सोमवार, 22 अप्रैल 2013

बिरिज कस मोर गाँव

कविता

  • आनंद तिवारी पौराणिक
बरदी के लहुटती
    गली,खोर, येती वोती
    अंगला, दुआर, कुरिया, मकान
    रूख, राई, रद्दा, रेंगान
    जम्मों धुर्रा म बोथाथें
    गईया, बछरू, अन्ते - तन्ते छरियाथे
बरदिहा ह, ह, ह,ह,ह, चिचियाथे
    बन्सी ल बजाथे
    सुरता म मोर भुलाये कन्हैया
    बिरिज कस मोर गाँव भइया
धुर्रा ह तभे चंदन कस
माथ म फबथे कन्दन अस
    जूड़ के घाम दूबर - पातर
    सूरूज नारायन जावत हे अपन घर
खोंदरा म चिरगुन - चिरई
मिट्ठू, मैना, पड़की, सल्हई
    घूमत किंजरत, जंगल - झाड़ी
    पिला बर चारा काड़ी
हम्मा - हम्मा नरियाये, बछरू अउ गईया
सुरता आयव मयारू जसोमति मईया
    देखते - देखत दिन हा पहाथे
    घोर अंधियारी ह घबटाथे
तुलसी चउँरा म होथे दीया बाती
मंदिर - देवाला म भजन आरती
    कदम के सुघ्घर छाँव कस
    नन्द बबा के गाँव कस
मंजूर पाखी आथे अँजोर बगरईया
सुरता आये गोपी अऊ रास - रचईया
    नवा बिहाती कस
    रतिहा ह संवरथे
    पिरीत के लहरा ह,
    मन, समन्दर म संचरथे
नंदिया के धार कस,
अन्तस ह मिंझरथे
सपना के नवा अरथ
जिनगी ह पाथे
    जी, म होथे तभे छपक - छईयाँ
    राधा तिर आ जाथे,किसन - कन्हैया।
  • पता - श्रीराम टाकीज मार्ग, महासमुन्द (छग.)

रविवार, 21 अप्रैल 2013

अमरबेल


 सुशील भोले
सुशील भोले
मंगलू ल जब कभू ढेरा आंटना होय त बस्ती के बाहिर म एक ठन गस्ती पेंड़ हे तकरे छांव म जा के बइठय अउ हरहिंछा ढेरा आंटय। एक पूरा कांसी के डोरी ल आंटे म वोला नहीं - नहीं म चार घंटा तो लगी जाय। आने मनखे कहूं वतका डोरी ल आंटतीस त एक घंटा ले जादा नइ लागतीस। फेर मंगलू ढेरा म आंटय कम अउ गस्ती के पेंड़ म अवइया चिरई - चिरगुन मन ला जादा देखय, तेकरे सेती वोला जादा बेरा लागय।
बड़का बांस के घेरा के पुरती झउरे रिहिसे गस्ती पेंड़ ह। देखब म बड़ा नीक लागय। गद हरियर, साल म दू पइत पिकरी फरय तेनो ह दू - दी, तीन -तीन महीना के पुरती ले अवइया - जवइया मन ला अपन सेवाद चिखावय। पिकरी मन पाक के जब चिरई जाम कस भटहूं रंग हो जाय न, त अच्छा - अच्छा मनखे के उपास - धास ह ओकर चीखे के लालच म टूट जाय। एकरे सेती वो पेड़ म रकम - रकम के चिरई चिरगुन मन ला तको पाते। मार चिंव - चिंव के बंसरी बाजत राहय दिन भर। मंगलू के मंझनिया ह एकरे सेती इहें पहाथे। कइसनों गरमी के चरपरावत बेरा होय फे र गस्ती के छांव हा जुड़ बोलय। एकरे सेती आन गांव के अवइया - जवइया अउ रेंगइया मन घलो वोकर तरी एक घड़ी बिलमें के लालच जरूर करयं।
जुड़ छांव देख के वो मेर ले नाहकत परदेसी के मन म घलो गस्ती तरी एक घड़ी सुरताए के लालच जागिस। वो साइकिल ले उतर के गस्ती तरी गिस, उहां मंगलू ल देख के वोकर मुंह मुंहाचाही करे लागिस। गोठे - गोठ म वो जानबा कर डारिस के ए गांव म एको ठन चाय ठेला नइए। ओकर मन मं उहां नानकुन ठेला राख के चाय अउ वोकर संग अउ कुछू नानमुन जिनिस मन के धंधा करे के बिचार जागीस। वो मंगलू तीर गांव के बारे म पूरा जानकारी ले के खातिर पछिस - अच्छा ए बता भइया ... ए गांव के सरपंच कोन आय ?''
- झंगलू दास''
- ओकर घर कोन मुड़ा हवय ?''
- उही दे ... छेंवा मुड़ा के तरिया तीर।'' मंगलू ह हाथ म इसारा करत कहिस।
परदेसी फेर पूछिस - अभी घर म भेंट हो सकथे का ?''
- कोन जनी भई, उहूं काम - बूता वाला मनखे आय। ऐती - तेती, अवई जवई करते रहिथे। '' मंगलू ल घलो वो मनखे के बारे म जाने बर होइस त पूछिस - अउ तंय कहां ले आवत हस जी ?''
- ए दे ... इही सिलतरा ले।''
- अरे त अतका दुरिहा नगरगांव के सरपंच ल नइ जानस ग।''
- नहीं, मैं सिलतरा के खास रहइया थोरे अंव जी। हमन आने देस ले आए हन ग ... आने देस ले।''
- अच्छा - अच्छा, त खाय कमाय बर आय हौ इहां।''
- हहो ... रात पारी म उहें के फेकटरी म काम चलथे। ऐकरे सेती मंय सोचेंव दिन - मान घलोक कुछू धंधा कर लेतेंव। वोकरे सेती  ऐदे अभी साइकिल म घूम - घूम के चना - मुर्रा अउ बिसकुट - डबलरोटी बेचत रहिथौं। फेर रात कन फेक्टरी म जागे मनखे के दिन भर साइकिल म घुमई ह नइ बनय न, तेकरे सेती इहां नानकुन धंधा खोल लेतेंव, एके जगा बइठ के धंधा करे म सरीर ल थोरिक आराम मिल जातीस।''
- अच्छा, त वोकरे सेती सरपंच ल पूछत हस। तेमा वोकर जगा कोनो मेर ठेला राखे खातिर हुंकारू भरवा सकस।''
परदेसी हीं - हीं - हीं कहिसे हांस दिस, त मंगलू फेर ओला पूछिस - त तंय ह अभी कतका दुरिहा ले घूमथस जी ?''
- अभी ... अभी केहे त सिलतरा ले चरौदा - टांड़ा होवत एदे तुंहर गांव, तहां ले बोहरही - सिलयारी डहार ले कुरूद - गोढ़ी होवत वापिस सिलतरा पहुंच जाथौं।''
- हूं ले का होगे कहिके मंगलू वोला चोंगी माखुर खातिर पूछिस। फेर परदेसी ह कुछु नइ लागय कहिके सरपंच के घर कोती चल दिस। मंगलू ढेरा आंटे ल छोड़ के वोला एक टक जावत देखे लागिस। वो जब नजर ले ओझल होगे तहां ले खीसा ले बीड़ी माचिस हेर के मंगलू धुंगिया उड़ियावत गस्ती पेड़ म ओध के ऊपर डहार ल देखे लागिस। वोह देखिस के उत्ती मुड़ा ले एक ठन कौंवा ह चोंच म अमरबेल के नार ल चाबे आवत हे। आए के बाद अमरबेल के नार ल गस्ती के एक ठन डारा म लामी - लामा ओरम दिस। मंगलू वोकर बारे म जादा गुनीस घलो नहीं। चोंगी चुहके के बाद ढेरा आंटे के बुता ल पूरा करीस तहां ले अपन घर लहुट आईस।
कुछू न कुछू ओढ़र करके मंगलू रोजे गस्ती तरी जाय, कभू गाय - गरू खोजे के बहाना, कभू गस्ती खाए के बहाना ते कभू ढेरा आंटे के बहाना। अब कभू जाय त कौंवा के ओरमाय अमरबेल ल अवस करके देखय। वोला बड़ा अचरज लागय, बिन जर के नार ह अतेक तालाबेली वाला गरमी म घलो कहसे सूखावत नइए। कभू - कभू वो गुनय के गस्ती के जुड़ छांव के सेती वोमा घाम के असर नइ होवत होही तेकर सेती न सूखावत हे, न अइलावत हे। वो ला सबले जादा अचरज तो त लागिस जब पंदरही के बीतत ले अमरबेल ल बाढ़त पाइस। वो अपन आंखी म रमंज - रमंज के देखय अउ गुनय - कौंवा लान के ओरमाए रिहिसे तेन दिन तो सवा हाथ असन दूनो मुड़ा ओरमे रिहिसे, फेर आज डेढ़ अउ दू हाथ होए असन कइसे लागत हे ?''
मंगलू बिना जड़ वाले अमरबेल के बाढ़े के गोठ ल गुनतेच रिहिसे, तहसनेच म भंइसा गाड़ा म जोराके एक ठन लकड़ी के ठेला घलो वो मेर आगे। वोकर संगे - संग परदेसी घलो साइकिल म आ के वो मेर ठाढ़ होगे। तहां ले देखते - देखते ठउका गस्ती के आगू म परदेसी के चाय ठेला चालू होगे।
अब मंगलू के गस्ती तरी अवई ह थोरिक कमती होगे रिहिसे, काबर ते परदेसी के ठेला के सेती वो मेरे लोगन के भीड़ - भाड़ बाढ़गे राहय। गस्ती पेंड़ म चिरई - चिरगुन मन के अवई घलो ह थोक कमतियागे राहय, फेर अमरबेल के फुन्नई ह अतलंग बाढ़गे राहय, वइसने परदेसी के ठेला के बढ़वार ह घलो लागय। जइसे गस्ती पेड़ के रस ल पी - पी के बिना जड़ वाले अमरबेल ह चारों मुड़ा छछलत राहत, तइसने लोक - लाज डर - भय अउ चिंता ने निसफिक्कर परदेसी के ठेला घलो बस्ती वाला मन के रसा ल नीचो - नीचो के छछलंग बाढ़य राहय।
ऐतराब के जम्मों बस्ती म वोकरे चरचा होवय। लोगन काहयं के वो हर तो केहे भर के चाय ठेला, असल म तो वोह जम्मों किसिम के निसा अउ जुआ - सट्टा खेलाए - खवाए के ठीहा आय। ऐकरे सेती उहां जम्मों लंदर फंदर किसम के मनखे मन के भीड़ लगे रहिथे। परदेसी ल गांव के मान - मर्यादा अउ लाज - सरम ले का लेना - देना ? वो इहां के मूल निवासी होतिस, चारों मुड़ा के गांव - बस्ती म वोकर लाग - मानी मन रिहितीन, तब वोला कुछु के बात - बानी हा लागतीस ? वो तो गस्ती पेड़ म बिना जड़ के छछलत अमरबेल कस रिहिसे, जेन सिरिफ दूसर के रस ल पीथे अउ पीये के बाद वोकरे छाती म छछल जाथे।
देखते - देखत परदेसी के धंधा अतका बाढ़गे के वोला एक मनखे के भरोसा सम्हालना मुसकुल होगे। तब वो अपन देस ले नता - रिस्ता अउ लरा - जरा मन ला घलोक बलाए लागिस। चारे पांच साल के बीतत ले आसपास के गांव म परदेसी के नहीं नहीं म सौ - दू सौ अकन परिवार आ के बस गे। अब वो मन ल कोनों गांव म दुकानदारी खोले बर पंच - सरपंच मन ला घलोक पूछे के जरूरत नइ परत रिहिसे। मुड़ भर - भर के लउठी धर के दल के दल जावयं अउ जेन मेर पावयं तेन मेर भुइयां ल अपन बना लेवयं।
अब वोमन सिरिफ दुकानदारी भर नइ करयं। गांव के सियानी अउ महाजनी घलो करयं। बड़का आदमी होय के अहंकार ले भरे मनखे मन के अत्याचार ले त्रस्त जनता मन वोकर मन के मीठ - मीठ बात म झट फंस जायं। तहां ले वोकर मन करा थोक - बहुत करजा बाढ़ी ले के बलदा म अपन जम्मों खेती - खार ल उंकरे नांव म चढ़ा देवयं। अब तो बस्ती के जतका बड़े - बड़े घर दुवार, बारी - बखरी अउ धनहा डोली हे सब वोकरे मन के पोगरइती होगे हे।
मंगलू महीना - दू महीना म एकाद पइत गस्ती पेंड़ करा अभी घलो जावय। एक नजर गस्ती ल देखय अउ एक नजर परदेसी के दुकान ल देखय। दूनो के दूनो चिनहाय अस नइ लागय। गस्ती के पेड़ ह अब अमरबेल के पेड़ बरोबर दिखय न तो वो कर मारे कोनो मेर गस्ती के पान - पतइया दिखय, न पहिली जइसन गुरतुर फर फरय। पेड़ घलो ह कतकों जगा ले सूखा - सूखा के चिल्फा छांड़े अस लागय। ठउका परदेसी के दुकान अउ ए बस्ती के मुल निवासी मन के रूप रंग अउ घर दुवार मन घलो दिखयं। परदेसी के परिवार चारों मुड़ा मार पिंयर - पिंयर दिखय अउ मूल निवासी मन गस्ती के पेंड़ बरोबर जगा - जगा ले चिल्फा छांड़े अस सूखागे राहयं।
मंगलू के खाली बेरा ह अब नंदिया खंड़ के डूमर तरी बीतथे। कभू - कभू जुन्ना सरपंच झंगलू दास घलो उहां पहुंच जाथे। कतको बेर सरकारी स्कूल के बड़े गुरूजी घलो अभर जाथे। तीनों झन जब सकलावयं त पांच साल पहिली के गांव अउ आज के गांव ऊपर जाया गोठियावयं। गुरूजी उनला हमेसा काहयं - बाहिर के मनखे ल इहां खातिर मोह कइसे लागही सरपंच, वो तो इहां पइसा रपोटे बर आए हे, वोकर बर वोला कुछु करना परही वो सबला करही।''
- तभो ले गुरूजी, मान - मर्यादा अउ मानवता घलो तो कुछु चीज आय ... अपन संस्कृति अउ संस्कार घलो तो कुछु चीज होथे। अरे भई, ये देस म अंगरेज मन घलो राज करे हे फेर उहू मन इहां के इतिहास, गौरव, बोली - भाषा अउ संस्कृति संग कभू छेड़छाड़ नइ करीन, फेर एक मन वोकरो ले नहाक गे हें। मंय का सोंच के दुकान खोले खातिर ए परदेसी ल जगा दे रेह हौं अउ ये सब का होगे ?''
- कुछू नई सरपंच,अब कइसनों करके फेर ए गांव अउ देस - राज के सासन - सत्ता ल, धरम - करम के जम्मों ठउर ल हम मूल निवासी मन ला अपन हाथ म ले बर लागही, तभे इहां के मरजाद बांच पाही, नइते हमर पुरखा मन काय रिहिन हें, कइसे करत रिहिन हें, तेकरो पहिचान ह मिटा जाही।''
- ये सब तो ठीक हे, फेर कइसे करे जाय तेला तुहीं मन बतातेव गुरूजी।''
- बस जतका झन समझदार अउ स्वाभिमानी किसम के मनखे हें तेमन ल जोरव, अउ जे मन उनला पंदोली दे खातिर टंगिया के बेंठ बने हें तेमन ल लेसौ - भूंजौ, तहां ले सब ठीक हो जाही। अउ हां, सबले बड़े बात तो ये हे के तहूं मन अपन आदत बेवहार, बोली - बचन, अउ रहन - सहन ल सुधारौ। तुंहर तीर - तखार के मनखे तुंहला छोड़ के वोकर मन के संग म खांध म खांध जोरे काबर रेंगथे तेला गुनौ - बूझौ। काबर ते इही सबके नांव म तो वो मन हमन ल आपस म लड़वावत रहिथें।''
- ठीक हे गुरूजी, हम अपने घर - परिवार अउ समाज म काबर लड़मर के सिरा जाथन तेला तो सोचेच बर लागही। फेर मंय सोचथौं ये टंगिया के बेंठ मन ला सबले पहिली सिरवाए जाय।''
- हां, ये तो सबले जादा जरूरी हे ....।''
मंगलू ह गुरूजी अउ सरपंच के गोठ ल कलेचुप सुनत रहिसे, वो टंगिया के बेंठ ल लेसे - भूंजे के बात सुनके पूछ परिस - गुरूजी ये टंगिया के बेंठ के अरथ ल तो मंय समझेच नइ पाए हौं।''
गुरूजी कहिस - मंगलू, तंय तो किसान मनखे अस। टंगिया - बंसुला के रोजे उपयोग करथस, फेर बता बिना बेंठ के ये टंगिया - बसुला ह कुछु काम आथे का ?''
मंगलू मुड़ ल खजवावत कहिस = नइ तो आवय गुरूजी, कले चुप एके तीर परे रहिथे।''
- हां, बस वइसनेच हमर मन के बीच म जतका झन टंगिया के बेंठ बइठे हें, जेकर मन के भरोसा परदेसी हमन ल चारों मुड़ा ले काटत - बोंगत हे, उही मन ला पहिली सिरवाए ल लागही।''
मंगलू फेर पूछिस - फेर ये मन ला जानबो कइसे गुरूजी ?''
गुरूजी वोला समझाइस - ये तो एकदम सरल हे मंगलू। जेन कोनो मनखे वो मन ल धरम के नांव म, भाखा अउ संस्कृति के नांव म, जाति - समाज या फेर चिटुक सुवारथ म बूढ़के पंदोली देवत रहिथें, उही सबो झन ल पहिली लेसे अउ सिरवाए बर लागही। चाहे वो कतकों हितु - परितु मनखे होवय तभो ओला ढलगाएच बर परही।''
- अच्छा - अच्छा ... जइसे गस्ती पेंड़ के अमरबेल ल सिरवाना हे। त वोकर जतका डारा - पाना मन वोला अपन रस पीया - पीया के पोसत हें, ते मन ला पहिली काट दिए जाय तहां ले अमरबेल खुदे सिरा जाही ... कइसे गुरूजी ?''
- वाह भई मंगलू ... अब्बड़ सुघ्घर बात बोले हस। गस्ती के पेंड़ ल बचाना हे, अउ वो मा नवा डारा - पाना जमवाना हे। त अमरबेल म बिपतियाये जम्मो डारा - पाना ल तो काटेच ल परही। बस इही किसम के परदेसी के जाल ले ये भुइयां अउ इहां के अस्मिता ल बचाए के उपाय घलो हे। बस तुमन दुनों अपन - अपन बुता म भीड़ जावौ। सरपंच जम्मों स्वाभिमानी मन के फौज बनावय अउ तहां ले जन जागरन के बुता करय, अउ तंय ह गस्ती के पेंड़ म नवा डारा - पाना उल्होए के उदिम म भीड़ जा, अउ हां ... जब कभू सौ - पचास नेवरिहा टुरा मन के तुंहला जरूरत परही त वोकर व्यवस्था ल मंय करहूं, ऐ बात के भरोसा देवत हौं। अपन स्कूल के जम्मों पढ़इया लइका मन ला तुंहर संग खांध म खांध मिला के रेंगे खातिर भेज दे करहूं जी, तुमन देखिहौ तो भला।''
गुरूजी के बात ल सुनके मंगलू के मन म फेर गस्ती के छांव तरी बइठ के ढेरा आंटे के भरोसा जागिस। वोकर मन - अंतस म रकम - रकम के चिरई - चिरगुन मन के चींव - चींव के भाखा सुनाए लागिस। वो अपन घर म आये के बाद कोठी कुरिया के संगसा म माढ़े टंगिया ल हेर के मार टेंवना पखरा म टें - टें के अमरबेल ल पोसत डारा - पाना मन ला काटे के उदिम करे लागिस।
पता - 41 - 199, रिक्शा स्टैण्ड के सामने गली,
संजय नगर, टिकरापारा, रायपुर ( छग.)

