा विवाहित हैं उन्हें जाने दीजिये। जो कुंआरे और गंजत्व प्राप्ति की ओर बढ़ रहे हैं उन्हें भी चिंता नहीं करना चाहिए क्योंकि महिलाएं भी उन्हें पसंद करती हैं जिन्हें सब पसंद करते हैं।
एक दफा वर्ल्ड ट्रेड  सेन्टर में गंजों का सम्मेलन बुलाया गया। यहां पर सभी प्रकार के गंजे पूरे विश्व से एकत्र हुए थे। वहां एकत्र गंजों में कोई सामने से गंजा था तो कोई बीच से। कोई सिर के पिछले हिस्से में गंजा था तो कोई पूरा सफाचट। सम्मेलन में एक बात विशेष रूप से सामने आई कि सिर के सामने गंजा व्यक्ति सेक्सी होता है। सम्मेलन के कुछ दिन बाद मुझे अधिकतर व्यक्ति सामने से गंजे दिखे।
इतने लंबे भाषण के बाद मैंने देखा , मेरे मित्र के चेहरे पर पूर्ण संतुष्टिï के भाव थे। लेकिन गंजत्व की ओर बढ़ रहे उसके चिकने होते सिर पर भारत की भौगोलिक स्थिति स्पष्ट होती जा रही है, जैसे हरे - भरे वनों को बेदर्दी से काट दिया गया हो।