बरगद का पेड़



  • बाके बिहारी शुक्ल
जब मैं 9 साल का था तभी मेरी मां सन्यपात रोग से तड़प- तड़प कर दिवंगत हो गई। मेरे पिता उन दिनों लीला मंडली में गये हुए थे। मां की मृत्यु से टूट से गये। घर में चार छोटे बच्चे। छोटी सी खेती। साधनहीन परिवार वे बहुत चिड़चिड़े और क्रोधी हो गये थे। बात - बात में अपनी खीझ निकालने के लिए मुझे कम, मेरी बहनों को कम मारते थे। थाली पटक देते थे। उन दिनों हमारे घर मिट्टी की हंडी में भोजन बनता था। उसे अक्सर पटक देते थे। उसके बाद क्या गति होती रही होगी, सहज अनुमान लगा सकते हैं। एक तरह से नारकीय जीवन जी रहे थे। रात में उनके मन में करूणा जगती थी फलस्वरूप हमें एक गाना गाना पड़ता था -
'' जिसके घर में मां नहीं, बाबा करे न प्यार। ऐसे दीन अनाथों के प्रभु, तुम ही हो आधार॥''
ऐसे समय मैं दोपहर चुपचाप गांव के बाहर एक बरगद के पेड़ में चढ़कर उसकी चौड़ी काया में घंटो बैठकर मातृत्व का सुख पाता था। कुछ दिन तो चुपचाप भागवत का एक मंत्र नमो भगवते वासुदेवाय जपा करता था। मेरे बाल मन में आशा थी कि भगवान मेरी मां को वापस भेज देगे। मां तो वापस आ न सकी किन्तु बरगद की मोटी डंगाल को आलिंगन में भर मुझे मन के तन का बोध होने लगा।
धीरे - धीरे किशोरावस्था आई। उच्च शिक्षा हेतु ऊंची कक्षाओं में पर्दापण हुआ। जब भी मौका लगता किताब लेकर उसी पेड़ में चढ़कर अध्ययन किया करता था। एक दिन एक सांप दोनों हाथों से होता हुआ निकल गया। उसके निकल जाने के बाद मुझे बोध हुआ। वहीं से जमीन में नीचे कूद गया। हल्की चोंट आई किन्तु पता चला कोई जीव आदमी को जानबूझकर नहीं काटता इसलिए सबके प्रति हमारे मन में मैत्री भाव होना चाहिए।
किशोरावस्था के कारण दाढ़ी मूंछे आने लगी थी। मन मधुराने लगा था। जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ी, बोध और जानकारी बढ़ी। बरगद के पर्यावरणीय महत्व को भी जाना। छुट्टी में मैं सारी दोपहरी यहीं आकर किताबे पढ़ता था। चिंतन करता था। बाल्यकाल में मेरा यहां आना भले ही पलायन रहा हो अब तो बोध स्थल हो गया था।
गर्मियों में बरगद के पत्ते झड़ते हैं। नये पत्ते आते हैं। यह कार्य साथ- साथ चलता। एक ओर पुराने पत्ते हवा के झोंकों से गिरते रहते हैं, दूसरी ओर नये - नये आकर्षक पत्ते आते रहते हैं। डंगालों की नोक पर नये पत्तों को प्रकृति कितने जतन से प्रकट करती है, उसके आवरण कैसे खुलते थे, दर्शनीय होता था। बरगद के नीचे पुराने पत्तों और आवरण पत्र [रेपर]से भर जाता था। गांव की कुम्हारिने इसे बुहारकर मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए ले जाती थी।
इसके बाद नन्हें - नन्हें फल लगते थे। दोपहर हरे पत्ते से छनकर आती हुई धूप का नजारा जिन्होंने नहीं देखा है, वे इसे एक बार अवश्य देख ले अन्यथा - वृथा गत: नरस्य जीवनम्। छोटे फल क्रमश: बढ़ते थे। उनकी वृद्धि की सुकुमारता के वर्णन के लिए ही मानो जयशंकर प्रसाद ने कामायनी के लज्जा सर्ग में लिखा है -
कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती सी।
गोधूली के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दीपती सी॥
मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों।
सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव विखरता ज्यों॥
भीषण गर्मी के दिनों में जब अधिकांश पेड़ पौधे पुष्प पत्र विहीन हो जाते हैं उन्हीं दिनों बरगद के फल लाल होकर पक जाते हैं। शत सहस्त्र रंग बिरंगे पक्षी कलरव करते पेट भरने हेतु दिन भर डेरा डाले रहते हैं। विशेषकर सलई मैना, हरिल, दूधराज,कोआटेना तोता, पड़की, आदि। पके फल नीचे गिर जाते थे। अपने दूधिया गुण के कारण मिट्टी पैरों में चिपकते थे। बरगद के नीचे फल के सड़ने के कारण मिट्टी बहुत उपजाऊ हो जाती है इसे खेत में डालना गुणकारी होता है।
कहा जाता है कि वृक्षों में बरगद और पीपल सब से बुद्धिमान वृक्ष होते हैं। इसके नीचे साधना जल्दी सिद्ध होती है। कालांतर में इसकी अनुभूति मुझे धीरे - धीरे होने लगी थी। जब मैं प्राध्यापक हो गया तो बड़े जटिल शास्त्रों का अध्ययन इसी के ऊपर बैठकर किया करता था। बाद में इसके ऊपर मचान बनवा लिया जिसमें एक साथ कई लोग बैठकर चर्चा कर सकते थे। मेरे एक साथी प्रभाकर दर्शन जो प्राय: यहां बैठकर मुझसे शास्त्र चर्चा किया करते थे, कई शोध ग्रन्थों को इसके चारो ओर घूम - घूम कर मैने लिखवाया है। प्रदक्षिणा क्या होती है इसका महत्व भी मैं बरगद के चारो ओर घूम - घूम कर जाना। आज भी किसी समस्या का समाधान पाने के लिए मैं बरगद के चारो ओर प्रदक्षिणा का प्रयोग करता हूं।
अब तो इसमें जटायें निकलने लगी है। बरसात में जब धरती नरम हो जाती है उन्हीं दिनों इनमें धरती की ओर तेजी से वृद्धि होती है ताकि धरती इन्हें आत्मसात कर सके। हम यदि वैरभाव, अहंकार त्याग दे तो हमारा सम्पूर्ण परिवेश हमारी सहायता करने लगता है। कविवर टैगोर की एक बंगला रचना का भाव है कि  अब मैं स्वर्ग जाना नहीं चाहूंगा। क्योंकि जब तक पुण्य संचित रहता है तभी तक स्वर्ग में आदर होता है। बाद में तिरस्कार पूर्वक ढकेल दिया जाता है। कोई साक्षु नयन विदाई देने नहीं आता ऐसे समय में हमारी धरती हमें करूणा पूर्वक स्वीकार कर लेती है। बरगद के इस कारूण्य भाव से मैं कई बार अवगत हुआ हूं।
वर्षा के दिनों में भी इसके नीचे मैं कई बार आश्रय ग्रहण किया हूं। वर्षा की बूंदे जब टप - टप इस पर पड़ती है तो ओंकार नाँद की अनुभूति होती है। इसके नीचे के धरती से जो गंध निकलता है उसकी कोई उपमा नहीं है महाकवि कालिदास ने ठीक ही लिखा है। मां के स्तन्यपान की खूशबू प्रथम वर्षा से भींगी धरती की खूशबू की कोई तुलना नहीं।
बरगद गुलाब जैसा सुगन्धित फूल नहीं देता और न कटहल जैसा फल न ही आम जैसे मंजरिया फिर इसका सौन्दर्य नित नवीन है। हर मौसम में नये नये रंग में प्रकट होता है। एक विराट सौन्दर्य इसके गर्भ में निहित रहता है। मैंने अपने जीवन में इसके रहस्यमय आध्यात्मिक सौन्दर्य का प्राय: साक्षात्कार किया है।
इसकी लकड़ी का कोई फर्नीचर नहीं बनता और न ही पुष्प पत्र फल मनुष्य के सीधे उपयोग में आते हैं। भौतिक दृष्टि से बरगद कोई उपयोगी पेड़ नहीं है। किन्तु जितना आक्सीजन देता है, जितनी घनी छाया देता है। पर्यावरण को जितना संतुलित रखता है, उसका आकलन सामान्य गणित से संभव नहीं है। उसके लिए उच्च गणित का हिसाब अपेक्षित है। मनुष्य केवल आवश्यकताओं [ भौतिक ] के धरातल पर नहीं जीता उसकी मानसिक व आध्यात्मिक भूख भी है। इसीलिए हमारे पूर्वज जहां गेंहू धान आदि अन्न की खेती करते हैं, जहां फल - फूल के लिए उपवन लगाते हैं वहीं चौराहे में तालाब के मेढ़ में मैदानों में बरगद पीपल लगाते हैं। बरगद को देखकर साक्षीभाव को बोध होता है शताब्दियों तक यह मूक दर्शक की भांति खड़ा रहता है विषम से विषम परिस्थिति में भी जी लेता है। धूप ठंड और वर्षा को समान भाव से मुस्कराते हुए झेलता रहता है। गीता कहती है -
दुखेषु अनुद्विग्र मन: सुखेषु विगतस्पृह:
वीत राग भय क्रोध स्थित ही मुनिरूच्यते।
आयुर्वेद में बरगद का जड़ छाल दूध और फलों का औषधीय उपयोग है। पारखी लोग यथावसर इसका उपयोग कर लाभ उठाते हैं इसलिए लोग इसकी लकड़ी को जलाते नहीं अपितु पूज्य मानते हैं। हमारे देश के इतिहास में बरगद को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इलाहाबाद का अक्षयवट तो प्रसिद्ध है ही, गया का बोधिवृक्ष भी विश्वभर में ख्याति प्राप्त है। पहले गांव में बाराती ठहरने का यही प्रमुख स्थान होता था। इसकी डंगाले आकाश में दूर - दूर फैली रहती है। अस्तु मधुमक्खी के बड़े - बड़े छत्ते इसमें झलते देखे जा सकते है। रतनपुर के राजघराने के इतिहास बरगद के इन छत्तो के कारण एक नया रहस्य [दीवान से नियोग]प्रकट हुआ।
महाकवि तुलसीदास ने लिखा है -
को जाने को जैहे जमपुर को सुरपुर परधाम को।
तुलसी हमें भलो लागै जग जीवन राम गुलाम को॥
इसी प्रकार बरगद का व्यक्तिगत अथवा सामाजिक महत्व क्या कितना है यह तो विशेषज्ञ लोग जाने किन्तु मेरे जीवन में इसने इतना सम्बल प्रदान किया है कि मेरा टूटता और बिखरता हुआ जीवन सम्हल गया। मैं आज भी इसके ऊपर मचान पर बैठकर बरसात में अरपा नदी की जलधारा को देखता हूं तो लगता है - अये लब्धं नेत्र निर्वाण। इसी प्रकार इसकी छाया में बैठे शिलापट्टï में बैठकर देश - विदेश के लोगों के चर्चा कर ब्यासगद्दी का बोध प्राप्त करता हूं।
बरगद के ऊपर निहारते हुए अनंत आकाश में मंडराते बाज पक्षी को देखकर अशरीरी का सहज ही बोध होता है-
शुधु विद्यातार सृष्टि नहि तुमि नारी।
पुरूष गढ़ेछे तुमि आपनि अनुहारी॥
बरगद केवल प्रकृति की रचना नहीं है इसे हमारे मन मस्तिष्क ने कला और आध्यात्म ने भी गढ़ा है।
  • पता - बी - 5 नेहरू नगर, बिलासपुर ( छग. )