हे दयालू, दया का दरवाजा खुलवाइए


व्‍यंग
  • कांशीपुरी कुंदन
हुजूर, हम असुविधा भोगी निवेदन करते हैं कि हमें कुछ सुविधाएं तत्काल मुहैया कराई जाएं। यूं तो हम इस सुविधा सम्पन्न महान देया में असुविधा भोगने के आदी हो चुके हैं, फिर भी भारतीय होने के नाते निवेदन करना या मांगना हमारी परम्परा हैं। इसलिए हमारी मांगों पर गौर करने की महती कृपा करें।
बेहतर होगा कि संविधान में संसोधन करके भ्रष्टïाचार को मूल अधिकारों में मुल्क हमेशा हरा भरा दिखाई देता रहे।
हर दहेज लें बहू को जिंदा जलाएँ या आत्महत्या के लिए प्रेरित करें, सरकार हमारे कामों में कोई टांग न अड़ाए क्योंकि हम आजाद देश के नागरिक हैं और हमें हर कार्य आजादी से करने कि छूट होनी चाहिए।
हे दयालू।़ दया का दरवाजा हमारे लिए भी खोलिए और भी दलाली या ठेका देकर अनुग्रहित करें, अपनी सहृदयता का परिचय दें अन्यथा हमारा यह जन्म व्यर्थ ही चला जाएगा। हम ऊपर वाले के दरबार में किस प्रकार के मुंह दिखा सकेंगे।
मंहगाई बढ़ाई वाले कारीगरों, समानों को गायब करने वाले जादूगरों यानी हमारे व्यापारी  बंधुओं को मिलावट, मुनाफाखोरी जमाखेरी और कालाबाजारी जैसे पुश्तैनी धंधे करने का पावर हमेशा के लिए दी जाए। यह आपकी दूरदर्शिता होगी कि बदे में बतौर संधि के समय - समय पर आप थैली भेंट में लेते रहें या सिक्कों से तुलते रहें।
चाहे धरती फटे या आसमान मगर आपकी सफलता और सलामती के लिए आपअसन्तुष्टïों को पद यानि सत्ता सुख का असनेद लेने दीजिए क्योंकि सत्ता पक्ष के होते हुए भी नेपथ्य में असली विपक्षी सही लोग हुआ करते हैं। इसलिए सचिवालय में भले ही कोई विभाग अथवा विभाग का अंश शेष नहीं रह गया हो, उनके रहने के लिए राजधानी में कोई बंगला खाली न बचा हो यह छोटी - छोटी बातें उनके स्वविवेक पर छोड़ दीजिए उनके लिए मेत्रीपद घेषित कीजिए। यदि मंत्रीपद संभव न हो तो किसी निगम, सहकारी संघ, ट्रस्ट आदि के अध्यक्ष पद पर उन्हें बैठा दें।
आतंकवादी प्रवृत्ति के सभी थनेदार को वीर पुरस्कार से सम्मानित करने की स्वस्थ परम्परा प्रारम्भ की जाए  तथा आत्मीयतापूर्वक बर्बरता बरतने, थने में ही सद्ïभावना सहित सामूहिक बलात्कार समपन्न करने, गोपनीय बातों का भंडाफोड़ करने चोरी डकैती आदि अनुकरणीय कार्य की पूरी छूट दी जाए। जिससे कि वे देशभक्त, जनसेवा और सुरक्षा के सच्चे पक्षधर सिद्ध हो सकें।
देश की एकता और अखण्डता के लिए उचित हो कि आप जयचन्द और मीरजाफर जैसे देशभक्तों को सत्ता की बागडोर सौंप दे ताकि वे हमारे आँगन में गुलाब के एवज में कैक्टस रोपने में जरा भी  कंजूसी न बरतें और राष्‍ट्र चहुंमुखी विकास के पथ पर अग्रसर रहे। जनता गले मिले या गला काटे, अंधकार बाँटे अथवा उजाला, आप जनता जनार्दन की नहीं बस कुर्सी की फि क्र कीजिए। वैसे भी इस देश की जनता बेवकूफ है। अत: उसे उसके हाल में ही मरने दीजिए। आपने कितना ध्यान दिया, भरसक प्रयत्न किया उसे ऊपर उठाने का ... मगर क्या आई.आर.डी.पी., क्या जवाहर योजना ? जनता तो यह कसम खाकर पैदा हुई है कि गरीबी में ही जीयेगी और गरीबी में ही मरेगी चाहे कुछ भी हो जाए वह गरीबी की रेखा से इंच भर भी ऊपर नहीं उठेगी, बल्कि यह कहिए कि टस से मस नहीं होगी। इसलिए परवर, मेरी तो यह सलाह है कि इस मंहगाई को और अधिक बढ़ने दीजिए। जितना हो सके हमें जनता को लूटने दीजिए।
जो अभिनेत्री जितना अधिक अंग प्रदर्शन करती हो उसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब देने की कृपा करें क्योंकि इन बेचारियों का इसमें कोई दोष नहीं, वे तो मात्र कलानेत्रियां है। आज - कल कहानियाँ ही ऐसी लिखी जा रही है कि निर्माता निर्देशक रूपये बटोरने के चक्कर में उन बेचारियों के कपड़े उतार लेते हैं। लोग तो पागल हैं जो अकारण ही चिल्लाते रहते हैं कि संस्कृति खुले आम नीलाम हो रही है। यह जो अंगप्रदर्शन हो रहा है, वह नारी की मर्यादा और सभ्यता के खिलाफ है। हमारा तो मानना है कि ये सब पुरातनपंथी बातें हैं। साहब सीधी सी बात है कि जिसके पास कुछ भी दिखाने लायक है, वह उसे दिखा दें तो इसमे हर्ज ही क्या है ? अब आप हमारे वकील को ही ले लीजिए उन्हें झूठ बोलने की कला में महारत हासिल है। ऐसे महारथियों को जनता की खुशहाली के लिए पूरी - पूरी छूट दीजिए कि वे अपनी कला के  बल पर यानि झूठ बोलकर न्याय को फांसी और कानून को जेल की हवा खिला सके। उन्हें झूठ,फरेबी और बेईमान जैसे अलंकारों से अंलकृत न किया जाए। फिर देखिए, इससे बड़ा त्यागी और जनहितैषी मुल्क में और कोई हो ही नहीं सकेगा। ये जो कुछ करते हैं अपने मुवक्किल की खुशी के लिए करते हैं। मुवक्किल की खुशी, देश के प्रतिष्ठित नागरिकों की खुशी और जब देश के बड़े - बड़े नागरिक खुश होते हैं तो देश खुशहाल होता है। आप इसे अन्यथा न लें, हमारा तो यही कहना है कि जिस देश के वकील खुश हों वह देश तरक्की करता है।
आंदोलन कारी जागरूक भाइयों को अपनी जागरूकता का परिचय निर्विध्रता पूर्वक देने का अवसर प्रदान कीजिए, चाहे वे हड़ताल करें या नगर बंद, चाहे भारत बंद या विश्व बंद। संविधान की प्रतियाँ जलाएं  या गरीबों की झोपड़ - पट्टियाँ, बसे - मोटरें फूंके या हवाई जहाज, उन्हें करने दें। आखिर वे भी तो इसी देश के नागरिक हैं। देश पर उनका भी अधिकार है। वे भी इस महान और स्वतंत्र देश के स्वतंत्र और स्वच्छंद वाशिंदे हैं।
कुछ सज्जन गांधी विचार धारा के पक्के समर्थक होने के नाते मुहल्ले से लेकर जंगलों तक के लकड़ियों की सफाई पर विश्वास करते हैं। उन्हें ट्रकों लकड़ियों की अवैध निकासी निष्ठा पूर्वक करने की अनुमति देने की महती अनुकम्पा करें। सच्चे अर्थों में यही लोग पक्के दूरदर्शी है। दिनोंदिन देश की जनसंख्या इस कदर बढ़ रही है कि श्मशानघाट में भी कालोनियाँ बन रही है। ऐसी विषम परिस्थिति में आगे चलकर जगह की घोर समस्या हो जाएगी। और आपका वृक्षारोपण का कार्यक्रम धरा का धरा रह जाएगा। इसलिए भी जंगलों की सफाई जरूरी हो जाती है ताकि पुराने वृक्षों की जगह नये वृक्ष लगाए जा सके, नये पौधे रोपे जा सके और जब वे बड़े हो जाए तो उन्हें चोरी से काट कर बाजार में चोरी - चोरी बेच दिया जाए।
जनप्रतिनिधि तो जनता का हित न करके सदैव स्वहित करने में ईमानदारी पूर्वक जुटे रहते हैं उदाहरणार्थ देश की घोर आवासीय समस्या को देखते हुए शहर - दर - शहर कोठियों का निर्माण या फुर्सत के क्षणों में जनसंख्या को गति देने में अपना अमूल्य योगदान देना। ऐसे पुरूषार्थियों को कर्मवीर की उपाधि से सम्मानित किया जाए। ताकि इससे जनती की निरीह इच्छा को पूरा किया जा सके। यह तो सर्वविदित तथ्य है कि प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधि का हित जनता का हित होता है। वे जो कुछ भी करते हैं जनहित में करते हैं अत: उन्हें हित करने का पूरी छूट दी जाए।
हमारी अंतिम अथवा आखिरी इच्छा यही है कि आप हमारी खुशी के लिए राष्‍ट्र के चहुंमुखी विकास के लिए अवसरवादिता, स्वार्थपरता और कोरे आदर्श के ढोल बजाएं, जिससे कि हमारे मुल्क का नाम संसार में रोशन हो सके।
  • ' मातृछाया ' , मेला मैदान,  राजिम, जिला - रायपुर (छग.)