जब तुम्हारी जिन्दगी

 कविता

संदीप भारती '' होरी ''
जब तुम्हारी जिन्दगी
कोई नाग का वंशज डसे
गीत भर लेना अदिबो उम्र की मधु प्याली में
हर तरह का विष उतर सा जायेगा
ऑसू के संग - संग लहू की लाली में
एक नया आसव स्वत: घुल जायेगा।

जब तुम्हारी जिन्दगी टीसता हुआ कोई घॉव हो
प्यार एक उजड़ा हुआ वीरान कोई गॉव हो
प्यासे होठों पर पड़ा हो आह का सागर
तप रहे सिर से जुदा हो नम्र वक्षस्थल
ढूंढना मेरा पता अक्षर के इस संसार में
दर्द का हर द्वार खुलता जायेगा।

जब तुम्हारी जिन्दगी
भय का नया विस्तार हो
मौत को मजहब बना इंकलाब कर देना
खून की बूंदों पर ताज - ओ - तख्त क्या टिक पायेगा
बौरेगा जन का ह्रदय फिर प्यार की अमराई में
झूमेगा मन सरसों किसी चाह की फगुनाई में।
  • पता - विष्णु मंदिर के पीछे,कहरा पारा, जांजगीर,जिला - जांजगीर - चांपा (छग)

सशक्त नारी

कविता

संतोष प्रधान '' कचंदा ''
संतोष प्रधान '' कचंदा ''
सृष्टि की श्रेष्‍टतम कृति, सबल सशक्‍त नारी।
जल - थल - आकाश का, बन जा तू अधिकारी॥

अबला नहीं, सबला हो , तुम हो बलवती,
धरा गगन पर राज कर, बनकर बुद्धिवती,
खुद को पहचान जरा, जग के महतारी।
जल - थल - आकाश का, बन जा तू अधिकारी॥

दुनिया ताके तेरी ओर, तुम हो जगत जननी,
बाधाओं का वध कर दो, बन विध्र विनाश करनी,
दो मिशाल जग को, जगत के राज दुलारी।
जल - थल - आकाश का, बन जा तू अधिकारी॥

दिल में तूफान भर लो, मन में भर लो आग,
रोना - धोना बस कर बंद, जगा लो अपनी भाग,
देश हित नित कर्म कर,छोड़ों सब लाचारी।
जल - थल - आकाश का, बन जा तू अधिकारी॥

शोषित, अभिशप्त किया, दुष्प्रथाओं ने बांधकर,
नित नया दुराचर सहा, अपने को मारकर,
अब न सह अत्याचार, बन मत बेचारी।
जल - थल - आकाश का, बन जा तू अधिकारी॥
  • पता - मु. - कचंदा, पो- झरना,व्हाया - बाराद्वार, जि- जांजगीर (छग)

नई कविता की समझ

 कहानी

  • गिरीश बख्शी
गिरीश बख्‍शी
प्रेम प्रकाश एक दिन कवि हो गया। उसने पहाड़ पर कविता लिखी - पहाड़ तू क्यों पहाड़ है ? जड़, काला, बुत, अड़ा हुआ। जाने कब से खड़ा है। तू नदी भी हो सकता था। बढ़ाकर अपना लम्बा हाथ रास्ता खोज कहीं से भी बह सकता था। पहाड़ तू क्यों खड़ा है, तू नदी क्यों न हुआ ?
मैं चक्कर में पड़ गया। उसकी यह भयानक पहाड़ी कविता सुन कर मैने पूछा - इसका शीर्षक क्या है ? वह एकाएक जोर से हंस पड़ा। बोला - तुम झोलाधारी गृहस्थ लाख सर पटको पर इसका शीर्षक सोच नहीं सकते। इसका शीर्षक है ... । '' उसने गंभीर हो अपने आये हाथ को एक अदा से नचाकर कहा - पहाड़ की दिशाएं ..।''
इसी तरह जाने क्या - क्या वह लिखा करता, खूब कांट - छांट करता। शब्द उसके सरल लगते पर उसके शब्द कहां से घुसकर किधर से निकल आते कि मुझे लगता यह कविता - अविता नहीं शब्दों का मायाजाल है। या शब्द उसके किसी खोज में है। पर चाहे जो हो, यह तो सच है क वह कवि हो गया। इधर - उधर जाने कितनी छोटी बड़ी पत्रिकाओं में उसकी रचनाएं छपने लगी।
एक दिन वह बड़ा खुश - खुश आया। अपने कंधिया झोला से एक पत्रिका निकाल कर गर्व से कहा - देखो, इसमें मेरी कविता छपी है। पता है कहां से निकली है - दिल्ली से। इसमें जो छप गया न, समझो, वह स्थापित हो गया। एक प्रति तुम्हारे लिए लाया हूं, लो ...।
मैंने डरते हुए उसकी पत्रिका ले ली। कुछ को छोड़ अधिकांश वो नदी, पहाड़ सी ही कविताएं थी। रसोईघर में जंगल आता और जंगल में जाने कहां से हलवाई दुकान आ जाती ? लम्बी - लम्बी कविताएं दो - दो पेज नहीं। बारह - पन्द्रह पेज की। मैं किसी की कविता सूनी डार पर उड़ता पत्नी के पन्ने गिन कर पूछ उठा - भाई, यह तो बताओ। तुम लोग यह कैसे जानते हो कि इसे समाप्त कहां करना है। बीच से शुरू कर दोगे तो भी ठीक और अंत से शुरू कर बीच ईच में खत्म कर दोग तो भी फर्क क्या पड़ता है ? मैं सोचता था - वह नाराज हो जायेगा, पर नाराज नहीं हुआ। उसके मुख पर रहस्यमयी मुस्कान खेल गई - इसकी अपनी टेक्नीक है। तुम सर, तुलसी वाले इसे समझ नहीं सकते। आज मेरे पास समय है। मैं तुम्हें अपनी एक बड़ी ठोस रचना सुनाता हूं, और उसका अर्थ भी समझाता हूं।
मेरे मुंह से अपने आप उच्छवसित पीड़ा के शब्द निकल पड़े - हे राम ...। पर विस्मय विमुग्ध हो गया - अरे, तुम कै से जान गये ? पहले कहीं पढ़ी क्या ? हां, तो कविता का शीर्षक है - हे राम। इसमें मैंने समाज की विसंगति, विडम्बना, पाखण्ड, ढकोसला को एक - एक करके उकेरा है। हां, तो हे राम। कविता लम्बी है पर इसमें उबाउ नहीं है। क्योंकि बीच - बीच में हास्य का पुट है और व्यंग्य की भी मार है तो ... मेरी पीठ पर अचानक एक जोरदार थाप देकर उसने कहा - अरे हां, याद आयी पिछले साल बड़ा मजा आया रे, जब मैंने भागलपुर में इसी कविता को सुनाने लगा ...।
तभी मैं कह उठा - सुनाने लगा मतलब ... उसे मेरा बीच में यूं टोकना अच्छा न लगा। चिढ़ उठा - सुनाने लगा मतलब पढ़ने लगा। वो बच्चन, पन्त, महादेवी के समय में कविता सुनाई जाती थी, गायी जाती थी, अब कविता पढ़ी और समझी जाती है। पहले से अब कविता कठिन हो गयी है। मतलब अब कविता को समझने से पहले कवि को समझना पडृता है। उसके समूचे जीवन को समझना पड़ता है, उसके दृष्टिïकोण को, उसके जीवन दर्शन को समझना पड़ता है। बताया न, कविता कठिन हो गयी है, बहुत कठिन। अब कोई कवि बन जाय सहज संभव्य है। पूरी पंक्ति गलत हो गई है, यह परिवर्तन का युग है बंधु, परिवर्तन को समझो। परिवर्तन को अपनाओ, परिवर्तन के साथ बहो, परिवर्तन ही उन्नति है।
मैं तभी कह उठा - पर भाई, परिवर्तन ही यदि उन्नति है तो हम बढ़त जाते हैं किन्तु मुझे तो सीधे - सादे पूर्व भाव ही भाते हैं। वह बोला - खैर, यह विस्तृत चर्चा का विषय है, इस पर बाद में कभी बहस करेंगे। अभी सुनो - कविता का शीर्षक है - हे राम। हां, तो ... तभी हर्षित दौड़ा - दौड़ा आया। बोला - छोटे नाना, छोटे नाना ... बड़े नाना की खांसी बढ़ गयी है। डांक्टर के यहां उन्हें ले चलना है, आपको बुला रहे हैं।
मैंने मन ही मन हर्षित को धन्यवाद दिया।
एकाध हप्ते बाद वहीं प्रेम प्रकाश कंधे में झोला डाले आ पहुंचा। मैंने मुस्करा कर कहा - हे राम। वह हंस कर बोला - नहीं, नहीं। आज हे राम नहीं। आज हमारे नगर में राष्‍ट्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त कविगण आये हैं। चलो, उन्हें सुनने चले। मैंने सहम कर पूछा - वे भी तुम्हारे जैसे कविता करते हैं। मेरी मूर्खता पूर्ण शंका पर हंस उठा प्रेम प्रकाश - मेरी जैसी ? अरे भाई, हम उनके सामने पिद्दी हैं। कहा न हमारे देश के लब्ध प्रतिष्ठï कवि है। वे हमारे लिए लिखते हैं फिर हम तुम्हारे लिए ऐसा समझ लो। मैंने साथ चलने में असमर्थता जताई - देखो भाई, मैं तो तुम्हें नहीं समझ सकता तो उन्हें क्या खाक समझूंगा। मुझमें इतनी बुद्धि नहीं है कि आधुनिक कविताओं को समझ सकूं। मैं रामलाल से विमल मित्र की कहानी सुन रहा हूं। पर रामलाल की नयी कविता सुनने का आग्रह देख मैं चकित रह गया। उसने विमल मित्र को बंद करते हुए कहा - अरे, चल न यार, आज की शाम बड़े - बड़े कवियों के नाम। मैं बेमन से उठा। प्रेम प्रकाश खुश हो गया। बड़े भारी हाल में घुसते मुझे संकोच हुआ। बड़े - बड़े लोग। मैं पीछे रह गया और रामलाल कंधई झोला वाले प्रेम प्रकाश के साथ मंच के सामने उत्सुक मन बैठ गया। मैंने ऐसा कोना चुना जहां से मंचस्थ कविगण तथा प्रेम प्रकाश रामलाल साफ - साफ दिखाई पड़ते थे।  जैसा मैं था,मेरे पल्ले न पड़ा। जैसे एक टाइपिस्ट जब टाइप करता है तो उसे अक्षर मालाएं ही दिखती चली जाती है, वाक्य विन्यास नहीं उसी तरह मुझे शब्द ही शब्द सुनाई पड़ते, क्रियाएं खो गई, अर्थ जो खो गये और मैं संज्ञा शून्य हो गया। पर आश्चर्य महान आश्चर्य, अपना कथा प्रेमी रामलाल कभी सिर हिलाता, कभी मुसकराता, कभी गंभीर हो जाता, तो कभी ताली बजाकर कह उठता - वाह। वाह॥ वाह॥ उसकी मुद्राएं कविता के साथ - साथ बराबर  बदलती रहती। मुझे उस दिन रामलाल के एक नये रूप के दर्शन हुए। वह कथा के मायालोक के साथ - साथ आधुनिक कविता  के भावों के पहाड़ पर चढ़ सकता है। ऊहापोह के जंगल में भी घूम फिर सकता है। विसंगति, विडम्बना के शब्द जाल में फंसकर उबर भी सकता है ? मैंने हाल से निकलते ही उसके दोनो हाथों को अपने हाथों में भरकर उसे नयी कविता की समझ के लिए जोरदार बधाई दी तो वह अकबकाया। बोल उठा - ये बधाई काहे का भाई। मैं एक साधारण पाठक, इस प्रगतिशील युण की अनबुझ पहेली जैसी बड़ी - बड़ी, लम्बी - लम्बी कविताओं को क्या समझूं ? मैं क्या, मेरा खुदा भी नहीं समझ सकता भाई।
मैं उसकी बातें सुनकर भौचक्क हो गया। पूछ उठा - तो ... तो फिर रामलाल। तुम जब तब सिर कैसे हिला रहे थे। कब अचानक मुग्ध होकर वाह, वाह॥ कहना है और कब एकाएक खुश होकर ताली बजाना है ये सब कैसे समझ रहे थे ? रामलाल ने सहज भाव से कहा - अरे यार, वो तो कविता पढ़ने वाले कवि के बाजू में बैठे हुए दूसरे कवि महोदय के हाव - भाव भंगिमा को देख - देख कर ...।
  • पता- दिग्विजय कॉलेज रोड, ब्राम्‍हाणपारा, राजनांदगांव (छग)

मछंदर

कविता
कुबेर सिह साहू

  • कुबेर सिंह साहू
मछंदर एक
जाल रहा फेंक
समन्दर में।
जाल अति विशाल
करता दिगन्त आक्रान्त
लपलपाता, गिरता छपाक
लक्ष्य को रहा ताक
हिंस्त, शिकारी जानवर की तरह
क्लांत, श्रांत
सारे सागरों, महासागरों
समस्त नदियों, झीलों और तालों को
सारे जलचरों और थलचरों को
लीलने अपने विशाल मुख विवर में।
जाल की बुनावट और बनावट अति आधुनिक
अतिविकसित वैज्ञानिक तकनीक
सोने चांदी के तारों से बना
पश्चिम से पूरब की ओर तना
ऐश्वर्य - अलीक
से लुभाता, उतरता
वर्षों से रिक्त उदर में।
कतरा आखेट
विश्व - मानस - वन में
प्रहार सत के मन में
तीर होता पार नैतिकता के सीने से
सारे मूल्यों का रक्त करता पान
भक्षण भावों का
लुप्फ लेता मानवीय आहों, कराहों का
करता अट्टहास
बढ़ता आता सवार
विकाराल दम्भ लहर में।
पता - ग्राम - भोढ़िया पो. सिंघोला
जिला - राजनांदगांव ( छग.)