त महूं बनेव समाज सुधारक



  • आनंद तिवारी पौराणिक
परन दिन बल्लू नाऊ के सेलून म समाज सुधारक संगी संग भेंट होगे। वो हा बीड़ी के धुंगिया ल मोर डहर फूंकत मोला ताना मारिस - अरे यार, तंय का कवि बने हावस, तोर कविता लिखे ले का समाज ह सुधरही। वोखर बर मोर कस समाज सुधारक बन जा, तभे देस, दुनिया के बुराई मन मेटाही। मोला वोखर बात बानी ह काँटा कस गड़गे वो हा त मोला चना के झाड़ म चघा दिस। चना के त नान - नान पौधा होथे। फेर दुनिया वाले मन वोखर झाड़ घलो बना देथें। एक ठन कहिनी म पढ़े रेहेंव के खीरा के रूख म अब्बड़ खीरा फरे रिहीस। त ये बात ह वो दिन मोर समझ म नइ आइस, आज समझ गेंव के जब चना के झाड़ होथे त खीरा के रूख काबर नइ होही। मंय ह बन गेंव  समाज सुधारक। खद्दर के सफेद कुरता, पैजामा पहिरेंव अऊ कांध म डारेंव लटकू झोला। संवागत समाज सुधारक बनगे, फेर ये समझ नई आइस के समाज सुधार ल कती ले चालू करंव। त मोला सुरता आइस के कोनो भी कारज ल अपन परोस ल चालू करना चाही।
नगर पालिका ह सड़क अऊ रद़दा के तिर - तिर, खराब पानी बोहाय बर नाली बनाय हे। फेर लोगन डारथें वोमा कचरा, कागद अऊ जम्मों गन्दा जिनिस। नाली ह बजबजा जाथे। बस्साये, माखी, मच्छर, कीरा मकोड़ा हो जाथे। डेंगू अऊ मलेरिया फइल जाथे। त सबो झन गारी देथय सरकार ल। मंय ह परोसी मन ल इही बात बतायेंव अऊ नाली ल साफ राखे बर कचरा डारेबर बरजेंव त लड़ंकिन परोसी डोकरी ह मोर सात पुरखा ल बखान डारिस अऊ मोर आँखी के देखते कचरा ल बाहरिस अऊ नाली म झर्रा दिस। तभो ले मंय ह हिम्मत नइ हारेंव। नल म पानी भरइया माई लोगन ल लाईन म पानी भरे बर कहेंव त मोरे बर पानी बंद होगे। पढ़इया मन ल टी.वी. देखे बर बरजेंव त मोरे टी.वी. देखना बंद होगे। इसकुल के लइका मन ल माखुर, गुटका, सिगरेट बर बरजेंव त वोमन ह लहुट के मोला किहिन - पहिली तंय ह दिन भर चाय पियई ल बंद कर त हमन ल सिक्क्षा देबे। मंय ह अपन जम्मो पीरा ल समाज सुधारक संगी ल बतायेंव त वोहा मोर पीठ ल ठोंकत बोलिस - तंय फिकर झन कर यार, हिम्मत ले काम कर। चल पान खाबोन। अइसन कहत मोला खींचत पान ठेला म लेगे। वोहा जरदा, माखुर वाला पान ल चबाईस, पाऊच ल दाँत म काट के वोमा भराये जर्दा ल मुँह मं फाँका मारिस। मंय ह लौंग, इलाइची चबात रेहेंव। वोहा पचाक ले थूकिस। बाजू म खड़े मनखे के फुलपेंट म थूक छटकगे। माखुर- गुटका के गंध ह हवा म बगरगे। मोर जीव खलबलागे, लगिस के मंय ह उछर डरहूं फेर रूमाल ल मुँह म ढाँके अपन मन ल समझायेंव। मंय संगी ले बिदा मांगेंव त किहिस - अरे सुन न यार, काली मोर इंजीनियर टुरा ल देखे बर लड़की के ददा - दाई मन आहीं, मंझनियां बेरा। तहूं आबे।
बिहान दिन मंझनिया मंय ह समाज सुधारक संगी के घर म गेंव। थोरिक बेर म चमचमात कार म सगामन पधारिन। समाज सुधारक संगी ह अपन घरवाली संग, वोमन के सुआगत करिस। सोफा म बइठाइस। लस्सी, ठंडा सरबत अऊ नमकीन - मिठई रखिन। सगामन ह लड़का ल देखिन त परसन्न हो गे। वोमन किहिन - हमन ल ये रिस्ता ह पसंद हे। वोमन जाय बर ठाढ़ होइस त समाज सुधारक संगी ह बोलिस - आप बने फोर के गोठ बात त नइ करेव सगा।
सगा किहिस - भई, आप मन तो ये छेत्र के समाज सुधारक हव। सादा ढंग ले आदर्स बिहाव करबो, अऊ समाज ल नवा रद़दा देखाबों। ओखर गोठ ल सुनके समाज सुधारक संगी ह बगियागे अऊ अपन हाथ के मिठई के पलेट ल पटक के किहिस - मंय ह आप मन ल समझदार समझत रेहेंव, फेर अइसन नइ लागय। सुन लव अपन कान ल खोल के, दुनिया ल देखाये बर भले हमन आदर्स बिहाव करबो फेर भीतरी - भीतरी तुमन तीन लाख नगदी, एक ठन कार अऊ पन्द्रह  तोला सोना देहू। कहव, तुमन ल मंजूर हे के नहीं ? टुरी के दाई - ददा मन रूआँसू होगें, फेर का करतिन वोमन तईयार होगे। समाज सुधारक संगी के ये दे बेवहार मोला बने नइ लागिस, फेर पर के घरेलू गोठ म महूं नइ गोठियाय सकेंव।
मोर समाज सुधारक वो संगी ह थोरिक दिन बाद म समाज सुधारक मन के एक ठन बड़े सभा म सहर लेगिस। बड़े - बड़े पण्डाल लगे रहय। जगर - मगर बिजरी झालर सजे रहय। दुरिहा - दुरिहा ले समाज सुधारक मन बड़े - बड़े गाड़ी, मोटर, कार म आइन। महंगी होटल म दारू, कुकरी खाईन। भासन ऊपर भासन देइन। कतक ो रूपिया पानी कस बोहागे। मंय ह समाज सुधारक संगी ल कहेंव = संगी ये देखावा अउ ढोंग करे ले का फायदा ? हमरे कथनी अउ करनी एक नइये त दुनिया ह कइसे सुधरही ? संगी हंस के गोठ ल हल्का बना दिस। किहिस - देख भाई, जईसन हलवाई ह अपन मिठई ल नइ खावय, वइसने हमर सिक्छा ह हमर मन बर नोहय।
तभे मंय ह समझेंव के मनखे मन पाठ पूजा करथे। फेर जिनगी म बेईमानी, छल, कपट अऊ सोसन ल नइ छोड़य। दूध म पानी मिलई, खाय पिये के जिनिस अऊ दवई म मिलावट करके पइसा कमाय देखाय बर जग, हवन, परबचन कराथें। तरिया ल पाटके काम्पलेक्स बनाथे। किराया म लाखों कमाथें। रूख, राई ल काटके घर म प्लास्टिक के फूल सजाथे। सबो त गड़बड़ हे रे भाई। कथनी आन, करनी आन। तइहा के सियान मन तरिया बनवावंय, पेड़ पौधा लगवावंय। गरमी म पियाऊ खोलय, पियासे मन ल पानी पियावंय। मोर नजर ह एक ठन किताब म लिखे ये गोठ म परिस - अरे बइहा, तंय ह दुनिया ल सुधारने वाला कोन होथस ? तंय खुद सुधर जा, दुनिया ह सुधर जाही।
मंय ह तुरते समाज सुधारक के बाना ल छोड़देंव, अऊ अपन जुन्ना रद्दा म रेंगे लगेंव।

सोमवार, 6 मई 2013

ईश्वरीय विधान

कहानी
  • डां.रामकुमार बेहार
आशा व उत्साह के साथ बैंक की सीढ़ियाँ चढ़ रहे अमर को ऐसा लगा मानों सामने जा रही लड़की गिरने वाली है, लाठी के सहारे वह लगभग उछलता दो सीढ़ियाँ चढ़ा, उसका अनुमान सही निकला। सामने वाली लंगड़ी लड़की गिरने लगी। अमर यदि समय पर न पहुंचता तो लड़की का गिरना व घायल होना अवश्यम्भावी था।
- धन्यवाद, आपने मुझे गिरने से बचा लिया।
- धन्यवाद की कोई बात नहीं है, यह तो मेरा फर्ज था।
- आजकल कौन फर्ज निभाता है, देखिए न, चार माह से लोन के लिए चक्कर लगा रही हूं। बैंक मैनेजर के कानों में जूँ नहीं रेंग रहा है।
- चलो, मैं देखता हूं। आपका काम आज कैसे नहीं होता। अमर ने लंगड़ी लड़की रंजना के साथ बैंक मैनेजर के चेंबर में प्रवेश किया। भाव भंगिमा से मैनेजर ने जान लिया, उसके अनुभव ने उसे लांछित होने से बचा लिया।
- आइये रंजना जी, आपका लोन स्वीकृत हो गया है।
- धन्यवाद मैनेजर साहब, आपने डूबते को तिनके का सहारा दिया है।
- नहीं - नहीं, ऐसा मत कहिए, हमारा तो फर्ज है। समाज के कमजोर तबके के लोगों कोर सहायता पहुंचाये। उन्हें आत्म निर्भर होने के लिए सहायता पहुंचाये।
- मैनेजर साहब, आज तो मैं थक हार कर आवेदन वापस लेने आई थी। आवेदन वापस लेने की नौबत नहीं आयी इसके लिए धन्यवाद....।
अमर और रंजना बैंक मैनेजर के कमरे से लोन का चेक लिए निकले। रंजना ने अमर को इस समयानुकूल सहायता के लिए धन्यवाद दिया । गिरने से बचाने व लोन दिलाकर अपने पैरों पर खड़े होने में सहायता देने के लिए बारम्बार धन्यवाद दिया।
अनेक  प्रसंग में अमर व रंजना की भेंट होती रही। साहचर्य, धीरे - धीरे प्रेम में बदलने लगा। अंतत: निर्णय की घड़ी आयी। दोनों को रह - रह कर एक चिंता सता रही थी कि उनकी  भाँति कही उनकी संतान भी अपाहिज न हो जाय। एक - दूसरे को वे समझाते अंतत: उन्होंने डॉक्टर की सलाह लेना उचित समझा। वे डॉक्टर से मिलने राम क्लीनिक गये। उस समय डॉक्टर क्लीनिक बंद करने वाले थे कि अमर और रंजना ने डॉ के कमरे में प्रवेश किया। अभिवादन के बाद अमर ने कहा - डॉक्टर साहब, हममें से कोई बीमार नहीं है। हम इलाज के लिए भी नहीं आये हैं। हम मात्र परामर्श लेने आये हैं। आपकी फीस हमने चुका दी है।
- कहिए ...। डॉक्टर ने पूछा।
- हम एक दूसरे को प्यार करते हैं।
- यह अच्छी बात है। इसमें मैं क्या परामर्श दूंगा।
- प्रेम के संबंध में नहीं, विवाह के संबंध में हम परामर्श लेना चाहते हैं। कृपया चिकित्सा शास्त्र के अनुसार बताइये कि लंगड़े - लंगड़ी की संतान लंगड़े - लंगड़ी तो नहीं होती ?
डॉक्टर गंभीर हो गये। बोले - चिकित्सा शास्त्र में ऐसा कुछ नहीं लिखा है ...।
अब अमर और रंजना संतुष्टï हो गये। वे वहां से निकल पड़े तथा कुछ दिनों बाद विवाह बंधन में बंध गये।
मैटर्निटी होम के एक पलंग पर लेटी रंजना उस घड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी जब उसे लेबर रूम में ले जाया जायेगा। पति अमर पास ही कुर्सी पर बैठा था। उसके चेहरे से व्यग्रता के भाव छलक रहे थे। दोनों को चिंता थी। परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा की घड़ियाँ धीरे - धीरे व्यतीत होती है। हर परीक्षार्थी को लगता है कि उसकी परीक्षा, शेष परीक्षा से भिन्न है, विशेष है। रंजना और अमर दोनों की परीक्षा की घड़ी काटे नहीं कट रही थी।
महिनों पहले दोनों के मन में चिंता ने जन्म लिया था। डॉक्टर से प्रतिमाह नियमित जाँच के दौरान वे एक ही प्रश्र करते और डॉक्टर का एक ही जवाब होता,  धैर्य से उन्हें समझाता, चिंता दूर करने की सलाह देता मगर माह दर माह उनकी चिंता बढ़ती ही जा रही थी।
नौ माह पूरे हो चुके थे। सावधानीवश अमर ने रंजना को मैटर्निटी होम में एडमिट करा दिया था। जोर देने पर वह अपने व्यवसाय को देखने कुछ देर के लिए जाता फिर वापस रंजना के पास आ जाता।
आखिर वह घड़ी आयी जब रंजना को लेबर रूम ले जाया गया। क्या सोचकर लेबर रूम नाम रखा गया डॉक्टर व उनका समूह जाने मगर उस रूम के पास गुजरने पर महिला के जोर लगाने की आवाज और उत्साहित करते नर्स समूह से लगता कि सार्थक नाम दिया गया है। लगभग एक घण्टे के बाद लेबर रूम से एक नर्स निकली और अमर को समाचार दिया कि उसे लड़की हुई है। समाचार सुनकर अमर का कौतुहल शांत नहीं हुआ। उसने पूछा कि उसके हाथ - पाँव तो सही सलामत है न ? नर्स के लिए यह प्रश्र नया था। अनोखा था। अप्रत्याशित था। अवांछित था। लोग जच्चा - बच्चा के बारे में पूछते हैं। बच्चा के हाथ - पाँव के बारे में पूछने वाला यह नर्स के सेवावधि में आने वाला प्रथम व्यक्ति था।
नर्स ने प्रति प्रश्र किया कि ऐसा वह क्यों पूछ रहा है ? अमर के जिद करने में नर्स ने कहा कि हाथ - पाँव एकदम सही सलामत है।
अमर को थोड़ी देर के बाद रंजना से मिलने का अवसर मिला। रंजना से मुखातिब होने के स्थान पर वह बच्ची के पलंग के पास गया और उसके हाथ - पाँव को छू - छूकर देखने लगा। स्वयं को संतुष्टï करने लगा।
रंजना सब कुछ समझ रही थी, जान रही थी, परीक्षा फल निकल चुका था। अपंग माँ - बाप की अपंगता बच्चे पर नहीं आती। अंधे की संतान अंधी, लंगड़े की संतान लंगड़ी नहीं होती। यह ईश्वरीय विधान सामने था। रंजना एवं अमर के चेहरे पर शांत रस झलक रहा था।

पता - अध्यक्ष,
छत्तीसगढ़ शोध संस्थान, 370,
सुन्दर नगर, रायपुर (छग.)