शब्‍द बोलते हैं

कविता

  • डिहुर राम निर्वाण '' प्रतप्त ''
गांवों की पगडंडियों में,
नदी - नालों की कल - कल ध्वनियों में।
पर्वत - जंगल की झूमती टहनियों में
मरू में खद वृंद भी शब्द बोलते हैं॥

    ज्ञानी विज्ञानियों की कण्ठों में
    कविता गीतों के रस बंधों में।
    वेद, पुराण, गीता के स्वर छन्दों में
    मधुमय ताल लिए शब्द बोलते हैं॥

क्षेत्र, भाषा, बोली पहचान लिए
संस्कृतियों के विविध निशान लिए।
आस्थाओं के प्रचुर प्रमाण लिए
बन भावों का मन मयूर शब्द बोलते हैं॥

    ईश्वर, अल्लाह,प्रभु ईसा से निकले
    सूर, तुलसी,कबीर वाणी से फिसले।
    गांधी, गौतम, नानक के समभाव मिले
    सत्य, शांति के पथ में शब्द बोलते हैं॥

ले ल अपना प्रेमाधिकार
करो किसी से न दुत्कार।
मानव मन से सब करे पुकार
एकता, समरसता में ही शब्द बोलते हैं॥

    भेद भाव को सभी भुलाने
    प्रेम पराग मन में फैलाने
    देश धर्म पर एक हो जाने
    नवचेतनाओं में शब्द बोलते हैं॥
                                    पता - स्मृति कुटीर,
भैसमुण्डी, पो- मगरलोड, व्हाया - कुरूद
जिला - धमतरी ( छग.)

रमेश चन्द्र शर्मा '' चन्द्र ''दो गीतिकाएं

 
रमेश चन्द्र शर्मा '' चन्द्र ''
    1
प्रेयसी के नाम पर प्यारी ग़ज़ल
जिन्दगी से आज वह हारी ग़ज़ल

क़ाफ़िये भी ठीक से मिलते नहीं
शाइरों की बुद्धि ने मारी ग़ज़ल

बन के माली लूटते हैं जो चमन
संग चमन के कैसी गद्दारी ? ग़ज़ल

बहिन, बेटी कह रहे व्यवहार में
नज़र उनकी लगती बाज़ारी ग़ज़ल

देखकर मौसम बदलने चाहतें
देखिये कितनी अदाकारी ? ग़ज़ल

अब न चुप बैठे दहाड़े जा रही
सिंहनी सी आज की नारी ग़ज़ल

कौन करता प्यार निर्धन से यहॉ ?
जिन्दगी बिन प्यार दुखियारी, ग़ज़ल
     2
बात - की - बात थी
जीत भी मात थी
चाँदनी थी खिली
मदमस्त रात थी
आप रूठे रहे
आपकी बात थी
हम खिलाड़ी नये
मात - पर - मात थी
आँसू रूकते नहीं
कैसी सौगात थी ?
हम अकेले नहीं
बेबसी साथ थी
जिन्दगी, मौत भी
आपके हाथ थी
पथ का रोड़ा बने
किसकी औकात थी ?
सुख ? आज और अबïï
दुख ? कल की बात थी।
पता - डी 4, उदय हाउसिंग सोसाइटी
वैजलपुर, अहमदाबाद - 380051

शेष नहीं उल्लास

कविता
  • श्याम '' अंकुर ''
श्‍याम '' अंकुर ''

सबके मन में -
मंथरा,
राम चले वनवास।

स्वारथ की कैकयी रोजाना
दशरथ पर भारी पड़ती है
सच की सीता
कैद हुई है
फिर भी रावण से लड़ती है
मक्कारी नित -
कर रही,
दुनिया में अभ्यास।

वानर सेना आज अचम्भित
इसको लंका लुभा रही है
कर्तव्यों को
भूल गई औ
खुद को काँटे चुभा रही है
कल है -
इसके साथ क्या,
आज नहीं अहसास।

दंभी रावण
सबके मन में
अपना राज जमाता फिर भी
मूल्यों का
'' अंकुर '' क्षरण हुआ
हिंसा रोज उगाता फिर भी
हनुमानों की -
देह में,
शेष नहीं उल्लास।
पता - हठीला भैरूजी की टेक, मण्डोला वार्ड,बाराँ
राजस्थान - 325205

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

परिवर्तन

कविता

  • डॉ . परमलाल गुप्त
पहले रहा लाभ का चिन्तन।
राष्ट्र हेतु बलिदान का चिन्तन॥
हँसते - हँसते प्राण त्याग कर।
राष्‍ट्र  - प्रेम का चेत पाग कर॥
    अर्पित कर अपना सब जीवन।
    माना यही कीमती चिर धन॥
    अब अपना इतिहास बदल कर।
    नव विदेश - चिन्तन पर चल कर॥

भुला दिया अपना सब गौरव।
छाया जिसका था जग में रव॥
अंगरेजी का हाथ थाम कर।
लाये भोगवाद के विषधर॥
    सब देशों को दे आमंत्रण।
    बाजारू ग्लेमर का चिन्तन॥
    उन्हें प्राकृतिक दे संसाधन।
    बने गुलाम लुटा अपना धन॥

उनकी सुविधा आदर देकर।
छोड़ा अपना स्वत्व कलेवर॥
एक वर्ग से भरा अपना घर।
जो सत्ता का रहा पक्षधर॥
    बेच स्वत्व लाये परिवर्तन।
    जिसमें काम भोग मनरंजन॥
    लूट खूब निर्धन का शोषण।
    मरे भूख से जो निस्साधन॥

उन्हें अज्ञ तक दे आश्वासन।
मौज उड़ाते सब अनुचर - गण॥
यह भारत विकास का गायन।
ठनक रहा है रहा - रहा कर मन॥
    उठता नहीं क्रांति का जन - स्वर।
    रखता धर्म नशे में छलकर।
    ऊपर से धन लाभ प्रलोभन।
    अटका भोग - तृषा में जन - मन॥
पता - संयोजक,
अ.भा.ग. साहित्यकार परिषद,
बस स्टैण्ड के पीछे, पटना

सूना - सूना, जूनी नाव

                                डॉ . जयजयराम आनंद
सूना - सूना
चारों ओर उदासी छाई
ओठों पर तालों के पहरे
घर आँगन अब सूना सूना।
    घर - बाहर की तैयारी ने
    माँगा तन - मन - धन का हिस्सा
    जिसे सुनाऊँ उसे लगेगा
    सचमुच तोता - मैना की किस्सा
कोर कसर रह जाय न कोई
पूरी हो अवशेष हसरतें
जोड़ रखा सब दूना - दूना।
    जहाँ कहीं भी गया निमंत्रण
    कोई छूछे हाथ न आया
    दूर पास के सब रिश्तों वे
    अपना - अपना रंग जमाया
मिटें लकीरे सब अनचाही
एक भाव था सबके मन में
रिश्ता लगे न जूना - जूना।
शहनाई की अनुगूँजों में
    हंसी - खुशी की अनगिन कड़ियाँ
    पंख लगा सब उड़े पखेरू
    सन्नाटा बुनती सब घड़ियॉ
सबने मिलजुल खुशियाँ बाँटी
सपने हुए अधूरे पूरे
सूनापन - दुख उना - उना।
जूनी नाव
    जूनी नाव बुनें सन्नाटा
    आती याद जवानी

नई नवेली दुल्हन सी थी
सुख सपनों की रानी
लहरों से नाचा करती थी
मीरा सी दीवानी
    भूले नहीं भूलते उसको
    देश विदेशी सैलानी।

जीवन रेखा थी बहुतों की
किया न कभी बहाना
गंगा - जमुना के संगम में
सहजा ठौर ठिकाना
    प्रलय - बाढ़ झंझावतों में
    मनु की बुनी कहानी।

जीवन जर्जर माँ बापू से
मुंह मोड़े सुत दारा
वैसे ही नाविक ने छोड़ा
समझ उसे नकारा
    रह रहा हूक उठे अंतस में
    जग करता मनमानी।
पता - आनंद प्रकाशन, प्रेम निकेतन,
ई 7/70, अशोका सोसाइटी,
अरेरा कालोनी, भोपाल

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

कविता


रमेश कुमार सोनी
बाजार
वह समाधि में है
सावधान
उस बूढ़े शेर की तरह
किसी शिकार की तलाश में
अपनी मासिक आमदनी को
मात्र दो दिन में व्यय कर
पूरे माह भर तक
वह ऐसा ही रहता है।
जड़ता की झूठी समाधि में
अपने दिल दिमाग को
गिरवी रख कर
पूरे माह तक
जिंदा रहता है वह,
हां, उसने हार नहीं मानी है
अब तक जिंदगी से
परन्तु मुस्कुराने के लिए वह
मुखौटे जरूर बदलता है
बदलते वक्त और मौसम के साथ
वैश्विक व्यापार की
पताका उठाए
अपनी सुरसा मुंह लिए
बाजार आ धमकता है
तुरंत वहीं और
निगल जाता है
उसके पूरे घर - परिवार को
जो सिकुड़ते हुए
सूक्ष्म हो गया था
अतिसूक्ष्म॥
2 व्यापार
खरीद सकते हैं आप
कहीं भी - कुछ भी
कीमत लगी पर्चियों वाली
सामग्रियों को
श्मशान के बाजार में भी,
सपने, भावनाएं, संवेदनाएं
चाँद - सूरज, हवा - पानी, प्रकृति
अपनी हस्ती के मुताबिक।
छीन भी सकते हैं इन्हें आप
चाकू टिका, बंदूक दिखाकर
अपहरण की फिरौती मांग
मजबूरी का फायदा उठाकर
अब लाठी और भैंस की
जगह ले ली है
बंदूक और इच्छित वस्तु ने॥
वक्त उनकी ड्यूड़ी पर
चौकीदारी तथा
मौसम गुलामी करता है
मौत को भी छकाते हुए
हममें भी तीन पग से
ब्रम्हांड नापने की कला है,
किन्तु खरीदने - बेचने के चक्कर में
भूल जाते हैं कि लोग
क्रेता है या विक्रेता ?
हैं तो किसके ? कब ?
हर अच्छी - बुरी चीज के व्यापारी॥
  • पता - जे.पी. रोड, बसना ( छग. )

बसंत इस बार

 कविता

  • विजय प्रताप सिंह
सृष्टि को श्रृंगार दो
    प्रकृति को बहार दो
    पतझड़ में वसन - हीन
    पेड़ पौधे याचक से दीन
    छूकर उन्हें दुलार दो
        प्रकृति को बहार दो
    ठिठुरता ठण्ड से सूरज
    वन - उपवन को है अचरज
    निष्प्राण तन में भरो जीवन
    सौन्दर्य शिल्पी करो नवसृजन
    अनुपम कोई उपहार दो
        प्रकृति को बहार दो
    अंगड़ाइयाँ ले , मन प्राण जागे
    तिमिर, आलस्यबोध भागे
    गुलाबी, छरहरी है धूप
    निखर आया है धरती का रूप
    नेह - निर्झर- धार दो
        प्रकृति को बहार दो
    प्रतीक्षित है भ्रमर, तितली
    सरसों की पीली चुनरी खिली
    महकतीं आम्र - मंजरियाँ
    विस्मित हुई दुनिया
    मिलन का पर्व, त्यौहार दो
        प्रकृति को बहार दो
 पता - से.नि.अंकेक्षण, क्लबपारा
महासमुन्द ( छग. )

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

अनुत्तरित प्रश्नों के मेले

कविता

  • दादूलाल जोशी '' फरहद ''
पांव रखें फूंक - फूंक कर, आँख खोल कर चलें।
झूठी होती आंखन देखी, सच होती अटकलें॥

    हाथ हमारे बहुत बौने,
    माने या न माने,
    आसमान में, पंख लगाकर
    उड़ते हैं दाने॥
नारे उगे खेतों में, आंगन में गेहूँ के गमले।
झूठी होती आंखन देखी, सच होती अटकलें॥

    आकृतियां हैं आदमी,
    नोटों के नपने
    देखकर मगन है भोर भी,
    खून सने सपने,
जख्मी और, विकृत होती आस्था की शकलें।
झूठी होती आंखन देखी, सच होती अटकलें॥

    लगे हैं, गली - गली,
    अनुत्तरित प्रश्नों के मेले,
    रोज नये करतब है
    जी भर कर खेलें,
समाधान सम्मुख, सभी, झांक रहे बगलें।
झूठी होती आंखन देखी, सच होती अटकलें॥
पता -  ग्राम - फरहद, पोष्ट - सोमनी
जिला - राजनांदगांव ( छग. )

दर्पण में दोष नहीं ...

 कविता

  • विद्याभूषण मिश्र
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना।
लोग चाहते हैं बातों को, ज्यादा उलझाना॥
    बड़ी बड़ी बातों की दुनिया
        भीतर रोश नहीं।
    युग है आज मुखौटों का
        दर्पण में दोष नहीं।
भीतर ईर्ष्या - द्वेष पालते, बाहर मुस्काना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
    आज खुशामदखोर अहं के
        गरल उगलते हैं।
    करते हैं बाहर से सौदा
        भीतर बिकते हैं।
बुझे दीपकों को मुश्किल है, पुन: जला पाना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
    रिश्ते - नाते हुए खोखले
        मुंह देखा व्यवहार।
    उल्लू सीधा करने वालों
        की है आज कतार।
जब सइयाँ कोतवाल तो काहे, को है भय खाना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
    पल - पल डींग हाँकते रहते
        यश दुहराते हैं।
    चमचे स्वारथ का रस पीने
        शीश झुकाते हैं।
किन्तु असंभव है खोटे सिक्कों, का चल पाना।
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना॥
 पता - पुरानी बस्ती, ब्राहा्रणपारा
मु.पो. - जांजगीर ( छग.)  

मिलावट राम

 विता
  • रामसाय धारिया
मेरा नाम मिलावट राम
करता हूं मिलावट का काम
पाप काटने के लिए जाता हूं चारोधाम।
मेरा नाम मिलावट राम॥


वहां बैठे रहते हैं पंडा पुजारी
करता हूं उनको दान।
खुश होकर वे कहते हैं-
जुग - जुग जियो मिलावट राम।
मरोगे तो जाओगे बैकुण्ठधाम॥
मेरा नाम मिलावट राम॥


उड़द मूंग मसूर चना में
मिलाता हूं काली मिट्टी
दाँतों को लगे तेज गिट्टी
चाँवल के कंकण - पत्थर
हाल मत पूछो गेंहूं का
जिसमें मिलता है कंकण भूसी
जो कोई कुछ बोले
करता हूं उसे राम राम।
मेरा नाम मिलावट राम॥


नारियल तेल में पाम ऑइल डालूं
और बेसन में आटा
सरसों तेल में रिफाईन डालूं
सूरजमुखी में सोयाबीन
ताकि सरकार हो बदनाम।
मेरा नाम मिलावट राम॥
पता - ग्राम पो - झरना, बाराद्वार
जिला - जांजगीर - चांपा ( छग.)