पुस्तक विमोचन समारोह में

व्यंग्य

  • डां. बच्चन पाठक ' सलिल' 
इन दिनों अपने नगर में एक नया उत्सव युद्धस्तर पर प्रारम्भ हुआ है। वह है पुस्तक विमोचन समारोहों का आयोजन। यह पुनीत कार्य पुस्तक विमोचन का पहले मंत्री लोग करते थे। राजनीतिक उठापटक में जिले के निवासी मंत्री शहीद हो गये। अनिवासी मंत्रियों के आने का विश्वास नहीं रहता अत: यह शुभ कार्य कुछ ठेकेदारों, मंत्रियों के मैनेजरों या अगले जन्म 6 चुनाव 8 के सम्भावित मंत्रियों से कराया जाता है। हाँ, कुछ दैनिक समाचार पत्रों के सम्पादक भी इस कार्य में गहरी रूचि लेने लगे हैं। आयोजक सोचते हैं कि चलो सम्पादक कुछ भले ही न दे, विस्तृत सचित्र विवरण तो छपेगा, पब्लिसिटी तो होगी। पुस्तकों के अतिरिक्त पत्रिकाओं के विमोचन हो रहे हैं। श्री ... जी अपनी पत्रिका ' कर्ण पिसाचिनी' के प्रत्येक अंक का विमोचन करवाते हैं। चार - पाँच साल से पत्रिका निकल रही है। अभी - अभी पत्रिका के रजत जयंती अंक का विमोचन हुआ है। मैंने श्री ... जी से पूछा रजत जयंती तो पचीसवें साल में मनायी जाती है। अभी कैसे रजत जयंती हो गयी ? वह गुर्राये, बोले - आप कॉलेज में लड़कियों को पढ़ाते रहे वे दिमाग चाट गईं। पाँच सालों में मेरी पत्रिका नियमित नहीं रही। यह पचीसवाँ अंक है। मैं रजत जयंती मना रहा हूं तो किसी का क्या ? मैंने भी सोचा श्री .. जी, जब स्वर्ण जयंती ही मनावें तो मैं क्या कर लूं ? पिछले दिनों एक निमंत्रण मिला। झटपट जी का काव्य पुस्तक ' खरकाई चालीसा' का विमोचन हो रहा है। नगर के प्रसिद्ध समाजसेवी धनपति जी के करकमलों से विमोचन होगा। आप अवश्य पधारें। अल्पाहार का उत्तम प्रबंध हैं। मिठाइयाँ छप्पन भोग से आ रही है। कार्ड के नीचे छपा था - मुद्रण छप्पन भोग के सौजन्य से।
मैं गया। कुल तीस पैंतीस चेहरे थे। प्रत्येक चेहरा एक या एकाधिक संस्थाओं - संगठनों से जुड़ा था। घास उगाओ, नगर बचाओ के संयोजक देहाती जी भी थे। मुझे देखकर बोले - गुरूजी, मैंने भी हाजिरी दे दी। भवदी की बात है। यदि किसी संस्था के समारोह में न जाओ तो तुम्हारे समारोह में कौन आयेगा ? ई सीरिया ' श्री.जी.' बहुत चालू चीज है। बाप का फोटो रख कर माल चढ़वा रहा है। सेठ से माल लिया है। छप्पन भोग से नाश्ता का इंतजाम करवा लिया है। मैं सुनता रहा और मुस्कुराता रहा। श्री .. जी संयोजक थे। कार्यक्रम एक घंटा विलम्ब से प्रारम्भ हुआ। सेठ धनपति ने विमोचन किया ( देहाती जी इसे मोचन कहते हैं ) तीन चार वक्तागण आये। किसी ने धनपति पुराण का पाठ किया। किसी ने श्री ... जी के पिताजी को श्रद्धांजलि दी। सबने साहित्यिक समारोहों में क्षीण होती उपस्थिति पर आंसू बहाये। न तो किसी ने पुस्तक की विषय वस्तु पर प्रकाश डाला और न कवि झटपट को घास डाली। इसी बीच एक प्रेस फोटोग्राफर आया। उसने कहा - थोड़ी देर हो गयी। मैंने विमोचन का चित्र नहीं लिया है। एक बार फिर हो जाय। सेठ जी उठे। फाड़े हुए कागजों को मुठ्ठी में दबाया। दूसरी में पुस्तक की गर्दन पकड़ी। फोटो हो गया। श्री ... जी वहीं पर खड़े होकर समाचार का ब्रीफिंग करने लगे। फोटोग्राफर स्वीट्स की दो पैकेट लेकर चले गए। मिठाई के डिब्बे बंट रहे थे। जो खा चुके थे, वे चाय पी रहे थे। जो चाय पी चुके थे, वे जा रहे थे। इसी बीच श्री ... जी को याद आया कि धन्यवाद ज्ञापन नहीं हुआ। उन्होंने झटपट को कृतज्ञता ज्ञापन के लिए ललकारा, झटपट इस आसन्न विपत्ति के लिए तैयार नहीं थे। वे तो अपना चालीसा बांट रहे थे। उन्होंने मुझे माइक की ओर ठेल दिया। मैंने एक मुक्तक सुनाया -
सेठ जी ने कष्ट से पुस्तक विमोची
श्रोताओं ने छप्पनभोग की पैकेट नोची।
वक्ताओं ने शब्दों को जोड़ा
कहीं के ईंट कहीं का रोड़ा
पर पुस्तक भी पढ़ी जाय,
किसी ने न सोचा।
  • पता - डी. रामदास भठ्ठा, विप्टुपुर, जमशेदपुर