प्रेरक काव्य के सर्जक - ठा. नारायण सिंह

नारायण सिंह ठाकुर
 व्यक्तिव
प्रेरक काव्य के सर्जक - ठा. नारायण सिंह
  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ के साहित्याकाश में अनेक कवियों  ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रदेश की सीमा को लांघ कर राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीयख्याति अर्जित की है। परन्तु कुछ ऐसे साहित्यकार भी हुए जिन्होंने ठोस रचनाएं तो लिखी लेकिन प्रकाशन के प्रति उदासीनता के कारण चर्चित नहीं हो पाये। वे अपनी मौन साहित्य साधना में लगे रहे। ऐसे ही एक कवि है - ठा. नारायण सिंह जिनकी रचनाएं काव्य की कसौटी पर सौ फीसदी  खरी उतरती है।
11 मार्च 1934 को राजनांदगांव जिले के तत्कालीन रियासत छुईखदान में जन्में ठा. नारायण सिंह दसवीं कक्षा में अध्ययनरत रहते हुए कविता लिखने की प्रेरणा अपने शिक्षक जी.पी. सुल्लेरे से प्राप्त कर कविताएं लिखने लगे। बेमेतरा में शिक्षक रहने के दौरान छत्तीसगढ़ के कवि दानेश्वर शर्मा से उन्हें काव्य सृजन की प्रेरणा मिलीं। बाद में समकालीन रचनाओं ने उन्हें काफी प्रोत्साहन किया। उन्होंने अमिधा एवं लक्षणा से ओतप्रोत शैली में काव्य लेखन कर युवाओं को उनकी ताकत का अहसास कराने का प्रयास किया। अब तक उन्होंने लगभग दो सौ कविताएं एवं गीत लिखे हैं लेकिन उनके पास मात्र सौ कविताएं ही संग्रहित है।
ठा. नारायण सिंह ने कविताओं के अलावा निबंधात्मक लेख, बाल प्रहसन, संस्मरण एवं यात्रा वृतांत भी लिखा। वे साहित्य की किसी एक विधा में बंधकर नहीं रहे। उन्होंने पहली रचना रामचरित मानस से प्रभावित होकर तुलसी स्तवन के नाम से लिखी, जो एक कोमल पदावली है।
ओ राम भक्ति के मतवाले, ओ रामरूप के दीवाने,
ओ रमा, रामप्रिय रामदास, तुलसी मेरा शत - शत प्रणाम।
रत्नावली के अनमोल रत्न, नरहरि के ओ आन - बान,
अमर आत्मा आत्माराम, हुलसी के तुलसी प्रणाम।

गुरू ऋण से कभी उऋण नहीं हुआ जा सकता। इस शाश्वत वाक्य को उन्होंने अपनी कविता में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है।
मैं प्राण का दीप सजा लाया, सांसों की इसमें बाती है,
नैवैद्य मात्र ये शब्द मेरे, बस इतनी मेरी थाती है।
मुझ पर गुरूवर की ऋण इतना, क्या कभी उऋण हो सकता हूं,
तेरे चरणों पर ये गुरूवर, अपने को समर्पित करता हूं।

शिक्षकीय जीवन में विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने अनेक कविताओं की रचना की। एक आव्हान गीत की पंक्तियां इस प्रकार है।
बरबादियों को हमीं ने है झेला, कि हमने सदा संकटों से है खेला।
ऊंगली पे गिरिवर उठाया था जिसने,  दुनिया को कान्हा की बंशी सुना दो॥
ये लक्ष्मी की तलवार राणा का माला, शहीदों ने पहनाई मुंडों की माला।
उसी मुंड माला की तुम भी कड़ी बन, मां के सपूतों दुनिया हिला दो॥

ठा. नारायण सिंह रागात्मक काव्य को ही कविता मानते हैं, जो रस, छंद एवं अलंकार जैसे काव्य गुणों से युक्त हो। उनके लिखे चंद दोहे दृष्‍टव्‍य हैं -
पलकों पर सपने सजे, सुख से बीती रैन।
सुबह हुई फिर जिंदगी, सायकल उतरी चैन॥
कौआ रोटी ले गया, बिल्ली खा गयी खीर।
धनिया बैठी सिसकती, ठोंक रही तकदीर॥
एक घाट पानी पीये, बकरी शेर सियार।
राजनीति का भेद यह, जाने सोई होशियार॥

मौजूदा दौर की सबसे भयावह समस्या दहेज पर ठा. नारायण सिंह की लेखनी जमकर चली है। उनकी मान्यता है कि दहेज के खिलाफ अब बेटियों को मुखर होकर सामने आना चाहिए। बेटी को आव्हान करती गीत की ये प्रेरक पंक्तियां -
तो अब तू जाग कि चल पड़, युग की यही पुकार है बेटी,
नहीं भ्रूण में तू मर सकती, जीने का तुम्हें अधिकार है बेटी।
आन - बान गौरव है तू, अपनी ताकत पहचान ओ बेटी
मत बन, मत बन, मत बन, विज्ञापन का सामान ओ बेटी।
इस जंग लगी तलवारों पर अब तू ही धार करेगी बेटी,
इस दहेज के महिषासुर का, तू ही संहार करेगी बेटी॥
शासकीय शिक्षा व्यवस्था पर उन्होंने व्यंग्यात्मक शैली में इस प्रकार कटाक्ष किया है -
गली - गली में अक्षर ज्ञान, स्कूल में भोजन अभियान।
शिक्षक बेचारे हैरान, बच्चों के मुख पर मुस्कान॥
शिक्षा का अब वजन न तौल, खोल सके तो बटुआ खोल।
सावन महिना बम - बम बोल ....॥
ठा. नारायण सिंह ने हिन्दी के अलावा छत्तीसगढ़ी में भी अपनी लेखनी जमकर चलाई है। सम सामायिक घटनाओं पर उनकी कलम बेखौफ होकर चली है। केन्द्र की राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के गठन पर उन्होंने छत्तीसगढ़ी में कुछ इस तरह व्यंग्य किया -
अकल हरागे अटल कका के फीलगुड के चक्कर मा,
अडवानी रथ चुरकुट होगे, सोनिया के टक्कर मा।
सुवारथ के सब संगी साथी, मतलब बर जुरियावत हें,
बिन पेंदी के लोटा कस, ऐती - वोती ढुरकत जावत हें।
कतको सुरकंय चुहत लार ला, कतको के मुंह मा आगे पानी,
मनमोहना मनमोहन सिंह के, मूड़ मा आगे परधानी।
सवैया छंद में होली गीत का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है -
लइका जवान सियान सबो में, फागुन अइसन रंग जमावै।
ऊंच न, नीच न छोटे बड़े कोनो, होरी के रंग सबै रंग जावै॥
रंग - गुलाल उड़े घनघोर के, देवतन देखि के तारी बजावै।
गलियन प्रेम के गंगा बहे, मन कारिख मैल सबै बहि जावै॥
दूषित राजनीति व्यवस्था पर उन्होंने प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से अपनी बात को बड़ी बेबाकी के साथ अभिव्यक्त किया है। पंक्तियां इस प्रकार है -
पोंसे कुकुर चबनहा होगे, कोढ़िया होगे बईला,
दूध - मलाई चांट बिलाई, कर दिन हमला कंगला।
बघवा के माड़ा म होवय, कोलिहा के सत्कार,
ओ बमलेसरी दाई कइसे के होही बेड़ा पार ...।
बखरी म तो बरहा पईधे, धनहा मा पईधे गोल्लर,
इन सावन के अंधरा मन बर, बारो महिना हरियर।
तेल सिरागे, बाती सुखागे, होगे देवारी तिहार,
ओ बमलेसरी दाई, कईसे के होही बेड़ा पार ...।
ठा. नारायण सिंह ने एक ओर कोमल पदावली की रचना की है तो दूसरी ओर वीररस एवं हास्य तथा व्यंग्य से भरपूर कविताओं का भी सृजन किया है।
स्थानीय काव्य गोष्ठिïयों के वे लोकप्रिय कवि हैं। कवि सम्मेलनों की अपेक्षा वे काव्य गोष्ठिïयों को अधिक वरियता देते हैं। कवि सम्मेलनों के फूहड़ प्रस्तुतियों से खिन्न रहने वाले ठा. नारायण सिंह का अभी तक कोई काव्य संकलन प्रकाशित नहीं हुआ है।
विभिन्न अवसरों व शिक्षक दिवस पर वे अनेक बार सम्मानित हुए हैं। दीपाक्षर साहित्य समिति दुर्ग - भिलाई द्वारा राजनांदगांव में आयोजि वार्षिक सम्मान समारोह में ठा. नारायण सिंह को उनकी काव्य साधना के लिए स्व. मेघनाथ कनौजे स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।
सबेरा संकेत
राजनांदगांव (छत्‍तीसगढ़) 

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

स्‍वर्गीय कृष्‍ण कुमार नायक की कुछ रचनाएं


खुद को तपाया था।
  • कृष्‍ण कुमार नायक
अपने पैदा होने के साथ मैं
लोहा हो गया
मेरी मां ने मुझे कोख में लेने के पहले
बहुत दिनों तक भठ्ठी में
खुद को तपाया था।
        मुझे नहीं मालूम -
        अपनी रिक्तता में मेरी मां
        कहां - कहां नहीं भटकी।
        पर यकायक उसके जिस्म में
        सुर्खी उभरी शायद उन दिनों मैं
        भ्रूण हो गया था - मां के महीन इरादों का।
जब मैंने मां के पेट में आंखें खोली थीं
मैंने भीतर ही भीतर
मां के जिस्म को जांचना शुरू कर दिया था
और गहरे भू - कम्प के साथ बाहर आ गया।
        दूध पीते बच्चे मुझे मूर्ख लगते हैं
        मैं लोहा हूं अपनी पैदाइश के साथ
        मैं कुतरता हूं मिट्ïटी के बड़े - बड़े ढेले
        और पचा जाता हूं अपनी अतड़ियां
        कि बारीक से बारीक संवेदन की बूंद
        मेरे इरादों को मां के इरादों से
        कहीं कमजोर न कर दे मुझे।
तपते ज्वार में उफनकर
जैसे मेरी मां मर गई
मैंने उसके ज्वार की गर्मी को
अपने हौसलों से बांध लिया है
और मैं अब अपने लोहे से खड़ा हूं
श्मशान के घेरे में
किन लोगों ने मेरी मां को दफनाया है
अपनी जमीन से हटाकर - कब्र में!!
गजल
पर्दे की ओट में क्या कुछ नहीं होता।
उनकी नजर में है हर कोई सोता॥
    चंदन की खुशबू छिपाने से क्या होगा।
    गालों की सुर्खियाँ छिपाओ तो जाने॥
    ना - ना कहोगे जमाने के डर से।
    आँखों में बसी तस्वीर छिपाओ तो जाने॥

सवालों की झड़ियाँ लगा सकते हो।
इल्जाम मुझ पर अनेकों लगे हैं॥
जवाब तुम्हारे ख्वाबों में कैद हो गए।
साफगोई के इरादे मचलने लगे हैं॥

    औपचारिकताएं टूट जाएं तो बेहतर।
    पहचान गर रिश्तों में जुड़े तो क्या हो॥
    अमानत में बदनीयती अब ठीक नहीं।
    दो अलग राहें एक ही तरफ मुड़े तो क्या हो॥
    ग़ज़ल
चलो चल कर टहल आएं
शायद कोई सड़क निकल आए

खनकता बर्तन मजूर का
घर में घूस जंगल आए

भीड़ बहुत है नदियों की
मछली में एक बदल आए

रहट - जूते बादलों के संग
काला पानी मुकम्मल आए

तरसे हुए चरण उम्र के
संसद ओढ़कर चप्पल आए

गर्म चर्चा फंसी उंगलियों में
क्रोशिए से बुन गजल आए
कविता 
बाहर - ए - रूवाईयात
नगर के पार तो चलें
गांव के कोठार पर ठहरें
मौसम की उदासी की चिंता
रंगीन लगते आसमां के नखरे॥
    आदमी का दर्द को देखने की जरूरत नहीं
    उसे समझा या महसूसा जावे
     मरहम पट्टी बांध कर दर्द दूर करने वालों
    गरीबों की भावनाओं को अब न चूसा जावे॥
माना हमसे कटकर रह सकते हो
आखिर कब तक आवरण में रहोगे
लेकिन आप अपने से अलग जा रहे हो
सोयी आँखों से भी जागरण में रहोगे॥
    गीतिका
उस दिए तले अंधेरा है
आज अंधेरा जलता है
दिए की यह सफलता है।
    है तो यह रात अमावस की।
    पर धरती पर दिन निकलता है॥
    आजाद होगी लक्ष्मी आज।
    उल्लुओं को यह खलता है॥
मत दिए को दिए से लड़ाओ
अपना ही हाथ जलता है॥
उस दिए तले अंधेरा है
जिसमें गल्त हिसाब चलता है॥
    कोई फूलझड़ी ऐसी छेड़ो
    जिसमें झूमकर प्यार पलता है॥
    मेरी ग$जल है उन्हें समर्पित,
    रौशनी को जिनका मन तरसता है।
ग़ज़ल
जो दवा थी वो बेअसर है
और गरीब सारे बेखबर है
    ये लोग सपने की चर्चा कर रहे
    जरूर इनके पास बिस्तर है
कौतूहल में है भीड़ किनारे पर
इस तालाब में कोई मगर है
    मुआइना किया जा रहा है आजकल
    ये किस सदी का खण्डहर है
लोग जिसको पूजते थे शीश झूकाकर
वो किसी फरिश्ते की कबर है
    ग़ज़ल
एक अलगनी - सा है मन
बस नागफनी - सा है जीवन।
बेरोजगार - से हो गए इरादे
अवैध आगजनी - सा है सपने।
बर्खास्त हो गई सादी हकीकत
पुरानी दुश्मनी - सा है अभिनंदन।
मूर्ख, प्यार एक जेबकतरा है
ऊपरी आमदनी - सा है यौवन।
भूख बेताब गर्भपात के लिए
अखबारी सनसनी - सा है राशन।
कविता
जे.पी.कसम
मम्मी ने डांटते हुए
अन्नू से पूछा -
तुमने कन्नू की पुस्तक के पन्ने
फाड़ दिया है क्या ?
नहीं मम्मी विद्या कसम
धरती माता कसम मैंने
नहीं फाड़ी है।
ये कसम और सौगंध
बड़े ही सहज ढंग से
बात - बात में उठाये जाते हैं
आजकल हर प्रदर्शन और
आन्दोलन में
जयप्रकाश नारायण का आर्शिवाद
बराबर उल्लेखित रहता है।
लगता है जे . पी. कसम
भी सच्चाई की प्राथमिकता हेतु

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

छत्तीसगढ़ी राजभाषा और एकरूपता ?



आखिरकार छत्तीसगढ़ी को संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत अध्यादेश लाकर राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू हो ही गई। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने से जो  खुशी छत्तीसगढी के जानकारों को हुई उतनी ही पीड़ा उन्हें हुई जो यह कभी नहीं चाहते थे कि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिले। अब आवश्यकता है छत्तीसगढ़ी को समृद्धिशाली बनाने का। इसके लिए छत्तीसगढ़ी रचनाकारों को छत्तीसगढ़ी में साहित्य लिखने के अतिरिक्त उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान पर भी छत्तीसगढ़ी में सृजन आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि समाचार पत्रों, फिल्मों में भी छत्तीसगढ़ी शब्दों का अधिकाधिक मात्रा में प्रयोग किया जाये। बेहतर तो यही होगा कि आकाशवाणी केन्द्रों द्वारा छत्तीसगढ़ी पर ही विविध कार्यक्रम रखा जाये जिससे आम जन तक छत्तीसगढ़ी सही मायने में पहुंच सके। इसके लिए दूरदर्शन केन्द्र को भी ध्यान देने होगें इसके अतिरिक्त प्राथमिक शिक्षा से ही छत्तीसगढ़ी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये।
छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण को लेकर भी अनेक बातें सामने आने लगी है। पूर्व में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग बोली के रूप में किया जाता था इसी का परिणाम था कि जो जिस क्षेत्र का रचनाकार था वह अपने क्षेत्र के आमबोल चाल का उपयोग साहित्य मे करता था  जिससे छत्तीसगढ़ी में एकरूपता नहीं आ सकी मगर अब जबकि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू हो ही गई है तो छत्तीसगढ़ी में एकरूपता लाना आवश्यक है क्योंकि अलग अलग जिलों में अलग - अलग छत्तीसगढ़ी वाक्यों, शब्दों का प्रयोग किया जाता है। अब मानकीकरण करके एकरूपता लाने से ही छत्तीसगढ़ी का विकास संभव है। तथा इसी से ही छत्तीसगढ़ी को 8 वीं अनुसूची में शामिल कर पूर्ण रूप से राजभाषा का दर्जा दे पाना संभव है।इस हेतु विभिन्न जिले के छत्तीसगढ़ी  जानकारों, साहित्यकारों, विद्वानों, को एक मंच पर लाना होगा और उनके द्वारा ही निर्धारण करना होगा।
राजकाज की भाषा बनने के लिए एकरूपता आवश्यक है। छत्तीसगढ़ी के अनेक रूप है। छत्तीसगढ़ के अन्य - अन्य क्षेत्रों में अलग - अलग प्रकार के छत्तीसगढ़ी का प्रयोग किया जाता है। मगर अब छत्तीसगढ़ी को प्रशासनिक, तकनीकी, वाणिज्य, बैंकिंग, कृषि, कानून कोर्ट, कचहरी, आदि आदि क्षेत्रों में प्रयोग में लाना है। इसके लिए जल्द से जल्द मानककोष बनाने की जरूरत है ताकि पूरे छत्तीसगढ़ में एक ही प्रकार के छत्तीसगढ़ी को इन स्थानों में प्रयोग में लाया सके।
बहरहाल,संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत छत्तीसगढ़ी को अध्यादेश लाकर राजभाषा का दर्जा देने की प्रक्रिया सरकार द्वारा की गई वह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है तथा सरकार बधाई के पात्र है ......।
फरवरी 2008
सम्‍पादक

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

लोकगाथा पंडवानी में श्रीकृष्ण



  • डां. पीसीलाल यादव
भारतीय लोक जीवन सदैव से ईश्वर और धर्म के प्रति आस्थावान रहा है। निराभिमानी और निश्चल जीवन लोक की विशेषता है फलस्वरूप उसका जीवन स्तर सीधा - सादा और निस्पृह होता है। उसकी निस्पृहता और उसकी सादगी लोक धर्म की अभिव्यक्ति लोक साहित्य कहलाता है। लोक देखने में जितना अनगढ़ और अशिष्टï लगता है, वह अंदर से उतना ही सुन्दर और शिष्टï होता है। शिष्टï हो या विशिष्टï हो वह तो लोक की बुनियाद पर ही अविलंबित है। लोक प्रकृति का संरक्षण ही नहीं उसका संवर्धन भी करता है। वह इसलिए क प्रकृति भी लोक के लिए ईश्वर का रूप है। सूर्य,चन्द्रमा, ग्रह,नक्षत्र, तारे, वृक्ष, पर्वत, नदी, समुद्र सब में लोक ईश्वर के दर्शन करता है। प्रकृति के प्रति लोक का प्रेम और समर्पण लोक जीवन का आदर्श है। लोक के अपने देवी देवता है। ये देवी - देवता लोक जीवन के आराध्य हैं उनकी उपस्थिति व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक कार्यों में सहज रूप से दृष्टिïकोचर होती है। लोकगीत, लोककथाएं और लोक गथाएं इन लोक देवताओं की अभ्यर्थना, प्रार्थना और गुनगान से आप्लावित है।
छत्तीसगढ़ का लोक मानस श्रम परिहार के लिए जहां लोक गीतों में नाचता गाता है। वहीं लोक कथाओं और लोक गाथाओं के माध्यम से मनोरंजन के साथ - साथ शिक्षा ग्रहण करता है। लोक गाथाएं लोक जीवन का महाकाव्य कहलाती है। लोक कंठ से उत्पन्न लोक गथाएं लोक निधि हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक परम्परा के द्वारा ये लोक गाथाएं अवरित होती रहती है। पाश्चात्य विद्वानों ने लोकगाथा को बैलेड कहा है। बैलेड के संबंध में फेंरच सिजविक लिखते हैं - सरल वर्णनात्मक गीत, जो लोक की संपत्ति हो और जिसका प्रचार मौखिक रूप से हो वह बैलेड है। जिसका रचयिता अज्ञात तथा वह सम्पूर्ण समाज की संपत्ति है।
छत्तीसगढ़ में अनेक लोक गाथाएं गायी जाती है। पंडवानी, चन्दैनी, ढोला - मारू, गोपी - चंदा, भरथरी, दसमत कैना आदि। इन सभी लोक कथाओं में पंडवानी सर्वाधिक लोकप्रिय है। पंडवानी गायन की दो शैलियां हैं - 1. कापालिक और 2. वेदमती। कापालिक शैली के पंडवानी गायन में दंत कथाएं अर्थात लोक कल्पित कथाएं गायी जाती है। जबकि वेदमयी गायन शैली में कथाएं शास्त्र सम्मत और वेदोक्त होती है। पंडवानी गायन में तम्बूरा और करताल मुख्य लोक वाद्य होते हैं। किन्तु अब समय गत वादयों हारमोनियम, तबला, ढोलक, आदि का भी प्रमुख वाद्ïय के रूप में प्रयोग होता है। पंडवानी गायन की कापालिक शैली लगभग विलुप्त हो चुकी है। वेदमती शैली के पंडवानी गायन श्री सबल सिंह चौहान रचित महाभारत के आधार पर अपना गायन प्रस्तुत करते हैं। पंडवानी महाभारत का लोकरूप है। इसलिए महाभारत की कथा होते हुए भी पंडवानी में लोक का लालित्य और लोक की सोंधी महक अधिक है। कथानक पात्रों की दृष्टिï से कथानक और पात्रों की दृष्टिï से भी पंडवानी में प्रभा मंडल है। लोक की कल्पनाएं, लोक का विश्वास, लोक का चरित्र, लोक का औदार्य और लोक का आदर्श पंडवानी की प्रभुता है।
मैंने प्रारंभ में ही उल्लेख किया है कि लोक के अपने - अपने देवी - देवता हैं। भारतीय जीवन में शिव, राम और कृष्ण सर्वमान्य और सर्वव्यापक है। इनके शिष्टï और लोक दोनों ही रूप हमें दिखाई पड़ते हैं। लोक की व्यापकता शिष्टï से अधिक है। इसीलिए इन देवों का लोक रूप ही लोक जीवन में ज्यादा पूज्यनीय और माननीय है। शिव तो भोले कहलाते हैं। उनका रूप बिल्कुल लोक की तरह भोला - भाला है। राम मर्यादा पुरूषोत्तम है। लोक मर्यादा से बंधे हुए है। उनके चरित्र में लोक की प्रतिष्ठïा और लोक का मंगलकारी बंधन है। कहीं उच्छंखलता नहीं है। जबकि श्री कृष्ण के चरित्र में नटखटपन है। बाल लीलाओं से लेकर माखन चोरी, चीरहरण और रास रचना तक  इस चरित्र के कारण श्रीकृष्ण लोक में ज्यादा रच बस गये। गोवर्धन उठाकर जहां श्रीकृष्ण कृषकों के हित संवर्धक और पूज्यनीय हो गए, वहीं महाभारत मे अर्जुन के सारथी बनकर तथा गीतोपदेश देकर अध्यात्म और जीवन दर्शन के सूत्रधार कहलाए। महाभारत में उनके दिव्य रूप और दिव्य कर्म दोनों के दर्शन होते हैं।
पंडवानी छत्तीसगढ़ का लोक महाकाव्य है। पंडवानी गायन में प्रारंभ से लेकर अंत तक श्री कृष्ण की महिमा का गान होता है। जहाँ श्रीकृष्ण महाभारत के सूत्रधार, अर्जुन के सारथीं वही पंडवानी गायन के वे आराध्य हैं। पंडवानी की कथाओं में श्री कृष्ण का चरित्र का गान तो हुआ ही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पंडवानी गायन का प्रारंभ श्रीकृष्ण की वंदना से होता है। यह क्रम कथा के बीच - बीच में और कथा के अंत चलते रहता है - बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की जय।
श्याम सुखदाई मोर हरधर भाई ग।
भजन बिना मुक्ति नई होय भाई ग।
भजन बिना मुक्ति नई होय भाई ग॥
पंडवानी में पात्रों की बहुलता है। महाभारत का नायक अर्जुन है और पंडवानी का नायक भीम। अर्जुन की अपेक्षा भीम का चरित्र पंडवानी में अधिक मुखर हुआ है। श्री कृष्ण महाभारत और पंडवानी दोनों मे सूत्रधार के रूप में दिखाई पड़ते हैं। पंडवानी का प्रत्येक पात्र चाहे वह पांडव पक्ष का हो या कौरव पक्ष का अपने आप में महत्वपूर्ण है। नायकत्व की दृष्टिï से भी प्रसंगानुसार उनमें सारे गुण मौजूद है पर महाभारत हो या पंडवानी सारे पात्रों में श्रीकृष्ण की अलग छवि है। वे साधारण मानव न होकर पूर्णतम पुरूषोत्तम भगवान है, नारायण के ही अवतार है। उनकी श्रेष्ठïता महाभारत के राजसूय यज्ञ प्रसंग में भीष्म पितामह के इस कथन से सिद्ध होती है - मैं तो भूमंडल पर श्रीकृष्ण को ही प्रथम पूजा के योग्य समझता हूं -
कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्यम:
कृष्णस्य हिकृते विश्वविदं भूतं चराचरम।
एव प्रकृतिरत्मयता कर्ता चैव सनातन :,
परश्च सर्व भूतेभ्यस्तस्मात पूज्यतमो हरि:।
महाभारत : गीता प्रेस श्लोक 23 - 24 पृष्ठ - 780
पंडवानी गायन वाचिक परम्परा द्वारा संरक्षित है। पंडवानी का कोई मूल ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। इसका गायन महाभारत के आधार पर ही किया जाता है। इसीलिए कथाओं में साम्यता है। अगर कहीं वैषम्यता है तो वह लोक के प्रभावी स्वरूप के कारण है। श्रीकृष्ण के बाल चित्रों का चूंकि महाभारत के कथानक से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, अत: श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन नहीं मिलता किन्तु महाभारत के परिशिष्टï भाग हरिवंश पुराण में बाल लीलाओं का वर्णन है। महाभारत में श्रीकृष्ण के बाल चरित्र का वर्णन अन्य पात्रों के द्वारा यत्र - तत्र उल्लेखित है। यथा शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण के हाथों पूतना, बकासुर, केशी, वृषासुर और कंस के मारे जाने, शकट के गिराये जाने तथा गोवर्धन के उठाये जाने का निंदा के रूप में वर्णन मिलता है।
श्रीकृष्ण पांडवों के सखा, मार्गदर्शक और हित संवर्धक है। श्रीकृष्ण की दीन दयालुता की लोक में अनेक कथाएं मिलती है। वे कृपालु हैं। अपने भक्तों की रक्षा स्वयं करते हैं। पांडव तो श्रीकृष्ण के अत्यंत सन्निकट और प्रिय थे। दुष्टï दुशासन द्वारा अपमानित द्रोपती के पुकारे जाने पर उन्होंने अलौकिक रूप से द्रोपती की लाज रखी
रामे ग रामे रामे ग भाई,
पापी दुसासन चीर खींचन लागे भाई,
दुरपती भंवरा कस घूमन लागे भाई।
द्रोपती अपने पतियों और सभा में उपस्थित लोगों से किसी प्रकार की सहायता न पाकर उनकी चुप्पी देख सजल नयनों से श्रीकृष्ण को पुकारती है -
दुख हरो द्वारका नाथ शरण मैं तेरी।
बिन काज आज महराज लाज गई मेरी॥
पंडवों की अहित कामना से दुर्योधन द्वारा भेजे गए महर्षि दुर्वासा व उनके दस हजार शिष्यों के आतिथ्य के समय भी श्रीकृष्ण ने पांडवों की सहायता की। भगवान भास्कर से महाराज युधिष्ठिïर को एक चमत्कारी बटलोही प्राप्त हुआ था, जिसमें पकाये अन्न से असंख्य अतिथियों को भोजन कराया जा सकता था। पर ऐसा तब ही संभव था जब तक द्रोपती भोजन न कर लेती थी। दुर्योधन के दुष्चक्र से दुर्वासा मुनि अपने शिष्यों के साथ ऐसे समय पहुंचे जब द्रोपती सबको भोजन करवाकर स्वयं भोजन ग्रहण चुकी थी। इस विपरीत परिस्थिति में भी भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपती द्वारा स्मरण किये जाने पर स्वयं उपस्थित होकर, उस बर्तन में चिपके भाजी के एक पत्ते को मुंह में डालकर संतृप्त हो गए थे।
अहो दुरपति तोर बटलोही ल लाना ओ,
दु दिन के खाय नहीं, भूख मरत हँव ओ।
अइसे कहिके कृष्ण बटलोही ल मंगइस अऊ बटलोही में चटके भाजी ल मुंह में डार के जोर से डकार लिस।
फलस्वरूप गंगा में अधमर्षण करते मुनि दुर्वासा व उनके शिष्य भी संतुषट हो गए और पांडवों के क्रोध की आशंका से भाग निकले। श्रीकृष्ण अपने आश्रितों के संरक्षक हैं और उनका यही सुदर्शन चरित्र पंडवानी में दृष्टिïगोचर होता है।
श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध को टालने का प्रयास किया, लेकिन होनी को कौन रोक सकता है ? स्वयं श्री कृष्ण भी नहीं। श्री कृष्ण पांडवों की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर कौरव की सभा में गए। उन्होंने दुर्योधन से पांडवों के लिए केवल पांच गांव मांगे। श्री कृष्ण की मांग लोक के संतोष, लोक की उदासीनता, शांति के प्रति समर्पण और लोकजन की सहिष्णुता की परिचायक है। अपार संपत्ति का अधिकारी होकर भी अंश मात्र में संतोष कर लेना लोक का ही कार्य हो सकता है। उन्मादी दुर्योधन ने उनके नीतिपूर्ण वचनों के बदले उनसे दुर्व्यवहार कर अपमानित किया। तब श्रीकृष्ण ने अपना दिव्य - स्वरूप प्रकट किया। श्री कृष्ण के इस रूप को देखकर राजाओं ने मारे भय के आँखें मूंद ली। केवल आचार्य द्रोण, भीष्म पितामह, महात्मा विदुर, संजय और तपोधन ऋषि ही उस रूप को देख पाये। क्योंकि भगवान ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। अपने उस दिव्य विग्रह को समेट भगवान श्रीकृष्ण सभा भवन से उठकर महात्मा विदुर के घर चले गए -
दुर्योधन के मेवा त्याग
साग विदुर घर खायो जी।
पंडवानी तो श्रीकृष्ण की महिमा और गुणगान से ओतप्रोत है। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन का रथ हाँक कर, सारथी बनकर पांडवों की सेवा की -
अगा कृष्ण ह रथे हांकन लगे भाई,
अर्जुन सरसर बान चलावय जी मोर भाई।
श्रीकृष्ण सत्य के संरक्षक है। आत्मग्लानि से पूरित युद्ध न करने की प्रतिज्ञा ठान लेने वाले अर्जुन को प्रेरित कर जीवन की निस्सारता व कर्तव्य परायण का बोध कराया। मोह माया से ग्रस्त पार्थ को जीवन - सत्य का संदेश दिया, जो गीता उपदेश के नाम से जाना जाता है - तू मेरा ही चिंतन कर, मुझसे ही प्रेम कर तथा सबका भरोसा छोड़कर मेरी ही शरण में ही आ जा। उनका उपरोक्त कथन भगवद् गीता का अंतिम उपदेश है। यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं था। यह तो समस्त लोक के लिए है। लोक की ऐसी व्यापकता, परोपकारिता है श्रीकृष्ण के चरित्र और वचनों में।
अर्जुन के बाणों में मर्माहत इच्छानुसार शरीर छोड़ने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की बाट जोह रहे, शर शय्या पर पड़े पितामह से धर्मोपदेश का आग्रह करते हुए श्री कृष्ण ने भीम की प्रशंसा कर कहा - तुम्हारे शरीर छोड़कर इस लोक से जाने के साथ ही सारा ज्ञान भी यहां से विदा हो जायेगा। उनकी यह उक्ति ज्ञान के समादर की पोषिका है। अत: पंडवानी के श्रीकृष्ण संहारक के साथ - साथ शांति के अग्रदूत और ज्ञान संवाहक हैं।
महाभारत युद्ध के पश्चात् श्रीकृष्ण को सती गांधारी के क्रोध का शिकार होना पड़ा। युद्धोपरांत युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं को तिलांजलि देने राजा घृतराष्टï्र, पांडव व गांधारी, कुंती, द्रोपती व अन्य समस्त कुरूवंश की स्त्रियां कुरूक्षेत्र के मैदान में गए। तब गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि - श्रीकृष्ण तुम चाहते तो इस नर संसार को रोक सकते थे। लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया। अत: जिस प्रकार कौरवों का नाश हुआ, उसी प्रकार तुम अपने स्वजनों के नाश का करण बनोगे और तुम स्वत: अनाथ की भांति मारे जाओगे। यही हुआ भी, श्रीकृष्ण चाहते तो उस श्राप को नकार सकते थे। उनका अभीष्टï पूर्ण हो चुका था। इसलिए वे यादवों के संहार का करण बने और स्वयं भी व्याध के हाथों मारे गए। लोक का नियम भला टूटता कहाँ है ? लोक के आदर्श ने लोक के नियम का पालन कर जीवन - मृत्यु के शाश्वत सत्य की रक्षा की। पंडवानी कथा का अप्रतिम उदाहरण है।
श्रीकृष्ण पंडवानी के सूत्रधार हैं। सृष्टा व संहारक होकर भी उन्होंने सत्य का ही पक्ष लिया। शांति के अग्रदूत बने, सामर्थ्यवान होकर भी गांधारी के श्राप को साधारण मानव की भांति स्वीकार कर असाधारण होने का परिचय दिया। पंडवानी का यह नायक इन्हीं लोकधर्मी गुणों के कारण लोक के लिए पूज्यनीय हो गए। पंडवानी लोकगाथा में श्रीकृष्ण का चरित्र लोक के लिए प्रेरणा आगार है। लोक की सुदीर्घ परम्परा का पोषक तथा लोक जीवन का स्पन्दन है।
गंडई - पंडरिया
जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)