दिसम्बर की रात आखिरी

  •  हरप्रसाद ' निडर' 
दिसम्बर की रात आखिरी
    नये साल का बेला है।

लल्लू अजगर मस्त पड़ा है, पीकर गंदी नाली में।
उल्लू खूब नहा रहा है, गंदी - गंदी गाली  में॥
    नया साल झमेला है।

दास गरीबा खोज रहा है, बासी घर की हाड़ी में।
अमीर ऐयाशी में लपटाया है, रंडी की साड़ी में॥
    नया साल रंगरेला है।

गोवा में नेता जी पीकर, मटक रहा है बार में।
बेटा चिलम खींच रहा है नाईनटी की रफ्तार में॥
    नया साल रसेला है।

चोर फटाका फोड़ रहा है, चढ़ ऊँची दीवार पर।
सिपाही भी झाँक रहा है, बैठे - बैठे द्वार पर॥
    नया साल का चेला है।

जुआड़ी है खेल रहा, नये साल की दांव में।
साहूकार भी बांट रहा है, दस सैकड़ा भाव में॥
    नया साल का मेला है।

युवक - युवती नाच रहे हैं, देखो दरिया पार में।
खूब मदिरा बंट रही है, पंचों के दरबार में॥
    नया साल अलबेला है।

पता - गटटानी कन्या शाला के सामने
अकलतरा रोड, जांजगीर (छग.)

स्‍वतंत्रता पर्व



  • संतोष प्रधान ' कचंदा' 
सारे भारत देश में, लहर - लहर लहराये तिरंगा।
स्वतंत्रता के पावन पर्व पर, जन में उठी उमंगा॥
ये भारत वर्ष हमारा, प्राणों से भी बढ़कर प्यारा।
गली - गली प्रभात फेरी में, गूँज रहा है ये नारा॥

खुशियाँ छायी जन - जन में, तन भी हो गया तिरंगा।
स्वतंत्रता के पावन पर्व पर, जन में उठी उमंगा॥
वीर बहादुर जवानों का, कर लो कुर्बानी याद।
गुलामी की जंजीर तोड़, अंग्रेजों से किया आजाद॥

आजादी की सौगात देकर, छोड़ चले सब संगा।
स्वतंत्रता के पावन पर्व पर, जन में उठी उमंगा॥
हो गयी समाप्त जब, सहनशीलता की मर्यादा।
मन में जागृत हुआ, स्वाधीनता प्राप्ति का इरादा॥

स्वाधीन किया वतन को, बहाकर खून की गंगा।
स्वतंत्रता के पावन पर्व पर, जन में उठी उमंगा॥
सारा देश ऋणि है, शहीद हुए वीर जवानों का।
सदा नत नमन करेगा, ऐसा महा वीर महानों का॥

पन्द्रह अगस्त अमर रहेगा, याद में इसकी जंगा।
स्वतंत्रता के पावन पर्व पर, जन में उठी उमंगा॥

पता - मु. - कचंदा, पो . - झरना,
व्हाया - बाराद्वार, जि - जांजगीर(छग.)