व्यंग्य - विधा और शैली



  • प्रो. बांके बिहारी शुक्ल
साहित्य में सत्य शिव एवं सुन्दर का समन्वय रहता है। शिव तत्व की साधना दो प्रकार से होती है। एक यथार्थवादी ढंग जैसे दर्पण में हम अपना चेहरा देखकर सुधार करते हैं। दूसरा आदर्शवादी दृष्टिï जिसमें मान्य आदर्शों के आधार पर अनुकरण करने की प्रेरणा मिलती है।
साहित्य को मुख्यत: दो विधाओं में पढ़ा जाता है, पद्य और गद्य। इनमें भी बहुत सी उपविधायें हैं। गद्य के अंर्तगत एक विधा व्यंंग्य साहित्य है इससे समाज का हित साधन यथार्थवादी ढंग से होता है।
सामान्य बातचीत में भी हम सभी व्यंग्य का प्रचुर प्रयोग करते रहते हैं। जो व्यक्ति अपनी भाषा में इसका जितना अधिक प्रयोग कर पाता है वह समाज में वाकपटु माना जाता है एवं उसे लोकप्रियता भी मिलती है। छत्तीसगढ़ी में एक लोकोक्ति है खाय बर बासी, बताये बर बतासा अर्थात करनी और कथनी में बहुत भेद रहता है।
यद्यपि हिन्दी में व्यंग्य साहित्य आधुनिक काल की देन है तथापि किसी न किसी रूप में साहित्य उदïï्भव काल से रहा है क्योंकि यह कथ्य ही नहीं शैली भी है। वचन वक्रता यह वक्रोक्ति इसके लिए उपयुक्त माध्यम है। संस्कृत साहित्य शास्त्र में आचार्य कुन्तक ने इसे वकोक्ति : काव्यं जीवितमï् कहकर काव्य की आत्मा मान लिया था।
व्यंग्य साहित्य के भी दो रूप हो सकते हैं 1. विध्वंसात्मक या खंडनात्मक व्यंग्य 2. रचनात्मक व्यंग्य। कबीर का पद - मूड़ मुड़ाये हरि मिलै .... भेंड़ न बैकुंठ जाय प्रथम कोटि का व्यंग्य है।
डां. नामवर सिंह ने सम्प्रेषण की समस्या को आधुनिक साहित्य की प्रमुख समस्या माना है। महाभारत के युद्ध के बाद भी यह समस्या उत्पन्न हुई थी। महर्षि ब्यास कहते हैं - उर्द्दबाहु विरोभ्येष न श्रुणेति कहाचन। आज की जटिल मनोवृत्ति को भी अमिधा में कह पाना कठिन होता जा रहा है इसीलिए व्यंग्य साहित्य की लोकप्रियता बढ़ रही है।
डां. रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं कि विकासशील संस्कृति के तत्वों के अनुरूप अपने आप को परिष्कृत करते हुए आप को एक काव्यात्मक भाषा तथा भविष्य प्रक्षिप्त दृष्टिï के लिए अर्थ गर्भ शब्दों का प्रयोग वांछित है। व्यंग्य इस हेतु उपयुक्त है। वैज्ञानिक और मशीनी संस्कृति तथा धार्मिकता का विघटन इसके कारण है। आधुनिक संवेदना में लेखक का नया सौन्दर्य बोध विशेष महत्व रखता है। केक्टस नई सौन्दर्य चेतना का प्रतीक है। व्यंग्य इसका अच्छा माध्यम है।
क्या मानव चिंतन मानव की भौतिक क्रियाशीलता से निरपेक्ष होता है? असंगति तब पैदा होती है। जब प्रतिभा और व्यक्ति को देशकाल निरपेक्ष मान लिया जाता है। प्रतिभा का दबाव कलाकार के भीतर एक वृहद असंतोष से ही उसका संघर्ष प्रारम्भ होता है। व्यंग्य साहित्य इसका ही परिणाम है। आजकल औसत बुद्धिजीवी अजनवीपन, अकेलेपन और संत्रास की माला जप रहा है और चूंकि अपने संदर्भों से असम्पृकृ है। एक धुरीहीनता के शिकार है। आप भारतीय एक स्वप्र भंग से गुजरा है और जीविकोपार्जन की सुविधा और सुरक्षा के लिए वह तथाकथित वैचारिक स्वतंत्रता और रचना आस्था तक छोड़ने को मजबूर है। इसका प्रतिबिंब व्यंग्य साहित्य में दिख पड़ता है।
आज का संसार जितना भी छोटा हो किंतु है बड़ा जटिल। इस जटिलता को व्यक्त करने के लिए अब सरल भाषा सक्षम नहीं है। छत्तीसगढ़ के गांवों में भी किसी व्यक्ति की कुटिलता को व्यक्त करने के लिए कहते हैं - हंसिया बरोबर सीधा हे। एक नजर में यह वाक्य सिधाई को व्यक्त कर रहा है। चूंकि हंसिया का स्वभाव ही टेढ़ा है अस्तु अंतत: टेढ़ेपन को ही इंगित किया जा रहा है। आज की जटिलता को व्यक्त करने के लिए भाषा व्यंग्य की ही हो सकती है।
प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य भतृहरि ने लिखा है - अनादि निधान बह्रा शब्द एव विर्वतायें। यह शब्द अमिधा से कब लक्षणा शक्ति में और कब व्यंग्रा शक्ति में प्रयुक्त होता है इसकी कहानी बहुत जटिल है। इसकी जटिलता हमारे मन की जटिलता के इतिहास से जुड़ा है। उपनिषद की भाषा बहुत सरल है यद्यपि उसकी व्याख्या गूढ़ है। किन्तु आज की भाषा बहुत गूढ़ है भले ही भाव साधारण हो। आधुनिक अमरीकी कविता का प्रारम्भ व्हिटमेन से होता है जिन्होंने भाष में व्यंग्य को अपनाया। लीब्ज आफ ग्रास में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है वह सम्प्रेषण की चुभती विद्या है। इसमें कवि की द्वन्द्वात्मक मानसिकता, उसका राजनीतिक स्वप्रभंग, अंर्तदृष्टा होने का उसका दावा, अतीत के प्रति उसका बदला हुआ रूख कलात्मक पूर्णता की उसकी बदली हुई धारणा और उसके बोध में होने वाले परिवर्तन सबने मिलकर एक नये संश्लेषण को जन्म दिया। अमरीकी कवियों को अपनी विदग्धता और मौलिकता पर अधिक विश्वास है। इसलिए कई बार वे एक नई भाषा का अन्वेषण करता है और वह व्यंग्य होता है जो कभी - कभी पुनर्विन्यास और विस्फोट पैदा करता है।
मानव मन के जटिल भावों को जो कभी - कभी परस्पर विरोधी भी होते हुए एक साथ उदय हो जाते हैं। उन्हें व्यक्त करना बहुत कठिन होता है। उसके लिए अर्थगर्भ शब्दों का व्यंजना शक्ति युक्त वाक्यों का या दूसरे शब्दों में कहे तो व्यंग्य विद्या का प्रयोग अपेक्षित होता है। जैसे कालिदास के कुमार संभव नामक महाकाव्य में भगवान शिव ब्राम्हा्रण का वेश बनाकर पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने जाते है वहां शिव की निंदा करते है। पार्वती बहुत देर तक प्रतिवाद करती है किंतु ब्राहा्रण के चुप न होने पर वहां से उठकर चली जाना चाहती है किंतु तत्काल ब्राहा्रण शिव के रूप में प्रकट हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में पार्वती न तो रूक पाती है और न जा पाती है।
एक अन्य प्रसंग में सप्तर्षि गण पार्वती के विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमांचल के घर जाते है। वहां पार्वती भी बैठी हुई है। अपने विवाह की चर्चा सुन वह वहां से बाहर जाना चाहती है और उत्सुकता वश वहां रहना भी चाहती है ऐसी स्थिति का वर्णन करते हुए कवि लिखते हैं - लीला कमल पत्राणि गणयामास पार्वती।
ऐसी विध या ऐसा व्यंग्य हर बोली और भाषा में व्यवह्रïत होता है। छत्तीसगढ़ी में अधिकांश मुहावरे इसका उदाहरण है जैसे - नाम धरे बर बलिहार सिंह अउ भरना पटाये बर दू आना...।
व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता उसके गागर में सागर समाने की वृत्ति है। या दूसरी भाषा में कहे तो स्थिति स्थापकत्व का गुण कह सकते हैं। अपने गांव में गम्मत देख रहा था। एक नर्तक बहुत अच्छा नाच रहा था। एक किशोरवय बालक टिप्पणी करता है - अरे ... ददा रे ... ऐसना नाच कभू नइ देखे रहेंवं। इसे सुनकर पास बैठे बूढ़े ने कहा लखुर्री सावन म जनमिस अउ भादो के पूरा बाढ़ ले देखके कहथे ऐसना पूरा कभू नइ देखे रहेवं। अर्थात बहुत कम समय में बहुत बड़ी टिप्पणी नहीं दे देनी चाहिए।
व्यंग्य की मार इतनी पैनी होती है कि उसे बर्दास्त करना हर किसी के बस की बात नहीं होती जर्मनी में हिटलर के समय वहां का एक नाटक का विदूषक एक वाक्य कहता था - छेल  ... उस मूर्ख को क्या पता था ? लोग हंसते लगते थे। लोग हंसने लगते थे क्योंकि आगे हिटलर का नाम आता था क्योंकि उन दिनों एक नारा आम था - छेल हिटलर ... अर्थात हिटलर की जय हो। जिसे हिटलर बर्दास्त नहीं कर पाया और उसे व्यंग्य करने के अपराध में दंडित किया गया।
आचार्य भतृहरि ने शब्द के चार भेद बताया है - परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। सबसे सुबोध वैखरी है जिसमें अमिधा गुण होता है व्यंग्य वैखरी से कुछ ऊपर मध्यमा के निकट ही वाणी हुआ करती है जिसमें केवल शब्दार्थ नहीं होता। उसमें कुछ अधिक समझने और बूझने को होता है। आचार्य जी ने शब्दयोग का उल्लेख किया है जहां ध्यानावस्थित होकर साधारण शब्दों में अनकही संकेतों का बोध कराया जाता है।
कबीर की वाणी की समीक्षा करते हुए डां. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कबीर वाणी के डिटेक्टर थे। भाव भाषा में सीधे - सीधे आ गये है तो ठीक अन्यथा वे दरेरा निकाल देते हैं।
बी - 5 नेहरू नगर
बिलासपुर (छ.ग.)

काबर के ओहर गरीब हर ये

कविता

  • पवन यादव '' पहुना ''
बीपत के मोहरा
दुख ऊपर दोहरा
भूखे उठावे
फिकर भर ये
काबर के ओहर गरीब हर ये।

तन हाड़ा - हाड़ा
करजा गाड़ा - गाड़ा
जोत्था के जोत्था
लटलट ले फरे
काबर के ओहर गरीब हर ये।

लहू सुखागे
पोटा अइठागे
दरिद्री के आगी
बंग - बंग ले बरे
काबर के ओहर गरीब हर ये।

कोनो नहीं पूछंता
नहीं कोनो तरंता
हवे कहाँ ककरो
करा समे
काबर के ओहर गरीब हर ये।

जिनगी के गाड़ा
बछुवा के माड़ा
सरी बिपति
ऐखरे बर ये
काबर के ओहर गरीब हर ये।
ग्राम - सुन्दरा, जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

नारी अबला नहीं

कविता 

  • श्रीमती राधिका सोनी

नारी कब थी अबला बोलो ?
मत कड़वाहट घोलो
जो जग की है सृष्टि जननी
जो है बेटी भगिनी
कभी धर्मपत्नी कहलाती
उसकी करूणा, स्नेह में जी लो
नारी कब थी अबला बोलो ?

विदुषी वह थी वेदकाल में
वीरांगना थी युद्धकाल में
कभी दया की प्रतिमा थी
कभी प्रेम की गरिमा थी
अपने मन में तो तौलो
नारी कब थी अबला बोलो ?

वही मदालसा, राधा, सीता
वही सावित्री, गंगा गीता
लक्ष्मीबाई रानी झांसी
वही है गंगा, मथुरा कांशी
कदम - कदम पर साथ तो हो लो
नारी कब थी अबला बोलो ?

नई सही है नया जमाना
छोड़ो राग पुराना
चरणों की दासी मत कहना
अपने सा बराबर समझना
सामंती युग में मत डोलो
नारी कब थी अबला बोलो ?
पता - क्‍लब पारा, महासमुंद (छग) 

दो कविताएं


  • संतोष श्रीवास्तव ' सम'
भोर का तारा
नभ में
अनेक तारे
रात्रि में
रौशनी बिखेरते हैं
टिमटिमाते तारों में,
उस एक तारे का
टिमटिमाना
अलग होता है
उस तारे की चमक
अनेकों पर भारी पड़ती है
उसका देदीप्यमान प्रकाश,
कोई लघु चांद
बन जाने उत्सुक है
वह मोह से दूर
माया से दूर
संकीर्णताओं से परे
सबसे पृथक
अपने अस्तीत्व की
तलाश में फिरता
सारा नभ
उसे छोटा दिखता है
वह किसी रात्रि में
नहीं रहना चाहता
वह प्रात: की ओर
गमन कर जाता है
वह भोर का तारा
बन गया है।
कुंए का अस्तीत्व
वह कुंआ थोड़े जल को
लिए सोचता है -
मुझमें दुनिया डूब सकती है
मेढकों का डूबकियां लगाना,
संसार के प्राणियों का
तरना समझता है।
कुंआ वृहत बन चुका है,
अपने आप में।
वह सोचता है -
दुनियां इतनी है
कुछ कीटों को वो,
दुनिया के सारे प्राणी
समझने लगा है।
किसी समय
कुंए के घेरों के
टूटने पर
जब उसका जल
समुंदर में
गमन कर जाता है,
तो जल वहां
कुंए का नहीं
समुंदर का हो जाता है
और उसे याद आता है
अपने कुंए का अस्तीत्व।
पता - शिक्षक,सरस्वती शिशु मंदिर उ.मा.विद्यालय,
भानुप्रतापपुर, जिला - कांकेर ( छ.ग.)

कालजयी गीतों के प्रणेता - डां. रतन जैन

डां.रतन जैन

  • वीरेन्द्र बहादुर सिंह
वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह
छत्तीसगढ़ की शस्य श्यामला भूमि में आदि कवि महर्षि बाल्मिकी से लेकर छायावाद के प्रवर्तक पं. मुकुटधर पाण्डेय एवं नई कविता के पुरोधा गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं से राष्ट्रीय स्तर की ख्याति अर्जित की है। परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हुए हैं जिनकी रचनाएं प्रकाशन के अभाव में कालजयी होते हुए भी चर्चित नहीं हो पायीं। इसके बावजूद वे उम्र के अंतिम पड़ाव में भी सतत मौन साहित्य साधना में रत हैं। ऐसे ही एक गीतकार है ... डां. रतन जैन।
छायावादी एवं प्रगतिवादी गीत लिखने वाले डां. रतन जैन का जन्म 27 मई 1927 को राजनांदगांव जिले के छुईखदान नगर में हुआ। 1939 में नोआखाली आंदोलन से प्रेरित होकर कविताएं लिखने वाले डां. रतन जैन ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा आयोजित साहित्य भूषण एवं साहित्य रत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की है। उनकी प्रथम रचना समाधि दीप विशाल भारत पत्रिका में प्रकाशित हुई। बाद में उनकी लिखी कहानी लुटेरा जिंदगी पत्रिका में छपी। उनकी कविताएं अब तक छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र से निकलने वाले लगभग सभी समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। वे आकाशवाणी के भी प्रिय गीतकार रहे। आकाशवाणी रायपुर की कवि गोष्ठियों में 1974 से 1992 तक उनकी गीत एवं कविताएं प्रसारित हुई है। इसके अलावा अंचल के अनेक मंचों पर उन्होंने देश के  प्रतिष्ठित कवियों के साथ काव्य पाठ किया है। छुईखदान जैसे छोटे से नगर में होने के कारण एवं प्रकाशन की अल्प सुविधा तथा कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ अंचल के इस कवि का एक भी काव्य संकलन आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया है। संभवत: यही कारण है कि साहित्य बिरादरी में आज तक  उनका समग्र मूल्यांकन नहीं हो पाया है। उनकी काव्य यात्रा अस्सी वर्ष की उम्र में अभी भी जारी है।

डां. रतन जैन कवि होने के साथ - साथ सफल पत्रकार भी रहे हैं। जीवन के प्रारंभिक दिनों में उन्होंने नागपुर से प्रकाशित साप्ताहिक आलोक में सह संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दी। बाद में वे रायपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र नवभारत एवं युगधर्म के  लगातार 15 वर्षों तक संवाददाता रहे।
डां. रतन जैन हिन्दी के अनन्य सेवक है। बसंत पंचमी सन् 1948 को छुईखदान में गठित हिन्दी साहित्य समिति के वे संस्थापक सदस्यों में से एक है। सन् 1961 में समिति का पुर्नगठन होने पर उन्हें सर्वसम्मति से इस समिति का अध्यक्ष चुना गया। अपने सात वर्ष के अध्यक्षीय कार्यकाल में उन्होंने समिति को नई दिशा एवं गति प्रदान की आठ फरवरी 1973 को आयोजित हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की रजत जयंती समारोह एवं इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका के कलेवर को संवारने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्तमान में वे समिति के संरक्षक है।
डां. रतन जैन के साहित्यिक योगदान के छुईखदान की सेवाभावी संस्था प्रेरणा ने 26 जनवरी 1996  को सम्मानित किया। दो वर्ष बाद हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान की स्वर्ण जयंती समारोह बसंत पंचमी 1998 में उनका सम्मान किया गया। जीवन के पचहत्तर वर्ष पूर्ण करने पर हिन्दी साहित्य समिति छुईखदान ने उनका अमृत महोत्सव का आयोजन किया एवं उन्हें सम्मानित कर उनके यशस्वी योगदान को याद किया। मात्र 23 वर्ष की उम्र से शुरू हुई उनकी काव्य साधना आज उम्र के 80 वें पड़ाव में भी निर्बाध रूप से जारी है।
डां. रतन जैन की कविताओं में व्यवस्था के प्रति आक्रोश एवं सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। उनकी इन पंक्तियों में जीवन संघर्ष का सटीक चित्रण हैं-
जीवन के पृष्ठों को मत खोलो, अक्षर - अक्षर चोट चिन्ह है।
शब्द - शब्द पीड़ा की रेखा, पंक्ति - पंक्ति है घाव व्यथा के,
छंद - छंद मेरे अभाव की, गाथाएं स्वच्छंद कह रहे,
अंधकार में भाव चरण मृदु बेबस, अनगिन शूल सह रहे।
उम्र साधना की वेदी पर, कविते तुम जी भर के रो लो,
जीवन के पृष्ठों को मत खोलो ....।
देश की मौजूदा हालत पर कवि की लेखनी कुछ इस तरह बेबाक होकर चली है -
शक्ति अभिव्यक्ति पुरानी, शोषण के सब श्रोत वही है।
दुल्हर धर हथेली देती, किन्तु भ्रष्ट आचरण खड़े हैं,
मंदिर कलश पुराने केवल, मूर्ति के पत्थर बदले हैं।
गीत वही है छंद वही है, केवल युग के स्वर बदले हैं,
परिवर्तन के संग्रह में बस,
नाविक बदले, धार न बदली, जीर्णशीर्ण जलपोत वही है,
वही
पृष्ठों के अक्षर बदले हैं
अपनी उत्पात शीर्षक कविता में कवि ने भयानक रस की भयावहता का चित्रण इन शब्दों में किया है -
लूटपाट हत्याओं की यह आयी कैसी अशुभ घड़ी है,
चौराहे पर बिना कफन की, नंगी विकृत लाश पड़ी है।
मरघट के सन्नाटे जैसा, सारा चमन उदास हो गया,
भाई से भाई का रिश्ता, अर्थहीन परिहास हो गया।
डां. रतन जैन की कविताओं में उपमा, अलंकार का सर्वाधिक प्रयोग दिखाई पड़ता है -
सुबह का सूरज सोया - सोया, सांझ सुहानी सरमायी सी,
रात वियोगिन खोयी - खोयी, दीपशिखा सी अलसाई सी।

उनकी कविताओं में छायावाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है -
नीली अलसी का राग नगया, अरहर को मिला सुहाग नया।
आंगन में घुंघरू बोल उठा,  मन मीत चने का डोल उठा॥
कवि का लेखनीय पिछले छह दशक से साधनरत है। हर स्थिति एवं घटनाक्रम पर कवि ने अपनी लेखनीय के माध्यम से अपने विचारों को मुखर होकर अभिव्यक्त किया है।
कवि बचपन की ओर लौटना चाहता है -
एक बार फिर से आ जावो प्यारा बचपन,
सुख का अनुभव कर लेगा यह बोझिल जीवन।
मां की दृष्टि पूर्णिमा जैसे ताजमहल है,
लोरी जिसकी अमृत जैसी गंगाजल है।
मां की मुस्कानों में हंसता जग का आंगन,
एक बार फिर आ जा ....।
कवि दुनियावालों से अपनी गीतों को गाने का अव्हान कुछ इस तरह करता है ताकि उनके गीत अमर हो जायें -
मेरे गीतों को स्वर दे दो,
मैं मरूं या छला जाऊं, दुनिया से दूर चला जाऊं,
लिखना ही मेरा कर्म बना, शब्दों की रचना धर्म बना।
जगवालों इन्हें अमरता का कोई भी सरल डगर दे दो,
मेरे गीतों को स्वर दे दो ...।
ऋतुराज बसंत का वर्णन कवि ने अत्यंत ही सार्थक शब्दों में इस प्रकार किया है -
मौसम की पालकी में आया बसंत है।
मदहोशी मस्ती की सीमा अनंत है॥
मौर मुकुट पहन लिया अमराई ने सरे आम,
कवियों ने गटक लिया छंदों का भरा जाम।
कोकिला बेसुध है ऋतुपति के प्यार में,
वसुधा उल्लासित है, सुरभित श्रृंगार में।
केशर की क्यारी में काश्मीर कंत है,
मौसम की पालकी में आया बसंत है।
डां. रतन जैन हिन्दी के अन्यय सेवी है। उन्होंने अपनी पंक्तियों में हिन्दी को हिन्दुस्तान कहा है -
हिन्दी भव्य विशाल सरल है, हिन्दी मधुर महान है।
हिन्दी है ध्वनि प्रखर हिन्दी की, हिन्दी हिन्दुस्तान है॥
कवि गीतों को ही अपनी जिन्दगी का मीत मानता है और अगला जन्म भी भारत में ही लेना चाहता है -
गीत मेरी जिन्दगी का मीत हो गया।
वर्तमान  ठूंठ सा अतीत हो गया॥
चाहता हूं मौत पर बस गीत कफन हो,
अगला जनम हो तो यही मेरा वतन हो।
दर्द मेरे द्वार का संगीत हो गया,
गीत मेरी जिन्दगी का ....।

डां. रतन जैन को फूलों से नहीं बल्कि कांटों से प्यार है -
फूलों से तो चाव नहीं है, पर कांटों से प्यार मुझे,
कांटों में ही पला - बढ़ा हूं, देते हर्ष अपार मुझे।
संघर्षों से तपकर निकला, वह कहलाता है कुन्दन,
मधुबन की क्यों लिप्सा पालें, शूल माथ का जब चंदन।
दुनिया वालों ने दिखलाया, सपने झूठ हजार मुझे,
फूलों से तो चाव नहीं है ....।
कवि कर्मयोगी है और केवल अपना कर्म करना जानता है। उन्होंने फल की आशा कभी नहीं की। यही भाव उनकी पंक्तियों में इस प्रकार आया है -
हाय - हाय में ढलता है दिन,
कैसी कटती रात न पूछो, मेरे मन की बात न पूछो।
मेरे गीत कुंवारें ही हैं, मैंने बहुत संवारे भी है॥
कौन निराशा में डूबा है, कौन हुआ प्रख्यात न पूछो,
मेरे मन की बात न पूछो।
जीवन की सांध्य बेला में कवि ने अपनी भावनाओं का इजहार कुछ तरह किया है -
जीवन की ढलती संध्या में ये मेरा अंतिम पड़ाव है,
बूढ़ा बरगद, पावन पीपल, अमराई से भरा गांव है।
सांझ की बेला धारा गहरी, तूफानों के बीच नाव है,
जीवन की ढलती संध्या में ...।
माटी सोंधी मेरे गांव की, मुझको लगती बड़ी सुहानी,
जिसका कण - कण पावन उज्जवल, पुण्य परम वंदित बलिदानी।
जन्मभूमि की शैय्या में ही सो जाने की प्रबल चाव है,
जीवन की ढलती संध्या में .....।
अपनी कविताओं एवं गीतों में जीवन के दुख - सुख, हर्ष - विषाद, सौंदर्य बोध और करूणा तथा जीवन दर्शन को स्थान देने वाले एवं हर प्रसंग, पर्व त्यौहार, मौसम एवं जीवन  प्रसंग  पर अपनी लेखनी सलाकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले डां. रतन जैन छुईखदान ही नहीं वरन छत्तीसगढ़ अंचल के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी रचनाएं अगर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हो जाये तो साहित्य के भंडार में एक और नगीना शामिल हो जायेगा मगर

आवश्यकता इस अनमोल नगीना को पूरी ईमानदारी के साथ पहचानने की है ....।
सबेरा संकेत, बल्‍देवबाग, राजनांदगांव