झीलों की नगरी - उदयपुर

     
  • भावसिंह हिरवानी 
      उदयपुर अरावली पहाड़ियों की गोद में बसा हुआ हैं। यहां की प्राकृतिक छटा अत्यंत मनोहारी हैं। इसे सूर्योदय का शहर भ्सी कहा जाता हैं। पर्यटन की दृष्टि से यह शहर अत्यंत मनोरम हैं। महाराणा उदयसिंह के  द्वारा सन् 1567 में इसकी स्थपना की गई थी। पूर्व में मेवाड़ की राजधानी यहीं थी। यह पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा तीन मिलों के किनारे पर स्थित एक आकर्षक शहर हैं।
        हरे - भरे पेड़ों से आच्छारित, उंची - नीची पहाड़ी ढलानों से मुक्त इस नगर की साफ - सुथरी , चौड़ी सड़कों पर घूमने का अपना ही आनंद हैं। चारों ओर , हरी - भरी पहाड़ियां , उनके बीच दूर तक लहराती झीलों का अंतहीन नैसर्गिक अनुपम सौंदर्य देख मन किसी स्वर्गिक आनंद की अनुभूति में डूबने उतराने लगता हैं। प्राकृतिक सुन्दरता तथा पर्यटन की दृष्टि से इसे राजस्थान का कश्मीर कहा जाता है। एक सर्वेक्षण के आधार भारत में उदयपुर की गिनती कश्मीर के बाद दूसरे नंबर पर है।
        पर्यटकों के लिए यहां आटो रिक्शा सबसे बढ़िया साधन है। बस और रेल मार्ग से जुड़े होने के कारण किसी प्रकार की कोई कठिनाई यहां पहुंचने में नहीं होती। ठहरने के लिए यहां हर स्तर के होटल तथा धर्मशाला सुलभ हैं। इस खूबसूरत शहर के दक्षिण - पश्चिम में मनमोहक पिछोला झील है एवं दूसरी ओर यह तीन तरफ दीवार से घिरा हुआ है। यहां सफेद संगमरमर के महल एवं कई प्राचीन मंदिर है। सन 1951 में निर्मित जगदीश मंदिर उदयपुर का सबसे बड़ा एवं भव्य मंदिर है। यहां जगन्नाथ अथवा विष्णु की मूर्ति की पूजा होती है।
       फतेह सागर झील यहां के प्रमुख आर्कषक का केन्द्र है। यहा पिछोला झील से एक नहर द्वारा जुड़ी हुई है। इस झील की लम्बाई 2.40 किमी. चौड़ाई 1.60 किमी. तथा गहराई अधिकतम 25 है। झील के मध्य भाग में नेहरू उद्यान स्थित है, जो चार एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां नौका द्वारा पहुंचने की व्यवस्था सुलभ है। रंगीन फव्वारों से सज्जित यह उद्यान पर्यटकों का पसंदीदा उद्यान है। यहां शाम से रात दस बजे तक पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है।
         नयनाभिराम पिछोला झील 4 किमी. लंबी तथा 3 किमी. चौड़ी है। यह झील पहाड़ियों, महलों, स्नानघाटों एवं तटबंधों से घिरी हुई है। सिटी पैलेस, झील के पूर्वी किनारे पर स्थित है तथा इसके पीछे के दृश्य की सुन्दरता अविश्वसनीय है। झील के अंदर लेक पैलेस होटल, जग मंदिर एवं मोहन मंदिर स्थित है। सिटी पैलेस के समीप बंशीघाट से पूरे दिन नौकायन आसानी से उपलब्ध रहती है।
        इसी के साथ पिछोला झील से पृथक किया गया हिस्सा दूध मलाई, माचला मंदिर, पहाड़ी के टलान पर स्थापित माणिक्य लाल वर्मा उद्यान एवं पहाड़ी की चोटी पर करणी माता की मंदिर भी देखने योग्य है। यहां का भारतीय लोक कला मंडल एवं संग्रहालय भारतीय लोककला नृत्य का अंर्तराष्‍ट्रीय  स्तर का संग्रहालय है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। यहां स्थित सभागार में पर्यटक मोहित करने वाले कठपुतली प्रदर्शक का आनंद उठा सकते हैं।
        यहां की अरावली वाटिका भी एक दर्शनीय मनोरम स्थल है जो झील के किनारे बहुत लंबी पहाड़ी पर फैली हुई है। उसी से लगा हुआ महाराणा प्रताप स्मारक स्थापित है। यह स्मारक फतेह सागर झील के पूर्व में मोती मगरी पहाड़ी पर स्थित है। इस पहाड़ी की चोटी पर महाराणा प्रताप की कांस्य प्रतिमा, उनके विश्वासपात्र घोड़े चेतक के साथ स्थापित की गई है। इस पहाड़ी पर से चारों ओर का मन भावन दृष्य देखते ही बनता है। इसके थोड़ा नीचे वीर भवन म्यूजियम है। इसमें महाराणा प्रताप की पूरी जीवनी आदमकद चित्ताकर्षक चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित की गई है। नीचे के तल में हल्दीघाटी युद्ध तथा चित्तौडगढ़ किले का माडल प्रदर्शित किया गया है। एवं इसके मध्य भाग में उस वक्त युद्ध में प्रयुक्त हथियारों को रखे गये हैं।
         सहेलियों की बाड़ी, जैसे की नाम से ही स्पष्ट है कि यह पहले राजकुमारियां एवं उनकी सहेलियों का मनोरंजन स्थल था। यहां सफेद संगमरमर के हाथी तथा भव्य ऊंचा फौव्वारा का अपना ही आकर्षण है। इसके अतिरिक्त उदयपुर से 5 किमी. दूर पश्चिम की ओर सबसे ऊंची ढलवां पहाड़ी पर 152 मीटर की ऊंचाई पर खड़ा एक मजबूत किला सज्जनगढ़ को देखे बिना उदयपुर का भ्रमण अधूरा ही रहेगा। इस किले से ऊपर झरोखों से उदयपुर शहर का मनोहारी दृश्य देखा जा सकता है। कहते हैं साफ मौसम में दिन के वक्त यहां से चित्तौड़गढ़ के किले को देख सकते हैं। इसमें दो मत नहीं हो सकता कि यहां की प्राकृतिक सुन्दरता को निहारते हुए मन नहीं भरता। यहां पर्यटन के लिए जाने वालों को कम से कम दो दिन का समय लेकर उदयपुर जाना चाहिए तभी यहां के दर्शनीय स्थलों पर घूमने का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है।
  • कबीर प्रिंटिंग प्रेस, गुरूर, जिला - दुर्ग(छग)